नान्हे कहिनी : सात फेरा
नोनी रूखमनी ह अपन परिचय देवत कहिथे आदमी अपन मन ले सुखी अऊ दु:खी होथे। मैं हां तुंहर पांव बनहू। ये चुंदी ल झन कटवाहूं। इही हा साधु सन्यासी के निसानी होथे। तुंहर परिचय इही हे। जिनगी के बड़ गजब किस्सा हे संगवारी हो, गरीब, मजबूरी एकर हिस्सा हे। एक घर के बाह्मन परिवार घला गरीबी म गुरज-बसर करत राहय। फेर धरम अऊ ईमान के रद्दा म रेंग के जीयय। संझौती बेरा म एक दिन ओखर घर गेंव। महतारी हरदी मिरचा ल पीसत राहय। मैं हा केहेंव का होगे महाराजिन दाई। अपने अपन खिसिया-खिसिया के रांधत हस। महराजिन दाई कहिथे- काबर नई खिसियावंव बेटा, चौथापन म रांधे बर होगे। जाने कब रंधई-खवई हा छूटही। बूड़हा महराज ल पूजा-पाठ ले फुरसत नइए। बेटा सारदा ल भागवत गीता ले फुरसत नइए। ये घर म मिही हा फुरसत हंव। मैं कहेंव- ‘महराजिन दाई तुंहर पुकार ल भगवान एक दिन जरूर सुनही। भगवान के … आघू पढ़व


