Tag: Keshav Pal

आजादी के गीत

खूने-खून के नदिया बोहाइस,
परान छुटत ले लड़े हे।
आजाद कराय बर देस ल,
दुस्मन संग भिड़े हे।
उही लहू के करजा ल,
अब चुकाये ल परही।
आजादी के गीत ल,
मिलके गाये ल परही।।…
घर दुवार के मोह छोड़ के,
देस के रक्छा करे हे।
भारत माँ के लाज बर,
आगी अँगरा म जरे हे।
जग ल अँजोर करइया बर,
एक दीया जलाये ल परही।
आजादी के गीत ल,
मिलके गाये ल परही।।…
जवान मन के बल देख,
मउत घलो ह हारे हे।
देस धरम के नास करइया,
बइरी मन ल मारे हे।
कतेक सहिबो अतियाचार,
तलवार उठाये ल परही।
आजादी के गीत ल,
मिलके गाये ल परही।।…

केशव पाल,
मढ़ी(बंजारी) सारागांव,
तिल्दा-नेवरा रायपुर(छ.ग.)
9165973868

नान्‍हे कहिनी : नवा बछर के बधाई

नवा साल के नवा बिहनिया राहय अउ सुग्घर घाम के आनंद लेवत “अंजनी” पेपर पढ़त राहय।
ओतके बेरा दरवाजा के घंटी ह बाजथे।
“अंजनी” पेपर ल कुरसी म रख के दउड़त दरवाजा ल खोलथे।”अंजनी” जी काय हालचाल कइसे हस ?
“अंजनी” (सोचत-सोचत)”जी ठीक हँव।”
फेर मँय आप मन ल चिनहत नइ हँव ?
अइ…..अतका जलदी भुला गेव ? मँय “नीलिमा” तोर कांलेज वाले संगवारी।
वोह…..! अरे…..”नीलिमा” तँय।
तँय तो अतका बदल गेस की चिनहाबे नइ करत हस।ले आवा भीतर म बइठव।
अउ सुनावा काय काम बूता चलत हे आजकल।
ये “अंजनी” “नीलिमा” ल कइथे। सब बने-बने हे…..आज अब्बड़ अकन गोठ बात करबो ओकर पहिली नवा बछर के गाड़ा-गाड़ा बधाई हे।
ये बात ल सुन के “अंजनी” अचेत हसन होगे।
काबर कि आज कई साल बाद वोहा अइसन सब्द ल अपन खुद बर काकरो मुँह ले सुनत राहय।
अउ एक-एक करके जुन्ना दिन के सुरता ह ओकर आँखी के आघू म झुले ल धर लिस।

केशव पाल
मढ़ी (बंजारी) सारागांव,
तिल्दा-नेवरा रायपुर (छ.ग.)
वाट्सएप-9165973868
ईमेल- keshavpal768@gmail.com

सतनाम पंथ के संस्थापक संत गुरूघासीदास जी

छत्तीसगढ़ राज्य के संत परंपरा म गुरू घासीदास जी के इस्थान बहुत बड़े रहि से। सत के रददा म चलइया, दुनिया ल सत के पाठ पढ़इया अउ मनखे-मनखे के भेद ल मिटइया। संत गुरूघासीदास जी के जीवन एक साधारन जीवन नइ रहिस। सत के खोज बर वो काय नइ करिस।
समाज म फइले जाति-पाँति, छुआछूत, भेदभाव, इरखा द्वेष ल भगाय बर जेन योगदान वोहा देइस वो कोनो बरदान ले कम नइहे।मनखे ल मनखे ले जोड़े बर, मनखे म मानवता ल इस्थापित करे बर, असत के रददा ल तियाग के सत के रददा म रेंगाय बर जेन परयास करिस उही वोला आज अतका पूजनीय बना दिस। “मनखे-मनखे एक समान” के नारा देवइया घासीदास जी जीव हतिया, मांसभक्छन, चोरी, जुआँ, मंदिरा सेवन, परस्त्रीगमन ल बहुत बड़े पाप मानत रहिस।
गाय-गरूवा, जानवर मन ऊपर अतियाचार करइ ल घासीदास जी सबले बड़े पाप बताय रहिस हे। अपन बचपन ले ही घासीदास जी हिंसा के बिरोधी रहि से। सत ल खोजे बर तपसिया करिस, समाज ल सुधारे बर समाजसेवक बनिस। सत के दरसन करना वोकर जीवन के परम लछ्य रहि से।वोखर समे म समाज म फइले विसंगति, कुरीति, मूरति पूजा, जाति वेवस्था, वर्न भेद ल घासीदास जी ह तियागे के बिसय बताय रहि से। घासीदास जी के पुरा जीवन सत के आराधना करत बितीस।सत, अहिंसा, करूना, परेम, दया, उपकार वोकर जीवन के सिंगार रहिस। छ्त्तीसगढ़ के पावन धाम गिरौदपुरी जिहाँ आज घलो मेला भराथे अउ सबो समाज, जाति धरम के मनखे उंहा जाके माथ नवाथे, येकर ले बड़े सामाजिक एकता, समरसता अउ का हो सकथे। आज घलो 18 दिसंबर के पुरा छत्तीसगढ़ म वोखर जयंती ल धूमधाम ले मनाये जाथे, जैतखाम म पालो घलो चढा़य जाथे। अउ पंथी गीत, नृत्य के माधियम ले बाबा घासीदास जी के अमर संदेस ल जन-जन तक पहुंचाय जाथे। आज गुरू घासीदास जी के उपदेस अउ संदेस ल मनइया दिनों-दिन बाढ़हत जात हे, अउ गाँव-गाँव म अइसन कार्यकरम के आयोजन ह ये बात के परमान हे कि घासीदास जी के उपदेस ह आज घलो जिंदा हे, अउ आगू घलो जिंदा रइही।

केशव पाल
मढ़ी (बंजारी) सारागांव,
रायपुर(छ.ग.)
9165973868

याहा काय जाड़ ये ददा

समझ नइ आवत हे,याहा काय जाड़ ये ददा…!
जादा झन सोच,झटकुन भुररी ल बार बबा…!
अपने अपन कांपाथे,हाथ गोड़…!
चुपचाप बइठ,साल ल ओड़…!
कोन जनी कती,घाम घलो लुकागे हे…!
मोला तो लागत हे,उहू ह जडा़गे हे…!
आज नइ दिखत हे,चंवरा म बइठइया मन…!
रउनिया तपइया,रंग-रंग के गोठियइया मन…!
बइरी जाड़ ह,भारी अतलंग मचावत हे…!
सेटर,कथरी म घलो,आहर नइ बुतावत हे…!
पारा,मोहल्ला होगे,सुन्ना-सुन्ना…!
डोकरी दाई चिल्लावत हे,सेटर होगे जुन्ना…!
गोरसी म दहकत हे,आगी अंगरा…!
बइठे बर घर म,होवत हे झगरा…!
डोकरा बबा घेरी-भेरी,चुल्हा ल झाकत हे…!
चाय पीये बर मन ह,ललचावत हे…!
हवा घलो बिहनिया ले,अलकरहा धुकथे…!
नहवइ घलो लेद दे होगे,थोरको नइ रूकथे…!
काला गोठियाबे ग,तोरो-मोरो सबके उही हाल…!
पीरा कतका बतांवा संगी,जीना होगे बेहाल…!

केशव पाल
मढ़ी (बंजारी) सारागांव,
तिल्दा-नेवरा रायपुर [छ.ग.]
9165973868
Keshavpal768@gmail.com

माटी के मया

अब तो नइ दिखय ग,
धान के लुवइया।
कहाँ लुकागे संगी,
सीला के बिनइया।
दउरी,बेलन ले,
मुँह झन मोड़व रे…..।
माटी संग माटी के,
मया ल जोड़व रे…..।।
बोजहा के बंधइया,
अब कहाँ लुकागे।
अरा-तता के बोली,
सिरतोन नदागे।
गाडा़, बइला के संग ल,
झन तुमन छोड़व रे…..।
माटी संग माटी के,
मया ल जोड़व रे…..।।
होवत मुंधरहा संगी,
पयरा के फेकइ।
आज घलो सुरता आथे,
बियारा के सुतइ।
धर के कलारी,
पयरा ल कोड़व रे…..।
माटी संग माटी के,
मया ल जोड़व रे…..।।

केशव पाल
मढ़ी (बंजारी) सारागांव,
रायपुर (छ.ग.)
9165973868

देवारी बिसेस : हमर पुरखा के चिनहा ल बचावव ग

……हमर संस्कीरिती, हमर परंपरा अउ हमर सभ्यता हमर पहिचान ये।हमर संस्कीरिती हमर आत्मा ये।छत्तीसगढ़ के लोक परब, लोक परंपरा, अउ लोक संस्कीरिती ह सबो परदेस के परंपरा ले आन किसम के हावय।जिहाँ मनखे-मनखे के परेम, मनखे के सुख-दुख अउ वोखर उमंग, उछाह ह घलो लोक परंपरा के रूप म अभिव्यक्ति पाथे।
जिंनगी के दुख, पीरा अउ हतास, निरास के जाल म फंसे मनखे जब येकर ले छुटकारा पाथे, अउ जब राग द्वेस से ऊपर उठ के उमंग अउ उछाह ले जब माटी के गीत गाथे अउ हमन खुसी ल जब मनखे चार के बीच म खोल देथे तब छत्तीसगढ़ी लोकनृत्य अउ लोकगाथा सुवा, करमा, ददरिया, पंथी, राऊत नाचा,चंदैनी, भोजली, गेड़ी, बाँसगीत, गौर, सरहुल, मांदरी, दसरहा माटी के सिंगार कहाथे। ये जम्मो नृत्य केवल मनोरंजन के साधन नोहय…..बल्कि हमर हिरदे के अंदर के बात ल कहे के साधन घलो हरय।हमर भाव हमर कला के माधियम ले लोकमानस के बीच आथे।….तब मनखे-मनखे के बीच के दूरी दुरिहा जथे….अउ भेदभाव ल भुलाके…मनखे जब एके स्वर मे गाथे तब उही बेरा लागथे कि परंपरा मनखे ल मनखे ले जोड़े के काम करथे।
फेर आज के कलजुगिया जमाना म हमर परंपरा अउ हमर संस्कीरिती ह दिनो दिन नंदावत हे।
जेन चिंता के बिसय हरे।आज मनखे माया-मोह के जाल म अतेक अरझ गे हे, कि अपन पुरखा के समय ले चले आवत तिहार-बार के महत्तम ल घलो समझ नइ पावत हे। अपन सभ्यता ल खुदे भुलावत हे।
हमर छत्तीसगढ़ म सबले बड़का तिहार के रूप म मनईया तिहार “देवारी” ल ही ले, ले…..पहली कस कुछू सोर नइ राहय अब गाँव म।……तिहार बार के दिन घलो गाँव गली मन सुन्ना-सुन्ना लागथे।
गाँव-गाँव म मातर, गोबरधन पूजा के मनाय के तरीका ह घलो बदलत जात हे।…..मांतर जेकर मतलबे हे मात के मदमस्त होके उमंग उछाह ले मनाय के तिहार हरय। पहिली हमन नानकिन राहन मातर देखेे ल जान गड़वा बाजा अउ मोहरी के सुर म मन घलो बइहा जवय। पान खावत जब परी मन नाचय, कौड़ी के कपडा़ पहिरे, खुमरी ओढ़हे, पाहटिया मन जब सज के निकलय तभे लागय आज मातर हरय।
फेर अब के समे म न पहिली कस दोहा परइया राऊत मिलय न पहिली कस बाजा के बजइया।
जब ले बैंड बाजा ह पाँव पसारिस तब ले हमर कान के सुने के तरीका ह घलो बदल गे हे।
एक जमाना रहिस जब पंदरा दिन पहिली ले मनखे मन घर दुवार के छबई-मुदई, लिपई-पोतई चालू कर देवय। फेर आज मनखे के सोच म फरक आ गे हे। गाँव के नोनी मन घरो-घर सुवा नाचे के चालू कर देवय।फेर आज खोजे ल लागथे सुवा के नचइया मन ल।तभो ले मिलय नहीं।…..कतेक कहिबे आज तो दिया बाती के जलाय के तरीका ह घलो बदलत हे।मनखे रंग-रंग के झालर अउ लाईट ले घर दूवार ल सजावत हे,चमकावत हे फेर मन मंदिर के अंधियार ल अंजोर नइ कर पावत हे।
संस्कीरिती जिंदा हे, सभ्यता जिंदा हे बस संस्कार जिंदा नइ हे। त संगवारी हो पाश्चात्य संस्कीरिती के चक्कर म झन पड़व….अउ अपन परंपरा ल झन छोड़व।अपन संस्कीरिती म अपन छत्तीसगढ़ के दरसन करव….छत्तीसगढ़ के तीज-तिहार अउ लोकपरंपरा ल बचा के राखव…तभे हमर छ्त्तीसगढ़ के मान ह बाढ़ही।

केशव पाल
मढ़ी(बंजारी)सारागांव,
रायपुर(छ.ग.)
9165973868

बेटी के सुरता

सोचथंव जब मन म, त ये आंखी
भर जाथे।
तब मोला, वो बेटी के
सुरता आथे।।
का पानी, का झड़ी,बारहों महिना
करथे काम।
का चइत, का बइसाख, तभो ले नइ
लागय घाम।
धर के कटोरा, जब गली-गली भीख
मांगथे।
तब मोला,वो बेटी के सुरता
आथे।।
बेटा ह पछवागे, बेटी ह अघवागे।
देस के रक्छा करे बर, बेटी आघु आगे।
नीयत के खोटा दरिंदा मन, जब
वोला सिकार बनाथे।
तब मोला, वो बेटी के सुरता
आथे।।
घर दुवार छोड़, जब बेटी जाथे
ससुरार।
बस एक दहेज खातिर, बेटी ल देथे
मार।
तब बेटी के आत्मा, कलप-कलप
के रोथे।
तब मोला, वो बेटी के सुरता
आथे।।
अब तो जागव रे मनखे,बेटी एक
नही, दू घर के लाज ये।
बेटी ह तो संगी, तोर-मोर अंतस के
आवाज़ ये।
झन भुलव मानवता ल, बेटी घर के
सिंगार होथे।
तब मोला, वो बेटी के सुरता आथे।।

केशव पाल
मढ़ी (बंजारी) तिल्दा नेवरा
सारागांव,रायपुर (छ.ग.)
9165973868
9644363694

खेती मोर जिंनगी

नांगर धर के चले नंगरिहा,
बइला गावय गाना।
ढोढिया,पीटपिटी नाचय कुदय,
मेचका छेड़य ताना।
रहि-रहि के मारे हे गरमी ह,
तन-मन मोरो जुड़ा जाही।
अब तो अइसे बरस रे बादर,
भूइयां के पियास बुझा जाही। ।

धान बोवागे बीजहा छीतागे,
कतका करिहंव तोर अगोरा ल।
उन्ना होगे आ के भर दे,
मोर धान के कटोरा ल।
गांव गली हो जाही उज्जर,
धरती घलो हरिया जाही।
अब तो अइसे बरस रे बादर,
भूइयां के पियास बुझा जाही। ।

तहुं तो थोरकुन तरस खा,
पथरागे मोर जांगर ह।
अब तो आ के थोरकुन बरस जा,
रिसागे मोर नांगर ह।
पउंर साल के बिगड़े खेती,
एसो साल अघा जाही।
अब तो अइसे बरस रे बादर,
भूइयां के पियास बुझा जाही। ।

– केशव पाल
मढ़ी (बंजारी) सारागांव,
रायपुर (छ.ग.)
9165973868



गांव के सुरता

होवत बिहनिया कुकरी-कुकरा,
नींद ले जगावय।
कांव-कांव करत चिरई-चुरगुन,
नवा संदेसा सुनावय।
बड़ निक लागय मोला,
लईका मन के ठांव रे।……
आज घलो सुरता आथे,
मोर मया के गांव रे।।……

भंवरा बांटी के खेल खेलन,
डूबक-डूबक नहावन।
डोकरा बबा खोजे ल जावय,
गिरत हपटत भागन।
आवत-जावत सुरता आवय,
डबरी के पीपर छांव रे।…….
आज घलो सुरता आथे,
मोर मया के गांव रे।।………

सिधवा मनखे गांव के,
मंदरस कस बोली।
बड़ सुघ्घर लागय मोला,
डोकरी दाई के ठोली।
सत जेकर ईमान धरम,
लछमी गाय के पांव रे।……
आज घलो सुरता आथे,
मोर मया के गांव रे।।……..

केशव पाल
मढ़ी(बंजारी)सारागांव,
रायपुर(छ.ग.)
9165973868




चित्र: भूपेंद्र गोसाईं साहेब