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आठे कन्हैया – 36 गढ़ मा सिरि किसन के लोक स्वरूप

– प्रोफेसर अश्विनी केसरबानी
छत्तिसगढ़ मा तेरता जुग अऊ द्वापर जुग के किसिम किसिम के बात देखे अऊ सुने बर मिलथे। ये हमर सब्बो छत्तिसगढ़िया मन के सउभाग्य हवे कि अइसे पवित भुइंया म हमर जनम होये हवे अउ इहां रहत हवन। इहां जगह जगह म राधा किसन के मंदिर हवय जेकर दरवाजा म गरूण जी हाथ जोरे बइठे दिखते। इहां के छोटे बड़े, अमीर गरीब अउ जंगल म रहवाइया आदिवासी मन के मन म ओखर प्रति अगाध सरधा हवय। सबके मन म सिरि किसन के लोक स्वरूप के कल्पना सही में लोक रक्छक करे गे हवय। सब्बो जानथे कि ओखर जनम कंस ल मारके ओकर जुलुम ले मथुरा, गोकुल अउ बिरिन्दाबन के लोगन मन ल मुक्ति देहे बर नई रहिस बल्कि पूरा ब्रम्हांड म राक्छस मन ल मारके भक्ति भाव अउ लोक सुराज लाये के रहिस हवय। बिचार करे ले समझ म आथे कि सिरि किसन के मैया देवकी के गरभ ले जनम लेहे, मैया जसोदा ल अपन बाललीला दिखाय अउ कउरव पांडव के माध्यम ले पूरा ब्रम्हांड ले राक्छसी प्रवृत्ति से लोकलीला करके मुक्ति दिलाइस। ओखर पूरा जीवन अनुकरणीय हवय। जेला अलग अलग ढंग ले कवि अउ लिखवइया मन लिखे हवय, गवइया मन गाये हवय। लोगन मन रासलीला करथे अउ गीत गाथे। हमर छत्तिसगढ़ के सौरिनारायेन म भारतेन्दुकालीन कवि पंडित हीराराम तिरपाठी ह रासलीला गीत लिखे हवय जेला रासलीला करत लोगन गावे-
चल वृन्दावन घनस्याम दृष्टि तबै आवै।
होगा पूरन काम जन्म फल पावै।।
द्रुम लता गुल्म तरू वृक्ष पत्र दल दल में।
जित देखे तित श्याम दिखत पल-पल में।।
घर नेह सदा सुख गेह देखु जल थल में।
पावेगा प्रगट प्रभाव हिये निरमल में।।
तब पड़े सलोने श्याम मधुर रस गावै।।1।।
तट जमुना तरू वट मूल लसै घनस्यामैं।
तिरछी चितवन है चारू नैन अभिरामैं।।
कटि कसै कांछनी चीर हीर मनि तामैं।
मकराकृत कुण्डल लोल अमोल ललामैं।।
मन स्वच्छ होय दृग कोर ओर दरसावै।।2।।
सुख पुंज कुंज करताल बजत सहनाई।
अरू चंग उपंग मृदंग रंग सुखढाई।।
मन भरे रसिक श्याम सज्जन मन भाई।
जेहि ढूँढ़त ज्ञानी निकट कबहुं नहिं पाई।।
युग अंखियों में भरि नीर निरखि हुलसावै।।3।।
श्रीकृष्ण प्रीति के रीति हिये जब परसै।
अष्टांग योग के रीति आपु से बरसै।
द्विज हीरा करू विस्वास आस मन हरसै।।
अज्ञान तिमिर मिटि जाय नाम रवि कर से।।
तब तेरे में निज रूप प्रगट परसावै।।4।।
चल वृन्दावन घनश्याम दृष्टि तब आवै।।




छत्तिसगढ़ म जन्माष्टमी ल सिरिकिसन के लोक स्वरूप के कल्पना करे गये हवय अउ येला ‘‘आठे कन्हैया‘‘ कहे जाथे। इही दिन सिरि किसन के जनम होय रहिस। भादो के किसन अष्टमी के रात म रोहनी नछत्र म देवकी मैया के आठवें लइका के रूप म ओकर जनम होइस। ओकर जनम अइनहे समय म होइस जब सब्बो तरफ कंस के आतंक रहिस। ओकर जनम के पहिली ओकर छै भाई मन ल कंस ह मार डारे रहिस। सब्बो डहर दुखी जन रोवत गात रहिस। कहे जाथे-
जब जब होही धरम के हानि, बाड़ ही असुर अधम अभिमानी।
तब तब धरि मनुज सरीरा, हरहिं भवनिधि पीरा।।
कारागार म देवकी अउ वसुदेव अपन छै लइका के मरे के सोक म डूबे दुख मनात रहिस। ईसवर किरपा ले सातवां गरभ रोहिनी के गरभ म चल दिस अउ अब आठवां गरभ म सिरि किसन आइस त सब तरफ खुसी दिखे लागिस। कवि कपिलनाथ अपन सिरि किसन महाकाब्य में लिखे हवय-
जउने दिन ले गरभ आठवां मा प्रभु आइन,
धरती अउ आकास मा प्रभुता अपन देखाइन।
बहिस सुगंधी पवन रूख राई हरियागे,
लागय असमय मा जाना बसंत रितु आगे।।
अमरइया मा आ आ कोयली कूके लागिन,
जहां तहां बन भीतर टेसू फूले लागिन।
फूल फूल जा जाके भंवरा गूंजे लागिन,
डार डार मा सूवा मैना झूले लागिन।।
भादो कारी रात भयानक
बिजली चमकय छिन छिन भरमा।
चारो कइत रहय सन्नाटा
पानी पानी धरती भर मा।।
होइस जब अधरतिया बेरा
रोहिनी लगिस नछत्तर
प्रगट भइन प्रभु बंदी गृह मा
रूप चतुरभुज धर कर।।
संख चक्र अउ गदा पद्म धर
पहिरे दिब्य पितांबर।
कानन कुंडल झिलमिल डोलय
सुंदर बनमाला गर।।
दरस देके कहिन प्रभु, जल्दी
मोला गोकुल अमरावा।
नंद महर घर ले जाके जनमे
कइना जसुदा ले आवा।।
सिरि किसन के लीला ल कोनो नइ समझ सकय। ओकर जनम सब्बो झन ल दुख से मुकति देहे बर होय रहिस। ओला लीला करना रहिस तभे जसोदा मैया के घर जाके लीला करिन। एक एक करके सब्बो राक्छस मन ल मरिस, गउ चराइस अउ दूध दही खाइस। कपिल कवि लिखथे –
मथुरा नगरी जान न देवन, अब गोकुल के दूध दही,
बिन पेट भर खाये तुमन जान न पावा बात सही।
अबले बेंचा मथुरा जाके, चोरी चोरी दूध दही,
भर भरके जो गाय चरावंय, पावंय पीये छांछ मही।।
अऊ किसन अपन संगी मन के साथ सबके घर जाके माखन खावे। घर घर जाके माखन चारी करके खाये खातिर ओखर नाव ‘‘माखन चोर‘‘ रख दिस। किसन अपन तो माखन खाये, अपन संगी मन ल भी माखन खवाय। कवि लिखथे-
बांट बांट के माखन मिसरी खाये लागिन।
एक एक के खा खा के सहराय लागिन,
ब्रम्हा देख किसन के लीला भक्खल होगे,
समझ न आइस चिटको वोला अक्कल खेगे।
कहां ब्रम्ह अवतार कहंय समझ न आवय।
बन म आके गोप ग्वाल के जूठा खांवय।।




छत्तिसगढ़ मा आठे कन्हैया के दिन मटकी म माखन रखके फोड़े के रिवाज हवय। चऊंक चौउराहा म मटकी बांधे जाथे अउ किसन के टोली बाजा गाजा के साथ जा जाके मटकी फोड़थे। दूध दही लुटाथे अउ माउज मस्ती करथे। येला इहां ‘‘दहिकांदों‘‘ कहे जाथे। सब्बो गांव म दहिकांदो होथे।
राइगढ़ म सेठ किरोड़ीमल ह गउरीशंकर के संगमरमर के देखे लाइक मंदिर बनवाय हवय। मंदिर म गउरी शंकर के साथ साथ राधा किसन के भी सुंदर मूरत हवय। इहां आठे कन्हैया के दिन भब्य झांकी बनाथे जेमा किसन के कई रूप बनाय जाथे अउ जेला देखे बर बहुत लोगन इहां आथे। किसिम किसिम के दुकान, झूला अउ प्रदर्शनी लगाये जाथे। इहां के जन्माष्टमी मेला पूरा छत्तिसगढ़ म परसिद्ध हवय। अइसनहे जांजगीर चांपा जिला के नरियरा म राधा किसन के बहुत सुंदर मूरत हवय। इहां के मंदिर परिसर म आठे कन्हैया के दिन रासलीला होवय। रासलीला करे बर दूर दूर के कलाकार आवे। रासलीला के आयोजन म अकलतरा के बैरिस्टर छेदीलाल के बहनोई कोसिरसिंह अउ भांजा विसेसर सिंह ह लगे रहे। अनेक गम्मतहिया, नचकरिहा इहां आवे जेमा सुरमिनदास, धरमलाल, लक्ष्मनदास चिकरहा, गउद के दादू सिंह अउ ननका रहस मंडली इहां रासलीला करय। जेला देखे बर अब्बड़ दूर दूर के लोगन इहां आवय। इहां के रासलीला अतका परसिद्ध होइस कि नरियरा ल ‘‘छत्तिसगढ़ के बृंदावन‘‘ कहे जाय लगिस। कवि सुकलाल पांडेय ह छत्तिसगढ़ गौरव म लिखे हवय-
ब्रज की सी रास देखना हो तो प्यारों
ले नरियर नरियरा ग्राम को शीघ्र सिधारो।
छत्तिसगढ़ म रासलीला करे खातिर सौरिनारायन के पंडित हीराराम तिरपाठी के गीत ल गावे। वोकर गीत बड़ा परसिद्ध रहिस। ये सिरि किसन के पचरंग सिंगार गीत देखव –
पंच रंग पर मान कसें घनश्याम लाल यसुदा के।
वाके वह सींगार बीच सब रंग भरा बसुधा के।।
है लाल रंग सिर पेंच पाव सोहै,
अँखियों में लाल ज्यौं कंज निरखि द्रिग मोहै।
है लाल हृदै उर माल कसे जरदा के।।1।।
पीले रंग तन पीत पिछौरा पीले।
पीले केचन कड़ा कसीले पीले।।
पीले बाजूबन्द कनक बसुदा के ।। पांच रंग ।।2।।
है हरे रंग द्रुम बेलि हरे मणि छज्जे।
हरि येरे वेणु मणि जड़ित अधर पर बज्जे।।
है हरित हृदय के हार भार प्रभुता के।। पांच रंग।। 3।।
है नील निरज सम कोर श्याम मनहर के।
नीरज नील विसाल छटा जलधर के।।
है नील झलक मणि ललक वपुष वरता के।। पांच रंग।।4।।
यह श्वेत स्वच्छ वर विसद वेद जस गावे।
कन स्वेत सर्वदा लहत हृदय तब आवे।।
द्विज हीरा पचरंग साज स्याम सुखदा के।। पांच रंग।।5।।
सिरि किसन के किरपा के कुछु नइ होवय। जेकर उवर वोकर किरपा होथे वोही रासलीला करे सकथे। सिरि किसन के भक्ति के प्रचार पर कवि के गीत हमेसा गाये जात रहिस-
कृष्ण कृपा नहिं जापर होई दुई लोक सुख ताहिं न होई।
देव नदी तट प्यास मरै सो अमृत असन विष सम पलटोई।।
धनद होहि पै न पावै कौड़ी कल्पद्रुम तर छुधित सो होई।
ताको चन्द्र किरन अगनी सम रवि-कर ताको ठंढ करोई।। द्विज हीरा हरि चरण शरण रहु तोकू त्रास देइ नहिं कोई।।
येकरे बर कहे जाथे कि सिरि किसन के किरपा खातिर भक्ति जरूरी हवय। लइका के जनम के समय इहां सोहर गीत गाये जाथे। अइसनहे एक सोहर गीत म कंस के कारागार म देवकी अउ बसुदेव के दुख के मारमिक चित्रण करे गे हवय –
मन मन गुने रानी देवकी
मन म बिचारन लागे ओ
ललना ऐही गरभ मैं कैसे
बचइ लेत्यौं ओ
सात पुत्र राम हर दिये
सबो ल कंस हर ले लिस ओ
ललना आठे गरभ अवतारे
मैं कैसे बचइ लेत्यौं ओ
घर ले निकरे जसोदा रानी
मेर सुभ दिन सावन ओ
ललना, चलत हवै जमुना असनाने
सत सखी आगू सात सखी पीछू ओ
सेने के घइला मूड़ म लिये
रेसम सूत गुड़री हे ओ
ललना, चलत हे जमुना पानी।
सात सखी आगू, सात सखी पीछू ओ
कोनो सखी हाथ पांव छुए
कोनो सखी मुंह धोवै ओ,
कोनो जमुना पार देखै
देवकी, रोवत हवै ओ
घेरि घेरि देखै रानी जसोदा।
मन में बिचारन लागे ओ
कैसे के नहकों जमुना पारे
देवकी ल समझा आतेंव ओ
न तो दिखे, घाट घठौना
नइ दिखे नाव डोंगा ओ
ललना, कइसे नहकों जमुना पारे
जमुना, बैरिन भरे हावय ओ
भिरे कछोरा मुड़ उघरा
जसोदा जमुना घंसिगे ओ
ललना, चलत हावय देवकी के पासे
जमुना ल नहकि के ओ
मत रो तैं मत रो देवकी
मैं तोला समझावत हौं ओ
ललना, कैसे विपत तोला होए
काहे दुख रोवत होवस हो
कोन तोर सखा पुर में बसे
तोर कोन घर दुरिहा है ओ
ललना, कोन तोर सइयां गए परदेसे।
गरभ के दुख ल रोवत हवौं वो
सात पुत्र राम हर दिये
सबे ल कंस हर लिस ओ
ललना, आठे गरभ अवतारे
मैं कइसे बचइलेबौं ओ
इस सोहर गीत म देवकी मैया के मन के पीरा के बड़ा ही मारमिक चित्रण हवय। यानी छत्तिसगढ़िया जन जीवन म सिरि किसन के लोक स्वरूप के दरसन होथे। तभे तो आठे कन्हैया के दिन लोग लइका, सियान अउ माइलोगन तक उपवास रकथे। बड़े भक्ति भाव से किसिम किसिम के जेवनास जैसे मालपुआ, खोवा के कुसली, बइचांदी के गुड़हा अउ सक्कर के पाग, तिखुर, राजगीर के लड्डू, सिंघाड़ा अउ धनिया पंजरी के भोग बनाये जाथे। ये तिहार के सब्बो झन ल बहुत इंतजार रथे। ये जेवनास ल भोग लगाके अपन सब्बो रिस्तेदार के घर भेजे जाथे। ये तिहार मिल बांटके रहे अउ खाये के तिहार कहे जाथे।

-प्रोफेसर अश्विनी केसरबानी
‘‘राघव‘‘ डागा कालोनी,
चांपा, छत्तिसगढ़

चारो जुग म परसिद्ध सिवरीनरायन

प्रोफेसर अश्विनी केसरवानी

सिवरीनरायन छत्तीसगढ़ के नवा जिला जांजगीर-चांपा म महानदी के खड़ में बसे जुन्ना, पबरित अउ धारमिक तीरथ हवे। ऐला आज सब्बो झन जानथे। इहां शिवनाथ अउ जोंक नदिया ह महानदी में मिलके पबरित अउ मुक्ति देवइया संगम बनाथे। इहां मरइया मन ल अउ ओखर हड्डी ल सेराये ले मुक्ति मिल जाथे। अइसने पोथी पुरान में घलोक लिखाय हे। ऐकरे बर इहां मरइया मन के हड्डी से सेराय बर अड़बड़ झन आथे अउ पिंडा पानी पारथे। महानदी के अड़बड़ महत्ता हे। जुन्ना सिवरीनरायन महात्तम ल पंडित मालिकराम भोगहा महराज, पंडित हीराराम त्रिपाठी महराज अउ सिरी बरणत सिंह चउहान ह अपन अपन भाखा म लिखे रहिस हे जेला अश्विनी केसरबानी ह संपादित करके फेर छपवाइस हे। आज सब्बो झन इहां के महत्ता ल पढ़ही अउ गुनही। ऐला सब्बो जानथे कि इहां के माटी-कोरा म इहां के जुन्ना इतिहास लुकाए हे जेला जाने ब इस्कंद पुरान, याज्ञवलक्य संहिता अउ रामावतार चरित ल पड़े बर परही। ये किताब म आन आन जुग म इहां के आन आन नाम रहिस। सतजुग म बैकुंठपुर, त्रेताजुग में रामपुर, द्वापरजुग म बिष्णुपुरी अउ कलयुग म नरायनपुर कहे जात रहिस। आज ऐला सिवरीनरायन कहे जाथे। इहां सतजुग म महर्षि मतंग रिषि के गुरूकुल आसरम रहिस जिहां शबरी रहिस। रिषि के कहे अनुसार त्रेताजुग म अजोध्या के दसरथनंदन सिरि राम अपन भाई लछमन के संग इहां आइस अउ ओखर जुठा बोइर ल मजे से खाके ओला मुक्ति दिस। मुक्ति देत समय ओला राम भगवान बरदान दिस कि तोर अए मोर नाम से इहां ‘शबरी-नरायन‘ गांव बसही जेकर अड़बड़ महत्ता रहि। ओकर मरे के बाद राम भगवान ओकर किरिया करम ल करिस अउ पंपा सरोवर कोती गइस। आज भी खरउद म शबरी दाई के मदिर हे जेकर दरवाजा म राम अउ लछमन के बड़े जबड़ धनुष बान धरे मूरति हे।
सिवरीनरायन म अड़बड़ जुन्ना बड़े मंदिर हे। इहां दू ठन भगवान के मूरति हे जेकर बारे में लोगन मन के अलग अलग बिचार हे। कोनो येला भगवान राम अउ लछमन कइथे। फेर धीर लगाके येला देखबे ल लागथे ये हर नर अउ नरायन के मूरति हे। इहां सब्बो कोती भगवान बिश्नु के चतुरभुजी मूरति हे, दरवाजा म जय बिजय के ठाड़े मूरति हे अउ आगु म गरूड़ के हाथ जोड़े मूरति हे। तइहा समय मे येला सिंदूरगिरि परबत कहे अउ इहां घनघोर जंगल रहिस। जहां आज के मंदिर हे उहां बहुत बड़े पानी के स्रोत रहिस हे जेला बांध के आज के मंदिर बने हे। भगवान के गोड़ के नीचू म एक ठन कुंड हे जेला रोहिनी कुंड कथे जेखर अड़बड़ महत्ता हे। ऐखर पानी ल पिये से मन पबरित होथे अउ मोक्क्ष मिल जाथे। ऐखरे बर ये कुंड के दरसन जरूर करना चाही अउ महानदिया न नहाना चाही। इहां के इतिहास ल जाने बर जुन्ना पोथी पुरान ल पढ़े बर लागही। सिरिमद भागवत के ग्यारवां स्कंद के पहिली अध्याय म 14 अए 15 वां इस्लोक में बरनन हे। महाभारत जुद्ध होये के बाद यदुवंस राजकुमार मन खेलत खेलत रिसि मुनि के आसरम गइस। ओ मन जामबती नंदन सांब ल माइलोगन के भेस म समरा के लेगे। उहां दुरवासा, भिरगु, कस्यप अउ वसिस्ठ रिसि ल पायलगी करके कहे लगिस-‘हे रिसी मन, ये सुघ्घर आंख वाली माइलोगन के देह भारी हे। तुमन अड़बड़ ज्ञानी, ध्यानी अउ सब्बो बात के जनोइया हवव, त बतावव के येकर बेटी होही के बेटा ? रिसी मन ओ मन के गोठ ल सुनके बड़ गुसिआइन अउ सराप दिन- येकर पेट ले येक ठन लोहा के मूसर निकलही जेकर से तुंहर कुल के नास हो जाही।‘ ये हर 16 वां इस्लोक म हे।
अब यदुवंसी राजकुमार मन डेराइन अउ झटकुन सांब के पेट म कपड़ा भरे रहिस तेला निकाल के देखे लागिस, तब सिरतोन ओमा येक ठन लोहा के मूसर निकलिस। मूसर ल धरके ओ मन राजा उग्रसेन के तिर गइन अउ सब बात ल बताइन। राजा ह ओ मूसर ल घिस घिस के सिराय के हुकुम दिस। राजकुमार मन समुद्र के तिर म अतका घिसिन कि ओहर नानकुन होगे अउ ओला घिसत नई बनिस त ओमन ओला समुद्र में फेंक दिस अउ सोचे लागिस कि नानकुन लोहा हमर काय करही। नानकुन लोहा ल येक ठन मछरी ह खा डारिस। जरा नाव के येक बहेलिया ल ओ मछरी मिलिस। जब ओहर ओ मछरी ल काटिस त नानकुन लोहा पाइस जेला ओहर अपन बान म लगा लिस। घिसाय लोहा मन पानी के लहरा म बोहाके आइस अउ उरई, जेला बिना गांठ के कांदी कइथे, जागिस। भागवत के 30 वां अध्याय के 21 वां इस्लोक म बरनन हे कि सब्बो यदुवंसी राजकुमार मन कन्हैया के हुकुम के मुताबिक समुद्र म नहाय गिन। उहां रिसि के सराप के सेती ओ मन के बुद्धी सिरा गे अउ ‘सेरैया‘ नाम के मद पीये लागिन। नसा होये के कारन ओ मन येक दूसर से लड़े लागिन। मार काट माच गे। ओमन के सब्बो हथियार सिरा गे त ओमन उरई कांदी ल उखारे लागिन। ये ओई कांदी हे जेहर रिसि मन के सराप से जागे रहिस हे। ये कांदी ह ओ मन के हाथ म आते ही लोहा बन जात रहिस। सब्बो झन लड़े नागिन अउ एक दूसर ल मारे लागिन। सब्बो राजकुमार मन ल मरत देख के बलराम ह समुद्र के तिर म धियान लगा के अपन आत्मा ल परमात्मा संग मिला के मनखे देह ल छोड़ दिस। तब कन्हैया बहुत दुखित होइस अउ एक ठन पिपर पेड़ के खाल्हे बइठ गे। ये समे कन्हैया ह अपन देह के कांति ल चतुरभुजी रूप धारन करके आगी सरिक सबो दिसा म अंजोर करत रहिस हे। कन्हैया ह अपन डेरी जांघ म जौनी गोड़ ल रखे रहिस। गोड़ म शंख, चक्र ह अइसन चमकत रहिस हे जइसन बेरा के रंग म रंगे कमल फूलथे। अतके बेरा जरा नांव के बहेलिया ह शिकार करत ओती आइस अउ शेर के आंखी चमकत हे समझ के ओई बान ल छोड़िस जेला मछरी के पेट म मिले नानकुन मूसर ल लगाये रहिस हे। जब पीरा म कहराय के अवाज ल ओ हर सुनिस त डरा के दोड़त उहां आइस और चतुरभुजी देवता कन्हैया ल देख के कांपत बहुत रोय लागिस। कन्हैया से रोवत अरजी बिनती करत कहिस-‘तुंहर लीला ल कोनो देवी देवता मन नइ समझ सकिन त मे तो अनपड़ गवांर जंगली हंव, मोला माफी दे दो। कन्हैया ह ओला समझाइस अउ हस्तिनापुर जाके युधिस्ठिर ल खबर करे बर कहिस। जरा ह दौड़त हस्तिनापुर गइस अउ सब्बो किस्सा ल युधिस्ठिर ल कहिस अउ अरजुन ल जल्दी ले के उहां आइस। अरजुन ह उहां आइस अउ सखा कन्हैया ल देख के रोय लागिस। जइसनहे कन्हैया के गोड़ ल अरजुन ह छुइस, ओखर सब्बो ताकत ल कन्हैया हर तिर लिस अउ मनखे सरीर ल छोड़ के अपन लोक चल दिस। कन्हैया के अपन लोक जाये के बाद ओकर परिवार में कोनो नइ बाचिस त अरजुन ह ओकर किरिया करिस लेकिन कन्हैया के देह नइ नरिस फेर ओसनहे ओला समुद्र म डार दिस अउ रोवत गात अपन हस्तिनापुर चल दिस।
ए कोती जरा ह सब देखत रहिस अउ पछतात रहिस, मोर हाथ कन्हैया के खून हों गिस कहिके। जइसनहे ओ मन गइस ओसनहे ओहर समुद्र से कन्हैया के देह ल ले आइस अउ सिंदूरगिरि के जंगल म रखके रोज पूजा करे। तेखरे बर ओला सिद्धि मिल गे। आगू जाके ओला जगन्नाथ पुरी के मंदिर में ले जाके इस्थापित कर दिस और ओला भगवान जगन्नाथ कहे लागिस। ओला सिवरीनरायन सेले जाये के बाद जरा के दुख ल भगवान हर लिस अउ कहिस कि मय इहां लुकाय रइहां, जउन मोर दरसन करिही ओला मोक्क्ष मिलही। तब ले सिवरीनरायन बहुत परसिद्ध हो गिस अउ उहां सब्बो झन दरसन करे जाये लागिस। फेर बंगाल देस के राजा उहां ओकर दरसन करे आइस अउ उहां मंदिर बनवाइस। मोरो काया ह सिवरीनरायन म जन्मिस। मय उहां के महत्तम ल लोगन तक पहुंचाय बर कोसिस करत हव। भगवान सौरिनरायन की जय।

प्रोफेसर अश्विनी केसरवानी
‘‘राघव‘‘ डागा कालोनी, चाम्पा

पीथमपुर के कलेसरनाथ : भोला बबा के महत्तम

हसदो नदिया के तिर म कलेसरनाथ भगवान।
दरसन जउन ओखर करिहि, आ बइकुंठ जाही।।

प्रोफेसर अश्विनी केसरवानी

छत्तिसगढ़ प्रांत म घलो बड़कन जियोतिरलिंग जइसन काल ल जितवइया भोला बबा के मंदिर-देवालय हवय जेखर सावन म दरसन, पूजा-पाठ अउ अभिसेक करे म सब पाप धुल जाथे। अइसनहे एक ठन मंदिर जांजगीर-चापा जिला म हसदो नदिया के तिर म बसे पिथमपुर म हवय। सावन महिना म, महासिवरात्रि म अउ चइत परवा से अम्मावस तक 15 दिन इहां मेला भरथे अउ धूल पंचमी के दिन इहां भोला बबा के बरात निकलथे जेला देखे बर देस भर के साधु मन इहां आथे। घिवरा के लिखवइया नरfसंगदास वैष्‍णव भोला बबा के बरात ल देख के गीत लिखे हे:-
आईगे बरात गांव तीर, भोला बाबा जी के
देखे जाबो चला गिंया, संगी ला जगावा रे।
डारो टोपी, मारो धोती, पांव पायजामा कसि,
गल गलाबंद अंग, कुरता लगावा रे।
हेरा पनही दौड़त बनही, कहे नरसिंहदास
एक बार हहा करही, सबे कहुं घिघियावा रे।।
कोऊ भूत चढ़े गदहा म, कोऊ कुकुर म चढ़े
कोऊ कोलिहा म चढ़ि चढ़ि आवत..।
कोऊ बिघवा म चढ़ि, कोऊ बछुवा म चढ़ि
कोऊ घुघुवा म चढ़ि हांकत उड़ावत।
सर्र सर्र सांप करे, गर्र गर्र बाघ करे
हांव हांव कुकुर करे, कोलिहा हुवावत।
कहें नरसिंहदास, शंभु के बरात देखि,




जांजगीर के कवि सिरि तुलाराम गोपाल ह पिथमपुर ल सतजुगी गांव कथे अउ कुथुर-पामगढ़ के गीत लिखवइया सिरि बुटु सिंह चउहान ह कथे कि इहां पुन्नी म नहाय अउ पूजा-पाठ करे ले देवता धाम जाथे। ऐखरे बर इहां सब्बो झन आके नदिया म नहाके कलेसर भोला बबा के धूप, दिया जला के बेलपान, धतुरा, गांजा-भांग अउ फूलपान चढ़ाथे। अइसन करके मानता माने ले ओ हर पूरा हो जाथे फेर ओहर दूसर साल भूइयां नापत इहां आते अउ कलेसर भोला बबा के पूजा करथे। बहुत झन कथे-’इहां आय ले पेट पिरा ह थिरा जाथे।’ काबर कि इहां के हिरासाय तेली के अइसनहे करे ले ओखर पेट पिरा थिरा गिस। गजट म उड़िया राज के खरियार के राजा ल इहां पेट पिरा ल थिराय बर आय रहिन करके लिख हे। ऐमा राजा के नाम नइ लिखे हे। लेकिन ये किताब म असवनी ह लिखे हवय कि ओला खरियार के युवराज जे. पी. सिंहदेव चिट्ठी लिखे हे कि हमर बबा राजा बिर बिक्रम fसंहदेव ह पेट पिरा के खातिर पिथमपुर नइ गे रहिस, ओ हर लइका के आसिरबाद मांगे गे रहिस। ऊहां कलेसर भोला बबा के पूजा करिन अउ मनौती मानिस कि ओखर लइका होही त इहां एक ठन मंदिर बनवाही। ओखर दू ठन नोनी अउ दू ठन बाबु होइस । ओ हर पिथमपुर म एक ठन मंदिर बनवाइस अउ देवता बइठाय नइ पाइस अउ मर गे त इहां के पुजारी मन ओ मंदिर म गौरी मइया ल बइठाइस। अइसनहे कतुक गोठ बात ल ए किताब म लिखे हवय। पिथमपुर के कलेसर बबा के महिमा ल कोनो नइ जानय। बुटु सिंह ओखर महिमा ल गाथे:-
हसदो नदिया के तिर म कलेसरनाथ भगवान।
दरसन जउन ओखर करिहि, आ बइकुंठ जाही।।
फागुन महिना के पुन्नी, जउन ऊंहा नहाइन।
कासी जइसन फल पाही, अइसनहे गाथे वेद अउ पुरान।।
बारहो महिना के पुन्नी म जउन इहां नहाहि।
ओ हर सीधा बइकुंठ जाही, अइसनहे गाथे बरनत सिंह चउहान।।




इहां के मंदिर के बनवइया के नाम पथरा म लिखाय हवय। कच्छ कुम्भारिया के जगमाल गांग जी ठिकेदार ह कारतिक सुदि दू, संबत् 1755 म गोकुल मिसतिरि कर ए मंदिर ल बनवाय रहिस। मंदिर ह ओतका जुन्ना नइ लागय। अइसन लागथे ए मंदिर के साज-तुने के काम करा गे हे। चापा के लिखवइया छबिनाथ दूवेदी महराज ह 110 बच्छर पहिली संसकिरित भासा म ‘कलेसर इस्तोत्र’ लिखे रहिन जेमा ओ हर संबत 1940 म कलेसर बबा ह जनमिस अउ मंदिर ह चार बच्छर म (संबत 1949 से संबत 1953) म बनिस। पिथमपुर के हिरासाय तेली ल भोला बबा ह सपना दे के कहिन-’घुरूवा ले मोला निकालबे त तोर पेट के पिरा ह थिरा जाही।’ हिरा ह ओसनहे करिस अउ ओखर पेट पिरा थिरा गे। ओहर इहां एक चउरा म भोला बबा के fलंग ल बइठाइस अउ पूजा करिस, सबके सामने म ओखर पेट के पिरा हर थिरा गे। ऐला सब्बो झन देखिन, दूरिहा गांव के लइकन-पिचकन, किसान, मोटियारी अउ माइ लोगन इहां आइन अउ पूजा करिन। फेर ऐला सब जान डारिस। चापा के जिमिदार हर ओखर भोगराग बर जोंगिस। इहां के मंदिर ल बनवाइन, ओमा संगमरमर लगवाइन अउ पूजा करे बर पुजारी राखिस। मेला अउ महासिवरात्रि म जिमिदार ऊंहा जाबेच करे। इहां एक ठन मठ रहिस हे जेखर महंत बैरागी मन रहिन। ए किताब म अस्सी बच्छर म दस झन महंत मन के नाम लिखे हे। इहां के मेला म रंग रंग के दुकान, सिनेमा-सरकस, अउ झुला आथे। खाये-पिये के जिनिस, बरतन-भाड़ा, टिकली-चुनरी, सोना-चांदी, सिल-लोढ़ा अउ कपड़ा के दुकान आथे। मेला घुमे बर लइकन-पिचकन, किसान-किसानिन सब आथे। कभु कभु लइकन मन के बिहाव लग जाथे। अइसन दूसर जगह कहां होथे, सब भोला बबा के किरपा हे। हमर मन म पिरा होथे कि इहां आय के रद्दा हर बड़ खराब हे। गंगा जइसे हसदो नदिया के तिर म फैक्टरी लगे हे जेखर जहर से नदिया के पानी जहर जइसन हो गे हे। ऐला रोके बर लागही।

प्रोफेसर अश्विनी केसरवानी
‘‘राघव’’ डागा कालोनी,
चांपा-495671 (छ.ग.)



रामनौमी तिहार के बेरा म छत्तिसगढ़ में श्रीराम

-प्रोफेसर अश्विनी केसरवानी
आज जऊन छत्तिसगढ़ प्रान्त हवय तेखर जुन्ना गोठ ल जाने बर हमन ल सतजुग, तेरताजुग अऊ द्वापरजुग के कथा कहिनी ल जाने-पढ़ेबर परही। पहिली छत्तिसगढ़ हर घोर जंगल रहिस। इहां जंगल, पहाड़, नदी रहिस जेखर सुघ्घर अउ सांत बिहनिया म साधु संत इहां तपस्या करय। इहां जंगली जानवर अउ राक्छस मन भी रहय जऊन अपन एकछत्र राज करे बर साधु संत मन डरावंय अऊ मार डारय। इकर बाद भी ये जगह के अड़बड़ महत्ता होय खातिर साधु संत मन इंहा रहय। इहां बहुतअकन साधु संत मन के रहे के कथा सुनेबर मिलथे। सौरिनरायेन म मतंग रिसी के आसरम रहिस हवै जिहां सौवरिन दाई रहिस अऊ जेला वो हर राम लक्छमन इहां आही अउ तोला मुकति दिही, कहे रहिस। अजोध्या के राम ह सबले पहिली इहां आइन, राक्छस मन ल मारके मुकति देइस अउ इहां राज करिन। अजोध्या ल कौसल कइथे अउ छत्तिसगढ़ ल दक्खिन कौसल। इहां के राजा भानुमंत की नोनी कौउसिल्या महाराजा दसरथ के पटरानी बनिन अऊ राम जेखर लइका होइन। तभे राम भगवान के इहां ल ममा घर कइथे। सुना हमर छत्तिसगढ़ के महिमा ला जेला कवि सुकलाल पांडे ह गाये रहिन :-

ये हमर देस छत्तिसगढ़ आगू रहिस जगत सिरमौर।
दक्खिन कौसल नांव रहिस है मुलुक मुलुक मां सोर।।
रामचन्द सीता अउ लछिमन, पिता हुकुम से बिहरिन बन बन।
हमर देस मां आ तीनों झन, रतनपुर के रामटेक मां करे रहिन हैं ठौर।।
घुमिन इहाँ ओ ऐती ओती, फैलिस पद-रज चारों कोती।
यही हमर बढ़िया है बपौती, आ देंवता इहाँ अउ रज ला आँजे नैन निटोर।।
राम के महतारी कौसिल्या, इहें के राजा के हैं बिटिया।
हमर भाग कैसन है बढ़िया, इहें हमर भगवान राम के कभू रहिस ममिऔर।।




तइहा के कथा कहिनी ला सुनबे त अइसने लागथे कि इहां सिरि राम,लक्छमन अउ जानकी अपन बनवास रहे के बेरा मा इहां रहिन अउ आर्य संस्किरिती के परचार करिन। इहां के भूंइयामा तीनो झन के चरन परे रहिस ऐकरे सेती इहां के रहन सहन अउ जिंदगी म अड़बड़ असर परे हे। भगवान राम के सुभाव, मितान, भाईचारा अऊ सब ला एक जइसे माने के सुभाव रहिस तेखरे बर इहां सब ल अइसनहे माने जाथे। अइसे माने जाथे कि राम भगवान के जनम जीव जगत के हित, सुख उएभाग अउ उद्धार खातिर होय रहिस। ऊंखर राज मा जाति बरन के आधार मा कउनो किसिम के दुआभेद नइ करे जात रहिस। सब्बो झन ला एके माने के रिवाज रहिस, सब्बो झन अपन बात ला बोल सकत रहिस। इहां ऊंच-नीच, जात-पात के दुआभेद नइ रहिस। तभे तो सब्बो झन के बीच भकति के बीज बोइस। सखा केंवटराज, सौउरिन दाई, अहिल्या माई जैइसन कतुक झन के उद्धार करिन, अउ ओला भक्ति दिस। ऐखरे बर इहां अनेक राम जानकी मंदिर हावय अउ वोखर दरसन परसन करे मा मोक्छ मिले के बात कहे जाथे।
भगवान काबर जनम लेथे, एकर बारे म जाने बर शिव पारबती संवाद ल जानेबर परही। ऐला हमर कवि कपिलनाथ कस्यप ह अपन पुस्तक ‘‘सिरी राम कथा‘‘ म लिखे हे –

पारबती कइथे-
राम ब्रम्ह तू कइथा, अबले समझ न आइस मोर।
दसरथ बेटा वही राम का, पूंछत हंव कर जोर।।
काबर लेइस जनम ब्रम्ह, राजा इसरथ के बेटा बनके।
मोला एकर मरम बतावा, मेटा मोर कुसंका मनके।।

तब भोला बाबा कइथे-
राम कथा मैं कइहौं गिरजा, सुन के भरम भूत सब जाही।
काबर होथे जनम ब्रम्ह के, सुन के कथा समझ म आही।।
जानत हासब मरम जनम के, इहां ब्रम्ह के होथे काबर।
पूछत हा लेढ़ी अस निचट, जनमिन दसरथ के घर काबर।।
कइहौं कथा गूढ़ मैं गिरजा, वही राम के सुमिरन कर कर,
पूछे हा तूं कथा राम के, दुनिया के कइलान करेबर।।
पापी मन के घोर पाप मा, जब धरती गरूवा जाथे।
नास करे बर वोमन के लेके अवतार ब्रम्ह आथे।।
पापी मन ला मार धरम के थापन करथें,
तपसी साधू धरमी मुनि के रच्छा करथें।
होथे धरम परचार फेर धरती के ऊपर,
अधरम होथे लुपुत सांति छा जाथे घर घर।
ओढ़र कर तूं अइसन निच्चट बन के बउरी,
पूछेहा सुघ्घर परसंग सब के हित गउरी।
अनगनती नइ कहत बनय सब कथा राम के,
तब ले तुंहला समझा कहिहंव जनम राम के।।




राम जनम के मरम ल शिव जी कहत हे-
राम कथा नइ सुनिस कान जो, अजगर के बिल वोला जाना।
आखी दरस न करिन प्रभू के, मंजुर पाख के चंदुवा माना।।
साधू संत देख के लेनइ मूड़ नवावय,
करू तुमा अस वोहर चिटको काम न आवय।
दुखी भुखी ल देख हिरदय जेकर नइ पिघलिस,
राम कथा मा जो सरधा बिसवास नइ करिस।।
अइसन प्रानी ला जीते जी मुरदा जाना,
कर कर तरक अकारन वो सइथे दुख नाना।
जे प्रानी के जीभ कथा हरि के नइ गाइस,
वो भिंदोल बेंगवा अस ब्रिथा मानुख तन पाइस।।
राम चरित सुन के सुख मा फूलय नइ छाती,
बरम्हा वोला ब्रिथा दिहिस पथरा अस छाती।
राम कथा सुन के न अघावय गिरजा जेहर,
बड़ भागी जनमे जाना धरती मा वोहर।।
कागु भुसंडी कहिन गरूड़ सो, अदभुत सुघ्घर कथा राम के।
वही कथा ला कहिहंव गिरजा, सुमरन कर कर राम के।।

शिव जी आगू कइथे-
धरती मा अवतार राम के, अनगनती बेरा होये हे।
उमा ! एक दू कथा सुनाहंव, काबर कइसे जनम भये हे।।
द्वारपाल जय बिजय हरी के, ब्राम्हन मुख ले पाइन श्राप।
हाटक लोचन ला मारे बर, बरहा रूप धरिन भगवान।
मारिन हरनाकुस प्रहलाद के, इच्छा कर नरसिंग भगवान।।
रावन कुंभ करन हो जनमिन, रेंगे धरती डोलय जेकर।
फर बरम्ह भगवान राम के, मारे मुकति होइस जिनकर।।
कश्यप पिता अदिति माता, दसरथ कौसिल्या होके आइन।
अपन कठिन तप के कारन जो, राम लखन अस बेटा पाइन।।




भगवान के अवतार तीन रूप म माने जाथे-पहिली पूरा अवतार जेमा भगवान स्वयं अवतरित होथे। ये स्रेनी में सिरि राम, सिरि किसन ल माने जाथे। दूसर आवेशावतार जेमा भगवान परसुराम ल माने जाथे अऊ तिसर अंशावतार होथे जेमा भगवान बिस्नु के अवतार के बरनन मिलथे। येमा मत्स, कूर्म, बराह, नरसिंग, वामन, बुद्ध अउ कलकी। भगवान बिस्नु के अवतारों का सामूहिक या स्वतंत्र मूरति कुसाण काल के पहले नई मिलय। लेकिन ये काल म बराह, कृस्न अउ बलराम के मूरत बनेले सुरू हो गी रहिस। गुप्त काल म वैस्नव धरम के माने जाने वाले राजा महराजा मन के कारन अवतार वाद के धारणा के विकास होइस। गुप्त काल के बाद सात से तेरहवीं के बीच मूरत बने चालू होइस। अऊ बराह, नरसिंह अउ बामन के मूरत बहुत बनिस। ये मूरत महाबलिपुरम, इलोरा, बेलूर, सोमनाथ, ओसियां, भुवनेस्वर अउ खजुराहो मा बनिस। ओखर बाद इही समय सिरि राम, सिरि किसन अउ बलराम के मूरत बनिस। भगवान सिरि राम ल पूरा अवतार, दसरथ पुत्र अउ निरगुन राम के रूप मा माने जाथे। भारतीय मूरत मा दसरथ नंदन सिरि राम के मूरत दूसर भगवान के तुलना मा बाद मा बनाये गइस। दू हाथ अऊ धनुस बान रखे सिरि राम के मूरत खरऊद के सौराइन दाई के मंदिर मा खड़े हावे, सौरिनरायेन मा अकलतरा के जिमिदार ह सिरि राम लक्छमन अउ जानकी के मंदिर बनवा के मूरत इस्थापित करिस। बाद में केंवटा समाजके लोगन अउ मठ मा सिरि राम लक्छमन अउ जानकी के अड़बड़ सुंनदर मूरत देखे जाये लाइक हावे। सबले बढ़िया राइपुर के दूधाधारी मठ मा सिरिराम पंचायतन मंदिर मा सिरि राम, लक्छमन, भरत अऊ सत्रुघन चारों भाई माई जानकी अउ बजरंगबली के बहुत सुंदर मूरत दरसन करे लाइक हावै। जांजगिर के मंदिर मा अउ सेतगंगा के मंदिर मा सिरि राम लक्छमन अउ जानकी के मूरत हावे। सेतगंगा मा के राम जानकी मंदिर मा रावन के मूरत भी हावे अउ ओला देखे मा लागथे कि रावन ऊंहा पहरा देवत हावे। सिरि सौरिनरायेन महात्तम मा सिरिराम भगवान के जनम के बारे मा बरनन मिलथे जेमा लिखे हावे-

मैं निज अंशहि अवध म, रघुकुल हो तनु चार
राम लक्छमन भरत अऊ सत्रूघन सुकुमार।
कौसिल्या के गर्भ मा जनम लेहु निसंदेह
महातमा दसरथ राजा मो पर करत सनेह।।
सिरि राम जनम के लिये सिरिंगी रिसी पुतरेष्ठी यग्य कराये रहिस। अऊ सिरिंगी रिसी छत्तिसगढ़ के धमतरी जिला के सिहावा पहाड़ मा रहिस अउ तपस्या करिन। येहु कहे जाथे कि सिरिंगी रिसी ह सिरि राम के भाठों रहिन। ओखर किरपा हमर छत्तिसगढ़ प्रांत ल मिलिस। अतका सुघ्घर भाग्य हामर प्रांत के अउ हमर हावै। सिरि राम ह जनमिस त सब्बे कोती खुसी फैइल गइस। बिजघंट बाजे लगिस, फूल के बरसा होय लगिस। स्वरग मा गाये लगिस-
भये प्रगट किरपाला दीन दयाला कौसिल्या हितकारी।
हरसित महतारी मुनि मन हारी अदभूत रूप बिचारी।।
लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुजचारी।
भूसन बनमाला नयन बिसाला सोमा सिंधु खरारी।।




हमर छत्तिसगढ़ प्रांत मा लोगन मन के मन मा सिरि राम ह मिसरी कस घुर गे हावै। इहां ऊंखर आये के अउ रहे के परमान मिलथे। इहि रद्दा ले लंका गये रहिस जेखरे बर इहां ला ‘‘दक्षिणापथ‘‘ कहे जाथे। ऊंहा जात जात जहां सिरि राम रूके रहिस ऊंहा तिरथ बन गे हावे। ऊंहा उंखर मंदिर भी बन गे हावे। सरगुजा के रामगढ़, सौरिनरायेन मा सौराइन दाई से भेंट, कसडोल के तुरतुरिया मा बालमिकी आसरम जिहां सीता मइया के दूनो लाल लव और कुस के जनम होइस, अऊ रतनपुर के पहाड़ी मा विसराम करिस। येकरे बर कबि सुकलाल पांडे लिखे हावे-
रतनपुर मा बसे राम जी सारंगपाणी
हइहयवंसी नराधियों की थी राजधानी
प्रियतमपुर हे संकर प्रियतम का अति प्रियतम
हे खरऊद मा बसे लक्छमनेस्वर सुर सत्तम
सौरिनरायेन म प्रगटे सौरि राम युत हें लसे
जो सब इनका दरसन करे वह सब दुख मा नहिं फंसे।।

रामराज के बरनन :-
कउनो ला नइ व्यापिस गिरजा, दैहिक दैविक भौतिक ताप।
राम राज मा रहिन सुखी सब, अइसन रहय राम परताप।।
कउनो के मन मा अइसन हिजगानइ आइस,
ऊंच-नीच के भाव कभूकउनो नइ लाइस।
अपन अपन ला सब समाज के अंग मान के,
एक एक ला करंय परेम सब अपन जान के।।
सब के सत व्यवहार रहय मानुस समाज मा,
रहंय न कउनो लबरा लुच्चा राम राज मा।
एक एक ला देख कभू इरखा नइ लाइन,
मार पीट हिंसा के मन माभावन लाइन।।
दाई बहिनी अस सब परनारी ला मानंय,
दूसर के धन दउलत ला माटी अस जानंय।
छूत छात के चिटको कउनो भेद न मानंय,
छुख सुख आये ले जुर मिल एक्के हो जावंय।।
रामराज मा नीत धरम के, उमा ! नित्त दिन बाजय बाजा।
सुख सागर मा प्रजा नहावंय, रामचंद्र अस पाके राजा।

केवल छत्तिसगढ़ मा नहिं बल्कि पूरे ब्रम्हांड मा सिरि राम राज के कल्पना करे जा सकत हावे। ऊंखर गुन ल कहुं नइ पाये जा सकत हावे। लेकिन विविधता भरे छत्तिसगढ़ मा मितान, भोजली, गुरू भाई जइसे रिवाज जरूर मिलथे जेमा ऊंच नीच, छेटे बड़े नइ देखे जाये। एक साथ पढ़े लिखे, खेले कूदे, खाये पहिने ओढ़े के साथ ही नौकरी करे जाथे … ये हमर छत्तिसगढ़ मा ही हो सकत हे जिहां राम भगवान के आसिस सब्बो दिन रइथे। इंहे निरगुन राम के मनइया रमरमिहा रइथे जौउन अपन सरीर मा राम राम लिखवा रइथे। सरीर के कोनो जगह नई बांचे हावे जिहां राम राम नई लिखाय रइथे। ऐखरे बर कहे जाथे कि राम ले राम के नाम हावै।

राम एम तापस तिय तारी। कोटि खल कुमति सुधारी।।
रिषि हित राम सुकेतु सुता की। सहित सेन सुत किन्ह बिबाकी।।
सहित दोष दुख दास दुरासा। दलइ नामु जिमि रबि निसि नासा।।
भजेऊ राम आपु भव चापू। भव भय भंजन नाम प्रतापू।।

प्रोफेसर अश्विनी केसरबानी
‘‘राघव‘‘ डागा कालोनी
चांपा (36 गढ़)
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