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छत्तीसगढ़ के गारी -प्रतिकात्मक अभिव्यक्ति

हर मनखे के मन म सकारात्मक-नकारात्मक, सुभ-असुभ भाव होथे। मन के ये सुभ-असुभ बिचार हर समय पा के अभिव्यक्त होथे। जब परिवेस बने रहिथे तब बानी ले बने-बने बात निकलथे अउ जब परिवेस हर बने नइ राहय तब मुँहू ले असुभ अउ अपशब्द निकलथे। बानी ले शब्द के निकलना अपनेआप म अन्तरभाव के परकटीकरन आय। अन्तरभाव के अभिव्यक्ति हर संस्कार अउ शिक्षा ले सरोकार रखथे। यदि ये बात के परतीत करना हे, त कोनो समाज के सामाजिकार्थिक दसा, शिक्षा के संगे-संग बिचार अभिव्यक्ति तरीका के अध्ययन करे जा सकत हे। मन के भाव अभिव्यक्ति के सोझे संबंध पारिवारिक व सामाजिक पृश्ठभूमि ले घलो होथे। जऊन हर जऊन वातावरन म रहिथे वो वातावरन के प्रचलित भासा ल सीखथे अउ ओहर ओ भासा ल बेवहार म लाथे। जम्मो मनखे अउ समाज के अपन भासा होथे । ओकर ओकरे ले पहिचान होथे। मनखे व्यक्तित्व के पहचान करना हे, तब ओकर भासा-बोली ले करे जा सकत हे।

‘गारी’ क्रोध के अभिव्यक्ति आय, तब ‘असीस’ प्रसन्नता के भाव। प्रसन्नता के भाव के शब्द अउ क्रोध म निकले शब्द म भावगत अउ भासागत अंतर देखे जा सकत हे। जब मनखे हर कोनो परिस्थिति म क्रोधित होथे, तब ओ परिस्थिति हर मनखे के मन ल अड़बड़ पीरा देथे अउ सुभाविक रूप ले अन्तर्भाव हर शब्द बन के बानी ले व्यक्त होथे। ओ परिस्थिति म बानी ले जऊन शब्द निकलथे वो हर ‘गारी’ बन जाथे। ये गारी के शब्द हर मनखे के मानसिक दसा, सामाजिक परिस्थिति, संस्कार अउ समाज म परचलित भासा के अभिव्यक्ति घलो होथे। भासा बिग्यानी का, आम मनखे हर घलो मनखे के बेवहार के भासा ल सुन के ओ मनखे के बारे म बता सकथे कि येकर शिक्षा अउ संस्कार कोन तरह ले होए हे।

छत्तीसगढ़ म परचलित ‘गारी’ के अलग-अलग रूप अउ अलग-अलग परकार देखे जा सकत हे। अलग-अलग समाज म अलग-अलग ढंग ले गारी के शब्द घलो देखे जा सकथे। छत्तीसगढ़ी म एकठन हाना हे-‘‘डार चुके बेंदरा, पाग चुके किसान अउ बात के चुके मनखे।’’ परिस्थिति के अनुकूल शब्द के प्रयोग नइ करना भी ‘गारी’ हो जाथे। छत्तीसगढ़ म परचलित गारी म भाव के व्यापकता हे। कोनो जगा सहज स्वीकार्य हे,तब कहीं जबर क्रोध के कारक। छत्तीसगढ़ के कइठन गारी हर अइसे तो सहज लागथे फेर जब ओकर बिस्लेसन करे जाय, तब बड़ा गंभीर अउ खराब अर्थ देथे। प्रचलित कुछ एक गारी ल हम बिस्लेसित कर देख सकथन। जइसे-गड़उना, तोला गाड़ंव, तोर खटिया रेंगे, तोला भूँजव, तोर मुरदा निकले, तोर नास होय, तोर सत्यानास होय, तोर मुँहू म आगी लागे, तोर मुँहू म किरा परे,चेलिक, रोगहा, जुटहा, कुटना, भड़वा, नानजात, किरहा, किसबिन, तोर चूरी फूटे, नकटी, चरकट अइसने बहुत अकन अउ गारी हे।

‘‘गड़उना, तोला गाडव, तोर खटिया रेगे, तोला भूँजव, तोर मुरदा निकले, तोर नास होय, तोर सत्यानास होय, तोर मुँहू म आगी लगे।’’ ये गारी ला चिटिक बिचार के अन्तरभाव ल देखथन तब सोझे ‘मर जाय’ के सरापा लागथे। फेर ये गारी के भाव हर सबो परिस्थिति म एके अर्थ नइ दे। जब बूढ़ीदाई के नत्ता हर ठठ्ठा-दिल्लगी म कहिथे- चल ले गड़वना, बेर्रा तब ये सहज भाव होथे, तब वोहर मनखे ल खराब नइ लागे, हाँस के टाल देथे अउ जब इही गारी हर क्रोध के भाव म झगरा-झंझट म दे जाथे, तब बहुत गंभीर हो जाथे अउ मनखे हर मारे-काँटे म उतारू हो जाथे। ये गारी मन म सीधा नइ कहे गे हे कि ‘‘तँय मर जा।’’ फेर ये गारी म बिंबात्मक रूप म भाव के इही अभिव्यक्ति हावै। अइसने ऊपर लिखे अउ दूसर गारी ल देख सकत हो। ये गारी मन म कतिक अर्थ छिपे हे। अइसे तो छत्तीसगढ़ म बहुत अकन बिकलम-बिकलम गारी हे। जऊन सोझे अर्थ देथे, जेला सार्वजनिक रूप म नइ कहे जा सकय अउ फेर ये गारी ल सबो मनखे हर दे भी नइ सकय। गारी देना घलो मनखे के सुभाव अउ नाता-रिस्ता के अनुसार होथे।

छत्तीसगढ़ म नाती, बूढ़ा, बूढीदाई अउ दूसर ठठ्ठा-दिल्लगी के नाता-रिस्ता जइसे-देवर-भउजाई, सारी-सारा, भाँटोमन ले देवइया गारी के अलग सरूप अउ अलग मजा हे। ये गारी के अर्थ अलग ढ़ंग ले प्रतिबिंबित होथे। छत्तीसगढ़ म बहुत अकन गारी नाता-रिस्ता के अधार म बने हे। ये गारी ल आने मनखे ह नइ दे सकय। ये हर छत्तीसगढ के मरजाद आय। हम ये कह सकत हन कि गारी म भी संस्कार छिपे हे।

छत्तीसगढ़ म परचलित गारी के हर मनखे के शिक्षा, सामाजिक दसा, मनखे के सोच के संगे-संग क्षेत्र बिसेस ले परभावित दिखथे। ये हर कहूँ कठोर होथे त कहूँ कोमल। ये गारी के कुछ क्षेत्र के अनुसार बदलत दिखथे। क्षेत्र के अनुसार गारी म बिबिधता भी हे। छत्तीसगढ़ के प्रतिकात्मक गारी ल इहाँ सोच, शिक्षा, संस्कार अउ भासायी समृद्धता के रूप म भी देखे जा सकत हे। शिक्षा के अर्थ कोनो औपचारिक शिक्षा ले नइ होय। लोक-शिक्षा के तको मनखे के जिनगी म जबर परभाव रहिथे। अउ एकरे ले मनखे के संस्कार बनथे।

बलदाऊ राम साहू

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महान लोकनायक अउ समन्वयवादी कबि गोस्वामी तुलसीदास

हमर देस ह बैदिक काल ले आज तलक साहित्य के छेत्र म समरिध हावय चाहे वो जब हिन्दील भाखा के जननी देव बानी संसकिरीत रहय जेमा बालमिकी के रामायन होवय, चाहे बेदबियास के महाभारत, चाहे कालीदास के अभिज्ञान साकुंतलम होवय। ओखर बाद जब हिन्दीत भाखा अवतरित होईस त ओमा घलो एक से बढ़के एक साहित्यकार, कवि हावय। हिन्दीत भाखा के भीतर म घलो अवधि, बरज, खड़ी बोली,छत्तीसबढ़ी भाखा म आथे।

आचार्य रामचंद्र सुक्ल जी ह हिन्दीं साहित्य कि इतिहास ल चार काल म बांटे हावय बीरगाथाकाल जेला आदिकाल घलो कईथन, भक्तिकाल, रीतिकाल अउ आधुनिक काल। भक्तिकाल ल हिन्दीत साहित्य के स्वर्ण काल घलो कहे जाथे काबर के ये काल म सबले जादा साहित्य रचना करे गे रहिस। भक्तिकाल म दो परमुख धारा रहिस। पहिली सगुन भक्तिधारा अउ दूसर निरगुन भfक्ताधारा। सगुन भक्तिधारा के भी दो साखा रहिस राम भक्ति साखा अद किसन भक्ति साखा। राम भक्ति साखा के परमुख कबि तुलसीदास जी रहिन। अउ किसन भक्ति साखा के परमुख कबि सूरदास जी रहिन। साहित्यकार अउ कवि मन समाज घलो ल अपन रचना के माध्यम से सुधार करे के कोसिस करथे। साहित्य ह समाज के अईना होथे अउ साहित्यकार मन समाज ल अईना दिखाये के काम करथे, जेखर ले समाज म फैले बुराई अउ अंधबिसवास ह धीरे-धीरे खतम होथे।

गोस्वामी तुलसीदास जी भक्तिकाल के सगुनधारा के रामभक्ति साखा के प्रतिनिधि कवि माने जाथे। वो ह एक कवि, भक्त अउ समाज सुधारक के रूप म स्वीकार करे जाथे। वो ह हिन्दीत साहित्य के गौरव और भारतीय संसकिरिती के रछक कहे जा सकत हे। ओखर हर रचना ह भारतीय धरम अउ आस्था के परतीक बन गे हावय। तुलसीदास जी ल देस-बिदेस के आलोचक मन मुक्त कंठ ले बढ़ाई करे हावय।

कविता करके तुलसी न लसे,
कविता लसी पा तुलसी की कला। ‘हरिऔध’

जन्म अउ मरन- तुलसीदास जी जनम अउ अस्थान के बारे म लोगन मन के कई मत हावय। हिन्दीय के इतिहासकार डा. ग्रियरसन के अनुसार तुलसीदास जी के जनम बछर 1532 (संवत् 1589) म उत्तरपरदेस के बांदा जिला के राजपुर गांव म होय रहिस। वो ह सरयूपरायन बाम्हन रहिन। वोखर ददा के नाव आत्माराम दुबे अउ दाई के नाव हुलसी रहिस। तुलसीदास जी बचपना ह बहुत कठिनाई म बितीस। वोखर दाई-ददा ह वोला मूल नछत्र म जनमे के कारन तियाग दिहिस। सेस सनातज जी की किरपा ले बेद, पुरान, उपनिसद, दरसन ल खूब पढ़िस। कहे जाथे के तुलसीदास जी अपन गोसाईन बर अब्बड़ मया करत रहिस। पर जब ओखर गोसाईन ह वोखर, अपन उपर आसक्ति ल देखिस त ओला फटकारिस ते मेरा ले तुलसीदास जी जीवन दिसा ही बदल गे। ओ ह अपन जीवन ल राम के भक्ति म लगा दिस। संवत् 1680 याने बछर 1623 म इंखर देहांत हो गे।
रचनाः- नागरी परचारनी सभा कासी ह इंखर परमारिक रचना मन ल परकासित करे हावय जे ह ये परकार ले हे- रामचरित मानस, रामलला नहछु, बैराग्य संदीपनी, बरवै रामायन, पारवती मंगल, जानकी मंगल, रामाज्ञाप्रस्न, दोहावली, कवितावली, गीतावली, सिरी किस्न गीतावली, बिनय-पत्रिका, सतसई, छंदावली रमायन, कुंडलिया रमायन, राम सलाका, संकट मोचन, करखा रमायन, रोला रमायन, झूलना, छप्पय रमायन, कबित्त रमायन, कलिधरमाधरम निरूपन, हनुमान चालीसा।

‘एन साईक्लोपिडिया आॅफ रिलीजन एंड एथिक्स’ म घलो हिन्दीय साहित्य के इतिहारकार डा.ग्रियरसन ह ये पहली बारह रचना के बरनन करे हावय।
राममचिरतमानस परबंध काब्य के आदरा प्रस्तुत करथे त दूसर कोती बिनय-पत्रिका ह मुक्तक सैली म रचे गे सबसे बढ़िया गीति काब्य हे।
काब्यगत बिसेसता- तुलसीदास जी के काब्य के सबसे बड़े बिसेसता समन्वय के भावना ये। उंखर काब्य म समन्वय के बिराट चेस्टा हे। अपन समन्वयवादी नजरिया के कारन ही तुलसीदास जी लोकनायक के आसन पर आसीन हावय। तुलसीदास जी ल लोेकनायक भी कहे गे हावय।
हजारी परसाद द्विवेदी जी उंखर बारे म लिखथे के ‘‘ लोक नायक वही हो सकत हे जो समन्वय कर सके, काबर के भारतीय जनता म नाना परकार के परस्पर बिरोधी संसकिरिती, साधना, जाती, आचार निस्ठा अउ बिचार पद्वति प्रचलित हावय। बुद्व देव समन्वयवादी रहिस। गीता म समन्य् के चेस्टा हे अउ तुलसीदास जी घलो समन्वयकारी रहिन।’’
लोक संगरह के भाव तुलसीदास जी के भक्ति के परमुख अंग रहिस। जेखरकारन वोखर भक्ति किस्न भक्त कबि के जईसे एकांगी न होके सरवांगपून हे। वो ह अवधी भाखा म अपन रचना ल लिखिस।
तुलसीदास अउ रामचिरतमानस – रामचरितमानस हिन्दीत साहित्य म ही नहीं बक्ति पूरा बिस्व साहित्य म अपन महत्वपून अस्थान रखथे। ये ह एक परकार ले भारतीय जीवन के प्रतिनिधि गरंथ हे। जेला तुलसीदास जी ह संवत् 1631 म अजोध्या म लिखे रहिस। देवयोग से वो बछर रामनवमी के दिन वईसनहे ही योग बने रहिस जईसना त्रेताजुग म भगवान राम के जनम के दिल रहिस। वो दिन बिनसरहा तुलसीदास जी ह रामचरितमानस के रचना लिखे बर सुरू करिन जेहा दू बछर सात महिना अउ छब्बीस दिन म पूरा होईस। ये गरंथ के मूल आधार बाल्मिकी जी लिखे गये महाकाब्य रामायन हे। लेकिन तुलसीदास जी ह येला अपन कल्पना अउ प्रतिभा के बल म युग अनुरूप बना दिहीस। जे समय ये गरंथ लिखे गईस ओ समय देस म मुसलमान मन के सासन रहिस। fहंदू मन के मन म निरासा के भावना घर करे लग गे रहिस। तुलसीदास जी भारत के अतीतकाल, सांसकिरितिक गौरव अउ आदरस जीवन के चित्रन कर आसा अउ बिसवास के दिया जला दिहिस।
रामचरितमानस म तुलसीदास जी ह राम भगवान के समग्र रूप के चित्रन करे हावय। ये महाकाब्य के कथा सात काण्ड म बंटे हावय। बाल काण्ड से ले के उत्तर काण्ड तक भगवान राम के जीवन के सबो अंग ल बड़ सुघ्घर ढंग ले बरनन करे हावय।
रामचरितमानस म आदरस जीवन के निरबाह ही नई होवय हे बल्कि ये ह काब्य सौन्दर्य के दिरिस्टि ले घलो एक आदर्स गरंथ हावय। ये महाकाव्य के नायक भगवान बिस्नु के अवतार सिरी राम हावय। जे ह भगवान के अवतार मनखे रूप म हे। जेखर से मनखे के जीवन म आने वाला सुख-दुख के ल ग्रहन करत जाथे। चौदह बछर के बनवास, ददा के मरनी के दुख, अरधांगिनी के अपहरन के दुख, भाई लछमन के मुर्छा के दुख अउ युद्व म नरसंहार के दुख अउ आखिरी म अपन अरधांगिनी सिता से हमेसा बर बिछुड़े के दुख सबला सहन करत जाथे काबर के भगवान ह इहां पिरिथिवी लोक म भगवान नई ये वो ह एक मनखे ये।
समन्वयभाव रामचिरतमानस के सबले बड़े बिसेसता हे। तुलसीदास जी के सब्बों काब्य ल ही समन्वय के बिराट चेस्टा के संज्ञा देहे गये हावय। ये समन्वय हर जगह बियाप्त हावय। दो बिरोधी भाव के समन्वय हावय। तुलसीदास जी के समय सैव अउ बैसनव संपरदाय म ओ समय लड़ाई ह जोर पकड़ रहिस। त तुलसीदास जी रामचरितमानस म समन्वय अस्थापित करे बर बानकांड म भगवान संकर के मुख ले कहलवाईस के
जासु कथा कुम्भज रिशि गाई, भगति जासुमैं मुनिहि सुनाई।
सोई मम ईस्ट देव रघुबीरा, सेवत जाही सदा मुनी धीरा।। बालकांड 62-4

अईसनहे भगवान राम के मुख से भगवान संकर के परती कहलवाई-

1- सिव द्रोही मम भगत कहावा, सो नर सपनेहॅंु मोंहि न पावा।
संकर विमुख भगति चह मोरी, सो नारकी मूढ़ मति थोरी।। लंकाकांड दोहा-2-4

2- संकर प्रिय मम द्रोही, सिव द्रोही मम दास।
ते नर करहि कलप भरि घोर नरक महुॅं बास।। लंकाकांड दोहा-3

तुलसीदास जी ह ज्ञान अउ भक्ति म घलो समन्वय करे हावय। रामचरितमानस म सब्बो रस के चित्रन हावय। येमा भाखा साहित्यिक अवधि हावय जेमा संसकिरित के पदावली के बिसेस परभाव हावय। भक्ति के पराधीनता के कारन काब्य के अंगी रस सांत रस बन गे हावय। परसंग के अनुकूल प्रसाद, ओज, माधुर्य गुन ल घलो अस्थान मिले हावय। गुन ह रस के अभिन्न अंग हावय। छंद म दोहा अउ चौपाई के घलो बिसेस परयोग तुलसीदास जी ह अपन रामचरितमानस म करे हावय। भाखा के सौन्दर्य वरधन म अलंकार अउ सब्दसक्ति के घलो सुघ्घर बरनन हे।
ये परकार ले देखा जाये त गोस्वामी तुलसीदास जी के रामचरितमानस समन्वयवादी रचना के पराकास्टा हावय। जेमा हर दिरिस्टि ले समन्वय हावय। अगर ये कहे जाये के रामचरितमानस हिन्दीर साहित्य के सबो बिधा के सार ह त वो ह अतिसोक्ति नई होही। काबर के पहिली तो ये रचना एक महाकाब्य ये जेमा नायक भगवान राम के पूरा जीवन के बरनन हावय जेमा नायक ह एक आदरस बेटा, भाई, राजा, मित्र, पति,सत्रु। येखर संगे-संग रामचरितमानस म दसो रस के परिपाक देखे बर मिलथे। अजोध्या काण्ड म सांत रस, बाल काण्ड म भगवान राम के संगे-संग भरत, लछमन अउ सत्रुघन बर उंखर माता कौसिलिया, कैकेई, अउ सुमित्रा के बात्सल्य म बात्सल्य रस के बिसद बरनन । राम जी के बनवास जाय के बेरा ओखर ददा-दाई के अउ परजा मन के मन के पीरा, राजा दसरथ के मरनी के सोर सुनके राम जी के मन के पीरा म, असोक बाटिका म माता सिता के भगवान राम के परति बिलाप म करून रस, सिव धनुस टुटे के बेरा भगवान परसुराम अउ लछमन के संवाद म रौद्र रस, माता सिता के पुश्प बाटिक म ओखर fसंगार के बरनन म fसंगार रस, बनवास के समय सुरपनखा के नाक काटे के बेरा म बिभत्स रस, हनुमान जी के अगास के रद्दा लंका जाये के बेरा, हनुमान जी के लंका दहन के बेरा, राम रावण युद्ध म बीर योद्धा मन के बीरता के बरनन म बीर रस, कुंभकरन के युद्ध म लड़े के बेरा ओखर सरीर के बरनन म भयानक रस, सुंदर काण्ड म हनुमान जी ह जब रावन के लंका म लंका दहन करे के पहिली जब रावन के सैनिक मन हनुमान जी के पूछी म आगी लगाये बर पूंछी म चेंदरा बांधत रईथे तेतका बेरा हनुमान जी अपन पूंछी ल अउ लंबा करत जाथे त रावन के संतरी मन ह चेंदरा लपेटत-लपेटत थक जाथे तेतका बेरा हास्य रस के सुघ्घर बरनन हावय। येखर संगे-संग अलंकार, दोहा, रोला, सोरठा, चौपाई हिन्दीड ब्याकरन के सबो चीज येमा मिलथे। रामचरितमानस ह fहंदू मन के परबित्र अउ पूजनीय गरंथ हावय जेहा हर fहंदू धरम ल मानने वाला के घर म जरूर रईथे। तभो ले जेमन ये गरंथ ल नई पूजय वोमन घलो येला हिन्दीय साहित्य के इतिहास के एक किताब के रूप म ज्ञान पराप्ति बर जरूर पढ़य। येमा हर छे के प्रबंधन कला के ज्ञान मिलथे। कहे जाथे के पढ़ईया लईकन मन परतिदिन सुंदरकांड के पाठ करथे त ओखर दिमाग ह तेज होथे। इस्कूल अउ कालेज के पाठ्यपुस्तक घलों म तुलसीदास जी के रामचरितमानस ल घलो रखे गे हावय।
हमर देस राज म क्वांर नवरात्रि के नवमीं के बाद दसमी तिथि के दिन रावन बध किये जाथे जेमा रावन अधरम के परतीम रूप म ओखर पुतला दहन करथन। येखर पहिली नव दिन दुर्गा उपासना करथन अउ रामलीला घलो संगे-संग चलथ रईथे ये राम लीला ह तुलसीदास जी के रामचरितमानस ल ही नाटक के रूप म मंचन किये जाथे। हमर छत्तीसगढ़ देस राज म कातिक महिना अउ ओखर बाद नवधा रमायन ह गांवो-गांव म होय लगथे येहू म तुलसीदास जी के रामचरितमानस के पाठ किये जाथे। कहे के मतलब ये हावय के तुलसीदास जी रामचरितमानस जईसे गरंथ ल अवधी भाखा म लिख के जेतका परसिद्धी पाईस वईसनहा हिन्दीं साहित्य का पूरा बिस्व के साहित्य के इतिहास म कोनो साहित्यकार ह नई पाय हावय। वो राम के चरित ल हर मानस के हिरदय म बसा दे हे हावय।

प्रदीप कुमार राठौर ‘अटल’
ब्लाक कालोनी जांजगीर
जिला-जांजगीर चांपा (छ.ग.)

नाग पंचमी के महत्तम

हमर भारत देस राज ह खेती-किसानी वाला देस हावय। याने हमर देस ह किरसी परधान देस हावय। नाग देवता ह किसान के एक परकार ले संगवारी ये, काबर के वो ह किसान के खेत-खार के रछा करथे। येखर कारन वोला छेत्रपाल कहे जाथे। छोटे-मोटे जीव जंतु अउ मुसवा ह फसल ल नुकसान करे वाला जीव हावय। ओखर नास करके नाग ह हमर खेत के रछा करथे।

सांप ह हमन ल कई परकार के संदेस घलो देथे। सांप के गुन देखे बर हमनकरा गुनग्राही अउ सुभग्राही नजर होना चाही। भगवावन दत्ता़त्रय म सुभ दिरिस्टीय रहिस उनला हर चीज म कुछ न कुछ सीख मिलीस अउ जेखर करा सीख मिलिस वोला ओ ह अपन गुरू बना लिहिस।

सांप मन घलों कोनो ल अकारन नई चाबय। वोला परेसान करे वाले मनखेमन ल ही चाबथे भले ही भूल से ही हमर गोड़ ओखर उपर रेंगत समय लग जाथे त वो ह अपन रछा बर डस देथे। सांपों घलो भगवान के बनाये ये परकिरीत के सुंदर जीव ये। वो ह बिना नुकसान पहुंचाये बिना उपद्रव करे अपन जीवन जीयत हे त ओला मारे के हमन ल कोनो अधिकार नई हावय। जब हमन ओखर परान लेहे बर करथन त ओ ह अपन रछा करे बर हमन ल डसथे त ओला दुश्ट काबर कहिबो। हमर परान लेहे वाला के के परान लेहे के का हमन कोसिस नई करन का?

नाग देवता ल ममहाई ह बहुत भाथे। जेखर कारन वो ह चंपा के रूख म या चंदन के रूख म लिपटे रईथे। केवड़ा के जंगल म घलो नाग देवता मन के वास रईथे।
कुछ जुन्नटहा नाग देवता के माथा म मणि रईथे। जे ह अमूल्य होथे। हमूमन ल अमूल्य चीच मन ल याने बने बिचार मन ल अपन माथा म रखना चाही।
सांप बिला जेजा fभंभोरा घलो कईथे म ज्यादातर एकांत जीवन जीथे। येखर कारन मुमुछु ल जनसमूह मन ल टालना चाही। ये बारे म सांप के उदाहरन दिये जाथे।
देवता अउ राछस के सागर मंथन म साधन रूप बनके वासुकि नाग ह दुरजन घलो बर परभु काज म निमित्त बने के रद्दा खोल दिहिस। दुरजन मन घलो यदि सच्चा रद्दा म आय त उहू ह सांसकिरीतिक काम म अपन बहुत बड़े योगदान दे सकत हावय।

नाग पंचमी हमर fहंदू मन के एक परमुख तिहार हावय। fहंदू पंचांग के अनुसार सावन महिना के सुकुल पछ के पंचमी के ये तिहार ल मनाये जाथे येखर काारन ये तिहार ल नागपंचमी घलो कईथन। ये दिन नाग देवता के पूजा करे जाथे अउ गोरस से नाग देवता ल अस्नान करे के बिधान हावय। ये दिन किसान मन ह अपन खेत-खार म जाके जे मेना fभंभोरा रईथे दोना म गोरस अउ लाई ल, ले जाके रख देथे।
काबर के नागपंचमी ह सावन महिना म मनाये जाथे त भगवान संकर के मंदिर म नाग देवता ल घलो पानी, गोरस से असनान कराये जाथे।
नाग देवता ह भगवान संकर के गला के हार ये। जेखर कारन भगवान संकर ल सांप घलो प्रिय हावय। भगवान सिरी राम के छोटे भाई लछमन घलो ल सेसनाग के अवतार माने गय हावय।
भगवान सिरी किसन जी घलो ह यमुना रहने वाला कालिया नाग के मरदन करे रहिस।
नाग पंचमी के दिन गांव-गांव म कुस्ती अउ पहलवानी परतीयोगिता के आयोजन घलो रखे जाथे। किसान मन अपन पसुधन गरूआ-भईसा मन ल तलाव, नदियां-नरवा म बढ़िया नउहाथे।
ये दिन अश्टनाग के पूजा करे जाथे।
वसुfकः तक्षकच्शैव कालियो मणिभद्रकः।
ऐरावतो,धृमराश्ट्रःकार्कोटकधनंजयौ।।
एतेअभयं प्रयच्छन्ति प्राणिनां प्राणजीविनम्।।
(भविश्योत्तरपुराण-32-2-7)
येखर अरथ ये हावय के वासुकि,तक्षक, कालिया,मणिभद्रक,ऐरावत,धृतराश्ट्र,कार्कोटक और धनंजय- ये मन जीव मन अभय देथे।
नाग ल देवता के रूप म स्वीकार करे म आर्य मन के हिरदय के बिसालता के दरसन होथे।
ये परकार ले देखे जाय त नाग, देवता के रूप म घलो अउ देवता मन के प्रिय के रूप म घलो अउ किसान मन के संगवारी के रूप म ये पिरथिवी लोक म वास करथ हावय। त अइसनहा जीव ल हमन ल नुसकान नई पहुंचाना चाही। जेला हमन एक कती पूजा करथन अउ ओला देखत ही मारे बर करथन ये बिलकुल गलत काम ये।

प्रदीप कुमार राठौर ‘‘अटल’’
ब्लाक कालोनी जांजगीर
जिला-जांजगीर चांपा (छ.ग.)

Nagpanchami ka mahatv

किताब कोठी: आवौ भैया पेड़ लगावौ

छत्तीसगढ में बालगीतों का सृजन

सबसे पहली बात तो यह कि बाल-गीत या कहें कि बालकों यानी बच्चों के लिए किसी भी विधा में लिखना ही अपने-आप में बडा चुनौती भरा काम है। लेकिन उन सबमें ‘बाल गीत’? इसके लिए गीतकार को (या कहें कि बाल साहित्यकार को) उसी स्तर पर जाना पडता है। स्वयं को बालक बना लेना पडता है और तभी वह बालकों की जुबान पर आसानी से चढ जाने वाले गीत, कविता, कहानी, नाटक, एकांकी आदि का सृजन कर पाता है। यदि यह सब इतना कठिन नहीं होता तो आज बाल साहित्य का टोटा न होता | गिने-चुने ही तो हैं बाल साहित्यकार! और फिर छत्तीसगढी में…..? भाई बलदाऊ राम साहू जी ने छत्तीसगढी में बाल गीतों की रचना का जो ‘उदिम’ किया है, वह केवल स्वागतेय नहीं अपितु वरेण्य भी है। कारण, भाई
बलदाऊ जी ने इन गीतों की रचना&यात्रा के दौरान अपने-आप को बालक ही बना लिया है, तभी तो उनके लिये ऐसे ‘भाव-पूर्ण’ ही नहीं
अपितु ‘प्रभाव-पूर्ण’ बाल गीतों का सृजन सम्भव हो पाया है। उनके गीतों में जो ‘सीख’ है, वह किसी ‘बडे-बुजुर्ग’ की दी हुई नसीहत नहीं
है भाई, वह तो एक बालक के द्वारा अपने ‘सँगवारी’ के साथ साझा किया जाने वाला स्वानुभूत सत्य है।
– हरिहर वैष्णव


Chhattisgarhi Bal Geet, Baldau Ram Sahu.

सुरता : प्रेमचंद अउ गांव

मुंशी प्रेमचंद हिंदी साहित के अनमोल रतन आय। उंकर लिखे कहानी अउ उपन्यास आज घलो बड चाव से पढ़े जाथे। उंकर कहानी ल पढत रबे त अइसे लागथे जानो मानो सनिमा देखत हैं। उंकर कहानी के पात्र के हर भाव ल पाठक ह सोयम महसूस करथे। गांव अउ किसान के जइसन चित्रण उंकर कहानी म पढ़े बर मिलथे वइसन दूसर कहानीकार मन के कहानी म देखब म बहुत कम अथे। गांव ल संउहत गांव बरोबर उही मन कागज म उतारे हे।

नानुक रहंव त बड संउक लागे महूं अलगू चौधरी अउ जुम्मन शेख वाला बइठका म जतेंव किके। अतेक सिरतोन लगे उंकर कहानी मन ह। दू चार ठन कहानी तो अंतस म समा गे हवय।

पंच-परमेश्वर कहानी म जुम्मन शेख अउ अलगू के कहानी ह कतेक सुग्घर हे। गांव के मनखे के छोटे-मोटे समस्या अउ झगरा ल आज घलो उही ढंग ले चार सियनहा मन मिलके समाधान करथें। हिंदू-मुस्लिम मितानी ह वइसनेच चलत हे। हमर गांव म घलो वइसने महापरसाद बधे हवय एक झन ह! नियाव के रसदा म नता गोता ल बीच म नी लाना चाही ए सिक्छा मिलथे पंच-परमेश्वर कहानी ले।

ईदगाह कहानी में गांव के नानुक लइका हामिद के जिम्मेदार सियनहा बरोबर बिचार के बड सुग्घर वर्णन करे हे प्रेमचंद ह। नानुक हामिद अपन खेल-खिलौना अउ खई-खजाना खाय के बिचार ल तियाग के अपन डोकरी दाई के जरूरत ल सुरता राखथे। उंकर हांथ रोटी रांधत मत जरय किके चिमटा लानथे।कतेक बड़े सिक्छा हामिद के माध्यम ले कहानीकार ह दे हवय।

‘परीक्षा’कहानी मे हाकी के खेल के अतिक बढ़िया वर्णन करे हे जानो-मानो लेखक घलो हाकी के खिलाड़ी हरय। कहानी ल पढबे त अइसे लागथे कि महूं वो खेल ल देखे बर बइठे हंव। फेर ए कहानी म मनखे ल परखे के जेन गुन बताय हवय वो ह अद्भुत हे। सुजानसिंह ऊपरी गुन नहीं बलुक अंतस के गुन जेमा आन बर दया-मया अउ सहयोग के भावना रथे ओला महातम देथे।

‘बूढी काकी’ कहानी म एकझन डोकरी दाई अउ ओकर नतनीन के मया के बड सुग्घर वर्णन करे हे कहानीकार ह। बुढापा के तकलीफ अउ मुंह मे सुवाद पाय के लालच कइसे होथे ए कहानी म देखे बर मिलथे। उम्मर बाढथे ताहन बेटा बहू के बेवहार सियनहा मन के संग कइसे बदल जथे।ए कहानी म बड मार्मिक विवरण हवय। सियान मन ल मान सम्मान देय के सिक्छा ए कहानी ले मिलथे।

‘कफन’ कहानी मे दूझन कोढिया बाप-बेटा के जेन मनोवैज्ञानिक ढंग ले चित्रण करे हे उंकर बर लेखक ल परनाम हवय। मनखे के मनोभाव कइसे बदलथे अउ ओहा अपन आप ल दोषमुक्त करे बर कैसे मनगढ़ंत बात बनाथे ए कहानी म पढ़े बर मिलथे। दूनों कोढिया के सेती एकझन छेवरिया ल मरे के बाद कफन तको नी मिल सकय।

प्रेमचंद ह किसान के दुर्दसा ल देखके बड बियाकुल रहय। ओहा अपन कहानी के माध्यम ले घेरी बेरी किसान के हालत ल समाज के आगू म रखे के परयास करय। गांव अउ गांव के किसनहा के हालत के सबले जोरदार वर्णन पढ़े खातिर मिलथे ‘पूस की रात’ कहानी मे। हलकू अउ झबरा नांव के कुकुर ह कभु नी भुलावय। कतिक मिहनत ले किसान ह अन्न उपजाथे अउ ओला सेठ साहूकार मन कइसे हडप लेवय तेकर वर्णन बड सुग्घर ढंग ले करे हवय मुंशी जी ह।हाडा कंपात जाड मे हलकू के हलाकानी ल पढत रबे त खुद के देंहे घलो घुरघुराय लागथे।

कुल मिलाके जेन मनखे ह भारत देश के गांव ल नी देखे होही। गांव के रहन-सहन अउ रीति रिवाज के बारे म नी जानत होही ओहा मुंशीजी के कहानी ल पढ़के जान डरही। गांव के किसान के हालत अभी घलो खराब हवय। देश म बाढत किसान आत्महत्या के मामला ह एकर सबूत आय। गांव के जेन चित्रण मुंशी प्रेमचंद ह अपन कहानी म करे हवय अब ओकर रुप म बड बदलाव आगे हे। गांव के मनखे ह घलो सहर के रंग म रंगे हे। गांव-गांव टावर खडे़ होगे हे। घर ले कोठा नंदागे हे। गाय,गरवा,नदिया-नरवा के बिनास होवत हे। मनखे ह अपन लालच के सेती जम्मो जीव-जंतु के हक ल मारत हे।

भगवान करे मुंशीजी के कहानी वाला मयारूक गांव फेर लहुटे फेर ओमा गरीबी अउ दुख झिन रहय।

रीझे ‘देवनाथ’
टेंगनाबासा(छुरा)
8889135003

रफी के छत्तीसगढ़ी गीत

रफी साहब….. हिंदी सनिमा जगत के बहुत बड़े नाम आय। जिंकर गुरतुर अउ मीठ अवाज के जादू के मोहनी म आज घलो जम्मो संगीत परेमी मनखे झूमरत रथे। उंकर अवाज के चरचा के बिना हिंदी सनिमा के गीत-संगीत के गोठ ह अधूरहा लागथे।
जम्मो छत्तीसगढ़िया मन भागमानी हवय के अतिक बड़े कलाकार ह हमर भाखा के गीत ल घलो अपन अवाज दे हवय। रफी साहब के अवाज म छत्तीसगढ़ी गीत सुनना अपन आप म बड गौरव के बात आय।

बछर 1965 के आसपास म जब छत्तीसगढ़ी सनिमा जगत के दादा साहेब मनु नायक जी ह पहिली छत्तीसगढ़ी फिलीम बनाइन त ओमे ओहा हिंदी सनिमा जगत के बड़े-बड़े नामही कलाकार मन से गीत गवाय रिहिन। “कहि देबे संदेश” नाव के ए फिलीम म रफी साहब के अवाज म “तोर पैरी के झनर-झनर” अउ “झमकत नदिया बहिनी लागे” ह जीव ल जुडा देथे। खास करके “तोर पैरी के झनर-झनर” गीत म गीत के पहिली के अलाप अउ गीत म उंकर अवाज के पाछू म दंउडत बांसरी के स्वर।
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ये फिलीम मे डॉ हनुमंत नायडू ‘राजदीप’ के गीत अउ मलय चक्रवर्ती जी के सुग्घर संगीत रिहिसे। ए फिलीम के बाद बछर 1971 मे “घर-द्वार” नाव ले दूसर छत्तीसगढ़ी फिलीम अइस। यहू फिलीम के गाना म रफी साहब ह अपन अवाज के मंदरस घोरे हे। छत्तीसगढ़ के नामही साहित्यकार हरि ठाकुर के लिखे गीत ह जमाल सेन के संगीत म बनेच धूम मचाय रिहिस। ए फिलीम म रफी साहब के अवाज म “गोंदा फूलगे मोर राजा” गाना ह बड सुग्घर लागथे जेला उन बड़ मस्ती के साथ गाए हवय।एकर अलावा एमा ”आज अधरतिहा” अउ ”सुन सुन मोर मया पीरा के संगवारी रे” ह घातेच मया पाइस। अतेक साल बीते के बाद घलो सुन सुन मोर मया पीरा के संगवारी गीत ह छत्तीसगढ़ के तीन ठ नामही छत्तीसगढ़ी लोककला मंच म अपन जादू बरकरार रखे हवय। ए गीत ल जब गुनगुनाबे तब गोड़ ह थिरके लागथे।

जेन मिहनत अउ धन लगाके छत्तीसगढ़ी फिलीम ल ओ समे के कलासाधक मन बनाय रिहिन ओ मुताबिक फिलीम ह बेपार नी कर पाइस तेकर सेती छत्तीसगढ़ी सनिमा के सफर ह उही मेर थमगे। नइते अउ कतको अकन गीत आज छत्तीसगढ़ के धरोहर रतिस।रफी साहब ल उंकर पुण्यतिथि के बेरा मे नमन हवय…

रीझे ‘देवनाथ’
टेंगनाबासा (छुरा)

हिन्दी साहित्य के महान साहित्यकार उपन्यास सम्राट, कलम के सिपाही मुंशी प्रेमचंद

हमर देस ह बैदिक काल ले आज तलक साहित्य के छेत्र म समरिध हावय चाहे वो जब हिन्दीर भाखा के जननी देव बानी संसकिरीत रहय जेमा बालमिकी के रामायन होवय, चाहे बेदबियास के महाभारत, चाहे कालीदास के अभिज्ञान साकुंतलम होवय। ओखर बाद जब हिन्दीं भाखा अवतरित होईस त ओमा घलो एक से बढ़के एक साहित्यकार हावय। हिन्दीं भाखा के भीतर म घलो अवधि, बरज, खड़ी बोली,छत्तीसबढ़ी भाखा मन आथे।

आचार्य रामचंद्र सुक्ल जी ह हिन्दी3 साहित्य के इतिहास ल चार काल म बांटे हावय बीरगाथाकाल जेला आदिकाल घलो कईथन, भक्तिकाल, रीतिकाल अउ आधुनिक काल। आधुनिक काल के अंतरगत प्रेमचंद्र युग आईस जेमा प्रेमचंद्र जी के रचना ल हमन पढ़थन। प्रेमचंद्र जी हिन्दीर साहित्य के परमुख साहित्यकार ये। वो ह साहित्य ल आम जनता से जोड़िस जेखर कारन उखर रचना ह साहित्य के मुंह बोलत चित्र बन गईस। साहित्य ह समाज के दरपन हो थे अउ वो दरपन प्रेमचंद्र जी ह समाज ल अपन रचना के माध्यम ले दिखाईस।

प्रेमचंद्र जी के जनम 31 जुलाई बछर 1880 म बाराणसी म लमही नाव के गांव म होय रहिस अउ 8 अक्टूबर बछर 1936 म वो ह सरगबासी होगे। उंखर असली नाव धनपतराय रहिस। सुरू-सुरू म ऊंह नवाबराय के नाव ले ऊर्दू म लिखत रहिस। पर बाद म वो ह हिन्दीर के परभाव से हिन्दीय भाखा म अपन साहित्य रचना करे लगिस। प्रेमचंद्र जी ह कुछ पत्र-पत्रिका के संपादन घलो करे रहिस। सरस्वती नाव ले अपन परकासन संस्था घलों बनाये रहिस।

पे्रमचंद्र जी परमुख रूप से कथाकार रहिन। वो ह आदर्शोन्मुखी यथार्थवादी कथाकार ये। वो ह समाज के सभी वर्ग ल अपन रचना म अस्थान दीहिस। निरधन,पीड़ित अउ सरवहारा के परति उखर बिसेस सहानुभूति रहिस। वो ह सोसक समाज के अतियाचार ल घलो खुल के अपन रचना म चितरन करिस।

गांव के जीवन के चितरन म तो पे्रमचंद्र जी ह कमाल कर दे हावय। प्रेमचंद्र जी के बिसाल कहानी-साहित्य ल देखते हुए कहे जा सकत हे के उंखर कहानी म जन-साधारन के जीवन के समान्य पिरिस्थिति, मनोवृत्ति अउ समस्या के चितरन ह बहुत ही मारमिक ढंग ले होय हावय।

प्रेमचंद्र जी के रचना म उपन्यांस म – वरदान, सेवासदन, प्रेमाश्रय, रंगभूमि, कायाकल्प, निर्मला, प्रतिज्ञा, गबन, गोदान, मंगल सूत्र (आधा हावय)।

कहानी संग्रह- प्रेमचंद्र जी ह लगभग 300 कहानी लिखिस जे हर मानसरोवर के आठ भाग म संकलित हावय। दो बैलो की कथा, पंच परमेश्वर, आत्माराम, बड़े घर की बेटी, रानी सारंधा, शतरंज के खिलाड़ी, सुजान भगत, पूस की रात, ईदगाह, कफन, बूढ़ी काकी, जइसे कहानी मन परसिद्ध हावय।
नाटक म – कर्बला, संग्राम, प्रेम की बेदी।
निबंध संग्रह म – कुछ बिचार।

प्रेमचंद्र जी के पूरा साहित्य ह समाज सुधार अउ रास्ट्रीय भावना ले प्ररित हावय। उंखर कोनो रचना चाहे वो ह उपन्यायस होय चाहे कहानी वोखर नायक ह किसान, मजदूर अउ मध्यम वर्ग के प्रतिनिधित्व करथे। ओखर उपन्यांस गोदान के नायक होरी रहे या पूस की रात के नायक हलकू रहय। जेमा नायक ह समाज के सोसक वर्ग के परति सामना करत दिखथे। वोखर हर रचना म तत्कालीन समाज के रूढिवादी परंपरा अउ जमींदारी परथा के बिरोध दिखाई देथे।

प्रेमचंद्र जी के कहानी,उपन्यारस के धारावाहिक घलो बने रहिस जेला दूरदरसन ह परसारन करे रहिस। जेमा प्रेमचंद्र जी के रचना के नायक के रूप म पंकज कपूर ह रोल निभाय रहिस अउ बहुत ही अच्छा जचे रहिस होरी अउ हलकू के रोल म। प्रेमचंद्र जी ह अपन हर रचना ल येतका समरपित भाव ले रचय के उंखर रचना के हर पात्र ह fजंदा हो के पाठक के हिरदय म धड़के लग जाथे। इंहा तक के यदि पात्र ह ब्यथित अउ समस्या ग्रस्त हावय त पाठक घलो के आंखि ले आंसू बह जाथे।

भाखा सैली – प्रेमचंद्र जी के भाखा सरल अउ मुहावरेदार हावय। प्रेमचंद्र जी ह मुख्य रूप ले वरनात्मक, बियंग्यात्मक अउ भावात्मक सैली ल अपनाय हावय।

येखर से स्पस्ट हो जाथे के प्रेमचंद्र जी ह हिन्दीस साहित्य के सर्वश्रेश्ठ साहित्यकार ये। वो ह हिन्दीग साहित्य ल देस-बिदेस म पहिचान दिलाइस। वो ह हिन्दीर कहानी साहित्य के कल्पतरू अउ उपन्याटस साहित्य के सम्राट अउ कलम के सिपाही माने जाथे। वो ह रास्ट्र परेम, मानव कल्यान, अउ समाज सुधार के संदेस दे हे हावय। वोखर हर रचना ह मानव जीवन के कोनो न कोनो हिस्सा ल दिखाथे।

प्रदीप कुमार राठौर ‘अटल’
ब्लाक कालोनी जांजगीर
जिला-जांजगीर चांपा (छ.ग.)

जल अमरित

पानी के बूँद पाके,
हरिया जाथें, फुले, फरे लगथें पेड़ पउधा,
अउ बनाथें सरग जस,धरती ल।
पानी के बूँद पाके,
नाचे लगथे,
मजूर सुघ्घर, झम्मर झम्मर।
पानी के बूँद पाए बर,
घरती के भीतर परान बचाके राखे रहिथें
टेटका, सांप, बिछी, बीजा, कांद-दूबी,
अउ निकल जथें झट्ट ले पाके पानी के बूँद,
नवा दुनिया देखे बर।
पानी के सुवागत मं
नाचथें फुरफून्दी, बत्तर कीरा।

इसकूल घलोक करत रहिथे अगोरा पानी के
खुले बर।
पानी पाके लाइन घलोक हो जथे अंजोर,
पहिली ले जादा।
पानी ल पाके,
किसान सुरु करथे काम किसानी के,
पानीच के भरोसा मं लेथे ठेका
जग के पेट भरे के,
अउ बन जथे भगवान भुइँया के,
पानीए ल देखके बेयपारी,
अनुमान लगाथे अपन आमदानी के।
पानी पाके नदिया गरजथे,
आघू मं अथाह समुंद के।
पानीच के सेती,
सबले अलग हे हमर धरती।
पानी के भीतरे मं होथे संगी,
अनमोल मोती।
पानी के एक बूँद के खातिर,
मरत हें लाक्खों परानी हर साल
मजबूरन मतलहा पानी पीके,
बीमार,मरत हें लाक्खों परानी हर बरिस।

देख,
अपन आस पास मं देख,
टीबी मं, सामाजिक नेट मं देख संगी।
जल हे त कल हे संगवारी,
जल बिन सब अचल हें जी
जले ह तो अमरित हे संगी,
जले ह सबले जादा पबरित हे संगी।
पवन बरोबर,
जल मं घलोक अधिकार हे सबके।
गाड़ी धोअई मं, गदगद- गदगद नहई मं…
अपन बपौती समझ के,
ये ल अइसने फालतू झन फेक संगी।

केजवा राम साहू ‘तेजनाथ’
बरदुली, कबीरधाम (छ ग )
7999385846

बेरा के गोठ : फिलिम के रद्दा कब बदलही

आजकल जौन ला देखबे तौन हा फिलिम, सिरियल अउ बजरहा जिनिस बेचइया विज्ञापन करइया मनके नकल करेबर अउ वइसने दिखेबर रिकिम रिकिम के उदिम करत हे।सियान मन कहिते रहिगे कि फिलिम विलिम ला देखव झिन, ये समाज अउ संस्कृति के लीलइया अजगर आय जौन सबो ला लील देही। आज वइसनेच होत हावय। हमर पहिराव ओढ़ाव, खाना पीना, रहना बसना, संस्कृति, परंपरा, तीज तिहार, बर बिहाव सबो फिल्मी होगे।
देस मा जब फिलिम बनेबर सुरु होइस तब कोंदा फिलिम अउ करिया सफेद (ब्लेक एंड व्हाइट) फिलिम हा हमर देबी देवता के लीला, पूजा पाठ ला देखावत होइस। फेर रद्दा बदलिस अउ देस के अजादी बर देसभक्ति वाला फिलिम बनिस।इही संगे संग बीर राजा महराजा, रानी महरानी जौन मन अपन देस, समाज अउ परजा बर भलई के बुता करिन उँखर उपर फिलिम बनिस। जब देस अजाद होगे होइस एखर पाछू फेर रद्दा बदलिस ।देस के ओ बखत के जवान चेलिक पीढ़ी मन करा मनोरंजन के साधन अपन संस्कृति,नाचा, गम्मत के पाछू फिलिम हा बनिस। बड़े सहर अउ गाँव के संस्कृति के अंतर देखाय वाले फिलिम बनिस। बड़का छोटे सहर मा टॉकीज, टूरिंग टॉकिज, के संग मेला मड़ई मा फिलिम के आनंद लेवत गिन।किसानी, मालगुजारी, बड़हर मन के अड़दली पन बर फिलिम बनिस अउ लोगन ओला परिवार संग देखिन अउ पसंग करिन।
एखर पाछू एक घाँव फेर रद्दा बदलिस चोर, डाकू, तस्कर, हफीम, गाँजा, हिरोइन, हीरा दलाली,मूर्ति चोरइया, परदेस मा बेचइया मन के उपर घलाव फिलिम बनिस। ओ बखत के लइका सियान, चेलिक जवान मन हीरो हिरोइन ला भगवान बरोबर मानय। फिलिम मा मनोरंजन के संगे संग परिवारिक, देसभक्ति, संस्कृति के अउ गाँव, पढ़ाई के महत्तम अउ गाँव सहर के अंतर ला देखाय। देबी देवता,भूत परेत, भगवान मानता, सिक्छा के संदेस वाला फिलिम घलाव बनिस। सौ बात के एक बात ओ बखत के मनखे ला जौन किसम के सीख के जरुरत रहिस ओइसने किसम के फिलिम बनिस।ओ बखत संस्कृति, परंपरा ला तोड़े फोड़े के जादा हिम्मत फिलिम मा घलो नइ रहय। एखर पाछू कहानी लिखइया अउ ओला फिलिम बना के बेचइया मन फेर अपन रद्दा बदलिस। नाचा गाना वाला फिलिम आयबर लगिस। इही करा ले हमर चेलिक लइका मन दूसर रद्दा धरे लगिस।रिकिम रिकिम के पहिरई ओढ़ई ला फैसन के नाम मा परचारित करे लगिन। फेर आईस कालेज पढ़ईया लइका मनके प्यार मोहब्बती वाला फिलिम ।जौन हा अमीरी गरीबी जाति धरम संस्कृति ला आगी धरा के चूल्हा मा डार दिस। देस के भविष्य मन दूसर रद्दा धर डारिस।सबो प्रांत मा परिवार मनके दाई ददा मनके मुड़ी नवइया लइका मन आज ले अपन सियान मनके पागा ला छोरत हे। चेलिक टूरा टूरी मन आन जात,धरम वाले संग मोहब्बती मा फँस जाथे। कुछु कही जानबो हो जाथे ताहन मार पीट, हइता, बलत्कार, आतमहइता अउ बैरी भाव बन जाथे। एमा हमर देस के अंतर्जातीय बिवाह कानून हा घीव के काम करथे। देस ला अजाद होय सत्तर बच्छर ले जादा होगे फेर भारत पाकिस्तान के बीच कोनों न कोनों संबंधी फिलिम आज ले बनत हे अउ हमर चेलिक मन इहीच मा मगन हे।
आजकल जतका प्रांतीय भाखा मा फिलिम बनत हे ओमा जादा अइसने प्यार मोहब्बती वाला फिलिम हावय जौन ला परिवारिक फिलिम के नाम मा परोसत हे।नान्हे नान्हे कपड़ा लत्ता,देह उघार के रेंगना, नाचना, घुमना, पढ़ेबर जाना सब फैसन होगे। जेठ हा भैया अउ डेड़सास हा दीदी इही फिलिम मनके देय नत्ता होगे। मुड़ी ढाँक के रेंगना अब तइहा के बात होगे नवा नवा गाड़ी मोटर भर्र भर्र चलाय बर हमर नवछटहा लाइकामन ला फिलिम हा देखावत अउ सिखावत हे। अइसने बनत फिलिम मन हमर जात, समाज, संस्कृति, धरम बर खतरा होवत हे। दाई ददा मन जाँगर टोर मेहनत करके लइका मनला पढ़ाई करे बर,नउकरी करेबर आने जगा अपन ले दूरिहा भेजथे।फेर ओमन पढ़ाई करे के जगा अपन भविष्य ला इही फिलिम कस प्यार मोहब्बती मा झिंगरा कस फाँस लेथे। अउ अपने गोड़ मा टंगिया मारथे।
अब देस दुनिया मा नवा रद्दा के फिलिम बनाय के जरुरत हे। बहुत होगे संस्कृति ला बिगाड़े, परिवार ला टोरे फोरे के फिलिम। देस अउ प्रांत मा बेरोजगारी, बिमारी, भ्रष्टाचार, समिलहा परिवार के पुरखौती परंपरा के बिनास हा हाथ गोड़ लमावत हे। एला बने करे के जरुरत हे। व्यावसायिक फिलिम के नाव मा हमर लइकामन करा काय काय परोसत हे एला देखे समझे के जरुरत हे। नवा जुग के नवा किसिम के फिलिम बनत हे जेमा रोबोट, कम्प्युटर, रिमोट हे। फेर एमा घलाव प्यार मोहब्बती , नारी हिनमान, ला मिंझार देवत हे। जनता ला काय मिलत हे। अब बेरोजगार बर रोजगार के उदिम वाला, देस मा डाक्टर के कमती ला दूर करे के उदिम, घर घर मा पानी बचाय के उदिम, खेती किसानी ले दुरिहात पढ़े लिखे चेलिक ला जोड़े के उदिम, पर्यावरण ला सुधारे मा चेलिक मन के सहयोग के उदिम वाला फिलिम बनाय के जरुरत हे।
कहे जाथे फिलिम हा समाज ला रद्दा देखाय के बूता करथे।फेर आज के फिलिम मनके रद्दा खुदे भुलवाही खुंद डरे हे।एक्कइसवीं सदी मा हमर चेलिक लइका मन ला काय देना हे, ओला फिलिम बनाइया मन बिचार नइ कर पावत हे। प्यार मोहब्बती मा फाँस के राख दे हावय। समाज मा बदलाव अउ नवा रद्दा देखाय के बूता फिलिम हा घलाव करथे। तब ये फिलिम मन अपन रद्दा कब बदलही, कब तक दूसर के जात धरम ला मोहबती के नाम मा बिगाड़े के बूता चलते रही,नवा पीढ़ी के चेलिक मन ला कब उबारही इही अगोरा हे।

हीरालाल गुरुजी “समय”
छुरा, जिला-गरियाबंद

चंदैनी गोंदा, रामचंद्र देशमुख, लक्ष्मण मस्तुरिया अउ खुमान लाल साव एक दूसर के पर्याय

लोक गायक महादेव हिरवानी के सांस्कृतिक संस्था “धरोहर” ह लोक संगीत के पुरोधा खुमानलाल साव अउ गीत के पुरोधा लक्ष्मण मस्तुरिया के सुरता म कन्हारपुरी, राजनाँदगाँव म “श्रद्धा-सुमन” के आयोजन करिस जेमा छत्तीसगढ़ के पचास ले आगर लोक मंच अउ उँकर कलाकार मन गीत अउ संगीत द्वारा अपन श्रद्धा सुमन प्रस्तुत करिन। कार्यक्रम के शुरुवात मा कर्मा भवन मा स्थित मंदिर म कर्मा माता के पूजा अर्चना होइस। तेखर बाद मंच मा खुमान लाल साव जी के फोटू मा उँकर बड़े बेटा चेतन साव, दाऊ दीपक चंद्रकार, अरुण कुमार निगम अउ पधारे पहुना मन फूलमाला चघा के दीया प्रज्ज्वलित करिन।

चेतन साव जी अपन उद्बोधन मा कहिन के सियान के बारे मा मोर ले ज्यादा इहाँ उपस्थित कलाकार अउ साहित्यकार मन जानथें। सियान के सुरता करत उँकर गला भरगे अउ ज्यादा नइ बोल पाइन। अर्जुन्दा ले आये लोकरंग के संस्थापक दाऊ दीपक चंद्रकार खुमान साव जी अउ मस्तुरिया जी ल श्रद्धा सुमन अरपित करके कहिन कि एमन छत्तीसगढ़ी भाखा अउ लोक संगीत ल जउन ऊँचाई म लेगिन हें ओला बनाए रखना उँकर प्रति सच्चा श्रद्धांजलि होही। आज काल कई झन अश्लील गीत लिखत अउ गावत हें। एला रोके बर परिही नइ ते हमर संस्कृति के पहिचान नँदा जाही। खासकर सरकारी आयोजन म कलाकार के मान-सम्मान नइ होवत हे। न मंच के ठिकाना, न मानदेय के, न खाए पीए के अउ न रुके ठहरे के बेवस्था डहर ककरो ध्यान रहिथे। दर्शक मन दारू पी के हंगामा करथें, कलाकार के सुरक्षा डहर कोनो गंभीर नइ हें। एखर यहू कारण हे कि कलाकार मन के कोनो संगठन नइये। सरकार ल दारुबन्दी करना चाही। कलाकार मन ल उचित मान सम्मान देना चाही।

छन्द के छ के संस्थापक अरुण कुमार निगम अपन वक्तव्य म कहिन कि चंदैनी गोंदा, रामचंद्र देशमुख, लक्ष्मण मस्तुरिया अउ खुमान लाल साव एक दूसर के पर्याय बन चुके हें। एक के चर्चा होही त बाकी तीनों के चर्चा होबे करही। उन बताइन कि 1999 मा जबलपुर मा दू कैसेट के रिकार्डिंग बर गे रहेन। रिहर्सल के दौरान लक्ष्मण मस्तुरिया जी कहे रहिन कि छत्तीसगढ़ के हर संगीतकार के संगीत मा खुमान के संगीत के झलक देखे बर मिलथे। बिना खुमान के संगीत के झलक के एको गाना नइ बनत हे। जइसे बंगाल मा रवींद्र संगीत के स्थापना होइस वइसने छत्तीसगढ़ म खुमान-संगीत ल स्थापित करना चाही। निगम जी श्रद्धांजलि – खुमानलाल साव स्मारिका मा सरला शर्मा के एक विचार ला रेखांकित करके कहिन कि खैरागढ़ संगीत विश्विद्यालय मा खुमानलाल साव जी के शोध पीठ के स्थापना होना चाही। 23 जून के कवर्धा म भोरमदेव साहित्य सृजन मंच द्वारा आयोजित वार्षिक अधिवेशन खुमानलाल साव जी ल समर्पित रहिस, उहाँ मुख्य अतिथि डॉ. मांडवी सिंह, कुलपति खैरागढ़ संगीत विश्व विद्यालय के सामने निगम जी इही मांग ला रखे रहिन कि खुमान-संगीत शोध पीठ के स्थापना विश्वविद्यालय म होना चाही। अपन उद्बोधन म मुख्य अतिथि डॉ. मांडवी सिंह, कुलपति खैरागढ़ संगीत विश्व विद्यालय घोषणा करे रहिन कि निगम जी के मांग बिल्कुल जायज हे अउ खैरागढ़ संगीत विश्व विद्यालय अपन डहर ले येखर बर जरूर प्रयास करही।

सब ले पहिली धरोहर में कलाकार मन के संग महादेव हिरवानी लक्ष्मण मस्तुरिया के लिखे अउ खुमान लाल साव के संगीतबद्ध करे अमर गीत “मँय छत्तीसगढ़िया अंव गा” प्रस्तुत करिन। तेखर बाद अनुराग धारा मंच के भगवती साहू “धनी बिना जग लागे सुन्ना” गा के अपन स्वरांजलि प्रस्तुत करिन। दुकालूराम साहू – तोला मोला सब ला जाना हे…, मनोहर यादव, बॉबी कलिहारी – तँय बिलसपुरहिन अस, विष्णु कश्यप – सुनो जगत के हाल, लता खापर्डे – तोला लागे झन ककरो नजर अउ ले चल रे ले चल मोटर वाला, निर्मला ठाकुर, चंपा गोस्वामी – फिटिक अंजोरी निर्मल छइयाँ, गली गली बगराये रे पुन्नी के चंदा, संतोष साहू – वारे मोर पंडकी मैना गीत प्रस्तुत करिन। लल्ला साहनी, सावित्री कहार, कुलेश्वर ताम्रकार अउ अनेक कलाकार मन अपन सुरीला प्रस्तुति देके खुमानलाल साव अउ लक्ष्मण मस्तुरिया जी ल अपन श्रद्धा सुमन अरपित करिन।

आयोजन मा श्री मधुसूदन (महापौर, नगर निगम, राजनाँदगाँव), संगीतकार गोविंद साव, तबलावादक राकेश साहू, संजय मेश्राम, साहित्यकार लखनलाल साहू अउ जम्मो छत्तीसगढ़ ले पधारे अनेक लोक कलाकार मन उपस्थित रहिन। भीड़ अतीक ज्यादा रहिस कि हाल खचाखच भरे रहिस अउ कई स्थानीय मन खड़े खड़े कार्यक्रम ल देखिन। धरोहर टीम अउ महादेव हिरवानी के अगुवाई म खुमानलाल साव अउ लक्ष्मण मस्तुरिया जी ल समर्पित कार्यक्रम के सुग्घर आयोजन बरसों सुरता करे जाही।

(अरूण कुमार निगम से चर्चा के आधार पर)