Tag: Gajanan prasad dewangan

पांच बछरिया गनपति

राजधानी म पइठ के ,
परभावली म बइठ के ।
हमर बर मया बरसाथे ,
हमींच ला अइंठ के ।
रिद्धी सिद्धी पाके ,
मातगे जोगी जति ।
ठेमना गिजगिजहा ,
पांच बछरिया गनपति ।

बड़का बुढ़हा तरिया के ,
करिया भुरवा बेंगवा ।
अनखाहा टरटरहा ,
देखाये सबला ठेंगवा ।
पुरखौती गद्दी म खुसरे खुसरे ,
बना लिन अपन गति ।
अपनेच अपन बर फुरमानुक ,
पांच बछरिया गनपति ।

लोट के , पोट के ,
भोग लगाये वोट के ।
न करम के , न धरम के ,
परवाह निये चोट के ।
मेहला घर धनिया के ,
छिनार घला अबड़ सति ।
जै हो , तुहंरेच जै हो ,
पांच बछरिया गनपति ।

तोर गुन ला जऊन गाही ,
ओहा सोज्झे नरक मा जाही ।
अइसन तोर महिमा हाबे ,
बिगन चऊंर चाबे पुजाही ।
घूस ले के गुलाम बना ले ,
परजातंत्र के खुरसीपति ।
फेर ये मउका नइ मिले जी ,
पांच बछरिया गनपति ।

गजानंद प्रसाद देवांगन
छुरा

कहानी : बड़का तिहार

गुरूजी पूछथे – कते तिहार सबले बड़का आय ? समझ के हिसाब से कन्हो देवारी, दसरहा अऊ होली, ईद, क्रिसमस, त कन्हो परकास परब ला बड़का बतइन। गुरूजी पूछथे – येकर अलावा ……? लइका मन नंगत सोंचीन अऊ किथे – पनदरा अगस्त अऊ छब्बीस जनवरी। कालू हा पीछू म कलेचुप बइठे रहय। गुरूजी पूछथे – तैं कुछु नी जानस रे ? ओला तिर म बलइस। कालू हा अपन चैनस के आगू कोती ला, पेंठ म खोंचे रहय, पीछू कोती, चैनस हा पेंठ ले बाहिर रहय। ओकर बिचित्र पहिनावा देख, लइका ते लइका, गुरूजी तको हाँस डरीस। तीर म बलइस अऊ पूछीस – तोर नजर म, कते तिहार बड़का आय। कालू किथे – जे तिहार म सबले जादा खुसी मिलथे तिही तिहार, सबले बड़का आय गुरूजी ….। गुरूजी किथे – खुसी तो सबे तिहार म मिलथे। कालू किथे – निही गुरूजी, हमर घर दू दिन चार दिन के आड़ म, तिहार आथे, उही दिन हमन, अबड़ खुस रहिथन। गुरूजी किथे – तोर बर इसपेसल कलेनडर बने हे रे ….., तेमा तोर घर दू दिन चार दिन म तिहार आ जथे….? कुछ भी बोलत रहिथस ……कहत सटाक ले गाल ला मारीस गुरूजी हा …..। लइका सिहरगे एके चटकन म। लइका ला, जोर से फटकारत, ओकर चैनस ला बने करे बर किहीस गुरूजी हा। कालू कुलेचाप खड़े रहय। गुरूजी ओकर बोड्डी ला धर के ईंचीस, एक रहापट फेर लगइस अऊ आगू कोती पेंठ म खोंचाये चैनस ला, बाहिर निकालिस। चैनस जइसे बाहिर अइस त गुरूजी देखथे के, चैनस के खोंचाये भाग हा चिरहा रहय। तुरते ओला खोंच दीस अऊ पीछू कोती जाके पेंट ले बाहिर निकले चैनस ला पेंठ म, खोंचे बर धरीस। गुरूजी देख पारीस, पीछू कोती ले चिराये पेंठ ला। बिचित्तर पहिनावा के कारन समझगे गुरूजी, ओकर आंखी डबडबागे।
देवारी तिहार के छुट्टी लगगे। गुरूजी अपन गांव नी गिस। कालू के घर जाके ऊंकर हालचाल पता करीस। कालू के ददा रामू बनिहार रिहीस। मेहनती जरूर रिहीस फेर, जतका कमातीस तेकर ले जादा मंद मउहा म उड़ा देतीस। दई के कमई म घर चलय। सांझकुन होतीस तहन रामू मरत ले पी के आतीस, झगरा मतातीस, कभू कालू के दई ला चुंदी हपाट के लाते लात मारतीस, कभू लइका मन ला……..। जे दिन रामू ला बूता नी मिलय अऊ जे दिन हाथ म पइसा नी आवय, ओ दिन ओकर तीर म कन्हो मंदुहा संगवारी मन नी ओधय, उही दिन ओला पिये बर नी मिलय। जे दिन नी दिन पियय, उही दिन, ओकर घर म सुख सानती रहय। उही खुसी ला कालू अऊ ओकर भई बहिनी मन तिहार समझय।
गुरूजी रामू ला सुधारे बर सनकलप ले डरीस। रामू ला अपन घर म, देवारी के साफ सफई बूता म बलइस। संझा होय तहन, रामू पइसा झोंके के अगोरा करय। गुरूजी दूसर दिन देहूं कहिके, टरका देवय। बूता सिरागे, पांच छै दिन नहाकगे, गुरूजी हा, रामू ला एको पइसा नी दीस, उलटा ओकर संग बकबात करे लागीस। रामू हा, गुरूजी के बड़ इज्जत करय, फेर गुरूजी हा, ओला पी डरे हे कहिके फटकार झिन दे सोंचके , कहींच नी कहि सकिस। दूसर दिन, संझाती संझाती पिये के चुलुक म संगवारी मिलगे, बिन पइसा के कन्हो संगवारी मन, मंद ला सुंघन तको नी दीस। एक पइत फेर, पइसा मांगे बर गुरूजी घर चल दीस। गुरूजी हा रामू ला, काये के पइसा कहिके, सवाल खड़ा कर दीस। रामू के मुहूं ले अंड संड गारी बखाना निकले बर धर लीस, गांव के कतको मनखे जुरियागे। गुरूजी के बहुतेच अपमान करीस रामू हा, फेर गुरूजी झगरा नी करीस। रामू उप्पर कन्हो बिसवास नी करीन। दबे जबान कुछ बिघ्नसनतोसी मन, गुरूजी उप्पर अनगुरी उचइन। अइसन मन के सह पाके, जे दिन पीहूं ते दिन बताहूं गुरूजी, तोर मजा ला, कहत, रामू मन मारके चल दीस……।
गुरूजी बईमान निकल जही, रामू सोंचे नी रिहीस । आवत आवत, मने मन गुनत रहय, गुरूजी सहींच म, ओकर पइसा ला नी दिही तब ? पंचइत सकेलहू त, मोला अऊ मोर बात ला, दरूवा मंदुहा हरस कहिके, फांक दिही, गुरूजी के गलती कन्हो ला नी दिखही। मन म उथल पुथल चलत रहय। मे नी पियत रहितेंव त, मोर संग, अतेक बड़ धोका नी होतीस। मने मन परन कर डरीस के, आज ले पियई बंद…….।
घर म निगतेच साठ, लइकामन संग, घर के साफ सफई म, पहिली बेर अपन हाथ बंटइस रामू हा। अपन बई अऊ लइकामन संग हाँस हाँस के, परेम से गोठियाये लागीस। दसना म सुते सुते रामू, घर म दिखत परिवरतन ला, सोंचत रहय। लइकामन बिगन केहे, हाथ गोड़ चपक दीस। माथा म अरसी तेल के मालिस म, कतका बेर नींद परगे, नी जानिस। चहा पीके बिहिनिया ले, बूता म निकलगे धनतेरस के दिन। कतको बूता मिलगे। पइसा हाथ म अइस जरूर, फेर संझाती के चुलुक धरके……। हाथ के पइसा हा, दारू नी पिये के परन ला, बिसार दीस। गुरूजी ले बदला ले के, आज मउका मिलगे कहिके, दारू के दुकान कोती, गोड़ उसलगे रामू के। बीते अठोरिया भर, ओला नी पुछइया संगवारी मन, ओकर तीर पइसा जानके, मोहलो मोहलो करे लगीस। रसदा म कपड़ा दुकान ले कालू ला, नावा कपड़ा धर के, लकर धकर निकल के, दऊंड़त देख पारीस। दऊंड़त कालू, अपन ददा संग झपागे। कालू दुकान ले, कपड़ा चोराके भागत होही सोंचके, ओकर गाल म सटाक ले, एक चटकन झड़िस रामू हा। चुंदी हपाटके लात जमातीस तइसना म, गुरूजी ला उही दुकान ले हाँसत निकलत देख पारीस। ओकर एड़ी के रिस तरवा म चइघगे। गुरूजी ला कुछ कहितीस तेकर पहिली गुरूजी पूछीस के, कालू ला काबर फोकटे फोकट मारत हस ? मउका मिलगे रामू ला, वो किथे – हमन गरीब मनखे भलुक आवन गुरूजी, फेर तोर कस बईमान नोहन …..। मोर लइका हा कपड़ा चोराके लेगत हे, त ओला मारहूं निही ते का ओकर पूजा करहूं ….? गुरूजी किथे – में भलुक बइमान हो सकत हंव फेर अपन लइका ला, चोर कहि के झिन सजा दे। अपन मेहनत के पइसा ले बिसा के लानत हे बपरा हा। तोर कस, अपन मेहनत के पइसा ला, दारू म नी बोहावत हे। रामू के आंखी फटे रहिगे तब गुरूजी बतइस – जबले छुट्टी लगे हे ते दिन ले, नानुक लइका हा, धान लुवे के बूता कमाके, न सिरीफ अपन बर बलकी, मई पिल्ला बर कपड़ा बिसाये हे …….।
रामू के आंखी उघरगे, कालू ला हाथ धरके जइसे उठइस, कालू हा, ये ददा कहिके जोर से रो डरीस। कालू के हाथ गिल्ला रिहीस, रामू के नजर परगे। हथेली भर, फोरा परे रहय, उही फूटगे…..। बपरा लइका जात, कभू वइसन बूता करे नी रहय, नानुक नरम नरम हाथ, धान लुवत, फोरा परगे रहय। लइका के हथेली के दुरदसा देख, रामू के आंखी ले परेम के धार उमड़गे। ओकर पछताताप के आंसू म, जनम भर के पाप बोहागे। पांव के रसदा बदलगे। ओकर सनकलप जीतगे।
दिया बारे के समे, गुरूजी मई पिल्ला, रामू के घर पहुंचगे। आतेच साठ, रामू के कमई के पइसा ला, रामू के हाथ म देवत, अपन करनी के माफी मांगत बतइस के, ककछा म कालू के पहिरावा ला देख के, सबो झिन हाँस पारे रेहेन, उही दिन के पाछू में जानेव के, तुंहर दुरदसा के जुम्मेवार तोर नसा आय, मोर परन रिहीस के, येसो तोर दिसा अऊ दसा ला सुधारहूं, तभे देवारी मनाहूं। उही दिन ले तोर लइका घला, अपन घर के अऊ कन्हो मनखे ला, कपड़ा के सेती झिन हाँसय कहिके, अतेक मेहनत करीस …….। गुरूवईन दई हा लइका मन बर लाने, मिठई पेड़ा, कपड़ा लत्ता अऊ फटाका ला आगू म मढ़हा दीस। दारू छोंड़े के सनकलप करतेच म, रामू ला, अतेक परेम मिलही, बिसवास नी होवत रिहीस……….। गुरूजी के सेती रामू के हिरदे बदलगे, घर म खुसी अपन पांव जमा डरीस। ओकर परिवार म वाजिम म बड़का तिहार आगे। अपमान सहिके, रामू के दसा सुधरइया, गुरूजी के हिरदे म बरत दिया, रामू के घर म अतेक अनजोर बगरइस के, देवारी के अऊ दिया मन, गुरूजी के दे, ये दिया के आगू म फिक्का परगे। खुसी मिले के अवसर हा तिहार आय, गुरूजी के बात, सोला आना अभू तक सच हे ………।
हरिशंकर गजानंद देवांगन
छुरा

गरीब के देवारी

गरीब के देवारी
का पूछथस ? संगवारी।
जेकर कोठी म धान हे
ओखर मन आन हे।
पेट पोसा मजदूर बर
सबर दिन अंधियारी ॥
का पूछथस संगवारी –
गरीब के देवारी।
उघरा नंगरा लइका के
सुसवाय महतारी।
जिनगी भर झेलथे –
करम छंड़हा , लाचारी।
का पूछथस संगवारी –
गरीब के देवारी।
दुख जेकर नगदी हे
सुख हे उधारी।
भूख ओकर सच हे
भरपेट – लबारी।
का पूछथस संगवारी –
गरीब के देवारी।
दुनिया अबड़ अबूज हे
बिन मुड़ी के भूत हे।
ईमानदार बइठे हे ठाठा –
बेईमान रोज छेवारी ॥
का पूछथस संगवारी –
गरीब के देवारी ॥

गजानंद प्रसाद देवांगन
छुरा

सोंच समझ के चुनव सियान

छत्तीसगढ़ ला गजब मयारू,
सेवक चाही अटल जुझारू,
अड़बड़ दिन भोरहा म पोहागे,
निरनय लेके बेरा आगे।
पिछलग्गू झन बनव, सुजान,
सोंच समझ के चुनव सियान ।।

करिया गोरिया जम्मो आही,
रंग रंग के सब बात सुनाही,
जोगी आही भोगी आही,
सत्ता लोलुप रोगी आही।
कोन हितू, कोन बेंदरा मितान,
सोंचा समझ के चुनव सियान।।

एक झिन बड़का सरग नेसेनी,
दूसर के अदभुत हे करनी,
ये नाग के नथइया, ओ सांप नचइया,
दुबिधा म मत परव रे भइया।
रसता सुझाही कुलेस्वर भगवान,
सोंच समझ के चुनव सियान।।

नहि खुरसी के किरवा चाही,
अऊर नहि मुड़ पिरवा चाही,
मां भारती के रकछक पोसक,
हमला बिकास के बिरवा चाही।
धियान रखव जी गुरूजी के गियान,
सोंच समझ के चुनव सियान।।

गजानंद प्रसाद देवांगन
छुरा

अवइया मुख्यमनतरी कइसन हो ?

घात जियानथे जऊन ला, गरीब अऊ अनाथ के पीरा,
जऊन नेता के अंतस निये, जइसे तिनफंकिया खीरा।
जेला गजब सुहाथे, छत्तीसगढ़ छत्तीसगढ़िया हीरा ,
जऊन नी बजावय, हमर पेट ला जइसे ढोल मनजीरा।
छत्तीसगढ़ के हित के खातिर, जूझ मरे चाहे जइसन हो।
जी चाहत हे छत्तीसगढ़ के अवइया मुख्यमनतरी अइसन हो।

पाछू ला गोड़ेली मार, मुड़भसरा ओला गिराके,
फेर, सबके देखऊ मा उही ला, पुचकारथे गजब उठाके।
मंच – सजवा, माला पहिर के, जय जय कार कराके,
मानसिक आरथिक सबो रूप मा, पक्का गुलाम बनाके।
राज करइया नइ चाही, जिंकर सुभाव अइसन हो।
छत्तीसगढ़ के अवइया मुख्यमनतरी, भरत राम के जइसन हो।

तइहा ले पियास बुझावत हे, आसवासन ओस चटा के,
बोट बटोरे म माहिर हे, भासन मा भूख मिटा के।
पोगराय पगुराय टकराहा हे, हकदार ला हकले हटा के,
ऊंच बने के भरम पाले हे, ऊंचाई दूसर के घटा के।
समझ बूझ के करव छत्तीसगढ़िया, जइसन ला तइसन हो।
निरनय लेय के बेरा आय हे, मुख्यमनतरी हमर कइसन हो।

राजिव लोचन, बमलेसवरी जिंहां हे, दनतेसरी दिन दानी,
अरपा पैरी सोंढू सिवनाथ अऊ इनदरावती के बानी।
रग रग म जेकर दऊड‌त हाबय, महनदी के पानी,
उही आय पक्का छत्तीसगढ़िया, रकछक हे इंकर भवानी।
धीर वीर गमभीर नियाव प्रिय, सचाई जेकर दरसन हो।
छत्तीसगढ़ के अवइया मुख्यमनतरी, बुढ़हा देव जइसन हो।।

गजानंद प्रसाद देवांगन
छुरा

पइधे गाय कछारे जाय

पइधे गाय कछारे जाय
भेजेन करके, गजब भरोसा।
पतरी परही, तीन परोसा।
खरतरिहा जब कुरसी पाइन,
जनता ल ठेंगवा चंटवाइन।
हाना नोहे, सिरतोन आय,
पइधे गाय, कछारे जाय ॥
ऊप्पर ले, बड़ दिखथे सिधवा,
अंतस ले घघोले बघवा।
निचट निझमहा, बेरा पाके,
मुंहूं पोंछथें, चुकता खा के।
तइहा ले टकरहा आय,
पइधे गाय कछारे जाय ॥
गर म टेम्पा, घंटी बांधव,
चेतलग रहि के बखरी राखव।
रूंधना टोरिस हरहा गरूवा,
घर के घला, बना दिस हरूवा।
हरही संग, कपिला बउराय।
हाना नोहे, सिरतोन आय,
पइधे गाय, कछारे जाय ॥

गजानंद प्रसाद देवांगन
छुरा
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कइसे उदुप ले डोकरा होगे

कइसे उदुप ले डोकरा होगे
जंगल के बघवा तेंहा,
कइसे चऊंर–चाबे बोकरा होगे।
एक कोरी म छै बछर कम,
कइसे उदुप ले, डोकरा होगे।।
जौन आथे तौन, बखरी ला उजारथे।
पेट ला हमर काट के, देखावटी सुलारथे।
छत्तीसगढ़ ल चरागन भुंइया बना लीन,
चोरहा मन चौरस्ता म कोतवाल ल ललकारथे।
मिठलबरा मन के डिपरा पेट,
हमर बीता भर खोदरा होगे।
तोर रग रग म, पैरी महानदी उछलथे,
तोर बहां म सिहावा कांदा डोंगर उचकथे।
सुरूज कस जोत तोर आंखी बरथे।
तोर भाखा गरू, बादर असन गरजथे ॥
अपन आप ल पहिचान –
का धनुष कांड तोर भोथरा होगे ?
कचना धुरवा के बांध ले बाना, राजिम लोचन महमाई,
बिलई माता तोर संग म हाबे, डोंगरगढ़ बमलाई।
संगे संग तोर पवन चलत हे, बलकरहा मन के रद्दा जोहत हे।
हाथ गोड़ झटकार के, कयराहा ल फटकार के, अगुवा रे भाई।
देख, गुरमटिया के तैं ठिन्ना बीजा –
का डरेलहा गहूं चोकरा होगे ?
राड़ी रो के थिरागे, एंहवाती मन कब चुप होंही।
एकलौता मारिस, महतारी ला, दोगला मन कब सपूत होही।
बिन बादर बरसथे आंखी हा, कोन जनी कब धूप होही।
लोहा के डोरी सुरलागे, उसकाहा धागा का मजबूत होही।
छत्तीसगढ़ के कमाऊ जुझारू बेटा –
कइसे परबुधिया छोकरा होगे ?
जंगल के बघवा तेंहा,
कइसे चऊंर चाबे बोकरा होगे ॥

गजानंद प्रसाद देवांगन
छुरा
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बसंत बेलबेलहा

सर सरात हवा संग
जुन्ना पाना झरथे ।
फोंकियाये रूख के फुनगी
बाती कस बरथे ।
रात लजकुरहीन संग
दिन बरपेलिहा ।
दिल्लगी करथे चुपचुप
बसंत बेलबेलहा ।

आमा जम्मो मऊरगे
बउराये मन बऊरगे ।
चुचवाय संगी संऊरगे
ललचाये अबड़ दंऊड़गे ।
सृस्टि दुलहिन बिहाये बर
बरतिया बनगे ठेलहा ।
दुलहा बनके आये हे
बसंत बेलबेलहा ।

हरियर डारा म बइठके
कोइली मन कुहके ।
भौंरा अऊ तितली मन
फूल के रस चुंहके ।
रसरसाय के बेरा आगे
रहय कहूं नइ तनहा ।
फेर गुदगुदावथे रति ल
रितुराज बेलबेलहा ।

गजानंद प्रसाद देवांगन
छुरा
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पुरखा मन के चिट्ठी

जय भारत , जय धरती माता
सबले उप्पर म लिखे हवय ।
सब झन बर , गजब मया करे हे ,
लागत हे सऊंहत दिखत हवय ।
हली भली रहिहहु सब बेटा ,
हम पुरखा मन चहत हबन ।
करम धरम हे सरग नरक ,
बिन सवारथ के कहत हबन ।
धुंआ देख के करिया करिया ,
छाती हर गजब धड़कथे ।
कोन जनी का बीतत होही ,
रहि रहि के आंखी फरकथे ।
एके माई के पिला सब झन ,
सुनता म रहिहऊ भईया ।
चंद रोजी जिनगी म सुघ्घर ,
गावव नाचव ता ता थइया ।
पांच सात ठिन लकड़ी होथे ,
एक झिन मनखे के बोझा ।

काम परे तब जुरिया जावव ,
फेर सेवर अमली कस गोजा ।
पेट भर रोटी सब कोई खावव ,
डट के उपज बढ़हावव ।
तन भर कपड़ा सब पहिरे ओढ़य ,
कुटिया जम्मो के छबावव ।
करिया अकछर भंइस बरोबर ,
अब कन्हो मनखे झन बोलव ।
ओसहा पानी बिन मरगे बिचारा ,
भेद कहूं झन खोलव ।
मनदीर मसजिद गिरजा गुरूदुवारा ,
एक देवता के रूप पसारा ।
परेम के एक ठिन रसदा हावय ,
कहे सुने के नियारा नियारा ।
मोर जम्मो लइका बाला मन ,
पढ़के समझहू चिट्ठी ला ।
मानवता बर जीहू मरहू ,
कलंक लगे झन मिट्टी ला ।
समझदार बर जादा का लिखंव ,
तुम मोर करेजा हीरा ।
गुनहगरा घबरू झन बनहू ,
पुरखा के समझहू पीरा ।

सुख ला बांटव , दुख ला बंटावव ,
सुरता राखव परोसी के ।
अनचिनहार बर कमती झन करहू ,
दया मया राखहू भरोसी ले ॥

गजानंद प्रसाद देवांगन , छुरा
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पांच बछरिया गनपति

रजधानी म पइठ के
परभावली म बइठ के
हमर बर मया दरसाऐ
हमीच ला अइठ के ।
रिद्धी सिद्धि पा के
मातगे जइसे जोगीजति
ठेमना गिजगिजहा
पांच बछरिया गनपति ।।

बड़े बुढ़वा तरिया के
करिया भुरवा बेंगवा
अनचहा टरटरहा
देखाये सब ला ठेंगवा ।
पुरखऊती गद्दी म खुसरे खुसरे
बना लीन येमन अपन गति
अपनेच अपन बर फुरमानुक
पांच बछरिया गनपति ।।

लोट के पोट के
भोग लगाये बोट के
न करम के न धरम के
परवाह निये खोट के
मेहला घर धनिया के
छिनार घला अबड़ सति
जय हो तुंहरेच तुंहर जय हो
पांच बछरिया गनपति ।।

तोर गुन ला जऊन गाही
ओहा सोज्झे नरक म जाही
अइसन तोर महिमा हाबय
बिन चऊंर चाबे पुजाही
घूस लेके गुलाम बना ले
परजातंत्र के हे खुरसीपति
फेर ऐ मऊका अऊ कब मिलही
पांच बछरिया गनपति ।।

गजानंद प्रसाद देवांगन 
छुरा