Category: मत्तगयंद सवैय्या

छत्तीसगढ़ी गीत-ग़ज़ल-छंद-कविता

होगे होरी तिहार

होगे – होगे होरी के, तिहार गा।
कखरो बदलिस न,आदत ब्यवहार गा।

करु बोली मा,अउ केरवस रचगे।
होरी के रंग हा, टोंटा मा फँसगे।
दू गारी के जघा, देय अब चार गा।
कखरो बदलिस न,आदत ब्यवहार गा।

टेंड़गा रेंगइया हा,अउ टेंड़गा होगे।
ददा – दाई ,नँगते दुख भोगे।
अभो देखते वो , मुहूँ फार गा।
कखरो बदलिस न,आदत ब्यवहार गा।

पउवा पियइया हा,अध्धी गटक दिस।
कुकरी खवइया हा,बोकरा पटक दिस।
टोंटा के कोटा गय , जादा बाढ़ गा।
कखरो बदलिस न,आदत ब्यवहार गा।

घर मा खुसर के,बरा-भजिया झोरे।
दाई – ददा भाई , बहिनी ला छोड़े।
फोकटे होगे , तेल – नून – दार गा।
कखरो बदलिस न,आदत ब्यवहार गा।

भारी चलत हे , ऑन लाइन होली।
फोटू के चक्कर मा,खुदे रंगे चोली।
कती होवत हे , रंग के बवछार गा।
कखरो बदलिस न,आदत ब्यवहार गा।

मनखे ह मनखे बर , बनगे बाधा।
कान्हा ह कंस होगे,पूतना कस राधा।
गोप – गुवालीन के,होगे बंठाधार गा।
कखरो बदलिस न,आदत ब्यवहार गा।

होली म रहि रहि के,सत ह जरत हे।
हिरणाक्ष दानव , मनके करत हे।
फोकटे छेना लकड़ी ,दिये बार गा।
कखरो बदलिस न,आदत ब्यवहार गा।

तिहार रीत ए, तिहार सीख ए।
मया अउ मीत ए,गाये गीत ए।
मान तिहार , जिनगी सँवार गा।
कखरो बदलिस न,आदत ब्यवहार गा।

जीतेन्द्र वर्मा”खैरझिटिया”
बाल्को(कोरबा)

उम्मीद
तेजनाथ के गजल

कांटा च कांटा थोड़े होही जिनगी म, कोनों मेर तो चन्दन होही?
कभू तो आही वो दिन संगी, जब तन – मन मगन होही।
राते-रात म नइ कटै जिनगी, बेरा घलो उथे एक समे,
हदास झन कर, कोन जानै, अवइया घड़ी वो लगन होही।
दुख , बिपत्ति हे बड़का भारी, मुंड़ गोड़ ले, भयंकर,
फेर घबरा झन संगी, वोखरो कुछ न कुछ जतन होही।
महंगा करम कांड के भंवर म, अउ फंस जाहि जोनि,
चढ़ादे कहूँ खुद ल चरन म भगवान के,हरेक करम भजन होही।
जतका अति करना हे, कर लै, समझ लै कीरा मकोरा जनता ल,
फेर देख लेबे , सक्तिसाली वो सरकार के घलो एक दिन पतन होही।
अपन काम करत राह, झन तज अपन सभियता,संस्कार,
विस्वास रख, जल्दी फेर ‘ बिस्वगुरु’ देस अपन होही।
देखा- देखी म जतका उपरे उपर भागना हे, भाग लै कोनों,
आखिर म,एक न एक दिन खुद ल झाँकहि, अन्तरमनन होही।
पद,पइसा, गाड़ी, बंगला जेखर मेर,तेखर मेर राहन धक,
अभी नइहे भले,फेर मोर तो ये धरती अउ गगन होही।
जग के सुख -दुख तो कुछ नइहे ‘तेज’ बहकावा हे मन के,
नइ घबरांव,उपर मोला अगोरत मोर मालिक/सजन होही।
हाय! सागर ले अलग हो, बूँद बनके रहि गेंव मैं, महादुख,
जनम भर बाद होही मिलन, अहा! सफल जनम होही।

तेजनाथ
बरदुली, पिपरिया, कबीरधाम
9479188414
7999385846

जोहार लागे दाई

जोहार लागे तोला मोर दाई छत्तीसगढ़।
बढ़ सुग्घर लागे मोला मोर छत्तीसगढ़।
अपन बोली हे अपन भाखा हे।
छत्तीसगढ़िया बोले के अभिलासा हे।
सूरजपुर ले लेके सुकमा तक।
तोर रूप सुग्घर साजे ओ।
जोहार लागे तोला मोर दाई छत्तीसगढ़।
तोर मया म बंधेव मैं मोर दाई छत्तीसगढ़।

अनिल कुमार पाली,तारबाहर बिलासपुर छत्तीसगढ़

मत्तगयंद सवैय्या छंद

खोर गली चमके दमके घर मा खुशियाँ धर आवय होली।
रंग गुलाल दिखे मुँह गाल म दाँत दिखा मुसकावय होली।
जे घर मा खुसरे रहिथे उँहला खुश हो सम्हरावय होली।
भेंट करावय मीत बनावय मान असीस ल पावय होली।

सुखदेव सिंह अहिलेश्वर”अँजोर”
गोरखपुर,कवर्धा

फागुन के दोहा

1~ फागुन बड़ मसमोटिया,मटमटहा मतवार।
परसा सरसो सेमरा, आगे धर लगवार।

2~फागुन मा फगुवा कहय, होरी मया तिहार।
बैर भाव ला छोड़ के, बैरी संग सँघार।

3~रंगव सबला एक मा, का हे अपन बिरान।
सतरंगी सुमता अमित, होरी के पहिचान।

4~जोंही जाँवर जहुँरिया,जुरमिल जबरन छेक।
धरव चिभोरव ड्राम मा, नइ ते फुग्गा फेक।

5~ हाँसी ठट्ठा ठीक हे, राख फेर मरजाद।
चिटिक मजा के फेर मा, झन होवव बरबाद।

6~लइका छौवा सियनहा, होरी खोलव पोठ।
सावचेत खच्चित रहव, गुनव अमित के गोठ।

7~मउका मनमरजी मजा, पीये खाय मतंग।
नइ सहाय जी काखरो, जादा के उतलंग।

8~ संगी तैं दुरिहा बसे, फेर पूछ ले हाल।
आथे सुरता तोर तब, होय गुलाबी गाल।

कन्हैया साहू “अमित”
भाटापारा

जीतेंद्र वर्मा खैरझिटिया के मत्तगयंद सवैया

(1)
तोर सहीं नइहे सँग मा मन तैंहर रे हितवा सँगवारी।
तोर हँसे हँसथौं बड़ मैहर रोथस आँख झरे तब भारी।
देखँव रे सपना पँढ़री पँढ़री पड़ पाय कभू झन कारी।
मोर बने सबके सबके सँग दूसर के झन तैं कर चारी।
(2)
हाँसत हाँसत हेर सबे,मन तोर जतेक विकार भराये।
जे दिन ले रहिथे मन मा बड़ वो दिन ले रहिके तड़फाये।
के दिन बोह धरे रहिबे कब बोर दिही तन कोन बचाये।
बाँट मया सबके सबला मन मंदिर मा मत मोह समाये।
(3)
कोन जनी कइसे चलही बरसे बिन बादर के जिनगानी।
खेत दिखे परिया परिया तरिया म घलो नइ हावय पानी।
लाँघन भूखन फेर रबों सुनही अब मोर ग कोन ह बानी।
थोरिक हे सपना मन मा झन चान ग बादर तैहर चानी।
(4)
आदत ले पहिचान बने अउ आदत ले परखे नर नारी।
फोकट हे धन दौलत तोर ग फोकट हे घर खोर अटारी।
मीत रहे सबके सबके सँग बाँट मया भर तैंहर थारी।
तोर रहे सब डाहर नाँव कभू झन होवय आदत कारी।
(5)
लाल दिखे फल हा पकथे जब माँ अँजनी कहिके बतलाये।
बेर उगे तब लाल दिखे फल जान लला खुस हो बड़ जाये।
भूख मरे हनुमान लला तब सूरज देव ल गाल दबाये।
छोड़व छोड़व हे ललना कहिके सब देवन हाथ लमाये।
(6)
हे दिन रात ह एक बरोबर छाय घरोघर मा अँधियारी।
खेवन खेवन देवन के अरजी सुन मान गये बल धारी।
हेरय सूरज ला मुँह ले सब डाहर होवय गा उजियारी।
हे भगवान लला अँजनी सब संकट देवव मोर ग टारी।
(7)
बाँटय जेन गियान सबो ल उही सिरतोन कहाय गियानी।
पालय पोंसय जेन बने बढ़िया करथे ग उही ह सियानी।
भूख मरे घर बाहिर जेखर वो मनखे ह कहाय न दानी।
वो मनखे ल ग कोन बने कहि बोलय जेन सदा करु बानी।
(8)
मूरख ला कतको समझावव बात कहाँ सुनथे अभिमानी।
आवय आँच तभो धर झूठ ल फोकट के चढ़ नाचय छानी।
स्वारथ खातिर वोहर दूसर ला धर पेरत हावय घानी।
देखमरी म करे सब काम ल घोरय माहुर पीयय पानी।
(9)
चोर सही झन आय करौ,झन खाय करौ मिसरी बरपेली।
तोर हरे सब दूध दही अउ तोर हरे सब माखन ढेली।
आ ललना बइठार खवावहुँ गोद म मोर मया बड़ मेली।
नाचत तैं रह नैन मँझोत म जा झन बाहिर तैंहर खेली।
(10)
भारत के सब लाल जिंहा रहिथे बनके बड़ जब्बर चंगा।
देख बरे बिजुरी कस नैन ह कोन भला कर पाय ग दंगा।
मारत हे लहरा नँदिया खुस हो यमुना सिंधु सोंढुर गंगा।
ऊँच अगास म हे लहरावत भारत देश म आज तिरंगा।
(11)
गोप गुवालिन के सँग गोंविद रास मधूबन मा ग रचाये।
कंगन देख बजे बड़ हाथ म पैजन हा पग गीत सुनाये।
मोहन के बँसुरी बड़ गुत्तुर बाजय ता सबके के मन भाये।
एक घड़ी म रहे सबके सँग एक घड़ी सब ले दुरिहाये।
(12)
देख रखे हँव माखन मोहन तैं झट आ अउ भोग लगाना।
रोवत हावय गाय गरू मन लेग मधूबन तीर चराना।
कान ह मोर सुने कुछु ना अब आ मुरली धर गीत सुनाना।
काल बने बड़ कंस फिरे झट आ तँय मोर ग जीव बचाना।
(13)
नीर बिना नयना पथराय ग आय कहाँ निंदिया अब मोला।
फेर सुखाय सबो सपना बिन बादर खेत बरे घर कोला।
का भरही कठिया चरिहा नइ तो ग भरे अब नानुक झोला।
देख जनावत हे जग मा अब लूट जही हर हाल म डोला।
(14)
भीतर द्वेष भरे बड़ हावय बाहिर देख न डोल ग जादा।
रंग भरे बर जीवन मा तँय बेच दिये मन काबर सादा।
कोन जनी कइसे करबे अब हावय का अउ तोर इरादा।
काम बुता बड़ देख धरे जर फेर लड़े बनके तँय दादा।
(15)
आवव हो गजराज गजानन आसन मा झट आप बिराजौ।
काटव क्लेश सबे तनके ग हरे बर तैं सब पाप बिराजौ।
नाम जपे नइ आवय आफत हे सुख के तुम जाप बिराजौ।
काज बनाय सबो झनके सुर हे शुभ राशि मिलाप बिराजौ।
(16)
टेंवत हे टँगिया बसुला अपने बर छोड़य तीर ल कोई।
लाँघन भूँखन के सुरता बिन झेलत हावय खीर ल कोई।
मारत हे मनके सदभाव ल देख सजाय शरीर ल कोई।
लेवत हे लउहा लउहा नइ तो ग धरे अब धीर ल कोई।
(17)
दूसर खातिर धीर करे सब तो अपने बर तेज बने हे।
हे कखरो चिरहा कथरी अउ देख कहूँ घर सेज बने हे।
छप्पन भोग बने कखरो घर ता कखरो घर पेज बने हे।
कोन लिही सुध भारत के मनखे ग इहाँ अँगरेज बने हे।
(18)
माँग हवे बड़ हाट बजार म भाव घलो ग बने चढ़के हे।
छोट मँझोलन का कहिबे बड़कापरिवार घलो झड़के हे।
आज घलो छटठी बरही मुनगा बिन देख कहाँ टरके हे।
दार टमाटर नून मिरी सँग स्वाद ह एखर गा बढ़के हे।

जीतेन्द्र वर्मा”खैरझिटिया”
बाल्को(कोरबा)
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मत्तगयंद सवैया : किसन के मथुरा जाना

आय हवे अकरूर धरे रथ जावत हे मथुरा ग मुरारी।
मात यशोमति नंद ह रोवय रोवय गाय गरू नर नारी।
बाढ़त हे जमुना जल हा जब नैनन नीर झरे बड़ भारी।
थाम जिया बस नाम पुकारय हाथ धरे सब आरति थारी।

कोन ददा अउ दाइ भला अपने सुत दे बर होवय राजी।
जाय चिराय जिया सबके जब छोड़ चले हरि गोकुल ला जी।
गोप गुवालिन संग सखा सब काहत हावय जावव ना जी।
हाल कहौं कइसे मुख ले दिखथे बिन जान यशोमति माँ जी।

गोकुल मा नइ गोरस हे अब गाय गरू ह दुहाय नहीं जी।
फूल गुलाब न हे कचनार मधूबन हे नइ बाग सहीं जी।
बार तिथी सब हे बिगड़े बिन मोहन रास रचे न कहीं जी।
जेखर जान निकाल दिही कइसे रइही ग बता न तहीं जी।

जीतेन्द्र वर्मा”खैरझिटिया”
बाल्को(कोरबा)
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सुखदेव सिंह अहिलेश्वर”अँजोर” के छंद

मदिरा सवैय्या छंद

सुग्घर शब्द विचार परोसव हाँथ धरे हव नेट बने।
ज्ञान बतावव गा सच के सब ला सँघरा सरमेट बने।
झूठ दगा भ्रम भेद सबे झन के मुँह ला मुरकेट बने।
मानस मा करतव्य जगै अधिकार मिलै भर पेट बने।

दुर्मिल सवैय्या छंद

सुनले बरखा झन तो तरसा बिन तोर कहाँ मन हा हरषे।
जल के थल के घर के बन के बरखा बिन जीव सबो तरसे।
नदिया तरिया नल बोरिंग मा भरही जल कोन बिना बरसे।
जिनगी कइसे चलही सबके अब आस सुखावत हे जर से।

मत्तगयंद सवैय्या छंद

तीज तिहार लगे मनभावन जे बड़ पावन रीत धरे हे।
द्वार सुहावन लागत हे जस आज नता जग जीत डरे हे।
गाँव गली मुसकावत हे बहिनी मन के शुभ पाँव परे हे।
आज सबे हिरदे खुश हे बिटिया बर सुग्घर भाव भरे हे।

सुखदेव सिंह अहिलेश्वर “अँजोर”
गोरखपुर, कवर्धा

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