सोन चिरई
ओन्हारी सियारी सेकलाथे ताहन किसान मन के चोला ह हरियाथे। हरियाही काबर नहीं, काबर कि इही ओन्हारी-सियारी के बदौलत तो जिनगी ल संवारना रहिथे। बने सुकाल होगे त सोचे बिचारे काम बूता ल निपटाथें। कहुं दुकाल परगे त दुब्बर बर दु असाढ़ हो जथे। दुरदेसी कका ह बेलौदी गांव के उन्नत किसान आय। छपराही के ऊपर म ओकर पांच एकड़ जमीन हे। भगवान के दे सुन्दर मोटर पंप घलो हे। धान ल लुथे ताहन अपन बारी म रमकेलिया, चुरचुटिया ल उपजा के कांदा-भाजी कस अपन जिनगी ल हरियाथे। एसो तो कका ह आधा एकड़ के रमकेलिया म बने कमाए रीहिसे। जेब डोभरा गे रीहिसे। फागुन के महिना म कका-काकी के दुलौरिन बेटी सोनचिरई ह आठवीं के परीक्षा देवाय बर बखरी ले निकलिस त सोनचिई नइ जानत रीहिसे के मोर जिनगी के घलो परीक्छा होवइया हे। सोनचिरई ह कका के अंगोछ म रीहिसे। तेरा-चउदा साल के उमर म सोला कस दिखथ … आघू पढ़व



