मन के दीया ल बार
कटय नहीं अंधियारचाहे लाख दीया ल बारहोही जगजग ले अंजोरमन के एक दीया ल बार।जाति-धरम भाषा के झगरा बंद होक जाहीमया पिरीत के रूंधना चौबंद हो जाहीसावन कीरा कस गंजा जाही संसार…सुने म न तो कान पिरावय न देखे म आंखीदेख सुन के कर नियाव, निकले मुख अमरित बानीकबीर कहे हे उड़ जय थोथा राहय सुपा में सार…तैंतीस कोटी देवी-देवता अउ कतको धरम-करमखड़-खड़ के भगवान चुनेन नई जानेन हम मरमहर मनखे भगवान के अंशी करले चिटिक सोच विचार…कुआं, तरिया, नदी-नरवा, फेर कतको कन हे पियासापगुरा लेयन सब घाट घठौंदा पानी के दुरदसाबनके भागीरथ बोहवा गंगाधार…देर सबेर भूले भटके कतको बेर होय घर आय ल परथेउमड़त-घुमरत अगाश ल भुइयां मं गोड़ मढ़ाय ल परथेहम चेतन चेतावन जग ल काबर सहन करन अत्याचार…। अनिल कुमार भतपहरी


