बांझ के पीरा-बांझ के सुख
लघुकथा‘तें मोला टूरा-टूरी नइ देस ना सुन्दरी, मे दूसर बिहाव करहूं तें मोला दोसदार मत कबे, काबर नी देत हस मोला तेंहा टूरा-टूरी। दू बच्छर ले जादा होगे फेर तोर पांव भारी नी होवत हे।’ भुलऊ ह अपन सुन्दरी नाम के गोसइन ल धमका के काहत राहय।‘मोर किस्मते मा नइ हे तेला का करहूं, तोला भारी पांव वाली गोसइन लाना हे ते ले आ, मोला कुछु नी कहना हे।’ सुन्दरी ताना ल सुन के फैसला सुना दीस।‘भुलऊ ल मौउका मिलिस। तहां ले राम्हीन ला बना के ले अइस जेन साल भर मा दू झन जुड़वा लइका दे के भुलऊ ल खुस कर दीस।’सुन्दरी ल अपन जीवन ह ए घर मा पहाड़ सही भारी लागत रीहीस त उहू ह हाथ लमा के दूसर घर चल दीस। सुन्दरी के नवा गोसइंया के घरवाली ह एक झन टूरा जनम के बीमारी मा खतम होगे रीहीस हे। टूरा ल सुन्दरी ह अपन बेटा कस … आघू पढ़व


