मन के सुख
अंजली दीदी फूफू दीदी संग माटी मताए अउ गारा अमरे बर जावय। तेकर पाछू एक झन डॉक्टर इहां झाड़ू पोछा के काम करे लागीस। इहें वोला पढ़े अउ आगे बढ़े के माहौल मिलिस। ऊंहा के डॉक्टर अउ नर्स मन ले मिलत प्रोत्साहन के सेती वो ह आया, फेर नर्स अउ फेर नर्स ले डॉक्टर के पदवी तक पहुंचगे। अब नौकरी छोड़के अपन अस्पताल चलावत हे। अब वो ह माटी मताने वाली अउ झाड़ू पोछा लगइया अंजली नहीं, डॉक्टर अंजली हे। ‘भोला… ए भोला.. लेना अउ बताना अंजलि के कहिनी ल’ – जया फेर लुढ़ारत बानी के पूछिस। भोला कहिस- ‘अंजलि जतका बाहिर म दिखथे न, वोतके भीतरी म घलोक गड़े हावय। एकरे सेती एला नानुक रेटही बरोबर झन समझबे। एकर वीरता, साहस, धैर्य अउ संघर्ष ह माथ नवाए के लाइक हे, तभे तो सरकार ह ‘नारी शक्ति’ के पुरस्कार दे खातिर एकर नांव के चिन्हारी करे हे।’ -’हहो जान डरेंव … आघू पढ़व


