हमर छत्तीसगढ़ी बोली ल राज भाषा बनाये बर जम्मो भाई बहिनी मन ल किरिया खा के बाना उठाए ल परही. वैसे छत्तीसगढ़ी राजभाषा के नाव मा दुकानदारी घलो चलत हे. एखर ले हमर भाखा के भला नि होवे, एक ठीक बूता म अरझे रहेव तेखर सेती धरना मा नि पहुच पायेवं, जम्मो संगवारी मन ल मोर पैलगी........... Lalit Sharma

चेतना साहित्‍य अउ कला परिषद डहर ले पद्मश्री डॉ.महादेव तिवारी जी, गिरीश पंकज जी, ललित मिश्रा जी, मीर अली मीर जी ह रायपुर म गुरतुर गोठ के करिस सम्मान.

नील पद्म शंख

Sitaram Patel

अघवा: मया के सपना पिछवा: घोर कसमकस परदा भीतरी ले मया आगि हवय, कोन्हों बुता नी सकंय। मया धंधा हवय, कोन्हो जान नी सकंय।। मया मिलाप हवय, कोन्हों छॉंड़ नी सकंय। मया अमर हवय, कोन्हों मेटा नी सकंय।। जान चिन्हार

मेछा चालीसा

मूंछ

मैं पीएचडी तो कर डारे हंव अब डी-लिट के तैयारी में हौं। मोर विषय रही ‘मेंछा के महिमा अऊ हमर देस के इतिहास’ मोला अपन शोध निर्देशक प्रोफेसर के तलाश हे। कई झन देखेंव पर दमदार मेंछा वाले अभी तक

कहिनी : बाढ़ै पूत पिता के धरम

Shyam Lal Chaturvedi

सनेही महराज सब नौकरी के दिन पूरा करके गांव म जाके खेती-पाती करे लागिस। ये महाराज ले ओकर महराजिन हर चार आंगुर आघू रहिस। बिहनिया कहूं चाह पियत म राउत आ जातिस। तब अपन चाह पिआई ल छोड़के ओकर बर

छत्‍तीसगढ़ी कथा कंथली : ईर, बीर, दाउ अउ मैं

Dadulal Joshi

- डॉ. दादूलाल जोशी ‘फरहद’ लोक कथाओं के लिए छत्तीसगढ़ी में कथा कंथली शब्द का प्रयोग किया जाता है। यह वाचिक परम्परा की प्रमुख प्रवृत्ति है। कथा कंथली दो शब्दों का युग्म है। सामान्य तौर पर इसका अर्थ कहानी या