बियंग : टुरी देखइया सगा
हमर गांव-देहात म लुवई-टोरई, मिंजई-कुटई के निपटे ले लोगन के खोड़रा कस मुंह ले मंगनी-बरनी, बर-बिहाव के गोठ ह चिरई चिरगुन कस फुरूर-फुरूर उड़ावत रइथे। कालिच मंगलू हल्बा के नतनीन ल देखे बर डेंगरापार के सगा आय रिहिस। चार झन रिहिन। दू झन सियनहा अउ दू झन नवछरहा टुरा। ठेला करा मोला पूछिस- ‘कस भइया, इहां हल्बा नोनी हावय बर-बिहाव करे के लइक।’ कहेंव- हव, कइसन ढंग के लड़की चाही आप मन ला। एक झन मोट्ठा सगा ह अंटियावत दांत निपोरीस- ‘कुंआरी।’ ओखर हांथी खिसा दांत ल देख के एक हुद्दा लगातेंव तइसे लागत राहे पर का करबे गांव-घर म आये सगा ए, सगा हर सगा होथे अउ लडक़ी देखइया ए काबर के गांव-घर के सबो के बेटी अपने बेटी होथे। सोंचके मन ल मुसेटेंव- ‘हाव सगा हो, चलव लेग देथंव। आगू-आगू मंय, पाछू मं भेंड़ कस मुंडी गड़ियाय सगा मन चलिन। मंगलू हल्बा घर पहुंचेंन।’ बोधन भइया हावय का … आघू पढ़व


