Category: गुड़ी के गोठ

गुने के गोठ : मोर पेड़ मोर पहिचान

वासु अउ धीरज ममा फूफू के भाई ऑंय। दूनो झन चार छ: महिना के छोटे बड़ेआय। दूनो तीसरी कक्छा मा पढ़थें। वासु शहर के अँगरेजी इस्कूल मा पढ़थे अउ धीरज गाँव के सरकारी स्कूल मा। धीरज के दाई ददा किसानी करथँय अउ वासु के दाई ददा नउकरिहा हावँय। गर्मी के छुट्टी माँ एसो वासु हा ममा गाँव गइस। आजी आजा खुश होगे। ममा मामी के घलाव मया दुलार पाय लगिस।फेर सबले बढ़िया ओला धीरज लगिस। लइका अपन खेलबर संगवारी खोजथे। ओला अपन जँहुरिया संगवारी मिलगे। दू दिन वासु के महतारी हा मइके मा रहिस फेर छोड़के अपन नउकरी मा आगे।

अब वासु धीरज के जोड़ी हा खेले कुदे लगिस। एक दिन खेलत खेलत दूनो झन तरिया ओ पार आमा बगइचा मा पहुँचगे। धीरज ओला तीन चार ठन आमा पेड़ अउ अमली, चिरइजाम, बीही के पेड़ ला देखावत कहिस – ये तीनों आमा पेड़ अउ अमली ला हमर बाबू के बबा हा जगाय रहिस। एला मंडल बगइचा कहिथे।चिरइजाम ला मोर बबा हा नान्हेपन मा लगाय रहिस ता ए पेड़ ला ओकरे नाम ले जाने जाथे।जब मोर बाबू नान्हे रहिस ता ओखर बबा हा एक दिन ओला बीही खायबर दिस। वो हा आधा ला खाइस अउ बाचे ला छानी उपर फेंक दिस। दिन बीतिस चउमासा आगे। कब के फेंकाय बीही हा हवा पानी पाके नानकून आठ दस पाना के पेड़ बनगे।

ओखर बबा हा सुरता करके ओला पेड़ ला धराके बगइचा मा गड़वा दिस।आज हमन हरियर पींयर बीही जेकर लाल लाल गुरतुर गुदा ला खाथन अउ बबा के सुरता करथन। दूनो झन ला इहाँ अपन धुन मा खेलत मँझनिया होगे। ओती वासु अउ धीरज ला खोजत ओकर बबा हाथ मा सुटी धरे पसीना पसीना होय आइस। दूनोंझन ला खिसयाइस अउ आमा के छइहाँ मा बइठ गे।कोन जनी कहाँ ले हावा चलिस कि काय होइस, दू ठन पक्का आमा उपर ले गिरिस।जानो मानो अपन बेटा ला भुखाय देख बाप हा कुछु खायबर देत हवय।बबा हा दूनोझन ला आमा ला बाँटिस अउ चलो घर कहिके हाँकिस। घर आवत तरिया मा नहाय बर रुकिन। धीरज हा वासु ला बताइस कि येला गौउँटिया तरिया कहे जाथे। हमर बबा के बबा के संगवारी गौउँटिया हा एला खनवाय रहिस कथे ।

नहा खोर के घर जाके भात खाके सूतीन। संझा वासु के आजा हा गाँव के गली डहर घुमायबर लेगिस।गली मा जावत बर , पीपर , हनुमान मूरती , शिव मंदिर अउ दूसर मंदिर के गोठ करत बताइस एला अमुख अमुक मन जगाय अउ बनाय रहिस हे। वासु के नानकुन बुद्धि ए नइ समझ पाइस कि जब ओ मनखे मन नइ हे तब ले ऊँखर नाम कइसे जानथे। पाछू घर आके अपन आजा आजी ला फेर आमा बगइचा के पेड़ जगाय के किस्सा ला पूछिस। ओखर आजा बताईस कि पेड़ हा हमर जिनगी बर कतका महत्तम होथे। नानकन ले पेड़ के लकड़ी के सहारा लेवत ,खटिया, पीढ़ा, टेबुल, कुर्सी, माची, झूलना, खिड़खी, कपाट, चूल्हा चौका बर सब इही पेड़ ले मिलथे। मरे के पाछू घलाव चिता जलाय बर लकड़ी लागथे।

वासु के नानकुन बुद्धि हा थाहा नइ पात रहय कि एक ठन पेड़ हमर कतका बुता आथे।वासु के मन मा एकेच बात बइठ गे कि मनखे के पहिचान पेड़ ले चलाव हो सकत हे। महिना भर के छुट्टी बिता के वासु अपन सहर मा आगे। दिन बीतिस इस्कूल खुलगे। असाढ़ महिना आगे। एक दिन इस्कूल ले आय पाछू संझा वासु नानकन आमा पेड़ ला धर के अपन घर के फुलवारी मा जगायबर खोचका खनत रहिस। ओखर महतारी हा ओला खिसयात पूछिस- तँय ये काय बूता करत हस वासु? अपन महतारी ला वासु हा कहिस- मँय अपन पहिचान अउ नाम बर आज पेड़ लगावत हँव। मोर पेड़ मोर पहिचान रही। अइसने काहत गाँव के जम्मो किस्सा ला बताईस।ओखर महतारी अड़बड़ खुश होइस अउ कहिस कि अपन प्रचार्य ले पूछ के एक ठन पेड़ इस्कूल मा घलाव लगाबे। पढ़ के निकले जब दस बीस बच्छर पाछू ओ रद्दा ले आवत जावत देखबे तब मन गदगदा जाथे।

आज पर्यावरण ला शुद्ध रखेबर पेड़ के जरुरत हे। हम सबला घलाव अपन कार्यालय, घर के तीर तखार जिहा खाली जगा भुइँया मिलय एक पेड़ अपन पहिचान अउ नाम राखे खातिर जगोना चाही।

हीरालाल गुरुजी “समय”
छुरा, जिला- गरियाबंद

छंद के छ : एक पाठशाला, एक आंदोलन

वइसे “छंद के छ” हा आज कोनो परिचय के मोहताज नइ हे तभो ले मैं छोटे मुँहु बड़े बात करत हँव। छत्तीसगढ़ी छंद शास्त्र के पहिलावँत किताब “छंद के छ” सन् 2015 मा श्री अरुण निगम जी द्वारा लिखे हमर मन के बीच मा आइच। छत्तीसगढ़ी साहित्य ला पोठ करे के उद्देश्य ले लिखे ए किताब हा छंद बद्ध रचना के संगे-संग छंद के विधि-विधान उदाहरण सहित अपन भाखा मा देथे। एखर पहिली संस्करन मा मात्र दू सौ किताब छपे रहीच। “छंद के छ” किताब मा पचास प्रकार के छंद रचना विधि-विधान सहित हावय। छंद के नवा लिखइया मन बर ए किताब हा वरदान बरोबर हावय। दू बछर मा ए किताब हा सिरिफ किताब भर नइ रहीगे ओखर आगू आज एहा ए पाठशाला अउ एक आँदोलन के रुप धर ले हे। छंद सिखे-सिखाय के अइसन इस्कूल, अइसन आंदोलन के सरुप हे “छंद के छ” जेमा अवइया दस-बीस बछर मा छत्तीसगढ़ी साहित के छंदकार के झड़ी लगा दीही। प्रस्तुत लेख मा इही “छंद के छ” के महत्तम, गतिविधि अउ असल उद्देश्य ला बताय के प्रयास करत हँव।

छंद का हे:-
“छंद के छ” ला जाने के पहिली छंद का हे एला जाने के प्रयास करथन। छंद ला काव्य के आत्मा कहे जाय ता कोनो अतिश्योक्ति नइ कहाही। काव्य मा भाव हा देंह हरय ता छंद हा ओखर आत्मा हरय। वइसे छंद हा एक नियम-कायदा हरय जेमा बंध के काव्य रचना करे जाथे। छंद एक निश्चित बेवसथा अउ निर्धारित क्रम होथे जेमा काव्य रचना करे जाथे। काव्य रचना के इही बेवस्थित रंग-ढ़ंग के शास्त्रीय नाँव छंद हा हरय। ए बेवसथा मा मातरा, वरन के संखिया, विराम, गति, लय अउ तुक के संगे-संग वियाकरन के विधि-विधान ले पालन करे जाथे। छंद के शाब्दिक अर्थ हे छंदाय या बंधाय। एखर मतलब होथे के अइसन काव्य रचना जेमा एक मातरा ना उपराहा, ना एक मातरा उन्ना। एक मातरा के भी कम या जादा कभूच नइ चलय। कोनो दशा, दिशा अउ देशकाल मा एमा मातरा के छूट न इच मिलय। एक बंधना, एक नियम, एक विधान छंद के पहिचान हरय। छंद चेत-बिचेत होके नहीं सावचेत होके लिखे के उदीम हरय जउन सबो झन के बस के बात नो हे। छंद सिरिफ मातरा गिनती भर के बुता नो हे बल्कि एखर ले बढ़के बंधना के अनुशासन हरय। छंद रचना हा शब्द सामरथ के बड़ कठिन साधना आय। शब्द संखिया, क्रम, मातरा गिनती अउ उचित यति-गति ले सजे-धजे बंधाय पद्य रचना हा छंद कहाथे। छंद शब्द हा छद धातु ले बने हावय, ए छद धातु शब्द के अर्थ हे- जउन अपन इच्छा या मन ले चलथे। याने के अपन गति ले चलइया। एखरे सेती छंद के मूलभाव गति हा होथे। बिन गति के छंद अबिरथा होथे। उचित गति हा छंद ला गेयता बनाथे। गति के संगे-संग शब्द संयोजन जेला कल संयोजन कहे जाथे एहा छंद ला सरल सुग्घर गुरतुर बनाथे। शब्द संयोजन खातिर शब्द चयन बड़ महत्तम के होथे। ए प्रकार एक छंद रचना बर कवि ला वरन के संखिया, विराम, गति, लय, कल संयोजन अउ तुक मिलान के नियम के पालन करे ला परथे। एक प्रकार ले छंद रचना मापनी जइसे होथे जेमा नाप-जोख सबले बड़े बुता हरय। छंद बद्ध रचना हा पद्य के कसौटी हरय अउ गद्य के कसौटी पद्य रचना ला माने जाथे।
अदर-कचर अउ गलत-सलत लिखइया मन बर छंद शास्त्र हा बड़ मुसकुल काम हरय फेर एक बेर जउन छंद के मरम ला जान डारथे, पार ला पा जाथे ओखर बर छंद लिखई डेरी हाथ के बुता होथे। छंदकार ला सिरिफ छंद सुहाथे अउ काँही नइ निक लागय। छंद विधान भले कठिन साधना अउ अनुशासन हरय फेर छंद मा छंदाय बंधाय रचना बड़ उँचहा मान पाथे,कंठ मा सोज्झे मधुरस कस घुरथे अउ रचनाकार ला अमर बनाथे। जन-जन ला छंद रचना बड़ गुरतुर अउ निक लागथे एखर सेती झट्टे जनप्रिय बन जाथे। सरसती के सरसधार भलभल ले छंद रचना मा बोहाथे। इही पाय के कबीर, सूर, तुलसी, मीरा, रहीम, जायसी, रसखान जइसन मन के छंद रचनामन हा लोकभाखा के रुप धरथे अउ मुअखरा सुरता आथे। छंद के सहारा पाके उपजे रचना मन मा लय अउ सुर के संगत मा गुरतुर गीत के भाव मन मस्तिस्क मा भर जाथे। छंद के साँचा मा ढ़ले, छंद विधान के आगी मा पके छंद रचना हा अभिव्यक्ति के सँउहे रंग ला जस के तस जनमानस मा बगराथे। छंद के प्रभाव हा अंतस मा परथे जेखर सेती छंद रचना हमर दिमाग मा तुरते बइठ जाथे अउ बरसों सरस जींयत रथे। हमर सोच अउ समझ ला नवा दिशा अउ दशा छंद रचना हा देथे। एखरे सेती आज घलाव दोहा, चौपाई, कुण्डली, रोला, सोरठा, आल्हा जइसन छंद मन हा साहित के सिरतो शोभा बने हावय। छंद रचना साहित के माई कोठी के बिजहा हरय। बिन बिजहा नवा फसल के उपज कभू संभव नइ हे। छंद रचना साहित मा पुरखा मन के अनमोल धरोहर जइसन हे।

“छंद के छ” का हे:-
सरी संसार हा मानथे के छंद अनुशासन, संयम अउ लगन के बड़ मुसकुल उदिम हरय। बिन साधना के छंद रचना हा बहुते कठिन काम हे। छंद संयम अउ समरपन माँगथे। हिन्दी अउ संस्कृत साहित मा छंद शास्त्र के गियान देवइया किताब थोरकुन खोजे मा मिल जाही फेर हमर छत्तीसगढ़ी भाखा मा छंद गियान के अकाल हे। साहित जगत मा सबले पहिली छंद छत्तीसगढ़ के धरती ले आदिकवि वाल्मीकि जी हा लिखे रहीन फेर छत्तीसगढ़ी मा छंद लिखइया छत्तीसगढ़ी छंदकार मन के संखिया सिरिफ गिने-चुने हे जादा नइ हे। श्री जगन्नाथ प्रसाद”भानु”, बाबू रेवाराम, रघुवर दयाल, श्यामसुंदर बाजपेयी जइसन कवि मन के पाछू मा सिरिफ पं. सुंदरलाल शर्मा ले लेके कपिलनाथ कश्यप, जनकवि कोदूराम “दलित” जी के नाँव छत्तीसगढ़ी छंदकार के रुप मा इस्थापित रहीन। इँखर मन के बाद चालीस-पचास बछर तक छत्तीसगढ़ी छंद के अकाल सहीं आगे हे रहीस। इही अकाल ला सुकाल मा बदले खातिर हमर सुजानिक छंदगुरु श्री अरुण निगम जी हा छंद विधान के किताब “छंद के छ” के रचना करीन हे। श्री अरुण निगम जी हा जनकवि कोदूराम दलित जी के वो सपूत हरँय जउन मन हा अपन पुरखा के परमपरा ला आगू बढ़ाय बर छंद गियान के किताब लिखे के बड़ मुसकुत बुता ला साधीन। छत्तीसगढ़ी छंद साहित ला पोठ के असल भाव ले ए “छंद के छ” किताब ला रचे गे हावय।
जबले छत्तीसगढ़ राज बने हे अपन भाखा बोली मा लिखइया मन के पाटपूरा आगे हे। एमा जादा झन मन हा अनचेतहा अदर-कचर लिखत हें अउ चारो मुँड़ा छाए हें। फेर अइसन चेत-बिचेत लिखइया मन के रचना हा चरदिनिया बरोबर लागथे। बिन बियाकरन पालन के, बिन अनुशासन अउ बिन विधि-विधान के सिरजन हा छत्तीसगढ़ी साहित ला नसकान कर सकत हे। अवइया नवा पीढ़ी बर घलो एहा फलित नइ होवय। अइसन रचना मन हा हमर साहित ला कोनो नवा रद्दा नइ देखा सकँय। आज छत्तीसगढ़ी साहित ला पोठ करे के जरुरत हे, छंद बद्ध रचना के खच्चित आवश्यकता हे। नवा पीढ़ी मन बर आदर्श इस्थापित करे के बेरा हे ए समय हा। साहित हा बिन अनुशासन, बियाकरन अउ विधि-विधान के बिन कइसे पोठ होही? एहा संसो के विषय हे ए वर्तमान घड़ी मा। बिन कठिन साधना के सफलता हा भुसभुस लागथे। छंद हा कठिन विषय हरय कहीके एला दुरिहा ले माथ नवाके घुँच देथे फेर छंद अतका मुसकुल नइ हे जतका दिखथे। हाँ फेर छंद के ए कठिन साधना ला सरल बनाय बर एक समरथ गुरु गियानी के सिखोना के खच्चित जरुरत परथे। इही बात ला धियान मा राखत श्री अरुण निगम जी हा छत्तीसगढ़ी साहित ला पोठ करे खातिर छत्तीसगढ़ मा नवा छंदकार तियार करे के जुमे उठाय हे। ए मन हा छत्तीसगढ़ी साहित के माई कोठी ला अपन छंद रचना ले सरलग पोठ करत हावँय। आज निगम जी हा छत्तीसगढ़ी साहित मा अपन छंद बद्ध रचना के सेती एक सुजान कवि के रुप मा भरपूरहा मान पावत हें। इँखरो बर बिन गुरु गियानी अउ कोनो छंद शास्त्र के बिन छंद के कठिन साधना बड़ मुसकुल काम रहीच। अपन मन के लगन, सीखे के ललक अउ अपन आत्मबिसवास ला एकमई करके निगम जी हा ए छंद साधना के कठिन कि म ला सरल बना डारीन। फेर ए बुता हा बिन गुरु अउ बिन छंद शास्त्र के थोरिक कठिन जरुर जनाइस फेर पुरखा के परमपरा ला आगू बढ़ाय के धुन हा ए बुता ला सरल बना डारीस। ना कोनो समरथ गियानी गुरु मिलय ना एको किताब छंद विधान के दिखय। जउन मिलय तेहा थोरउचा परय। बिन सुवारथ के गुरु गियानी खोजे मा नइ मिलय अउ जउन मिलय ते मन करा अतका समय नइ रहय के सरी विधि-विधान ला चेतलग सिखोय। निगम जी हा छंद के किताब खोजे बर बिलासपुर, रइपुर, दुरुग, भेलाई, के संगे-संग जबलपुर अउ लखनऊ के किताब दुकान मन के चक्कर लगा के जुच्छा लहुट आवँय। अइसन बिकट समय मा इन्टरनेट मा “ओपन बुक्स आँनलाईन” के माधियम ले छंद सिखाय के एकठन समरथ मंच मिलीस। ए मंच हा आज के समय मा सबले छंद सिखोय के सरेस्ठ मंच हावय। इही मंच ले सीखते-सीखत निगम जी हा छंद मा लिखना शुरु करीन। बछर 2015 के शुरुवात मा इँखर छंद बद्ध हिन्दी रचना के संग्रह “शब्द गठरिया बाँध” छपीस। ए किताब मा दू सौ ले जादा छंद बद्ध कविता के संग्रह हावय फेर छंद विधान के कोनो जानकारी नइ हे। हिन्दी छंद कविता संग्रह मा छंद विधान के कमी ला पूरा करें खातिर अपन भाखा छत्तीसगढ़ी छंद बद्ध रचना के संग्रह “छंद के छ” निकालीन। ए “छंद के छ” किताब मा पचास प्रकार के छत्तीसगढ़ी छंद बद्ध कविता अउ ओखर लिखे के नियम-धियम हा उदाहरन सहित हावय। ए किताब मा छत्तीसगढ़ी छंद रचना लिखे सिखे बर सरी विधि-विधान सरल ढ़ंग से बताय गे हावय।
“छंद के छ” किताब हा अपन भाखा मा नवा छंद लिखइया मन बर अपन परमपरा अउ संस्कार ला सहीं ढ़ंग ले निभाय के साधन हरय। आज नंदावत छंद रचना के परमपरा ला फेर लहुटा के लाने के जरुरत हे। छंद के ए मरत बर रुख ला फेर जियाँए के उदिम ए किताब हा करत हावय। लगभग 112 पेज के नान्हे ए किताब के पहिली संस्करन सन् 2015 मा सिरिफ 200 प्रति ही छप पाए रहीच। छंद के प्रति रुचि जगइया ए किताब के माँग दिनों-दिन बाढ़ते जावत हे। “छंद के छ” किताब हा निमगा बियाकरन भर के किताब नो हे। एमा पचास किसम के छंद के विधि-विधान सहित सुग्घर सरल उदाहरन देके समझाय गे हावय। सबले छोटे सरल फेर बड़े मात मातरा गिनती के नियम-कानून ले ए किताब के शुरुवात होय हे। बिन मातरा गिनती के जानकारी के छंद लिखना सबले मुसकुल बुता हरय। ए किताब मा अक्छर, तुकांत, वरन,यति, गति, मातरा, मातरा गिने के नियम, डाँड़ अउ चरन, सम चरन, विसम चरन, गन के बारे मा गुने के गोठ सबले शुरु मा होय हे। “छंद के छ” के सबले बड़े बात एहे के एमा जतका भी उदाहरन हे वो कविता मन हा कहूँ ले माँगे-जाँचे उधारी के नो हे। ए किताब के जम्मों रचना उदाहरन सहित श्री अरुण निगम जी के खाँटी मौलिक रचना हरय। पहिली संस्करन मा छपे किताब आज कमती परगे। नवा छंद लिखइया, छंद सिखइया मन बर ए किताब हा वरदान बरोबर हे। छंद परेमी अउ छंद के आरो लेवइया गुनी सुजानिक मन बर “छंद के छ” हा उँखर खोज ला पूरा करथे। छत्तीसगढ़ी साहित अगाश मा पुन्नी के चंदा अस अँजोर बगरावत हे ए “छंद के छ” हा। निगम जी हा ए किताब ला लिख के छंद लिखे के पुरखा मन के परमपरा ला आगू बढ़ावत हें अउ छत्तीसगढ़ी साहित ला पोठ करत हें। आज ए किताब हा एक पाठशाला अउ एक आंदोलन के रुप धर के फूलत-फरत हावय। निगम जी सिरिफ “छंद के छ” लिख के अपन साधना ला पूरा कर लीन अइसे नइ हे बल्कि ए किताब ला एक इस्कूल के रुप देके एक आंदोलन के बिजहा बोए गेहे। बिन सुवारथ के छंद परमपरा ला आगू बढ़ाय खातिर तन,मन अउ धन ले संकलपित होके निगम जी हा अपन अराम करे के उमर मा कनिहा कँस के एमा भिड़ें हें।

“छंद के छ” एक आँदोलन:-
“छंद के छ” आज सिरिफ छंद शास्त्र के गियान देवइया किताब भर नो हे। एहा आज छत्तीसगढ़ी साहित मा छंद के अकाल ला मेटे बर एक आँदोलन, एक अभियान के रुप धरके एक इस्कूल कस चलत हावय। आज जमाना सोशल मीडिया के हावय अउ छत्तीसगढ़ के नवा पीढ़ी के कवि मन हा इहाँ बड़ लिखत हें व्हाट्सएप मा फेर गुणवत्ता के कमी हे। नवा पीढ़ी के रचनाकार मन ला सही दिशा मा सहीं रचना लिखे ला सिखाए बर व्हाट्सएप मा “छंद के छ” ग्रुप बनाए गीस। एखर सदुपयोग करत “छंद के छ” ला सरी छत्तीसगढ़ मा बगराय के बुता दू साल ले सरलग चलत हावय। व्हाट्सएप के माधियम ले “छंद के छ” ग्रुप बनाके सुजानिक कवि छंद गियानी श्री अरुण निगम जी हा छंद के कक्षा चलावत हें। मोबाईल के अउ आने-ताने बने व्हाट्सएप ग्रुप मन ले सबले अलग हटके ए “छंद के छ” ग्रुप हावय। ए “छंद के छ” व्हाटसएप ग्रुप मा छत्तीसगढ़ी छंद के सिखइया-लिखइया छंद साधक मन हा सरी छत्तीसगढ़ के कोनहा-कोनहा ले जुड़ के छंद साधना करत हावँय। छंद साधना बर जउन लगन, महिनत अउ समरपन चाही वो सब गुन ए ग्रुप के छंद साधक मन मा मिलथें। व्हाट्सएप के माधियम ले संचालित ए “छंद के छ” ग्रुप हा एक इस्कूल बरोबर चलथे। रोज हाजिरी के संगे-संग अभ्यास अउ गृहकार्य ला अपन हिसाब ले चौबीस घंटा के भीतर मा पूरा करे ला होथे। इहाँ उल्टा-सीधा अउ अनाप-शनाप मेसेज भेजे के मनाही हावय। छंद के अभ्यास ले संबंधित सवाल-जवाब करे के छूट हे। संझा, मँझनिया, रतिहा के जय-जोहार, कोनो प्रकार के बधाई संदेश, आडियो-विडियो, चित्र अउ पोस्टर भेजे के मनाही हे। ए ग्रुप ला खाली सिखे भर बर बनाय गे हावय जइसे घर के एक कमरा पूजा खोली ला साफ सुथरा अउ सिरिफ पूजा-पाठ बर रखे जाथे। सिरिफ अउ सिरिफ छंद के गोठ बात,छत्तीसगढ़ी साहित के विकास के बात ए “छंद के छ” ग्रुप मा करे जाथे। सोलाआना अपन छत्तीसगढ़ी भाखा के प्रयोग इहाँ सिखे-सिखाय मा करे जाथे। “छंद के छ” इस्कूल मा उमर के सम्मान तो होथेच फेर साधक के समरपन, लगन अउ ओखर रचना हा वोला उचित मान देवाथे। साधक के रचना हा साधक ला सुजान अउ सियान बनाथे इहाँ। छंद रचना सिखे-लिखे बर बियाकरन के गियान, सहीं शब्द चयन, लय, गति, वरन,चरन अउ तुकांत के धियान राखे ला परथे। गीत, कविता ला मीटर या मापनी मा लिखना,गजल ला बहर मा लिखना एक प्रकार के छंद विधान हरय। कोनो भी रचना ला बिन बंधना के कालजयी होना बड़ मुसकुल हे। पतंग घलाव हा अपन डोरी के बंधना मा ही अगाश ला नापथे, बिन बंधना के एती-तेती भटक जाथे। सारथक अउ समरथ होय बर सबला बंधना ला स्वीकार करेच ला परथे।
छंद सिखे-लिखे बर हमर छत्तीसगढ़ मा ना कोनो प्रकार के इस्कूल हे ना कोनो संस्था हावय। ना कोनो गुरु गियानी हे जौन ला बिन सुवारथ के दुसर ला सिखाय के ललक हावय। “छंद के छ” व्हाट्सएप ग्रुप ले छंद सीखे के इही समसिया के समाधान बिन सुवारथ के फोकटे-फोकट मा हमर छंदगुरु श्री निगम जी हा करत हावँय। आज हर क्षेत्र मा मठाधीश के चलन हावय। साहित के क्षेत्र हा घलो ए बिमारी ले अछूता नइ हे। बड़े अउ नामी कवि मन हा नवा लिखइया मन ला भाव नइ दँय। नवा कवि मन ला हाथ धरके सिखैया गिनती के मिलहीं। बजार मा कविता सीखे बर किताब नइ मिलय अउ छंद सीखे बर जौन किताब मिलही वो हा अपर्याप्त हे। फेर किताब पढ़के मनखे गियानी हो जातिन ता इस्कूल, कालेज के का जरुरत रहितिस। साधना बर समरपन घातेच जरुरी होथे। समय सबला एकेच बरोबर मिलथे जौन हा सबले कीमती जीनिस हरय। गियान बर अभ्यास अउ साधना जरुरी होथे। इही सार गोठ “छंद के छ” के अधार हरय।
अपन पिताजी श्री कोदूराम “दलित” जी के पहिली कुण्डली संग्रह “सियानी गोठ” बछर 1967 के भूमिका ला पढ़के आज “छंद के छ” के सूत्रपात होय हावय। अपन किताब के भूमिका मा दलित जी संसो के स्वर मा लिखे रहीन के “ए छत्तीसगढ़ी बोली मा खास करके छंद बद्ध रचना के अकाल असन हावय, इहाँ के कवि मन ला चाही के ए अभाव के पूर्ति अपन छंद बद्ध सिरजन ले करँय। स्थाई छंद लिखे डहर जासती धियान देवँय। हमर ए बोली पूर्वी हिन्दी कहे जाथे। ए हर राष्ट्रभाषा हिन्दी ला अड़बड़ सहयोग दे सकथे। इही सोच के महूँ हा छत्तीसगढ़ी मा रचना करे हँव।” अपन परमपूज्य पिताजी के विचार ला पूरा करे के एक छोटकुन उदिम हमर छंदविद् गुरु गियानी श्री अरुण निगम जी हा उठाँय हवँय। चार-पाँच बछर पहिली निगम जी हा छंद सीखे के कोशिश शुरु करीन। छंद के विधि-विधान ला विधिवत जाने बर ए मन ला एको किताब इँखर जरुरत के हिसाब ले खोजे नइ मिलीच। कोनो समरथ इस्थानीय छंद गियानी गुरु घलाव एको नइ मिलीस। अइसन विषम परिस्थति मा घलाव निगम जी हा छंद सीखे के आस ला नइ छोड़ीन। एती-वोती कोनो भी कोती ले छंद सीखे के प्रयास मा इंटरनेट अउ मोबाईल ले आज घलाव निगम जी सरलग छंद सिखत अउ सिखात हावय। छंद सीखे के अपन इही अनुभव , गियान, साधन अउ साधना ला नवा सिखइया-लिखइया मन संग बिन सुवारथ के साझा करे खातिर व्हाट्सएप मा “छंद के छ” ग्रुप बनाय हावँय।
“छंद के छ कक्षा-एक” के शुरुवात 9 मई 2016 मा अकती तिहार के दिन छत्तीसगढ़ी छंद बाउग के रुप मा करीन। ए दिन हमर छत्तीसगढ़ मा बिजहा बोए के बड़ सुग्घर परमपरा हावय। इही परमपरा के पालन करत “छंद के छ” के नेव धराइस हे। “छंद के छ कक्षा-दू” हा 28 सितंबर 2016 जनकवि कोदूराम दलित जी के पुण्यतिथि मा शुरु होइस। “छन्द के छ कक्षा-तीन” ला जनवरी 2017 मा शुरु करे गीस हे। आदरनीय निगम जी ला मिलाके कुल बीस झन नवा छंद साधक एक बछर मा तियार होगे हें जौन मन हा निरदोस विधान सम्मत छंद रचना करत हावँय। मँय भागमानी हँव के महूँ हा “छंद के छ कक्षा-दू”
के छंद साधक हरँव। मोला गरब हे के मँय छंदगुरु निगम जी के “छंद के छ” आँदोलन मा एकठन नान्हें सिपाही के रुप मा अपन समरथ हिसाब योगदान करत हँव। “छंद के छ कक्षा-चार” अकती तिहार 2017 मा शुरु करे गे हावय अउ “छंद के छ कक्षा-पाँच” ला कुवाँर नवरात्र मा 28 सितंबर 2017 के दिन शुरु करे गेहे। “छंद के छ” के एक कक्षा मा सिरिफ दस साधक रखे जाथे ताकि उँखर जम्मों रचना उपर बारिकी ले धियान दिए जा सकय। छंद साधक मन के रचना मा लिंग, वचन, काल संबंधी दोष निवारन के संगे-संग सहीं शब्द चयन अउ उत्तम तुकांत उपर जोर दे जाथे। इहाँ छंद सिखे के शुरुवात वरन अउ शब्द के मातरा गिनती ले होथे। मातरा, डाँड़, चरन, यति,गति अउ तुक मिलान के गियान सरल से सरल ढ़ंग ले बताय जाथे। एक कक्षा के सफल साधक हा दुसर कक्षा के प्रशिक्षक बनके नवा छंदकार गढ़े के पुनीत काज मा भागीदार बनथें। “छंद के छ” के एक प्रमुख उद्देश्य सीखना अउ सीखाना घलाव हरय। इही पाए के जम्मों सफल साधक मन के भूमिका नवा कक्षा बर प्रशिक्षक के हो जाथे। प्रशिक्षक के रुप मा घलाव इँखर मन के दुसर छंद के अभ्यास सरलग चलत रहीथे। सीखे के कोनो उमर नइ होय, मन मा सच्चा लगन अउ महिनत हा सफल बनाथे। इहाँ कोनो गुरु चेला के नाता नइ रइय फेर योग्यता ला सम्मान देके बेवसथा अपने आप हावय। सबो साधक मन ला आपस मा सिखे-सिखाए के मूलभूत नियम के पालन करते करत अपन अर्जित गियान ला इहाँ साझा करना होथे। “छंद के छ” हा सिखे अउ सिखाए के सिद्धांत मा काम करत हे। एक के चार, चार के सोला, सोला के चौंसठ…….अउ अइसने नवा साधक मन के संखिया सरलग बाढ़त जाही अउ छत्तीसगढ़ी रचना कोठी पोठाही। “छंद के छ” के ए उदिम हा बिन सुवारथ के,बिन मजूरी के चलत हावय। धन बाँटे मा घटथे फेर गियान अउ मया बाँटे मा बढ़थे।
एक बछर मा लगभग बीस छंदकार “छंद के छ” के माधियम ले तियार होगे हें जौन मन हा पच्चीस ले तीस प्रकार के शुद्ध छंद रचना करत हें। अवइया दस-पंदरा बछर मा “छंद के छ” हा छत्तीसगढ़ी भाखा ला पोठ करे के सबले बड़े आँदोलन के रुप धर लेही। छंद लिखइया मन के संखिया जोरदरहा बाढ़ते जाही अउ छंद बद्ध रचना के पूरा आ जाही। जन मानस मा फेर एक बेर अपन भाखा के दोहा, चौपाई, कुण्डली, आल्हा के गुरतुर गीत अउ कविता पढ़े सुने ला मिलही। आज साहित के इस्तर हा गिरते जावत हे। खासकर के पद्य मा छंद के जघा बिन कोनो उद्देश्य के सोज्झे चुटकुलाबाजी, हँसी मजाक, ठट्ठा के हल्का-फुल्का गोठ होवत हे।
“छंद के छ” कक्षा-एक, दू, तीन के साधक मन हा लिखने मा गति पकड़ लीन ता इँखर उपलब्धि ला साझा अउ आपसी चर्चा करे बर “छंद के छ-खुला मंच” नाँव से एक अलग ग्रुप बनाय गीस हे। छंद के छ” सबले खास बात हे छंद ला छंद के पारंपरिक स्वर मा प्रस्तुत करे बर सिखाए के उदिम करना। हर छंद के अपन अलग-अलग लय अउ धुन हे जेखर ले ओखर पहिचान हावय। इहाँ छंद लिखे-सिखे के संगे-संग छंद ला ओखर प्रचलित धुन मा सस्वर प्रस्तुतिकरन घलाव व्हाट्सएप के माधियम ले इहाँ सिखोय जाथे। होली तिहार के दिन ले हर शनिच्चर-इतवार के मोबाईल मा आनलाईन आँडियो ले छंद बद्ध कवि कोष्ठी चलथे जेमा सुर के उतार चढ़ाव ला जानकार मन हा बहुते बढ़िया ढ़ंग ले बताथें। “छंद के छ” कवि गोष्ठी मंच मा प्रस्तुति ले साधक के प्रतिभा के चहुँमुखी विकास होथे। इहाँ साधक के हर प्रस्तुति के बड़ कड़ा समीक्छा होथे अउ मंच संचालन के जिमेदारी घलाव मिलथे। सरेस्ठ साहित नंदावत हावय ता अइसन बेरा मा छंद के फेर लहुट आना बड़ सुखदाई होवत हे।
“छंद के छ” एक परवार बरोबर बेवहार करत छत्तीसगढ़ी साहित सिरजन मा आज भागीदार बनत हावँय। आज “छंद के छ” परवार मा डेढ़-दू बछर मा छत्तीसगढ़ के दुरिहा-दुरिहा के छंद साधक मन आपस मा जुड़े हावँय। कोरबा, कवर्धा, खरसिया, रायगढ़, सारंगढ़, जाँजगीर, मरवाही, मस्तुरी, राजनांदगांव, बलौदा बजार, भाटापारा, नवागढ़, मुँगेली, बेमेतरा, बिलासपुर, रायपुर, दुरुग, भेलाई अंचल के छोटे-बड़े गाँव-गवँई अउ शहर के नवा-नवा छंद साधक मन हा “छंद के छ” परवार के सदस्य के रुप मा एकमई हावँय। “छंद के छ” अउ निगम जी के बिन सुवारथ के कलेचुप छत्तीसगढ़ी छंद सिरजन उदिम ला देख छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग हा अपन आर्थिक सहयोग बर अपन हाथ बढ़ाइन। राज्य स्तरीय छंदमय कवि गोष्ठी भेलाई मा 9 जून 2017 के छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के आर्थिक सहयोग ले पहिली बेर खुल्ला जघा मा होइस। व्हाट्सएप मा आनलाईन कवि गोष्ठी मा सुर, लय सिखइया जम्मों छंद साधक मा भेलाई मा जुरिया के छंद-रस के बरखा करीन। छत्तीसगढ़ी छंद के नवा जनम ला देख के छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के पधारे माई पहुना अध्यक्ष अउ सचिव मन गदगद होगे अउ भविष्य मा तन,मन अउ धन ले अउ सहयोग दे के बात कहीन। एखर दुसर कड़ी बलौदा बजार जिला के हथबंद गाँव मा एक वरिष्ठ छंद साधक के माधियम ले राज्य स्तरीय छंदमय कवि-गोष्ठी 12 नवंबर 2017 समपन्न होइस। ए दू कार्यक्रम हा बहुते सफल रहीस। हथबंद के कार्यक्रम मा महूँ हा एक छंद साधक के रुप शामिल होके अपन छंद रचना के पाठ करे रहेंव। एखर ले “छंद के छ” परवार मा बड़ उछाह भरगे हे अउ अइसन कार्यक्रम अवइया समय मा दुसर-दुसर जघा मा आयोजित करे के योजना हावय। एमा सीखे हुए छंद के अपन मौलिक रचना के सस्वर पाठ छंदप्रेमी जनमानस के बीच मा प्रस्तुत करे के सौभाग्य पाके अपन आप ला भागमानी मानथें। इही कड़ी मा अवइया 13 मई 2018 के सिमगा गा “छंद के छ” के दूसरइया वर्षगाँठ मनाय बर जम्मों छंद साधक मन हा जुरियाँही।

“छंद के छ के उद्देश्य:-
“छंद के छ ” के सबले बड़े उद्देश्य अपन भाखा छत्तीसगढ़ी साहित ला पोठ करना हावय। “छंद के छ” के एक अउ उद्देश्य आज के समय मा बाढ़त तकनीक के सहारा ले छत्तीसगढ़ी साहित मा छंद रचना के बढ़ोना करना हे। अपन भाखा अपन बोली अउ अपन पुरखा के परमपरा के मान करत अपन साहित ला पोठ करे के परम उद्देश्य हे। “छंद के छ” मा हाले के ए गियान फोकट मा बड़ असानी ले उपलब्ध कराए जात हे एखर सेती कतको साधक मन एला प्राथमिकता नइ दँय अउ जौन साधक एला प्राथमिकता देवत हें उँखर लेखनी ले कालजयी छंद रचना निकलत हे। प्राथमिकता देना नइ देना एतो साधक के मन उपर हे फेर “छंद के छ” बिन सुवारथ के छंद सिखोवत हे अउ सिखोत रहीच। छंद के प्रस्तुति मा आत्मा के सुख होथे काबर के छंद अपन आप ला सुख दे खातिर लिखे जाथे। जौन रचना दुसर मन ला आनंद दे बर लिखे जाथे वोमा ताली के गूँज जरुर हो सकथे फेर आत्मा के सुख नइ रहय।
बियाकरन के गियान, रचना मा सारगर्भित गोठ, साहित के विधि-विधान के पालन सहीं ढ़ंग ले सिखाना। इहाँ सिरिफ दोहा, रोला , चौपाई, कुण्डली जइसे छंद के अभ्यास करवाना भर उद्देश्य नो हे। जब कोनो रचनाकार ला बियाकरन के गियान मिलथे ता वोहा अलवा-जलवा अउ अदकचरा कभू नइ लिख सकय, जब कभू लिखही ता साहित विधान के पालन करही, शुद्ध-निरदोस , सारगर्भित बात लिखही। एखर ले इँखर रचना मन हा कालजयी बनहीं। रातों-रात कोनो साहितकार नइ बन जाय, कई बछर के साधना कलेचुप करे ला परथे। जिनगी के अनुभव रचनाकार के रचना ला परिपक्व बनाथे तभे कहूँ जाके अइसन रचना मन एक साहितकार के पहिचान बनाथें अउ रचना के संगे-संग रचनाकार ला अमर बनाथे।
ए साल नवा बछर के शुभ मुहूर्त मा “छंद के छ” के कक्षा ~छै: हा शुरु होगे हे। अब छंद बद्ध रचना करइया साधक मन के संखिया सरलग बाढ़त जावत हे। हमर वरिष्ठ अउ सुजानिक साधक श्री चोवाराम “बादल” जी अठतालीस प्रकार के छंद रचना के किताब “छंद बिरवा” हम सब के बीच आगे हे। ए किताब के विधिवत विमोचन छठवाँ छत्तीसगढ़ राजभाषा प्रांतीय सम्मेलन बेमेतरा मा होइस हे। ए छंद परवार के एक अउ सुग्घर सुजानिक अउ गुनी छंदकार श्री रमेश सिंह चौहान जी दू बछर मा दू ठन छंदबद्ध रचना के किताब “दोहा के रंग” अउ “छंद चालीसा” हमर हाथ मा आये हे। ए प्रकार “छंद के छ” हा अपन छत्तीसगढ़ी साहित्य ला पोठ करे के प्रयास मा सफल होवत दिखत हे।
आवव थोरिक नवा छंद साधक मन के कुछ रचना मन ला देखव अउ ऊँखर सोच-समझ ला परखव। सबले पहिली हमर आदर्श गुरु गियानी श्री अरुण कुमार निगम जी के छंद रचना:-
1~(शंकर छंद)
देख बिदेसी चाल-चलन ला, अँधमँधाये प्रान,
हमर देस के परम्परा के, कोन करही मान।
छोड़-छाँड़ के रिस्ता-नाता, जायँ दूसर देस,
सीधा-सादा पहिनावा तज, तुरत बदलयँ भेस।
2~(सोरठा छंद)
तरि नरि नाना गाँय, नान नान नोनी मन,
सबके मन हरसायँ, सुआ-गीत मा नाच के।
सुटुर-सुटुर दिन रेंग, जुगुर-जुगुर दियना जरिस,
आज जुआ के नेंग, जग्गू घर मा फड़ जमिस।

छंद साधक मन के रचना———-
1~शकुन्तला शर्मा- विष्णु पद छंद:-
एक एक दिन हीरा जैसे, पल पल मा कटही,
बात मान ले जीबे कैसे, जम छिन छिन बढ़ही।
अभी समय हे तोर हाथ मा, सदाचार अपना,
वोही धरसा जाही सुख मा, नो हय रे सपना।
सुख दुख हर तो घाम-छाँव ए, नाचत गावत हे,
नीत नेम हर कर्म दाँव ए, हर पल जावत हे।
मनखे जनम बहुत दुर्लभ हे, सज्जन मन कहिथें,
सोच रहे मा सबो सुलभ हे, सरल सहज रहिथें।

2~सूर्यकान्त गुप्ता- हरिगीतिका छंद:-
चल छोड़ गा सब चोचला, बदली हमूँ अब सोच ला।
हर जात के सुन बात ला, मनभेद के हर मोच ला।।
बहिथे जिहाँ रग मा लहू, तुम भेद का कर पाय हौ।
खेल-खेल के जनभावना, सुख राज के हथियाय हौ।।

3~रमेश सिंह चौहान- दोहा छंद (जनउला)
१-हाड़ा गोड़ा हे नहीं, अँगुरी बिन हे बाँह।
पोटारय ओ देंह ला, जानव संगी काँह।।
२- कउवा कस करिया हवय, ढेरा आटे डोर।
फुदक-फुदक के पीठ ला, खेलय कोरे कोर।।
३-पैरा पिकरी रुप के, कई-कई हे रंग।
गरमी अउ बरसात मा, रहिथे मनखे संग।।
४-चारा चरय न खाय कुछु, पीथे भर ओ चूँस।
करिया झाड़ी मा रहय, कोरी खइखा ठूँस।।

4~हेमलाल साहू-चौपैया छंद:-
छोड़व मन माया, माटी काया, झन करहू अभिमाना।
चारे दिन जिनगी, सबला संगी, एक जघा हे जाना।।
संतोष रखै सुख, मिलै नहीं दुख, अपन करम के भागे।
मन कतको जागे, कतको भागे, काल सबो ले आगे।।
तज जात पात ला, मान बात ला, आगू बढ़ जा भाई।
सब संग जोर के, गाँव खोर के, रद्दा बने बनाई।।
आवौ सब पढ़बो, आगू बढ़बो, जिनगी सफल बनाबो।
सब गाँव म जाबो, अलख जगाबो, शिक्षा ला बगराबो।।

5~चोवाराम वर्मा “बादल”-बरवै छंद:-
सुन लव संगी द्वापर, जुग के बात।
अश्विन महिना पावन, पुन्नी रात।
राधा संग कन्हैया, नाचै रास।
दसों दिसा मा बगरे, रहय उजास।
मुरली ला कान्हा जब, झूम बजाय,
राधा गोपी ग्वाला, सब मोंकाय।
झूमै डार कदम के, नाचै मोर,
जमुना के हिरदे मा, उठै हिलोर।
कृष्ण चंद्र के मुख ला, देख चकोर,
मिलकी नइ मारय हो, भाव बिभोर।
रुखुवा नाचैं धरके, मानुस रुप,
अमृत झरै चंदा ले, आप सरूप।
उही लगन शुभ पावन, तिथि हे आज।
रात जाग पूजा के, करबो काज।

6~वसन्ती वर्मा-दुर्मिल सवैया छंद:-
बिहना उठके अब धान लुये बर जावत हे पकलू कमिया।
पटकू गमछा कुरता करिया पहिरे पनही धरके हसिया।।
धरसा तिर रेंगत जावत वोहर गावत गीत लगे बढ़िया।
टुकनी चरिहा धर काँवर मा पकलू पहुँचे बहरा सुतिया।।

7~आशा देशमुख-किरीट सवैया छंद:-
रोय किसान धरे मुड़ ला अब नीर बिना सब खेत सुखावय।
का विधना अपराध करे हन ये दुख काबर हे नहि जावय।।
थोकिन मोर घलो सुनले बिनती महराज कहाँ सुख हावय।
जोड़य हाँथ नवावय माथ बता कइसे जग दु:ख सुनावय।।

8~दिलीप कुमार वर्मा- अमृत ध्वनि छंद:-
नरवा नदिया तीर मा, बर पीपर के छाँव।
बसे हवय गा नान कुन, सुग्घर लागे गाँव।
सुग्घर लागे, गाँव देख ले, आके संगी।
मया पिरीत के, छाँव सबो बर,.नइ हे तंगी।
नइ हे पक्का, इहाँ सबो घर, छांही परवा।
हिलमिल सब झन, रहे तीर मा, नदिया नरवा।

9~कन्हैया साहू “अमित” – सरसी छन्द :-
बिकट बरतिया बिदबिद बाजँय, चाल चलय बेढ़ंग।
बिरबिट करिया भुरुवा सादा, कोनो हे छतरंग।।
कोनो उघरा उखरा उज्जट, उदबिदहा उतलंग।
उहँदा उरभट कुछु नइ घेपँय, उछला उपर उमंग।
रोंठ पोठ सनपटवा पातर, कोनो चाकर लाम।।
नकटा बुचुवा रटहा पकला, नेंग नेंगहा नाम।
खरभुसरा खसुआहा खरतर, खसर-खसर खजुवाय।
चिटहा चिथरा चिपरा छेछन, चुन्दी हा छरियाय।।
जबर जोजवा जकला जकहा, जघा-जघा जुरियाय।
जोग जोगनी जोगी जोंही, बने बराती जाय।।
भुतहा भकला भँगी भँगेड़ी, भक्कम भइ भकवाय।
भसरभोंग भलभलहा भइगे, भदभिदहा भदराय।।
भकर भोकवा भिरहा भदहा, भूत भसड़हा भरमार।
भीम भकुर्रा भैरव भोला, भंडारी भरतार।।
मौज मगन मनमाने मानय, जौंहर उधम मचाय।
चिथँय कोकमँय हुदरँय हुरमत, तनातनी तनियाय।।
आसुतोस तैं औघड़दानी, अद्भूत तोर बिहाव। अजर अमर अविनासी औघड़, अड़हा अमित हियाव।।

10~गजानंद पात्रे “सत्यबोध”-ताटंक छंद:-
नाम कमाले जग मा संगी, पल भर के जिनगानी हे।
छोड़ पिंजरा पंछी उड़ जाही, करम धरम चिनहारी हे।।
सुख के सब्बो संगी साथी, दुख मा भइया भागे हे।
सुख दुख मा जे आघू आथे, असली हितवा लागे हे।।
मुट्ठी बाँधे आना सबके, हाथ पसारे जाना हे।
जीयत भरके संगी साथी, मरे तहाँ बेगाना हे।।
काया माटी माटी मिलही, पथरा पड़ही छाती जी।
बइठ दुवारी छिन भर रोही, बुझही जिनगी बाती जी।।
भाखा बोली मीठा रखले, दया मया संगवारी जी।
सुमता के तैं फूल खिलाले, महका ले फुलवारी जी।।

11~अतनु जोगी-रुपमाला छंद:-
छंद गाथा गीत गाबो, राग पाही पाग।
रुपमाला जान जाबो, जाग जाही भाग।।
छंद रचना बाढ़ जाही, मोर अइसन गोठ।
देस जानै मान देवै, राजभाषा पोठ।।
छाँट साहित लेख लिखबो, पाठ बनही जेन।
माँग करहीं लोग लइका, जेन पाही तेन।।
रात कारी बीत जाही, आज लेखक जीत।
हाथ धरके संग चलबे, बाँट सबला प्रीत।।

12~सुखन जोगी-छप्पय छंद:-
चरिहा टुकनी साज, बाँस ला ले जी कच्चा,
सुनके बँसरी तान, होय खुस लइका बच्चा।
छट्ठी बरही होय, होय जी माटी काठी,
आथे सब मा काम, बाँस के बनथे लाठी।
बाँस म छँउनी छाव जी, बाँसे बल्ली गाड़ के,
सूपा झँउहा ले बना, येला तैंहा फाड़ के।।

13~जितेन्द्र वर्मा “खैरझिटिया”-जयकारी छंद(जनउला):-
जड़काला मा जे मन भाय। गरमी घरी अबड़ रोवाय।
बरसा भर जे फिरे लुकाय। जल्दी बता चीज का आय।।१
आघू मा बइठे रोवाय। नइ खाये जी तभो खवाय।
कान धरे अउ अबड़ घुमाय। काम होय अउ छोड़ भगाय।।१
घर भीतर हे सीटी मार। बइठे धरे भात अउ दार।
कोनो नइ ओला खिसियाय। हेर हेर के सब झन खाय।।३
हावय जेखर दू ठन गोड़। बइठे बबा पालथी मोड़।
गोड़ तिरइयाँ के हे चार। भागे जेहा खारे खार।।४

14~मनीराम साहू “मितान”-कुण्डलियाँ छंद:-
नोनी मारे कोंख के, करथच बाबू जाप।
कतको करले तैं जतन, नइ उतरय जी पाप।
नइ उतरय जी पाप, नरक तैं सोज्झे जाबे।
हो जाबे तैं नास, बहू नइ खोजे पाबे।
बिनती करय ‘मितान’, सफल कर मनखे जोनी।
बाँचय बन रखवार, मरय झन कोनो नोनी।

15~अजय ‘अमृतांशु’-कुकुभ छंद:-
रक्तदान करके संगी हो, ककरो जिनगी ल बचावव,
दान हवय ये सबले बढ़के, बात सबो जघा बतावव।
रक्तदान ईश्वर के पूजा, बात सबो झन जी जानव,
येहू आय भक्ति के रद्दा, जेला तुमन पहिचानव।
पइसा मा नइ मिलय खून जब, बखत परे म चेत आथे,
अधर मा जिनगी लटके रहिथे, तभे बात ल समझ पाथे।
खून नइ बनय लेब म संगी, मोल ल येकर पहिचानव,
मनखे के शरीर मा बनथे, बात ला सिरतोन जानव।
येकर ले आथे कमजोरी, अइसन भरम ल झन पालव,
खून साफ करथे रक्तदान, ये बात मन म बइठालव।

16~मोहन लाल वर्मा-छप्पय छंद:-
सुक्खा परगे फेर, देख तो तरिया नदिया,
कइसन हाहाकार, मचे हे सरी दुनिया।
बिन पानी संसार, फेर गा चलही कइसे,
तड़पत रइही जीव, सबो गा मछरी जइसे।
होही पानी के बिना, सुन्ना ये संसार गा,
जानव एकर मोल ला, पानी जग आधार गा।

17~सुखदेवसिंह अहिलेश्वर-मत्तगयंद सवैया
सावन के महिना बड़ पावन, काँवरिया बन पुन्न कमाबो,
फोंक नदी म नहावत खोरत, मंदिर जाय के फूल चढ़ाबो।
काँवर मा जल बोह के आवत, जावत शंकर के गुन गाबो,
देत असीस सदा शिवशंकर, हाँथ लमावत माँगत आबो।

18~ज्ञानुदास मानिकपुरी-सार छंद:-
धन दौलत अउ माल खजाना, छोड़ एक दिन जाना।
कंचन काया माटी होही, काबर जी इतराना।।
ये दुनिया ला जानौ संगी, दू दिन अपन ठिकाना।
सब संग रहौ मिलजुल संगी, रिस्ता नता निभाना।।
बैर कपट ला दुश्मन जानौ, गीत मया के गाना।
मुट्ठी बाँधे आय जगत मा, हाथ पसारे जाना।।
सुग्घर मनखे तन ला पाके, जिनगी सफल बनाना।
गुरतुर बोल मया के, हिरदे अपन बसाना।।
दया-मया अउ करम-धरम हा, सबले बड़े खजाना।
सत्य प्रेम के पाठ पढ़ौ अउ, सबला हवै पढ़ाना।।

19~दुर्गाशंकर ईजारदार-मत्तगयंद सवैया:-
पाकर के सुन मानुस के तन काबर तैं कति सोचत लाला,
नाम कमा सुन रे मन मूरख काबर काम करे अति काला।
राम जपे नइ तैं हर काबर डार रखे हस रे मुँह ताला,
जावत तोर हिसाब करे यम देखत दौड़त मारत भाला।

20~रश्मि रामेश्वर गुप्ता-कुण्डलिया छंद:-
पानी बड़ अनमोल हे, जतन करव भरपूर।
चिटकन पानी राखिहौ,मन मा घलव जरूर।
मन में घलव जरूर, राखिलौ अमरित पानी।
का के गरब गुमान, अबड़ छोटे जिनगानी।
चिंता सबके एक, बहुत होगे मनमानी।
हरदम रखव सकल, बहे झन फोकट पानी।

21~हेमन्त मानिकपुरी-दोहा छंद
अइलाये तन मा जगे, मनहर प्रीत अनंत।
सूट बूट पहिरे बने, आगे ऋतु बसंत।।
डारा मन उलहोत हे, हरियर हरियर पान।
बुढ़वा बुढ़वा रूख मन,होवत हवे जवान।।
मउहा के खुश्बू धरे , अपने ओली झार।
पगली पुरवइया चले,लड़भड़ लड़भर खार।।
जंगल जंगल सुरमई, जंगल जंगल प्रीत।
आमा मउरे डार मा,कोइली गावय गीत।।
लाली साफा बाँध के, परसा ठाढ़े पार।
कटही सेमरा देख तो,फूले हवय अपार।।
सर सर सर सर उड़त हे,जइसे उड़य गरेर।
रस चुहके बर आय हें, टेसू फूल मछेर।।
आनी बानी फूल खिले,महर महर ममहाय।
जैसे धरती मा सरग , चारो मुड़ा अमाय।।

22~संतोष फरिकार- सरसी छंद
धान लुवे के बाद देख ले,सुन्ना होगे खेत।
ओन्हारी बोये बर कखरो,नइहे एको चेत।
गाय गरू सब छेल्ला घूमय,संसो करे किसान।
हात हूत दिन रात करत मा,लटपट होइस धान।
लाख लाखड़ी चना गहूँ बिन,सुन्ना खेती खार।
अरसी सरसो कायउपजही,सोचय बइठे हार।
ढ़ील्ला हवे गाँव मा एसो, राउत कहाँ लगाय।
मिलके सब किसान हा जम्मो, गरवा अपन चराय।

22~मोहन कुमार निषाद-सार छंद
देवव बेटी ला दुलार जी , बन्द करव ये हत्या ।
जीयन दव अब बेटी ला गा , राखव मनमा सत्या ।
बेटी होही आज तभे जी , बहू अपन बर पाबे ।
बेटा कस जी मान देय ले , जग मा नाम कमाबे ।
करव भेद झन जी दूनो मा , एक बरोबर जानव ।
बेटी लक्ष्मी रूप आय जी , बहू घलो ला मानव ।
छोड़व लालच के रद्धा जी , झन दहेज ला लेहव ।
बन्द होय गा अइसन कुप्रथा , शिक्षा अइसे देहव ।
मारव झन कोनो बेटी ला , जगमा गा तब आही ।
हासत खेलत घर अँगना मा , जिनगी अपन बिताही ।
होवय बंद भ्रूण के हत्या , परन सबे जी ठानव ।
बेटी बिन जिनगी हे सुन्ना , बेटा के सम मानव ।।

23~ बलराम चंद्राकर-लावणी छंद
नान नान नोनी बाबू हम, खेलन बड़ बाँटी भौंरा।
धूर्रा माटी नइ चिनहन जी, जुरियावन चौंरा चौंरा।।
धान मिसावय ब्यारा ब्यारा,दउड़ दउड़ बइठन बेलन।
चइघन खरही पैंरावट मा, उलन उलन अब्बड़ खेलन ।।
खेलन डंडा अउ पचरंगा, पेड़ पेड़ लटकन झूलन।
रेस टीप मा दाँव चुकावन,झटकन कोनो ला छूलन।।
खेल कबड्डी मा छोलावय, कभू कोहनी अउ माड़ी।
सीला बीने बर जावन जी , चघ के हम बइला गाड़ी।।
तॅइर तॅइर तरिया मा संगी, सोर मचावन हम अड़बड़।
पानी मतलावत हे कहिके, होय बिकट कड़बड़ कड़बड़।।
पच जावय सब खेल खेल मा, जब पावन जी तब खावन।
सुरता अब्भो हे ननपन के, जइसे हम लइका हावन। ।

24~जगदीश “हीरा” साहू- सरसी छंद
मनखे अच ता मनखे कस रह, झन उलझा तँय काम।
अपन जनम ला सफल बनाले, लेवत गा प्रभु नाम।।
कहना मान मोर गा भाई, हरी नाम हे सार।
माया के चक्कर मा झन फँस, सबकुछ हे बेकार।।
जिनगी दूभर हो जाही गा, भटकत सुबहों शाम।
जिनगी भर पछताबे तैहा, नइ गाबे प्रभु नाम।।
पाप करे ले नरक भोगबे, खाबे यम के मार।
खौलत पानी मा ओमन जी, तोला दिही उतार।।
तड़पत रहिबे दुख मा भाई, सुरता आही बात।
भटकत रहिबे जनम जनम तँय, आनी बानी खात।।

25~कौशल साहू “फरहदिया”-कुण्डलियाँ छंद
मोची पाँव कटार के, पनही खूब बनाय।
करिया पालिस पोत के, रगड़ रगड़ चमकाय।।
रगड़ रगड़ चमकाय, पाँव के रक्षा करही।
बिन पनही के गोड़, भोंभरा बिक्कट जरही ।।
लेवय सब ले दाम, सकेलय खोंची खोंची ।
पालय घर परिवार, हुनर मा निसदिन मोची।।

26~पोखन जायसवाल-दोहा छंद
लउहा लउहा रेंग के ; जावव हाट बजार ।
किसिम किसिम के चीज मा ;लावव छाँट निमार ।
लेके लान बजार ले ; किसिम किसिम के चीज ।
बारी बखरी बर बिसा ; साग पान के बीज ।
सुन के भाव बजार के ; सबके चेत भुलाय ।
किलो किलो लेवय जिहाँ ; पाव पाव घर आय ।
सुन्ना परत बजार ले ; सबझन दिखय उदास।
देखत असो अकाल ला ; टूटत हे सबके आस ।

27~बोधनराम निषाद- अमृत ध्वनि छंध
पढ़ बेटी तँय मोर ओ,अव्वल बाजी मार।
बेटा ले तँय कम नहीं,जिनगी अपन सुधार।
जिनगी अपन-सुधार बना ले, बनबे रानी।
दाम कमाबे, नाम कमाबे, आनी-बानी।।
दाई -बाबू, भाई- बहिनी, दुनिया ला गढ़।
नवा जमाना,आए हावय, बेटी तँय पढ़।।

28~ राजेश कुमार निषाद- कुकुभ छंद
चलना संगी आज हमन गा,सिरपुर के मेला जाबो।
मन भर घुमबो मेला संगी,होवत संझा घर आबो।।
नदिया के गा तीर भराथे,बड़ सुघ्घर होथे मेला।
कोनो खोले हावय होटल,कोनो गा गुपचुप ठेला।।
खाबो संगी हमन मिठाई,सुघ्घर झुलबो गा झूला।
फेर अइसन दिन कब आही,देबे झन गा तैं भूला।।
मेला होथे माँघ महीना,मनखे मन हा सब आथे।
घूम घाम के लइका मन बर, खई खजाना गा लाथे।।

29~आशा आजाद- दोहा छंद
दाई अपने कोख मा,मोला झन तयँ मार।
सरी जगत ला देखहूँ ,लेके मयँ अवतार।।
भ्रूण नाश ला झन करवँ,एहा अब्बड़ पाप।
जिनगी ला मोरे बचा,नोहय बेटी श्राप।।
तोरे हावव अंश मयँ, नारी के अवतार।
मोला सुग्घर दे जनम,मोर हवयँ गोहार।।
तोर कोख के हवँ कली,झन कर तयँ अपमान।
ये जग मा होवय अबड़,मोरो ऊँचा शान।।
बइठे हाववँ कोख मा,करत हावव गोहार।
मोला नव संसार दे,मोर हवयँ जोहार।

30~नीलम जायसवाल-कुण्डलियाँ छंद:-
वीणापाणी दे मया, कर मोरो उद्धार।
मोला तँय हा ज्ञान दे, अतका कर उपकार।।
अतका कर उपकार, मोर तँय अवगुण हर ले।
दे विद्या के दान, अपन तँय सेवक कर ले।।
ओखर जग मा नाम, बसे तँय जेखर वाणी।
दाई आशा मोर, तहीं हस वीणापाणी।।

31~ज्योति गभेल-दोहा छंद:-
बाती बोलय तेल के, देख सदा ये होय।
तिल-तिल करके हम जलें,अंजोर तभे होय।।
गुरतुर बोलव बोल जी, करलव बढ़िया काम।
दान धरम करके बने, पावव हरि के धाम।।
ज्ञान सुमत के जानिए, बिपती दूर भगाय।
अँगुरी एक टिके नही, मुठा पाँच बन जाय।।
आमा फरगे पेड़ मा, लदगे डारा पान।
हरियर-हरियर फर दिखे, कोयल करथे गान।।

32~पुरुषोत्तम ठेठवार- अमृत ध्वनि छंद
खाये फोकट घूम के, मानुष तन ला पाय।
काम धाम ला छोड़ के, बइठ बइठ के खाय।
बइठ बइठ के, खाय अकारथ, पेट निकारे।
खोर गली मा, तँय छुछवाये, बात बघारे।
काम धाम ले, भागे दुरिहा, नजर बचाये।
किंजर किंजर के, आन कमाई, फोकट खाये।

“छंद के छ” के नवा साधक जौन मन निर्दोष छंद रचना करत हें, इँखर रचना एके जघा इंटरनेट मा पढ़े जा सकथे। 15 अगस्त 2017 ले “छंद खजाना” के नाँव ले एकठन ब्लॉग मा सकेले के उदिम करे गे हावय। छत्तीसगढ़ी भाखा के छंद बद्ध रचना अब गुगल मा www.chhandkhajana.blogspot.in के ठौर मा बड़ असानी ले मिलथे। “छंद के छ” के एकठन अउ सबले खास बात हे इहाँ देवनागरी लिपि के जम्मों 52 अक्षर ला उपयोग करे मा जोर दिए जाथे। बहुते कम समय मा जनकवि “दलित” जी के सपना ला सकार मा “छंद के छ” परिवार बड़भारी सफलता अर्जित करत हवँय। छत्तीसगढ़ी छंद गंगोत्री ले छंदधार फूट परे हे अब एला छंद गंगा बने मा जादा बेरा नइ लागय।

समुद्र मंथन ले अमरित निकले रहीस, ए बात ला हमन पढ़े अउ सुने हन। अमर होय मनखे ला आज ले हम अपन आँखी मा नइ देखे हन। होवत होही अमरित फेर विगियान के ए जुग मा प्रमाण के संग अमरित हा देखे मा नइ आय हे। तुलसी, सूर, कबीर, मीरा, जायसी, सेनापति, रसखान, केशव, घनानंद एमन अमरित नइ पीये रहीन तभो आज अमर हें। सत-साहित ला अमरित जानव अउ इही ला सार मानव। मनखे ला अनमोल जनम मा एमानुस तन मिले हे। बड़ भागमानी हें जेमन ला उपरवाला परमातमा हा कविता लिखे के गुन देहे। आवव अब कुछु अइसन सिखन-लिखन के समाज बर थाती बनय, पढ़इया ला नवा सोच मिलय, हमर लिखे कविता हा जुग-जुग ले अमर रहय,प्रासंगिक रहय। समाज ला नवा दिशा दिखावय। इही “छंद के छ” के सार उद्देश्य हरय।

(साभार:- छंद के छ/ विमर्श के निकष पर छत्तीसगढ़ी)

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*कन्हैया साहू “अमित”*
शिक्षक~ भाटापारा (छ.ग.)
9753322055/9200252055

महंगइ के चिंता

Chhattisgarhi Vyangyaतइहा के बात ला बईहा लेगे, समे ह बदल गे अउ नवा जमाना देस म अपन रंग जमा डारे हे। एकअन्नी-दूअन्नी संग अब चरन्नी नंदा गे हे। सुने हन सरकार ह अब पांच रूपिया ला घलो बंद करईया हे, अब हमर रूपिया दस ले सुरू होही। पहिली हमर सियान मन खीसा भर पईसा म झोला भर जिनिस बिसा डारत रहिन, अब झोला भर रूपिया म खीसा भर जिनिस मिलत हावय। मंहगई के अहा तरा मुह फरई ला देख के नेता अउ मीडिया वाले मन अड़बड़ चिंता करत दिखथें, उंखर चिंता ला देख के लागथे के, देस के जम्मो चिंता के बोझा उंखरे उप्पर हावय। तभो ले, ना तो देस के खरचा मा कमी होवय ना बीपीएल के परचा म कमी होवय।

रोजे धकापेल पान ठेला म जर्दा पाउच अउ दारू भट्ठी म दारू बेंचावत हावय, गाड़ी फटफटी म तेल भरावत हावय, बिन बूता के बूता जवान छोकरा मन गुटका मूह म दाबे फटफटी फर्रावत हांवय, बड़का ककवा कस मोबाइल खीसा म धरे बाप मेर पईसा मांगत हांवय, अउ बापो ह महगई के सोच करे बिना उडाये बर पइसा देवत हावय। अइसनहो मन हमन ला कहत हावय के ‘मंहगाई ले कम्मर टूट गे, महंगइ ह हमला चिंता म डार दीस…!!’

ये सरलग अनादि काल के सत ये के, महंगइ ले जादा ओखर चिंता के डमडमा होथे। तइहा के बात ल बइहा जाने फेर चिंता करइ आजकल के फेसन हो गए हे, तेखर खातिर हम कलेचुप सुनथन। बघेरा वाले दाउ के समे म लोकप्रिय गायक छत्तीसगढ़ के रफी भाई केदार यादव के नवा बिहान म जयंती बाई ह जब बद्रीविशाल परमांद के गीत ‘कम्मर टूट ना गुलैती, ये महगंई के मारे गुलैती, कम्मर टूट गे ना’ गावय, तब उहू समें हमर सियान मर बड़ चिंता करंय। वो बेरा म कहूं मंहगई बर बड़का सियान मन चिंता नई करतिन त ये गीत ह अतका परसिध नई होतिस, माने कि सबे समे म मंहगाई बर चिंता करईया रहिन, भले आज पोटिया गांव म पचत जयंती बाई के चिंता कउनो झन करय।

कुछ उज्‍जर कुरथा पहिरइया मन चिंता नइ करंय, उमन ल येखर कभू जरूरत परबेच नइ करय, उमन बीर बन के महंगई संग लरे के दांव बताथें। जना मना महंगइ ह कउनो बिलई ये, के ओखर कान ल उमेठ के कनबुच्ची बइठार देहू? ये दूनों बात ला देख के मोला लागथे के देश म टोपी लगा के जईसे लोकपाल, निपोरपाल, चंदोरपाल के बिवस्था करे जात हे, तईसनेहे मंहगई बर चिंता करईया अउ मंहगई के बिरोध म गोठ बात करईया, कोनो चिंतापाल के बिवस्था करना चाहिए। ओ ह, हर हप्ता मंहगई के बिरोध म लम्भा लम्भा भासन झाड़य अउ गजट मन मा बिगियपति देवय। महगई के बिरोध म रेरियाये खातिर चिंतापाल ह जम्मो परदेस अउ जिला स्तर म एक एक झन के नियुक्ति करय। जेखर सिरिफ इही काम रहय के सरकार ह जईसे पेट्रोल उट्रोल के भाव बढ़ावय त वो ह, होs होs हो sss रोवय, ताकि जनता ला पता चल सकय के मंहगई बाढ़ गे हे।

अब अपन पीरा ल जनवाए बर दरोगा राखे के पारी आ गए हे। हमन ह, न तो गाड़ी फटफटी म पेट्रोल फुंके म कमी करन ना सरकार के कारिंदा मन। खाली महंगई के रोना रोथन। नेता मन तो अउ अतलंग कर देहे हें, बाहिर-बट्टा तको जाना हे अउ कहूँ तीर तखार म सुलभ सोंचालय के सिलानियास बर जाना हे, तभो उमन कार म जाहीं, अउ एक ठन कार नहीं, अपन संग चार ठिन कार ला जुच्छा रेंगवाहीं। जेखर ले पता चल सकय के नेताजी आवत हे। काखर काखर ल गोठियांवव.. सरकार ला तो, ये बात के फिकरे नई हे, जउन साहब मन ला सरकार डहर ले गाड़ी मिले हे, तेखर लईका मन ला फिलिम जाना हे, साग भाजी लाना हे, त सरकारी गाड़ी भर्रावत इंदिरा मारकिट पहुंचत हे, त कोन कहिथे के महगाई बाढ़त हावय। असली बात लोगन के खर्चा करे के सामरथ ह बाढ़त हावय। हमर खून पसीना ले कमाए पैसा ल टेक्स म वुसुल के अउ भ्रष्ट्राचारी करके सरकार के कारिंदा अउ नेता मन के खरचा बाढ़त हे। मिलावटखोरी अउ जमाखोरी ले बियापारी, ठेकेदार मन के खरचा बाढ़त हे। हमर खेत म राख छींच के, हमला नंगरा बना के, उद्योगपति मन के मन के खरचा बाढ़त हे। कोन कथे महंगई बाढ़त हे, ताली वाले बेतनमान संग दू लंबर के इनकम तको तो बाढ़त हे।

इमन ल खरचा करन दव, तुम जनता आव त कलेचुप महंगइ के चरचा करव, चिंता करव। एखर ले तुहाँर चतुरई घटही अउ येमन बिना तुतारी के मेछराही।

तमंचा रायपुरी

छत्तीसगढ़ी : कामकाज अउ लेखन के रूप : सुशील भोले

Sushilजबले छत्तीसगढ़ी ल राजभाषा के दरजा दे के ए भरोसा जगाये गे हवय के अवइया बेरा म ए ह शिक्षा के संगे-संग राजकाज के भाषा बन सकथे, तबले एकर साहित्यिक लेखन के रूप अउ कामकाज माने प्रशासकीय रूप ऊपर भारी गोठ-बात अउ तिरिक-तीरा चलत हे। ए संबंध म राजभाषा आयोग ह एक ठ विचार गोष्ठी के आयोजन घलोक करे रिहिसे, जेमा ए बात प्रमुखता ले आइस के कामकाज के भाषा ल आम बोलचाल के रूप म ही लिखे जाना चाही।

ए विचार ले लगभग महूं सहमत हवंव। काबर के प्रशासनिक काम-बुता म बहुत अकन अइसन शब्द आथें, जेकर मनके अनुवाद करे म आने के ताने असन लागथे, वोकर मूल अभिव्यक्ति नइ हो पावय। ए बात ल उही मन समझ सकथें, जेमन छत्तीसगढ़ी म सरलग लिखत हें, उहू म गद्य रूप म। फेर पद्य लेखक मन या फेर वोमन, जेकर मन के लेखन ह सिरिफ नेंग छूटे असन हावय, वोमन ह आरुग भाषा के संगे-संग लिपि (वर्णमाला) के प्रयोग के मामला म घलोक परंपरावादी रूप के प्रयोग के बात करथें।

मोला लगथे के एला हमन ल उही रूप म लेना चाही, जइसे हिन्दी ह लोकभाषा ले राष्ट्रभाषा के खुरसी म बइठे खातिर अपनाइस हे। माने जब तक वोला खड़ी बोली के रूप म लिखे गेइस तब तक श,ष, ऋ जइसन शब्द के प्रयोग ले दूरिहा रखे गेइस फेर जइसे राष्ट्रभाषा के खुरसी म बइठे के उदिम रचे गेइस वइसनेच एकर रूप ल उच्चारण के शुद्धता के अनुरूप कर दे गेइस। माने नागरी लिपि के जम्मो वर्ण मनला आत्मसात कर ले गेइस। मोला लागथे के अब हमूं मनला अइसने करना चाही। छत्तीसगढ़ी  लेखन खातिर हमन नागरी लिपि ल अपनाए हावन त वोकर सब्बो वर्णमाला ल घलोक अपनाना चाही। जब तक छत्तीसगढ़ी ह बोली के रूप म जाने जावत रिहिसे तब तक भले हम श,ष, ऋ जइसे वर्ण मनके प्रयोग नइ करत रेहे हावन, फेर अब जब इहू ल प्रदेश स्तर म राजभाषा के दरजा दे दिए गे हवय, प्रशासनिक काम-काज ल एमा करे के जोखा मढ़ाए जावत हावय त एला भाषा के जम्मो मानक के अनुरूप बनाये जाना चाही। ए हम सबके जिम्मेदारी आय।

अभी साहित्यिक लेखन म दू किसम के रूप देखे जावत हे। पहला रूप तो परंपरावादी मनके हे, जेमन संस्कृति ल संसकिरिति, शंकर ल संकर, प्रसार ल परसार, ऋषि ल रिसि लिखत रहिथें। मोला लागथे के छत्तीसगढ़ी के अइसन रूप ल आज के वैश्विक (ग्लोबल) दुनिया ह पचो नइ पावय, आत्मसात नइ कर पावय। फेर सबले बड़े बात ये हे के कोनो भी आने क्षेत्र के मनखे मन अपन भाषा ल बिगाड़ के दूसर के भाषा ल नइ सिखंय।     हमला छत्तीसगढ़ी ल ए पूरा राज के हर आदमी मन के संगे-संग विश्व के लोगन संग जोडऩा हे, उनला छत्तीसगढ़ी लिखे, पढ़े अउ बोले खातिर प्रेरित करना हे, त ए जरूरी हवय के हमला अपन दृष्टिकोण ल बड़े बनाए बर लागही, हमला अपन सोच ल विश्वव्यापी बनाए बर लागही अउ पूरा एकमई होवत दुनिया (ग्लोबल होवत) के हर वो संपर्क भाषा ल अपन संग जोड़े बर लागही, वोकर मनके वो प्रचलित शब्द मनला अपन संग संघारे बर लागही, जेमन कोनो न कोनो किसम ले हर दिनचर्या म शामिल होवत जावत हें।

आज हमन अंतर्राष्ट्रीय भाषा अंग्रेजी के ए कहि के विरोध करथन के वोकर सेती हमर अपन भाषा के अस्तित्व खतरा म परत हावय। फेर वोकर वो बड़प्पन ल काबर भुला जाथन के वोहर अपन आप ल बड़े बनाए खातिर दुनिया के हर भाषा अउ वोकर प्रचलित शब्द मनला आत्मसात करके अपन आप ल बड़े बनाए हे। वोकरे सेती वोहर आज पूरा दुनिया म राज करत हे। अउ एक हमन हावन जेन कुआं के मेचका बरोबर बने रहना चाहथन, अउ सपना देखथन के ए हर जन-जन के भाषा बनय, राजकाज अउ शिक्षा के भाषा बनय।

मोर अरजी हे के जतका जल्दी हो सकय एकर व्यापकता ल देखत-समझत अपन सोच अउ दायरा ल बड़े बनाय के दिशा म कदम बढ़ावन।

सुशील भोले
संपर्क : 41-191, कस्टम कालोनी के सामने,
डॉ. बघेल गली, संजय नगर (टिकरापारा)
रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं. 098269 92811

हीरा गंवा गेहे बनकचरा म…

ये ह छत्तीसगढ़ महतारी के दुर्भाग्य आय केवोकर असर हीरा बेटा मनला चुन-चुनके बनकचरा म फेंक अउ लुकाए के जेन बुता इहां के इतिहास लिखे के संग ले चालू होय हे तेन ह आजो ले चलते हे। एकरे सेती हमला आज हीरालाल काव्योपाध्याय जइसन युग पुरुष ल जनवाय के उदीम करे बर लागत हे।
ये ह कतेक लाज के बात आय के छत्तीसगढ़ी लेखन के जेन गंगोत्री आय तेने ल इहां के इतिहास लेखन ले दुरिहाए के उदीम करे गे हवय। मोला लागथे के अइसन किसम के उजबक बुता ल उही मन करें हें, जिनला इहां के मूल निवासी मन के धरम, संस्कृति, इतिहास अउ गौरव ले कोनो किसिम के इरखा या दुसमनी रहिस होही। काबर ते इहां के ये सब जिनीस संग जतका दोगलई करे गे हवय वइसन सिरिफ कोनो दुसमन बैरी च ह कर सकथे, कोनो हितु-पिरितु अउ संगी संगवारी मन नहीं।
आप मनला ये जान के आश्चर्य होही के जब कभू छत्तीसगढ़ी लेखन के शुरुआत के बात आथे, त झट ले सुंदरलाल शर्मा के नाम ले देथन, ये कहिके के प्रकाशित रूप मं उंकर लिखे ‘दानलीला’ ह सबले पहिली किताब आय। फेर ये बात ल कइसे भुला जाथन के उंकर ले कतको बछर पहिली सन् 1885 म हीरालाल काव्योपाध्याय ह छत्तीसगढ़ी व्याकरण लिखे रिहिन हें। जेमा व्याकरण के संगे-संग लोक गीत अउ साहित्य ल घलोक सकेले गे रिहिस हे। ये व्याकरण ल वो बखत के दुनिया के सबले बड़का व्याकरणाचार्य सर जार्ज ग्रियर्सन ह अंगरजी म अनुवाद करके छत्तीसगढी अउ अंग्रेजी के समिलहा रूप म सन् 1890 म छपवाए रिहिस हे।
इहां एक अउ बात के चरचा करना चाहथौं के जब सुंदरलाल शर्मा ले आगू निकले के बात होथे, त संत कबीरदास के बड़का चेला धनी धरमदास के बात करे जाथे। उंकर लिखे निरगुन भजन- जामुनिया के डार मोर टोर देव हो…जइसन मन के उदाहरन दिए जाथे। ये ह बिलकुल दोगलाई के बात आय। काबर ते धरमदास के एको ठन रचना मन ला छत्तीसगढ़ी के आरुग रूप के अंदर्गत नइ रखे जा सकय। उंकर रचना मन मिश्रित भाषआ के उपयोग करे गे हावय। जइसन कबीरदासजी ह अपन रचना मन म करयं। एकर सेती धरमदास ल छत्तीसगढ़ी के रचनाकार नइ माने जा सकय। अइसने अउ बहुत झन हें, जे मन छत्तीसगढ़ म रहयं भले फेर उन ब्रज, अवधी या खड़ी बोली म रचना करयं। हम जब छत्तीसगढ़ी के बात करथन, त आज केजेन छत्तीसगढ़ी के आरुग रूप हे तेकर बात करथन, अउ आज के रूप म सिरिफ हीरालालजी के छत्तीसतगढ़ी व्याकरण ल ही प्रकाशित रूप म सबले जुन्ना किताब या लेखनी माने जा सकथे, अउ कोनो दूसर ल नहीं।
मैं इहां के मूल संस्कृति अउ इतिहास के बात हमेश ाकरथों अउ जम्मो जगा ये बात ल कहिथौं के इहां के सांस्कृतिक इतिहास ल इहां जेन सृष्टिकाल या युग निर्धारण के हिसाब ले कहिन ते सतयुग के संस्कृति ल नवा सिरा ले लिखे जाना चाही। जेन छत्तीसगढ़ ह आदिकाल ले बूढ़ादेव के रूप म सृष्टिकाल के संस्कृति ल जीथे, वोकर प्राचीनता ह सिरिफ रामायण अउ महाभारत (द्वापर-त्रेता) तक सीमित कइसे हो सकथे? बस्तर के लोकगीत म ये बात के जानकारी मिलथे के जब गणेश जी ल प्रथमपूज्य के आर्शीवाद दे दिए जाथे। त वोकर बड़का भाई कार्तिक ह रिसा के दक्षिण भारत आ जाथे। कार्तिक ल मना के वापिस हिमालय लेगे खातिर भगवान शंकर अउ देवी पार्वती ह सोला साल तक बस्तर म रहे हावयं। जब शिवजी ये छत्तीसगढ़ म रहे हावय। त निश्चित रूप ले इहां के इतिहास ह वतका जुन्ना हे त फेर अइसन काबर लिखे जाथे के इहां के इतिहास ह सिरिफ रामायण-महाभारत काल तक सीमित हे।
ये तो जुन्ना बेरा के गोठ होइस। अब कुच आज के बात। इतिहास लेखन के जब गोठ करत हावन त आजो जेन लिखे जावत हे। तेला खलहारना जरूरी हावय। काबर ते आजो वइसनेच चाल चले जावत हे। जइसे पहिली चले गे रिहिसे। अभी कुछ दिन पहिली इहां रायपुर म छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग के कार्यक्रम होइस। जेमा इहां के साहित्यकार अउ पत्रिका के ऊपर जतका भी वक्तामन बोलिन वोमा छत्तीसगढ़ी भाखा के एकमात्र संपूर्ण मासिक पत्रिका ‘मयारू माटी’ के नाम के उल्लेख एको झन वक्ता मन नइ करीन। अब येला का कहे जाना चाही? वक्ता मन के अधूरा ज्ञान ते जानबूझ के करे गे बदमासी। जबकि ये बात सोला आना सच आय के इहां पत्रिका के नाम म जतका भी पक्षित्रा निकले हे वोमा सिरिफ मयारू माटी ल ही संपूर्ण कहे जा सकथेष बाकी अउ कोनो ल नहीं। बाकी मन कोनो कविता संकलन के रूप म निकलत हें, त कोना कहानी अउ गद्य संकलन के रूप म। एक सम्पूर्ण पत्रिका के जेन मानक रूप होथे, वोमा कोनो ल पूर्ण रूप से नइ रखे जा सकय।
अइसने बात साहित्यकार मन के संबंध म घलोक हे। लेख लिखने वाला या सभा म वक्ता के रूप म बोलने वाला मन के जतका चिन-चिन्हार के होथे. तेकर मन के नाम ह तो बने जग-जग ले लिखे मिलथे, भले वोकर रचना के स्तर ह खातू-कचरा किसम के राहय। फेर जे मन सहीं म बहुत अच्छा लिखते हावयं या पहिली लिखे हावयं वोकर मन के नाम ह कोनो मेर खोजे नइ मिलय। ये सबला का ककहे जाना चाही? इहां के इतिहास लेखन म अंगरी उठाय के मोर जेन उद्देश्य हे वो ह कोनो मनखे ल दोसी बताना नइए। फेर अतका जरूर हे के अइसन किसम के काम ल पूरा ईमानदारी अउ पूरा-पूरा जानकारी के आधार म होना चाही, मात्र सूने सुनाय या अपन बिरान के आधार म नइ करे जाना चाही। काबर ते इहां अइसन मनखे मन के संख्या जादा हावय। जेन मनला कौंवा कान ल लेगे कहि दे त उन कान ल टमड़े ल छोड़ के कौंवा के पाछू भागे म अगुवा जाथें।
आज हीराला जी ल सुरता करत अउ गजब अकन गोठ करे रे मन होवत हे। फेर अभी हर साल उंकर सुरता म ये कारज ल करना हे। तेकर सेती बाकी विषय मनला अउ अवइया बछर खातिर छोड़ना ह ठीक रइही।

सुशील भोले
41191 डॉ. बघेल गली
संजय नगर टिकरापार
रायपुर

अस्मिता के आत्मा आय संस्कृति

आजकाल ‘अस्मिता’ शब्द के चलन ह भारी बाढग़े हवय। हर कहूँ मेर एकर उच्चारन होवत रहिथे, तभो ले कतकों मनखे अभी घलोक एकर अरथ ल समझ नइ पाए हे, एकरे सेती उन अस्मिता के अन्ते-तन्ते अरथ निकालत रहिथें, लोगन ल बतावत रहिथें। अस्मिता असल म संस्कृत भाषा के शब्द आय, जेहा ‘अस्मि’ ले बने हे। अस्मि के अर्थ होथे ‘हूँ’। अउ जब अस्मि म ‘ता’ जुड़ जाथे त हो जाथे ‘अस्मिता’ अउ ये दूनों जुड़े शब्द के अरथ होथे- ‘मैं कोन आँव?’, मैं कौन हूँ?, मेरी पहचान क्या है?, मोर चिन्हारी का आय? अब ये बात ल तो सबो जानथें के हर मनखे के या क्षेत्र के चिन्हारी वोकर संस्कृति होथे। एकरे सेती हमन कहिथन के जे मन छत्तीसगढ़ के संस्कृति ल जीथे वोमन छत्तीसगढिय़ा। अइसने जम्मो क्षेत्र के लोगन के निर्धारण वोकर संस्कृति संग होथे।

एक बात इहाँ ध्यान दे के लाइक हे के भाषा ह संस्कृति के संवाहक होथे, वोकर प्रवक्ता होथे, एकरे सेती कोनो क्षेत्र विशेष के भाषा भर ल बोले म कोनो मनखे ल वो क्षेत्र के मूल निवासी नइ माने जा सकय। अब हमन छत्तीसगढ़ के संदर्भ म देखन। इहाँ के मातृभाषा छत्तीसगढ़ी ल आज इहाँ के मूल निवासी मन के संगे-संग बाहिर ले आके रहत लगभग अउ जम्मो लोगन थोक-बहुत बोलबेच करथें, तभो ले उनला हम छत्तीसगढ़ के मूल निवासी नइ मानन, काबर उन आजो इहाँ रहि के घलोक अपन मूल प्रदेश के संस्कृति ल जीथें। पंजाब ले आये मनखे पंजाब के संस्कृति ल जीथे, बंगाल ले आये मनखे बंगाल के संस्कृति ल जीथे, अउ अइसने आने लोगन घलो अपन-अपन मूल प्रदेश के संस्कृति ल ही जीथें, उही संस्कृति के अंतर्गत इहाँ कतकों किसम के आयोजन घलोक करत रहिथें। ए ह ए बात के चिन्हारी आय के वो ह आज घलोक छत्तीसगढ़ के ‘चिन्हारी’ ल अपन ‘चिन्हारी’ नइ बना पाए हे, इहाँ के अस्मिता ल आत्मसात नइ कर पाए हे। अउ जब तक वो ह इहाँ के अस्मिता ल आत्मसात नइ कर लेही तब तक वोला छत्तीसगढिय़ा नइ माने जा सकय।

हम ए उदाहरण म भारत ले जा के विदेश म बसे लोगन मनला घलोक शामिल कर सकथन। आज घलो अइसन लोगन ल हम भारतीय मूल के लोगन कहिथन, भारतीय संस्कृति ल विदेश म बगराने वाला कहिथन काबर ते उन आने देश म रहि के घलोक भारत के संस्कृति ल जीथें, भारत के तिहार-बार ल मनाथें। जबकि उहाँ बसे अइसे कतकों लोगन हें, जे मन भारत के भाषा ल भुलागे हवंय, फेर संस्कृति ल आजो धरे बइठे हावंय। क्रिकेट खेले बर इहाँ वेस्ट इंडीज के जेन टीम आथे, वोमा अइसन कतकों झन रहिथें, जे मन भारतीय मूल के होथें, उंकर मनके नाम घलोक शिवराम चंद्रपाल जइसन भारतीय किसम के होथे, फेर उन इहाँ के भाषा ल नइ बोले सकयं। भाषा उहें के बोलथें जिहाँ अब रहिथें, तभो ले उनला भारतीय मूल के कहे जाथे, काबर ते वोकर पहिचान के या कहिन के चिन्हारी के मानक संस्कृति होथे।

अब हम छत्तीसगढ़ के संस्कृति के बात करन या कहिन के अस्मिता के बात करन। त सबले पहिली ए बात उठथे के छत्तीसगढ़ के संस्कृति का देश के आने भाग म पाए जाने वाला संस्कृति ले अलग हे? त एकर जवाब हे- हाँ बहुत अकन परब-तिहार अउ रिति-रिवाज अलग हे, अउ उही अलगे मनके सेती हम छत्तीसगढ़ ल एक अलग साँस्कृतिक इकाई मानथन, जेकर सेती ए क्षेत्र ल एक अलग राज के रूप म मान्यता दे गे हवय। वइसे कुछ अइसे घलोक तिहार-बार हे, जेला पूरा देश के संगे-संग छत्तीसगढ़ म घलोक मनाए जाथे, फेर जब अलग चिन्हारी के बात आथे त अइसन मनला अलगिया दिए जाथे। अब प्रश्न ये उठथे के अइसन का अलग हे जेन संस्कृति ल आने प्रदेश म नइ जिए जाय? त ए बात ल सब जानथें के मैं ह इहाँ के मूल संस्कृति ऊपर पहिली घलोक अड़बड़ लिखे हौं, अउ बेरा-बेरा म एकर ऊपर चरचा-भासन घलोक दिए हौं, तभो ले कुछ रोटहा बात ल थोक-मोक फेर करत हावंव।

सबले पहिली छत्तीसगढ़ के मूल संस्कृति का आय, तेला फोरिया लेथन। काबर ते आज इहां के संस्कृति के जेन रूप देखाए जावत हे, वोकर मानकीकरण ल गलत करे जावत हे। असल म कोनो भी क्षेत्र या प्रदेश के संस्कृति के मानक उहाँ के मूल निवासी मन के संस्कृति होथे, बाहिर ले आके इहाँ बस गे लोगन मन के संस्कृति ह नइ होवय, फेर कोन जनी इहाँ के तथाकथित विद्वान मनला का मनसा भरम धर लिए हे, ते उन इहाँ के मूल निवासी मनके संस्कृति ल एक डहर तिरिया दिए हें, अउ बाहिर ले आए लोगन मन के संस्कृति ल छत्तीसगढ़ के संस्कृति के रूप म लिखत-पढ़त हें। ये ह असल म इतिहास लेखन संग दोगलागिरी करना आय, तभो ले कुछ लोगन ए दोगलागिरी ल पूरा बेसरमी के साथ करत हें। एमा वो लोगन मन के संख्या जादा हे, जे मन उत्तर भारत ले आ के इहाँ बसे हवंय, एकरे सेती उन अस्मिता के आत्मा के रूप म संस्कृति ल छोड़ के भाषा ल बतावत रहिथें। काबर ते उन ए बात ल अच्छा से जानथें के जब इहाँ के मूल संस्कृति के बात करबो तब तो हमूँ मन गैर छत्तीसगढिय़ा हो जाबो, बाहिरी हो जाबो, काबर ते छत्तीसगढ़ के संस्कृति ल तो उहू मन नइ जीययं।

अब कुछ मूल संस्कृति के बात। त सबले पहिली वो चातुर्मास के बात जेला चारोंखुंट मनाथें, फेर जे छत्तीसगढ़ के मूल संस्कृति म लागू नइ होय। अइसे कहिथें के चातुर्मास के चार महीना म देंवता मन बिसराम करथें या कहिन के सूत जाथें, एकरे सेती ए चार महीना (सावन, भादो, कुंवार अउ कातिक) म कोनो भी किसम के शुभ कारज (माँगलिक कार्य, जइसे- बर-बिहाव आदि) नइ करे जाय। अब हम छत्तीसगढ़ के परब-तिहार के बात करन त देखथन के इहाँ भगवान शंकर अउ देवी पार्वती के बिहाव के परब ल ‘गौरा पूजा’ या ‘गौरी-गौरा’ के रूप म इही चातुर्मास के भीतर माने कातिक महीना के अमावस्या तिथि म मनाए जाथे। अब प्रश्न उठथे, के जब भगवान के बिहाव ह देवउठनी माने चातुर्मास सिराये के पहिली हो जाथे, त ए चातुर्मास के रिवाज ह हमर छत्तीसगढ़ के संस्कृति म कहाँ लागू होइस?

मोर तो ए कहना हे के छत्तीसगढ़ के संस्कृति म चातुर्मास के इही चारों महीना ल सबले जादा शुभ अउ पवित्र माने जाथे, काबर ते इही चारों महीना- सावन, भादो, कुंवार, कातिक म ही छत्तीसगढ़ के मूल संस्कृति के जम्मो बडक़ा परब मन आथें, जेमा हरेली ले लेके कातिक पुन्नी ले चालू होवइया मेला-मड़ई परब ह आथे।

अब एक अइसे बडक़ा तिहार के चरचा जेला पूरा देश म मनाए जाथे, फेर वोकर कारण अउ स्वरूप म बाहिर म अउ छत्तीसगढ़ म थोर-बहुत फरक होथे, वो तिहार आय होली। होली के बारे ए बात ल जानना जरूरी हे के छत्तीसगढ़ म एला ‘काम दहन’ के रूप म मनाए जाथे, जबकि देश के आने भाग म ‘होलिका दहन’ के सेती। होलिका दहन ल सिरिफ पाँच दिन के मनाए जाथे, जे ह फागुन पुन्नी ले लेके रंग पंचमी (चइत महीना के अंधियारी पाख के पंचमी) तक चलथे। छत्तीसगढ़ म जेन ‘काम दहन’ मनाए जाथे वोला चालीस दिन के मनाए जाथे- बसंत पंचमी (माघ महीना अंजोरी पाख के पंचमी) ले लेके फागुन पुन्नी तक।

बिल्कुल अइसने दसरहा के बारे म जानना घलोक जरूरी हे। काबर के इहू परब ल छत्तीसगढ़ म अउ देश के आने भाग म अलग-अलग कारण के सेती मनाए जाथे। जिहाँ देश के आने भाग म एला ‘रावण वध’ के सेती मनाए जाथे, उहें छत्तीसगढ़ म ‘विष हरण’ माने ‘दंस हरन’ के रूप म मनाए जाथे। हमर बस्तर म जेन रथ यात्रा के परब मनाए जाथे वो असल म मंदराचल पर्वत के मंथन अउ वोकर बाद निकले विष के हरण के परब आय। बस्तर के दसरहा अउ कल्लू (मनाली) के दसरहा, ए दूनो ह एके आय।

अस्मिता के जब बात होथे त भाषा अउ इतिहास के बात घलोक होथे। काबर ते इहू मन अस्मिता माने ‘चिन्हारी’ के अंग आयं। जिहाँ तक भाषा के बात हे त हीरालाल काव्योपाध्याय द्वारा सन् 1885 म लिखे छत्तीसगढ़ी भाखा के व्याकरण संग एकर प्रकाशित रूप हमर आगू म हवय, जेला अब इहाँ के राज सरकार ह प्रदेश म ‘राजभासा’ के दरजा दे दिए हवय, फेर केन्द्र सरकार के माध्यम ले संविधान के आठवीं अनुसूची म शामिल करे के बुता ह अभी घलोक बाँचे हवय।

आज छत्तीसगढ़ी भाखा म हर विधा के अंतर्गत रचना करे जावत हे, अउ अच्छा रचना करे जावत हे, जेला राष्ट्रीय स्तर के आने भाखा के साहित्य मन संग तुलना करे जा सकथे। नवा पीढ़ी के रचनाकार मन म अच्छा उत्साह देखे जावत हे, जे मन ल इहां के पत्र-पत्रिका मन म प्रकाशन के अवसर घलोक अच्छा मिलत हे। सबले बढिय़ा बात ये हे के इंटरनेट के आधुनिक तकनीक के प्रयोग घलोक ह छत्तीसगढ़ी भाखा ल देश-दुनिया के चारों खुंट म पहुंचावत हे। ए सबला देख के लागथे के छत्तीसगढ़ी के आने वाला बेरा ह चमकदार रइही।

आखिरी म इतिहास के घलोक खोंची भर बात हो जाय। काबर ते इहाँ जेन किसम के इतिहास लेखन होवत हे वोकर ले मैं भारी नराज हावंव। ए देखे म आवत हे के अधकचरा जानकारी रखने वाले मन इहां इतिहासकार अउ गुन्निक बनके सबला चौपट करत हवयं। संग म इहू देखे म आवत हवय के कुछ वर्ग विशेष के मनखे मन जानबूझ के आने वर्ग के लोगन मन के बड़े-बड़े कारज मन के घलोक उपेक्षा करत हें। एमा विश्वविद्यालय मनके भूमिका घलोक ह बने नइ लागत हे। भलुक ए कहना जादा ठीक होही के आँखी मूंद के पीएचडी के डिगरी ल बांटे जावत हे। ए सब दुखद हे। भरोसा हे के ईमानदार आँखी के माध्यम ले ये सबला नवा सिरा से देखे जाही।

सुशील भोले
संपर्क : 41-191, डॉ. बघेल गली,
संजय नगर (टिकरापारा), रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं. 098269 92811

काम दहन के आय परब- होली

छत्तीसगढ़ आदिकाल ले बूढ़ादेव के रूप म भगवान शिव अउ वोकर परिवार ले जुड़े संस्कृति ल जीथे, एकरे सेती इहां के जतका मूल परब अउ तिहार हे सबो ह सिव या सिव परिवार ले जुड़े हावय। उही किसम होली जेला इहां के भाखा म होली कहे जाते। इहू हर भगवान भोलेनाथ द्वारा कामदेव ल भसम करे के परब आय।
छ त्तीसगढ़ म हमन जेन होली के परब मनाथन वो हर असल म काम दहन के परब आय। बाहिर ले आए मनखे मन इहां के सांस्कृतिक स्वरूप अउ इतिहास ल अब्बड़ ख़दर-बदर कर दिए हे। तेकरे सेती हमू मन वोकर मन सही ये होली के परब ल होलिका दहन के रूप म जानथव। ये हर असल म उत्तर भारत ले आये लोगन अउ उंकर मन के ग्रंथ के माध्यम ले इहां थोपे गे स्वरूप आय।
छत्तीसगढ़ आदिकाल ले बूढ़ादेव के रूप म अग्रवाल शिव अउ वोकर परिवार ले जुड़े संस्कृति ल जीथे, एकरे सेती इहां के जतका मूल परब अउ तिहार हे सबो ह सिव या सिव परिवार ले जुड़े हावय। उही किसम होली जेला इहां के भाखा म होली कहे जाते। इहू हर भगवान भोलेनाथ द्वारा कामदेव ल भसम करे के परब आय।
जे मन छत्तीसगढ़ के ‘होले’ ल होलिका दहन संग जोड़थें वोकर मन ले मोर एक ठन प्रश्न हे- होलिका तो सिरिफ एकेच दिन म चिता रचिस, वोमा आगी ढिलीस अउ प्रहलाद ल धर के लहुटिस। येमा प्रहलाद तो बांचगे फेर खुदे ह जर-भुंज के लेसागे। तब फेर एकर खातिर बसंत पंचमी ले लेके फागुन पुन्नी तक के करीब चालीस दिन के परब मनाए के ये अवसर म नाचे गाए अउ वासनात्मक शब्द मन के उपयोग करे के का आवश्यकता हे। आखिर ए सब के होलिका संग का संबंध हे?
असल म ये जम्मो दृश्य के संबंध भगवान शिव अउ ओकर द्वारा तीसरा नेत्र खोल के भसम करे गे कामदेव के संग हे। आप मन ये प्रसंग ल जानत होहू के त्रिपुर नामक राक्षस के आतंक ले पीड़ित होके देवता मन भगवान शिव के पुत्र के कामना खातिर कामदेव ल तपस्यारत शिव जगा भेजथे तेमा शिवजी के अंदर काम वासना के जनम होवय। अउ वोहर माता पार्वती संग बिहाव करय ताकि वोकर ले शिवपुत्र के जन्म हो सकय जेन हर ये अत्याचारी राक्षस के संहार कर सकय। काबर के वो राक्षस ह तपस्या करके शिवपुत्र के द्वारा ही अपन मरन के आसीरवाद मांगे रहिथे तेकरे सेती वो हर अउ कोनो देवता के द्वारा नइ मरत राहय।
देवता मन के अरजी बिनती करे म कामदेव ह अपन सुवारी पत्नी संग बसंत के मादकता भरे मौसम म जाथे शिव तपस्या भंग करे बर। हमर इहां बसंत पंचमी के दिन जेन अंडा नांव के पेड़ गडियाए जाथे वोहर असल म कामदेव के आगमन के प्रतीक आय। अउ वोकर बाद तहां ले इहां वासनात्मक गीत नृत्य के चलन-चालू हो जाथे जे हा फागुन पुन्नी तक चलथे। काबर ते भगवान भोलेनाथ ह इही फागुन पुन्नी के तीसरा नेत्र ल खोल के कामदेव ल भसम करे रिहिसे।
सिरिफ होली तिहार भर नहीं, भलुक इहां के जतका भी मूल परब अउ तिहार हे, इहां के इतिहास हे जम्मो के रांही-छांही कर दिए गे हावय। जेमन ला नवा सिरा ले वोकर मूल रूप म लिखे के जरूरत हे। छत्तीसगढ़ के इतिहास अउ एकर सांस्कृतिक स्वरूप ल जब तक बाहिर के प्रदेश मन म बइठ के लिखे गे ग्रंथ मन के मापदण्ड म लिखे जाही तब तक एकर सही स्वरूप ह लोगन के आगू म नइ आ सकय। एकर सेती इहां के जम्मो अस्मिता प्रेमी मन ला बाहिरी लोगन अउ बाहिर म लिखे गे ग्रंथ के भंवरजाल ले निकल के इहां के वास्तविक कारण ल जाने बर परही अउ फेर वोकर मापदण्ड म एला नवा सिरा ले लिखे बर लागही।
सुशील भोले

आरूग चोला पहिरावय 10 जन

धर्म के नांव म हमर मन ऊपर अन्य प्रदेश के संस्कृति ल खपले के लगातार प्रयास चलत हे। जेकर सेती हमर भूल संस्कृति के उपेक्षा करे जाथे या फेर वोकर ऊपर कोनो आने किस्सा कहिनी गढ़ के वोकर रूप ल बिगाड़ दिए जाथे।
जब कभू संस्कृति के बात होथे त लोगन सिरिफ नाचा-गम्मत, खेल-कूद या फिर जे मन ल सांस्कृतिक कार्यक्रम के अंतर्गत मंच आदि म प्रस्तुत करे जा सकथे, वोकरे मन के चरचा करथें। मोला लागथे के ये हर संस्कृति के मानक रूप नोहय। येला हम कला के अंतर्गत मान सकथन। फेर जिहां तक संस्कृति के बात आथे त एमा हम सिरिफ वो जिनीस ल शामिल कर सकथन। जेला हम संस्कार या धर्म आधारित परब-तिहार के रूप म जीथन, मानथन अउ अपन अवइया पीढ़ी ल सौंपे खातिर संरक्षित रखे के उदिम करथन।
भासा आन्दोलन के बेरा म संस्कृति के बात करना कोनो-कोनो ल उजबक गोठ कस लाग सकथे फेर मैं जिहां तक समझथौं ते बिन संस्कृति के सिरिफ भासा के बात करना मोला उजबक कस लागथे। काबर ते भासा ह खुद संस्कृति के संवाहक होथे। एकरे सेती मैं पहिली संस्कृति के बात करथौं तेकर पाछू भासा के अउ अइसन सिरिफ मोला नहीं भलुक जम्मो भासा के खेवनहार मन ला करना चाही। काबर ते आज हमर संस्कृति ल भुलवारे के, भरमाये के षड़यंत्र भारी पैमाना म चलत हे अउ जाने अंजाने हमें मन ये षड़यंत्र म शमिलहा हो जाथन। काबर ते हमला कला के रूप ल संस्कृति के रूप म बताए जाथे अउ संस्कृति के धर्म के रूप म। जबकि ये जानना जरूरी हे के धर्म अउ संस्कृति एक दूसर के पूरक आय या ये कहिन के एक सिक्का के दू पहलू आय।
हमन जब छत्तीसगढ़ी संस्कृति के बात करथन त वो हर सिरिफ करमा, ददरिया, भौंरा, बांटी, डंडा-पचरंगा या नाचा-गम्मत भर नइ होवय भलुक एकर मतलब भोजली, जंवारा, गौरा, कमरछठ, तीजा-पोरा, हरेली आदि घलोक होथे। फेर सुख के बाद हे के ये तीज तिहार अउ परब मन ला धर्म के दायरा म बांध के भासा आन्दोलन के अलग कर दिए जाथे।
मैं कई पइत अइसे काहत अउ लिखत रहिथौं के धर्म के नांव म हमर मन ऊपर अन्य प्रदेश के संस्कृति ल खपले के लगातार प्रयास चलत हे। जेकर सेती हमर भूल संस्कृति के उपेक्षा करे जाथे या फेर वोकर ऊपर कोनो आने किस्सा कहिनी गढ़ के वोकर रूप ल बिगाड़ दिए जाथे। मैं हमेशा कहिथौं के हमन चातुर्मास के चार महीना म सूते रहने वाला देवता मन के संस्कृति ल नइ जीयन। छत्तीसगढ़ के मूल संस्कृति निरंतर जागृत देवता मन के संस्कृति आय। फेर धर्म खासकर के हिन्दुत्व के नांव म ये सब महत्वपूर्ण बात मन के अनदेखी कर के आने प्रदेश ले आय धार्मिक स्वरूप अउ ग्रंथ मन के प्रचार-प्रसार करे जाथे। दु:ख के बात ये हवय के जे मन भासा आन्दोलन म मशाल धरे दिखथे उहू म के कतको झन धरम अउ संस्कृति के नांव म अइसन गड़बड़ी करत रहिथे अउ जब कहूं उनला हुदरबे कोचकबे त इहां के मूल संस्कृति ल सिरिफ आदिवासी मन के संस्कृति बता के अपन आप ला वोकर ले दूरिहा राखे के उदिम करथे। आने प्रदेश ले आए मनखे मन अपन संग उहां ले लाए संस्कृति ल आज तक भुला नइ पाए हें। उल्टा वो बाहिर के संस्कृति ल धरम के नांव म इहां खपले के षड़यंत्र करत हें।
अइसन मनखे मनला कोनो भी रूप म इहां के संस्कृति के संवाहक नइ माने जा सकय, संरक्षक अउ हितवा नइ माने जा सकय। अच्छा होही के ये मन अपन आप ल आरूग छत्तीसगढ़िया के चोला पहिरावयं।
सुशील भोले
डॉ. बघेल गली संजय नगर
टिकरापारा, रायपुर

छत्तीसगढ़ी के विकास यात्रा

‘छत्तीसगढ़ी के विकासयात्रा ल जाने के जरूरत हे तभे छत्तीसगढ़ी के लेखन ह समझ में आही।
छत्तीसगढ़ी ल बोली के मापदण्ड के ऊपर उठाके भासा के मापदण्ड म लिखे जाना चाही। लोकभासा मन ले परिष्कृत ‘हिन्दी’ ल नागरी लिपि के वर्ण माला के सबो अक्षर संग सजा के शुध्द बनाए गीस, वइसने छत्तीसगढ़ी ल घलोक ‘नागरी’ वर्णमाला के सबो अक्षर संग शुध्द बनाए जाना चाही।’
अइसे कहे जाथे के कोनो भी भाखा ल जब प्रकाशन के मंच मिलथे, त वोमा अउ वोकर लेखन म धीरे-धीरे निखार आए लगथे। छत्तीसगढ़ी भाखा संग ये कहावत ह रिगबिग ले देखब म आवथे। बोलइया मन म जिहां राष्ट्रीय अउ अंतर्राष्ट्रीय भाखा के सम्पर्क हें उहें लेखन म घलोक स्तर म बढ़ोतरी के संगे-संग विषय के बढ़वार दिखत हे। एक समय रिहीस जब छत्तीसगढ़ी के नांव म सिरिफ पद्य रचना उहू म पारम्परिक गीत शैली म ही लिखे जावत रिहिसे, उहें अब गद्य लेखन म विषय के विविधता देखे जावत हे।
छत्तीसगढ़ी के लेखन ल कुछ इतिहासकार मन कुछ जुन्ना मंदिर म मिले ताम्रपत्र अउ शिलालेख के माध्यम ले मानथें, उहें कुछ साहित्यकार मन संत कबीरदास के बड़का चेला धनी धरमदास के निरगुन रचना ‘जमुनिया के डार मोर टोर देव हो…’ आदि ले मानथे। फेर रिहिसे, भलुक उत्तर भारत के अन्य बोली मन संग सांझर-मिंझर कर के लिखे गे रिहीसे। भलुक ये कहना जादा अच्छा होही के उन्नींसवीं सदी तक अइसने गढ़न के लिखे जावत रिहीसे। शायद एकर पाछू ये भावना रिहिस होही के इंकर मन के रचना ल आने क्षेत्र के पाठक मन घलोक पढ़ अउ समझ जावयं।
जिहां तक प्रकाशन म छत्तीसगढी क़े आरूग रूप देखे के बात हेतु एला हम डॉ. दयाशंकर शुक्ल के संपादन म प्रकाशित ‘छत्तीसगढ़ी मासिक’ ले मान सकथन। ए समय छत्तीसगढ़ी के आरूग रूप के संगे-संग लेखक मन के संख्या म घलोक बढ़ोतरी देखे बर मिलिस। आज हमन छत्तीसगढ़ी लेखन के पहिली पीढ़ी के रूप म जेकर मन के नांव के उल्लेख बड़ा आदर के साथ करथन सब उही समय के उपजन-बाढ़न आय। एकर बाद डॉ. विनय कुमार पाठक के संपादन म ‘भोजली’ नाव के एक तिमाही पत्रिका आइस, अउ एकरे साथ छत्तीसगढ़ी के लेखन म व्यापकता घलोक आइस। इहां एक बात जरूर उल्लेखित करे जाना चाही के ये समय तक छत्तीसगढ़ी के लेखन ह पद्य तक ही सीमित रिहिसे।
कहूं हम पत्रिका के सम्पूर्ण रूप ल देखिन त सुशील वर्मा ‘भोले’ के संपादन म प्रकाशित छत्तीसगढ़ी मासिक पत्रिका ‘मयारू माटी’ ल छत्तीसगढ़ी भाखा के पहिली पत्रिका मान सकथन। काबर ते एकर पहिली प्रकाशित दूनो पत्रिका ‘छत्तीसगढ़ी मासिक’ अउ ‘भोजली’ मन म सिरिफ पद्य रचना छपत रिहिसे। ये दृष्टि ले वोमन ल सिरिफ पद्य संकलन के ही श्रेणी म रखे जा सकथे, सम्पूर्ण पत्रिका के श्रेणी म नहीं। भाखा विज्ञानी डॉ. बिहारी लाल साहू के बोले ये बात सही लगथे के ‘मयारू माटी’ ही छत्तीसगढ़ी के असली पत्रिका रिहिस, जेकर आज घलो कोनो पूर्ति नइ कर पाइन हें। भले आज वोकर बाद तिमाही ‘लोकाक्षर’ अउ चौमाही बरछाबारी घलोक छपत हे, फेर पत्रिका पढ़े के जेन संतुष्टि होथे, वोला सिरिफ ‘मयारू माटी’ ह पूरा करत रिहिसे। एकर बीच म जागेश्वर प्रसाद के संपादन म साप्ताहिक ‘छत्तीसगढ़ी सेवक’ घलोक छपत रिहिसे, फेर वोकर कुछ पर्व विशेष म निकले वाला अंक मन के छोड़े बाकी मन ला ‘पत्रिका के श्रेणी म शामिल नइ करे जा सकय।’
ये बीच म एक बहुत अच्छा बात ए होइस के इहां के कुछ दैनिक समाचारपत्र मन ‘मड़ई’, ‘चौपाल’, ‘अपन डेरा’, ‘पहट’ आदि के नांव ले छत्तीसगढ़ी म परिशिष्ट निकालत हें। ‘मड़ई अपन आप म एक पूरा छत्तीसगढ़ साहित्यिक अखबार आय जेला, ‘देशबन्धु’ ह 35-36 बछर ले निकालत हावय। एकर मन के प्रकाशन ले ‘मयारू माटी’ संग भरदराए ये गद्य लेखन ह विविध विषय संग देखे ले मिलत हे। वइसे छत्तीसगढ़ी के लेखन ह अब ये परिशिष्ट मन के छोड़े घलोक बहुत अकन पत्र-पत्रिका मन म देखे ले मिलत हे खास कर के छत्तीसगढ़ राज बने के बाद। अउ वोकरो ले जादा राज्य सरकार द्वारा एला राजभासा घोषित करे के बाद।’
फेर अब लागथे के छत्तीसगढ़ी के लेखन ल बोली के मापदण्ड ले ऊपर उठके भासा के मापदण्ड म लिखे जाना चाही। जइसे लोकभासा मन ले परिष्कृत ‘हिन्दी’ ल नागरी लिपि के वर्णमाला के सबो अक्षर संग सजा के शुध्द बनाए गीस। वइसने छत्तीसगढ़ी ल घलोक नागरी वर्णमाला के सबो अक्षर संग गूंथ के शुध्द बनाए जाना चाही, तेमा येला पढ़ाई अउ आने कारज खातिर गैर छत्तीसगढ़ी भाषी जेमन नागरी लिपि ल जानथे उहू मन एला आसानी के साथ अपना सकयं।
सुशील भोले
41-191 डॉ. बघेल गली
संजय नगर टिकरापारा रायपुर

मन के सुख

अंजली दीदी फूफू दीदी संग माटी मताए अउ गारा अमरे बर जावय। तेकर पाछू एक झन डॉक्टर इहां झाड़ू पोछा के काम करे लागीस।
इहें वोला पढ़े अउ आगे बढ़े के माहौल मिलिस। ऊंहा के डॉक्टर अउ नर्स मन ले मिलत प्रोत्साहन के सेती वो ह आया, फेर नर्स अउ फेर नर्स ले डॉक्टर के पदवी तक पहुंचगे। अब नौकरी छोड़के अपन अस्पताल चलावत हे। अब वो ह माटी मताने वाली अउ झाड़ू पोछा लगइया अंजली नहीं, डॉक्टर अंजली हे।
‘भोला… ए भोला.. लेना अउ बताना अंजलि के कहिनी ल’ – जया फेर लुढ़ारत बानी के पूछिस।
भोला कहिस- ‘अंजलि जतका बाहिर म दिखथे न, वोतके भीतरी म घलोक गड़े हावय। एकरे सेती एला नानुक रेटही बरोबर झन समझबे। एकर वीरता, साहस, धैर्य अउ संघर्ष ह माथ नवाए के लाइक हे, तभे तो सरकार ह ‘नारी शक्ति’ के पुरस्कार दे खातिर एकर नांव के चिन्हारी करे हे।’
-‘हहो जान डरेंव भोला, फेर सरकार के बुता म तोरो योगदान कमती नइए। आज अंजलि ल जेन सब जानीन- गुनीन, सरकार जगा सम्मान खातिर वोकर नांव पठोइन, सब तोरे सेती तो आय। तैं कहूं वोकर बारे में लिख-लिख के पेपर मन म नइ छपवाए रहिते, त खदान के हीरा कस उहू कोनो मेर लुकाए-तोपाए रहितीस।’
– ‘तोर कहना सही हे जया, फेर लिखे-पढ़े वोकरे बारे म जाथे, जेन वोकर योग्य होथे। कोनो भी अयोग्य मनखे खातिर कुछ लिखबे, त एकर ले लेखनी के अपमान होथे, एकर सेती ए कहई ह सही नइए के अंजलि ल ‘नारी शक्ति’ के पुरस्कार मोर सेती मिले हे। अरे भई, मैं वोकर बारे म नइ लिखतेंव त कोनो अउ लिखतीस, आखिर हीरा के चमक अउ फूल के खुशबू ल कोनो रोके-तोपे सकथे का? आज नहीं ते काल वोकर चमक दिखतीस, फेर दिखतीस जरूर।’
– ‘एकरे सेती तो मैं तोर मेर केलौली करत हौं, बताना अंजलि के कहिनी ल।’ जया फेर गोहराइस।
-‘त कहिनी ल सुनकर के कइसे करबे?’
– ‘अई कइसे करबो, हमू मन वोकरे सहीं आत्मनिर्भर बने के उदिम करबो। कब तक पर भरोसील रहिबो। अपन जांगर म कमाबो अउ अपन जांगर म खाबो।’
भोला ल जया के ए बात अच्छा लागीस।
वो कहीस- ‘मैं चाहथों जया, के जम्मों नारी परानी मन आत्मनिर्भर बनयं। अपन पांव म खडा होवयं। आज हमला जेन नारी शोषण अउ अत्याचार के किस्सा सुन ले मिलथे, वोकर असल कारण आय बेटी मनला पढ़ा-लिखा के आत्म-निर्भर नइ बनाना। मोला समझ म नइ आवय आज के पढ़े-लिखे जमाना म घलो पर के धन कहिके वोकर शिक्षा अउ रोजगार खातिर काबर धियान नइ दिए जाय।’
भोला लंबा सांस लेवत कहिस- ‘अंजलि संग घलोक तो पहिली अइसने होए रिहीसे। दाई-ददा मन जइसे खेती-मंजूरी करइया रिहीन हें तइसने उहू ल बना दिए रिहीन हें। ददा छोटे किसान रिहीसे तेकर सेती वोकर दाई ल घलोक गृहस्थी के गाड़ी तीरे खातिर अपन खेती-किसानी के छोड़े आने बुता करे ले घलो लागय।’
-‘अच्छा आने बुता घलोक करय, कइसन ढंग के।’ जया अचरज ले पूछ परीस।
भोला कहिस- ‘हां, अपन खेत के बुता ल करे के बाद वोकर दाई ह जंगल ले लकड़ी अउ कांदी-कुसा लान के तीर के शहर में बेचे ले जावय। अइसने वोकर ददा ह खेती के बुता के बाद घर-उर बनाय के ठेका लेवय, कुली-मिस्त्री संग खुदो राजमिस्त्री के बुता करय। अइसन म तैं खुदे सोच। सोच सकथस जया तब अंजलि अउ वोकर भाई-बहिनी मन कतका अकन पढ़त रिहीन होहीं?’
– ‘अई… अइसन म कोनो कहां पढ़े सकहीं!’
– ‘हां, तैं सही काहत हस जया, चार झन नान-नान भाई-बहिनी म सबले बड़े अंजलि भला कइसे पढ़े सकतीस। चौथी तक पढ़े पाइस तहां ले उहू ह अपन दाई संग जंगल जाए लागिस, लकड़ी अउ कांदी लाने खातिर। अइसने करत-करत सज्ञान होए लागिस त दाई ददा मन तीर के गांव म वोकर बिहाव घलो कर दिन।’
कांचा उमर म भला बिहाव के अरथ ल कोनो कहां जानथे। न बाबू पिला, न छोकरी पिला। एकरे सेती अंजलि ससुरार म तो चल दिस फेर जांवर-जोड़ी के सुख ल नइ जानीस। ठउका बिहाव के होत वोकर जोड़ी ल पढ़ई करे खातिर शहर भेज दिए गीस, अउ अंजलि घर के संगे-संग खेत-खार के बुता म झपवो दिए गीस। ये बीच अंजलि ल अपन ससुर के गलत नियत के तीर घलोक सहे ल परीस एकरे सेती वो ह अपन जोड़ी ल मना-गुना के मइके म आके रेहे लागीस।
दमांद बाबू जब पढ़-लिख के हुसियार होगे त नौकरी करे के उदिम करे लागिस। फेर वोकर दाई-ददा तो निच्चट अड़हा, काकर तीर जाके वोकर बारे म गोहरातीस! एकरे सेती वोला अपन ससुर तीर जाए ले कहिस। वोकर ससुर माने अंजलि के ददा ह घलोक पढ़े-लिखे नई राहय, फेर घर-उर बनाए के ठेकादारी करत शहर के जम्मो बड़े-बड़े अधिकारी मन संग चिन्हारी कर डारे राहय। अपन इही चिन्हारी के सेती वोकर दमांद ल सरकारी ऑफिस म नौकरी लगवा दिस। अउ अंजलि के अपन ससुर के सेती ससुरार नइ जाए के जिद के सेती दमांद ल घलोक अपने घर राख लेइन।
अपने जोड़ी संग रहे के सुख अंजलि ल जादा दिन नइ मिल पाइस। काबर के ससुर ऊपर लांछन लगाए के सेती वोहर मने-मन म तो चिढ़ते राहय ऊप्पर ले शहर म पढ़त खानी उहें के एक झन छोकरी संग वोकर आंखी चार होगे राहय। एकरे सेती जब वो ह नौकरी म परमानेंट होइस, अउ वो शहरिया छोकरी संग बरे-बिहाय सही बेवहार करे लागिस। अंजलि ए सबला के दिन सहितीस? आखिर वोला मजबूर होके मइके म बइठे बर लागिस।
अब अंजलि ल अपन जिनगी अंधियार बरोबर लागे लागीस, वो सोचिस-सिरिफ भाई-बहिनी मन के सेवा अउ कांदी-लकड़ी बेच के जिनगी ल पहाए नइ जा सकय, तेकर ले फूफू दीदी जेन बड़का शहर म रहिथे, तेकरे घर जाके शहर म कुछु काम-बुता करे जाय।
– ‘अच्छा… तहां ले अंजलि अपन गांव ल छोड़ के शहर आगे।’ जया पूछिस।
– ‘हहो जया, इही शहर म तो मोर वोकर संग भेंट होइस। तब ले अब तक मैं वोकर जीवन के संघर्ष यात्रा ल देखत हावौं।’
– ‘वाह भोला… वो तो आखिर पढ़े-लिखे नइ रिहीसे त फेर एकदम से ये बड़का काम ल कइसे धर लिस होही?’
-तै सही काहत हस जया…अंजलि ल ये बड़का जगा मा पहुंचे खातिर अड़बड़ मिहनत करे ले लागे हे। शुरू-शुरू म तो जब वो ह शहर आइस त रेजा के काम करीस। कोनो जगा घर उर बनत राहय तिहां अंजली दीदी फूफू दीदी संग माटी मताए अउ गारा अमरे बर जावय। तेकर पाछू एक झन डॉक्टर इहां झाड़ू पोछा के काम करे लागीस। इहें वोला पढ़े अउ आगे बढ़े के माहौल मिलिस। ऊंहा के डॉक्टर अउ नर्स मन ले मिलत प्रोत्साहन के सेती वो आया, फेर नर्स अउ फेर नर्स ले डॉक्टर के पदवी तक पहुंचगे। अब नौकरी छोड़के अपन अस्पताल चलावत हे। अब वो ह माटी मताने वाली अउ झाड़ू पोछा लगइया अंजली नहीं, डॉक्टर अंजली हे।
– ‘सिरतोन म भोला, लोगन के विकास के किस्सा तो सुनथन फेर एकदम से कोइला ले हीरा के दरजा पावत कमतीच झन ल देखथन।’
– ‘तैं सही काहत हस जया, तभे तोसरकार ह वोला ‘नारी शक्ति सम्मान’ दे के निर्णय लिए हे। अवइया राष्ट्रीय परब म वोला हमर राज के मुख्यमंत्री ह शासन डहर ले सम्मान करही।’
– ‘फेर भोला… वोला अपन ये संघर्ष के दिन म अपन जोड़ी के सुरता नई आइस?’
– ‘दगाबाज के सुरता कर के काय करतीस?’
– ‘तभो ले जिनगी म एक संगवारी के, एक परिवार के जरूरत तो घलोक होथे न, तभे तो जिनगी के आखरी घड़ी ह पहाथे।’
– ‘हां जया तोर कहना सही हे, फेर अब वोकर परिवार तो अतेक बड़े होगे हवय के वोला एक ठन घर म सकेले नई जा सकय। जतका झन के दवई पानी करथे, रोग राई ले छुटकारा देवाथे, सब वोकर परिवार के हिस्सा बनत जाथें।’
– ‘हां.. ये तो भौतिक परिवार होइस। फेर अंतस के सुख तो कुछु अऊ खोजथे न।’
– ‘तोर कहना सही हे जया, फेर अंजलि एकरो रस्ता निकाल डारे हे। मन के सुख अउ शांति के खातिर वो ह अपन तीर-तखार के कलाकार मन ला जोर के एक ठन सांस्कृतिक समिति बना डारे हे। तैं तो सुनेच होबे के संगीत ह आत्मा ल परमात्मा तक पहुंचाए के सबले सुन्दर अउ सरल रस्ता होथे, एकरे सेती एला असली सुख अउ शांति के माध्यम कहे जाथे।’
-‘अच्छा-अच्छा त अंजलि ह डॉक्टरी के संगे-संग कलाकारी घलोक करथे।’
-‘हां जया… तन के सुख के संगे-संग वो ह लोगन ल मन के सुख घलोक बांटथे।’
सुशील भोले
41-191 डॉ. बघेल गली
संजय नगर, टिकरापारा रायपुर