फरहार के लुगरा अउ रतिहा के झगरा
एक बार वर्मा जी के घर गे रेहेंव। वर्मा जी ह अपन सबो लइका मन बर एके रंग के कुरता अउ एके रंग के पेंठ बनवा दे राहय। देवारी के भीड़ में भी वर्मा जी के लइका मन कलर कोड से चिनहारी आवय। अइसे लगय जइसे सबो झन एके इसकूल के पढ़इया लइका आयं। मैं देखेंव तब मोर मन परसन्न हो गे। उही दिन ले मैं सोचे रेहेंव कि इही परयोग ल मैं अपनों घर दुहराहूं।
आसो के तीजा में सबो बहिनी मोरे घर अवइया रिहिन। तीजा माने बहिनी, भांचा-भांची अउ दमाद मन के पिकनिक। तीजा माने बहिनी मन के सम्मेलन, तीजा माने भाई मन के उछाह। तीजा माने भाई-बहिनी मन के दु:ख-सुख बांटे के तीन दिन के अधिवेशन। बहिनी मन आसो के तीजा में मोर घर आ गे। दुरुग, नांदगांव, बलौदाबाजार सबो तरफ के भांचा-भांची मन घलो आ गे। करेला भात खाइन अउ उपास रहिन। निरजला उपास के कारण सबो झन लरघिया गे राहय। कइसनो करके शंकर-पारवती के भजन करत रतिहा पहाइश। फरहार के दिन आइस तब सबो के कुम्हलाय चेहरा मन में थोकिन खुशी के फुहार पड़ गे। चरचर ले जम्मो बहिनी मन रानी कलर के लुगरा पहिनिन। भांचा मन बर कत्था रंग के पेंठ अउ फीका पींवरा रंग के कुरता। भांची मन बर संतरा रंग के फराक बनवा देंव। कुल मिला के दू थान कपड़ा तीन रंग के बिसाएंव।
मोर मन में उछाह समा गे। सबो झन अलगेच चिन्हावय कि ये मन मोर घर के सगा ये। उही दिन गनेस चतुर्थी राहय। चौबे जी ल बला के कथा कहाएंव। दमाद मन घलो पहुंचे राहय। ये तीन दिन ले मैं हा सरग के सुख पाएंव। कथा खतम होय के बाद पंचामृत अउ परसाद बांटे गीस। सबो लइका के मुंह गबर-गबर चलत राहय। मैं अपन लइका ल बड़का बहिन दमाद ल बलाय बर केहेंव। ठउके लइका ह परसाद ल मुंह में भरे राहय। मोर आज्ञा के पालन होइस। लइका ह फूफा कहिस अउ रोए लगिस। मैं लइका ल अपन तीर में बला के पूछेंव ‘बेटा! का हो गे?’ वो कहिस मैं परसाद खावत रेहेंव। फूफा ल बलाएंव तब फू…फा… कहे में मोर मुंह के जम्मो परसाद ह बाहिर फेंका गे। लइका फेर रोये ल धर लीस। पंडित जी मेर ओला फेर परसाद देवाएंव। परसाद खा के कभू अपन फूफा ल हांक नइ पारना चाही। बहिनी मन के फरहार चलत राहय। अइसे लागय के दूरिहा तक ले लाल गुलाल ह रिगबिग ले फुले हे। एके रंग के साड़ी में नजर भर जावत रहिस हे।
ओ मन ला गनपति के दरसन करा के आवत ले संझोती हो गे। ठउका छै बजे लाइट ह गोल हो गे। लाइट का गोल होइस जीव के काल हो गे। छोटे भांचा ह फुग्गा बर रिसा के घोण्डे राहय। दू ठन फुग्गा ल फोर डरे राहय। तभो ले अउ मांगत राहय। काम करइया नोनी ह बता दीस ‘गुड्डु फुग्गा बर घोण्डे हे’। देहात में बाबू माने गुड्डु अउ नोनी माने गुड्डी। पलंग तरी सपटे भांचा के हाथ ल तीर के बड़े बहिनी ह दंदोर के पीट देइस। लइका कलबला के रोइस अउ अपन मां जघा पहुंच गे। असल में गुड्डु सुन के बड़े बहिनी समझिस के मोर लइका के नाम गुड्डु हे कहिके अंधियार में जा के छोटे बहिनी के लइका ल दंदोर दे राहय। सब्बो झन के एके रंग के कपड़ा होय के कारण चिन्हारी नइ हो सकिस। भांचा ह रोवत जब छोटे बहिनी जघा गीस तब दूनो बहिनी के झगरा मात गे। तैं मोर लइका ल काबर पीटेस? ओ रिसाय रहिस तब रिसाय रहन देतेस, थोकिन में मान जतिस। ले तो अपन लइका ल ओतके असन पीट तब जान हूं। बड़े बहिनी सफाई दीस ‘अंधियार में नइ चिन्ह सकेंव बहिनी’। ये झगरा कइसनो करके माढ़िस।
दमाद मन घूम फिर के आइस तब मंझला दमाद ह अपन बाई मेर गिल्ला मंजन मांगिस। अंधियार में अपन बाई के भोरहा में ओ हा अपन सारी के हाथ ल धर परिस। अतका ल देखिस तब छोटे दमाद भड़क गे। जब देखबे तब तैं हा ओला छेड़त रहिथस यार। ये हा अच्छा बात नोहय। आन बखत अइसने करबे तब ठीक नइ हो ही। बहिनी मन के झगरा सिराइस तब दमाद मन के शुरू होगे। मंझला दमाद ह तर्क दे लगिस- ‘अरे यार ये मन एके रंग के लुगरा पहिन ले हे। अंधियार में चेहरा नइ दिखिस, तेखर सेती धोखा हो गे।’
बाहिर ले घूम फिर के आएंव तब बाई ह मोर बर बाहरी धरे खड़े राहय। तोर मेचिंग के चक्कर में घर में दू बार झगरा माढ़ चुके है। आज ले तैं कसम खा ले कभू एके रंग के कपड़ा झन लाबे। महूं कसम खाएंव। रतिहा सुग्घर खेक्सी साग रांधे राहय तभो ले बहिनी दमाद मन पेट भर नइ खा के, थोक-थोक खा के उठ गे। माने झगरा के परभाव ह अभी तक मेंटाय नइ रिहिस।
बिहनिया दमाद मन ल घलो पेण्ठ शर्ट भेंट करेंव। तीनों एकेच रंग के राहय। दमाद मन कहिन ‘भइया, ये कपड़ा ल तीनों झन सिलवा के पहिनबो, तब देखइया मन कहीं- बेण्ड पार्टी वाले मन आ गे’ अइसे कहिके सबो झन कपड़ा ल पटक दीन। मैं दूसर ले के देबर वादा करेंव। बहिनी मन के मुंह उतरे राहय। जाये के बेरा ओ मन पांव परिन अउ एके बात कहिन:
काबर ले हस इभया, एके रंग के कपड़ा-लुगरा।
रतिहा हमन बहिनी-बहिनी, हो गे हावन झगरा॥
डॉ. राजेन्द्र पाटकर ‘स्नेहिल’
268- हंस निकेतन कुसमी,
व्हा. बेरला, जिला दुर्ग (छ.ग.)


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