Category: जीवन परिचय

हमर गुरूजी – 9 दिसमबर पुन्यतिथि बिसेस

अंधियार गहरावत हे। मनखे छटपटावत हे। परकास के अगोरा म हाथ लमाये बइठे हे लोगन। परकास हमर जिनगी म कइसे हमाही, एकर चिनतन मनन अऊ परकास लाने के उदिम बहुतेच कम मनखे मन कर पाथे। जेन मनखे हा परकास ला भुंइया म बगराके, दुनिया ला जगजग ले अंजोर कर देथे उही मनखे हा जग म गुरूजी के नाव ले पुजाथे। गुरूजी हा अइसन परानी आय जेहा जिनगी भर, दिया कस बरके जग के अंधियारी ला दुतकारथे अऊ ललकारथे। लोगन ला बने रद्दा म रेंगाये अऊ ओकर ठऊर तक अमराये के बूता करइया मनखे ला जग हा, गुरूजी के नाव ले जानथे।
हमर बीच अइसने साहितकार गुरूजी सिरी गजानंद परसाद देवांगन रिहीन। गनेस चतुरथी उन्नीस सौ चालीस म रइपुर के बाम्हनपारा म बहुत सधारन परिवार म जनम धरइया गुरूजी हा कतको पारिवारिक समसिया के बीच सिकछा के परचार परसार म अपन जिनगी ला होम दिस। गुरूजी के सरकारी पद इंकर बर सिरीफ उदर पोसन के माधियम रिहीस। इंकर जिनगी के मकसद, अटके सटके, गिरे परे निरबल मनखे ला उचाके बने रद्दा म रेंगाके, ओकर जिनगी ला सारथक बनाना रिहीस।
तीन सौ के लगभग हिन्दी कबिता, डेढ़ सौ के लगभग छत्तीसगढ़ही कबिता, तीन सौ भजन, दू सौ कहानी अऊ अतके अस आलेख रचके, अपन बिचार ला अकासबानी, समाचार पत्र के माध्यम ले लोगन तक पहुंचइया गुरूजी के पांच किताब परकासित हो चुके हे अऊ दू किताब परकासन बर तियार होवत हे।
देवांगन जी के बिसाल हिरदे अऊ ऊंचई ला सम्मान देवत सरकार हा छुरा नगर के सासकीय उच्चतर माधमिक इसकूल ला, गुरूजी के नाव कर दे हे। मगरलोड, नवापारा, छुरा म कतकोन साहितकार मनला ओकर नाव ले सममानित करे जाथे हरेक बछर। इंकर नाव म नवागांव म दिसाबोध साहित समिति के निरमान करे गे हे। छुरा म इंकर इसमरन ला जिनदा रखत, स्मरण साहित समिति के सनचालन पाछू पांच बछर ले सनचालित हे।
नौ दिसमबर उन्नीस सौ ग्यारह के दिन दुनिया ले ससरीर बिदा लेवइया गुरूजी, अभू घला अपन रचना के माधियम ले हमर बीच जिनदा हे अऊ जगा जगा गियान के दिया बार के अंजोर बगरावत हे। एक कोती दिसा के गियान देवइया गुरूजी, साहितजगत म दिसाबोध के नाव ले जनावत रिहीन, त दूसर कोती उन्नीस सौ तिहत्तर ले अपन इसकूल म सबले पहिली योग के सिक्छा दे के, परदेस के पहिली इसकूली योगगुरू बन गिन। ऊंकर सातवीं पुन्यतिथि म साहित अऊ योगजगत के विनम्र सरधानजलि ……।

श्रीमति संजू एच.एस. देवांगन
छुरा

मंगल पांडे के बलिदान : 8 अप्रैल बलिदान-दिवस

अंगरेज मन ल हमर देस ले भगाए बर अउ देसवासी मन ल स्‍वतंत्र कराए बर चले लम्बा संग्राम के बिगुल बजइया पहिली क्रान्तिवीर मंगल पांडे के जनम 30 जनवरी, 1831 के दिन उत्तर प्रदेश के बलिया कोति के गांव नगवा म होय रहिस। कुछ मनखे मन इंकर जनम उत्‍तर प्रदेश के साकेत जिला के गांव सहरपुर म अउ जन्मतिथि 19 जुलाई, 1927 घलोक मानथें। मेछा के रेख फूटतेच इमन सेना म भर्ती हो गये रहिन। वो बखत सैनिक छावनी मन म गुलामी के विरुद्ध आगी सुलगत रहिस।
अंग्रेज मन जानत रहिन कि हिन्दू गाय ल पवित्र मानथें, जबकि मुसलमान सूंरा ले खिक मानथें। तभो ले अंग्रेज मन अपन सैनिक मन ल जऊन कारतूस देवत रहिन, ओमां गाय अऊ सूंरा के चर्बी मिले रहत रहिस। गोली चलाए के बेरा वो कारतूस ल सैनिक मन ल अपन मुँह ले खोले ल परय। अइसनहे अड़बड़ बछर ले चलत रहिस फेर सैनिक मन ल एकर सच मालूम नइ रहिस। मंगल पांडे ओ समय बैरकपुर म 34 वां हिन्दुस्तानी बटालियन म तैनात रहिन। उहाँ पानी पियइया एक हिन्दू ह ए बात के जानकारी सैनिक ल दीन के कारतूर के खोल म गाय अउ सूंरा के चर्बी चढ़े हे। एखर से सैनिक मन म आक्रोश फैल गीस। मंगल पांडे ले रहे नइ गीस। 29 मार्च, 1857 के दिन उमन विद्रोह कर दीन। एक भारतीय हवलदार मेजर ह जाके सार्जेण्ट मेजर ह्यूसन ल ये हाल ल बताइस। मेजर घोड़ा म बइठके छावनी गीस। उहां मंगल पांडे सैनिक मन ल कहत रहिन के अंग्रेज हमार धरम ल भ्रष्ट करत हें। हमला उंखर नौकरी छोड़ देना चाही, मैं छोंडहूं, मैं तो परन कर लेहे हवंव अउ कोनो अंग्रेज कहूं मोला रोकही में ओला मार दूंहूं।




सार्जेण्ट मेजर ह्यूसन ह सैनिक मन ल मंगल पांडे ल पकड़े ल कहिन; तब तक मंगल पांडे के गोली ह ओखर सीना छलनी कर दीस। ओखर लाश घोड़ा ले नीचे आ गिरिस। गोली के अवाज सुनके एक अंग्रेज लेफ्टिनेण्ट उहाँ आ गीस। मंगल पांडे ह ओकर उपर घलोक गोली चलाईस; फेर वो बचके घोड़ा ले कूद के गे। मंगल पांडे ओकर उपर झपट परिस अऊ तलवार ले ओखर काम तमाम कर दीस। लेफ्टिनेण्ट के सहायता बर एक आन सार्जेण्ट मेजर आइस; उहू मंगल पांडे के हाथ मारे गीस। अब तक चारों मूड़ा खबर फइल गीस। 34 वां पल्टन के कर्नल हीलट ह भारतीय सैनिक मन ल मंगल पांडे ल पकड़े के आदेश दीस; भारतीय सैनिक मन एखर बर तैयार नइ होइन, मने बिद्रोह कर दीन।




अंग्रेज सैनिक मन ल बलाए गीस अउ सबले पहिली मंगल पांडे ल चारो मूड़ा ले घेर लिए गीस। जब चारो तरफ ले मंगलवार घेरा गये त वो समझ गइस के अब बचना असम्भव हे। तेखर सेती वो अपन बन्दूक ले खुदे ल गोली मार लीस। गोली ले मंगल मरे नइ रहिस भलुक घायल होके गिर गए रहिस। अंग्रेज सैनिक मन ह ओला पकड़ लीन, घायल मंगलवार उपर कोर्ट मार्सल होइस। मंगल पांडे उपर सैनिक न्यायालय म मुकदमा चलाए गीस। उमन कहिन, ‘‘मैं अंग्रेज मन ल अपन देश के भाग्यविधाता नइ मानंव। अपन देश ल आजाद कराना कहूं अपराध हे, त मैं हर दण्ड भुगते ल तैयार हंव।’’
न्यायाधीश ह ओला फांसी के सजा दे दीस अउ 18 अपरेल के दिन फाँसी देहे बर निरधारित कर दीन। एती भारतीय सैनिक मन के बीच मंगलवार के लगाए आगी ह फइल गए रहिस। अंग्रेज मन ह देश भर म अउ जादा विद्रोह झन फइले ये डर म, घायले अवस्था म 8 अपरेल, 1857 के दिन मंगल ल फाँसी दे दीन। बैरकपुर के छावनी म मंल ल फाँसी देहे बर कोनो जल्‍लाद तइयार नइ होइन, तीर तखार के छावनी वाले मन तको तइयार नइ होइन। हार खाके अंग्रेज मन कोलकाता ले चार जल्लाद जबरन बला के वोला फांसी देहे गीस।
मंगल पांडे ह क्रान्ति के जऊन मशाल जलाईस उही आगू चलके 1857 के बड़का अउ जबर स्वाधीनता संग्राम के रूप लीस। हमर भारत देस भलुक 1947 म स्वतन्त्र होइस फेर ये आजादी बर पहिली क्रान्तिकारी मंगल पांडे के बलिदान ल हमेसा श्रद्धापूर्वक स्मरण करे जाथे।

– अनुवाद : संजीव तिवारी
– मूल हिन्‍दी आलेख : इंटरनेट में उपलब्‍ध विभिन्‍न स्रोतो से प्राप्‍त



बाबू जगजीवनराम अऊ सामाजिक समरसता : 5 अप्रैल जन्म-दिवस

हिन्दू समाज के निर्धन अऊ वंचित वर्ग के जऊन मनखे मन ह उपेक्षा सहिके घलोक अपन मनोबल ऊंचा रखिन, ओमां बिहार के चन्दवा गांव म पांच अप्रैल, 1906 के दिन जनमे बाबू जगजीवनराम के नाम उल्लेखनीय हे। ऊंखर पिता श्री शोभीराम ह कुछ मतभेद के सेती सेना के नौकरी छोड़ दे रहिस। उंखर माता श्रीमती बसन्ती देवी ह गरीबी के बीच घलव अपन लइका मन ल स्वाभिमान ले जीना सिखाइस।
लइकई म बाबू जगजीवनराम के स्‍कूल म हिन्दू, मुसलमान अउ दलित हिन्दु मन बर पानी के अलग-अलग घड़ा रखे जात रहिस। बाबू ह अपन संगवारी मन के संग मिलके दलित मन वाले घड़ा मन ल फोर दीन। प्रबन्ध समिति के पूछे म उमन कहिन कि ओला हिन्दु मन म बंटवारा स्वीकार नइ हे। ये बात ले प्रबंधन के आंखीं तको उघरिस अउ एखरे सेती सबो हिन्दु मन बर एकेच घड़ा के व्यवस्था करे गीस। 1925 म ऊंखर स्‍कूल म मदन मोहन मालवीय जी आइन। वो समें म बाबू जगजीवनराम ह स्वागत भाषण दीन, येकर ले प्रभावित होके मालवीय जी ह उमन ल काशी बला लीन।
कासी म घलो छुआछूत उंखर पाछू नइ छोडि़स। नाउ ऊंखर बाल नइ काटय, खाना बनइया ओला जेवन नइ दय। जूता पालिस करइया पालिस नइ करय। अइसन म मालवीय जीच ह उंखर सहारा बनत रहिन। कई पइत त मालवीय जी खुदे ऊंखर जूता पालिस कर देवत रहिन। अइसन वातावरण म बाबू ह अपन विद्यालय अऊ काशी नगर म सामाजिक विषमता मन के विरुद्ध जनजागरण करत रहिस।



1935 म बाबू ह हिन्दू महासभा के अधिवेशन म एक प्रस्ताव पारित कराइस, जेमां मंदिर, तालाब अउ कुआं मन ल सब हिन्दु मन बर समान रूप ले खोले के बात कहे गए रहिस। 1936 म उमन प्रत्यक्ष राजनीति म प्रवेश करिन अऊ 1986 तक सरलग एके सीट ले जीतत रहिन।
गांधी जी के आह्वान म ओ मन कई पइत जेल गइन। अंग्रेज भारत ल हिन्दू, मुसलमान अउ दलित वर्ग के रूप म कई भाग मन म बांटना चाहत रहिन, बाबू जगजीवन राम उही समें ए खतरा के बारे म बताए रहिन। स्वाधीनता के बाद ओ मन सरलग केन्द्रीय मंत्रिमंडल के सदस्य रहिन। 1967 ले 70 तक खाद्य मंत्री रहत उमन हरित क्रांति के सूत्रपात करिन। जब श्रम मंत्री रहिन तब उमन अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अध्यक्ष घलोक रहिन। जब उमन रेलमंत्री रहिन त सबे स्टेशन म मनखे मन ल लोटा ले पानी पिलइया ‘पानी पांडे’ के नियुक्त करे रहिन, ये पद म उमन जादातर वंचित वर्ग के मनखे मन ल रखिन।
1971 म उंखरे रक्षामंत्री रहे के बेरा म पाकिस्तान हारिस अऊ बंगलादेश के निर्माण होइस एमा घलोक उंखर बड़का भूमिका रहिस। 1975 के आपातकाल ले ऊंखर दिल ल बहुत चोट लगिस। चुनाव घोषित होतेच उमन ‘कांग्रेस फार डैमोक्रैसी’ बनाके कांग्रेस के विरुद्ध चुनाव लडि़न। जनता पार्टी के शासन म ओ मन उपप्रधानमंत्री बनिन। छै जुलाई, 1986 के दिन समरस भारत बनाए के इच्छुक बाबू जगजीवन राम जी के देहांत हो गए।

अनुवाद : संजीव तिवारी
(मूल आलेख : नवोत्थान लेख सेवा, हिन्दुस्थान समाचार के भावानुवाद)


छत्तीसगढ़ के गिरधर कविराय – जनकवि कोदूराम “दलित”

(108 वाँ जयंती मा विशेष)

1717 ईस्वी मा जन्में गिरधर कविराय अपन नीतिपरक कुण्डलिया छन्द बर जाने जाथें। इंकर बाद कुण्डलिया छन्द के विधा नँदागे रहिस। हिन्दी अउ दूसर भारतीय भाखा मा ये विधा के कवि नजर मा नइ आइन।

पठान सुल्तान, जुल्फिकार खाँ, पंडित अम्बिकादत्त व्यास, बाबा सुमेर सिंह, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, मन सुप्रसिद्ध कवि के दोहा के भाव मा विस्तार दे के अउ रोला जिद के ये विधा ला पुनर्स्थापित करे के कोशिश जरूर करिन।

हास्य कवि काका हाथरसी घलो कुण्डलिया जइसे दोहा अउ रोला मिलाके छै डाँड़ के बहुत अकन रचना मंच मा पढ़के प्रसिद्धि पाइन हें फेर उंकर रचना मन काका की फुलझड़ियाँ के नाम मा जाने जाथें। उंकर रचना मा कुण्डलिया असन आदि अउ अंत मा एक्के शब्द के प्रयोग नइ होइस हे। सन 2000 के बाद हिन्दी मा कुण्डलिया छन्द फेर प्रचलन मा आइस हे।

कोदूराम “दलित” जी अपन पहिली कुण्डलिया छन्द संग्रह “सियानी गोठ” (प्रकाशन वर्ष – 1967)मा अपन भूमिका मा लिखे रहिन – “ये बोली (छत्तीसगढ़ी) मा खास करके छन्द बद्ध कविता के अभाव असन हवय, इहाँ के कवि-मन ला चाही कि उन ये अभाव के पूर्ति करें।स्थायी छन्द लिखे डहर जासती ध्यान देवें।ये बोली पूर्वी हिन्दी कहे जाथे। येहर राष्ट्र-भाषा हिन्दी ला अड़बड़ सहयोग दे सकथे। यही सोच के महूँ हर ये बोली मा रचना करे लगे”

उंकर निधन 28 सितम्बर 1967 मा होइस, उंकर बाद छत्तीसगढ़ी मा छन्दबद्ध रचना लिखना लगभग बंद होगे। छत्तीसगढ़ी मा अब “छन्द के छ” के साधक कवि मन कुण्डलिया छन्द मा सुग्घर रचना करत हें।

छत्तीसगढ़ मा कुण्डलिया छन्द ला प्रतिष्ठित करे के श्रेय जनकवि कोदूराम “दलित” ला जाथे। इही पाय के दलित जी ला छत्तीसगढ़ के गिरधर कविराय माने जाथे।

जनकवि कोदूराम दलित जी छत्तीसगढ़ी के संगेसंग हिन्दी मा घलो कुण्डलिया छन्द लिखिन हें। उनकर कुण्डलिया छन्द के एक संग्रह 1967 मा सियानी-गोठ के नाम मा प्रकाशित हो चुके हे।

कोदूराम दलित जी के हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी ऊपर समान अधिकार रहिस। फेर छत्तीसगढ़ी कवि के रूप मा उन ला ज्यादा जाने जाथें। इनकर कविता मा कुण्डलिया छन्द के अलावा दोहा, रोला, सोरठा, उल्लाला, सार, सरसी, चौपई, चौपाई, ताटंक, कुकुभ, लावणी, श्रृंगार, पद्धरि, पद पादाकुलक, घनाक्षरी आदि छन्द के दर्शन होथे।

गिरधर कविराय अपन नीतिपरक कुण्डलिया बर प्रसिद्ध हें त कोदूराम दलित के कुण्डलिया मा नीति के अलावा भारत के नव निर्माण, सरकारी योजना, विज्ञान, हास्य-व्यंग्य, देशप्रेम, छत्तीसगढ़ के लोक संस्कृति जइसे अनेक रंग के दर्शन होथे।




दलित जी के नीतिपरक कुण्डलिया देखव –

(1) कतरनी अउ सूजी
काटय – छाँटय कतरनी, सूजी सीयत जाय
सहय अनादर कतरनी , सूजी आदर पाय
सूजी आदर पाय , रखय दरजी पगड़ी मां
अउर कतरनी ला चपकय वो गोड़ तरी-मां
फल पाथयँ उन वइसन, जइसन करथयँ करनी
सूजी सीयय, काटत – छाँटत जाय कतरनी.
(2) पथरा –
भाई, एक खदान के, सब्बो पथरा आयँ
कोन्हों खूँदे जायँ नित, कोन्हों पूजे जायँ
कोन्हों पूजे जायँ , देउँता बन मंदर के
खूँदे जाथयँ वोमन ,फरश बनय जे घर के
चुनो ठउर सुग्घर, मंदर के पथरा साहीं
तब तुम घलो सबर दिन पूजे जाहू भाई.

सामाजिक बुराई दूर करे बर दलित जी के संदेश –

(1) जुआ –
खेलव झन कोन्हों जुआ, करव न धन बरबाद
आय जुआ के खेलना, बहुत बड़े अपराध
बहुत बड़े अपराध, आय ये मा सब बिगड़िन
राजा नल अउ धरमराज जइसे सब्बो झिन
खो के धन फोकट जीवन भर दुख झन झेलव
सुखी रहव सब झन मन, जुआ कभू झन खेलव।।

(2) नशा –
गाँजा चरस अफीम अउ माखुर मदिरा भंग
इन्हला जे सेवन करयँ, छोड़व उनकर संग
छोड़व उनकर संग, तभे तुम रहू निरोगी
नशा बनाथे मनखे ला कँगला अउ रोगी
पियौ दूध फल मेवा खावौ ताजा ताजा
आवयँ जहर अफीम चरस मदिरा अउ गाँजा।।




दलित जी अपन प्रदेश के गरिमा अउ आहार के महिमा ये कुण्डलिया मा करिन संगेसंग छत्तीसगढ़ के पिछड़ापन के कारण तको बताइन –

(1) छत्तीसगढ़ –
छत्तिसगढ़ पैदा करय, अड़बड़ चाँउर-दार
हवयँ इहाँ के लोग मन, सिधवा अउर उदार
सिधवा अउर उदार, हवयँ दिन रात कमावयँ
दें दूसर ला भात, अपन मन बासी खावयँ
ठगथयँ ये बपुरा मन ला बंचक मन अड़बड़
पिछड़े हवय अतेक, इही कारण छत्तिसगढ़।।

(2) बासी –
बासी मा गुन हे गजब, एला सब झन खाव
ठठिया भर पसिया पियौ, तन ला पुष्ट बनाव
तन ला पुष्ट बनाव, जियो सौ बछर आप मन
जियत हवयँ जइसे कतको के बबा-बाप मन
दही-मही सँग खाव शान्ति आ जाही जी -मा
भरे गजब गुन हें छत्तिसगढ़ के बासी मा।।

कोदूराम दलित जी के जनम टिकरी (अर्जुन्दा) गाँव मा होय रहिस फेर उंकर करम भुइयाँ दुरुग रहिस। अइसन मा भिलाई उंकर विषय वस्तु कइसे नइ बनतिस –

(1) भिलाई –
बनिस भिलाई हिन्द के, नवा तिरथ अब एक
चरयँ गाय गरुवा तिहाँ, बस गें लोग अनेक
बस गें लोग अनेक, रोज आगी सँग खेलयँ
लोहा ढलई के दुख ला, हँस हँस के झेलयँ
रहिथयँ मिल के रूसी हिन्दी भाई भाई
हमर देश के नवा तिरथ अब बनिस भिलाई।।

साठ के दशक मा हमर देश निर्माण के प्रक्रिया ले गुजरत रहिस। ओ बेरा मा सरकारी योजना ला सफल करे के आव्हान देखव –

(1) परिवार नियोजन –
अड़बड़ बाढ़िन आदमी, भारत मा भगवान
दू ले आगर होय झन, अब ककरो सन्तान
अब ककरो सन्तान, कहूँ होही नौ-दस झन
तो करना परिही सब ला, परिवार नियोजन
ज्यादा मनखे बाढ़े ले, हो जाथय गड़बड़
पूरय नहीं अनाज, सबो दुख पाथयँ अड़बड़।।

(2) पँचसाला योजना –
पँचसाला हर योजना, होइन सफल हमार
बाँध कारखाना सड़क, बनवाइस सरकार
बनवाइस सरकार, दिहिन सहयोग सबो झन
अस्पताल बिजली घर इसकुल घलो गइन बन
देख हमार प्रगति , अचरज होइस दुनिया ला
होइन सफल हमार, योजना मन पँचसाला।।




लोकतंत्र मा वोट के महत्ता अउ चुनाव के प्रक्रिया बतावत दलित जी के कुण्डलिया –

(1) वोट –
सोना चाँदी घीव गुड़, रुपिया पैसा नोट
होथय सबसे कीमती, आप मनन के वोट
आप मनन के वोट, अधिक पाथयँ जउने मन
राज काज के अधिकारी बनथयँ तउने मन
यही पाय के उन्हला चाही अच्छा होना
परखो वोट डलइया मन, पीतल अउ सोना।।

(2) राजा –
अब जनता राजा बनिस, करय देश मा राज
अउ तमाम राजा मनन, बनगें जनता आज
बनगें जनता आज, भूप मंत्री-पद माँगे
ये पद ला पाए बर घर घर जायँ सँवागे
बनयँ सदस्य कहूँ जनता मन दया करिन तब
डारयँ कागद पेटी ले निकलय राजा अब।।

लोकतंत्र मा प्रिंट मीडिया के भारी महत्व होथे। अखबार के भूमिका बर उंकर विचार ये कुण्डलिया मा देखे जा सकथे –

(1) पेपर –
पेपर मन –मां रोज तुम, समाचार छपवाव
पत्रकार संसार ला, मारग सुघर दिखाव
मारग सुघर दिखाव, अउर जन-प्रिय हो जाओ
स्वारथ – बर पेपर-ला, झन पिस्तौल बनाओ
पेपर मन से जागृति आ जावय जन-जन मां
सुग्घर समाचार छपना चाही पेपर-मां.

5 मार्च 1910 मा जन्मे कवि दलित जी प्रगतिशील विचारधारा के रहिन अउ जन हित के सबो किसम के परिवर्तन ला स्वीकार करिन। विज्ञान के समर्थन मा उंकर कुण्डलिया देखव –

(1) विज्ञान –
आइस जुग विज्ञान के , सीखो सब विज्ञान
सुग्घर आविस्कार कर , करो जगत कल्यान
करो जगत कल्यान, असीस सबो झिन के लो
तुम्हू जियो अउ दूसर मन ला घलो जियन दो
ऋषि मन के विज्ञान , सबो ला सुखी बनाइस
सीखो सब विज्ञान, येकरे जुग अब आइस.

(2) बिजली –
तार मनन मा ताम के, बिजली रेंगत जाय
बुगुर बुगुर सुग्घर बरय, सब लट्टू मा आय
सब लट्टू मा आय, चलावय इनजन मन ला
रंग रंग के दे अँजोर ये हर सब झन ला
लेवय प्रान,लगय झटका जब येकर तन मा
बिजली रेंगत जाय, ताम के तार मनन मा।।




दलित जी कवि सम्मेलन के मंच मा हास्य अउ व्यंग्य के कवि के रूप मा विख्यात रहिन। उंकर शिष्ट हास्य के सुग्घर उदाहरण आय ये कुण्डलिया –

(1)खटारा साइकिल –
अरे खटारा साइकिल, निच्चट गए बुढ़ाय
बेचे बर ले जाव तो, कोन्हों नहीं बिसाय
कोन्हों नहीं बिसाय, खियागें सब पुरजा मन
सुधरइया मन घलो हार खागें सब्बो झन
लगिस जंग अउ उड़िस रंग, सिकुड़िस तन सारा
पुरगे मूँड़ा तोर, साइकिल अरे खटारा।।

दलित जी आडम्बर ला नइ मानत रहिन। आडम्बर ऊपर उंकर व्यंग्य देखव –

(1) ढोंगी –
ढोंगी मन माला जपयँ, लम्भा तिलक लगायँ
हरिजन ला छीययँ नहीं, चिंगरी मछरी खायँ
चिंगरी मछरी खायँ , दलित मन ला दुत्कारयँ
कुकुर बिलाई ला चूमयँ, चाटयँ पुचकारयँ
छोंड़ छाँड़ के गाँधी के सुग्घर रसदा ला
भेद भाव पनपायँ, जपयँ ढोंगी मन माला।

छत्तीसगढ़ मा बाहिर ले आये मनखे मन इहाँ के सिधवा मन के शोषण करिन हें। ये पीरा ला व्यंग्य के माध्यम ले दलित जी खूब सुग्घर लिखिन हें –

(1) फुटहा लोटा –
फुटहा लोटा ला धरव, जाओ दूसर गाँव
बेपारी बन के उहाँ, सिप्पा अपन जमाव
सिप्पा अपन जमाव, छोंड़ के जोरू जाँता
नौ ला सौ कर कर के लिक्खो रोकड़ खाता
खिचड़ी खावौ पहिनो कुछ दिन कपड़ा मोटा
बना दिही लखपतिया तुम्हला फुटहा लोटा।।

नवा भारत मा औद्योगीकरण बाढ़िस। विकास बर जरूरी घलो रहिस। फेर किसानी बूता ला छोड़ के नौकरी करे बर गाँव ला छोड़ना दलित जी के हिरदे मा पीरा ला जनम देवत रहिस। ये कुण्डलिया उंकर मन के पीरा ला बतावत हे –

(1) नौकरी –
पढ़े लिखे मनखे मनन, भइन सुस्त सुखियार
खोजे खातिर नौकरी, किंजरयँ हाथ पसार
किंजरयँ हाथ पसार, न भावय खेती बारी
करिही कोन बताव, अन्न के पैदावारी
करथयँ खेती खूब, जगत के लोग सबो झन
खोजयँ नित नौकरी, इहाँ के पढ़े लिखे मन।।

जनकवि कोदूराम दलित जी पक्का गांधीवादी विचारधारा के रहिन। अपन कविता मा नान नान जिनिस ला तको विषय वस्तु बना के ओखर महत्व ला रेखांकित करत रहिन –

(1) राख –
नष्ट करो झन राख –ला, राख काम के आय
परय खेत-मां राख हर , गजब अन्न उपजाय
गजब अन्न उपजाय, राख मां फूँको-झारो
राखे-मां कपड़ा – बरतन उज्जर कर डारो
राख चुपरथे तन –मां, साधु,संत, जोगी मन
राख दवाई आय, राख –ला नष्ट करो झन.




दलित जी के बचपन गाँव देहात के वातावरण मा बीतिस तेपाय के उंकर रचना मन मा प्रकृति के प्रेम साफ साफ झलकथे। उंकर पर्यावरण बर जागरूकता देखव –

(1) पेड़ –
भाई अब सब ठउर –मां, अइसन पेड़ लगाव
खाये खातिर फल मिलय, सुस्ताये बर छाँव
सुस्ताये बर छाँव , मिलय लकड़ी बारय बर
मिल जावय लौड़ी , दुष्टन – ला खेदारे बर
ठण्डी शुद्ध सुगंधित हवा मिलय सुखदाई
सबो ठउर – मां अइसन पेड़ लगावव भाई.

छत्तीसगढ़ी के संगेसंग दलित जी के हिन्दी मा घलो समान अधिकार रहिस। उंकर हिन्दी के कुण्डलिया –

(1) कुर्सी –
सबसे कुर्सी है अधिक, जग में तेरा मान
तुझको पाने के लिए, तरसे हर इन्सान
तरसे हर इन्सान, जिसे तू मिल जाती है
उसको चुम्बक जैसी ही तू चिपकाती है
तुझसे करते नेह, लोग अपने मतलब से
तेरा मान अधिक है कुर्सी, जग में सबसे।।

जिनगी के निस्सारता बर उंकर हिन्दी के ये कुण्डलिया छन्द एक कालजयी रचना आय –

(1) नाम –
रह जाना है नाम ही, इस दुनिया में यार
अतः सभी का कर भला, है इसमें ही सार
है इसमें ही सार, यार तू तज के स्वारथ
अमर रहेगा नाम, किया कर नित परमारथ
काया रूपी महल, एक दिन ढह जाना है
किन्तु सुनाम सदा दुनिया में रह जाना है।।

आज 5 मार्च के 118 वाँ जयंती मा जनकवि कोदूराम “दलित” जी ला नमन।

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)
मोबाइल – 9907174334, 8319915168
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रायपुर नगर निगम के मयारू : ठाकुर प्‍यारे लाल

अगस्त सन् 1937 म जब ठाकुर प्‍यारे लाल साहब रायपुर मुनिसपल कमेटी के अध्यक्ष चुने गीन तब मुनिसिपल कमेटी म डेढ़ लाख रूपिया के करजा रहिस। मुनिसिपल कमेटी के कर्मचारी मन के तरक्की छै-सात बछर ले रूके परे रहिस। इही हालत स्कूल के गुरूजी मन के घलोक रहिस। शहर के सड़क उखर गए रहिस, स्कूल के छत अतका टपकत रहिस के पढ़इया लइका मन ल स्कूल म बइठके पढना मुश्किल हो गए रहिस। ठाकुर साहब के दू साल के प्रेसीडेंटी म सब करजा अदा होगे, सड़क मन के हालत सुधार गए, अऊ स्कूल के इमारत मन के मरम्मत घलोक हो गए। रायपुर मुनिसपल कमेटी म करजा के अतका भारी बोझ काबर रहिस, ओखर व्यवस्था अतका खराब काबर रहिस? एखर कारन उपर प्रकाश डालत ठाकुर साहब ह खुदे लिखे हें ‘सरलग कई बछर तक कमेटी म प्रेसीडेंट हमेसा वकालत पेशा के मनखे मन चुने जात रहिन। ओ मन ल न तो अपन व्यवसाय ले फुरसत मिलत रहिस अऊ न ही अपन धनी मुवक्किल मन ल नाराज करे के उमन म साहस रहिस।“



शहर म पानी के समुचित व्यवस्था नइ रहिस, सड़क मन अऊ इमारत मन बर घलोक कमेटी तीर पइसा नइ रहिस। ठाकुर साहब ह कमेटी के अध्यक्ष बनतेच ए सब्बो काम ल कर डरिन अऊ कमेटी के आमदनी बाढ गए। नगर के विकास होइस अउ नगरपालिका के कर्मचारी मन अऊ शिक्षक मन के तरक्की होइस। ठाकुर साहब नगर म पीये के पानी के उचित व्यवस्था करिन। मुनिसपल अध्यक्ष रहत उमन अपन मातहत कर्मचारी मन ल वोतकेच मंहगाई भत्ता दीन जतका कि प्रान्तीय शासन देत रहिस। प्रदेश म ओ समय कोनो म्युनिसपल कमेटी ओतका महंगाई भत्ता अपन कर्मचारी मन ल नइ देत रहिस। जतका के ओ मन अपन कर्मचारी मनं ल देवत रहिन। अतका होए बाद घलोक उमन जनता उपर टैक्स नइ बढाइन। ये काम ऊंखर निष्ठावान अउ कुशल प्रशासक होए के स्पष्ट प्रमाण हे।

नगर के विकास ल देखत जनता के मांग के आधार म उमन नयापारा अऊ जुन्ना बस्ती म लड़की मन बर दू स्कूल खोलिन। गंजपारा जिहां गरीब मजदूर मन के बस्ती रहिस, उहां मुनिसपल के तरफ ले अस्‍पताल खोलवाए गीस। प्रौढ शिक्षा बर शहर के बहुत अकन जघा म केन्द्र खोलवाये गीस। जुन्ना पुलिस लाइन ल व्यवस्थित रूप ले बसाए बर उमन शासन ल जरूरी प्रस्ताव भेजिन। उमन नगर म खेलकूद के सुविधा बर स्थानीय कोआपरेटिव्ह बैंक तीर खेले बर मैदान बनाए के प्रस्ताव शासन ल भेजिन जऊन ल स्वीकृति प्रदान करे गीस।



गुढ़ियारी ल रायपुर मुनिसपल कमेटी के अंदर लेहे के मांग 1906 ले चले आत रहिस। गुढ़ियारी ल रायपुर मुनिसपल कमेटी म लेहे ले कमेटी के आर्थिक स्थिति मजबूत हो जातिस। एखर से कमेटी ल 30-40 हजार रूपिया के सालाना लाभ होतिस। फेर गुढियारी ल कमेटी म लेहे के मांग जइसे के तइसे परे रहिस अउ कमेटी ल हजारों रूपिया के नुकसान उठाए ल परत रहिस। उमन गुढि़यारी ल मुनिसपल म सामिल कर दीन येकर से राजस्‍व आए बाढ् गए।

सन् 1938 म ठाकुर साहब ह एक बड़का काम करिन। जेमा हिन्दू मुस्लिम एकता बर अऊ सद्भावना ल बनाए रखे बर उमन कमेटी के तरफ ले हिन्दू मुस्लिम दंगा मन के मुकदमा मन ल मुनिसपल कोति ले न्यायालय ले वापस ले लीन। एखर से मुकदमे बाजी म मुनिस्पल के होवत हजारो रूपिया के खरचा बांचिस। ए प्रकार ऊंखर उदीम ले नगर म सुख शांति स्थापित होइस, अऊ हिन्दू – मुसलमान म सद्भावना बाढ़िस। ठाकुर साहब के हिन्दु अऊ मुसलमान मन म एकता के भावना अउ सौहाद्रपूर्ण वातावरण के निर्माण करे के स्पष्ट उदाहरण हमला म्युनिसपल लारी हाई स्कूल के एक ठन घटना ले मिलथेा उहां मुसलमान अउ हिन्दू लड़का लड़की मन एक राष्ट्रीय झंडा के तरी वंदना नइ करना चाहत रहिन। ठाकुर साहब ल जब ये पता चलिस त उमन उंखर हृदय म बदलाव लाइन अउ ओ मन एके झंडा के तरी सकला के भारत माता के वंदना म सामिल होए लगिन। उमन जनता ल राष्‍ट्रीय चरित्र के अइसन शिक्षा दीन जऊन संभवतः कोनो मुनिसपल कमेटी के अध्यक्ष कोति ले आज तक नइ दे गए होही।



ओ मन एक अच्छा शिक्षा शास्त्री घलोक रहिन। छड़ी हाथ म लेके टहलत रहंय त अचानक कोनो स्कूल म अऊ कोनो क्लास म चल देत रहिन अऊ जऊन विसय के पीरियड होतिस, पढ़ाए लगत रहिन। हिन्दी, अंगरेजी, संस्कृत अउ इतिहास के विद्वान त उमन रहिन, कठिन ले कठिन गणित के सवाल के हल ओ मन कुछ समय म ही कर देवत रहिन। पढ़ाए के शैली घलोक उंखर आकर्सक रहिस। कोनो स्कूल म अचानक पहुंच जाय ले शिक्षक मन म बड़ प्रभाव परय। ओ मन हमेसा सजग रहंय कि ठाकुर साहब कब उंखर शाला म आ जहीं। इही बात आन विभाग मन के कर्मचारी मन बर घलोक लागू होत रहिस। मुनिसपल कमेटी के कर्मचारी मन म जऊन अनुशासन अऊ कर्त्तव्यनिष्ठा ओ समय रहिस, ओखर प्रमुख कारन ठाकुर साहब के औचक जांच ह रहिस। शहर म ओ मन अक्सर पैदल घूमत रहिन। रात के बारा एक बजे घलोक 4 मील दूरिहा नल घर के निरीक्षण करे बर पैदल ही रेंग देत रहिन। माननीय महंत श्री लक्ष्मनारायण दास जी ह ठाकुर साहब के विसय म लिखे रहिन ’सन् 1933 ले मैं ह ये बराबर अनुभव करे हंव कि रायपुर ल उपर उठइया अऊ आगू बढइया कोनो हे त सिरिफ ठाकुर प्यारेलाल सिंह ही हे। ऊंखर सिवाय अतका त्याग करइया कोनो नइ रहिन।’

य े सब करे के बाद घलव ठाकुर प्‍यारे लाल के शासन संग मतभेद रहिस। ये मतभेद के पीछू शासन के कारिंदा मन के चाल रहिस। सरकार के कारिंदा मन चाहत रहिन कि मुनिसपल कमेटी अपन बिजली व्यवस्था बेच दय। फेर ठाकुर साहब एखर विरोधी रहिन। ओ मन प्रजातंत्र अऊ सत्ता के विकेन्द्रीकरण म विश्वास करत रहिन। बिजली व्यवस्था मुनिसपल कमेटी के हाथ ले निकाल के शासन ल सौंप देहे के मतलब रहिस, प्रकाश व्यवस्था बर नगर ल दूसर के मुंह ताके ल परय, अऊ शासन कोति ले जउन टेक्स बढ़ाए जाये ओला चुपचाप जनता सहत रहय। दुसर बात मुनिसपल कमेटी के हाथ म बिजली व्यवस्था होए ले मुनिसपल ल हर साल 25,000 रूपिया के आमदनी तको होत रहिस। ए आमदनी ल अऊ बढाए जा सकत रहिस। ओ समय बिजली व्यवस्था जनता के प्रतिनिधि मन कोति ले संचालित होत रहिस। बिजली बेचे के मतलब रहिस प्रजातंत्र के सिद्धांत ले विलग होना। ये खातिर उमन बिजली व्यवस्था शासन ल सौंपे ले इंकार कर दीन। एखर से शासन ठाकुर साहब ले नाराज हो गीस।



शासन के आरोप येहू रहिस कि मुनिसपल कमेटी के आर्थिक व्यवस्था ठीक नइ हे। ठाकुर साहब ह एकर घलोक समाधान कारक उत्तर दीन। उमन लिखिन कि ऊंखर रहत कम समय म ही रायपुर मुनिसपल कमेटी के डेढ लाख के जुन्ना करजा अदा करे गए हे। गुढियारी ल कमेटी म लेके 50 हजार सालाना आमदनी बढाए गए हे, जम्मो जुन्ना दबे टैक्स के रकम वसूल हो गए हे, अइसे म ये आरोप लगाना अन्यायपूर्ण हे।

असल बात तो ये रहिस कि ठाकुर साहब ह गंज व्यापारी मन ल नाराज कर दे रहिन। उंखर नाराजगी के कारन ये रहिस कि आक्ट्राय नियम के अनुसार अनाज के टैक्स नाका म ही पटाए जाना चाही। फेर व्यापारी मन नाकेदार संग मिल के बिना नाका महसूल पटाए गंज म गाड़ीं ले आत रहिन। गंज म मनगरजी महसूल देवत रहिन नइ तो नइ देवत घलव रहिन। ए प्रकार के भ्रष्टाचार के जानकारी जब ठाकुर साहब ल मालूम चलिस त उमन नाकेच म महसूल वसूले के हुक्म दीन, अऊ ये नियम बना दीन कि जऊन व्यापारी महसूल पटाही उही ह सामान गंज ले जा पाही। ए निर्णय के विरोध म व्यापारी मन ह हड़ताल घलोक करिन, फेर नियम हटाए नइ गीस। एखर से मुनिसपल कमेटी के राजस्व आय करीबन दू लाख्र रूपिया बाढ़ गीस। व्यापारी मन शासन से शिकायत करिन त शासन ह मुनिसपल कमेटी ल भंग कर दीस।

ठाकुर साहब के मुनिसपल कमेटी ल भंग करे के एक अऊ कारन रहिस वो ये कि रायपुर म्युनिसिफल कमेटी के अंतर्गत जऊन तीर तार के गांव जइसे टिकरापारा, कुशालपुर, डंगनिया, चिरहुलडीह, फाफाडीह, राजा तालाब आदि सामिल करे गए रहिस, ऊंखर किसान अऊ बसुंदरा मनखे मन के बस्ती के जमीन म वो मनखे मन के कोनो अधिकार नइ रहिस। ठाकुर साहब ओ जमीन म उंखर अधिकार देहे के बात करंय। ठाकुर साहब के ए बात ले ओ गांव के मालगुजार मन उंखर ले नाराज हो गए रहिन। ए मालगुजार मन म ले कुछ मुनिसपल के सदस्य घलोक रहिन। उमन घलोक कमेटी ल भंग करे म ठाकुर साहब के बिरोध म शासन ल सहयोग करिन। ए प्रकार कमेटी भंग हो गीस, फेर ठाकुर साहब के ओखर से कुछ नइ बिगड़िस। एखर उलटा जनता के हृदय म ठाकुर साहब बर सम्मान अउ बाढ़ गीस।

संजीव तिवारी
संदर्भ : त्‍यागमूर्ति ठा.प्‍यारेलाल – हरि ठाकुर
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सुरता सुशील यदु

सहज, सरल, मिलनसार अउ मृदुभाषी व्यक्तित्व के धनी सुशील यदु जी के पिता के नाम स्व.खोरबाहरा राम यदु रहिस । एम.एम. (हिन्दी साहित्य) तक शिक्षा प्राप्त यदु जी प्राइमरी स्कूल म हेड मास्टर के पद रहिन । छत्तीसगढ राज बने के पहिली ले छत्तीसगढी भाखा ल स्थापित करे के जडन आंदोलन चलिस ओमा सुशील यदु के नाम अग्रिम पंक्ति म गिने जाथे । छत्तीसगढी भाखा अउ साहित्य के उत्थान खातिर हर बछर छ.ग. म बडे-बडे आयोजन करना जेमा प्रदेश भर के 400-500 साहित्यकार ल सकेलना, भोजन पानी के व्यवस्था करना असन काम केवल सुशील यदु ही कर सकत रहिन छत्तीसगढी कवि सम्मलेन के लोकप्रिय हास्य व्यंग्य कवि के रूप मा उन विख्यात रहिन । छत्तीसगढी के उत्थान खातिर अपन पूरा जीवन खपा दिन अउ अंतिम साँस तक तक भाखा ल स्थापित करे खातिर हर उदीम करिन ।

सन् 1981 म जब उन प्रांतीय छत्तीसगढी साहित्य समिति के स्थापना करिन त वो बखत कोनो नइ सोचे रहिन होही कि संस्था ह एक दिन आंदोलन के रूप ले लेही । आज ये संस्था ह छ.ग. राज के लगभग 18 जिला म छत्तीसगढी के विकास बर श्री यदु के बाना बिंधना ल उठाय काम करत हे । लगभग 700 साहित्यकार, कलाकार,संस्कृति कर्मी मन ये संस्था ले जुडे हवय। सन 1994 म प्रथम प्रांतीय सम्मेलन के आयोजन होईस जङडन आज पर्यप्न्त तक जारी हे । सन् 2007 में छत्तीसगढी साहित्य समिति के रजत जयंती बरिस रहिस प्रांतीय समिति के द्वारा उठाय कदम ह क्रांतिकारी रहिस छत्तीसगढ के छोटे से ले के बड्का-बड्का साहित्यकार मन घलो येमा जुडिन । हर बछर लगभग 8 सम्मान अलग-अलग क्षेत्र में उपलब्धि हासिल करने वाला मन ल देवत आत हे । अब तब छत्तीसगढ के सैंकडो हस्ती सम्मानित हो चुके हवय जेमा साहित्कार, लोक कलाकार,खिलाडी,फिल्मी कलाकार मन शामिल हवय । छत्तीसगढ के लगभग सबो बडका साहित्यकार अउ लोक कलाकार के सम्मान सुशील यदु जी अपन संस्था के माध्यम ले करिन ।

महिला साहित्यकार मन ल बरोबर प्रतिनिधित्व देना श्री यदु जी के खासियत रहिन । उँकर प्रांतीय साहित्य समिति के वार्षिक आयोजन के लोकप्रियता के अंदाजा आप इही बात ले लगा सकथव कि साहित्यकार मन ला साल भर येकर अगोरा रहय कि ये बछर कोन तारीख के अउ कोन जघा येकर आयोजन होही । छत्तीसगढ राज्य निर्माण संघर्ष समिति म स्व.हरि ठाकुर के संग जुड के आंदोलन ल गति दे के काम यदु जी करिन । छ.ग.राज बने के बाद छत्तीसगढी ल राजभाषा बनाये खातिर कई बार प्रांतीय सम्मेलन के माध्यम से आवाज ल सरकार तक पहुँचाइन । राजभाषा बने के बाद भी उँमन बइठ के नई रहिन अउ छत्तीसगढी ल राजकाज के भाखा बनाये बर आजीवन प्रयासरत रहिन ।

छत्तीसगढी म उन कालजयी गीत भी उन लिखिन,जेमा कुछ के तो आडियो, विडियो भी बने हवय अउ फिल्म म भी आ चुके हवय । ओकर लिखे गीत अउ हास्य बियंग कविता के छाप आज भी जनमानस मा देखे जा सकथे । रायपुर के दूधाधारी मठ हा उँकर कई बडे आयोजन के साक्षी बनिस । कवि सम्मेलन के मंच म – घोलघोला बिना मंगलू नइ नाचय, अल्ला अल्ला हरे-हरे, होर्तेव कहूँ कुकुर, नाम बडे दरसन छोटे, कौरव पांडव के परीक्षा जइसन हास्य बियंग रचना ले उन खूब वाहवाही लूटिन।

सन् 1993 ले 2002 तक दैनिक नवभारत म छत्तीसगढी स्तंभ “लोकरंग” के लोकप्रिय लेखक रहिन । लोकरंग के माध्यम ले उन छत्तीसगढी के साहित्यकार अउ लोक कलाकार मन ल सामने लाय के काम करिन । आकाशवाणी अउ दूरर्शन ले बेरा-बेरा म उँकर कविता,अडउ परिचर्चा के प्रसारण होवत रहय ।

सुशील यदु जी अपन संपादन में वरिष्ठ अड अभावग्रस्त साहित्यकार मन के किताब के प्रकाशन करिन जेमा- श्री हेमनाथ यदु, बद्रीबिशाल परमानंद रंगू प्रसाद नामदेव, लखनलाल गुप्त, उधोराम झकमार, हरि ठाकुर, केशव दुबे, रामप्रसाद कोसरिया प्रमुख हे । अपन संपादन में छत्तीसगढी साहित्य समिति के द्वारा अब तक कुल 15 पुस्तक के प्रकाशन सुशील यदु जी करिन जउन में- 1. हेमनाथ यदु के व्यक्तित्व अड कृतित्व, 1. बनफुलवा 3. पिंबरी लिखे तोर भाग, 4. छत्तीसगढ के सुराजी बीर काव्य गाथा 5.बगरे मोती 6. हपट परे तो हर हर गंगे 7. सतनाम के बिरवा 8. छत्तीसगढी बाल नाटक 9. लोकरंग भाग-एक 10. लोकरंग भाग-दो, 11. घोलघोला बिना मंगलू नई नाचय, 12- ररूहा सपनायेदार भात, 13. अमृत कलश, 14. माटी के मया हे 15. हरियर आमा घन 16. सुरता राखे रा सँगवारी हवय ।

छत्तीसगढी के दिवंगत साहित्यकार मन ल स्मरण करे खातिर उमन “सुरता कडी के शुरूआत करिन जेमा- सुरता हेमनाथ यदु, सुरता भगवती सेन,सुरता डॉ.नरेन्द्र देव वर्मा, सुरता हरि ठाकुर, सुरता कोदूराम दलित, सुरता केदार यादव, बद्रीबिशाल,गनपत साव, मोतीलाल त्रिपाठी मन ल सुरता करे के प्रसंशनीय अउ अनुकरणीय कार्य प्रांतीय साहित्य सामिति के माध्य से करिन । प्रांतीय स्तर म बडे-बडे छत्तीसगढी कवि सम्मेलन के आयोजन करे के श्रेय भी यदु जी ला जाथे |यदु जी के अब तक स्वयं के 5 कृति आ चुके हवय । वर्ष 2014 में प्रकाशित उँकर कृति हरियर आमा घन (सन 1982 ले 2012 तक लिखे उँकर गीत और बियंग कविता के कुल 51 रचना के संग्रह ) प्रकाशित होईस जउन खूब लोकप्रिय होईस ।

कार्यक्रम आयोजन अउ संयोजन के गजब के क्षमता यदु जी म देखे बर मिलिस । उँकर संग मैं लगभग 18 बछर रहेंव,कई घव उन कहय कि अब येती आघू के काम ल तुम युवा मन ला करना हे तब ये कभू भी नइ सोंचे रहेंब कि अतका जल्दी उन सँग छोड के चल देही । उँकर अगुवई म छत्तीसगढी साहित्य समिति के अंतिम प्रांतीय सम्मेलन 14-15 जनवरी 2017 के तिल्दा म होय रहिस । कतकोन साहित्यकार इही बात ल घेरी भेरी सुरता करथे कि उन ल का मालूम रहिस कि ये सम्मेलन उँकर जीवन के आखिर प्रांतीय सम्मेलन होही । जीवन के अंतिम समय म 5-6 दिन उन आईसीयू म रहिन उँहा ले छुट्टी हो के घर आगे रहिन फेर नियति के लेखा ल कोन टार सकथे । 23/09/2017 के रतिहा 9:30 बजे संदेशा मिलिस कि उन नई रहिन । थोरिक देर बर मोर हॉथ पाँव सुन्न होगे । अइटसन व्यक्तित्व के सुरता हा रहि-रहि के आथे अउ नजरे नजर म झूलथे ।

सुशील यदु जी के नाम ह लोक साहित्य,लोक कला अउ लोक संस्कृति के पर्याय बनगे रहिस हवय । उँकर जाय ले छत्तीसगढी भाखा के उत्थान बर रेंगइया,लडईया,जुझईया,दिन-रात एक करईया के एक जुग समाप्त होगे । छत्तीसगढी ल स्थापित करे दौर म उँकर जाना अपूरणीय क्षति आय ।

अजय ‘ अमृतांशु”
भाटापारा

 

मोर संग चलव रे ..

पं. दीनदयाल उपाध्याय : व्यक्तित्व अउ कृतित्व
– संजीव तिवारी

जनम अउ शिक्षा
कभू-कभू धरती के जनमानस ल नवा दिशा देहे अऊ जुग बलदे के उदीम ल पूरा करे बर युग पुरूष मन के जनम होथे। ओ मन संकट के समय म जनम लेहे के बाद घलोक अपन जनमजात चमत्कारिक प्रतिभा ले बड़े ले बडे़ काम पूरा करके अन्तरध्यान हो जाथें। बीसवीं शताब्दी के सुरू म भारतीय क्षितिज म कुछ अइसनहे जाज्ज्वल्यमान नक्षत्र मन के उदय होइस। जेमन अपन प्रकाश ले भारत वसुन्धरा ल आलोकित कर दीन। ए काल खण्ड म दू प्रकार के व्यक्तित्व मन के दर्शन होइस, एक तो ओ मन जऊन पाश्चात्य जगत ले शिक्षा दीक्षा प्राप्त करके आइन अऊ उहां के भोगवादी संस्कृति के आकर्षण ले कुछ करे ल लालायित रहिन। दुसर तरफ कुछ अइसन मनखे के भारत के धरा म आगमन होइस जऊन पस्चिमी जगत के वैभव वाले भोगवादी संस्कृति ल नकारत भारतीय संस्कृति ल नवा आयाम देहे म जुट गइन, काबर कि उंखर विश्वास रहिस कि गुलामी के सेती भारतीय सनातन ज्ञान परम्‍परा ला खतम करे के षडयन्त्र रचे गए हे।
स्वामी विवेकानंद अऊ महर्षि अरविन्द के गौरवशाली भारतीय परम्परा ल आगू बढइया प्रखर राष्ट्रभक्ति के अलख जगइया बहुमुखी प्रतिभा के धनी ‘एकात्म मानव वाद’ के प्रणेता महामानव पं. दीनदयाल जी उपाध्याय के जनम 25 सितम्बर 1916 (विक्रम सम्बत 1973, शालिवाहन शक 1938, भाद्रपद अश्विन कृष्ण 13) सोमवार के दिन राजस्थान प्रान्त के जयपुर-अजमेर रेलवे लाइन म स्थित ’धनकिया’ नाम के रेलवे स्टेशन म होय रहिस। पं दीनदयाल जी के नाना पं. चुन्नीलाल जी शुक्ल ’धनकिया’ म स्टेशन मास्टर रहिन। इखंर जनम के समय इंखर माता जी अपन पिता तिर ’धनकिया’ म ही रहत रहिन।
पं. दीनदयाल जी के पूर्वज मथुरा जिला के आगरा मथुरा मार्ग म स्थित ’फरह’ कस्बा ले एक किलोमीटर पिछौत म ’नगला चन्द्रभान’ नाम के गांव म रहत रहिन जिहां दुर्भाग्य ले पण्डित जी कभू नइ रह सकिन। पं. दीनदयाल जी के आजाबबा पं. हरीराम जी शास्त्री अपन क्षेत्र के प्रसिद्ध ज्योतिषी रहिन। शास्त्री जी अपन भाई श्री झण्डूलाल जी भतीजा शंकर अऊ वंशीलाल पुत्र भूदेव, रामप्रसाद अउ प्यारेलाल के संग ए छोट कन गांव म रहत रहिन। पं. हरीराम जी शास्त्री के मृत्यु के पाछू ए कुटुंब म मौत के अइसन सिलसिला सुरू होइस कि पूरा कुटुंब के पुरुष सदस्य मन के कुछु ना कुछु कारन ले मौत होए लगिस। पूरा कुटुंब म सिरिफ विधवां मन भर बांचे रहि गीन, जिंकर जीवन के अधार पं.रामप्रसाद जी के एक मात्र पुत्र भगवती प्रसाद रहिन। भगवती प्रसाद पढ़ लिख के बडे़ होइन अऊ धर्मपरायण श्रीमती रामप्यारी ले उंखर बिहाव होइस। आर्थिक चिन्ता ले बिवश होके ओ मन ल रेलवे म नौकरी करना परिस। उमन उत्तर प्रदेश के जलेसर रोड रेलवे स्टेशन म स्टेशन मास्टर के पद म काम करे लगिन। पूरा कुटुंब के खरचा अउ छोट कन नौकरी, पुरत नई सहिस तेकर सेती भारी पांव के अपन धर्मपत्नी श्रीमती रामप्यारी ल ऊंखर पिता श्री चुन्नीलाल जी तीर ’धनकिया’ (राजस्थान) भेज दीन। अउ पं. दीनदयाल जी के जनम उन्‍हें ’धनकिया’ म होइस। नाना घर म जनम होए के सेती पंडि़त जी ल अपन ननिहाल ले गहरा सम्बन्ध रहिस।
कुछ दिन के बाद पंडि़त जी के माता श्रीमती रामप्यारी अपन पति तिर वापस आ गइन अऊ दू साल के बाद दूसर पुत्र ल जनम दीन जेखर नाम शिवदयाल रखे गीस। पं. दीनदयाल जी के बचपन के नाम “दीना“ अउ शिवदयाल के “शीबू“ रहिस। शिवदयाल के जनम के छः महिना बाद मने पं. दीनदयाल जी के जनम के ढाई साल बादेच इखंर पिता श्री भगवती प्रसाद जी उपाध्याय के निधन हो गीस। दुनों भाई माँ के संग फेर नाना तीर रहे लागिन। पण्डित जी छै साल के रहिस होही उही समें उंखर माता श्रीमती रामप्यारी क्षयरोग बिमारी के कारन स्वर्ग सिधार गइन।
“दीना“ सही म “दीना“ (अनाथ) रहि गीस। पं. दीनदयाल जी के पारिवारिक जीवन अड़बड़ दुःखमय रहिस। बचपन ले उंमन अपन मयारू मन के मृत्यु के दुख ल सरलग सहत आइन। ओ मन कभू अपन पैतृक निवास म नइ रह पाइन। पारिवारिक कारन से उंखर लइकई नाना चुन्नीलाल के संग धनकिया म बीतिस। ढ़ाई बछर के रहिन उही समे उंखर ऊंखर पिताजी के देहान्त हो गए। थेरकेच दिन म विधवा अउ दुखी मां रामप्यारी क्षयरोग ले ग्रस्त गीन अऊ सरग सिधार दीन। वो समें पं. दीनदयाल जी ल छै-सातेच साल के रहिन, दीनदयाल ल माता पिता दुनों के मया नइ मिल पाइस।
एकर पाछू पं. दीनदयाल जी के नाना पं. चुन्नीलाल जी शुक्ल नौकरी छोड़ के “दीना“ अऊ “’शीबू“ के संग अपन गांव ’गुड के मडई’ आगरा चले आइन। ’गुड के मडई’ आगरा जिला म फतेहपुर सीकरी तीर स्थित छोटकुन गांव रहिस। इहीं गांव पं. दीनदयाल जी के सही ननिहाल रहिस पण्डित जी के उम्मर अभी 9 साल रहिस कि ऊंखर पालक नाना श्री चुन्नीलाल जी शुक्ल सितम्बर 1925 म स्वर्ग सिधार गइन। पिता, माता अउ नाना के मया टुटे लइका मन अपन ममा श्री राधारमण शुक्ल के कोरा म पले लगिन। श्री राधारमण शुक्ल गंगापुर म सहायक स्टेशन मास्टर रहिन।
पं. दीनदयाल जी सन् 1925 म अपन मामा श्री राधा रमण शुक्ल के संग गंगापुर सिटी चल दीन इन्हें उंखर पढ़ई सुरू होइस। कक्षा चार तक के पढ़ई उमन गंगापुर म करिन, आगू के पढ़ई के व्यवस्था इन्‍हां नइ होए के सेति इंखर मामाजी ह ’दीना’ ल आगू के पढाई बर कोटा (राजस्थान) भेज दीन। उहां उंखर ’सेल्फ सपोर्टिंग हाउस’ म रहे के व्यवस्था कर दीन। इन्हें दीना ह स्वावलम्बन के पाठ सिखिस। तीन साल के कडा़ मेहनत के बाद उमन मिडिल (कक्षा-7) के परीक्षा पहिली श्रेणी म उत्तीर्ण करिन। पं. दीनदयाल जी जब कक्षा 7 म पढत रहिन उही समें सन् 1930 म ऊंखर पितातुल्य मामा श्री राधारमण शुक्ल के घलोक देहान्त हो गीस। पंडि़त जी के उमर वो समें पन्द्रा साल के रहिस, अब पिता के घर अउ ममा के घर दुनों जघा म परिवार के पुरूष सियान मन सिरा गींन। पिता के घर म दू दादी बांचे रहिन अऊ इहां नानी मामी, आघू के पढ़ई उंखर बर अब समस्‍या होगे। पण्डित जी के मामा श्री राधारमण शुक्ल के चचेरा भाई श्री नारायण जी शुक्ल ’राजगढ’ जिला अलवर म स्टेशन मास्टर रहिन। पण्डित जी के आघू के पढ़ई बर उंमन आश्रय देहे ल तइयार हो गइन। पंडि़त जी सन् 1932 म राजगढ चल दीन। इहां ’दीना’ ह दू साल बिताइन अउ आघू के परीक्षा पास करिन। पं. दीनदयाल जी अपन पढ़ई म अतिक प्रतिभा वाले रहिन कि जब ओ मन कक्षा नौ म पढत रहिन त कक्षा दस के पढ़ईया लईका घलोक उंखर ले गणित के सवाल हल करवावंय।
जब दीनदयाल जी कक्षा नौ म पढत रहिन ओ मन अट्ठारा साल के रहिन कि छोटे भाई शिवदयाल टाइफाइड बिमारी ले पीडि़त हो गीस। लाख उदीम के बाद दीनदयाल जी शीबू ल नइ बचा पाइन। दीनदयाल जी शीबू के मृत्यु ले अत्यन्त विचलित हो उठिन, जिंकर सुरता जीवन म कभू नइ भुला पाइन। अभी तक पं. दीनदयाल जी ह अपन पालक मन के सरलग मृत्यु के दुःख सहन करे रहिन, फेर 7 नवम्बर सन् ।934 को ऊंखर पालित छोटे भाई शीबू के देहान्त ह ओ मन ल अन्दर ले झकझोर दीस। सन 1934 म श्री नारायण शुक्ल (मामा) के स्थानान्तरण ’सीकर’ होए के कारण दीनदयाल जी ऊंखर संग ’सीकर’ आ गईन अऊ महाराजा कल्याण सिंह हाईस्कूल म प्रवेश ले लीन। उन्नीस साल के आयु म सन् 1935 म पण्डित जी अजमेर बोर्ड म पहिली नम्‍बर ले पास होइन, पूरा बोर्ड म उंखर नम्‍बर सबले जादा रहिस।
ये बात ले प्रभावित होके सीकर के महाराज कल्याण सिंह ह उमन ल स्वर्ण पदक ले सम्मानित करिन अऊ आघू के पढ़ई बर ।0 रुपये महिना छात्रवृत्ति अउ 250 रुपया के एक मुश्त आर्थिक सहायता प्रदान दीन। दूसर स्वर्ण पदक अजमेर बोर्ड कोति ले ओ मन ल प्रदान करे गीस। उमन इण्टरमीडियेट के पढाई बर सन् 1935 म ’पिलानी’ (राजस्थान) आ गंय। वो समें पिलानी उच्‍च शिक्षा के प्रसिद्ध केन्द्र रहिस, उमन पिलानी के बिडला इण्टर कालेज म प्रवेश ले लीन। सन् 1937 म इमन इण्टरमीडियेट बोर्ड के परीक्षा म बईठिन अऊ न केवल समस्त बोर्ड म सर्वप्रथम रहिन वरन सब विषय म विशेष योग्यता अंक प्राप्त करे रहिन। बिडला कालेज के ये पहिली छात्र रहिन जऊन हर अतिक सम्मानजनक नम्‍बर ले परीक्षा पास करे रहिन। सीकर महाराज के जइसे घनश्याम दास बिडला ह पंडित जी ल स्वर्ण पदक अउ ।0/- रुपया मासिक छात्रवृत्ति अउ पुस्तक बिसाए बर 250/- रुपया प्रदान करिन। बी.ए. के पढ़ई करे बर सन् 1937 म दीनदयाल जी पिलानी ले कानपुर आइन अऊ एस.डी. (सनातन धर्म) कालेज म प्रवेश लीन।
इहां पढ़त समें उंखर संग श्री बलवन्त जी महाशिन्दे अऊ श्री सुन्दर सिंह भण्डारी घलव पढ़त रहिन। इमन ह पंडि़त जी ल मा. भाऊसाहब देवरस ले मुलाकात करवाइन। देवरस जी पंडि़त जी के प्रतिभा के कायल रहिन उमन पंडि़त जी ल राष्ट्रीय स्‍वयं सेवक संघ म स्‍वयं सेवक बने ल प्रेरित करिन। पंडि़त जी शाखा म सरलग जाए लगिन अउ बौद्धिक क्रियाकलाप मन म आघू बढ़ के हिस्‍सा ले लगिन। बाबा साहब आमटे, दादा राव समर्थ इंखर छात्रावासे च म रूकत रहिन। स्वतन्त्र्य वीर सावरकर ह दीनदयाल जी के शाखा म अपन बौद्धिक देवंय। वेदमूर्ति पण्डित सातवलेकर जी कानपुर के शाखा म जब आइन अऊ पं. दीनदयाल उपाध्याय से मिलिन। पण्डित सातवलेकर जी शाखा म दीनदयाल के बारे म भविष्य वाणी करिन कि कोनो दिन बड़े होके ये कुशाग्र बालक देश के गौरव बनही। कानपुरेच म पण्डित जी के सम्बन्ध श्री बापूराव जी मोघे, श्री भइयाजी सहस्‍त्र बुद्धे, श्री नानाजी देशमुख अउ बापूराव जोशी जइसे राष्ट्रीय स्‍वयं सेवक संघ के कार्यकर्ता मन ले होइस। इहिंचे उंखर भेंट संघ के संस्थापक परमृपूज्य डा. केशवराव बलिराम हेडगेवार ले घलव होइस। इही मेर ले पंडि़त जी के सार्वजनिक जीवन म प्रवेश हो गीस। उही समें कमजोर पिछड़ा पढ़ईया लईका मन के पढ़ई के बढ़ोतरी बर उमन एक ’जीरों क्लब’ के स्थापना करिन जेखर उद्देश्य परीक्षा म शुन्य अंक पवइया छात्र मन ल आन छात्र के समकक्ष लाना रहिस। दीनदयाल जी ओ लइका मन मन ल खुदे पढा-लिखाके अतका समर्थ बना देवत रहिन कि ओ कमजोर लइका मन परीक्षा म उत्तीर्ण हो जात रहिन। एखर से विद्यार्थी समाज म पंडि़त जी के लोकप्रियता अऊ व्यापक हो गीस। सन् 1930 म पण्डित जी ह पहिली श्रेणी म बी.ए. के परीक्षा पास करिन। एम.ए. अंगरेजी साहित्‍य के शिक्षा बर आगरा के सेन्ट जॉन्स कालेज म उमन प्रवेश लीन। सन् 1940 म एम.ए. पहिली साल के परीक्षा म पहिली श्रेणी के अंक प्राप्त करिन। इहां वो राजा के मण्डी म किराया के मकान ’रत्ना बिंल्डिंग’ म रहत रहिन। इही समय उंखर एक ममेरी बहिनी रामादेवी बहुत बीमार हो गीस, वो ह इलाज कराए बर आगरा आइस। दीनदयाल जी अपन बिमार बहिन के सेवा करे म व्यस्त रहे लगिन। ए बखत उमन तीन काम एक संग करत रहिन, पढ़ई, संघ के काम अऊ बहिनी के सेवा। एम.ए॰ दूसर साल के परीक्षा लकठियाए रहिस ऊंखर आघू धरमसंकट रहिस कि परीक्षा के तइयारी करंव के बहिन के तीमारदारी करंव? बहिनी के तकलीफ ल देख के पंडि़त जी किताब-पोथी एक कोति रख के जादा बेरा अपन बहिनी के सेवा-दवई अउ इलाज कराए म लगाए लगिन। पंडि़त जी बहिनी के सेवा म रातदिन एक कर दीन, सब उदीम करिन, प्राकृतिक चिकित्सा बर उमन ल पहाड म तको ले गइन फेर रामादेवी नइ बांचिस। ए सब के सेती पंडि़त जी एम.ए॰ उत्तर्राद्ध के परीक्षा म नइ बइठ पाइन। परीक्षा नइ देहे के सेती सीकर अऊ बिडला के दुनों छात्रवृत्ति मन बन्द हो गंय। ममा जी के आग्रह म पंडित जी एक पइत प्रशासनिक परीक्षा म घलोक बइठिन ओमा पास तको होइन फेर ए नौकरी ल ठुकरा के बी. टी. करे बर प्रयाग (इलाहाबाद) चल दीन। सन् 1942 म उमन बी.टी. के परीक्षा पहिली श्रेणी म उत्तीर्ण करिन।
एखर बाद उंखर प्रवेश सार्वजनिक जीवन म हो गीस अउ ओ मन अखण्ड प्रवासी हो गीन। मत्यु ह ऊंखर शिशु किशोर, बाल अउ युवा मन म सरलग आघात करे रहिस तेकर सेती ऊंखर मन म वैराग्य उत्पन्न होगए। उमन नवा-नवा जघा मन म प्रवास करना अउ नवा-नवा अपरिचित मनखे मन ले मिलना, उंखर मन म पारिवारिकता उत्पन्न करना उमन बचपन के ल ही सीखे रहिन, पूरा राष्ट्र उंखर घर-परिवार रहिस। सन् 1942 म राष्ट्रीय स्‍वयं सेवक संघ के लखीमपुर जिला के प्रचारक नियुक्त होके राष्ट्र के कारज बर कटिबद्ध हो गइन। सरलग प्रवास अऊ संगठन के काम म देश के कोना-कोना म लाखों स्‍वयं सेवक मन ले मधुर स्नेहपूर्ण आत्मीय सम्बन्ध के स्थापना ही ह पण्डित जी के एकेच काम रहिस। संघ के विचारधारा ले ओतप्रोत पण्डित जी ह संघ काज अपन जीवन म उतार लीन अऊ इन्‍हें ले ऊंखर सार्वजनिक जीवन के श्रीगणेश होइस।

पुस्‍तक अंश…
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सुरता : डॉ. विमल कुमार पाठक

डॉ. विमल कुमार पाठक सिरिफ एक साहित्यकार नइ रहिन। उमन अपन जिंदगी म आकाशवाणी म उद्घोषक, मजदूर नेता, कॉलेज म प्रोफेसर, भिलाई स्टील प्लांट म कर्मचारी, पत्रकार अउ कला मर्मज्ञ संग बहुत अकन जवाबदारी निभाईन। आकाशवाणी रायपुर के शुरुआती दौर म उंखर पहिचान सुगंधी भैया के रूप म रहिस अउम केसरी प्रसाद बाजपेई उर्फ बरसाती भैया के संग मिलके किसान भाइ मन बर चौपाल कार्यक्रम देवत रहिन। एखर ले हटके एक किस्सा उमन बताए रहिन -27 मई 1964 के दिन आकाशवाणी रायपुर म वोमन ड्यूटी म रहिन अउ श्रोता मन बर सितार वादन के प्रसारण जारी रहिस। कान म लगे माइक्रोफोन म एक म सितार वादन सुनत रहिन तो दूसरा ह दिल्ली ले जुड़े रहिस। एती सितार वादन के रिकार्ड बजते रहिस के अचानक माइक्रोफोन म दिल्ली ले सूचना आईस कि ”हमारे देश के प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू का निधन हो गया।” तब के बरेा ओ मुश्किल हालात ल उमन कइसन अपन आप ल संभालिन अउ सितार वादन बंद करके नेहरूजी के निधन के सूचना देत श्रोता मन ल दिल्ली स्‍टेशन ले जोडि़न, ये प्रसारण जगत बर एक केस स्टडी हो सकत हावय।
एक दौर म डॉ. पाठक छत्तीसगढ राज्‍य आंदोलन के तहत भिलाई स्टील प्लांट म स्थानीय लोगन मन ल नौकरी म प्राथमिकता देहे बर बेहद मुखर रहिन, तब ओ मन पत्रकारिता घलोक करत रहिन अउ भिलाई स्टील प्लांट के परमानेंट मुलाजिम घलोक हो गे रहिन। दिन म नौकरी के बेरा अपन अफसर मन के हुकुम मानय अउ नौकरी के बाद ओही अफसर मन के घर मजदूर मन ल ले जाके धरना प्रदर्शन घलोक करवावंय अउ फेर ओखर खबर घलोक अपन अखबार म छापंय। ये अउ मजे के बात के अपन अखबार बर विज्ञापन घलोक भिलाई स्टील प्लांट से लेवंय। आज शायद एके मनखे अतेक ‘रोल’ एके संग नइ निभा पावंय।

भिलाई स्टील प्लांट के छत्तीसगढ़ी लोक कला महोत्सव के शुरूआत करे ले लेके ओला ऊंचाई देहे वाले तिकड़ी म रमाशंकर तिवारी, दानेश्वर शर्मा के संग तीसर सदस्य डॉ. पाठक रहिन। साहित्यकार के तौर म उंखर कलम हमेशा जीवंत रहिस। भिलाई इस्पात संयंत्र के नौकरी के संग उमन यश घलोक खूब कमाइन तो कई बार आलोचना के घेरे म घलोक रहिन। खास कर श्याम बेनेगल के धारावाहिक ”भारत एक खोज” म पंडवानी सुनात तीजन बाई के दृश्य म मंजीरा बजात बइठे म समकालीन लोगन मन हर उखर उपर कई सवाल उछाले रहिन।

बीते डेढ़ दशक म लगातार गिरत सेहत के बावजूद हमर जइसे पत्रकार मन ल ‘खुराक’ देहे बर उन हमेशा तैयार रहंय। पूरा हिंदोस्तान के बहुत से चर्चित हस्ति म न के संग ऊंखर कई अविस्मरणीय संस्मरण रहिस। हाल के कुछ दिन मन म उंखर सेहत लगातार गिरत रहीस। अब ऊंखर गुजरे के खबर आईस। जइसे उमन खुदे बताए रहिन कि उंखर अतीत आपाधापी ले भरे अउ संघर्षमय रहिस अउ बाद के दिन मन म उमन नाम-वैभव खूब कमाइन। फेर हकीकत ये हावय कि ए सब म भारी उंखर बेहद तकलीफदेह बुढ़ापा रहिस।

पहली तस्वीर कल्याण कॉलेज सेक्टर-7 म हिंदी के प्रोफेसर रहे डॉ. पाठक (बाएं से तीसर) के तत्कालीन सांसद मोहनलाल बाकलीवाल अउ कॉलेज कुटुंब के संग के हावय अउ दुसर तस्वीर सुपेला रामनगर म ओ जगह के हावय, जिहां आज शासकीय इंदिरा गांधी उच्चतर माध्यमिक शाला हावय। 1967 म उहां एक निजी स्कूल चलत रहिस अउ ”वक्त” फिल्म के सुपरहिट होए के ठीक बाद बलराज साहनी अपन जोहरा जबीं (अचला सचदेव) के संग भिलाई स्टील प्लांट के कार्यक्रम म आए रहिन। निजी स्कूल के बुजुर्ग संचालक हर पत्रकार विमल पाठक के माध्यम ले अनुरोध भिजवाइन त बलराज साहनी टाल नइ सकिन अउ अगले भिनसरहा बच्चा मन बर मिठाई अउ तोहफा लेके स्कूल आ पहुंचिन। तस्वीर म बलराज साहनी के पीछू अचला सचदेव अउ ऊंखर ठीक बाजू पत्रकार पाठक अउ ऊंखर बाजू स्व. डीके प्रधान नजर आवत हें। स्व. प्रधान देश के प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के बड़ी मौसी के बेटा रहिन अउ इहां भिलाई स्टील प्लांट म अफसर रहिन।

मो. जाकिर हुसैन के मूल हिन्‍दी पोस्‍ट के छत्‍तीसगढ़ी अनुवाद संजीव तिवारी द्वारा







श्रद्धांजलि – गीत संत: डॉ. विमल कुमार पाठक

हमर जइसे कबके उबजे कोलिहा का जाने खलिहान मन के सामरथ म डॉ. विमल कुमार पाठक के व्यक्तित्व अउ कृतित्व के उपर बोलना आसान नइ हे. तभो ले हम बोले के उदीम करत हन आप मन असीस देहू. एक मनखे के व्यक्तित्व के महत्व अउ ओखर चिन्हारी अलग अलग लोगन मन बर अलग अलग होथे. इही अलग अलग मिंझरा चिन्हारी ह ओखर असल व्यक्तित्व के चित्र खींचथे. जइसे हमर मन बर ‘राम‘ ह भगवान रहिस त केवटराज बर ‘पथरा ला मानुस बनईया चमत्कारी मनखे‘, परसराम बर धनुस ला टोरईया लईका.. आदि इत्यादि. त छत्तीसगढ़ राज्य आन्दोलन के प्रमुख आन्दोलनकारी, भिलाई स्पात संयत्र के माध्यम ले छत्तीसगढ़ के लोक कला ला एक नवा आयाम देवईया अधिकारी, साहित्यकार, ख्यात मंचीय कवि, प्रखर पत्रकार, डॉ.विनय कुमार पाठक के बड़े भाई डॉ. विमल कुमार पाठक.. आप बर अउ मोर बर अलग अलग आय.

उंखर व्यक्तित्व के आंकलन मोर हिरदे म एक समग्र मानव के रूप म हावय जेखर हिरदे म प्रेम, दया अउ सहानुभूति हे. सबले बड़े बात के उमन आज तक ले तप करत हांवय, दुखमय जिन्दगी के बावजूद मुस्कान ढ़ारत रचनासील हांवय ये मोला बड़ नीक लागथे, उंखर इही व्यक्तित्व हम युवा मन ला प्रेरणा देथे. डॉ. पाठक जी कोनो जघा ये बात ला लिखे घलो हांवय के चलते रहो चलते रहो.

मैं दू-तीन बरिस पहिली जब उंखर मेर मिले उंखर घर गे रेहेंव तेखर पाछू अपन ब्लॉग म उंखर बारे म लिखे रेहेंव के छत्तीसगढ के नामी साहित्यकार डॉ. विमल कुमार पाठक पाछू कइ बछर ले अडबड गरीबी म दिन गुजारत हांवय. उखर हाल देख-सुनके मोला दुख के संग अति अचंभा होइस. सरलग गिरे हपटे अउ बीमारी म पानी कस पइसा बोहाए के पाछू आजकल डॉ. पाठक छत्‍तीसगढ सासन कती ले साहित्‍यकार मन ला मिलत मानदेय अउ पत्र-पत्रिका मन म प्रकासित लेख के मानदेय म अपन गुजारा करत हावय. एक समय रहिस जब डॉ. पाठक भिलाई स्पात संयंत्र के प्रसार अधिकारी रहिन तब उनखर नाम के डंका चारो मूडा लोक कला अउ साहित्‍य के पुरोधा के रूप म बाजय. जम्मा संसार म लोहा उदगारे बर बजरंगा भिलाई स्पात संयंत्र के सामुदायिक विकास विभाग के माइ मूड के अब का हाल हावय येला आप मन सब देखते हावव, वैभवपूर्ण पद म काम करे डॉ. पाठक ये हाल म घलव पहुंच सकते हें, विस्वास नइ होवय, फेर इही नियति आय.

आप सब मन ये समय के फेर जानत हावव, अउ इहू जानत हावव के डॉ.पाठक जी ल ये सबके चिंता नइ हे, ना वो ह ये बात ला सोंचय. समय ले जूझत डॉ.पाठक जी के जीवन निराला जइसे कठोर हो गे हावय जेखर भीतर ले संवेदना रूपी गीत मन के उलुव्हा पीका लगातार फूटत हावय.

अब गोठ बात डॉ. पाठक के साहित्यिक व्यक्तित्व के, त पाठक जी के रचना यात्रा बड़ लम्बा हावय. देस भर म कवि सम्मेेलन के मंच, रेडियो, टीबी मन म छत्तीसगढ के धजा फहरावत, पेपर गजट मन म छपत लगभग ३० किताब के प्रकासन तक, डॉ.पाठक जी के लिखइ आज तक ले चलत हावय. डॉ.पाठक जी हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी दूनों भाषा म लिखथें, साहित्य सृजन बर उंनला कोरी कोरी पुरस्कार अउ सम्मान मिले हावय.

उंखर रचना यात्रा म गद्य अउ पद्य दू विधा देखे बर मिलथे, मोर उंखर गद्य ले भेंट प्रखर समाचार म छपत सरलग कड़ी “कहां गए वे लोग” ले होइस. ये कड़ी अंदाजन ६० ठन छपिस, जेमा हमर पुरखा मन के मान बढ़इया हमर सियान मन के बारे म पाठक जी ह बड़ सहज अउ सरल ढ़ग ले लिखे हांवय. ये कड़ी पाछू म एक किताब के रूप म “छत्तीसगढ के हीरे” के नाव ले छपिस. जीवन परिचय जइसे सहज लेखन ला रूचिकर बनाये के कला ये किताब म देखे बर मिलथे. समाज, संस्कृति, परम्परा अउ इतिहास संग परिस्थिति के ताना बाना जोड़त डॉ.पाठक जी ह भूले बिसरे सियान मन के जउन गौरव गाथा लिखे हांवय वो ह छत्तीसगढ़ के एतिहासिक दस्तावेज बन गए हावय. ये अकेल्ला एक ठन किताब ह उंखर लेखन ला अमर करे के समरथ रखथे.

मैं डॉ.पाठक जी के जम्मो रचना ला पढे सुने त नइ हंव, फेर जतका ला पढे सुने हांवव ततकेच म मोर हिरदे म उखर संवेदनसील कवि के व्यक्तित्व परखर रूप म उभर के सामने आथे. डॉ.पाठक जी गीत कवि आंए, उमन परम्परा ले जुरे प्रेम, सौंदर्य अउ दर्सन के गीत लिखथें. उमन हिंदी गीत मन म घलव हमर आंचलिक संवेदना ला उभार के आघू लाथें. इंखर कविता म स्‍वर साधना अउ छंद-योजना लाजवाब रहिथे. इमन अपन रचना म गौ भक्ति अउ आध्यात्मिकता के सुर तको भरे हांवय जउन मन म बाबा सिरीज के गीत मन ला छांट दन त बांचे मन एके नजर म कखरो मान खातिर बनाये नजर आथे, सिरजे के भाव अउ अंतस के पीरा जइसे उंखर सौंदर्य अउ बिरोधी स्वर के गीत मन म हावय वो उमन म नइ हे.

अपन बिरोध के कविता मन म डा. पाठक दलित, किसान अउ कमइया मन के दुख ला सुर देवत समाज के बुराई अउ अनीत उप्पर तेल डार डार के खंडरी घलो निछथें. कोन जनी कब आही नवा बिहान म इमन कहिथें –
नेता मन बेंच डारिन अपन इमान,
कोन जनि कब आही नवा बिहान!
अफसर बेपारी मन बनके मसान,
पीस डारिन जनता ला,
कर दिन पिसान.
दमित सोसित मनखे के पीरा ह इनला अतका अंतस ले जियानथे के इही गीत म आघू कहिथें –
नइ तो फेर हम उठाबो धनुस, जहर बान,
मरकनहा मन के हम लेबोन परान.
ये कवि के हिरदे ले उदगरे अकुलइ ये, जहर बान धरइया मन के जल जंगल जमीन जब छिनाही त इही बात होही.

अइसन वामपंथी सुर के संगें संग इंखर छत्तीेसगढ़ी कविता मन म लोक जीवन के उभार घलो रहिथे, प्रेम, सौंदर्य, श्रृंगार, प्रकृति के संग इमन जनजीवन ल अपन गीत म बहुत सुघ्घर रंग म उतारथें-
चंदा झाकै चनैनी,
लरजत गरजत रात म.
धान के हरियर लुगरा पहिरय,
धरती हर चौमास म.
येमा चंदा के चनैनी ल झंकई अउ रात के लरजई गरजई संग देह के भाषा के मानकीकरन देखव, आघू इही गीत म कवि कहिथें- चूमा लेवय हवा, लजावय खेत खार हर, सांस म. अइसनेहे सौंदर्य के चित्र कवि अपन अडबड अकन गीत मन म कोनो मूर्तिकार कर गढे हावयं, तेन म कोनो कोनो जघा अतिरंजन घलो हो गए हे तइसे कस लागथे-
फरकय अंग अंग तोर अमरित,
पीके मैं हर गएंव मताय,
टिप टिप भरे रखे हस करसी,
दू ठो छाती म बंधवाए.

भक्ति, प्रेम सौंदर्य के पाछू कवि के प्रिय विसय प्रकृति आय, प्रकृति के दुख ला गोहरावत कवि पानी जइसे आम अउ खास जिनिस बर एक ठन लम्बा गीत रचथे जेमा पानी के सहारे जीवन ला जोरथे जउन म जवानी के घुरे ले पानी के महमहइ के बरनन करथें-
महर महर महकत मम्हावत हे पानी ह,
लागत हे घुरगे सइघो जवानी ह.
अइसनेहे प्रकृति के बरनन करत कवि छत्तीसगढी के सटीक सबद मन के घलो प्रयोग करथें जउन हा एक नजर म भले अटपटा लगथें फेर जब दूसर पइत सुनबे त सार बात समझ म आथे कि कइसे कवि ह पानी बरसइ ला लंगझग लंगझग कहिथे, फेर उही पानी जब नरवा नदिया तरिया म बरसथे त झिमिर झिमिर अउ रद रद रद पानी बरसइ के अंतर समझ म आथे.

अइसनेहे कइ ठन गीत हावय जउन कवि के कविता के असल सास्त्रीय रूप के बखान करथे. सबद मन के बाजीगर ये कवि ह अपन अउ समाज के अभी के हालत उप्पर कोनो कोनो जघा दुखी दिखथें, फेर अपन गीते म उमन येला फलियार के कहिथें कि कवि निरास बिल्कुल नइ हें उनखर आसा के डोर उखंर अडबड अकन गीत मन म परगट होये हे. उमन आवाज लगावत हें सब ला जुरमिल के ये संकट के घरी ला टारे बर-
आवव अधिंयारी ला मेटन,
हम पिरथी के बिटियन बेटन.
अपन मया के तेल अउ बाती,
चलव जलावन हम सरी राती.
आपो मन हरदम सुख पावौ,
सुख ला बांट बांट बगरावव.
दीया सही सुघ्घर बरके,
घर घर म अंजोर बरावव.
उंखर इही आसावादिता हमर मन बर प्रेरना आए अउ इही उखंर व्यक्तित्व अउ कृतित्व के सार आए.

संजीव तिवारी


इतवार १४ जुलाई, २०१३ के संझा वीणा पाणी साहित्य समिति कोती ले पावस गोस्ठी के आयोजन, दुर्ग म सरला शर्मा जी के घर म होइस. कार्यक्रम म सतत लेखन बर छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग के अधियक्छ पं.दानेश्वर शर्मा, जनकवि मुकुन्द कौशल, हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी के वरिष्ठ लेखिका डाॅ.निरूपमा शर्मा, संस्कृत हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी के वरिष्ठ लेखिका शकुन्तला शर्मा के सम्मान समिति ह करिस. ये अवसर म डॉ. विमल कुमार पाठक के घलव सम्मान होवइया रहिसे फेर डाॅ.पाठक कार्यक्रम म पधार नइ पाइन. कार्यक्रम बर डाॅ.पाठक के उप्पर लिखे मोर आलेख गुरतुर गोठ के पाठक मन बर प्रस्तुत हावय – Continue reading

किताब कोठी : अंतस म माता मिनी

अंतस म माता मिनी

छत्तीसगढी राज भासा आयोग के आर्थिक सहयोग ले परकाशित

प्रकाशक
वैभव प्रकाशन
अमीनपारा चौक, पुरानी बस्ती रायपुर ( छत्तीसगढ)
दूरभाष : 0771-4038958, मो. 94253-58748
ISBN-81-89244-27-2
आवरण सज्जा : कन्हैया
प्रथम संस्करण : 2016
मूल्य : 100.00 रुपये
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अंतस म माता मिनी
( जीवनी)
“दु:ख हरनी सुख बंटोइया, आरूग मया छलकैया
बनी मंदरस, फरी अंतस, मरजादा धन बतइया
माथ म चंदन, चंदा बरन, सेत बसन चिन्हारी
नाव व धराये मिनीमाता, छत्तीसगढ के महतारी”
अनिल जाँगडे
ग्राम- कुकुरदी, पो-जिला बलौदा
बाजार-भाटापारा (छ.ग. )पिन 493332
मो. 8435424604

समरपन

सिरीमती दुर्गा जाँगडे सुख-दु:ख के जीवन सँगनी ल…
‘”गुनवतींन नारी दुर्गा, विपदा म रिथे संग
भाग सहराथौ पा के, मोरा आधा अंग
मोरा आधा अंग दुई परानी ठठा सुख
संतोस बर रहचुल, लोभ बढाये जग म दुख
कहे अनिल जाँ गडे, राखै मान कुलवतींन
बिगडे ले बनाथे, लाथै सुमत गुनवतींन” ।।
अनिल जाँगडे

मिनी माता : अनिल के कलम

श्रीमती सुधा वर्मा मन लिखे हें के-
मैं औरत नहीं सदी हूँ अनवरत बहती नदी हूँ ।
जाने कितनी विभूतियाँ कोख में मैंने पाली है।।
चीर कर देखो मेरा कलेजा जाने कितना छाले हैं ।।
जे समाज म नारी शक्ति जाग जाथे त ओ समाज म मरद जात के मरजादा अऊ मान बाढ जाथे। पुरुष के संग शक्ति जरूरी हे। बिगर शक्ति के पुरुष म पुरुषारत न नारी गिरहस्ती के धारंग ए त सिंगार के आधार ए। वंश चलाए के ए त दया-मया के सोन–दोना ए। नारी के पाँव म सम्मान रथे त हाथ म मरजाद के दीया बरथे। बानी म दूध-दही घुरथे त ओकर बेवहार म मथला तरिया कस लहरा पैदा होथे। नारी के सुभाव, चंद्रमा के शीतलता ए तन हिरदे, दही के कोमलता ए…. पर जब जेवनी गोड आगू बढा के खोभ दिस त सरग के तारा अपने–अपन धरती म टूट के झरे लगथे। कथें न के तिरिया बिन सूना संसार… फूल बिगर पराग शोभा नइ देअ। खुशबू अऊ रंग ओकर आकर्षन ए तइसे नारी संसार के शोभा ए।
लुगरा के अँचरा त मया के पसरा-तिरिया ए, दीदी, नोनी, बहिनी, फुफु, मोसी, मामी, काकी, दाई, भौजी, ननद, जेठानी, भतीजी, देवरबेटी, भांची, नतनीन, बहू (पत्तो-बहुरिया) मितानीन, ममादाई अऊ बडकादाई (दुदुदाई) परोसीन, ढेढिन–सुहासीन, समधीन, सास, न जाने एक आत्मा के कतका नाव अऊ रिश्ता.? एहर ओकर रुप अउ महिमा के पहचान ए | भारतीय संस्कृति के आधार ए। सद् संस्कार के संवाहक, पहार कस अचल अऊ सहे के शक्ति रखथे त गंगा जमुना कस मया के धार ए। सतनामी समाज म नारी मन के प्रतिभा, कला, गुन, सिंगार अऊ विभूति के दर्शन होथे। पुरुष म पुरुषार्थ होथे त नारी म पुरुषार्थ ल सँवारे के ताकत होथे। नारी सबले पहिली माँ होथे बाद म तिरिया के ना ना रुप… माँ के गोरस मनखे के सिरजनहार ए…. ओकर सफेदी म सत अऊ संसार भरे हे। कहे गए हे के-
लबो में उसके कभी बददुआ नहीं होती।
बस एक माँ है जो कभी खफा नहीं होती ।।




सतनामी समाज के नारी मन, राजनीति, शिक्षा, संगीत अऊ खेलकूद म अपन भूमिका देहे म अगुवाई करे हें। लक्ष्मीबाई, शांतिबाई चेलक, उषा बारले, शामे शास्त्री, जलेश्वरी देवी, किरण भारती, गरिमा दिवाकर, पुष्पा दिवाकर, भगवती टांडेश्वरी, क्षमा पाटले, डॉ. इन्दु अंनत, जैसे नारी ऊर्जा, लोक संगीत साहित्य के नवा अंजोर बगरावत हें त राजनीति म पाँव कतको नारी जइसे मिनीमाता, कमलादेवी पाटले ल कोन भूल सकत हे। नारी के दया-मया तो धरती के गरुवाई ले जादा गरू हे। भाई श्री अनिल जाँगडे सुभाव म सरल, मधुरभाषी अऊ कलम के धनी ए। जाँगडे जी हर नारी के ऊर्जा, गरिमा, दया-मया अऊ ऊँकर कर्मक्षेत्र ल पहचान के दाई मिनीमाता के योगदान, कर्म, जस, अऊ मानव समाज के सेवा ल पहचान के निर्मल आकाश म चांदनी बगरा दिस अतका कम उम्र म चार-चार किताब मंजूर झाल, मउहा झरे झउंहा झउंहा, नाचा अऊ चंदन अस माटी, रच के समाज म नाव कमा डारिस। ए पडत मिनी माता ऊपर अपन भाव के माला गूंथत हे जेकर एक-एक शब्द म मोती कस चमक हे।
मिनी माता के बचपन के नाव मीनाक्षी रहिस जेकर जनम असम प्रांत के लोदे गाँव म होए रहिस | मीनाक्षी, नानकन ले प्रतिभावान रहिस। पिता बुधारी के मया असीस ले बेटी संसार म जस कमाइस । गुरु गोसाई श्री अगमदास जी हर अपन सतनाम यात्रा के दौरान हीरा ल पहचान के अपन अर्धागिनी बनाइन फेर भंडारपुरी ले सतनाम सेवा, नारी उत्थान, शिक्षा अऊ राजनीति म पाँव रख के नारी शक्ति के सफलता ल पूरा करिन। भाई अनिल जाँगडे जी हर माता जी के संपूर्ण जीवनगाथा ल पंक्ति बद्ध करके एक सबूत बतावत हें के समाज म
ऊँकर कतका ऊँचाई हे, नि:संदेह ए कृति, समाज के धरोहर रही। साहित्यकार तो बौद्धिक श्रमजीवी होथे। ओकर कलम म संसार के भाषा समाए रथे। अनिल के मिहनत अऊ सोच जरूर रंग लाही। ऊँकर कलम से स्याही कभू खतम मत होवै लगातार लाइन के शब्द अऊ भाव हर उबकै। ओमा रस, छंद के सिंगार के सुघरता एइ आशा हे…… ।
अनिल तोर कोंवर-कोंवर शब्द गीत बनै ग।
सतनाम के जपड्या बर सुघर मीत बनै ग ।।
घासीदास ल छोडौ नहीं सतनाम ल जपत ग।
अनिल के लिखे किताब मन ल पढत रइहौ ग ।।
डॉ. मंगत रवीन्द्र
शा.उ.मा.शा.कापन
दिनांक जिला-जांजगीर चांपा, छ.ग. 495552
14-6-16
मो. 9827880682




दु आखर

दाई मिनीमाता के सुधी आते नारी के झलक आँखी म झुलथे जेकर असथान छत्तीसगढ म आज तलक कोनो नीं ले सके ए। ओहर एक बेटी, महतारी, बहिनी, पत्नी, समाज सेविका, गुरूमाता के रुप अउ राजनीति म अपन अलग छाप छोडिस। दु:ख हरनी, सुख बांटत परमारथ म जिनगी होम दीस । समाज के उद्धार कइसे होही ? संसो करै, गुनान म बुडे राहै।
गुरुगद्दी के मान रखिस, सतनामी समाज ल बल दिस। गाँव के मनखे ल लेके बडडका राजनेता अउ प्रधानमंत्री तक ओकर बात कान देके सुनै, सलाह लेवै, मान–सनमान दै। छत्तीसगढ म हसदो बांध, विधान सभा भवन, रयपुर बस स्टैंड, चंडक चौराहा कतको महाविद्यालय माता के नाव म रख के सनमान दे हवै। समाज सेवा करइया महिला या संस्था ल हर बछर दू लाख रूपया अउ बडाई मान पाती (प्रंशसा पत्र) देके तियाग के सुरता करे जाथे।
समाज, देसराज म काकरो गुनगान, मान तभे होथे जब परमारथ म अपन सुख तेज के दूसर के विपद म खडा होथे, दुख हरथे। अट्टसने तियागी, गठ सुभाव के माता जी रहिस | माता के महान कारज ल गुनीजन के मुख ले सुनेंव, समझेंव अउ कतको संत, महंत, लेखक, कवि, कलाकार, गीतकार, के अंश ल समोवत जतेक मोर मति पुरीस, दु बूँद माता जी के सिरी चरन म अरपित करत कोरा कागज म अपन सरदा के भाव चढाये के उदीम करेंव। ये कारज म पंदोली देवइया गुनवन्ता पूजनीय डॉ. मंगत रवीन्द्र, डॉ. अनिल भतपहरी, सिरी डी. एल.
दिव्यकार, सिरी पुरानिक लाल चेलक, भाई संतोष कुर्रे, अजय अमृतांशु अउ दीदी उषा बारले जी (पंडवानी गायिका) के मैं अंतस ले गुनमानिक हव माता जी बिसाल हिरदे के रहिस, उँकर कतको परमुख कारज परगट करे बर बिना आरो के छूटगे होही तब संत, मंहत गुनी पाठक मन सम्हार लेहू अउ ‘जकहा’ समझ के छिमा करिहा।

सुझौती के अगोरा म…
असीस लोभिया
अनिल जाँगडे
कुकुरदी- बलौदा बाजार
तारीख-20 जुन 2016

नार–पात

1. भाग-एक : दु:ख के हवे लागे आगी
2. भाग- दो : मीनाक्षी ले मिनी गुरूमाता
3. भाग-तीन : सतनामी रीत के बनइया पहिचान
4. भाग-चार : घर अंधियार, मंदिर म दीया बारे ले का होही ?




भाग एक
दु:ख के हवे लागे आगी

बिसाल बिरछा नानकुन बीजा भीतर समाये रिथे, इही बीजा खातु, माटी म बडका होके फूलथे, फरथे अउ देथे। मनखे भीतर अन्तर्मन म समाये सक्ति बिरवा बीजा बरोबर होथे। जेन सुन्दर गुनान (विचार) संस्कार रूपी जल पा के अमोल सक्ति के परगट होय म मनखे महान बनथे | गुनी, संत, महात्मा कहाथे | संत, महात्मा के मुखारबिंद ले विचारे गियान ले सीख मिलथे. .. सब नर के भीतर नारायन (सतपुरुष) बसथे। गीद गायन मन पंथी गीत म गाथें…

“घट-.धट म बसे हे सतनाम!
खोजे ल हंसा कहाँ जाबें जी” ?

मनखे जिनगी, सतनामपिता! के देये वरदान आय। निरमल जल म काया ल धोके जइसे साफ रखे जाथे, वइसने मन वचन के निरमल रहे म अपन अंतस भीतर के सक्ति जब कोनो मनखे चिन्ह लेथे अउ परमारथ म जिनगी अरपन कर देथे तहाँ उल्लू पूजनीय हो जथे। छत्तीसगढ के महतारी मिनीमाता परे, डरे, दु:खी, भूखी, अनाथ, लचार बर अपन जिनगी अरपित कर दिस। छत्तीसगढ के कोन अभागा होही ? जेन माता जी के दुलार नट पाय हो हय ? दुकाल के कोख म जनमें माता जी दु:ख हरनी, तियागी रहिस।

भारत के आतमा गाँव म बसथे, हिरदे कहाथे छत्तीसगढ | छत्तीसगढिया के सिधवा, भोलापन ल देस, दुनिया जानथे। इहाँ के मनखे खेती- किसानी म रमे रिथि। संतोस सुख, मरजाद धन होथे। छत्तीसगढी म कहावत हे..जान जाय फेर मरजाद झिन जाय।

छप्पन के अकाल, अघारी अउ परवार के गाँव छोडना —

छत्तीसगढ के खेती-किसानी सरग भरोसा, कभू धरती के पियास बुझाथे, त कभू पियासा रहि जाथे। सन 1896 से 1899 तक तीन बछर के सरलग दुकाल कभू नीं भूलाये जा सकै।

सम्वत के हिसाब ले ये दुकाल छप्पन के बनथे, येकर सेती छप्पन परगे छत्तीसगढी मुहावरा बनगे | ये दुकाल घेरी–घेरी विपदा के सुरता कराथे। कुँआ, तरिया, नदिया, नरवा, डबरी-पोखर जम्मो सुखागे | चहूँ ओर हाहाकार मातगे । चिरई-चुरगुन अउ कतको जीनावर पियास म परान तेज दिन। बडे-बडे गौटिया, जमींदार मन के कन्हिया ढिल्ला परगे। भूख म बेहाल परान बचाये के उदीम खोजैं। कमाये खाये बर परदेस जाये के सिवाय कोनो रद्दा दिखीस | कलकत्ता, असम, खडकपुर, कोइलारी (बिहार) बर सब बगरगैं।

छप्पन इही के दुकाल म बिलासपुर पंडरिया जमींदारी गाँव सगोना के मालगुजार अघारीदास मंहत अउ परवार फसगे। दाना-दाना बर तरसगैं, कइसे परान बाँचय ? उदिम करै जोखा नइ माडिस। परवार लेके घर छोडे बर परगे । सुवारी बुधियारिन, बेटी चाउँरमती, पारबती अउ देवमती ल लेके अघारी गौटिया गाँव छोड दिस, बिलासपुर रेलवाही आगे। राहत के नाव म अंग्रेज सरकार जगा-जगा सरकारी कीचन म बघरी बांटय । रेल्वे टेसन के कीचन म बघरी खाय बर मिलगे। ओ बखत के सियान मन किच्चक खाना काहैं। खाय के बाद परवार सहित टेसन के रुख तरी सोगैं, नींद कहाँ आवै ? विपदा आगू ठाढे। असाम चाय बगान के अड्कारी (ठेकादार) ठउका मिलगे। भूख मिटाये बर बटोही मिलिस। असाम जाय बर अघारी तियार होगे। परवार ल लेके रेलगाडी म चढगैं, बिना बिलमे रेलगाडी छुक-छुक दउडे बर धरलिस । नान्हे-नान्हे लइका भूख म बियाकुल, एक दाना अन्न निंही, भूख म अतङडी अइठे लागीस ।




रेलगाडी म बेटी पारबती बेमार परगे । भूख-पियास म काया रूरगे राहै, हाथ म कौडी पइसा निंही, कहाँ ले दवई-दारु लानै ? रद्दा म बेटी के हंसा उडगे। करम ठठावत रहिगे अघारी |

महतारी के आँसू कहाँ थरकै ? चेत ल बिचेत होगे। बेटी के काया धरती ल कइसे सउँपै ? अघारी गौटिया सदगुरू बाबा घासीदास जी ल सुमरिस । बिचारिस रद्दा म गंगा माई दरस देतिस त सउँप देतेंव, रेल दउड्ते रहिस, गंगा के पाट दिखगे । बेटी के काया महतारी बुधियारिन के गोदी ले उठावत अघारी के हाथ थर-थर काँपत रहै, सतनाम! ल सुमरके चलती गाडी म गंगा माई ल सउँप दिस…अभागिन ल तार लेबे दाई…

‘कठिन कल्पना म डारे साहेब मोला
काबर तैंहा अवतारे साहेब मोला”?
रेल म बइठे मुसाफिर मन घटना ल सउँहात देखिन, सबके करेजा फाटगे । महतारी बिसुध, दुनों बेटी रहिगे चांउरमती अउ देवमती ।
“माटी के काया
माटी के चोला
के दिन रहिबे बतादे मोला”?
कलकत्ता से असाम बर गाङी बदलीन, येती बेटी चाउँरमती घलु मुरछा खागे, अघारी निच्चट कठवाये निहारत राहै, करम के रेख कोन टारै ? देखते देखत दूसर बेटी चाउँरमती परान तेज दिस’…। हाय मोर दाई…! गोहार पार के महतारी रोय लागीस आँखी उसवागे राहै।

“‘चार खुरा चार पाटी, पाटी म बरे दीया”।
संतन बोह ले जाही, तरही माटी म काया
चार खुरा, पाटी न दीया–बाती, चार संत मुक्तिधाम नहीं, भट्टगे! बाप अकेल्ला, बेटी चाउँरमती के काया पद्मा नदिया म सउँपत गुरु ल सुमरथे…
‘”दु:ख हो गुरू मोरा, हरिहा गुरु मोरा
तन दुरखिद, मन के विपदा हटैहा गुरु मोरा
दु:ख के हावे लागे आगी
जीव लेके उठही कहाँ भागी ?
अरजी सुनिहा साहेब मोरा”।
दाई बुधियारिन कंदरन लागिस, कोरा सुन्ना होगे…. ।
दुनों नोनी दाई के कोरा ले उतरगे, गंवा डारीस बेटी मन ल…. अघारी के आँखी पथरागे, रोवै फेर आँखी म आँसू नीयें…. रहिगे छ: बछर के बेटी देवमती।

असाम के चाय बगान म रहिके मंझली बेटी देवमती, दाई संग काम–बुता सीखे ल धर लीस । कोरा ले उतरे दुनों बेटी के चिंता म दुरखियारिन दाई रूरगे…परगे बेमार, खटिया धरलीस, अघारी अब्बड दवा करीस खर नीं खाइस, दुनों बेटी के संगवारी होगे… धरती के कोरा म समागे दाई ह। अघारी के मुड उपर पहाड अस दु:ख, का करै बिचारा…? गाँव के बडका किसान अघारी गौटिया काहत लागै…कभू बुता करे नइ रहिस जीव बचाये बर का करही…? बुता करे बर परगे | रात-दिन के संसो, सरीर निच्चट सोखवा होगे… दुकाल लपेटलीस अघारी ल…।

देवमती मुरही बनगे, दाई न ददा सात बछर के नान्हे लडका कहाँ जावै ? कोन ल गोहरावै? बेमार परगे, कोनो सहारा निहीं.. एक झिन दयालु मनखे दोलगाँव के अस्पताल म भरती कर दीस ।
‘तरफत मछरी ल गुरु
पानी म ढीले हो
उदी दिन मछरी ल
नवा जनम मिले हो’।




दोल गाँव के अस्पताल म देवमती के ईलाज–पानी होइस, बने होगे। बिचारी कहाँ जातीस ? अस्पताल धाम बनगे, अउ नसबाई मन के दुलौरिन होगे, बेसहारा ल परवार मिलगे। उमर संग भूख बाढत गिस, बुता धरलीस, रोजी एक तांमा पइसा। बुडत ल तिनका सहारा। अस्पताल म बूता करइया बगांलीन मौसी मिलगे, अपन घर ले आइस, सिखाइस-पढाइस मन ल बोधिस ।

मीनाक्षी के जनम —
असम के जिला नवागाँव ग्राम सलना निवासी बुधारी दास मंहत, सतनामी समाज के भंडारी रहिस। एक दिन मौसी संग भेंट होगे, कैसे भंडारी…? भंडारी जी इस कन्या (देवमती) का हाथ पीला कराकर ठौर ठीकाना नहीं लगवागें…? भंडारी देखिस…. सगियाँन, हसमुख, जात–जतुवन देवमती ल… मौसी ल कहिस, तोर मन असीस त मौसी… अपन घर के लछमी बना लेतेंव । बुधारी अउ देवमती के जोडी बनगे, नता–गोता, संगी-सजन, जान-पहचान सबो सुग्घर असीस दिन। मुरही ल घर मिलगे, देवमती आरुग मन के राहै, नता-कुनेता ल चुम्मुक असन अपन कोती खींच लेइस ।

आसा-बिसवास अउ सुन्ता बने रहे ले जिनगी भर नर-नारी सुख के रहचुल घर-अँगना मया म बगिया असन गमकत रिथे। इही मया संसार बसाथे; दू जिनगी ले बिस्तार बाढथे।

जोडी-जाँवर सुख-दु:ख के संगी होथे, मया-पिरीत पूजा ये, जान डारीन देवमती अउ बुधारी, बिसवास के गठरी म बँधागे । दूनो के संग नइ छूटै। बारह महीना बीतिस, देवमती ल आओकियासी आइस, सखी-सहेली आरो पाइन, कहिन, देवमती भारी पांव हे, बुधारी के भाग खुलगे, सुनतें मन म खुसी समागे, सोचे लागीस मोरो अँगना म किलकारी ।

हिन्दू धरम के परमुख तिहार होली के दिन 13 मार्च सन 1913 के अधराति नोनी अवतरीस । (माता जी के जन्म दिन पर लेखको का मत भिन्न है रायपुर के बस स्टैंड में माता जी की आदमकद प्रतिमा के शीला पट्टी पर जन्म तारीख 15 मार्च सन 1911 अंकित है) घर-परवार म उछाह मंगल मनाइन। कोन जानत रहिस ? दुरखियारिन देवमती के कोख ले अवतरे बेटी एक दिन छत्तीसगढ के महतारी कहाही ।

नान्हेपन ले आजादी के लडई म संघरना —

नोनी के जनम बाद बुधारीदास परवार सहित सलना ग्राम ले जमुना मुख आगे इहाँ गाँव म मीनाक्षी हर मिडिल तक पढहिस, इही सिक्छा नवा रद्दा देखाइस । जमुना मुख के मदरसा म मिले गियान छत्तीसगढ के अंधियारी म अंजोर बगराये के उदीम होइस | मीनाक्षी हर पुन्नी कस चंदा सुग्घर रहिस, पढई-लिखई म गुनवतींन। हिन्दी, अंग्रेजी, असमी भाखा म गियान पाइस ।

भारत भर अंग्रेजी सासन उखान फेंके बर अंग्रेज भगाव के नारा सुनई देत रहिस। इही बीच असम म जगा–जगा हडताल सुरु होगे, महिला दल के संग महतारी देवमती संघरजै अउ आने महिला असन खादी के कपडा पहिरय, घर म चरखा चलावै; महतारी ल देख के बेटी कहाँ पीछू राहै ? मीनाक्षी घलु बालपन सुभाव म आजादी के लडई म संघरगे आगू चलके बच्चा दल के अगुवई करीस । सन 1920 म भारत भर स्वदेसी ओनहा अपनाये बर आंदोलन चलीस, अंग्रेज ल हीनहर करके भगाये खातीर बिदेसी कपडा-लत्ता के होरी बारीन स्वदेस म बने जीनिस बढउरे बर जन–जागरन चलाइन। असम म मीनाक्षी लइका दल संग घर-घर जाके बिदेसी कपडा-लत्ता सकेलय, तहाँ चउँक-चौराहा म आगी लगा देवयं | राजनेता मन के आंदोलन देख के नकल करत बच्चा दल ल उछाहित करै. नवा जोस भरै, ये बुता म खुब्बेच नाव कमाइस |

मीनाक्षी, ले मिनी गुरूमाता




देस सुतंत्र होगे। सतनामी समाज उपर अट्दताचार कम नई होइस । अनुमान मुताबिक सन 1880-85 के तीर-तार छ.ग. छेत्र म सिक्छा के दुवार खुलगे रहिस । सहर अउ कस्बा म मदरसा (पाठशाला) खुलीस | भेदभाव के चलते समाज म सिक्छा उपर चेत नट करत रहिन तभो ले समाज के मालगुजार अठ गौटिया परवार के कोनो-कोनो लइका पढे-लिखे बर धरलिन। आजादी के बाद भारतीय संविधान म छुआछूत ल अपराध माने गिस । उल्लंघन करइया ल दंड के भागी बनाइस | तब जाके सोसित समाज म सिक्छा पाये के हिम्मत आइस | भंडारपुरी गुरुद्वारा सामाजिक दसा के सुधार बर चिंतन-मनन के ठउर रहिस। संत, महंत, भंडारी, साटीदार मिलके गुरु अगम दास जी के संग समाज के बेवस्था बनाये रखे बर गुनान करैं । जेन गाँव म भंडारी, साटीदार नइ रहिस उहां चुने गिस। समाज ल एक फेट करे खातीर दुरिहा-दुरिहा बसे खातीर दुरिहा–दुरिहा बसे सतनामी समाज के बीच पहुँच के गुरुजी संत समाज के बिचार जानै, समाज के बढोत्तरी (विकास) अउ सुमत बर जोर दै।

रामत म गुरू अगम दास जी के असाम पहुँचना —

सतनामी समाज के जगत गुरु अगमदास जी अपन सेवादार, सिपाही, राजमहन्त मन ल लेके समाज सुधार बर रामत निकलै । बाबा गुरू घासीदास जी के सतनाम संदेस के परचार-परसार करत सन 1932 म असाम पहुँचगे, भंडारी बुधारी घर डेरा पारीस। असाम के सतनाम पंथी नर-नारी अउ भंडारी बुधारी के परवार सहित गुरु दरसन पा के मगन होगैं.

अपन भाग सहरावत कहिस–

“मोर सोये भाग आज जागे हो साहेब
हमार अँगना म आइके बिराजे हो”…।

गुरू के चरन पखारके परवार सहित भजीन…दाई-ददा संग मीनाक्षी घलु भजीस । मीनाक्षी ल देख के गुरुजी नांव पूछीस | पढई-लिखई अउ नाव बताइस । गुरूजी के एको झिन संतान नीं रहिस। गद्दी के अधिकारी बर संसो राहै, गुरुजी के इसारा समझ के राजमहन्त मन बात चालीन, बुधारी अपन भाग सहरावत हामी भर दिस।

“कंहुवा ल लानव साहेब, आरुग फुलवा
कइसे के तोला आरुग फुलवा”?




इही ओ समे ये छत्तीसगढ के भाग सँवारे बर बुधारी अउ देवमती बड सर्वा के संग फूल असन बेटी मीनाक्षी ल गुरूजी के चरन सौंप दिस। देवमती उही महतारी ए, दुकाल, छत्तीसगढ ले दुरिहा दाई-ददा संग असाम के चाय बगान पहुंचा दे रहिस । गुरुघासीदास बाबा जी के लीला देख, गुरूमाता कणुका देवी के कोख ले 07 दिसम्बर सन 1895 ग्राम तेलासीपुरी धाम ‘ अम्मरदास बाडा’ म जनमें अपन तीसर पीढी के गुरु अगमदास जी पिता सिरी अगरमन दास गुरू गोसाई संग नाता जोर के पैंतिस बछर ले छूटे छत्तीसगढ भूईंया म फेर लहुटा लिस।

मीनाक्षी के बिहाव

मीनाक्षी हर परवार संग छत्तीसगढ आगे। गुरू अगमदास जी सतनामी समाज के राजमंहत, सेवादार, भंडारी, साटीदार, अउ लाखों लोगन के बीच म गाँव बरडीह (खरोरा) जिला–रइपुर 2 जुलाई सन 1930 म बिहाव रचाइस । सब संतन जयकारा बोलाइन, नाव बदलगे, मीनाक्षी ले मिनीमाता कहाइस ।

“छत्तीसगढ के धन भाग
बिहाव रचाये गुरू अगमदास
गुरुमाता के दरजा पाइस,
मीनाक्षी, मिनीमाता कहाइस” ।




मिनीमाता के गिरहस्ती जीवन हर सुख म बितीस, संतोसी सुभाव के, छल-कपट, ईरखा, लोभ माता जी के तीर आये बर डर्रावय। फेर एको झिन संतान नीं रहिस, नारी जात के कोख सुना रहें ले, संतान सुख नइ पाये ले भीतरे-भीतर उंखर मन म चिंता के घुना खावत रडथे जिनगी अबिरथा अड्डसन म जेन नारी हर दूसर के लइका ल अपन समझ के संवास लेथे अउ मया बरसाथे तहाँ आधा दु:ख भुला जाथे गुरू माता घलो स्त्री ये, संतान नई रहे ले अंतस म पीरा काबर नइ रहिस होही ? फेर छोटे बहिनी करूनामाता के पुत्र विजयकुमार गुरू ल खुद के संतान ले कम नई समझीस, घाद-दुलार पुरोइस । संगे संग लाखो सतनामी समाज ओकर बेटा-बेटी बरोबर रहिन।

जब देस अंग्रेजी गुलामी से छुटे बर जुझत रहिस, उही समे गुरू परवार म माता के गिरहस्ती बसीस । माता जी गुरु परवार के चंदा रहिस । गुरु अगम दास के संग भारत के सबों जगा जाय–आय के मउंका मिलीस अ देस-परदेस म जनता के समस्या ल जानिस, समझिस। गुरूजी घर सुराजी जोधा मन चिंतन-मनन करै। रयपुर मं मोवा भाठा के मकान आजादी बर लडइया सेनानी मन के बइठका ठउर राहय । पंडित सुन्दरलाल शर्मा, ठाकुर प्यारेलालसिंह, डॉ. खूबचंद बघेल, कान्तिकुमार भारती, मंहत नैनदास महिलांग, मंहत भुजबल जइसन देसभक्त मन गुरू परवार के घरौधी बरोबर रहिन। सतनामी समाज के गुनीजन, जोद्वा आजादी के लडई म समरपित होके लडीन अउ अगवई करीन । ये जोधा रहिन राजमंहत नैनदास महिलांग सलौनी (बलौदाबाजार) अंजोरदास कोसले देवरी (मुंगेली) रतिराम मालगुजार केंवटा डबरी, राजमंहत अंजोरदास सोनवानी हरिनभठ्ठा, (सिमगा) मूलचंद जाँगडे, रेशमलाल जाँगडे परसाडीह (बिलईगढ) नकुलढीढी भोरिंग (महासमुन्द) नन्दू भतपहरी जुनवानी (पलारी) अउ हजारो सतनामी बघुवा अपन तन, मन, धन निछावर कर दिन। देस के आजादी खातीर जेल गिन । बडका नेता सुराजी मन के सांघरो माता जी पाइस, काम करे के मंउका मिलीस । गुरू अगमदास बघुवा बेटा मन ल तियार करै। रयपुर अउ भंडारपुरी के गुरूद्वारा म बडका बइठका करके लडे के रद्दा तियार करत अंग्रेजी सत्ता ल उखान फेंके बर उदीम करैं। अंग्रेज सोचय सामाजिक सुधार बर बइठका म एकर सेती नजर नई फायदा सुराजी मन ल मिलै।

गुरु अगम दास जी सन 1932 म रयपुर मं जमीन बिसाइस जिहां सतनामी आसरम बनाइस | जेला साहेब बाडा के नाम से जाने जाय। सन 1937 मं ग्राम बरडीह (खरोरा) ले छोड के परवार सहित बलौदाबाजार तहसील के गाँव खडुवा (सिमगा) म बसगे ।

छत्तीसगढ के हर गाँव गुरूजी के अपन गाँव रहिस, गाँव के मन परवार। रामत म कोनो गाँव पहुँतीस, सरद्वा म लोगन मन के माथ नव जाय, पानी ओछारैं, गुरुजी अउ माता के चरन पखारके असीस लेवैं। गुरूजी असीस देत गियान बांटत काहै…..’संसार विराट हे, जउन नजर म देखत हन इही सत आय, जेला देख नई सकन, संग म गोठिया नई सकन, ओकर जगा अपन दुख गोहराथन, फूल, पातर चढाथन, मठ, मंदिर के चक्कर म पंडा, पुरोहित मन करा लुटाथन, कुछु नइ मिलै तभो ले फोंफा असन झपावत दुख मोल लेथन । कस्तुरी मिरगा कस भटकत र्थिन। जब अपन अंतस के देव ल जान-परख लेबोन, पहिचान जाबो, तहाँ कोनो मंदिर म जाके ठोकर खाय बर नट परै । सतनाम! के संदेस ल जानव, गुरू घासीदास बाबा के बताये मारग म चलव। गीत गायन मन पंथी गीत म गाथें…

‘”मंदिरवा म का करे जइबो ?
अपन घट के देवा ल मनइबो’।

बाबा जी के सतनाम! रूपी डोंगा म भवसागर ल पार करे जा सकथे।

गो रक्षण समिति म गुरू अगमदास जी —

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस बने के पाछु जुलई 1888 म गो रक्षण समिति बनाय गिस | आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयांनद के सुझाव म देस भर समिति गठन होइस | गो रक्षण समिति म बाल गंगाधर तिलक, मदन मोहन मालवीय जी मन घलो रहिन। छत्तीसगढ म पंडित सुन्दरलाल शर्मा, धर्म गुरू अगमदास जी, राजमंहत नैनदास महिलांगे, राजमहन्त रतिराम मालगुजार, महंत अंजोर दास सोनवानी, महंत बिसाल दास, महंत बिसौहाराम अउ मदन ठेठवार जी जट्टसन देसभक्त, समाज सेवक मन समिति म रहिन।

बलौदाबाजार (नवा जिला) के नजीक गाँव ढाबाडीह, करमनडीह म अंग्रेज मन बूचडखाना चलात रहिन। जिहां हर सप्ताह सैंकडों मवेशी (गाय-बैल) काटे जाय तहां मांस ल भाटापारा रेल्वे टेसन से मद्रास, कलकत्ता बर भेजे जावै। कत्लखाना अंग्रेज के देख-रेख म चले के सेती बिरोध करे के ताकत कोनो कर नट सकत रहिन। गुरु अगमदास के असीस पा के राजमहन्त नैनदास महिलांगे आगू आइस । सन 1914 से 1924 तक बूचडखाना बंद कराये बर आंदोलन करिस। ये आंदोलन म पंडित सुंदरलाल शर्मा, राजमहन्त रतिराम, महंत अंजोर दास सोनवानी, मदन ठेठवार मन पूरा संग दिन। आखिर म बूचङडखाना बंद होगे। सन 1924 म राजमहन्त नैनदास महिलांगे ल कानपुर कांग्रेस अधिवेशन म देस के परथंम ‘गो रक्षक सपूत’ के उपाधि देके सम्मान करे गिस। गुरु अगमदास साहेब धर्म गुरु होय के नाते सतनामी समाज के समाज सेवक, देसभक्त मन ल असीस अउ बल देत राहै।




गुरू अगमदास के सतलोकी होना —
संसार म प्रकृति के नियम हे, सिरजन अउ बिनास। सिरजन संग अवरदा लिखा जथे, चेतन होय या अचेतन अवरदा भर र्थि। बिसाल महल एक दिन खंडहर दिखथे । जनम के पीछु मिरतुका अटल सत ए। आतमा (जीव) मर्जी के मालिक होथे, जाय के बेरा धरे-बाँधे, रोके–टोके नीं जाय सकै। लाख छेका पर जाय, चाहे कछु उदीम होय, चोला ले हंसा कब उड जथे ?

गम नी मिलै। सन 1952 म गुरू अगम दास जी आपसरू सतलोकी होगे | तब गुरूजी रयपुर लोकसभा के परथंम संसद सदस्य रहिस । सतनामी समाज ठगागे, गुरूजी संग छोड दिस । गिरहस्ती सुख म माता उपर जिनगी भर के दुख झपागे, बडका समाज, पतवार कोन खेवै, गुरू विजय कुमार नाबालिक, परवार, समाज अउ राजनीति के बोझा माता जी के मुड खपलागे। गुरू मान (गरिमा) घलु बना के रखना रहिस। गुरुमाता गुनवतींन अउ हिम्मतवाली रहिस। काबर नट रडही ? असम के धरती म उपजन–बाढन, बडे-बडे नदिया के लहरा संग

खेले, जुझे, घर-परवार अउ समाज के धुरा थाम लिस । सन 1953 के लोकसभा उपचुनई म पहली संसद सदस्य बनीस । पुत्र के नाबालिक रहे ले गुरुगद्दी घलु सम्हारे ल परगे।

गुरू अगम दास जी के साथ मिनी माता जी

भाग-तीन
सतनामी रीत के बनइया पहिचान

भारत से अंग्रेजी सत्ता उखान फेंके खातीर सन 1920 म महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन देस भर चलिस। असम म मिनी माता जी दाई देवमती संग चरखा चलावै, तहां ले देसभक्ति के भाव मन म जागिस। नान्हे पन ल माता जी देस के आजादी बर जुझत देसभक्त मन ल देखे रहिस। गुरु अगम दास जी के संग सन 1930 म छत्तीसगढ आइस ।

मिनीमाता जी के राजनीति जीवन

15 अगस्त सन 1947 मं भारत सुतंत्र होगे। आजादी के बाद ले छत्तीसढ सहित देस भर सन 1950 से 1970 के समे राजनीति म कांग्रेस के जोर रहिस। गुरू अगमदास जी कांग्रेस पार्टी से रयपुर लोकसभा ले सन 1952 म पंरथम संसद सदस्य बनीस। गुरुजी के सतलोकी होय के पाछु मिनीमाता जी लोकसभा उपचुनई म पहली संसद सदस्य सन 1953 म चुने गइस । छत्तीसगढ म परथंम महिला संसद सदस्य बने के एतिहासिक नाव जुडगे। दूसर लोकसभा सदस्य सन 1957 में बनिस। तीसर चुनई सन 1962 अउ चउंथा सन 1967 के चुनई म सरलग जीत के रायपुर, जांजगीर, बिलासपुर अठ सारंगढ लोकसभा छेत्र ले संसद सदस्य बनिस | जब-जब माता जी चुनई लडिस, जीतते गिस। कहे जाथे न…. |

कर्मयोगी के साथ होकर
हर पत्थर साधक बन जाता है।
दीवारें भी दिशा बताती है
जब इंसान आगे बढ जाता है।।

अपन चुनई छेत्र ल कार्यकर्ता भरोसा छोडके दूसर के छेत्र म जाके परचार करै। लोगन म माता जी उपर अतेक भरोसा राहै, खुद के परचार म जाये बिना भारी अंतर ले जीत मिल जाय। संसद सदस्य के बने ले देस बर अब्बड काम करीस।

“भेदभाव चतुवारन कानून लाइस ।
दलित के हक मान देवाइस ।।
बियाकुल देख नारी दसा ।
बुझाइस, बेटी पावै सिक्छा” ।।




संविधान बने के बाद भारतीय समाज के कोढ छुआछूत नड मिट पाइस दलित के उपर होवत भेदभाव अउ अत्याचार खतम न् होइस । तब अनुसूचित जाति के संसद सदस्य मन मिलके छुआछूत के खिलाफ कानून पास कराय बर पंडित जवाहर लाल नेहरू अउ तत्कालिन गृहमंत्री डॉ. काटजू से निवेदन करीन। कानून पास कराये बर श्री एन. एस काजरोलकर (बम्बई), श्री रानानंद दास (पश्चिम बंगाल), श्री पन्नालाल बारुपाल, (राजस्थान) श्रीमती मिनीमाता (मध्यप्रदेश), श्री रेशम लाल जाँगडे (मध्यप्रदेश), श्री बी.एस. मूर्ति (आंध्रप्रदेश), श्री कन्हैयालाल वाल्मीकि (उत्तरप्रदेश), जडसन दलित नेता मन प्रस्ताव बनाइन अउ मिनीमाता ल अगुवाई करे के बुता दिन। पंडित जवाहर लाल नेहरू अउ बाबा साहेब आंबेडकर के मार्गदर्शन म 17 अप्रैल 1953 म संसद म प्रस्ताव (अस्पृश्यता निवारण कानून) ल रखिस । 28 अप्रैल 1955 म लोकसभा 2 मई 1955 म राज्यसभा ले भेदभाव चतुवारन कानून पास होगे | 8 मई 1955 म राष्ट्रपति के मंजूरी मिलगे । 1 जून 1955 म देस भर कानून ल लागू कर दिए गिस।

ये कारज म देस भर माता जी पहिचाने गिस अउ सनमान पाइस । बडे-बडे राजनेता सहराइन। बाबा अम्बेडकर, बाबू जगजीवन राम, डॉ राजेन्द्र प्रसाद, डॉ. सर्वपल्लीराधाकृष्णन, वाय.वी. एस.चब्हाण, लालबहादुर शास्त्री, पंडित रविशंकर शुक्ला, पंडित सुंदरलाल शर्मा जइडसन दंबग नेता मन माता जी के साहस अउ लगन देख के अचरित राहै। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी अपन सखी मानै। येकर सेती माता जी जगा विपदा लेके गोहरड्डया मनखे के कमीं न् राहै। फरियादी मन के काम कराये बर माता जी कोनो कसर नई छोड्य | खुद दप्तर जावै, काम करा के लहुटय | माता सरूप ओकर हरेक कारज म परगट होय, दुवा-भेदी न् जानीस | जात, परजाता सबो बर मरती मरय, मया–दुलार दै। गरीब, अमीर, राजनेता, बैपारी, किसान, बनिहार जम्मो के बिपदा हरै। दुखिया मन ल भरोसा राहै माता जी छोड कोनो दूसर दुख नीं हर सके। सरन म पहुँच जावै । साहित्यकार श्रीकांत वर्मा ल अपन दुलार पुरोइस, टिकट देवा के संसद म पहुँचाइस | इहाँ तक बहू पंसद करके श्रीमती वीणा वर्मा संग बिहाव करा दिस | कामरेड मुक्तक मजदूर नेता के पूरा मदद करै। कवि मैथ्यु जहानी ल अपन अंचरा के म रखीस | सिरी भंवर सिंह पोर्ते, सिरी कन्हैयालाल कोसरिया, सिरी किशनलाल कुर्रे अउ चन्दू लाल चंद्राकर ल राजनीति के उच्च पद तक ले जाके छोड्रिस। अट्टसने रयपुर लोकसभा के संसद रहे सिरी केयूर भूषण मिश्रा ल गोदनामा लेये संतान बरोबर मानिस, येकरे सेती केयूर भूषण जी अपन नाव म मिश्रा सरनेम लिखबे नइ करीस । जेन मनखे माता जी ल गोहराइस, सबो ल सुख बांटिस, महतारी के करतब निभाइस । इही गुन कर्म माता जी ल ऊँचा उठा दिस।

समाज सेवा के कारज म समरपित —
‘”करुणा की तुम सागर हो
ममता की बनी ।
डूबती नाव सागर में माता
दुखियों का पतवार बनी” ।।




कहूँ मनखे के सुभाव सुंदर हे, अंतस पबरित हे, तब घर म सुमत रिथि। सुमत अउ सांति रहे ले घर-परवार, पारा-परोस, के संग देस राज के बिकास म बढोत्तरी होथे। गुरू घासीदास बाबा जी के अमरितबानी हे… “अपन ल देख दूसर ल देख; बेरा देख, कुबेरा देख, जउन हे तउन ल बाँट बिराज के खाले”। खुद के पीरा असन दूसर के पीरा होथे, समझे के बात आय; दूसर के दु:ख म खडा होय ले दु:ख बंटा जथे; दुखिया ल हरू लागथे। गुरू बाबा जी के सात उपदेस अउ बियालिस अमरितबानी कर्मयोग के सिक्ठा सनमान हे। सात उपदेस म जीवन मुक्ति के बिधान हे अउ बियालिस अमरितबानी म निस्कपट जीवन जीये के मंतर (सूत्र) हे। इही मंतर ल माता जी अंतस म बसाके सेवा भाव के रद्दा धरिस अउ जीवन के साधना समझ के समाज सुधार के बुता म समरपित होगे। भंडारपुरी गुरूद्वारा दुखिया मन के दरबार रहिस । अट्टसने नई दिल्ली के नार्थ एवेन्यू निवास म फरियादी के रेम लगे राहै। सबके सुख-दु:ख पूछय; खवातिस-पियातिस, रात रूकइया मन बर ओढे-बिछाये के जोखा मडावै। पूस के रात जाड बाढे राहै; एक घवं दुरिहा-दुरिहा ले आये फरियादी माता के निवास म रात रहिगैं; पूरत ले सब बर चद्दर, कंबल दिस; जइसे जगा पाइन सोगे। सब के सोये उपर माता जी चारो कोती घुम के सरेखा लेथै; काकरो बर ओढना-दसना तो नट खंगे ये ? तभे सीढी म सोये एक झिन मनखे दिखगे; ओहा जाड म कांपत राहै; माताजी अपन ओढे कंबल ल ओढा के अपन खोली म आके सुतगे । ओढे बर माता जी जगा कुछु नीं रहिगे; जस रात तस जाड। नंडकरानी करा सिगङडी जलवाइस; पंलग तीर रखवा के किवाड बंद करके सोगे। सिगङी के कुहरा खोली म भरगे; माता ल अकबकासी लागिस; नींद उच्चगे; माथा चकराये ल धरलीस; कपाट खोलीस तहाँ मुहटा म मुरछा खाके गिरगे | डॉक्टर ल बलाके इलाज करवाइन तब परान बांचिस । अपन जान जोखिम म ढारके दूसर के जान बचइया राजनेता कहाँ मिलथे ? अट्टसन संत हिरदे वाली माता जी रहिस।

मनखे ल समाजिक परानी माने जाथे; समाज म रहिके सुख-दु:ख बांटत जीथे–मरथे। मनखे–मनखे म मया–पिरीत राखे खातीर सामाजिक बंधन, कायदा होथे।

जेकर से सुमत बने रिथि। बिसाल समाज म मनखे एक सुभाव के नई राहै; गुनान एक नीं होय, उच्च-नीच होथे। बिचार भले अलग-अलग होय, फेर घर- परवार, समाज के सुमत बर अंतस एक करे बर परथे। तभे उन्नति के अगासा छूये जा सकथे। सतनामी समाज म गुरू पद उच्च माने जाथे। मिनीमाता जी समाज के गुरू गद्दीसीन रहिस। जाने, अन्जाने म समाज के मनखे से उच्च-नीच हो जाय तब कसुरवार जगा डाड म एक नरियर लेके जैतखाम! म फोरवा दै; निहीं त कसुर देखत सामरथ देख के अर्थदंड लेवै ओ रकम ल सामाजिक हित म लगा देवै। गुरू घासीदास बाबा जी के सतनाम संदेस, उपदेस के परचार अउ समाज सुधार बर गाँव-गाँव बइला गाडी म रामत निकलै । माताजी ल गाँव म पहुँचत सुन के समाज के लोगन मन आरती-मंगल के संग पंथी नाचत-गावत गाँव के मेडो ले परिघावत ले जावैं, चरन पखारैं, भजैं तहाँ सुख. दु:ख बतावैं। अउ सरदा म सक्ति मुताबिक गुरू टीका देके बिदा देवयै ।

“कवच दलित, सोसित के ।।
पहिचान बनाये सतनामी रीत के |
सेत बसन, माथ म चन्दन ।
भाग सहरावैं पा के दरसन”।।

माता जी करा अगला–उछला धन-दोगानी रहिस; तभो ले अंहकार ओला छुये नइ सकीस । जन सेवा ल सबले बडे धन समझीस | गुरूघासी दास जी अमरितबानी म कहे है-

‘”मोर हीरा ह तोर बर हीरा आय
तोर हीरा मोर बर कीरा आय”।

“मोर धन जम्मो संत मन के आय फेर धन मोर बर कीरा बरोबर ये, काबर ? पर धन के लोभ दु:ख के कारन होथे।’ माता जी धन नड् कमाइस, जन के मान पाइस । अपन हिसा के सुख बाँट दै; रोजी-रोटी बर भटकत मनखे ल सहारा दिस। पेट के खातीर अपन धरम बदलइया मन ल समझाइस; भटके ल रोकिस, भेदभाव करड्या ल टोकीस, लालच देके सतमारग से भटकइड्या मन ल फटकारिस, दिन-रात जन सेवा म लगे राहै। सादा जीवन उच्च बिचार के रहिस; मन म कुछु छल, कपट नीं राखीस।

माता मिनी जी परवार, समाज अउ राजनीति म कतको उच्च-नीच छल, छद्म देखीस, तभो हार नई मानीस | धन, सम्पति मान-सनमान बढई के गुमान मन म नई पोंसीस । बाबा जी अपन संदेस म कहे है-

“मोर संत मन मोला काकरो ले बडे झिन
कइहीं नइते मोला हुदेसना म हुदेसन आय”।

बाबाजी के बताये एक-एक संदेस ल गांठ बांध के धरिस अउ तपस्या मान के सतमारग म चलीस | खादी के सादा लुगरा म जिनगी खपा दिस। जन सेवा के बलदा ओला कुछु नइट भट्टस ।

किसान, बनिहार बर छलकत पीरा —

दूसर से कुछु लेये म ही सुख नींये, देये म भी सुख हे। दुखी-भूखी ल भोजन देके या हीनहर के मदद करके जउन आंनद मिलथे एकर ले बढके अउ कोनो खुसी नइये। जेन मनखे अपन अउ परवार के सुख भुलाके दूसर बर ओला कोनो दुख नई बियापै; अट्डसन मनखे जीवन म सच्चा सुख के भागी होथे। जस, अपजस अपन हाथ म हवै। दया. मया के भाव जतेक जादा अंतस म रहिथे, ओतके चंदा कस उजियारा जस बगरथे।




छत्तीसगढ के खेती-किसानी सरग भरोसा, जुआ खेले असन, सुकाल कभू दुकाल । नहर नाली नहीं के बरोबर; बादर बने बरस जाय त अमरित, निंही त धरती पियासे रहि जाथे।

बछर-बछर के दुकाल, किसान के करलई देखे नइ गिस । माता जी के नाना-नानी अउ परवार इही दुकाल म तिडी-बिडी होय रहिन। दुकाल के विपदा ले जुझत किसान ल बचाये बर गुनान करै, रद्दा नइ दिखय । बाबाजी के संदेस म परमारथ के सीख मिलथे। इही सीख ल माता जी धरिस। सतगुरु के मुखारबिंद ले निकरे अमरितबानी हे–

‘मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारा संतद्भारा बनावन मोला भावै नई, तोला बनायेच बर हे, तब जलाशय बना तरिया बना, कुँआ बना, धर्मशाला बना अनाथालय बना, नियालय बना दुर्गम ल सुगम बना”।

सतनाम साधिका मिनीमाता ल रद्दा दिखगे | हसदो बांध बर संसद म प्रस्ताव रखत कहिस, बांध बन जाय ले हजारों एकड खेती म पानी पहुँचही, फसल म बढोत्तरी होही । घेरी- घेरी दुकाल के मार से किसान ल बचाये जा सकत हे। सरलग दउड- धूप म हसदो बांध बनाये के मंजूरी मिलीस; काम चालू होगे | माता के सुरता म सन 1981 म बाँध के नाव मिनीमाता बांगो बांध रखे गिस ।

आजादी के बाद छत्तीसगढ म भिलाई इस्पात संयंत्र, बालको के एल्युमीनियम प्लांट, बैलाडीला, कोरबा, बचेली म बडका कारखाना खोले गिस | छत्तीसगढी पढे-लिखे जेवान मन ल नौकरी देत रहिस । येकर से माता जी ल अब्बड दु:ख पहुँचय । केंद्र अउ मध्यप्रदेश सरकार छत्तीसगढ छेत्र बर भारी दुभेदवा करै। इहाँ के समस्या के समाधान बर माता जी अपन अंतस के बात कहिके अलग छत्तीसगढ राज के दर्जा बर जोर दय | जेकर से छत्तीसगढ के बिकास हो सकै अउ बेरोजगार ल रोजगार मिलै। खनिज संपदा के दोहन छत्तीसगढ के विकास बर होय।

मजदूर समस्या ल लेके छत्तीसगढ मजदूर संघ के गठन होइस । सिरी विमल कुमार पाठक जी अध्यक्छ रहिन। मजदूर संघ दुवारा लगभग पाँच हजार छंटनी करे मजदूर, भू अधिग्रहण ले प्रभावित संयंत्र से निकाले 1500 किसान अउ छत्तीसगढिया बेरोजगार मन के रोजगार बर घेरी घंव धरना-प्रदर्शन होय। संघ के अध्यक्छ पाठक जी ल संयंत्र के मनेजर एक नई गमहेरत रहिस, तब हार–थक के मजदूर साथी मन ल लेके पाठक जी समस्या के निदान बर माता जी जगा पहुँचगे । माताजी समस्या दूर करे के भरोसा देथे अउ मजदूर मन के बिनय म मजदूर संघ के आजीवन अध्यक्छ बने बर तियार हो जथे।

सन 1967 के फरवरी महीना, माता जी के अगवाई म बढका रैली निकाले गिस। जेमा क्धियक सिरी धरमपाल सिंह गुप्ता, सिरी शिवनंदन प्रसाद मिश्र, डॉ. पाटकर, सिरी सम्बल चकवती, अउ सिरी सुधीर मुकर्जी छत्तीसगढ के हितवा अउ मजदूर नेता मन जुरियइन। भिलई इस्पात कारखाना म जउन किसान के भूईंया निकरे रहिस उही म के 1500 मजदूर मन ल छंटनी करके नउँकरी ले निकाल दे रहिस। इही रैली म छत्तीसगढ राज के मांग बुलंद करे गिस । दस हजार से जादा मजदूर, किसान जुलुस म रहिन। कारखाना के जनरल मनेजर चरचा करे बर माता जी जगा नेवता भेजीस | माता जी कहिस मैं रैली लेके आये हव; चरचा अकेल्ला नइ फेर एक घव जनरल मनेजर सरदार इन्द्रजीत सिंह बिनय करत अपन साथी सहित पहुँचे बर माता जी जगा संदेस भेजीस । साथी मजदूर नेता सिरी धरमपाल सिंह गुप्ता, सिरी शिवनंदन प्रसाद मिश्र, विमलकुमार पाठक, सिरी सुधीर मुकर्जी मन ल लेके माताजी इस्पात भवन गिस | चरचा सुरू होइस, जनरल मनेजर सरदार इन्द्रजीतसिंह ल माता जी एकटप्पा सवाल करीस–

”आप लोगों ने हमारे किसान, मजदूर पर अत्याचार किया है मैं आप से पूछना चाहती हूँ जनरल मनेजर आदेश क्रं. 20 के तहत अनुबन्ध में प्रभावित किसानों को पर्याप्त मुआवजा व संयत्र में स्थायी नौकरी पर रखने का प्रावधान है इसी तरह स्थानीय बेरोजगार युवकों को रोजगार देने केंद्र सरकार का स्पष्ट निर्देश है. फिर आप लोगो ने खिलाफत क्यों किया” ?

गलती तो कर डरे राहै, जनरल मनेजर के बोलती बंद होगे। हाथ जोर के मनेजर ह कहिस, “माताजी क्षमा करें इस समस्या का हल करना मेरे वश की बात नहीं है मुझे समय दीजिए इसके लिये इस्पात मंत्रालय भारत सरकार के पास प्रस्ताव भेजना होगा” । माता जी अउ मजदूर नेता मन लहूट के आगैं। आम सभा होइस, माताजी गोठियावै छत्तीसगढी, भासन घलु छत्तीसगढी म दिस | सुनके मजदूर, किसान अधिकार बर जागीन। आमसभा उसले के बाद गुरु माता दिल्ली पहुँच के प्रधानमंत्री जी श्रीमती इंदिरा गांधी जी अउ मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री सिरी श्यामाचरण शुक्ल जी से भिलाई संयंत्र के मजदूर समस्या ल रखिस आखिर म निकाले भू-अर्जन से परभावित 1500 मजदूर ल नौकरी म फेर लहुटाइस संग म छंटनी करे अउ मजदूर मन के घलु फायदा होइस । अपन आखिरी सांस तक छत्तीसगढ अउ छत्तीसगढिया के हक खातीर लडुई लडीस; कतको ल नंउकरी मिलीस। माता जी सर्वहारा के पूज्यनीय होगे ।
”गुथे, बुने देखाये, राज छत्तीसगढ सपना ।
कहे उंघवा गंवाथै, हवै हक बर जागना ।।
कोरबा, भिलई, हसदो, तोरेच गुन गाथा ।
अंतस भीतरी छत्तीसगढिया के मिनीमाता” ।।




माता जी दक्षिण-पूर्व रेल्वे बोर्ड के सलाहकार सदस्य रहिस, रेल्वे म अब्बड कन काम सवारी (यात्री) मन के सुभित्ता ल देखत केंटिन अउ छोटे रेल टेसन माता जी के सुझौती म बनाये गिस। कोयला लोडिंग बर रेल्वे युनियन बिलासपुर म गठन करके मजदूर मन ले सोसन से बचाय के उदिम करीस ।

गुरुवइन डबरी हंड्ताकांड म बघनीन रुप —

जात-पात, धरम के ईरखा जादा अलहन लाथे, देस, समाज ल बाँट देथे, रीस–राड म मनखे के मगज भस्ट हो जथे, सोचे बिचारे के ताकत हीनहर हो जथे। मनखे रीस म अंधरा बरोबर होथे। गुरूघासी दास बाबा जी रावटी म कहे हे-

‘”‘झगरा के जर नई होय, ओखी ह खोखी होथे”।

सतनामी समाज के मनखे धार्मिक सुभाव के होथें। कोनो जात–धरम के देवधामी ल माने बर कोर कपट नइ करैं; सबो बर मन म सरद्धा गुरु परब तो मनाबे कोनो-कोनो छेत्र म रामायन पाठ त कहूँ रहस (कृष्ण लीला) घलु बिलासपुर जिला मुंगेली, बैगाकापा अउ गुरुवाइन डबरी म राम चरित मानस पाठ के करई ल उच्च जात के मनखे मन नई भाइन; देख के जरजरी समागैं, धरलीन भंइस बैर, तहाँ पांच झिन निरपराध सतनामी ल घर भीतरी के बइरी मन आगी लगा दिन। 19 जनवरी 1968 म जात-पात के ईरखा चलते पाँच सतनामी बेमउत मारे गइन। ए कांड सतनामी समाज ल झकझोर के रख देथे | मामला संसद म उठाइस; ए हंड्ता कांड म एक अकेल्ला मिनीमाता जी संसद भीतर म बघनीन अस गरजत कहिस, मोर लटका मन कोनो गाजर, मुली नोंहे जिंहला मारे, काटे, जाथे। मैं अपन समाज के उपर जुलुम होत नइ देख सकौं; नियायिक जांच होना चाही, आदेस दव, चारों कोती सन्नाटा छागे। भट्टगे! एक नारी के दरद अउ चीत्कार संसद म गूँजत रहै । माता जी अपने दल के कांग्रेस सरकार ल कटघरा म लाके खडा कर दिस। सिरीमती इंदिरा गांधी जी परधानमंत्री रहिन; संसद सभा ले जांच के आदेस देये बर परगे । अंग्रेजी गजट वाले मन माता जी के देये भासन उपर लिखे रहिन–

”स्तब्ध संसद में एक अकेली तीखी आवाज चीख की तरह गूँज रही थी” ।

मुरगे ली म घटना के बिरोध बर आमसभा —

गुरूवइन डबरी हंइता कांड के बिरोध करत मुंगेली म देस भर के सतनामी जुरियइन। जुराव के मंच ले माता जी सरकार ल चेतावत कहिस, (ओ बखत सिरी गोविंदनारायन सिंह मध्यप्रदेश के मुखमंत्री रहिन) ये मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री आँखी म पट्टी बाँध के राजगद्दी म बइठे रहे ले नई बनै ? देख, मोर लडका मन ल दंदोरे, रौदें जात हे, टोरे-फोरे, तरसाये जावत हवै। ए मन कोनो भेड, बकरी नोहें, सब ल सम्मान के संग जीये के हक हे । तैं ईंकर रहच्छा (रक्षा) नइ कर सकच त झिन कर, मैं रइच्छा खुद करिहों। अपन हक, पाये बर हथियार उठाये बर परही तभो हम पाछू नइ घुचन । आगू चलके मोला दोस झिन देबे। आगू का होही ? येला समे बताही, मैं नइ जांच होइस, हंड्तारा मुलजिम मन पकडे गइन, खटका टरिस, समाज म सान्ति आइस | माता जी समाज के लोगन ल सचेत करत कहिस-सतनामी समाज ल अंधियार म रखइया, जात-पात के नांव म आगी बरड्डया मन से सावचेत रहे बर लागही, समे आगे हे आँखी उघारे म बनही, मुँह लुकई म हक, नियांव नई मिलय, जोम्मस म मिलथे। हमला हँसिया टेना नीं ए, धीरज राखे सद्गुरू जी के बताये सतमारग म रेंगना हे, अभी समाज उपर बिपत आये हे, टरही। गुरुमाता के बुझे ले सतनामी समाज जागीस अउ सुमत दीखिस।

घर अंधियार, मंदिर म दीया बारे ले का होही ? अन्जान सक्ति (आदिशक्ति) जब धरती ल सिरजाइस होहय, तब ओकर अंतस म ममता के धारा बोहात रहिस होही। येकर सेती आज तलक हमन धरती ल माता के रूप म पूजथन, मान देथन, नारी रूप म बंदना करथन । नारी महतारी रूप धरके जिनगी नीं देतीस त ये संसार के बिस्तार कहाँ ले होतिस | डॉ. राजेश कुमार उपाध्याय अपन कविता म लिखे हे (सत्यध्वज पत्रिका ले) :-

”नारी उन्नति नारी समता
नारी वैभव जग में उज्ज्वल
पग-पग में सम्मान भाव का
दिव्य ज्ञान बतलाओ जी
सतगुरु के ज्ञान गावो जी”।




नारी हक सिक्छां बर जोर —

माताजी के विचार म जब तक नारी के उन्नति, सम्मान अउ सिक्छां के दुवार नई खुलही तब तक समाज के मरजाद अउ देस के बिकास के बात सोचई सपना बुनई ये। आदमी जात (पुरुष) ये भूला जथे, नारी के कोख म पलके जनम पाये हन; धरती म पांव रख सके हन । नारी, महतारी, सुवारी, (पत्नी) बहिनी, बेटी, अठ देवी रूप म घलु माने जाथे। अपन सुख बर आदमी जात सुवारथी किसम के हो जथे। आदिकाल से नारी जाति के जिनगी ल पराधीन बनाके हक नंगाये गिस । जब-जब दासता जिनगी से मुक्ति बर छटपटाइस तब-तब दबाये के उदीम करे गे हवे। एक कोती नारी ल देबी मानके अउ दूसर कोती भोग के जीनिस (वस्तु) मानें।

नारी, तपसी, तियागी, अउ ममता के बरसइया होथें। छत्तीसगढ म गाँव के तिरिया मन ल माता जी देखिस, अंधविस्वास के सेती नोनी जात ल पढाये, लिखाये बर नइ पढही तहाँ घर के बुता कोन करही ? कतको पढ जाही घर के चूल्हा फूंकही, दाई संग घर–दुवार के बुता सीख जाही तब, ससुरार के बोझा नड् बनही। अट्टसन सोचइया दाई-ददा ल माता जी बुझिस, नोनी मन सिक्का पाही तभे अपन हक ल जानही, समझही, परखही, उच्च सिक्का पा के अपन पांव म खडा होही। दाई-ददा के मरजाद बाढही, समाज देस राज के उन्नति होही।

महतारी लटका के परथंम गुरु माने जाथे; लडका ल सुग्घर सिखौना (संस्कार) तभे मिलही जब महतारी पढे-लिखे रइही। बनिहारिन बना के कब ले रखिहा ?

लोगन मन नारी के सुन्दरता ओकर काया रूप-
रंग म देखथे; जे हर प्रकति के देये आय माता जी के संदेस रहिस–

“नारी के सुन्दरता, सिक्छा, संस्कार, बेवहार ले झलकथे | इही सुन्दर रुप परवार, समाज के मान-गौरव होथे | नारी सुन्दरता तन ले निहीं मन, सादगी से देखे जाथे” ।

माता जी जादा जोर सिक्छा के उपर दिस । आज सबो जात बिरादरी के नोनी मन पढत-लिखत हे; अपन पांव म खडा होय बर धर ले हवैं।

समाज के पय-पाखर चतुवारे के बुता घलु माता जी करीस, बालविवाह, अनमेल विवाह के विरोध करत मानव समाज म जागृति लाये के उदिम म लगे रहिस। नारी उत्थान बर दहेज निवारण अधिनियम 1961, मातृत्व लाभ अधिनियम 1961 समान पारिश्रमिक अधिनियम अउ शारदा एक्ट जइटसन समाजिक सुधार बर कतको उपाय हे।

गुरू घासीदास जंयती अउ गिरौदपुरी मेला ल बढावा —

गुरू घासीदास बाबा जी के जंयती के जन्मदाता सिरी नकुलढीढी जी ग्राम भोरिंग निवासी सन 1938 म गुरू घासीदास बाबा जी के जंयती मनाये खातीर पहली उदीम करीस । तब अंग्रेजी सासन रहिस । ग्राम भोरिंग ले जंयती मनाये के सुरुवात तो होगे; फेर सतनामी समाज म जागरन नीं आये ले 20–30 साल ले परचार-परसार म कमी देखे बर मिलिस ।

आजादी के बाद सतनामी समाज सिक्छा–दीक्छा बर चेत करीन मिनीमाता जी संसद सदस्य होगे रहिस । बाबा जी के जंयती मनाये बर जोर-सोर से माताजी परचार म भिड्के धार्मिक अउ सांस्कृतिक गियान बगराइस ।

गुरुघासीदास जयंती परब 18 दिसंबर के दिन सरकारी छुट्टी रखे बर मध्यप्रदेश के राज्यपाल सिरी के.सी. रेड्डी जी से मिनीमाता जी मांग रखिन । जेकर से बाबा जी के अनुयायी मन गुरु जयंती सबो परवार-समाज मिलके मना सकै अउ बाबा जी के सतनाम संदेस जन-जन तक पहुँचे। मुख्यमंत्री पंडित श्यामाचरण शुक्ल जी सन 1970 म गुरुघासीदास जयंती 18 दिसंबर के दिन रायपुर अउ बिलासपुर संभाग म छुट्टी घोषित करीस। आगू चलके मुख्यमंत्री सिंह जी हर सन 1972 म पूरा मध्यप्रदेश म 18 दिसंबर के छुट्टी घोषित करके गुरु बाबा घासीदास के उपर अपन सरद्धा भाव परगट करीन।




गिरौदपुरी मेला लगे के सुरुवात सन 1935 ले होय रहिस, मांधी पुन्नी के दिन मेला होवय। एकर पहली गुरू दरसन बर कमती मनखे जावय । मेला के विस्तार बर मिनी माता जी, सिरी नकुलढीढी जी, गुरू आसकरनदास, राजमंहत दीवानचन्द जी सोनवानी, सखाराम बघेल, मंहत जगतु सोनवानी, संत, मंहत, भंडारी जइसे सुजानिक मन विचार करत मेला तिथि ल बदलके सन 1961 से फागुन महीना अंजोरी पाख के पंचमी, छठ साते म तीन दिन के मेला तिथि के ऐलान करीन तब ले आज तलक हर बछर इही समे म मेला लगथे । संगे–संग बाबा जी के नांगर जोते खेत सफूरा मठ, बछरु जीवन दान, पथरा उपर बाबा के चरन चिन्ह, छाता पहाड, अमरित कुंड, चरनकुंड, पंचकुंडी जइसन पबरीत अउ चमत्कारी जगा मन के चिन्हारी करीन । गिरौदपुरी म गुरू अगमदास के बनाये मंदिर ल परमुख मान के गुरूगद्दी पूजा सुरु करे गिस । माताजी संत, मंहत के संग गिरौदपुरी मेला के विस्तार बर गाँव-गाँव म फागुन महीना के पंचमी, छठ अउ साते म मेला होय के आरो देवत दरसन बर नेवता देवय। परचार होत गिस; गिरौदपुरी म अब संसार के सबले बडे सतनाम मेला लगथे । 77 मीटर ऊंचा जैतखाम सत के संदेस बगरात हवै।

‘कहि देबे संदेस’ सनिमा मंजूरी बर माता के भूमिका —

सन 1965 मनुनायक के बनाये छत्तीसगढी सनिमा ‘कहि देबे संदेस’ सामाजिक कुरीति के उपर बने हवे। ये सनिमा म बाम्हन जात के मुटियारी अउ सतनामी चेलिक के परेम अउ बिहाव रचाके सामाजिक बराबरी (समानता) के संदेस देवत कहिनी गढे गे हे। ते पाय के बाम्हन समाज के मन रोसियाये बिरोध करीन। रिलिज होने नई देत रहिन; बिरोध ल देख के सूचना प्रसारन मंत्रालय के सदस्य मन छत्तीसगढ के संसद सदस्य अउ गुनी जन ल देखाये बर सुझाव दिन। ओ समे मिनीमाता जी, डॉ. खूबचन्द बघेल के संग सिरी बाबू जगजीवन राम अउ सिरीमती इंदिरा गांधी जी तक ‘कहि देबे संदेस’ सनिमा देखीन। मिनीमाता जी आगू आइस, सनिमा बनइया मनुनायक जी ल इंदिरा गांधी जी से मिलवाइस अउ कहिस, फिलिम सामाजिक बुराई उपर बने हवै। येकर उपर रोक लगवाना न्यायसंगत नोहे। सूचना प्रसारन मंत्री इंदिरा गांधी जी रहिस। देखाये बर मंजूरी मिलगे । तहाँ सनिमा ल चलाये गिस। माता जी रोक लगन नई दीस |

गुरु घासीदास जयंती 18 दिसंबर 1968 के कार्यक्रम म छत्तीसगढ सनिमा कहि देबे संदेश बनइया सिरी मनुनायक, संगीत, निर्देशक सिरी मलय चक्रवर्ती अउ संगी कलाकार मन ल सतनामी समाज कोती ले सनमान करत माता जी सबो झिन कलाकार ल असीस देवत फिलिम के सफलता बर बधाई दिस।

माताजी के गुनान —

घाट अलग-अलग बनगे, धारा तो एक हे, ओकर काम एक हे, प्यासा के पियास बुझाना । घाट के अलग होय ले तरिया, नदिया, नरवा नई बदल जाय। आने–आने धरम, जात-बिरादरी हे, सतपुरष तो एक हे, देवधामी के नाव कतको हो सकत हे, फेर सत के सरूप नीं बलदै। घाट के भेदभाव म अपन मनखे पन ल गंवा डरथन | देखमरी, खो, ईरखा (मतभेद) भूला के निरमल धारा पाय बर मन एक करे बर परही | अंतस म मनखे पन आये ले सुख के लेवना पाये जा सकथे। फूल रंगबिरंग के होथे, एक सुत म पिरोये ले सुन्दर माला (हार) के रूप ले लेथे। अट्टसने मनखे घलु ल अपन अंतस म भाव गढे बर परही, जात, धरम के ईरखा भूलाये बर परही तभे मानुस जनम के कलियान होही।

माता जी के विचार म नता-गोता के डोर बढ नाजुक होथे, सम्हार के रखे बर परथे। अगास म उड्त पतंग ल जादा ढिल्ला छोडे म उडे के जगा भूईंया म गिरे लगथे; अपन कोती जादा ताने म पंतग के डोर टूट जथे। जबरदस्ती म नता के मया डोर टूटे के डर रिथि। बचाये रखे बर खुद के गलती सुधारे ले अउ दूसर के गलती संवासे म बनथे। गलती होय से छिमा मांग लेये म कोनो छोटे या नीचा नई हो जाय; येकर से मन के मइल धोवा जथे।

आज नता-कुनेता ल म तउले जात हे; परवार म मया-पिरीत खरा माते अस दिखथे। वीरान अठ अनचिन्हार असन लागथे। आगू चलके नवा पीढी ल का इही सिखौना सीखा के छोडबो ? मया के मंदरस म महुरा घोरे ले नइ बनय; कोकडा खिंधोहिल म सुमत नई माडै। अवइया बखत समाज, परवार के कउन दसा होही ? समझे बर परही । ‘घर अंधियार हे, तब मंदिर म दीया बारे ले का होही”?

गुरू बाबा के सतनाम! मंतर ल अंतस म बसाये बर परही। बाबा जी के बताये गियान धरे म बनही । तभे परवार अउ समाज म सुन्ता बंधाही।




सतनामी समाज के संस्कार ल लेके माताजी के विचार रहिस; हमर समाज म नारी ल बराबर माने-गउने जाथे। सनमान अउ बराबरी के दरजा मिलथे। समाज म आदमी जात के जतेक असथान हे ओतके नारी मन के हवे | नर-नारी दुनों मेहनती होथे, गरीबी विपदा ले जूझे बर जानथे। अपन हाथ सबो कारज कर लेथे; परभरोसिया नीं होय। ईरखा, देखमरी म घाट, पारा के बंटइया मन हमर समाज ल लेके तरह-तरह के पुरान दबाये रखे बर उदीम हमन देखत हन जतेक समाज सुधार होवत आवत हे ओहर अपन ल उच्च जात, बुधमान बतइया समाज म होत हे। सतीप्रथा, दाईज डोर, नारी ल भोग के जीनिस बताना, पराधीन बनाके के रखना, बालविवाह, रूढिवाद, पाखंड, जडसन बेमारी हमर समाज म नीयें।

“हमन ल सतनामी कहाये म गरब होथे | गुरू घासीदास बाबा जी! जइसे गियानी, मुक्तिदाता अवतार लेके आइस अद बुद्भ! असन तप–तपस्या म आत्मगियान पा के मानव जाति म सामाजिक क्रांति लाइस; जीवन म सतकर्म के बोध कराइस; अटके–भटके डरे, थके ल पार नकाइस । म छबडाये मनखे ल रद्दा बताइस: आसा-बिंसवास जगाइस, मनखे के करु कस्सा मिटाके नवा नता–गोता, संगी-साथी, हितवा-मितवा जोरीस । मनखे–मनखे एक बताके सतनाम! संदेस बगराइस ।”

माताजी कहै समाज म असिक्छा, बाल विवाह, नसाखोरी, घेखराहीपन, जइसन अवगुन हवे जेकर से जुझत हन । बिचारौ कब ले जुझबो ? चलनी म दुध दूह के, भाग ल दोस, अट्डसन म नइ बनै, करम सुधार के चले म बनही, अपन भाग खुद ल गढे बर लागही। काकरो आँच-पाँच ले दुरिहा रहिके डट के कमावा, डट के खावा, अउ छाती तान के रेंगव, चोरी करे म डर, मिहनत म का के डर ? जुआ-चित्ती, मंद-मउंहा, बीडी, गाजा, ये सब अरकट्हा रद्दा रेंगाथे; दुरिहा रहे बर परही, तभे हमन सच्चा सतनामी बनके रही सकत हन । पढे-लिखे म आगू आये ले सबो समस्या के निपटारा होही। बडहर मनखे के घलु अप्पढ रहे म कोनो दरजा नई राहै। हक अउ सनमान पाये बर सिक्छा सब ले बडे हथियार होथे, अग्यानता के अंधियारी मिटाये बर गियान जोत जलाये म बनही। समाज संसार म फबते, अलग चिन्हारी, मान सनमान पाथे।

माता मिनी के संदेस —

माता जी सिक्छा, संगठन, खान-पान, बोली-भाखा, आचरन अउ समाज के विकास बर जादा जोर देवत संदेस देये हवै…

1. सामाजिक निंयाव वेबस्था म चेत करिहा। निंयाव दीया बरोबर होथे; कहूँ निंयाव के दीया बुझा जथे, ओ समाज अंधियार म बुड जथे।

2. मिहनत से जी न चुराना चाही।

3. बेटी-बेटा ल जतेक जादा हो सकै पढोवा-लिखावा कोर-कपट झिन करिहौ।

4. गुरु घासीदास बाबा जी के बताये सतमारग म चलना हे।

5. अपन ल हीनहर नड समझना ये।

6. रहन-बसन साफ सुथरा अउ बानी के मिठास ले बइरी घलु जुरथे।

7. दूसर ल सनमान देये म सनमान मिलथे। फेर ओतके देना चाही जतका जरुरत हे।

8. आज जमाना संगठन के आय, जुग झुकाने वाला के ये; समाज म एक फेंट होके रहे म बनही ।

9. सोसित बनके नई रहना ये, सोसन के बिरोध म जुझे बर परही, तभे हक पाये जा सकथे।

10. सादा खान-पान, उज्जर चरित्र, मन, वचन, आचरन के पबरित रहे ले मनखे पन झलकथे।

11. अंतस म आत्मविश्वास के जागे ले, आत्मबल मिलथे, अंधियारी म उजियारा लाथे, बिसवास के दीया जलाके रखव, जिनगी सँवर जाही।




माता जी के सतलोकी होना —
माताजी भंडारपुरी ले रयपुर होवत दिल्ली जाय बर निकलगे। दिल्ली जाय के पहली भोपाल म पुत्र विजयकुमार से मिलके पढई-लिखई के आरो लेवत हवाई जिहाद म बइठगे | जिहाद म माता जी सहित 14 झिन मनखे सवार रहिन । दिल्ली पहुँचते-पहुँचते पालम हवाई अड्डा नजीक तूफान म जिहाद पहाडी म ठोकर खाके गिरगे। 11 अगस्त 1972 के अधराति मिनीमाता जी बिसाल समाज ल आँसू म बुडोके रोवत, कंदरत छोडके सतलोकी होगे । सतनामी समाज अपन महतारी ल गंवा डारिस।

ग्राम चटुवापुरी धाम (सिमगा) म गुरू अगमदास अउ माता जी के समाधी हवै जिंहा हर बछर पूस पुन्नी म गुरू दरसन मेला लगथे जिहां गुरूजी अउ गुरूमाता ल माथ नवाके सर्वा अरपित करथें।

छत्तीसगढ राज बनगे, माता जी के सपना पूरा करे के भार हम जम्मो छत्तीसगढिया मन उपर हे; तभे हम अपन हक, सनमान पा सकत हन । निंही त परभरोसिया रहि जाबो।

माता मिनी जी हमर बीच नइये, ओकर बताये संदेस हवे, जेकर ले बल मिलथे। हम सब ल नवा रद्दा देखाइस; उही रद्दा म आगू बढना हे। नांव अम्मर हे, आज लाखों लोगन के अंतस म माताजी बसे हव्य |

“संग छूटगै, मिटगे काया, रहिगे माता सतकरम्।
जुग-जुग रहही नाव अम्मर, जनाये मनखे धरम” ।।
जय सतनाम




गुरू माता मिनी
दुबर-हीनहर के देख आँसू जावै करेजा फाट
दुलरैया-बरसैया मया, माता मिनी के हिरदे विराट
अम्मल म देवमती, पबरीत अन्तस भाव-भक्ति
उन्नीस सौ पन्द्रह फागून महीना, अवतरे मगन सबीना
अँगना गूंजे सोहर गीत, तक धिन्ना मांदर खटका बीत
सहरावैं भाग किलकारी सुन, उछाहित परवार बिधुन
मुच-मुच हास, हरसवि मन, असम म धरि जनम
नाव देवी मीनाक्षी धरावे, चन्दा बरन रूप पाये
छत्तीसगढ के धन भाग, बिहाव रचाये गुरू अगमदास
गुरू माता के दरजा पाइस, मीनाक्षी मिनीमाता कहाइस
चिन्हारी कहाँ जात-पात ? दुलारिस सबन ल महतारी
जुलमी देखाये आँखी जब-जब, रूप बघनीन के तब-तब
कवच दलित-सोसित के, पहिचान सतनामी रीत के
सतनाम! के सोर बगराइस, अँचरा भटके पाइस
सेत बसन माथ म चन्दन, भागमानी जन पावै दरसन
थर्राजय संसद जब गरजै, देस भर तहाँ चिहूर परजै
भेदभाव चतुवान कान्हून लाइस, दलित मान हक देवाइस
बियाकूल देख नारी दसा, बुझाइस बेटी पावै सिक्छा
गुन माता के कतेक छोडव कङन-कउन सुनावं
भाईचारा परमारथ खातीर, होइस माता कुर्बान आखिर
उन्नीस सौ बहत्तर गियारा अगस्त, परगे जउंहर बिपत
सतलोकी दुलार पुरवइया, मिलगे माटी म कंचन काया
खायेन किरिया हम संतान, अबिरथा नीं जावै बलिदान
रहिगे सुरता के चंदन, असीस दे माता हवै बन्दन ||