Category: विष्णु पद

विष्णुपद छंद : हे जग के जननी

जुग जुग ले कवि गावत हावँय,नारी के महिमा।
रूप अनूप निहारत दुनिया, नारी के छवि मा।

प्यार दुलार दया के नारी,अनुपम रूप धरे।
भुँइया मा ममता उपजाये,जम के त्रास हरे।

जग के खींचे मर्यादा मा, बन जल धार बहे।
मातु-बहिन बेटी पत्नी बन,सुख दुख संग सहे।

मीथक ला लोहा मनवाये,नव प्रतिमान गढ़े।
पुन्न प्रताप कृपा ला पाके,जीवन मूल्य बढ़े।

धरती से आगास तलक ले, गूँजत हे बल हा।
तोर धमक ला देख दुबक गे,धन बल अउ कल हा।

नारी क्षमता देख धरागे, अँगरी दाँत तरी।
जनम जनम के मतलाये मन,होगे आज फरी।

सुखदेव सिंह अहिलेश्वर “अँजोर”
गोरखपुर,कवर्धा
मोबा-9685216602
sukhdev.singh.ahileshver31@gmail.com
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विष्णुपद: छंद – मोखारी

बबा लाय हे दतवन नोनी,दाँत बने घँसबो !
जीभ सीप के कुल्ला करबो,कुची फेंक हँसबो !!1!!

बनतुलसा बर बोइर बमरी,टोर लन चिरचिरा !
करंच मउहाँ सब्बो दतवन,लीम हे किरकिरा !!2!!

बमरी सोंटा के मोखारी,गाँव-गाँव चलथे !
घड़ी-घड़ी मा खेलत खावत,आज कल निकलथे !!3!!

हँसिया बाँधै डँगनी धरके,दतवन अभी मिलही !
लाम छँड़ा ला टोरै सब्बो,दाँत तभे खिलही !!4!!

नवा जमाना धरके आगे,टूथ ब्रस घँसरबे !
टूथ पेस्ट तो रइथे बढ़िया,देख तहूँ फँसबे !!5!!

मजा कहाँ जी दतवन जइसन,करू लीम बमरी !
दाई बाबू माँगत हावै,चलना जी लमरी !!6!!

बैकटेरिया मरथे नोनी,बढ़िया मुँह लगथे !
साफ दाँत तो दिखथे चकचक,बदबू हर भगथे !!7!!

सुरता बढ़थे बमरी घँसले,यहू बुता करले !
आवाज मधुर बोइर करथे,ध्यान यहू धरले !!8!!

नैन जोति तो बढ़थे बर ले, श्वेत प्रदर हँटथे !
रक्त प्रदर के नाशक होथे,केत बने मिटथे !!9!!

दतवन के अब देखव जादू, घर-घर सुख लमरे !
लाख बिमारी नाशक बनके,मेटे बर टमरे !!10!!

मूत्र रोग अउ पथरी स्वाँसा,दाँत सेंध्द हिलना !
मुँह के छाला अउ पायरिया,सबला हे मिटना !!11!!

पेट चेहरा बढ़िया सेहत,झुमरत मन करले !
कफ ब्लड प्रेशर जाही सबके,गाँठ बाँध धरले !!12!!

अइसन होथे जी मोखारी,जादू बड़ चलथे !
देश मोर तो घँसथे दतवन,केत हाँथ मलथे !!13!!

असकरन दास जोगी
मो.नं.: 9340031332

www.antaskegoth.blogspot.com
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धूवा मारे : विष्णुपद छंद

(भ्रूण हत्या)

धूवा मारे काबर पापी,पाबे का मन के !
बेटा मिलही ता का करबे,चलबे का तनके !!1!!

बेटी-बेटा मा भेद करे,लाज कहाँ लगही !
नाक-कान तो बेंचे बइठे,कोन भला ठगही !!2!!

नारी-नारी बर जी जलथे,मोर इही कहना !
ममता देहव तबतो दाई,सुघर संग रहना !!3!!

धूवा सँचरे लालच ठाने,मशीन मा दिखथे !
चेक कराके फाँदा डारे,पापी मन हिलथे !!4!!

डॉक्टर बनथे संगी तुँहरे,लोभ फूल खिलथे !
नियत-धरम के सौदा करथे,कोख तहाँ मिटथे !!5!!

कतको धूवा अलहन सँचरे,मया जाल फँसके !
धूवा मारव काबर संगी,आज तुमन हँसके !!6!!

नाबालिक में धूवा परगे,बोल कोन रखही !
पाप मान के फेंकैं सबतो,कुकुर खड़े भखही !!7!!

करथव काबर अइसन गलती, रोथन मर मरके !
बिनती हे तुम रोकव अलहन,जीथन डर डरके !!8!!

जेकर उजड़े कोख जान ले,हिरदे हा जरथे !
जीथे काया दिखथे सबला,अंत्तस हा मरथे !!9!!

जानौं बढ़िया बात सबो जी,गुरुजी जब रहिसे !
छोड़व अइसन पाप करम ला, सबला तब कहिसे !!10!!

बैना संस्कृति चालू करके,क्रांत्ति करदिच सगा !
सतगुरु घासी जेकर परिचय,सबला कहवँ जगा !!11!!

कोख तरी तब लइका बाँचै,धूवा बंस पलै !
पढ़े लिखे अब पापी होगैं,कोख मरघट चलै !!12!!

गुरु घासीदास अमृतवाणी : एक धूवा मारे तेनो तोर बराबर आय

असकरन दास जोगी
सम्पर्क : 9340031332
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हमर बहू – विष्णु पद छंद

कहाँ जात हस आतो भैया,ले ले सोर पता।
अब्बड़ दिन मा भेंट होय हे,का हे हाल बता।

घर परिवार बहू बेटा मन,कहाँ कहाँ रहिथें।
नाती नतनिन होंही जेमन,बबा बबा कहिथें।

अपन कहौ हमरो कुछ सुनलौ,थोकुन बइठ जहू।
बड़ सतवंतिन आज्ञाकारी,हमरो हवय बहू।

बड़े बिहनहा सबले पहिली,भुँइ मा पग धरथे।
घर अँगना के साफ सफाई,नितदिन हे करथे।

नहा खोर के पूजा करथे,हमर पाँव परथे।
मन मा सुग्घर भाव जगाथे,पीरा ला हरथे।

हमर सबो के जागत जागत,चूल्हा आग बरे।
दुसरइया तब हमर तीर मा,आथे चाय धरे।

पानी गरम नहाये खातिर,मन चाहा मिलथे।
हमर खुशी के कहाँ ठिकाना,तन मन हे खिलथे।

जल्दी आथे ताते जेवन,नइतो देर लगे।
बुढ़त काल मा अइसे लगथे,जइसे भाग जगे।

बेटी मनके मान बढ़ावै,नवा जघा ढल के।
हे संस्कार ददा दाई के,बोली ले झलके।

अइसन बहू पाय के काबर,होवय गरब नहीं।
इँखर आय ले घर दुवार मा,गड़गे दरब सहीं।

सुखदेव सिंह अहिलेश्वर “अँजोर”
गोरखपुर,कवर्धा
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