अनुवाद : बारह आने
(मोरेश्वर तपस्वी ”अथक” द्वारा लिखित ”बारह आने” का अनुदित अंश) वो ह मोर हाथ ल धरलिस अउ एक ठन छोटकन पुड़िया दे के मोर मुठा ल बंद कर दिस अउ कहिस- बाबू जी, आज मोर मंसा ह पूरा होगे। मैं तुम्हीं ल खोजत रहेंव। आज मिलगेव। ये पुड़िया म तुंहर बारा आना ह हावय। बाबूजी, मैं गरीब हंव फेर काकरो उपकार ल रखना नइ चाहवं। दू महीना बनी करके मैं ये बारा आना ल बचाय हांवव। संझा के बेरा रहिस। अगास करिया-करिया बादर छाय रहिस। बादर ल चीर के सुरुज भगवान के किरन ह सतरंगी छटा देखावत रहिस। हवा के झकोरा पाके पेड़, पउधा सिहर जावय। अइसे लागय जइसे भींगे चिरई ह पांखी ल फड़फड़ा के पानी ल झर्रावत हे। अइसे सुघ्घर मउसम म दू-चार गिंया संग मैं ह घूमे बर निकलेंव। हमन बतियावत रेंगत रहन, का जानी कइसे मोर धियान ह सड़क तीर परे एक झन मनसे डहर चल … आघू पढ़व



