कहिनी : उपास
गांव म एक झन बिमरहा मनखे रहय। रोज के पेट पीरा म बिचारा कुछ काम-बुता करे नई सकय। भात खावय तहां ले बाहिर कोती जावय। थोरकिन हफरहा बानी तको रहीस। एक दीन के बात आय। परस हर भात खाके लोटा म पानी धरके चुपे-चाप बाहिर जाय बर निकलत रहीस ततके बेरा कईलान महराज घूमत-घामत आत रहिस। परस ल देख डारिस अउ कहे लागिस… कस जी परस, तैं चुपेचाप अभी कइसे निकलत हावस। तोला खेत खार के संसो नइए का? परस हर कईलान महराज के गोठ ल सुनके कइथे, मोर दु:ख ल तोला कइसे बताववं महाराज! मोर पेट हर रोज-रोज पीरा करथे। भात खाथंव तहां ले मोला बाहिर कोती लागथे। ये दे अभी भात खाय हाववं तहां ले लोटा धर के बाहिर कोती जाय बर निकलत हाववं। येकरे सेती मैं कोनो कोती बुता काम नई जाय सकत हाववं। कईलान महराज परस ल कइथे परस, तैं मोर बात ल मानबे त तोर … आघू पढ़व


