Tag: Deepak Kumar Sahu

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धानी भुईया मोर छत्तीसगढ़

बड़ सुग्घर महतारी के कोरा धान कटोरा धानी रे।
डोंगरगढ़ बमलई ईहा तेलिन दाई के घानी रे।।
पैरी सोंढुर के धार संग महानदी के पानी हे।
जनमेन इही भुइया म धन धन हमरो जिनगानी हे।।

जुड़ पुरवाही झकोरा म लह लहावत धान के बाली।
हरियर लुगरा पहिरय दाई माथ नवावय सूरज के लाली।।
अइसन हे छतीसगढ़ के भुईया जिनगी हमर भागमानी हे।
जनमेन इही भुइया म धन धन हमरो जिनगानी हे।।

सरग बरोबर गांव गली हे अमरईया खार ओनहारी डोली।
लइका खेलय भवरा बाटी बीरो बिल्लस हासी ठिठोली।।
कहानी कथा के अचरित रचना बबा के सुग्घर जुबानी हे।
जनमेन इही भुइया म धन धन हमरो जिनगानी हे।।

महामाई सीतला दंतेश्वरी दाई के डीही डोंगर म बसेरा।
सातो रिसी धुनि रमाये सिहावा डोंगरी म सुग्घर डेरा।।
गुन गावत भगवन चरण के मुनि महात्मा के बानी हे।
जनमेन इही भुइया म धन धन हमरो जिनगानी हे।।

दीपक साहू
मोहंदी मगरलोड

सत अउ अहिंसा के पुजारी गुरु घासीदास

गुरु घासीदास छत्तीसगढ़ राज मा संत परम्परा के एक परमुख संत आय। सादा जीवन उच्च विचार के धनवान संत गुरु घासीदास छत्तीसगढ़ राज ला नवा दिसा दिस अउ दसा ला सुधारे बर सरलग बुता करिन अउ अपन सरबस लुटादिन।

जीवनी:- बछर 1672 मा हरियाणा राज के नारनौल गाँव मा बीरभान अउ जोगीदास नाव के दु झिन भाई जिनगी चलावत रिहिस। दुनो भाई सतनामी साध मत के साधक रिहिस अउ अपन मत के परचार परसार करत रिहिस।दुनो भाई अब्बड़ स्वाभिमानी रिहिस। सतनामी साध मत के विचारधारा के अनुसार कोनो भी मनखे ला कोनो दूसर मनखे करा झुकना मना रिहिस, लेकिन मनखे के पूरा सम्मान होय ये बात के धियान ये मत मा होवत रिहिस। सन 1672 हा मुगल काल के सासन हमर देस मा चलत रहिस अउ मुगल सासक औरंगजेब के हाथ मा सासन के डोरी हा रिहिस। एक घांव के बात आय की सतनाम साध मत विचारधारा के किसान मन औरंगजेब के सेना अउ ओकर चेला चांगुरिया मन ला झुक के सलाम नइ करिस ता औरंगजेब के सैनिक मन जम्मो किसान मन ला लउठी मा मार दिस। किसान अउ सैनिक मन के बीच मा भयंकर झगरा सुरु होगे। थोक थोक मा बात मुगल सासक औरंगजेब तक पहुँचगे। सतनामी अउ औरंगजेब के झगरा सुरु होगे। सतनामी समाज के अघवा दोनो भाई वीरभान अउ जोगीदास रिहिस। अड़बड़ दिन ले झगरा चलिस, जेमा सतनामी समाज के सैनिक मन औरंगजेब के सेना के धुर्रा छड़ा दिस। जेकर बाद औरंगजेब के अतियाचारी हा दिनो दिन अउ बाढ़हत गिस अउ सतनामी समाज के लोगन मन ला मारे पीटे के सुरु होईस। अतियाचारी ले बाचे बर सतनामी समाज के लोगन मन देस मा येती ओती बगरत गिन। जेकर बाद गुरु घासीदास के पुरखा मन घलो छत्तीसगढ़ राज मा आके बस गिस अउ इहचे जीवन यापन करिस।

गुरुघासीदास के अवतरण:– गुरु घासीदास के जनम अट्ठारह दिसम्बर 1756 मा वर्तमान बलौदाबाजार जिला के बिलाईगढ़ तहसील के गिरौदपूरी गांव के एक साधारण किसान अउ गरीब परिवार मा होईस। गुरु घासीदास के ददा के नाव महंगू दास अउ दाई के नाव अमरौतिन बाई रिहिस। गरीबी मा दिन गुजारे के सेती गरीब अउ सोसित मन के पीरा ला घासीदास भली भांति समझय अउ उकर कल्याण बर सदा सरलग बुता करत करय। घासीदास बबा हा सत के खोज बर छाता पहाड़ ला अपन समाधि इस्थल बनाइस अउ ज्ञान बर सरलग तपस्या करिस।

कुरीति के पुरजोर विरोध:- गुरु घासीदास जी हा समाज के फैले जुन्ना परम्परा जेन हा समाज बर खतरा रिहिस अइसन परम्परा अउ रीतिरिवाज के पुरजोर विरोध करिस। समाज के चार वर्ण के सिद्धांत ला गलत ठहराइस। चार वर्ण के जुन्ना परम्परा मा समाज के लोगन मन स्वाभिमान के जीवन यापन नइ कर सकत रिहिन। वो समय के ब्राम्हण वर्चस्वता ला सिरवाय बर नवा उदिम करिस जेकर ले समाज मा सब जाति के मनखे मन ला समान अधिकार मिलिस। जुन्ना सन्त होय के कारन गुरु घासीदास जुन्ना रीतिरिवाज मन के समाज मा होवइया प्रभाव ला भली भांति समझय अउ छुटकारा देवाय बर सरलग बुता करिस। मनखे मन ला स्वाभिमान ले जीवन जिये के प्रेरणा दिन।

लोगन मन बर सिक्छा:- गुरु घासीदास एक सिद्ध पुरुष संत रिहिस। संत मन अपन करम के द्वारा लोगन मन ला सिक्छा देय के काम करथे। गुरु बाबा के एक सिद्धात् मनखे मनखे एक बरोबर हा समाज के लोगन मन बर एक परमुख सिक्छा आय। संत होय के कारण गुरु घासीदास ज्ञान भक्ति अउ बैराग्य हा कूट कूट के भरे रिहिस। मुगल मन के सासन काल मा बलि प्रथा हा पनपत रिहिस ओकर विरोध गुरुजी के द्वारा करे गिस। मूर्ति पूजा के बदला मा ज्ञान भक्ति वैराग्य के द्वारा ईश्वर ला पाय बर लोगन मा जारूकता लाइस। पशुधन के ऊपर होवत अतियाचारी ला गुरु घासीदास हा रोकिस। सतनाम पंथ मा गाय के उपयोग खेती के कारज मा मनाही हे। सुराजी के लड़ई मा छत्तीसगढ़ राज के पहिली शहीद वीर नारायण सिंह घलो गुरु बाबा के सिखाय रददा मा रेगिन।

सात सिद्धान्त:– गुरु घासीदास के सात सिद्धान्त ला सतनाम पंथ मा सात वचन के रूप मा माने जाथे जेमा सतनाम धरम मा विस्वास, जीव हत्या नइ करना, मांसाहार मा प्रतिबंध, जुआ चोरी ले दुरिहा रहना, नसा ले दुरिहा रहना, जाति पाती के भेद नइ करना, व्यभिचार ले दुरिहा रहना हा शामिल हे। एकर अलावा सत्य अउ अहिंसा, धैर्य, लगन, करुना, करम, सरलता अउ नेक व्यवहार के चरचा सात सिद्धान्त मा करे गे हवय।

गुरु घासीदास हा समाज के लोगन मा नवा सोच अउ विचार पैदा करिस अउ इही बुता बर अपन सरबस लुटा दिस। तेखरे सेती आज संत बाबा गुरु घासीदास के जीवन हा आज के मानव समाज मा एक आदर्श हे।

दीपक कुमार साहू
मोहंदी मगरलोड

मोर छतीसगढ़ महान हे

छतीसगढ़ के पबरित भुईया जस गावत जहान हे
वीर जनमईया बलिदानी भुईया मोर छतीसगढ़ महान हे

होवत बिहनिया सुरुज के लाली नित नवा अंजोर बगरावय
मटकत रुखवा पुरवईया म डोंगरी पहाड़ी शोभा बढ़हावय
जन जन के हिरदे म मानवता मया के खदान हे
मोर छत्तीसगढ़ महान हे मोर छत्तीसगढ़ महान हे

करिया तन म मनखे ईहा सत ईमान के ढांचा
रिस्ता नाता जबर पोठ हे राम ईहा के भाचा
मया पीरा बर घेच कटईया मनखे गुणवान हे
मोर छत्तीसगढ़ महान हे मोर छत्तीसगढ़ महान हे

कल कल बोहावत महानदी संग पईरी सोंढुर के धारा
इन्दरा नाचय बस्तर घाटी म सुग्घर सजे चित्रकूट फुहारा
हीरा तोपाये ईहा माटी म रतनगरभा भुईया धनवान हे
मोर छत्तीसगढ़ महान हे मोर छत्तीसगढ़ महान हे

सुवा पंथी ददरिया गूँजय सरगुजिहा करमा नाचा
मीत मितानी मया बधना के सुग्घर ईहा साचा
कला सन्सकीरीति के धनी राज रंग रंग के विधान हे
मोर छत्तीसगढ़ महान हे मोर छत्तीसगढ़ महान हे

दीपक कुमार साहू
मोहदी मगरलोड



दाई ददा भगवान हे

दाई ददा के मया दुलार म मनखे होथे बडका धनवान जी
झन छोडव दाई ददा ल् जागत तीरथ बरथ भगवान जी

जन्म देवइया दाई के करजा जिनगी भर नई छुटाए
दाई के मया अमरित बरोबर दूध के संग म पियाये
नवा रस्ता गढ़हईया हमर जिनगी रूप शील गुणवान जी
दाई ददा के मया दुलार म मनखे होथे बडका धनवान जी

उबड़ खाबड़ रस्ता जिनगी के ददा ह ओला चतवारे हे
बाधा पिरा आईस जब जिंदगी ल् सुग्घर रखवारे हे
पर उपकारी ददा के जिनगी धर्मात्मा युधिस्ठिर समान जी
झन छोडव दाई ददा ल् जागत तीरथ बरथ भगवान जी

दाई के अचरा के छइहा म जम्मो देवी देवता के गांव हे
सरग के दुवारी खुलही दाई के तीर निसेनी इखर पाव है
दाई के करव निसदिन सेवा इही म राम बनगे भगवान जी
झन छोडव दाई ददा ल् जागत तीरथ बरथ भगवान जी

ददा के सपना झन टोर मन म जबर दिन ले संजोए हे
जिनगी ल उजियारी करे बर तन ल् पसीना म भिजोये हे
निसदिन मया लूटईया ददा के हर रोज करव सम्मान जी
झन छोडव दाई ददा ल् जागत तीरथ बरथ भगवान जी

दीपक कुमार साहू
मोहदी मगरलोड
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होरी तिहार के ऐतिहासिक अउ धार्मिक मान्यता

हमर भारत भुइया के माटी म सबो धरम सबो जाति के मनखे मन रइथे। अउ सबो धरम के मनखे मन अपन अपन तिहार ल अब्बड़ सुग्घर ढंग ले मनाथे। फेर हमर भारत भुईया म एक ठन अइसन तिहार हे जेन ल सबो धरम के मनखे मन मिलजुल के मनाथे। ओखर नाव होरी तिहार। होरी तिहार के नाव ल सुनते साठ मन म अब्बड़ उलास अउ खुशी के माहुल ह अपने आप बन जाथे। होरी तिहार ह कौमी एकता के तिहार आय। होरी तिहार ह अपन संग अब्बड़ अकन तिहार मन ल समेटे हे। हिन्दू धरम म होरी तिहार के अब्बड़ महत्व हवय। हिन्दू धरम म होरी तिहार ल होलिका अउ परम् भगत प्रहलाद ले जोड़ के देखे जाथे। होरी के पहिली दिन होले जलाए के परम्परा हवय। अर्थात अधरम म धरम के जीत होईस तेखर सेती होलिका दहन के बिहान दिन लोगन मन खुसी मनाथे अउ रंग गुलाल खेलथे। होलिका ल धार्मिक ग्रन्थ म सात्विक जिनगी के दुरगुन बताये गे हवय।
ये तिहार के वरनन हमर हिन्दू धर्म के धारमिक पुस्तक मन म मिल जाथे। शिव पुराण के अनुसार भगवान शिव जब अपन तपसिया करत रइथे त देवता मन शिव जी ल जगाए बर कामदेव ल के सहारा लेथे। जब कामदेव के द्वारा भगवान के तपसिया ल भंग करे जाथे त शिव जी अपन तीसर आखी ल खोल देथे जेखर सेती काम देव ह भस्म जो जाथे। काम देव जेन दिन भस्म होथे वहू दिन फागुन पूर्णिमा के दिन रइथे। काम के भावना के प्रतीकात्मक रूप जला के सच्चा भक्ति ले होली तिहार मनाथे। तेखर बाद म भगवान शंकर के बिहाव राजा हिमालय के बेटी पार्वती ले होथे अउ ओखर बेटा कार्तिक ह ताड़कासुर के वध करथे।
बाल रूप जब भगवान श्रीकृष्ण के वध के आस लागये कंस ह पूतना ल गोकुल भेजथे। उल्टा श्रीकृष्ण जी के ह राक्षसी पूतना के वध कर देथे। वहू दिन फागुन पुन्नी के दिन रइथे। होरी तिहार ह राधा अउ किसन के पबरित परेम ले घलो जुड़े है। बसन्त ऋतु में एक दूसर के ऊपर रंग लगाना श्री कृष्ण लीला के अंग आय।



भारत मे एक झन राजा जेखर नाव पृथु रिहिस। ओखर समय म एक झिन ढुंढी नाव राक्षसी रिहिस। भगवान ले वरदान पाये राक्षसी राज के जम्मो लइका मन अपन आहार मान के खावय। मोला देवता, मनुष्य, अस्त्र, शस्त्र नई मार सकय अउ न ही मोर ऊपर कुहर,बरसा,जाड़ के कोनो परभाव पड़य ये वरदान ढूंढी ल भगवान शंकर कोति ले मिले रहय। ढूंढी ल केवल लइका मन ले मर सकत रिहिस। अइसन दानव ले मुक्ति पाये बर राजा पृथु के राज पुरोहित ह ओखर उपाय बताईस की फागुन महीना के पुन्नी दिन जब न तो बहुत जादा गरमी अउ न तो जाड़ रइथे ओ समय म हमर राज के जम्मो लइका मन एक जगा सकलाके एक एक ठन लकड़ी, छेना धरके आही अउ मन्त्र जाप करत बरत आगी के परिक्रमा करही त ढुंढी राक्षसी ह मर जाही। अउ होईस घलो इसनेच जब राक्षसी ह आगी के तीर म आईस त ओखर उही कर विनास होंगे।
आधुनिक इतिहास म देखन त विंध्य क्षेत्र के रामगढ़ म मउजूद ईसा ले तीन सौ बछर जुन्ना एक ठन आलेख म ये तिहार के अब्बड़ सुग्घर वरनन हवय। इसने ढंग ले भारत के यात्रा करईया मुस्लिम विदेसी यात्री साहित्यकार अलबरूनी अपन पुस्तक म होरी तिहार के उत्साह मंगल ल जबर समझाए हे। मुगल के समे म अकबर के संग जोधाबाई अउ जहाँगीर के संग नूरजहाँ के होली मनाये के परमान आज घलो मिलथे। इतिहास म वरनन हवय की शाहजहां के जमाना म होरी तिहार ल ईद-ए-गुलाबी या आब-ए-पाशी(रंग के फुहार)के नाव ले जाने जाय। अइसन ढंग ले होली तिहार ल धारमिक मान्यता मिले हवय। ये तिहार ल जम्मो मनखे मन भाईचारा के भावना ले मनाथे।

दीपक कुमार साहू
मोहदी मगरलोड
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राज काज म लाबोन

चलव धधकाबो भाखा के आगी ल, दउड़ समर म कूद जाबों रे
गुरतुर मीठ छतीसगढ़ी भाखा ल्, हमर राजकाज म लाबोंन रे

हमर राज म दूसर के भाखा, होवत हे छतीसगढ़ी के अपमान
दूसर के भाखा जबर मोटहा, दूबर पातर छतीसगढ़ी काडी समान
अपन भाखा के बढाबोन मान, चलव जुरमिल सुनता बधाबोन रे
गुरतुर मीठ छतीसगढ़ी भाखा ल, हमर राजकाज म लाबोंन रे

देवनागरी ले उपजे बाढ़हे, अब छाती ताने राजा ठाड़हे हे
दूसर ल मया देवईया हमर भाखा, आज अपने विपत म माड़हे हे
अपन भाखा ल देवाबोन पहिचान, चलव जुरमिल आघु आबोन रे
गुरतुर मीठ छतीसगढ़ी भाखा ल, हमर राजकाज म लाबोंन रे

कला के बदउलत कलाकारी मन, छतीसगढ़ के नाव जगाए हे
हमर बोली भाखा के रंग ह, चारो मुड़ा हरियर पाना हरियाय हे
इही बोली भाखा के रंग ल, जुरमिल फेर बगरबोन रे
गुरतुर मीठ छतीसगढ़ी भाखा ल, हमर राजकाज म लाबोंन रे

दीपक कुमार साहू
मोहदी मगरलोड
जिला धमतरी
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झन बिसावव सम्मान

अभी के बेरा म कला अउ कलाकार के कमी नई हे। किसिम किसिम के कलाकार ह अपन कला ल देखाथे। हमर बीच म कतको अकन अइसन कलाकार रिहिस जेन मन अपन कला के बल म सरी दुनिया ल दांत तरी अंगरी चाबे बर मजबूर कर दिन। फेर उन कलाकर मन मान अउ सम्मान के थोरको आस अपन मन म नई राखिस। पहिली के कला ह कलाकार मन बर एक साधना रहय। इही साधना ल पूरा करत करत कतको बछर ह बीत जावय। अउ अब्बड़ सुग्घर कला ह उपजय। कलाकर मन जेन भी विधा ले जुड़े रहय ओ विधा म अब्बड़ नाव कमावय। अब के जमाना म किसिम किसिम के कलाकार आगे हवय फेर उखर कला म बने साख नजर नई आवय।



ये बात घलो सही हवय की लोहा ल जतका मांजबे ओतके उज्जर होथे। फेर अभी के लोहा ह ओतका करिया नईहे जतका पहिली के रहय। इही लोहा कस तो नवा कलाकार मन हवय। अभी के कलाकार मन चमकेच नईहे अउ अपन आप ल अपन विधा म सर्वज्ञानी समझ जाथे। अउ थोर बहुत जेन भी कलाकर ल कलाकारी करे बर आथे वो कलाकार मन बर आलोचक घलो नई मिल पावत हे। जेकर से पता चल सकय की ओ अपन कला के कतक गहिरा पानी म हे। अपन कला ल देखाये से जादा सम्मान पाये के लालसा मन रइथे।

नान बुच कोन्हों कविता लिख लिस त कोन्हों नाचा गम्मत म जोकर बन जाथे त अउ आनी बानी के कला म अपन पाव राखे त ओमन फूले नई समाये। मन म कोन्हों भी सम्मान ल् पाये के लालसा ह बढ़ाहत रइथे। अउ अभी के माहुल ह घलो अइसने चलत हे की कोन्हों भी सम्मान देवइया संगठन या समिति मन नवा कलाकर मन ल भुलवार के सम्मान के महत्ता ल् बढ़हा चढ़हा के बता देथे जेखर सेती अभी के कलाकर मन घलो उही सम्मान म झाप जाथे। कलाकर मन थोर बहुत पइसा दे देथे तहान वहू मन ल सम्मान दे देथे। अउ सब कलाकार मन घलो इही बात ल बढ़ावा दे बर आघु रइथे। आजकल जतका भी सम्मान हो सबो सम्मान ह पइसा म बेचावत हे। हमर देश के सर्वोच्च सम्मान मन के हालत घलो अइसने हे। जेन ल सम्मान मिलना चाही वोला नई मिल पावत हे। ईहा पद अउ पइसा के आघु म काखरो नई चलय।



नवा कलाकार मन के हिरदे म थोरको धीरज नईहे। हिरदे म धीरज के कमी नवा कलाकर मन म साफ नजर आथे। काबर की श्री रामचरित मानस ल लिखाये हे कि “कर्म प्रधान विश्व रचि राखा”। इहा करम के प्रधानता हे अउ करम करे म के मीठ फर ह मिलथे। अउ गीता म घलो ये बात के परमाण हे कि करम ल बने ढंग ले सिरजाव जेकर ले मीठ फल ह मिलय। निरन्तर करम करव फर के आस मत रखव। काबर की हम करम करे हन त फर मिलना निश्चित हे। नानकुन कला ल सिरजा डारथे तहान तुरते फल के आस ह रइथे। कहावत घलो हे नवा बइला के नवा सिंग चल रे बइला टिंगे टिंग। अइसन पइसा म बिसाय सम्मान ह तो हमर ऊपरी कला ल देखाथे।असली कला तो जागर तोर मेहनत म आघु आथे। अउ ये पइसा म बिसाये सम्मान ह हमर बर अच्छा परिणाम नोहय। सबले बड़का अउ सुग्घर सम्मान जनमानस के परेम आय। जनमानस के बीच म अपन कला ल देखाये के बाद म जतका मया अउ दुलार मिल जाये ओ कलाकार बर सबले बडका सम्मान आय। हमर कला हमर कलाकारी बढ़िया रही त सम्मान मिलना घलो सिरतोन हे। हम जतका हमर कला ल मांजबो ओतके हमर कला म धार आही अउ सम्मान मिलही।

दीपक कुमार साहू
मोहदी मगरलोड
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