सनत के छत्‍तीसगढ़ी गज़ल

1

डहर-डहर मं घन अंधियार होगे,
बिहनिया हमर नजर के पार होगे।
जेखर उपर करत रेहेंन विसवास,
वो हर आजकल चोर-बटपार होगे।
पहिरे हावय वो हर रंग-रंग के मुखउटा,
चेहरा हर ओखर दागदार होगे।
जॉंगर टोरथन तभोले दाना नइ चुरय,
जिनगी हमर तो तार-तार होगे।
मर-मर के जीना कोन्‍हों हमर ले सीखय,
हमर बर जीत ह घलो हार होगे।
गलती करके मूड़ मं चघा पारेन,
वो ह हमरेच्‍च मुड़ के भार होगे।
घर गोसिया ल पहुना ह डरवावय,
अब तो जेखर मार तेकर सार होगे।

2

इहॉं आके संगी तैं का पाबे,
अलकरहा जिनगी पहाबे।
आसा के महल धसक जाही,
सपना ला देखत रहि जाबे।
कतको कमाबे नई पुरही,
तैं पेट के आगी मं झंपा जाबे।
लोटा-लोटा पीबे आसुवासन,
बटकी-बटकी भासन ला चबाबे।
छोड़ दिहीं जम्‍मो अमीर ल,
तैं गरीब होरा असन भुँजाबे।
आघू बढ़बे कि छेकइया ठाढे़ हे,
तैं सुखर्रा कइसन उल्‍हाबे।
बचोइया लहुटिन मरोइया,
पीरा ला काखर मेर गोहराबे।

सनत
साहित्‍य निकेतन,
जूट मिल थाना के पीछे, रायगढ़

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