Category: Shabdkosh

प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – कहावतें

छत्तीसगढ़ी कहावतें (हाना / लोकोक्तियाँ) :-
कहावत का शाब्दिक अर्थ है ‘लोक की उक्ति’। इस अर्थ से कहावत का क्षेत्र व्यापक हो जाता है, जिसे हिन्दी साहित्य कोश में इस प्रकार व्यक्त किया गया है “लोकोक्ति में कहावतें सम्मिलित हैं, लोकोक्ति की सीमा में पहेलियाँ भी आ जाती हैं।’ परन्तु आज ‘लोकोक्ति’ शब्द ‘कहावत’ या प्रोवर्ष के पर्याय के रूप में रूढ हो चला है। इसके अंतर्गत पहेलियाँ नहीं रखी जाती (यदु: छत्तीसगढ़ी कहावत कोश: 2000-7)। छत्तीसगढ़ी की बहुप्रचलित कहावतें इस प्रकार हैं –

अँधरा पादै भैरा जोहारै (अंधा पादे, बहरा जुहार करे)
अँधरा खोजै दू आँखी (अंधा खोजे दो आँख)
अँधवा म कनवा राजा (अँधों में काना राजा)
अक्कल बडे़ के भैंस (अक्ल बड़ी की भैंस)
अड़हा बइद प्रान घात (अनाडी वैद्य प्राण घातक होता है॥
अपन आँखी म नींद आथै (अपनी आँखों में नींद आती है।)
अपन कुरिया घी के पुडिया (अपना घर स्वर्ग समान)
अपन मराए काला बताए (अपनी समस्या किसे बताएँ)
अपन मरे बिन सरग नि दिखय (अपने मरे बिना स्वर्ग दिखायी नहीं देता ॥)
अपन हाथ जगन्नाथ (अपना हाथ जगन्नाथ)
अपन गली म कुकुर घलो बघवा कर नरियाथे (अपनी गली में कुत्ता भी शेर की तरह दहाड़ता है।)
आए नाग पूजै नहीं, भिंभोरा पूजे जाए (आए हुए नाग की पूजा न करके उसके बिल की पूजा करने के लिए जाता है।)

प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – मुहावरे

आगू के करु बने होथे (पहले की कड़वाहट बाद की कड़वाहट से अच्छी)
आप रुप भोजन, पर रुप सिंगार (आप रुचि भोजन, पर रूचि श्रृंगार)
आए न जाए चतुरा कहाए (आता जाता कुछ नहीं चतुर कहाता है)
उपर म राम-राम, भितर म कसइ काम (मुख में राम बगल में छूरी)
एक कोलिहा हुँआ-हुँआ त सबो कोलिहा हुँआ-हुँआ (एक सियार हुँआ बोला तो सभी सियार हुँआ बोले)
एक जंगल म दू ठिन बाघ नि रहय (एक जंगल में दो शेर नहीं रह सकते)
एक ठन लईका गाँव भर टोनही (एक अनार सौ बिमार)
एक ला माँ एक ला मौसी (भाई भतीजावाद करना)
एक हाथ के खीरा के नौ हाथ बीजा (तिल का ताड़, राई का पहाड़)
कथरी ओढे घी खाए (खाने के दांत अलग दिखाने के अलग)
कतको करय गुन के न जस (कितना भी करें गुण का न यश का)
कौआ के सरापे गाय नि मरय (कौंआ के श्राप से गाय नहीं मरती)
करिया आखर भैंस बरोबर (काला अक्षर भैंस बराबर)
करेला तेमा नीम चढ़य (एक तो करेला उस पर नीम चढ़ा)
कहाँ गे कहूँ नहीं काय लाने कछु नहीं (कहाँ गए कहीं नहीं क्या लाए कुछ नहीं)
कहाँ राजा भोज कहाँ गंगवा तेली (कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली)
नंगरा नहाही काला अउ निचोही काला (नंगा नहाएगा क्या और निचोडेगा क्या )
का माछी मारे का हाथ गंधाए (मक्खी मारकर हाथ गंदा करना)
गरियार बइला रेंगथे त मेड्बवा ल फोर के (आलसी कुछ करता नहीं, करता है तो नुकसान करता है)

बाम्हन कुकुर नाउ, जात देख गुर्राउ (प्रतिद्धन्दी से ईष्या करना)
कुकुर के पूछी जब रही टेडगा के टेडगा (कुत्ते की पूँछ कभी सीधी नहीं हो सकती)
कुकुर भूकय हजार हाथी चलय बजार (कुत्ते भोंके हजार, हाथी चले बाजार)
कोरा म लइका गली खोर गोहार (बगल में बच्चा गाँव भर हल्‍ला)
खसू बर तेल नहीं घुडसार बर दिया (खुजली मे लगाने को तेल नहीं पर घुडसाल में दिया जलाने के लिए तेल चाहिए)
गंगा नहाए ले कुकुर नई तरय (गंगा स्नान करने से कुत्ते को मोक्ष प्राप्त नहीं हो जाता)
गाँव के कुकुर गाँवे डहार (गाँव का कुत्ता गाँव की ओर से ही भोंकता है)
गाँव के जोगी जोगड़ा आन गाँव के सिद्ध (गाँव का जोगी जोगड़ा आन गाँव का सिद्ध)
गाँव गे गवार कहाए (गाँव गए गवार कहाए)
गाँव भर सोवै त फक्कड रोटी पोवै (गाँव के सभी लोग सो जाते हैं तो फक्कड रोटी बनाता है)

बढई के खटिया टुटहा के टुटहा (दिया तले अँधेरा)
गुरु तो गुड रहिगे चेला शक्कर होगे (बाप से बेटा सवा शेर)
घर के भेदी लंका छेदी (घर का भेदी लंका ढाए)
घर के कुकरी दार बरोबर (घर की मुर्गी दाल बराबर)
घानी कस किंजरत हे (कोल्हू का बैल बनना)
घी देवत बामहन टेड़वाए (बेवजह नखरे करना)
चट मंगनी पट बिहाव (चट मंगनी पट विवाह)
चटकन के का उधार (थप्पड की क्या उधारी,/क्वथनं किं दरिद्रम)
चमड़ी जाए फेर दमड़ी झन जाए (चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए)
चार बेटा राम के कौडी के न काम के (चार बेटे राम के कौडी के न काम के)
चिर म कौंआ आदमी म नउँवा (पक्षियों में कौंआ और मनुष्यों मे नाई)
चोर मिलय चंडाल मिलय फेर दगाबाज झिन मिलय (चोर मिले चंडाल मिले किन्तु दगाबाज न मिले)
सिधवा के डौकी सबके भौजी (सीधे व्यक्ति की पत्नी सभी की भाभी)
छानी म चघके होरा (छप्पर पर चढकर होला है)

प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – मुहावरे

जइसे जइसे घर दुवार तइसे तइसे फइरका जइसन दाई-ददा तइसन तइसन लइका (जैसा घर वैसा दरवाजा, जैसे मां-बाप वैसे बच्चे)
हूम देके हाथ जरोए (भलाई का जमाना नहीं)
मया के मारे मरे त दूनो कुला जरे (अधिक प्रेम करने से शत्रुता हो जाती है।)
जिहाँ गुर तिहाँ चाँटी (जहाँ गुड वहाँ चींटी)
जेखर घर डउकी सियान तेखर घर मरे बियान (जिसके घर में पत्नी की चलती हो वहाँ पति की मृत्यु हो जाती है)
जेखर बेंदरा तेखरे ले नाचथे (जिसका बंदर उसी से नाचता है)
जेखर लाठी तेखर भैंस (जिसकी लाठी उसकी भैंस)
जइटसन बोही तहसन लूही (जैसा बोएगा वैसा काटेगा)
जोन गरजथे तोन बरसे नहीं (गरजने वाले बरसते नहीं)

जोन तपही तोन खपबे करहि (जो अत्याचार करेगा वह नष्ट होगा)
झांठ उखाने ले मुर्दा हरू नी होय (झांट उखाडने से मुर्दा हल्का नहीं होता)
टठिया न लोटिया फोकट के गौंटिया (थाली न लोटा मुफ्त के जमीदार)
टिटही के थामें ले सरग नि रुकय (अकेला चना भाड्ड नहीं फोड सकता)
रद्दा के खेती अउ रांडी के बेटी (रास्ते की फसल और विधवा की पुत्री का कोई रखवाला नहीं होता)
राजा के अगाड़ी अउ घोड़ा के पिछाडी (राजा की अगाड़ी अउ घोड़ा की पिछाड़ी)
चोदरी डउकी के बारी ओखी (वेश्या औरत के अनेंक बहाने)
तइहा के गोठ बइहा ले गे (गई बात गणपत के हाथ)

तिन म तेरा म ढोल बजावै डेरा म (कबीरा खड़ा बाजार में सबकी मांगे खैर, ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर)
म लाडू नि बंधावय (थूक थूक से लड्डू नहीं बंधता है।)
दाँत हे त चना नहीं, चना हे त दाँत नहीं ( दाँत है तो चना नहीं चना है तो दाँत नहीं)
दुब्बर बर दू असाड (गरीबी में आटा गिला)
दूध के जरे ह मही ल फूक के पीथे (दूध का जला छाछ को भी कर पीता है)
दुधारी गरुवा के लातों मीठ (दुधारु गाय की लात भी सुहाती है)
दुरिहा के ढोल सुहावन (दूर के ढोल सुहावने)
धोए मुरई बिन धोए मुरई एके बरोबर (गधा घोडा एक समान)
न उधो के देना न माधो से लेना (न उधो को देना न माधो से लेना)
न गाँव म घर न खार म खेत (न गाँव में घर न खार में खेत)
कतको घी खवा चाँटा के चाँटा (कितना भी खिलाओं अंग नहीं लगेगा)
न मरय न मोटाए (न मरेगा न मोटाएगा)

नकटा के नाक कटाए सवा हाथ बाढय (नक्टे की नाक कटी परन्तु वह सवा हाथ बढ गयी)
नानकुन मुह बडे-बडे गोठ (छोटा मुँह बडी बात)
नीच जात पद पाए हागत घानी गीत गाए (तुच्छ को पदवी मिल जाती है तो वह अभिमानी हो जाता है)
नौ हाथ के लुगरा पहिरे तभो टांग उघरा (नौ हांथ लम्बी साडी पहनने पर भी पैर नंगे)
पर भरोसा तीन परोसा (पराधीन सपनेहू सुख नाही)
सही बात के गांड गवाही (सांच को आंच नहीं)
फोकट के पाए त मरत ले खाए (फोकट के चंदन घिस मेरे नंदन)
बर न बिहाव छट्ठी बर धान कुटाए (शादी न ब्याह छठी के लिए धान कुटाए)
जादा मीठ म कीरा परय (अति परिचयात् अवज्ञा)
बाते के लेना बाते के देना (ब्यर्थ बकवास करना)
बाप मारिस मेचका बेटा तीरंदाज (बाप ने मारी मेंढकी बेटा तीरंदाज)
बाप ले बेटा सवासेर (बाप से बेटा सवा शेर)

बिन देखे चोर भाई बरोबर (बिना देखा हुआ चोर भाई बराबर)
बिलई के भाग म सिका टुटय (बिल्ली के भाग्य से टूटा)
बुढ़तकाल के लइका सबके दुलरवा (बुढ़ापे का बच्चा सबका प्यारा)
बेंदरा काय जानय आदा के सुवाद (बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद)
भगवान घर देर हे अंधेर नइ ये (भगवान के घर देर है अँधेर नहीं)
भागे भूत के लंगोटी सही (भागे भूत की लंगोटी सही / नहीं मामा से काना मामा)
भूख न चिनहय जात कुजात, नींद न चिनहय अवघट घाट (भूख जात कुजात की और नींद अच्छे बुरे स्थान की पहचान नहीं करती)
भंइस के आघू बिन बजाए भैंइस बइठे पगराए (भैंस के आगे बिन बजाए भैंस रही पगुराए)
दान के बछिया के दाँत नि गिने जाए (दान की वस्तुओं का मूल्यांकन नहीं किया जाता)
मार के देखे भुतवा काँपे (मार से भूत भी काँपता है)

प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – मुहावरे

मुड़ मुड़ाए त छुरा ल का डराए (ओखली में सिर दिया तो मूसल से क्या डरना)
ररूहा खोजय दार भात (दरिद्र को सिर्फ खाना चाहिए)
राखही राम त लेगही कोन, लेगही राम त राखही कोन (जाको राखै साईयाँ मार सकै न कोय, बाल न बाँका कर सकै चाहे जग बैरी होय)
रात भर गाडा फाँदे, कुकदा के कुकदा (रात भर गाडी चलाई जहाँ के तहाँ)
रात भर रमायन पढिस, बिहनियाँ, पूछिस राम सीता कोन ए त भाई बहिनी (रात भर रामायण पढी, सुबह पूछा कि राम सीता कौन तो बताया भाई-बहन)

रुपया ला रुपया कमाथे (रुपए को रुपया कमाता है)
लंका म सोन के भूति (लंका में सोने की मजदूरी)
लटका जांग म हाग दिही त जांग ल थोरे काट देबे (यदि बच्चा जांग पर मल त्याग कर दे तो जांघ को थोडे ही काट देते हैं)
लबरा घर खाए त पतियाए (झूठे की खाए तभी विश्वास करे)
लात के देवता बात म नइ मानय (लातों के भूत बातों से नहीं मानते)
लाद दे लदा दे छे कोस रेंगा दे (लाद दो लदा दो छह कोस पहुँचा दो)
संझा के झडि़ बिहनिया के झगरा (शाम की झड़ी और सुबह का झगड़ा)
सबो कुकुर गंगा चल दिही त पतरी ल कोन चाटही (सब कुत्ते गंगा चले जायेंगे तो पत्तल कौन चाटेगा)
सबो अंगरी बरोबर नइ होवय (सभी अंगुलियाँ बराबर नहीं होतीं)
सरहा मछरी तरीया ला बसवाथे (एक सडी मछली पूरे तालाब को गंदा करती है)
सस्ती रोवय घेरी-फेरी महँगी रोवय एक बेर (सस्ता रोए बार-बार रोए एक बार)
जोन सहही तेकर लहही (जो सहेगा वह टिकेगा)

सांझी के बइडला किरा के मरय (सांझे का बैल कीडे पडकर मरता है)
सावन मं आँखी फुटिस हरियर के हरियर (सावन के अंधे को हरा ही हरा सूझता है)
सास लइकोरी, बहू सगा आइस तउनो लइकोरी (जब सभी कामचोर हों तो काम कभी पूरा नहीं होता)
सीखाए पूत दरबार नइ चढ़य (सिखाया हुआ पुत्र दरबार नहीं चढ़ता)
सौ ठन बोकरा अउ झांपी के डोकरा (एक अनुभवी सौ नवसिखियों पर भारी पडता है)
सुनय सबके करय अपन मन के (सुने सबकी करे अपने मन की)
सूते के बेर मूते ल जाए, उठ उठ के घुघरी खाए (सोने के वक्त पेशाब करने जाता है और उठ उठ कर घुघरी खाता है)
सोझ अंगरी म घी नई निकरय (सीधी अंगुलि से घी नहीं निकलता)
सौ ठन सोनार के त एक ठन लोहार के (सौ सुनार की तो एक लोहार की)
सोवय तउन खोवय, जागय मउन पावय (जो सोया वह खोया, जो जागा सो पाया)
हगरी के खाए त खाए फेर उटकी के झन खाए (एहसान फरामोशों से कुछ नहीं लेना चाहिए)
हाथी के पेट म सोंहारी (ऊँट के मुँह में जीरा)

हाथी बुलक गे पूछी लटक गे (हाथी निकल गया पूँछ रह गयी)
आवन लगे बरात त ओटन लगे कपास (बारात आने पर आरती के लिए कपास ओटने चले)
कुँआर करेला, कातिक दही, मरही नही त परही सही (क्वार में करेला और कार्तिक में दही खाने वाला यदि मरेगा नहीं तो बीमार अवश्य पडेगा)
पीठ ल मार ले त मार ले फेर पेट ल झन मारय (किसी के पेट पर लात मारना ठीक नहीं)
बिन रोए दाई घलो दूध नई पियावय (बच्चे के रोए बिना माँ भी दूध नहीं पिलाती)
मुड मुडाए देरी नइ ए करा बरसे लागिस (आसमान से टपके, खजूर पर अटके)
हर्रा लगय न फिटकरी रंग चोखा (मुफ्त में अच्छा काम हो जाना)

शोधार्थी – राजेन्‍द्र कुमार काले, रायपुर. निदेशक – चित्‍तरंजन कर

प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – मुहावरे
प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – विभक्तियाँ
प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – अव्यय
प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – सर्वनाम
प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – आस्था, अंधविश्वास, बीमारियाँ
प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – वर्जनाएँ
प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – क्रिया
प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – गीत, नृत्य
प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – संस्कार

प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – मुहावरे

छत्तीसगढ़ी मुहावरे एवं कहावतें idioms and phrase – छत्तीसगढ़ी में ‘मुहावरा’ को ‘मुखरहा’ और ‘कहावत’ या ‘लोकोक्ति’ को ‘हाना’ कहते हैं। वार्तालाप में वक्ता द्वारा अपनी प्रस्तुति को अधिक प्रभावी बनाने के लिए मुखरहा और हाना का बखूबी प्रयोग किया जाता है। बहुप्रचलित मुखरहा और हाना निम्नानुसार हैं –

छत्तीसगढ़ी मुहावरे (मुखरहा)
‘मुहावरा’ ऐसी पद-रचना है, जो अपने सामान्य अर्थ से भिन्न किसी अन्य अर्थ में रूढ़ हो गया हो। छत्तीसगढ़ी के कुछ मुहावरे मानक हिंदी के मुहावरों के बिलकुल समान हैं, जैसे- ‘अति करना’ लेकिन कई बार मानक हिंदी में जिन शब्दों से मुहावरा बनता है, छत्तीसगढ़ी में उनमें से कोई शब्द बदलकर मुहावरा बना लिया जाता है, जैसे- ‘अंगुली पकडकर हाथ पकङडना’ के लिए ‘अंगठी धर के धरना’ (महरोत्रा: छत्तीसगढ़ी मुहावरा कोश. छत्तीसगढ़ी के बहुप्रचलित मुहावरे इस प्रकार हैं –

अकल लगाना = विचार करना
अंगठी देखाना = उंगली दिखाना
अंग म लगना = अंग में लगना
अंगरी जरना = उंगली जलना
अंधियारी कुरिया = अंधेरी कोठरी
अइसे के तइसे करना = ऐसी की तैसी करना
अकल के अंधवा होना = अक्ल का अंधा होना
अजर-गजर खाना = अलाय-बलाय खाना
अद्धर करना = अलग करना
अपन घर के बडे होना = अपने घर का बडा होना
आँखी-आँखी झूलना = आँखों ही आँखों में झूलना
आँखी-कान मूंदना = आँख-कान मूंदना
आँखी के कचरा = आँख का कचरा
आँखी के तारा = आँख का तारा
आँखी = आँख गड़ाना
आँखी गुडेरना = आँख दिखाकर क्रोध करना

आँखी फरकना = आँख फड़कना
आँखी फार फार के देखना = आँखें फाड़ फाड़कर देखना
आँखी म समाना = आँख में समाना
आँखी मटकाना = आँख मटकाना
आँखी मारना = आँख मारना
आँखी मिलना = आँखें मिलना
आँसू पी के रहि जाना = आँसू पीकर रह जाना
आगी उगलना = आग उगलना
आगी देना = आग देना
आगी बूताना = आग बुझाना
आगी म घी डारना = आग में घी डालना
आगी म मूतना = आग में मूतना
आगी लगना = आग लगना
आगी लगाके तमासा देखना = आग लगाकर तमाशा देखना
आघू-पीछु करना = हीला हवाला न करना
आघू-पीछु घुमना = चमचागिरी करना घुमना
आडी के काडी नि करना = कोई काम न करना
आन के तान होना = कुछ का कुछ हो जाना

आसन डोलना = आसन डोलना
आसरा खोजना = सहारा खोजना
इज्जत कमाना = इज्जत कमाना
उबुक चुकुक होना = डूबना उतराना
उलटा पाठ पढाना = उल्टा पाठ पढाना
एडी के रिस तरवा म चढना = अत्यधिक क्रोधित होना
एक कान ले सुनना = एक कान से सुनकर
दुसर कान से बोहा देना = दूसरे कान से निकाल देना
एक खेत के ढेला होना = एक खेत का ढेला होना
एक ताग नि उखाड सकना = कुछ भी न बिगाड सकना।
एक दु तीन होना = नौ दो ग्यारह होना
एक हाथ लेना दूसर हाथ देना = बराबरी का सौदा करना
एके लवडी म खेदना एक ही लाठी से हाँकना
एती के बात ओती करना = इधर की बात उधर करना
कचर-कचर करना = बकबक करना
कठवा के बइला = काठ का उल्लू

कन्हियाँ टूटना = कमर टूटना
कमर कसना = कमर कसना
करजा बोड़ी करना = कर्ज आदि करना
करम फूटना = भाग्य फूटना
करेजा निकलना = कलेजा निकल आना
काटे अंगरी नि मूतना = कटि अंगूली में न मूतना
कान म तेल डारे बइठना = कान में तेल डालकर बैठना
कान ल कौंआ ल जाना = कान को कौंआ ले जाना
कुल के दिया होना = कुल का दीपक होना
कोन खेत के ढेला होना = किस खेत का ढेला होना
कोरा भरना = गोद भरना
कोरा म लेना = गोद में लेना
खटपट होना = यथावत
खटिया धरना = खाट पकडना
खांध देना = कंधा देना

खाक छानना = खाक छानना
खाए के दाँत अलग = खाने के दाँत अलग और
देखाए के दाँत अलग = दिखाने के दाँत अलग होना
खुसुर पुसुर करना = खुसुर फुसुर करना
गंगा नहाना = गंगा स्नान करना
गडे मुरदा उखाङना = गडे मुर्दे उखाङना
गरवा पुछी छुना = गाय की पूँछ छूना
गांड जरना = मलद्धार जरना
गुड गोबर करना = गुड गोबर करना
गोड धोके पीना = पैर धो के पीना
परना = गांठ पडना
घुचुर-पुछुर करना = आगे-पीछे करना
चारी करना = चुगली करना
चुरी उतरना = विधवा होना
चुरी पहिराना = चूडी पहनाना
छाती म दार दरना = छाती पर मूंग दलना

जरे म नून = जले पर नमक छिडकना
जहाँ गुर तहाँ चाँटा होना = जहाँ गुड वहाँ चिंटा होना
जुच्छा हाथ होना = खाली हाथ होना
जे थारी म खाना ओही म छेदा करना = जिस थाली में खाना उसी में छेद करना
झक मारना = झक मारना
टुकुर-टुकुर देखना = टुकुर-टुकुर देखना
पीटना = टिंडोरा पीटना
डेरी हांथ के खेल होना = बाँए हाथ का खेल होना
तिडी-बिडी होना = तितर बितर होना
दाँत ल खिसोरना = दाँत निपोरना
धरती म पाँ नि मढाना = जमीन पर पैर न रखना
नाक कटोना = नाक कटाना
नाक घसरना = नाक रगड्ना
पहुना बनना = मेहमान बनना
पाठ-पीढा लेना = शिक्षा-दीक्षा लेना
पिंजरा के पंछी उड जाना = पिंजरे का पंछी उड जाना
पुदगा नि उखाड सकना = बाल न बाँका कर सकना
पेट म आगी बरना = पेट में चूहे कूदना

पोटार लेना = गले लगना
फूटहा आँखी म नि सुहाना = फूटी आँख न सुहाना
बनी भूति करना = मजदूरी करना
भोरका म गिरना = गडढे में गिरना
माटी के माधो = गोबर गणेश
मीट लबरा होना = मीठी छुरी होना
मुंह करिया कर डारना = मुंह काला कर डालना
मुड्भसरा गिरना = सिर के बल गिरना
मोर चिरई के एक गोड = मेरी मुर्गी की एक टांग
लुगरा चेंदरा तक बेचा जाना = कंगाल हो जाना
एक हंसिया के टेडगा होना = अनुशासन में रखना
हर्रा लागय न फिटकरी = हर्रा लगे न फिटकरी
हाथ उचाना = हाथ उठाना
हाथ झर्राना = पल्ला झाडना
हाडा गोड नि बाचना = हड्डी पसली न बचना।

शोधार्थी – राजेन्‍द्र कुमार काले, रायपुर. निदेशक – चित्‍तरंजन कर

प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – मुहावरे
प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – विभक्तियाँ
प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – अव्यय
प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – सर्वनाम
प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – आस्था, अंधविश्वास, बीमारियाँ
प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – वर्जनाएँ
प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – क्रिया
प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – गीत, नृत्य
प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – संस्कार

प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – विभक्तियाँ

छत्तीसगढी की विभक्तियाँ :-
छत्तीसगढ़ी में विभक्तियों के लिए निम्न प्रकार शब्द प्रयुक्त होते हैं –
मैं हर (मैं ने)
हमन (हम ने )
ओहर (उसने)
ओमन (उन्होंने /उन लोगों ने)
मोला (मुझे / मुझ को)
हमन ला (हमें / हम लोगों को)
तोला (तुम्हें / तुम को)
तुमन ला (आप लोगों को)
ओला (उसे / उसको)
ओमन ला (उन्हें / उन लोगों को)

मोर ले (मुझ से)
हमन ले (हम से)
तोर ले (तुम से)
तुमन ले ले (आप लोगों से)
ओकर ले (उस से)
ओकर मन ले (उन लोगों से)
मोर बर (मेरे लिए)
हमन बर (हमारे लिए)
तोर बर (तुम्हारे लिए)
तुमन बर बर (आप लोगों के लिए)
ओकर बर (उसके लिए)
ओकर मन बर (उन लोगों के लिए)
मोर (मेरा)
हमर (हमारा)
तोर (तुम्हारा)
(आप लोगों का)

ओकर /ओखर (उसका /उसके /उसकी)
उन कर / उँखर (उनका /उनके / उनकी)
इकर(इसका / इसके / इसकी)
इंकर(इनका / इनके / इनकी)
एहे /ओहे (वो)
एति /ए लंग(इधर)
औओती /ओ लंग(उधर)
ए करा(यहाँ)
ओ करा,(वहाँ)
जिहाँ (जहाँ)
तिहाँ / तेति(तहाँ)
जइसे(जैसा)
तइसे(तैसा)
ओसने (वैसा)
कोन कोति (किधर)
कोन हर (किसने)
जेति (जिधर)
ओति (उधर)
ए, एहर (इसने),
ए मन (इन्होंने)

ओ / ओहर (उसने)
ओमन (उन्होंने)
जे बेरा (जब)
जोन हर (जिसने)
जोन हर (जो)
जइसे (यथा)
अउ (और / तथा)
बर (के लिए)- खाए बर (खाने के लिए), जाए बर (जाने के लिए)

शोधार्थी – राजेन्‍द्र कुमार काले, रायपुर. निदेशक – चित्‍तरंजन कर

प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – मुहावरे
प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – विभक्तियाँ
प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – अव्यय
प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – सर्वनाम
प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – आस्था, अंधविश्वास, बीमारियाँ
प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – वर्जनाएँ
प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – क्रिया
प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – गीत, नृत्य
प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – संस्कार

प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – अव्यय

छत्तीसगढ़ी के अव्यय –
समुच्चय बोधक अव्यय
संयोजक – अउ, अउर
मैं अउ तैं एके संग रहिबोन।
वियोजक – कि, ते
रामू जाहि कि तैं जाबे।
विरोधदर्शक = फेर, लेकिन
संग म लेग जा फेर देखे रहिबे।
परिणतिवाचक = तो, ते, ते पाय के, धन
बुधारू बकिस ते पाय के झगरा होगे।
दिन-रात कमइस तभे तो पइसा सकेल पइस अउ अपन बेटी के बिहाव करिस।
आश्रय सूचक = जे, काबर, कि, जानौ (जाना-माना), मानौ (जाने-माने)
तैं ओला काबर बके होबे।
अइसन गोठियात हस जाना-माना तैं राजा भोज अस अउ मैं गगवा तेली।
विस्मयादिबोधक अव्यय
विस्मय – आँय, राम-राम, ए ददा, ए दाई, अरे, हे
आँय, का होगे ?
राम-राम, अइसन बखानत हे नहीं।
ए दाई ऽ ऽ अतका कन पई ऽ सा ऽ।
घृणा – दुर-दुर, छी, छि-छि, थू. हत, दुर-दुर एला दूरिहा राख। छि-छि, ओ टूरा ह पीथे तहाँ निचट बकथे। थू , कइसन बस्सावत हे।
हर्ष / प्रशंसा – वा, बने, धन-धन, सुग्घर, वा, बने करे बेटा। कत्तेक सुग्घर हे ओकर बहुरिया हा। धन-धन मोर भाग, मोर घर बेटी होगे।
पीड़ा – हाय, हा दाई /ददा, दाई वो, ददा गा, हा दाई ऽ मर गेंव वो ऽ। ददा गा , मैं नई तइसे लागथे अब्बड़ पीरावत हे।

शोधार्थी – राजेन्‍द्र कुमार काले, रायपुर. निदेशक – चित्‍तरंजन कर

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प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – सर्वनाम

छत्तीसगढ़ी के सर्वनाम Chhattisgarhi pronouns
मैं / मैं हर (मैं) – मैं रहपुर जावत रहेंव।
हमन (हम) – हमन काली डोंगरी जाबो ।
तैं / लूँ /तें हर (तुम) – तैं काय कहत रहे ?
तुमन(आप लोग) – तुमह तभे बनही।
ओ / ओहर (वह) – ओर सुते हे।
ओमन (वे) – ओमन नई मानिन।
ए/एहर (यह) – एहर बिहनिया रोवत हे।
एमन (ये) – एमन गम्मत करड्डया आय।

शोधार्थी – राजेन्‍द्र कुमार काले, रायपुर. निदेशक – चित्‍तरंजन कर

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प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – आस्था, अंधविश्वास, बीमारियाँ

आस्था -देवी-देवता के नाम -सांहड़ा देवता, काली माई, चंड़ीदेबी, शीतला माता, देबीदाई, देंवता, मंदिर, भगवान, गणेश, महादेव, पारबती, राम, छिता, लछिमन, बजरंगबली, हनमान, बिसनू, लछमी, सरसती माई, महामाया, बमलेसरी, कंकालीन, बूढिमाता, भैंरो बाबा, सवरीन दाई, ठाकुर देवता, संतोषी दाई, बजारी माता, बामहन देवता, पंडित, पुजारी।

सामग्री – उँवारा, जोत, नरियर, परसाद, फूल-पान, हूम-जग, चढोतरी, सेंग, बईगा, पूजा-पाठ, हवन, जग, कलस, कलावा, गंगाजल, नवदुरगा, जंवारा, कलस, कुंवारीभोज, पंडा, गोबर, चउक, आरती।

अंधविश्वास / रूढिवाद – मसान, परेतिन, परेत, जिन्द, टोना, बरमभूत, करिया मसान, सरपीन, सकसा, मटिया, बधघर्रा, मुडकट्टी, टोनही, टोनहा, बइगा, भट्टसासूर, फूंकइ-झरड, घर कोठा बंधइ, नजर उतर, टोना-टोटका, बदना (मन्नत), हूम-धूप, हूम-जग, बन्दन, नरियर, लिमउ, काजर, तेल, दिया, मिरचा, फरिया, पुतरी-पुतरा, केंस, पूजइ, बाना, चूरी-चांकी, सुपली, टोपली, कसरहा आदि।

बीमारियाँ- कुकुरखांसी, मुड्पीरा, रसरसहा लागथे, सूलपीरा, जर, कानपीरा, हाथ-गोड पीरा, माता, आंखी आए हे, धुसधुस ले लागत हे, मसमसावत हे, अलकरहा लागथे, लोकवा, संसो /मुड़धंगी, खजरी, पोंकरी, धराधुक्की, गलफुलवा, आदि का प्रयोग।

शोधार्थी – राजेन्‍द्र कुमार काले, रायपुर. निदेशक – चित्‍तरंजन कर

प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – मुहावरे
प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – विभक्तियाँ
प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – अव्यय
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प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – आस्था, अंधविश्वास, बीमारियाँ
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प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – तीज-त्योहार और उपकरण

तीज-त्योहार – हरेली, खम्हरछठ (हलषष्ठी), गणेश चतुर्थी, आठे कन्हैया, राखी, अक्षयतृतीया, तीजा-पोरा, पीतर, दसेरा, सुरूत्ती, देवारी, गोबरधनपूजा, छेरछेरा /माघीपुन्नी, होरी, गौरा-गौरी, अक्ती (पुतरी-पुतरा के तिहार), गुरबारी, होली, जेठउनी, जुमतिया, नागपंचमी।

उपकरण – उपकरण के अंतर्गत घरेलू उपकरण, कृषि संबधी उपकरण, काम करने के औजार, सुरक्षा संबंधी हथियार आदि को अध्ययन की दृष्टि से अलग-अलग वर्गों में बाँटा जा सकता है।

घरेलू उपकरण एवं वस्तुएँ – बटकी, सील-लोढा, चौकी-बेलना, थारी, लोटा, माली, परात, पैना, पसउना, बांगा, करछूल, कराही, झारा, लकरी, छेना, गुंडरी, थौना, चिमनी, कंडिल, दीया-बाती, जांता, ढेंकी, मूसर, खौना, चन्नी, सूपा, बहिरी, पोतनी, खरहारा, टठिया, परई, तसला, हंडा, गोरसी, चूलहा, सिगरी, चिमटा, अंगरा, माचिस, ।

कृषि उपकरण – कुदारी, राँपा, असकूड, टेंकनी, टेंवना, ढांक, पीढा, बेलन, कोर्रा, तूतारी, कलारी, चतवार, साबर, नांगर, मेंडरी, फर, मूठ, टंगिया, खूंटी, जूडा, सूमेला / पंचारी, जोंता, डांडी, कोल्लर, पटनी, नाहना, असकूड, चक्का, बाठ, पक्ती, खोल, हंसिया, रपली, पुठी, आरी, मुडी, असकूड, गुरदा, खिला, बिंधना।

औजार – उस्तरा, हंसिया, पेसकस, पेनचिस, पना, हथौरी, घन, छिनी, पटासी, भैंवारी, गिरमिट, बिंधना, बसुला, रेतमल, तिकोरा, आरी, आरा।

हथियार – फरसा, तब्बल, बरछी, ढाल, तलवार, भाला, चक्कू, छूरी, उस्तरा, धनुस-बान, डण्डा, मुदगर, सोंटा (चाबूक / कोडा)।

शोधार्थी – राजेन्‍द्र कुमार काले, रायपुर. निदेशक – चित्‍तरंजन कर

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प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – वर्जनाएँ
प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – क्रिया
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प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – क्रिया

क्रिया – रंधई, खवई, पियइ, सुतइ, नचइ, कूदइ, खेलइ, इतरइ, हसड्, रोवइ, संगदेवइ, अवई-जवईइ, देख, किंजरइ, बनि-भुति करइ, कमई, लरइ-झगरा करइ, बकई, हनई, देवइ, बहरइ।

क्रिया शब्दों को अंत में ना उपसर्ग लगाकर भी लिखा जाता है यथा –
खाना मुसकाना धोना मया करना
हदरना बतराना बहकना जड़ाना
बहना खेलना बड़बड़ाना भगाना
भागना बजाना लड़बडाना गोठियाना
गाना बसना रेंगना लहराना
फसाना समझाना हंकराना हड़बडाना
हसना बुझाना पीटना खटकाना
पीटना तीरना रोना फंदना
बारना झटकना सुसकना जागना
हफ्टना सजाना उजारना सुतना
फोरना चिरना कलहरना हराना
नहाना सटकना जोतना अमरना
धोना पीना तिरियाना हफरना
मया करना मुसकाना रगड़ना छोलना
डरवाना बिजराना कहना डूबकना
बकना पोंकना खासना
दुलारना चोराना चरकना बोलना
गोठियाना धराना भोंकना कुदाना
कांखना उछरना भागना नाचना
हलाना सुररना लिखना पढना

शोधार्थी – राजेन्‍द्र कुमार काले, रायपुर. निदेशक – चित्‍तरंजन कर

प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – मुहावरे
प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – विभक्तियाँ
प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – अव्यय
प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – सर्वनाम
प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – आस्था, अंधविश्वास, बीमारियाँ
प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – वर्जनाएँ
प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – क्रिया
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प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – संस्कार

प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – गाली, वर्जनाएँ

गाली – रोगहा, कोढि़या, बन्चक, रांड़ी, रण्ड़ी, भोसड़ामारी, चोदरी, बेसिया, चरकट, किसबीन, चंडालीन, बकरचोद, रांड़ी, भौजी, किसबीन, भडुवा, लफंगा, हरामी, सारा, चुतिया, चुच्चा, बेसरम, चंडाल, दोगला, लबरा, जुठहा, जुठही, रोगहा, किसबा, कनचोदवा, मादरचोद,  चोट्टा, चोदू, चोदूनंदन, भोसडीवाला, टोनही, टोनहा, कुरगहा, जलनकुकडा, टेटरही, रेंदहा, हेक्कड, पाजी, हिजडा, नलायक, दत्तला, घोंघी, करबोंगी, भकचोदवा, करबोकवा, करलुठी, करजिभि, पेटली, लमगोडवा, बदमास, बरदाओटिहा, परदाकुद्दा, कुबरा, बेर्रा, कनटेरी, कनवा, मरहा, कुसवा, सुसवा, छुछमुहा, गठारन, ननजतिया, हकनीन, कौंवा, उखनू, उखानचंद।

वर्जनाएँ (टैबू संरचना) :
शरीर के अंग– नूनू, चोचो, झांट, लवड़ा, पुदी, गट्टा, गांड, पोंद, दुदु, फुर्गा, अंड़वा, टोटो, लण्ड, भोसड़ा, भोसड़ी, रिश्ते- सारा, सारी।

क्रिया– पादना, हागना, चोदना, फारना, खुसेरना, चपकना, खोदरना, खजवाना, झांट उखानना, चूरी फोरना, गांड मारना, आदि।

पशुओं के नाम– कुकुर, कुतन्नीन, कुतिया, बनबिलवा, बिलई, गधा, सूरा, कोलिहा, हूर्रा, बेंदरा, भैंईस, बइला, बोकरा, छेरी, छुछू।

उपमा – बिलईं मुही, कारी, क्री बिलई, बिरबिट ले, छेना कस चाकर, प्री, ललमुहा, लसुन पोथी, मटारन आँखी, टेड्गोडवा, बटन आँखी, कनवा, खोरवा, हगरा, पदरा, टेर्रा, डरपोकना, देवार बानी, खपरामुहा, सरांगी मुंह के, खच्चर बानी, बेंदरा मुंहू, धनमिरचा, डौकी बरोबर, खखाए भलवा कस, किरहा कुकुर कस, लमगोडवा, बोजवा, खोखररी, बड़का मुड़ के, पेटला, चाकर गांड के, उद मुंहा, लमचोचवा, छेतका कुरिया, खपरा दांत के, परभरोसिया, जोंक चटका, कौंआ कस नहइया, मुंहफार आदि।

श्राप– तोर मुंह म किरा परय, तोर हांथ के चूरी फुटय, तैं रांड़ी हो जा, तोर कोरा म लटका झिन खेलय, तोर सइतानास होवय आदि।

मनुष्य की अवस्थाएँ – दुदमुहा लटका, नानकुन लइका, नोनी, बाबू, टूरा, टूरी, जवान, ठडगी, ठडगा, रांडी, बेवा, अधेड, डोकरा, डोकरी, केपकेपहा डोकरा, निचट बुढ़वा

प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – खानपान

प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – संस्कार

प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – कपड़े, आभूषण

प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – गीत, नृत्य

प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – कृषि संबंधी प्रक्रियाएँ

शोधार्थी – राजेन्‍द्र कुमार काले, रायपुर. निदेशक – चित्‍तरंजन कर

प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – मुहावरे
प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – विभक्तियाँ
प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – अव्यय
प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – सर्वनाम
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प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – वर्जनाएँ
प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – क्रिया
प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – गीत, नृत्य
प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – संस्कार

प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – कृषि संबंधी प्रक्रियाएँ

छत्तीसगढ़ी में कृषि संबंधी प्रक्रियाएँ, जैसे – खातू पलई, खेत जोतई, बोनी, पलोई, बियासी, निंदई-कोड़ई, रोपा, रोपई, दवई डरई, लुवई, डोरी बरई, करपा गंजई, बीड़ा बंधई, भारा बंधई, खरही गंजई, पैर डरई, मिंजई, खोवई, ओसई, नपई, धरई, कोठी छबई, बियारा छोलई, लिपई, बहरई, बसूला/राँपा / बिन्हा/टंगिया/हँसिया टेवई, बेंठ धरई, कलारी चलई, पैर खोवई, पैरावट लहुटई, पैर गंजइ।

फसलों की विभिन्न स्थितियाँ– जरई आगे, जामत हे, धान केंवची हे, दूध भरावत हे, पोटरिया गे, भरा गे, बाली आवथे, पोठा गे, पोक्खा-पोक्खा होगे, पोचलियावत है, बदरा पर गे, माहो लग गे, पाकत हे, सूखा गे, मुठियाए के लईक होगे, लूए के लाइक हो गे, लूवा गे, करपा माढे़ हे, बिडि़या गे, बोझा डोहरा गे, खरही गंजा गे, पैर डरा गे, मिंजा गे, उड़ा गे, धरा गे, कोठी छबागे)

प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – खानपान

प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – संस्कार

प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – कपड़े, आभूषण

प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – गीत, नृत्य

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प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – क्रिया
प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – गीत, नृत्य
प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – संस्कार