Chhattisgarhi

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अनुवाद : बारह आने

(मोरेश्वर तपस्वी ”अथक” द्वारा लिखित ”बारह आने” का अनुदित अंश) वो ह मोर हाथ ल धरलिस अउ एक ठन छोटकन पुड़िया दे के मोर मुठा ल बंद कर दिस अउ कहिस- बाबू जी, आज मोर मंसा ह पूरा होगे। मैं तुम्हीं ल खोजत रहेंव। आज मिलगेव। ये पुड़िया म तुंहर बारा आना ह हावय। बाबूजी, मैं गरीब हंव फेर काकरो उपकार ल रखना नइ चाहवं। दू महीना बनी करके मैं ये बारा आना ल बचाय हांवव। संझा के बेरा रहिस। अगास करिया-करिया बादर छाय रहिस। बादर ल चीर के सुरुज भगवान के किरन ह सतरंगी छटा देखावत रहिस। हवा के झकोरा पाके पेड़, पउधा सिहर जावय। अइसे लागय जइसे भींगे चिरई ह पांखी ल फड़फड़ा के पानी ल झर्रावत हे। अइसे सुघ्घर मउसम म दू-चार गिंया संग मैं ह घूमे बर निकलेंव। हमन बतियावत रेंगत रहन, का जानी कइसे मोर धियान ह सड़क तीर परे एक झन मनसे डहर चल … आघू पढ़व

अनुवाद : तीसर सर्ग : सरद ऋतु

कालिदास कृत ऋतुसंहारम् के छत्तीसगढ़ी अनुवाद- अओ मयारुककांसी फूल केओन्हा पहिरे,फूले कमल कसहाँसत सुघ्घर मुंहरनमदमातेहंसा के बोली असछमकत पैजनियां वालीपाके धान के पिंवरी लेसुघ्घर येकसरी देंह केमोहनी रूपनवा बहुरिया कससीत रितु ह आगे। सीतरितुआय ले कांसी फूल ले धरतीचंदा अंजोर म … आघू पढ़व

हीरानंद सच्चिदानंद वात्सायन अज्ञेय के तीन कविता

हीरानंद सच्चिदानंद वात्सायन अज्ञेय के तीन कविता

सांपसांप! तोला सऊर अभी ले नई आईससहर म बसे के तौर नई आईसपूछत हंव एक ठन बात-जवाब देबे?त कइसे सीखे डसे बर-जहर कहां पाये? पुलजोन मन पुल बनाहींवो मन सिरतौन पाछू रहिं जाहींनहक डारही सेनारावन ह मरही जीत जाही राम … आघू पढ़व

मिट्ठू मदरसा : रविन्द्रनाथ टैगोर के कहिनी के छत्तीसगढ़ी अनुवाद

एक ठिक मिट्ठू राहय। पटभोकवा, गावय मं बने राहय। फेर बेद नई पढ़य। डांहकय, कूदय, उड़ियाय, फेर कायदा-कानहून का होथे, नई जानय। राजा कथे ‘अइसने मिट्ठू का काम के’ कोनो फायदा तो नी हे, घाटा जरूर हे। जंगल के जमें … आघू पढ़व