Chhattisgarhi
  • सोन चिरई

    ओन्हारी सियारी सेकलाथे ताहन किसान मन के चोला आघू पढव...

    मई दिवस

    अइसन होथे काबर..... अइसन होथे काबर संसार म मेहनत आघू पढव...

    आईपीएल के बुखार

    स्कूल कॉलेज के छुटृटी हाबय, गरमी परत अपार आघू पढव...

    ग्राम सुराज

    फ़ेर सुरू होवत हवय हमर छत्तीसगढ म ग्राम आघू पढव...

    छत्तीसगढ़ के संस्कृति अउ लोकगीद पंथी

    ''पंथी गीद म लोक कल्याणकारी नीति, संदेस के रूप आघू पढव...

    छत्तीसगढ़ी कव्वाली- भरमाहा होगे नर तन

    भरमाहा होगे नर तन, चिटिक बात म अगन हो जाथे। नता आघू पढव...

    ''अमरइया म ना''

    चल जाबो रे संगी, चल जाबो रे जोही करमा नाचे ल आघू पढव...

    तोर मेहनत के लागा ल.....

    तोर मेहनत के लागा ल, तोर करजा के तागा ल उतार आघू पढव...

    माटी के मँदरी

     माटी के मँदरी ल चामे म छवाए कइसे? झुल-झुल आघू पढव...

    सोन चिरई

    ओन्हारी सियारी सेकलाथे ताहन किसान मन के चोला आघू पढव...

    मई दिवस

    अइसन होथे काबर..... अइसन होथे काबर संसार म मेहनत आघू पढव...

    आईपीएल के बुखार

    स्कूल कॉलेज के छुटृटी हाबय, गरमी परत अपार आघू पढव...

Category Archives: श्यामू विश्वकर्मा

कहिनी : उपास

गांव म एक झन बिमरहा मनखे रहय। रोज के पेट पीरा म बिचारा कुछ काम-बुता करे नई सकय। भात खावय तहां ले बाहिर कोती जावय। थोरकिन हफरहा बानी तको रहीस। एक दीन के बात आय। परस हर भात खाके लोटा म पानी धरके चुपे-चाप बाहिर जाय बर निकलत रहीस ततके बेरा कईलान महराज घूमत-घामत आत रहिस। परस ल देख डारिस अउ कहे लागिस… कस जी परस, तैं चुपेचाप अभी कइसे निकलत हावस। तोला खेत खार के संसो नइए का? परस हर कईलान महराज के गोठ ल सुनके कइथे, मोर दु:ख ल तोला कइसे बताववं महाराज! मोर पेट हर रोज-रोज पीरा करथे। भात खाथंव तहां ले मोला बाहिर कोती लागथे। ये दे अभी भात खाय हाववं तहां ले लोटा धर के बाहिर कोती जाय बर निकलत हाववं। येकरे सेती मैं कोनो कोती बुता काम नई जाय सकत हाववं। कईलान महराज परस ल कइथे परस, तैं मोर बात ल मानबे त तोर … आघू पढ़व

नान्हे कहिनी : डोकरा-डोकरी के झगरा

डोकरा-डोकरी के झगरागांव म एक ठन घर में डोकरा-डोकरी रहय। एखर मन के लोग-लइका नई रहिस। डोकरा-डोकरी अतका काम-बुता करय के जवान मनखे मन नई कर सकंय। अपन खेत-खार ल अपनेच मन बोवय अपनेच मन निंदय-कोंड़य। बुता-काम ले थोर-बहुत ठलहा … आघू पढ़व

कबिता : बसंत रितु आथे!

हासत हे पाना डारा। लहलहात हे बन के चारा॥ कुद कुद बेंदरा खाथे। रितु राज बसंत आथे॥ चिरई चिरगुन चहके लागे। गुलाबी जाड़ अब आगे॥ लहलहात हे खेत खार। रुख राई लगे हे मेड़ पार॥ पेड़ ले अब गिरत हे … आघू पढ़व

कबिता : चना-बऊटरा-तिवरा होरा

शहरिया बाबू आइच गांव म।खड़ा होइस बर पिपर छांव म॥ दाई ददा के पाव पलगी भुलागे।बड़ शहरिया रंग छागे॥ये माघ के महिना।पहिने सुग्घर गहिना॥गिरा घुमे फिरे अपन खेत म।छत्तीसगढ़िया रेंगना रेस म॥हेमा पुष्पा मन्टोरिया पोरा।भुंजिस चना बऊटरा तिवरा होरा॥देख के … आघू पढ़व

आथे गोरसी के सुरता

पागा बांधे बुढ़गा बबापहिरे पछहत्ती चिथरा कुरता।पियत चोंगी तापे खनीयाआथे गोरसी के सुरता॥नंदागे गोरसी नंदागे चोंगी,मन होगे बिमार तन होगे रोगीबदल गे दुनिया बदल गे बारबदल गे बखरी बदल गे खार।नंदागे जाड़ ठंडानंदागे तपई बरई भुर्रीनंदागे झिटी बिनय काड़ी।नंदागे भइंसा … आघू पढ़व

रूख लगाय के डाढ़ – कहिनी

एक झन पुराना बाबू कहिस रूख के बदला हमन ला रूख लगा के दिही। अब तुंहर काय विचार हे अब तुमन बतावव। गांव के पंच, सरपंच, मिलजुल के कहे लागिस। तुमन अपन अपन हाथ म बीस-बीस पेड़ तरिया के जात … आघू पढ़व

डुमर डारा : कबिता

कोचके भौजी भइया लाकइबे जाके सब पाराआज मड़वा गड़ही भाई के काटे जाहा डुमर डारा। हरियर-हरियर छाय लागहीढेड़हा-ढ़ेड़हीन ल जागे लागहीसजाही मंगरोहन पिढुहा फुफुदीदी धरे पर्राभौजी के बहनी उड़ावय गर्राभड़त-भड़त थक गे समधीनचाबत हे बहेरा, हर्रा। लाली-लाली पहिने लुगरीदीखत हे … आघू पढ़व

श्यामू विश्वकर्मा के कबिता : मन के आंसू मन म पोंछ ले

मन के पीराकर देथे तन ल खोखलाचाहे होवय जवाननई छोड़य लईका-डोकरा।घुट-घुट के बेंगवाजइसे येती-ओती तलमलाथेनिकाल देबे कुंआ ले ये बेंगवाबिन पानी के फड़फड़ाथे॥तस मन के पीराबन के भाला तन ला कोचयमने हर बिमार पड़े हेत तन के पिरा कोन सोचय।ये … आघू पढ़व