छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल
एकक दाना बर किसान लुलवात रहिथे रे ओखर मिहनत मा आने मेछरात रहिथे रे !! हरर-हरर नांगर बईला धरे मुंधरहा जाय ओखर माथ मा पछीना चुचावत रहिथे रे !! संसो रिथे सुक्खा नईते पनिया दुकाल के एती ओती लईका मन छुछवात रहिथे रे !! झिमिर-झिमिर बरखा संग मा जुड़जुड़हा सिपा बैरी चूल्हा के आगी गुंगवात रहिथे रे !! हरियर-हरियर पाना मा सोन सही बाली ‘शकुन’ आँखी मा सपना भुलवात रहिथे रे !! शकुन्तला तरार



