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समीक्षा : जुड़वा बेटी

छत्तीसगढ़ी साहित्य म गद्य लेखन नहीं के बतौर होवत हे। कहानी,एकांकी,उपन्यास के तो मानो टोंटा परे हवय। अइसन बेरा मा बादल जी के “जुड़वा बेटी” ल पढ़े के बाद ये आस जागिस हवय कि अब गद्य लेखन छत्तीसगढ़ी मा समृद्ध होही। बादल जी के कहानी मन आँचलिक समस्या ऊपर केंद्रित हवय। गाँव गवई में समाज के समस्या ल कहानी के रूप मा प्रस्तुत करके  पाठक ल जोड़े मा बादल जी पूरा सफल होय हवय। मुहावरा अउ लोकोक्ति के सुग्घर प्रयोग बादल जी के कहिनी म देखे बर मिलथे। कहानी के शिल्प के चिंता करे बिना बादल जी अपन बात ल पाठक के बीच सुग्घर अउ फोरिया के रखे हवय। कहानी के भाखा अउ शब्द चयन सहज अउ सरल हवय।

सबो कहानी संवेदनशील हवय जेला पढ़ते पढ़त पाठक स्वयं एक पात्र के रूप मा खो जाथे अउ कहानी खतम होय के बाद चिंतन बर विवश होथे। ये किताब के पहिली कहानी “इंसानियत के लाश” भीड़तंत्र के दोष ला उजागर करत शिक्षाप्रद कहानी हवय। “किरिया’ मा बादल जी स्कूल म पढ़ई लिखई के समस्या ल प्रमुखता ले उठाय हवय संग म समस्या के निदान घलो बताय हवय । “बुधवारो” कहिनी बेटी मन ला प्रेरित करथे कि हर स्थिति के सामना कइसे करना हवय । निःसंतान होय के बाद भी बहू मन समाज बर प्रेरणा बन सकथे येकर सुग्घर उदाहरण “पतरेंगी” कहानी म देखे ल मिलथे।

“जुड़वा बेटी” सन्देश परक मार्मिक कहानी आय जेहा नशा  के कारण परिवार के दुर्दशा ल चित्रित करथे। नारी के संवेदना के प्रति-पूरा पूरा न्याय लेखक ह करे हवय, ये कहानी पाठक के अंतस मा सीधा उतरथे। मन में चिर स्थायी जघा बनाथे। समलैंगिकता  जइसन  गंभीर मुद्दा  ला “माथा चकरागे” कहिनी के माध्यम ले उठाय हवयँ । इंसानियत के लाश,अति के अंत, बुधवारो, दुलार के दवा कहानी मन लघुकथा के एहसास कराथे। जात बाहिर कहिनी सामाजिक समस्या ऊपर हवय जेकर निदान घलो लेखक ह बताथे। सबो कहानी में सुखांत हवय जेकर ले पाठक उल्लासित रहिथे। विषय वस्तु चयन के संग सुग्घर अभिव्यक्ति  लेखक के कौशल के परिचायक हवय।
शीर्षक के अनुरूप कव्हर पेज कलात्मक अउ बेहतरीन हवय। अवइया बेरा मा ये कहानी संग्रह निश्चित रूप से साहित्य मा अपन जघा बनाही येमा संदेह नइ हे। नवा रचनाकार मन ये किताब ला एक घाव जरूर पढ़य।

अजय अमृतांशु
भाटापारा

कृति-      जुड़वा बेटी
लेखक-    चोवाराम वर्मा “बादल”
प्रकाशक- वैभव प्रकाशन
मूल्य-      100/-

आमा के अथान – चौपई छन्द (जयकारी छंद )

अब अथान आमा के खाव,आगे गरमी कम हे भाव।
झोला धर के जाव बजार,*लानव आमा छाँट निमार।

मेथी संग मा सरसों तेल,येकर राखव सुग्घर मेल। *
मेथी अउ सरसों के दार,चिटिक करायत होथे सार। 2

पीसे हरदी बने मिलाव,लहसुन डारे झने भुलाव।
जीरा के येमा हे खेल,नापतौल के डारव तेल। 3

मिरचा सिरतो कमती खाव,स्वाद देख के नून मिलाव।
थोरिक अदरक घलो मिलाव,दू दू दिन मा बने हिलाव। 4

गोही ला झन फेंकव हेर,लेव स्वाद खाये के बेर।
अब्बड़ मिठाथे गोही जान,आमा सँग मा बनय अथान। 5

राखव कुछ दिन येकर ध्यान, सुग्घर बनही आम अथान।
सब के मुँह मा पानी आय,रोज बिहनिया अथान खाय। 6

घर मा जे दिन नइ हे साग,सब अथान के गावय राग।
दूसर घर के बने अथान,अबड़ मिठाथे सब ला जान। 7

घेरी भेरी कहय मितान,देबे महूँ ल आम अथान।
पारा भर के जी ललचाय,रोज रोज माँगे ला आय। 8

बाँटत बाँटत जी करलाय,मोर सुवारी रार मताय।
निसदिन वोला मैं समझाँव,बाँट बाँट के येला खाव। 9

बिहना बासी के संग खाव,दिनभर घूमव मौज मनाव।
पाचक होथे आम अथान। बात गजब के येला जान। 10

अजय अमृतांशु
भाटापारा
मोबा. 9926160451

सिंहावलोकनी दोहा (गरमी)

गरमी हा आ गे हवय,परत हवय अब घाम।
छइँहा खोजे नइ मिलय,जरत हवय जी चाम। ।

जरत हवय जी चाम हा,छाँव घलो नइ पाय।
निसदिन काटे पेंड़ ला,अब काबर पछताय। ।

अब काबर पछताय तै,झेल घाम ला यार।
पेंड़ लगाते तैं कहूँ,नइ परतिस जी मार। ।

नइ परतिस जी मार हा,मौसम होतिस कूल।
हरियाली दिखतिस बने,सुग्घर झरतिस फूल। ।

सुग्घर झरतिस फूल तब,सब दिन होतिस ख़ास।
हरियाली मा घाम के,नइ होतिस अहसास। ।

नइ होतिस अहसास जी,रहितिस सुग्घर छाँव।
लइका पिचका संग मा,घूमें जाते गाँव। ।

घूमे जाते गाँव तै ,रहितिस संगी चार।
गरमी के चिंता बिना,मिलतिस खुशी अपार। ।

अजय अमृतांशु
भाटापारा

हीरा सोनाखान के

छत्तीसगढ़ी साहित्य के पद्य लेखन मा उत्कृष्ट लेखन के कमी हवय, छन्द लेखन म तो बिल्कुल नगण्य। येकर भरपाई – हीरा सोनाखान के (खंडकाव्य) करत हवय । ये खण्डकाव्य ला पढ़ेंव एक घव मा मन नइ माढ़ीस ता दुबारा-तिबारा पढ़ डारेंव। पंडित सुंदरलाल शर्मा के दानलीला के एक लंबा अंतराल मा खण्ड काव्य आइस जेन पूरा व्याकरण सम्मत अउ विधान सम्मत हवय। बीच-बीच मा खण्डकाव्य के इक्का दुक्का किताब जरूर आइस फेर व्याकरण अउ विधान म पूरा खरा नइ उतरिस । मितान जी के ये खण्डकाव्य विधान सम्मत अउ व्याकरण सम्मत हवय जेमा उपमा, अनुप्रास अउ अतिसंयोक्ति अलंकार के सुग्घर प्रयोग देखे बर मिलिस।

शहीद वीर नारायण के सौंदर्य (पुरुष श्रृंगार) के गजब के वर्णन मनीराम जी के काव्य कौशल ला दर्शाथे । अनुस्वार अउ अनुनासिक के बहुत ही बारीकी से प्रयोग मनीराम जी करे हवय । शब्द चयन सटीक अउ अर्थपूर्ण हवय। गाँव गँवई के नँदावत ठेठ देहाती शब्द मन ल लेखक सुग्घर प्रयोग करे हवय जेकर ले छ्न्द के सौंन्दर्य बाढ़गे हवय । खण्डकाव्य मा प्रयोग छत्तीसगढ़ी शब्द मन अवइया बेरा मा मानकीकरण के आधार बनही । ये बात के नँगते खुशी हवय कि छन्द लेखन के परंपरा छत्तीसगढ़ म पुनर्स्थापित होवत हे अउ छन्द लेखन मा नवा नवा प्रयोग भी देखे मा आत हे ।

शहीद वीर नारायण सिंह के गाथा वर्णन मा लेखक कुल 21 प्रकार के छ्न्द – दोहा, रोला, कुण्डलिया, अमृतध्वनि, सवैया, रूपमाला, गीतिका, आल्हा, त्रिभंगी,उल्लाला, हरिगीतिका, बरवै, सरसी, शक्ति, चौपाई, घनाक्षरी, शंकर, सार, विष्णुपद, छप्पय अउ सोरठा के प्रयोग करे हवय। मुख्य छन्द आल्हा हवय जेकर संख्या कुल 251 हवय । युद्धभुमि के अद्भुत वर्णन घनाक्षरी छन्द में हवय जेला पढ़बे त रोंवा-रोंवा खड़ा हो जाथे। आल्हा में गाथा के संगे संगे जनमानस मा देशप्रेम के भावना ल जागृत करे म घलो लेखक पूरा सफल होय हवय । अनुप्रास अलंकार के प्रयोग देखव-

तर्र तर्र तुर्रा मार, लाली-लाली लहू धार ।
खार-खाय खच-खच, चलै हो के चाँद गा।
छेदै छाती जोंग-जोंग,आल-पाल भोंग-भोंग।

आल्हा में अतिशंयोक्ति अलंकार के बानगी देखव –
सिंह के खाड़ा लहरत देखय,बइरी सिर मन कट जयँ आप।
लादा पोटा बाहिर आ जयँ,लहू निथर जय गा चुपचाप।

हीरा सोना खान के छत्तीसगढ़ी साहित्य म मील के पथरा बनही एमा रत्ती भर संदेह नइ हे। किताब के छन्द मन उत्कृष्ट अउ कालजयी होही अउ छत्तीसगढ़ी म छ्न्द लेखन के परंपरा ल पोठ करे के काम करे के काम करही। नवा रचनाकर मन ये किताब ल जरूर पढ़य उन ला नवा दिशा मिलही।

अजय “अमृतांशु”
भाटापारा

राखी

छन्न पकैया छन्न पकैया,पक्का हम अपनाबो।
नइ लेवन अब चीनी राखी,देशी राखी लाबो।1

छन्न पकैया छन्न पकैया,बहिनी आँसों आबे।
हमर देश के रेशम डोरी,सुग्घर तैं पहिराबे।2

छन्न पकैया छन्न पकैया, सावन आय महीना।
हमर देश के राखी ले के,पहिरव ताने सीना।

छन्न पकैया छन्न पकैया,चलन विदेशी छोड़ी।
किसन सुभद्रा जइसे भैया,राहय सब के जोड़ी।

छन्न पकैया छन्न पकैया,राखी कीमत जानौ।
मया बँधाये बहिनी मन के,येला तुम पहिचानव।5

छन्न पकैया छन्न पकैया,बहिनी भेजे राखी।
सरहद मा भाई मन पहिरे,देवत हे सब साखी।6

छन्न पकैया छन्न पकैया,ये तिहार हे पावन।
बहिनी जब पहिरावय राखी,लागय जी मनभावन।7

अजय ‘अमृतांशु’
भाठापारा

सिंहावलोकनी दोहा : गरमी

गरमी हा आ गे हवय,परत हवय अब घाम।
छइँहा खोजे नइ मिलय,जरत हवय जी चाम।।

जरत हवय जी चाम हा,छाँव घलो नइ पाय।
निसदिन काटे पेंड़ ला,अब काबर पछताय।।

अब काबर पछताय तै,झेल घाम ला यार।
पेंड़ लगाते तैं कहूँ,नइ परतिस जी मार।।

नइ परतिस जी मार हा,मौसम होतिस कूल।
हरियाली दिखतिस बने,सुग्घर झरतिस फूल।।

सुग्घर झरतिस फूल तब,सब दिन होतिस ख़ास।
हरियाली मा घाम के,नइ होतिस अहसास।।

नइ होतिस अहसास जी,रहितिस सुग्घर छाँव।
लइका पिचका संग मा,घूमें जाते गाँव।।

घूमे जाते गाँव तै ,रहितिस संगी चार।
गरमी के चिंता बिना,मिलतिस खुशी अपार।।

अजय अमृतांशु
भाटापारा


छ्न्द बिरवा : नवा रचनाकार मन बर संजीवनी बूटी

चोवाराम वर्मा “बादल” जी के “छ्न्द बिरवा” पढ़े बर मिलिस । एक घव मा मन नइ माढ़ीस दुबारा पढ़ डारेंव। सिरतोन म अतका बढ़िया छन्द संग्रह हवय येकर जतका प्रसंशा करे जाय कम हवय । अब के बेरा म अइसन लिखइया आगे हवय जिंकर किताब ल पढ़ना तो दूर पलटाय के भी मन नइ होय अइसन बेरा मा बादल जी ल पढ़ना सुखद अनुभव रहिस । सबो छ्न्द विधान सम्मत, व्याकरण सम्मत हवय । अनुस्वार अउ अनुनासिक के बहुत ही बारीकी से प्रयोग बादल जी करे हवय । शब्द चयन सटीक अउ अर्थपूर्ण हवय। छत्तीसगढ़ी के नवा रचनाकार मन दिशाहीन अउ उत्ता धुर्रा लिखइच बुता करत हवय उँन ला मोर सलाह हवय के ये संघरा ल जरूर पढ़य अउ गुनय कि लेखन कइसे करे जाथे।
बादल जी के किताब म मात्रिक अउ वार्णिक मिलाके लगभग 40 किसिम के छ्न्द मिलथे। शुरूच म मात्रा विधान दे हवय संगे संग प्रत्येक छ्न्द मा लिखे के पहिली वो छ्न्द के विधान ल घलो दे गे हवय जेकर ले पाठक छ्न्द पढ़े के बाद समझ भी सकथे कि छन्द ला कइसे लिखे गे हवय । छन्द बिरवा म प्रयोग करे शब्द मन पोठ दाना आय जेन छत्तीसगढ़ी के मानकीकरण के बेरा म काम आही अइसे मोर मानना हे । वर्णमाला के जम्मो 52 वर्ण के प्रयोग बादल जी करे हवय जो कि पूर्णतया उचित हवय। संघरा म एक डहर जिहाँ पौराणिक, ऐतिहासिक, प्रकृति अउ लोक परम्परा ल विषय बना के छ्न्द लिखे गे हवय उँहे दूसर डहर नवा जमाना के समसामयिक विषय बेटी बचाव,स्वच्छता,दहेज,मृत्युभोज, प्रदूषण,नशा ऊपर घलो सारगर्भित छ्न्द हवय। गाँव गँवई के नँदावत ठेठ देहाती शब्द मन ल बादल जी ज्यों के त्यों प्रयोग करे हवय जेकर ले छ्न्द के सौंन्दर्य बाढ़गे हवय।

छ्न्द बिरवा म दोहा,सोरठा,रोला,कुण्डलिया, अमृतध्वनि, उल्लाला,छप्पय,रूपमाला,शोभन,गितिका चौपाई, चौपई, सार,आल्हा,त्रिभंगी,ताटक, सरसी सहित कुल 22 मात्रिक छ्न्द हवय। वार्णिक छ्न्द म 18 प्रकार के सवैया अउ घनाक्षरी छ्न्द हवय। अंत म कहमुक़री हवय। छ्न्द बिरवा ह छत्तीसगढ़ी म नवा आयाम गड़ही येमा रत्ती भर संदेह नइ हे । बादल जी लिखे छ्न्द मन उत्कृष्ट अउ कालजयी होही । ये किताब हा छत्तीसगढ़ी म छ्न्द लेखन के परंपरा ल पोठ करही अउ नवा रचनाकार मन बर संजीवनी बूटी सही काम करही ।

अजय “अमृतांशु”
छ्न्द संग्रह : “छ्न्द बिरवा”
लेखक : चोवाराम वर्मा “बादल”
प्रकाशक : आशु प्रकाशन
मूल्य : 150/-
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अंतर्राष्‍ट्रीय महिला दिवस म दोहा : बेटी

दोहा (बेटी)

झन मारव जी कोख मा ,बेटी हे अनमोल।
बेटी ले घर स्वर्ग हे, इही सबो के बोल।।1।।

बेटी मिलथे भाग ले,करव इँकर सम्मान।
दू कुल के मरजाद ये,जानव येहू ज्ञान।।2।।

बेटी आइस मोर घर,गज़ब भाग हे मोर।
घर पूरा खुशहाल हे,जुड़े मया के डोर ।।3।।

बेटी ला सम्मान दव, ये लक्ष्मी के रूप।
बेटी छइँहा कस चलय,गर्मी हो या धूप।।4।।

मनखे मन करथे जिहाँ, नारी के सम्मान।
करथे लक्ष्मी वास जी, सुखी रथे इंसान।।5।।

काली,दुर्गा,शारदा, सबो करय उद्धार।
बेटी कतका रूप मे,जग के पालनहार।।6।।

माँ,बेटी,अर्धांगिनी,कभू बहन के रूप।
त्याग करय हर साँस मा,सहय जेठ के धूप।।7।।

दाई बन पोषण करय,पत्नी बन के प्यार।
बहन रूप रक्षा कवच, बेटी तारणहार ।।8।।

करथे देवी रूप मा, पापी के संहार।
तीन लोक के देवता,करथे जय जय कार।।9।।

बेटी नइ भूलय कभू ,सात समुंदर पार।
सुरता कर दाई ददा, रोथे आँसू चार ।।10।।

बेटी मिलथे भाग ले,तरसत रहिथे लोग।
जेकर हे बढ़िया करम,ओकर बनथे योग।।11।।

घर माँ बेटी आय जब,जीवन मा सुख आय।
बेटी मारे कोंख जे , बहू कहाँ ले पाय।।12।।

अजय अमृतांशु
भाटापारा
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होली के दोहा

ब्रज मा होरी हे चलत, गावत हे सब फाग।
कान्हा गावय झूम के, किसम-किसम के राग।। 1।।

राधा डारय रंग ला, सखी सहेली संग।
कान्हा बाँचे नइ बचय, होगे हे सब दंग।।2।।

ढोल नगाड़ा हे बजत, पिचकारी में रंग।
राधा होरी में मगन, सखी सहेली संग।।3।।

गोकुल मा अब हे दिखत, चारो कोती लाल।
बरसत हावय रंग हा, भींगत हे सब ग्वाल।।4।।

लाल लाल परसा दिखय, आमा मउँरे डार।
पींयर सरसों हे खिले, सुग्घर खेती खार।।5।।

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तन ला रंगे तैं हवस, मन ला नइ रंगाय।
पक्का लगही रंग हा, जभे रंग मन जाय।। 6।।

छोड़व झगरा ला तुमन, गावव मिलके फाग।
आपस में जुरमिल रहव,खूब लगावव राग।।7।।

आँसों होरी मा सबो, धरव शांति के भेष।
मेल जोल जब बाढही, मिट जाही सब द्वेष।।8।।

कबरा कबरा मुँह दिखय, किसम किसम के गोठ।
मगन हावय सब भाँग मा, दूबर पातर रोठ।।9।।

मिर्ची भजिया देख के, जी अड़बड़ ललचाय।
छान छान के तेल मा, नवा बहुरिया लाय।।10।।

अजय अमृतांशु
भाटापारा
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पण्डवानी शैली के लोकप्रिय कबीर भजन गायिका : त्रिवेणी साहू

पण्डवानी के नाम सुनते साठ हमर आँखी के आघू म पाँचो पाण्डव के कथा चलचित्र सरिक चले लागथे । पण्डवानी मा अब तक आप पाण्डव/महाभारत के ही कथा सुने होहू फेर अब पण्डवानी शैली म कबीर के जीवन दर्शन भी गाये जावत हे अउ श्रोता मन ओतके आनन्दित होके सुनत भी हवय। पण्डवानी शैली म लोकप्रिय कबीर भजन गायिका बहन त्रिवेणी साहू सँग भेंट होइस। गोठ-बात के अंश :-

आप पण्डवानी शैली म कबीर भजन गायन कब ले करत हव ?
– मोर माताजी स्व.फूलबाई साहू (पण्डवानी शैली के प्रथम कबीर भजन गायिका) 2004 म सतलोकवासी होय के बाद 14-15 साल के उमर ले मैं गायन करत हँव। ये कला मोला विरासत म मिलिस, मोर दीदी संगीत के क्षेत्र म बहुत नाम हे। ये तरह से मोर पूरा पारिवारिक माहौल गायन के रहे हवय।

आप पण्डवानी के कौन से शैली मा प्रस्तुति देथव ?
– मोर प्रस्तुति कापालिक शैली म रहिथे।

पण्डवानी म पाण्डव मन के कथा होथे फेरआप ये शैली म कबीर के जीवन दर्शन ऊपर गायन करथव। कोन-कोन से पहलू ल बताथव ?
– कबीर प्राकट्य, सृष्टि विस्तार दर्शन, रानी इन्द्रमति भक्ति, स्वपच सुदर्शन गुरुभक्ति, धनी धर्मदास लोक आगमन, अनुराग सागर आधारित कबीर जीवन चरित्र।



अभी तक आप कहाँ कहाँ प्रस्तुति दे हावव ?
– छत्तीसगढ़ के लगभग सबो जगह म, सूरत (गुजरात), नुवापाड़ा (उड़ीसा),काटोल (महाराष्ट्र), समस्तीपुर (बिहार), भागलपुर, पूर्णिया, टाटा नगर (झारखंड), इलाहाबाद कुंभ,बनारस(उ.प्र.), बांधवगढ़, सिवनी, उज्जैन (म.प्र.) आदि जघा मा अपन प्रस्तुति कईं बार दे चुके हवव।

आपके पण्डवानी दल के का नाम हवय ?
– आदर्श पण्डवानी ग्रंथ गायन, ग्राम-पिरदा, पो-भिभौरी, जिला-बेमेतरा।

वर्तमान म आपके निवास कहाँ हवय?
– शक्तिपारा,वार्ड क्रमांक-16,उरकुरा रायपुर।

आपके पंडवानी गायन दल मा कतका सदस्य हवय ?
– कुल 6 सदस्य जेमा- हारमोनियम विनय साहू (भाई),तबला-गेलन दास मानिकपुरी, रागी-कुँवरसिंह देवदास, बेंजों-भुलूराम देवदास, डफली-हरीशचंद्र साहू, गायिका-मैं स्वयं त्रिवेणी बाई साहू।

पण्डवानी गायन के दौरान आप का-का संदेश देथव ?
– नशा मुक्ति,बेटी बचाव, बालिका शिक्षा, नवा पीढ़ी ल संस्कारित करना, जाति पाति, छुआछूत, भेदभाव मिटाना, कौमी एकता के सन्देश देथन। सँगे संग देशप्रेम के भावना ल जागृत करे के प्रयास भी करथन।

आपके आजीविका के साधन का हे ?
– भजन गायन ही एकमात्र साधन हवय जेकर ले हम छहों झिन के आजीविका चलत हवय।

आप गृहिणी आव, येकर ले काफी समस्या आवत होही ?
– नही,मोर घर परिवार के पूरा सहयोग मोला मिलथे, मोर पति स्वयं मोर साथ रहिथे अउ सँग देथे।

आप एक तरह से लोककला के उत्थान के भी काम करत हव,सरकार से आप ल कोई मदद मिलथे ?
– सरकार से हमन ला कोनो प्रकार के सहायता अब तक नइ मिले हे। दूसर प्रदेश म होवइया बड़े बड़े महोत्सव म संस्कृति विभाग ह लोक कलाकार मन ल भेजथे लेकिन अब तक संस्कृति विभाग ले हमन ल अइसन कोनो ऑफर नइ आय हे।

प्रस्तुतिकरण के बाद श्रोता मन के का प्रतिक्रिया रहिथे?
अगाध स्नेह अउ भरपूर आशीर्वाद मिलथे।

अजय “अमृतांशु”
भाटापारा
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