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दिनेश चौहान के आलेख – कबीर जयंती बर विशेष : जन-मन म बसे कबीर

हिन्दी साहित्य के अकास म आज ले लगभग सवा छै सौ साल पहिली एक अइसे नक्षत्र के उदय होय रिहिस जेला हमन कबीरदास के नाँव ले जानथन। कबीरदास जी कवि ले बढ़के एक समाज सुधारक रिहिन। जउन सोझ-सोझ अउ खर भाखा म बात केहे के बावजूद हिन्दू अउ मुसलमान दुनो के बीच समान रूप म लोकप्रिय होइन अउ आजतक ले हवँय। ऊँखर पूरा जीवन विवाद के चादर म लपटाय मिलथे। कबीरदास जी के माता-पिता अउ जनम के बारे म निश्चित ढंग ले कुछ कहना संभव नइ हे। कोनो कहिथे के ऊँखर जनम चमत्कारिक रूप ले कमल के फूल म हो रिहिस तौ कोनो कहिथे वो एक विधवा बम्हनिन के गरभ ले पैदा होय रिहिस। जेला वोह लोकलाज के भय म लहरतारा नाँव के तरिया करा फेंक दे रिहिस। जेखर पालन-पोषण नीरू अउ नीमा नाँव के जुलाहा दंपती मन करिन। कबीर उही मन ल अपन माँ-बाप मानिन। कबीर के बाप करा अतका धन-दौलत नइ रिहिस के वोला पढ़ा-लिखा सकतिस। एकरे सेती वोला पुस्तक-पोथी के ज्ञान नइ मिल पाइस। धार्मिक सुभाव के सेती उन स्वामी रामानंद के चेला बन गिन। अपन जीवन के अनुभव अउ साधना के बल म उन अपार ज्ञान हासिल करिन। दूसर ज्ञानी अउ बिद्वान मन ल कबीरदास के कहना राहय-
“तू कहता कागद की लेखी, मैं कहता आँखिन की देखी”
दुनियाभर के पोथी-पुरान पढ़े के बजाय कबीरदास जी ढाई अक्षर के प्रेम के पाठ पढ़े बर जोर देवत केहे रिहिन-
“पोथी पढ़-पढ़ जग मुवा, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।। ”
कबीर दिखावा अउ आडंबर के कट्टर बिरोधी रहिन। माला जपना, टीका लगाना, मूर्ति पूजा, नमाज पढ़ना, रोजा रखना ये सब के बिरोध म उन दूनो कौम ल चेताय बर नइ छोड़िन-
“काँकर पाथर जोड़ के, मस्जिद लई बनाय।
ता चढ़ि मुल्ला बाँग दे, बहिरा हुआ खुदाय।।

पाहन पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूँ पहार।
ताते या चाकी भली, पीस खाय संसार।।

मूड़ मुड़ाए हरि मिले, तो सब कोई लेय मुड़ाय।
बार-बार के मूड़ते, भेड़ न बैकुंठ जाय।।

ये उदाहरण ले साबित होथे के कबीर ल धरम म बंधाना मंजूर नइ रिहिस।

ऊँखर वाणी ल ऊँखर चेला मन कलमबद्ध करके दुनिया खातिर संजो के राखिन। तभे तो कबीरदास बर ये लाइन ह पर्याय बन गे हे-
मसि कागद छूयो नहीं, कलम गही नहिं हाथ।
चारों जुग के महातम, कबिरा मुखहिं जनाई बात। ।

कबीरदास जी भक्तिकालीन कवि रिहिन। लोक कल्याण खातिर समाज म घटनेवाला घटना ल अतेक सहज अउ प्रभावी ढंग ले कबीरदास जी प्रस्तुत करँय के वोला सुने के बाद हर कोई गुने बर मजबूर हो जाय अउ आजो हो जाथे-

“माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर।
कर का मनका डार के, मन का मनका फेर।।

धीरे धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय।
माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय।। ”
कबीर के वाणी ल साखी, सबद अउ रमैनी छंद के रूप म संजोय गे हे जेन ‘बीजक’ के नाम से परसिद्ध हे। कबीर गुरू के महिमा के बड़ बखान करे हवँय। एक जघा गुरू ल भगवान ले ऊँच इस्थान दे हवँय तौ एक जघा कुम्हार से तुलना करे हवँय-

गुरु गोबिंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाँय।
बलिहारी गुरु आपनो, जिन गोबिंद दियो बताय। .

गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ गढ़ काढ़ै खोट।
अंतर हाथ सहार दै, बाहर मारै चोट। ।
कबीर के खर भाखा के सेती ऊँखर निंदा करइया मन के घलो कोनो कमी नइ रिहिस। फेर कबीर निंदा करइया मन ल अपन हितवा मानय-
“निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।।

कबीर के जनम संवत् 1455 म काशी म होइस। पूरा जीवन काशी म बीतिस। जब मरे के पाहरो आइस तौ कबीर मगहर चल दिस। काबर? काबर के वो समय अइसे धारना रिहिस के काशी म मरे ले सरग अउ मगहर म मरे ले नरक मिलथे। ये धारना ल टोरे खातिर वो समय के खाँटी महात्मा अपन शरीर ल मगहर म तियागिन-
“क्या काशी क्या ऊसर मगहर, राम हृदय बस मोरा।
जो काशी तन तजै कबीरा, रामे कौन निहोरा।। ”
संवत् 1575 म ऊँखर शरीर तियागे के बाद ऊँखर लास बर घलो विवाद होगे। हिंदू मुसलमान दुनो अपन-अपन ले दावा करे लगिन। फेर अइसे मानता हे लास गायब होगे अउ लास के जघा म फूले फूल रखाय मिलिस।

कबीर बेधड़क सच बोलइया संत कवि रिहिन। उन कटु सत्य केहे म घलो नइ हिचकत रिहिन। मानवता ल सही रस्ता देखाय बर आज अउ हमेशा कबीर के जरूरत रइही।

दिनेश चौहान

छत्तीसगढ़ी भाषा का मानकीकरण : कुछ विचार

डॉ. विनय कुमार पाठक और डॉ. विनोद कुमार वर्मा की पुस्तक ‘छत्तीसगढ़ी का संपूर्ण व्याकरण’ पढ़ने को मिली। इसमें देवनागरी लिपि के समस्त वर्णों को शामिल करने की पुरजोर वकालत की गई है। यह भी ज्ञात हुआ कि डॉ. वर्मा और श्री नरेन्द्र कौशिक ‘अमसेनवी’ की पुस्तक ‘ छत्तीसगढ़ी का मानकीकरण : मार्गदर्शिका’ भी शीघ्र प्रकाशित होने वाली है।

यहाँ मैं ‘छत्तीसगढ़ी का संपूर्ण व्याकरण’ पुस्तक पर अपने कुछ सवाल और विचार रखना चाहता हूँ। क्या व्यक्तिवाचक संज्ञा के लिए ही देवनागरी लिपि के सभी वर्णों को स्वीकार किया गया है? क्योंकि प्रशासनिक शब्दकोश खण्ड में हिन्दी के बहुत से शब्दों को अपभ्रंश रूप में लिखा गया है। यथा- आकास, अनुसासन, अब्दकोस, असासकीय, आचरन, सीघ्रलेखक, आदेस, रास्ट्र, वरिस्ठ, वेधसाला, कार्यसाला,संदेस, सिफारिस, अनुसंसा, गियापन, ससर्त, अकुसल, सुल्क, सून्य, सपथपत्र, विसय, सारनी, उपसीर्स, संदेस आदि।
शब्दकोश खण्ड में इसारा, इस्लोक, ईसान आदि।





संधि खण्ड में विसम, विसाद, सुसमा, प्रनाम, भूसन, निस्फल, निस्चिंत, दुस्सासन, मन-अभिलासा आदि। इस प्रकार श, ष, ज्ञ और ण की छुट्टी कर दी गई है।

‘व’ की जगह ‘ब’ के प्रयोग से बचने का सुझाव तो है लेकिन बकालत, बिसय, बिस्तार, बित्तीय, बिदेसी, बिधान, बिबेक, बिक्रय, बिभाग, साबधानी आदि को बेखटके इस पुस्तक में स्थान देने का क्या अर्थ निकाला जाए? पुस्तक शुद्ध छत्तीसगढ़ी की बात करते-अपभ्रंश छत्तीसगढ़ी की चपेट में दिखता है। कुछ उदाहरण और जो छंद खण्ड से लिए गए हैं-

बरम्हा, धरम, परान, इंदिरावती, दुरुग, करन, नकसान, परबत, बिनास, निरासा, लछमी, लछमन, आसुतोस, नियारी, पियारी, रक्छा, गनेस आदि।
नरेन्द्र कौशिक ‘अमसेनवी’ जी भी ‘छत्तीसगढ़ी का मानकीकरण’ पुस्तक से जुड़े हैं। उनका कहना है कि अर्ध ‘र’ की जगह पूर्ण ‘र’ लिखकर हम ‘प्रदेश’ को ‘परदेश’ बना लेते हैं। हम लोग ‘प्रभाव’ को ‘परभाव’ लिखेंगे तो इसका अर्थ पर का भाव (दूसरे का भाव) हो जाएगा। इसे छत्तीसगढ़ी शब्द का हिन्दी अर्थ निकालना कहा जाएगा। यह सुविज्ञात तथ्य है कि शब्द का केवल एक ही अर्थ हो यह कोई जरूरी नहीं है। एक शब्द के कई अर्थ होते हैं। वहीं छत्तीसगढ़ी में ‘श्रम’ या ‘परिश्रम’ लिखने की जरूरत ही नहीं है। क्योंकि इसके लिए छत्तीसगढ़ी में मिहनत शब्द है। धरम, करम, गरम, मरम, गरभ, सरम, करन, को गलत कहना कहाँ तक उचित है? धर्म, कर्म, गर्म, मर्म, गर्भ, शर्म, कर्ण आदि के आधे ‘र’ को पूर्ण ‘र’ करना कहीं से भी अनुचित नहीं है।





अर्ध ‘र’ कहाँ जरूरी है इसका उदाहरण देखिए- ‘कार्य’ यदि इसे कोई ‘कारय’ लिखता है तो गलत है।
अब हम क्रम, प्रण, प्रकार, प्रभाव, प्रणाम, प्रचार, प्रपंच, प्रबंध, प्रमाण आदि को देखें तो इन शब्दों में प्रथम वर्ण ही आधा है और ‘र’ पूरा है। इसमें प्रथम वर्ण को पूर्ण बनाकर आदिकाल से आजतक छत्तीसगढ़ी में सहजता से बोला जाता है।
यथा- करम, परन, परकार, परभाव, परनाम, परचार, परपंच, परबंध, परमान आदि। यहाँ करम और परभाव जैसे कुछ शब्दों के दो-दो अर्थ बताने होंगे।

ङ, ञ का प्रयोग तो हिन्दी में भी बंद हो चुका है। ऋ का महत्व भी सिर्फ मात्रा लगाने तक सीमित हो गया है। अतः हिन्दी में प्रयुक्त होने वाले सभी वर्णों के छत्तीसगढ़ी में प्रयोग से कोई ऐतराज न होने के बावजूद मतभेद मुख्यतः ष, श, ण, और संयुक्ताक्षर क्ष, त्र, ज्ञ को लेकर होता है। छत्तीसगढ़ी में इन वर्णों का उच्चारण नहीं होता। क्योंकि छत्तीसगढ़ी न तो इनसे शुरू होनेवाले शब्द हैं न ही अन्य किसी शब्द में इनका प्रयोग होता है। इसलिए सभी वर्णों को शामिल करने का मुख्य कारण अन्य भाषा के शब्दों को जस का तस स्वीकारना भर है। दूसरी समस्या है अर्द्ध अक्षरों को किस सीमा तक पूर्ण बनाकर प्रयोग किया जाए। जैसे धर्म- धरम, कर्म- करम ( आधा र को पूर्ण र करके) दोनों का प्रयोग सही है। क्रम- करम, प्रण- परन, प्राण- परान (आधा क और प को पूर्ण करके) यहाँ भी दोनों प्रयोग सही है। अत: अपभ्रंश को गलत मानना हमेशा उचित नहीं है। छत्तीसगढ़ी भाषा पर कई महत्वपूर्ण पुस्तकों के लेखक डॉ. सुधीर शर्मा की टिप्पणी एकदम सही है- “अपभ्रंश शब्द छत्तीसगढ़ी की एक बड़ी विशेषता है।” अपभ्रंश से परहेज करे तो कविता लिखना बंद हो जाए।

“मोर छुटगे ‘परान’
जीव होगे हलाकान
मैं बेटी अटल कुवाँरी
मइके म रहितेंव वो…”

“मोर कतका सुग्घर गाँव
जइसे ‘लछमी’ जी के पाँव।”

-दिनेश चौहान

दिनेश चौहान के छत्तीसगढ़ी आलेख- सेना, युद्ध अउ सान्ति

हमर देस के जम्मू कास्मीर राज के पुलवामा जिला म 42 ले जादा जवान के शहीद होय के बाद पूरा देस म सेना अउ युद्ध के चर्चा छिड़े हे। पूरा देस जानथे के भारत म होने वाला जम्मो आतंकवादी हमला म पाकिस्तान के हाथ हे। पाकिस्तान हमर वो पड़ोसी देस हरे जउन आजादी के पहिली भारत के हिस्सा रिहिस। अंगरेज मन हरदम फूट डाल के राज करिन अउ जावत-जावत देस के दू टुकड़ा कर दिन। ये बँटवारा धरम के नाँव ले के करे गिस। बँटवारा के बाद दुसमनी खतम हो जाना रिहिस फेर अइसन नइ होइस दुसमनी अउ बाढ़ गे। पाकिस्तान के एके उद्देस्य रहि गे हे के भारत ल नीचा देखाना। एखरे सेती वो कभू युद्ध छेड़ देथे तौ कभू समय-कुसमय आतंकवादी घटना करवावत रहिथे।

पुलवामा आतंकवादी घटना म घलो पाकिस्तान के हाथ होना साबित हो गे हे फेर पाकिस्तान वोला माने बर त इयार नइ हे। एखरे सेती हमर वायु सेना एयर अटेक करिस। तब जाके पाकिस्तान के आँखी उघरिस। बाद म दुर्भाग्य ले हमर वायुसेना एक झन वाइस कमाण्डर अभिनंदन वर्धमान ह पाकिस्तानी सेना के कब्जा म आ गे। पाकिस्तान के ये हरकत के दुनियाभर म थू-थू होय लगिस अउ भारत के कूटनीतिक दबाव बनिस तौ अभिनंदन वर्धमान ल ससम्मान वापिस लौटाना परिस। ये बीच म पूरा भारत म युद्ध अउ पाकिस्तान ऊपर हमला के माहौल बन गे। जिहाँ युद्ध के समर्थन म बहुमत दिखिस उहें सान्ति के समर्थक मन घलो चुप नइ बइठिन। सोसल मीडिया म अपन-अपन पक्ष म समर्थन अउ विरोध आजो चालू हे।
भारत अउ पाकिस्तान के बीच चार युद्ध लड़े जा चुके हे । फेर कोनो ये दावा के साथ नइ कहि सकय के युद्ध ले समस्या के निराकरन होइस अउ कोई प्रकार के लाभ होइस। आज फेर ये सोच लेना के युद्ध ले समस्या हल हो जाही कोनो बुद्धिमानी के बात नइ होही। समस्या के हल बातचीत ले ही निकल सकथे। सान्ति प्रक्रिया कोनो सीमित कार्यवाही नइ होय। एखर बर लगातार अउ हमेसा प्रयासरत रेहे ल पड़थे। युद्ध हमेसा अउ लगातार न इ लड़े जा सके। युद्ध ले सान्ति इस्थापित होय के दुनिया म एक भी उदाहरण नइ मिलय। युद्ध के परिणाम तबाही अउ विनास के छोड़ दूसर नइ होय।
बहुत झन सवाल करथे- कोई बार-बार हमर ऊपर हमला करत राहय तौ का तभो हम सान्ति पाठ करत राहन?

एखर जवाब हे-दुसमन के हमला ले बचाव करना अउ युद्ध छेड़ना दूनों अलग-अलग बात हरे। दुसमन ले बचाव अउ बिरोधी सेना के अतलंग हरकत ले बचाव करे बर हथियार तो उठाय्च् ल परही। वोला सबक सिखायेच् बर तो सीमा म सेना तैनात करे जाथे। वो समय दुसमन ल मुँमतोड़ जवाब देय बर सेना ल सरकार के परमीसन लेय के जरूरत नइ राहय। देस म सेना अउ हथियार एखरे सेती जरूरी हे। सेना अउ हथियार के उद्देश्य युद्ध छेड़ना नइ अपन आत्मरक्षा होथे। फेर युद्ध बिना सरकार के परमीसन के नइ छेड़े जा सकय। आतंकवादी अउ घुसपैठी मन ल मारे म कोनो मनाही नइ हे। एखर बर युद्धोन्माद फैलाय के घलो कोई जरूरत नइ हे।
आवव हमन युद्धमुक्त अउ सान्ति ले भरपूर दुनिया बनाय बर आगू बढ़न। हमर देस तो विश्वगुरु हरे। हम तो अहिंसा के बल म आजादी हासिल करके दुनिया म मिसाल कायम करे हन। का अब हम वो रस्ता ल छोड़ दन?
दिनेस चौहान

युवा दिवस 12जनवरी बिसेस

“उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत”
“उठव, जागव अउ लक्ष्य पाय के पहिली झन रुकव”

भारत भुँइया के महान गौरव स्वामी विवेकानंद के आज जनम दिन हरय। स्वामी जी के जनम 12 जनवरी सन् 1863 के कलकत्ता (अब कोलकाता) म होय रिहिस। ऊँखर पिताजी के नाँव बाबु विश्वनाथ दत्त अउ महतारी के नाँव सिरीमती भुवनेश्वरी देवी रिहिस। ऊँखर माता-पितामन ऊँखर नाँव नरेन्द्रनाथ रखे रिहिन। बचपन ले ही नरेन्द्रनाथ धार्मिक सुभाव के रिहिन। धियान लगाके बइठे के संस्कार उनला अपन माताजी ले मिले रिहिस। एक बार नरेंद्र एक ठी खोली म अपन संगवारी मन संग धियान लगाय बइठे रिहिन के अकसमात कहूँ ले वो खोली म करिया नाग आके फन काढ़ के फुसकारे लगिस। ओखर संगी साथी मन डर के मारे उहाँ ले भाग के उँखर माता-पिता ल खभर करिन। उन दउड़त-भागत खोली म पहुँचिन अउ नरेन्द्र ल जोर-जोर से अवाज देके बलाय लगिन। फेर नरेन्द्र ल कहाँ सुनना हे। वोतो धियान म मगन हे ते मगने हे। एती नाग देवता अपन फन ल समेट के धीरे-धीरे कोठी ले बाहिर होगे। ये घटना ले माता-पितामन ल आरो हो गे नरेन्द्र कोनो छोटे-मोटे बालक नोहे अउ भगवान जरूर वोला बहुत बड़े काम बर भेजे हे। ये बात बाद म साबित होइस तेला आज सरी दुनिया जानत हे।

इही नरेन्द्रनाथ अपन गुरू स्वामी रामकृष्ण परमहंस के चेला बने के बाद स्वामी विवेकानंद के नाँव ले दुनियाभर म प्रसिद्ध होइन। स्वामी विवेकानंद आज ले लगभग डेढ़ सौ साल पहिली होइन फेर ऊँखर विचार ल जान के आज के पीढ़ी ल अचरज हो सकथे के ऊँच-नीच, जात-पाँत, दलित-सवर्ण के जेन झगरा आज देस के बड़े समस्या के रूप धर ले हवय तेखर विरोध उन वो समय म करिन जब समाज म एखर कट्टरता ले पालन करे जाय अउ एखर विरोध करना कोनो हँसी-ठठ्ठा नइ रिहिस। वो समय म उन नारी जागरन, नारी सिक्छा अउ दलित शोषित मनखे बर आवाज उठइन तेन बड़ जीवट के काम रिहिस। नरेन्द्र बचपन ले ही मेधावी, साहसी, दयालु अउ धार्मिक सुभाव के रिहिन। उन रामकृष्ण परमहंस ल गुरू बनाइन फेर ठोक-बजा लिन तब बनइन। हमर छत्तीसगढ़ म एक ठी कहावत हे-“गुरू बनाए जान के पानी पीयय छान के”। इही नरेन्द्रनाथ रामकृष्ण परमहंस के महाप्रयान के बाद संन्यास धारन करके स्वामी विवेकानंद कहाइन।

अब वो समय आइस जब दुनियाभर म स्वामी विवेकानंद के नाँव के डंका बजना रिहिस। वो समय रिहिस 11 सितंबर 1893, अमरीका के शिकागो सहर म विश्व धर्म महासभा के आयोजन। जेमा स्वामी जी बड़ मुस्किल ले सामिल हो पाइन। अउ जब ऊँखर बोले के पारी आइस तौ अपन गुरुजी के याद करके बोलना सुरू करिन- “अमरीका निवासी बहिनी अउ भाई हो…” बस्स् अतके बोले के बाद धर्म सभा के जम्मो देखइया सुनइया दंग होके खुसी के मारे ताली बजाय लगिन। हरदम “लेडीज़ एंड जेन्टलमैन” सुनइया मन कभू सपना म नइ सोंचे रिहिन के कोनो वक्ता अइसे घलो हो सकथे जेन उनला बहिनी अउ भाई बोल के सम्मान देही। बाद म अपन भासन म हिन्दू घरम के अइसे ब्याख्या करिन के अमरीकावासी मन सुनते रहि गे। धरम के अतका सुंदर ब्याख्या ओखर पहिली कोनो नइ कर पाय रिहिन। बिहान दिन अमरीका अउ दुनियाभर भर के अखबार स्वामी जी के तारीफ म भर गे राहय।
30 साल के उमर म स्वामी जी हिंदू धरम के झंडा फहराय बर अमरीका अउ यूरोप सहित दुनियाभर भर म घूमिन अउ अपन जीवन के ये पाँच-छे साल म जिहाँ भी गीन उहाँ हिंदू धरम के झंडा गड़ा के ये साबित करिन विश्वगुरु होय के योग्यता यदि कोनो धरम हे तो वो हे हिंदू धरम।
स्वदेस वापिस आके उन जघा-जघा रामकृष्ण मिशन के स्थापना करिन। कुछ दिन बाद उनला आभास होगे के आगे के काम बर ये सरीर के कोई जरूरत नइ रहि गे। अब ये सरीर तियागे समय आ गे हे। स्वामी विवेकानंद 4 जुलाई 1902 महासमाधि धारन करके अपन भौतिक सरीर के तियाग कर दिन अउ मात्र साढ़े 39 बरस म कतको महान कारज करके ये साबित कर दिन के जीवन बड़े होना चाही लंबा नहीं।

सन् 1984 म भारत सरकार दुवारा स्वामी विवेकानंद के जनमदिन ल युवा दिवस के रूप म मनाय के घोसना होय रिहिस। तब से हर साल 12 जनवरी ल युवा दिवस के रूप म मनाय जाथे। ऊँखर देय मूलमंत्र-“उठव, जागव अउ लक्ष्य पाय के पहिली झन रुकव” हमेसा युवा मन बर अटूट प्रेरणास्रोत रइही।

दिनेस चौहान,
छत्तीसगढ़ी ठिहा,
सितलापारा, नवापारा-राजिम

निर्वाचन आयोग ल छुट्टी खातिर आवेदन पत्र

सेवा में,
सिरीमान मुखिया निर्वाचन आयुक्त
महोदय,
भारत निर्वाचन आयोग, नई दिल्ली।
बिसय : विधानसभा चुनाव मतगणना के दिन
सार्वजनिक छुट्टी घोसित करे बाबत।
महोदय जी,
बिनती हवय के आपके आयोग ह मतदान के दिन सार्वजनिक छुट्टी के घोसना करथे। इही किसम ले मतगणना के दिन घलो सार्वजनिक छुट्टी के घोसना होना चाही। काबर के मतदान म तो एक मनखे ल जादा ले जादा आधच घंटा लगथे फेर मतगणना पूरा दिनभर के कार्यक्रम होथे।
लोकतंत्र म चुनाव ले बड़े अउ कोनो महापरब नइ होवय। मतगणना के दिन ये महापरब के दिन पूरनाहूती होथे। ये सोंचना के ए दिन लोगन अपन काम करत-करत मतगणना के आनंद ले सकथे उचित नइ लगय।
तेपाय के हांत जोड़ के बिनती हवय के मतगणना के दिन घलो एक दिन के सार्वजनिक छुट्टी के घोसना करे जाय।
घन्नबाद!
दिनांक : 04-12-2018
गेलौली करइया
दिनेस चौहान,
छत्तीसगढ़ी ठिहा, सितलापारा,
नवापारा-राजिम,
जिला- रइपुर (छत्तीसगढ़)

अपने घर म बिरान हिंदी महिना

हमर देस म आजकल हिंदू अउ हिंदू संस्कृति के अब्बड़ चिंता करे जावत हे। साहित्यकार अउ संस्कृति करमी मन नंदावत रीत-रिवाज अउ परंपरा के संसो म दुबरात जावत हे। फेर एक ठन बिसय अइसे हे जेकर डाहन काखरो धियान नइ गे हे तइसे लगथे। वो बिसय हे हिंदी महिना अउ तिथी। हिंदी महिना के ज्ञान प्रायमरी कक्छा म देय के औपचारिकता के बाद कोनो मनखे ल हिन्दी महिना अउ तिथी के चिंता करे के सुध नइ राहय। आज कोनो भी अच्छा पढ़े-लिखे आदमी ल हिंदी महिना अउ तिथी बताय ल कबे तो वो हड़बड़ा जही।
हिंदी महिना अउ तिथी के उपयोगिता सिरिफ बिहाव कारड भर म रहि गे हे। इहाँ तक के छट्ठी अउ सोक पत्र अउ कतको आमंत्रण-निमंत्रण पत्र म घलो कोनो भुला के हिंदी महिना अउ तिथी के उल्लेख नइ करना चाहंय। धन तो हमर जम्मो परब तिहार हिंदी महिना अउ तिथी के मुताबिक परथे नइ ते हिंदी महिना अउ तिथी के का दसा होतिस ये कल्पना ले बाहिर हे।




संसोच के बात हरय के हमला अंगरेजी महिना अउ तारिक तो मुअखरा याद रथे फेर हिंदी महिना अउ तिथि बताय बर हम मुहूँ फार देथन। मोर महतारी बारो महिना अकादसी उपास रइथे। अकादसी कोन दिन परही तेन सवाल के मोर करा कोनो जवाब नइ राहय। वो डाहर हम बिस्वगुरू होय के डंका पीटत हन। जेला अपन महिना अउ तिथी के ज्ञान तको नइ हे। आज ये सोंचे के बिसय हरे हिंदी महिना ये दसा म काबर परे हे। यदि ये केहे जाय के ज्ञान उपर पहरा बइठाय के जेन परंपरा आदिकाल ले हमर देस म चले आवत हे तेने ह देस के पिछड़ापन बर सबले जादा जिम्मेदार हे। आजो हिंदी महिना अउ तिथी ह सिरिफ पंडित अउ पुजारी मन के बिसय बने हे एकर पीछू इही कारन आय।
ये हिंदी महिना के दुखभरे कहिनी आय। हिंदी महिना ल चंद्रमास केहे जाथे। काबर के एकर महिना के तिथी चंद्रकला के मुताबिक तय होथे। ये हिसाब ले हिन्दी महिना २८, २९, ३० नइते ३१ दिन के हो सकथे। औसत देखे जाय तौ चंद्रमास के एक बछर ३५५ दिन के होथे। इही पाय के हर तीन बछर म एक महिना बढ़ाय के परंपरा हे। ये महिना ल लउंद महिना, मलमास या अधिमास घलो केहे जाथे। एमा कोनो एक महिना ल ज्योतिसी गिनती के मुताबिक बढ़ाय जाथे। अइसन साल म एक बछर म तेरा महिना होथे। एक महिना ह अंधियारी अउ अंजोरी दू पाख म बंटे रइथे। अधिमास वाले बछर म पहिली महिना के अंजोरी पाख अउ दूसर महिना के अंधियारी पाख ल मिला के परसोत्तम महिना केहे जाथे। हिंदू धरम म परसोत्तम महिना के बड़ महत्तम बताय गे हे।




हर पाख म परवा ले लेके चउदस तक तिथी होथे। अंधियारी पाख के आखरी तिथी ल अम्मावस अउ अंजोरी पाख के आखरी तिथी ल पुन्नी केहे जाथे। तिथी मन के नांव हे परवा(एक्कम), दुइज, तीज, चउथ, पंचमी, छठ, सातें, आठें, नवमी, दसमी, अकादसी, दुवास, तेरस, चउदस अउ आखरी तिथी अम्मावस या पुन्नी। दू पाख मिला के एक महिना होथे। महिना मन के नांव हे- चइत, बइसाख, जेठ, असाढ़, सावन, भादो, कुवाँर, कातिक, अग्घन, पूस, मांघ अउ फागुन।
अब हात उठावव कोन अइसे मनखे हवय जेन अपन जनम दिन या बिहाव दिन ल हिंदी महिना अउ तिथी के मुताबिक मनाथे? का एकर बर कोनो आगू आय बर तियार हे के जनमदिन अउ बिहाव दिन हिंदी महिना के मुताबिक मनना चाही? “गर्व से कहो हम हिंदू हैं” चिल्लाय भर ले कुछू नइ होवय। अरे, हमर ले गरबवान तो आदिवासी अउ बनवासी मन हरंय जेकर मन के नांव जम्मो हिंदी महिना अउ तिथी उपर धराय मिल जथे।
ये हिंदी महिना अउ तिथी के गोहार आय जेकर उपर धियान नइ देय ले अउ बांकी जिनिस असन इहू नंदा जाही। एमा कोनो संखा के बात नइ हे।
जै जोहार!
जै छत्तीसगढ़!!

दिनेस चौहान
छत्तीसगढ़ी ठीहा,
सितलापारा,
नवापारा-राजिम।

भगवान संग नता-रिस्ता- छत्तीसगढ़ के खास पहिचान आय

हर जघा, देस, प्रदेस अउ छेत्र के कोई न कोई खास पहिचान होथे। हमर प्रदेस छत्तीसगढ़ के घलो अइसे कई ठी पहिचान हे। जेमा छत्तीसगढ़ के मंदाकनी महानदी , छत्तीसगढ़ के प्रयाग राजिम, छत्तीसगढ़ के संस्कृति, छत्तीसगढ़ के परंपरा अउ रीति-रिवाज, छत्तीसगढ़ के मान्यता, छत्तीसगढ़ के तिरिथ-धाम जइसे जुन्ना पहिचान के नांव गिनाय जा सकथे तो छत्तीसगढ़ के एक नवा पहिचान राजिम कुंभ मेला ल माने जा सकथे।
जिहाँ तक मानता के बात हे छत्तीसगढ़ मानता के मामला म घलो बहुत बड़हर हे। एक ठी प्रसिद्ध मानता हे के छत्तीसगढ़ भगवान राम के ममियारो हरे। भगवान राम छत्तीसगढ़ के भांचा आय। महतारी कौसिल्या के मइके छत्तीसगढ़ के चंदखुरी गाँव हरे। इही दुनिया के एकमात्र अइसे जघा हे जिहाँ माता कौसिल्या के मंदिर हे। भाँचा के पूजा के मानता दुनिया तो का हमरे देस भारत म अउ कोनो जघा नइ मिलय। हर छत्तीसगढ़िया अपन भांचा म भगवान राम के रूप देखथे। तेखरे सेती ‘भाँचा से पाँव परवाना माने पाप के भागी बनना’ अइसे मानता छत्तीसगढ़ म मिलथे। “पाँ परत हौं भाँचा” अइसे मधुरस कस मीठ भाखा छत्तीसगढ़ छोड़के अउ कहूँ सुने बर नइ मिल सकय।



छत्तीसगढ़ म भाँचा के एके ठी किस्सा नइ हे। एक किस्सा अउ मानता छत्तीसगढ़ म अउ पाय जाथे वो हरे के ममा-भाँचा ल एक डोंगा म संघरा नदिया-नरवा पार नइ करना चाही। इही मानता के सेती गाड़ी-घोड़ा म घलो ममा-भाँचा के संघरा यात्रा करे बर मनाही जुन्ना सियान मन करथंय।
ममा-भाँचा के रिस्ता उपर एक सुंदर किस्सा कमल क्षेत्र पद्मावती पुरी राजिम छेत्र म अक्सर सुनाय जाथे। राजिम त्रिवेणी संगम म भगवान कुलेसर महादेव के प्राचीन मंदिर इस्थापित हे। जेला भगवान राजिम लोचन मंदिर के समकालीन नवमी सताब्दी म निरमित माने जाथे। पुरान के मुताबिक कुलेसर महादेव भगवान राम के कुलदेवता आय। बनवास काल म राम-सीता, लछमन ये मार्ग ले नाहके रिहिन। चित्रोत्पला पार करे के पहिली माता सीता ल कुल देवता के पूजा करे इच्छा होइस। फेर दूर-दूर तक महादेव के कोई मंदिर नइ दिखिस तौ माता सीता नदिया के रेती से महादेव के मुरती बना के पूजा करे रिहिन। अतेक जुन्ना हे एकर इतिहास अउ एकरे सेती कुलेसर महादेव के महिमा कोनो ज्योतिर्लिंग ले कम नइ माने जाय।
कुलेसर महादेव ल भाँचा महादेव माने जाथे। काबर के एकर इस्थापना म जगत भाँचा भगवान राम के हाथ घलो सामिल रिहिस हे। कुलेसर महादेव तीन नदिया महानदी, पैरी अउ सोंढ़ू नदी के संगम म बिराजित हे। पहिली समय म हर बछर तीनों नदिया म पूरा आवय। अइसे मानता हे के कुलेसर मंदिर पूरा म बूड़े लगय तौ भाँचा कुलेसर हांक पारय “ममा बचाव, बूड़त हौ! ममा बचाव, बूड़त हौं” ये हांक ल सुन के ममा महादेव कहिथे-“नइ बूड़स भाँचा” तहान नदिया मन ल आदेस देथे अउ पूरा ओसके लगथे। ममा महादेव कुलेसर मंदिर अउ राजिम लोचन मंदिर के रस्ता म नंदिया के खंड़ म इस्थापित हे। इही मंदिर ल इसथानी निवासी मन ममा-भाँचा मंदिर कहि देथे। मानता हे के संगम के पूरा ह ममा मंदिर के इस्पर्स करे बाद ओसकना सुरू हो जाथे। ममा-भाँचा के संघरा यातरा के मनाही के पीछू इही मानता हे के एक झन उपर संकट आ परिस तौ दूसरा एकझन रक्षा करइया मौजूद होना चाही।
जइसे भगवान के महिमा होथे वइसने भक्त के घलो महिमा होथे। ये भक्त मन के महिमा हरे के वो भगवान के मानवीकरन करके ओखरो संग नता-रिस्ता जोड़ लेथे। भगवान भगत के बस म होथे तेन लबारी नो हे। भक्त अउ भगवान के ये मानता छत्तीसगढ़ के एक खास पहिचान आय। बोलो भक्त अउ भगवान की जय! कुलेसर महादेव की जय! राजिम लोचन कुंभ की जय!

दिनेस चौहान, छत्तीसगढ़ी ठीहा, सितलापारा, नवापारा-राजिम, जिला-रायपुर, छ.ग.
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भारतीय संविधान अउ महतारी भाखा

गणतंत्र दिवस के तिहार हमर पूरा देस म हमर देस के स्वतंत्र संविधान लागू करे खुसी म हर बछर 26 जनवरी के दिन मनाय जाथे। संविधान के मतलब होथे देस म सासन चलाय के नियम-कानून। हमर देस के कानून अउ सासन बेवस्था हमर संविधान म दर्ज धारा, अनुच्छेद अउ अनुसूची के मुताबिक चलथे।
जब संविधान लागू हो चुके हे तौ वोमा लिखाय हर बात के पालन घलो होना चाही। आपमन ल ये जान के ताज्जुब होही के संविधान के अनुच्छेद 350 (क) म लिखाय बात के पालन हमर छत्तीसगढ़ राज म नइ होवत हे। संविधान के अनुच्छेद 350 (क) म मातृभाषा के संबंध म उल्लेख हे। जेखर मुताबिक प्राथमिक सिक्छा के माध्यम महतारी भाखा होना चाही। आप सब झन ल मालूम हे हमर महतारी भाखा छत्तीसगढ़ी आय। का हमर प्रायमरी इसकुल म महतारी भाखा माध्यम म पढ़ई-लिखई होथे? एखर जवाब सब ल मालूम हे।
हमर सरकार छत्तीसगढ़ी ल राजभासा घोसित कर चुके हे। फेर बड़ दुख के बात हे के हमर राज के निवासिच मन ल ये बात के पता नइ हे। छत्तीसगढ़ी भासा सिरिफ आपस म बोलेच-बताय तक सीमित हे। छत्तीसगढ़ी ह न राजकाज के भासा बने हे न कामकाज के। जम्मो डाहर हिन्दी अउ अंगरेजी के राज हे। इहां तक के इसकुल तक म एकर एक स्वतंत्र भासा के रूप म कोई पहिचान नइ हे। छत्तीसगढ़ी ल कोनो भासा माने बर त इयार नइ हे। अभी घलो एकर पहिचान एक बोली के रूप म होवत हे।
का गणतंत्र दिवस के दिन संविधान के अनुच्छेद म लिखाय बात के पालन के मांग नइ होना चाही? महतारी भाखा ल प्राथमिक सिक्छा के माध्यम बनाया जाय। इसकूली सिक्छा म छत्तीसगढ़ी ल स्वतंत्र अउ अनिवार्य बिसय बनाया जाय। छत्तीसगढ़ी ल हिन्दी संग संघेर के पढ़ाना बंद होय। यदि अइसन नइ हो सकय तौ संविधान म संसोधन कर के अनुच्छेद 350 (क) ल काबर नइ हटा देना चाही? ओखर का जरूरत हे?
महतारी भाखा मयारुक मन ल हर रास्ट्रीय परब म ए बात के चिंतन करना चाही के हमर महतारी भाखा छत्तीसगढ़ी ल काबर वोखर वाजिब मान-सम्मान अउ हक नइ मिलत हे जेखर वो हकदार हे। रास्ट्रकवि मैथलीशरण गुप्त ह सिरतोन केहे हे-

“निजभासा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिन निजभासा ज्ञान के मिटत न हिय के सूल।

दिनेस चौहान,
छत्तीसगढ़ी ठीहा,
सितला पारा, नवापारा-राजिम।
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पीरा ल कइसे बतावंव

आजकल फेसबुक, वाट्सअप अउ दुनियाभर के सोसल मीडिया म एक ठी नवा चलागन चले हे। आइ ए एस परीक्षा म पूछे गे सवाल- सही उत्तर बताय म 99% फैल। कुछ भी अंते-तंते सवाल रथे बिगन मुड़ी पुछी के। तभो ले मोबाइल के दीवाना मन दिन-रात उही म भिड़े रइथे।
फेर मैं जेन सवाल ल पूछत हौं तेकर जवाब देय बर सेंट परसेंट फैल हो जही। सवाल हे- “अइसन कोन सा काम हवय जेला मास्टर मन नइ कर सकय?” उत्तर बताने वाला म सेंट परसेंट के फैल होना पक्का। ए तीर मास्टर कोन हरे तेन ल जान लेना जरूरी हे। मास्टर माने गुरूजी।
“गुरूजी?”
बड़ बकवाय हे। अब गुरूजी के मायने घलो बताय ल परही बुजा के ल। अरे भई हमर जमाना म इसकुल म पढ़ाने वाला मास्टर ल गुरूजी काहन। गुरूजी मरगे उठा खटिया घलो काहन। अउ असल म गुरूजी के खटिया रेगाने वाला हरे छत्तीसगढ़ के पहिलाँवत मुखिया मंत्री। उँखरे करनी आय के गुरूजी अउ बहिनजी के खटिया रेंगाय बर सर-मैडम मन के इसकुल म तैनाती हो गे। खैर ये आने बात हो गे। हमर सवाल रिहिस अइसे कोन सा काम हे जेला मास्टर मन नइ कर सकय? काम ल खोजे के अउ सुरता करे के जरूरत नइ हे। काबर के काम के नाम लेहू तौ फैल होना पक्का हे। एकर जवाब हे- “अइसे कोई काम नइ हे जेला मास्टर न कर सकय।” याने मास्टर हर काम कर सकथे। चुनाव, जनगणना, पालतू अउ जंगली पसु गनना, मतदाता सूची, पोलियो ड्राप, कुकुर मन के नसबंदी, दारू बेचई खुले म सौच के चौकीदारी। अउ जेन भी काम कहि लौ सब करे बर मास्टर नहीं नइ काहय। अउ नहीं कहि दिस तौ फेर वो मास्टर नो हे। अउ ये सब करे के बाद म उपराहा म लइका मन के पढ़ई-लिखई, परीक्षा लेवई अउ बिगन फैल करे सब्बो झन ल पास करई।




अब हाई कोर्ट अउ सुप्रीम कोर्ट काहत राहय न मास्टर मन से गैर सिक्छकीय काम नइ लेना हे। कहि दिस। कोर्ट देखे बर थोरे आही के सरकार ओखर ले का का काम लेवत हे। वइसे तो हर डिपाट के करमचारी सरकार के नौकर होथे। फेर सरी काम ल सरकार मासटरेच मन ल काबर संउपथे? काबर के वो जानथे के मास्टर सब मन ले गरुवा होथे। कोनो काम बर आनाकानी नइ करय। अब तुही मन बतावव- “पढ़इया लइका मन के जाति, निवास अउ आय प्रमाण पत्र बनवाना, बैंक खाता खोलवाना, आधार कारड बनवाना; पटवारी, कोतवाल, पंच-सरपंच, तहसीली, लोक सेवा केन्द्र अउ बैंक के चक्कर लगाना का मास्टर मन के काम आय?”
इही पीरा धरे हे आजकल मास्टर-मास्टरिन मन ल। अउ काम मन तो कभू कभार अउ सीजन म आ के चल देथे। फेर जाति-निवास अउ आय-बकवाय (बैंक खाता) ह साल भर चलने वाला अउ हर साल के पीरा आय। कतका लक्छ हे , ये हप्ता कतका बनिस, कतका बांचे हे। कहाँ पेंडिंग हे, पेंडिंग हे ते काबर पेंडिंग हे? एकर हर हप्ता जानकारी दे। न इ ते तोर गर म कारवाही के तलवार गिरनेच वाला हे।
सरकार ह इस्थाई जाति प्रमाणपत्र के टारगेट पूरा करवाय बर मास्टर मन के इस्थाई पीरा के बेवस्था कर दे हे। अउ एती दुनिया ह मास्टर मन ल बदनाम करथे के मास्टर मन पढ़ाय-लिखाय नहीं। काहत राहव। अब मास्टर अपन पीरा ल कइसे बतावय?
तुही मन बतावव भइया!

दिनेस चौहान
छत्तीसगढ़ी ठीहा, सितला पारा,
नवापारा-राजिम।
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दिनेश चौहान के गोहार : महतारी भाखा कुरबानी मांगत हे

हमन छत्तीसगढ़़ के रहइया हरन। छत्तीसगढ़िया कहाथन। वइसे हमर प्रदेस म कई ठी बोली बोले जाथे। छत्तीसगढ़ी, हलबी, भतरी, कुडुख, सरगुजिहा, सदरी, गोंड़ी आदि आदि। फेर छत्तीसगढ़ी बोलने वाला जादा हवंय। जब छत्तीसगढ़़ के भासा के बात आथे तौ छत्तीसगढ़ी के नांव ही आगू आथे। इही पाय के छत्तीसगढ़ी ल छत्तीसगढ़़ के राजभासा बनाय गे हे। अब ए तीर एक ठी सवाल उठथे, ये बात ल जानथे कतका झन?
मोर आप मन से इही सवाल हे के आज ले पहिली ये बात ल कतका झन जानत रेहेव?
सरकार छत्तीसगढ़ी ल इहाँ के राजभासा घोषित कर चुके हे।
सरकार ह छत्तीसगढ़ी राजभासा आयोग घलो बना चुके हे।
सरकार छत्तीसगढ़ी के 20℅ पाठ ल हिन्दी संग मिला के पढ़ाय के बेवस्था घलो करे हे।
सरकार के ये काम से जेन मन संतुष्ट हवंय तेकर मन से मोला कुछ नइ कहना हे। फेर मोला सरकार से सिकायत हे।
आज इसकुली लइका मन ल इसकुल म पढाय जाने वाला भासा के बारे म पूछबे तौ जवाब मिलथे 1हिन्दी भासा, 2अंगरेजी भासा अउ 3 संस्कृत भासा। छत्तीसगढ़ी भासा के नांव काबर नइ आय?



अउ जब छत्तीसगढ़ी भासा के नांव न इ आय तब वो ह काय के राजभासा हरे?
का राजभासा अइसने होथे जेकर इसकुल म एक भासा के रूप म तको कोई पहिचान नइ हे? अउ सरकार अपन पीठ ठोंकत हे-‘हमने छत्तीसगढ़ी को राजभाषा बनाया’। का एमा खुस होय के बात दिखथे?
आगू बढ़न! छत्तीसगढ़ी के बात सुरू करेस तहान छत्तीसगढ़ी उपर बिदवान मन के बड़े-बड़े सुझाव, उपाय अउ छत्तीसगढ़ी भासा के बढ़चढ़ के गुनगान के सिलसिला सुरू हो जथे।
छत्तीसगढ़ी म सरकारी कामकाज सुरू होना चाही।
छत्तीसगढ़ी ल संविधान के आठवां अनुसूची म सामिल करे जाय।
प्रायमरी सिक्छा के माध्यम छत्तीसगढ़ी करे जाय।
ये सब बहुत बड़े-बड़े बात आय। अइसन कुछ नइ होने वाला हे।
मैं बहुत छोटे से बात करथंव। जउन 20℅ पाठ ल हिन्दी संग मिला के पढ़ाय जावत हे वोला अलग करके स्वतंत्र अनिवार्य बिसय बना दे जाय। मोर दावा हे एमा हर्रा लगय न फिटकिरी अउ रंग चोखा। कइसे? मैं बतावत हौं-
अभी सरकार दुवारा मिडिल से लेके हाई हायर सेकेंडरी तक बर जारी टाइम टेबल के मुताबिक सात पिरेड बनाय गे हे। छै पिरेड म छै बिसय के पढ़ाई होथे। सातवां पिरेड देखायच बर भर बने रइथे। यदि छत्तीसगढ़ी ल एक अलग अनिवार्य बिसय बना दे जाय तौ ये सातवां पिरेड बनाय के औचित्य घलो दिखे लग जही।
मैं जानत हौं मोर ये बात म मास्टर मन मोर पीछू म डंडा धर के कुदाही। काबर के एखर से काम के बोझ तो निसचित रूप में थोड़ा सा बढ़ जही।
फेर मैं महतारी भाखा खातिर अइसन मार-गारी ल सहे बर तइयार हौं। मोर सिक्छक साथी मन से बिनती हवय उन घलो महतारी भाखा के मान सम्मान खातिर अतका कुरबानी देय बर आगू आवंय। धन्यवाद!

जै जोहार! जै छत्तीसगढ़़!!
जै छत्तीसगढ़ी!!

दिनेश चौहान
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