Tag: Lalit Nagesh

व्यंग्य : माफिया मोहनी

बाई हमर बड़े फजर मुंदराहा ले अँगना दूवार बाहरत बनेच भुनभुनात रहय, का बाहरी ला सुनात राहय या सुपली धुन बोरिंग मा अवईया जवईया पनिहारिन मन ल ते, फेर जोरदार सुर लमाय राहय – सब गंगा म डुबक डुबक के नहात हें, एक झन ये हर हे जेला एकात लोटा तको नी मिले। अपन नइ नाहय ते नइ नाहय। लोग लइका के एको कनी हाथ तो धोवा जथिस। भगवान घलो बनईस एला ते कते माटी के? एकर दारी तो कोनो कारज बने ढंग ले होबेच नी करे । कतेक नी जोजियाएँव यहू ला थोर बहुत करजा बोड़ी लिखवा लव लिखवा लव, खातू कचरा निंदई कोड़ई बर सोहेलत होही, फेर ये तो कँवरों नगर के राजा आय, एला कहाँ लागही करजा बोड़ी? काकरो आगू मा हाथ पसारई तो एला लाज लागथे? घर के सुने न बन के, करथे अपन मन के।
अतेक बिहनिया बिहनिया मोरे आरती होय कस लागिस। महुँ बिष्णु भगवान सहिन खटिया मा गोड़ ला लमाके ढनगे ढनगे ओकर बंदना के कारण पुछ परेंव।
अई कहिंच ला नी जानो सहिन का होगे कहिथव, सरी दुनिया दुनिया शोर होगे, जम्मो किसान मन के करजा माफ होगे कहिथे, कालिच हमर परोसी घलो काहत रिहीस। खातू के, बिजहा के, नगद पइसा लाने रिहीस, सरकार सब ला छिमा कर दिस । जेमन धान बेंच के लागा चुका दे रिहीन उंकरो पइसा ला लहुटात हे। उही पइसा के ओहा नवा फटफटी अउ अपन गोसइन बर नौ लर के करधन घलो लान डारिस, एक तुमन हव भोकवा के भोकवा। मौका मा चौका मारे ला कभू नइ आय। बाई के गोठ सुनके मै चेथी खजवात गुने बर लग गेंव। आखिर ये करजा लेवई हमर अधिकार आय के मजबुरी?? ?
खैर जउन भी होय, लोगन मन ला गोठियाय के अवसर तो मिलिस।
सही मा आज चारो डहर किसान मन के चरचा होवत हे। सिरीफ चेहरा देखके पता चल जही कोन किसान आय तेहा ।लागथे किसान के माथा मा ओगरईया पानी थोकन मुहु मा ओगरिस। गाँव गाँव एके गोठ तोर कतका रिहीस मोर कतका रिहीस । नवा तिहार होगे। नाचे कुदे के बहाना मिलगे।
हमर ददा बबा काच्चा ले पाक्का होगे ये भूँइया मा नांगर जोतत जोतत। संगे संग हमरो उमर अधियागे ये माटी के सेवा बजावत। फेर गउकिन किसान बर कभू अइसन मौका नइ दिखे रिहीस मजूँर कस नाचत। जइसन आज ये बिना सावन के करिया बादर ल देख के नाचत हे। मँजुर कस छम छम नाचत भर नइ हे, बलुक मिरगा सहीन इंहा ले उंहा डाँहकत फाँदत घलो हे। एक किसान होय के अनुभव के लहरा पहिली घाँव सबो के अंतस तरिया मा मारत हे।
अब तक तो मन ये मानेच बर तय्यार नी होय कि किसान नाँव के घलो समाजिक प्राणी होथे। किसान तो सिरीफ एक जीव भर आय जउन पेट के खातिर जांगर गलात रहिथे। सुक्खा दुकाल त कभू पनिया दुकाल। इमारी बीमारी रात दिन हरहर कटकट के नाँवे किसानी आय। तिही पाय के कतको किसान खेत कोठार बेंच भांज के शहर कोति रेंगत हें ।गाँव के गौंठिया शहर मा नौकर बने बर तियार हो जथे । आजकाल के लइका मन तो खेत के मेंड़ मा रेंगे बर लजाथें, अरे! कन्हो रेंगत देख डारही त भयंकर फधित्ता नी हो जही ?
लेकिन खेती बारी के दुख पीरा बर अइसन गजब के मलहम बनाके करजा माफिया मन आज बजार मा बेचत हे ।जेकर रंग रूप महक मा जम्मो जनता मोहाय परत हें। एकर नाँवे मा जबर मोहनी समाय हे। जउन लेवत हे दीवाना बने जात हे। कतेक गुणकारी हे, कतेक असर करही ये दवई हा, एला तो लगाय के बादे पता चलही। फेर एक बात तय हे जउन ला नइ पिरात रइही वहू हा माफिया के मलहम ला जबरदस्ती चुपरही।
ये लागा बोड़ी के ताम झाम ला मैं अतेक दिन मजबुरी समझत रेहेंव, फेर बिहनिया ले बाई के ठेसरा परे हे, अभी ले मुड़ी किंजरत हे। अब तो मोला लागत हे करजा उठाना अधिकार भर नइ होय बलुक जनमसिद्घ अधिकार आय। अधिकार के उपयोग सबला करना चाही। सोंचत हँव बिना समे गँवाय सीधा बेंक जाके बोरा भर करजा उठाहुँ अउ बिदेस कोति रेंगहूँ। मनमाने करजा उठा ले आज, डर्रा झन आगे करजा माफिया राज। आखिर ये मोहनी दवई कब काम आही। का तैं मोहनी डार दिये गोंदा फूल।

ललित नागेश
बहेराभांठा (छुरा)
493996

बाहिर तम्बू छोड़ के, आबे कब तैं राम

गली गली मा देख लव,एके चरचा आम ।
पाछु सहीं भुलियारहीं ,धुन ये करहीं काम ।

अाथे अलहन के घड़ी,सुमिरन करथें तोर ।
ऊंडत घुंडत माँगथे ,हाथ पाँव ला जोर ।

मतलब खातिर तोर ये ,दुनिया लेथे नाँव ।
जब बन जाथे काम हा, पुछे नही जी गाँव ।

कहना दशरथ मान के ,महल छोड़ के जाय ।
जंगल मा चउदा बछर ,जिनगी अपन पहाय ।

तुम्हरो भगत करोड़ हे, बाँधे मन मा आस ।
राम लला के भाग ले, जल्द कटय बनवास ।

फुटही धीरज बाँध ये, मानस कहूँ निराश ।
आही परलय जान ले ,होही गंज बिनाश ।

लेके तोरे नाँव ला , सजा डरिन निज धाम ।
बाहिर तम्बू छोड़ के , आबे कब तैं राम ।।

ललित नागेश
बहेराभॉठा (छुरा)
४९३९९६

गज़ल : किस्सा सुनाँव कइसे ?

ये पिरीत के किस्सा सुनाँव कइसे ?
घाव बदन भर के ला लुकाँव कइसे ?

देंवता कस जानेंव ओकर मया ला मँय हर ,
अब श्रद्धा म माथ ला झुकाँव कइसे ?

पाँव धँसगे भुइँया म देखते देखत ,
बिन सहारा ऊपर ओला उचाँव कइसे ?

पानी म धोवाय छुँही रंग सहिन दिखथे,
हो तो गेंव उघरा अब लजाँव कइसे ?

ये जमाना ताना अबड़े मारत हे ‘ललित’
बताय कोनो जिनगी ला बचाँव कइसे ?

ललित नागेश
बहेराभाँठा (छुरा)
४९३९९६

गाँव गाँव आज शहर लागे

गाँव म गरीब जनता खातिर चलाये जात योजना मन उपर आधारित

गाँव गाँव आज शहर लागे,
चकचक ले चारो डहर लागे !

फूलत हे फूल मोंगरा विकास के,
ओलकी कोलकी महर महर लागे !

जगावत हे भाग अमृत बनके ,
जे गरीबी हमला जहर लागे !

संसो दुरियागे देख नवा घरौंदा,
खदर जेमा ढांके हर बछर लागे !



काया पलटत जमाना हे ललित,
सांगर मोंगर होगे जे दुबर लागे!

रद्दा गढ़त अब बिन संगवारी के,
रेंगत अकेल्ला जिंहा डर डर लागे !

घात सुग्घर निखरत रूप भूंइया ला,
देखव बने , झन काकरो नजर लागे !

ललित नागेश
बहेराभांठा (छुरा) 493996

गरीब बनो अउ बनाओ

नवा बछर के बधाई म मोर एकलौता संगवारी जब ले केहे हे – ‘मंगलमय’। मंगलवार घलो इतवारमय लागत हे। इतवार माने सब छोड़छाड़ के, हाथ गोड़ लमाके अटियाय के दिन। फुरसत के छिन। अच्छा दिन।जब ले सुने हंव गरीब नामक जीव के उद्धार बिल्कुल होवईयाच हे, संडेवा काड़ी सहिन शरीर के छाती मुस्कुल म बीस पचीस इंच होही, फूलके छप्पन इंच होगे हवय।
अब देखव न हर कोई गरीबेच के सेवा ल अपन धरम मान के तन मन लगाके धन बनात हें। जब ले ए दुनिया के सिरजन होय हे तउन दिन ले ए बुता ह चलत आवत हे। आने आने बेरा म आने आने बलवान पहलवान खिंचत हेचकारत उठाय के, रेंगाय के उदिम करत आवत हवंय, फेर वाह रे जीव! एक कदम आघु तनी जाय बर नी उसाले। उल्टा दू कदम पीछु घुच जावत हे। पेट भीतर ले अमर होके आय जीव ल मारे के, भगाय के सिरीफ ढोंग होवत हे। हर बछर दसराहा म रावण बध के ड्रामा सहिन। अब रावण हर मनखे रिहीस हे त मुस्कुल से छै ले सात फीट रिहीस होही, तइहा जमाना ले मारत आवत हवय, वो हिसाब म ओकर नानकुन केस तको नी बांचतिस। फेर ए कलजुग म तो पचास-पचास, सौ-सौ फीट के कद काठी वाला रावण संवहत किंजरत बुलत दिखत हाबे।
इही ड्रामा म गम्मतिया मन आनी बानी संवागा रचाके हमन ल भुलियारे हवय। किसम किसम के खेल तमासा ल देखके मनखे मोहाय भकवाय हांस हांसके ताली बजावत हे।




फेर आजकाली गरीब नामक जीव के रुतबा ल देखके कुबेर महराज घलो गरीबी रेखा प्रमाण पत्र बर पंचायत के घेरी बेरी चक्कर लगावत हवंय। वहु हर अपन धन संपत्ति ल राखे धरे बर ठौर ठिकाना के जुगाड़ म हवय। कहुं मेर फोकट म बेंक खाता खुल जही ते थोर बहुत ल लुकात बने तिसने। एति बेंक वाला मन घलो तो लुलवात हे गरीब के सेवा करे बर। बिना खाता के सेवा करत नइ बने। अमीर नामक जीव बर ए दुनिया म कहुं मेर ठउर नइ हे। जउन ल भी इहां जिनगी पहाना हे गरीब बने ल परही। दाऊ गौटिया मन के कोनो इज्जत नइहे अब। गरीब मन के जोरदार पुछपरख अउ मान सनमान ल देखके हर कोई के मन गरीब कहाय बर मचलत हे। एकर बर अच्छा अच्छा योजना घलो चलत हवय। अपन किसमत ल संहराय के गंज मउका हाथ लगे हवय।




बिना धान के कोठी बनवाले, राखे धरे बर एकात काठा खोंची नइहे तभो ले कोन्हो ल मांग जाच के डार। मुसवा मन बर तो चाही न। नान्हे नान्हे मुसवा के बड़े बड़े पेट।आज के जमाना के मनखे बर एक अउ सिरिफ एक सुत्रीय नारा हे ‘गरीब बनो अउ बनाओ’
ए धरती म सरग, सरग जइसे सुख सुविधा, आनंद मंगल के फूल फूलत हे, एकर महक ल गरीबहा नाक मे सुंघे जा सकत हे। अतेक बेवस्था, अतेक जानकारी ल जान के घलो गरीब नइ बनेव या गरीब नइ बनाय त ए मानुष जोनी म आना अकारथ समझो।
इही परम ज्ञान ल, गुरूमंत्र मानके कई झिन साधक मन जी जान देके भीड़े हे ए नीक बुता म। अउ ए हमर बर बड़ गौरव के बात आय। अपन काम अउ ईमान के प्रति इंकर लगन ल देखके अइसे लागत हे, देश गरीब ले महागरीब के परम पद ल जरूर पाही। इंहा के जनमानस के सहयोगी सुभाव अउ पंदोली देय बर आगु ले तियार बइठे मशीनरी के किरपा ल देखत मन महागरीब के रद्दा म दउड़े बर कुलबुलावत हवय। अइसने सबके अपार मया दुलार अउ सहयोग सरलग मिलत रइही त हमुमन ए गरीब नामक जीव के नाव ल एक दिन जरूर जगाबो। अउ ए देश ल ‘गरीब रत्न’ के महा गहना ले सिंगारबो।

ललित नागेश
बहेराभाठा (छुरा)
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देख कइसे फागुन बउरात आत हे

लुका झन काहत बड़ ठंडी रात हे,
देख कइसे फागुन बउरात आत हे!

झराके रुखवा चिरहा जुन्ना डारापाना,
नवा बछर म नवा ओनहा पहिरात हे!

रति संग मिलन के तैय्यारी हे मदन के
कोयली ह कइसे रास बरस मिलात हे!

मउहा कुचियाके बांधे लगिन दिन बादर,
फुलके परसा सरसो महुर मेंहदी रचात हे!

फगुवा के राग म निकले तियार बराती,
बनके लगनिया आमा मउर चढ़ात हे!

माते पुरवाई झुमरत बन के बंडोरा,
सुनावत सब ल सरसर बधाई गात हे!

ललित नागेश
बहेराभांठा(छुरा)
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गज़ल

बदलगे तोर ठाठबाट अउ बोली,गोठियात हे सब झन ह
मंदरस कहां ले बरसय ,करेला कस होगे हे जब मन ह

पोत के कतको कीरिम पवडर,सजा ले अपन बाना ल
नइ दिखय सुघ्घर मुरत तोर, जब तड़के रइही दरपन ह!

चारों खुंट लाहो लेवत हे, बड़े बड़े बिखहर बिछुरी सांप
संगत म अब सुभाव देख,बदले कस दिखत हे चंदन ह

भोकवाय गुनत रही जाबे, देख नवा जमाना के गियान
सियानी धराके नान्हे हांथ कलेचुप बुलकत हे ननपन ह

बिरथा हो जाही पोसे तोर,मन म अकल के घोड़ा घमंड
सुधबुध सबो गंवा जाही,जब गोड़ तरी आही अलहन ह

अपने मुड़ी गिरही पथरा,लगाबे निशाना कहूं बादर ल
अंधियारी रतिया लालच के,भटकत कलपही नरतन ह

ललित नागेश
बहेराभांठा(छुरा)
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व्यंग्य : बटन

जब ले छुए वाला (टच स्क्रीन) मोबईल के चलन होय हे बटन वाला के कोनो किरवार करईया नइ दिखय। साहेब, सेठ ले लेके मास्टर चपरासी ल का कबे छेरी चरईया मन घलो बिना बटन के मोबईल म अंगरी ल एति ले ओति नचात रहिथें। अउ काकरो हाथ म बटन वाला मोबईल देख परही त वो ल अइसे हिकारत भरे नजर ले देखथे जानोमानो बड़ भारी पाप कर डारे होय।
फेर ये बटन नाम के जिनिस हमर जिनगी म कइसन कइसन रुप लेके समाय हे, सब जानथे। हमर दिन के शुरवात घलो तो टीबी के रेडियो के बटने ले होथे। दिन भर के काम बुता ले रतिया सुतत बेरा म लट्टु चिमनी के बुताय के बटन। कुरता म, पइट, सलोखा म, जाकेट म, एलउज बेलउज म तो बटन के महत्तम सबले जादा पाबे। एकरे सेवा भावना ले हम इज्जतदार कहात हन। जब कहुं ए बटन हमर कपड़ा संग काम करे बर मना कर दिही ते दिन हमर लाज उपर वाला के हाथ।




घर म जब कहुं नान्हे लइका मन बिटाय, उही बटन वाला फोन ल धरा देंवय। कुछु जाने या झन जाने (कीपेड) के “टूं टूं..! ल सुनके लइका मन मगन खेले बर धर लेंथय। भले कभू कभू इंकर मसकई म खाता म पइसा (बेलेंस) जम्मो कट जाथे। अइसने हमर एक झन परोसी घलो मोबईल ल धरके जे नीही ते बटन ल हुदरत कोचकत रहिथे, अउ ए दारी का होइस जानथव, फट ले ‘पांच अरब डालर’ के बेलेंस कट तो गे । गेज ले दांत ल नीपोर दिस। वो दिन ले ओकर मुहु ह अंईलाहा चेंच भाजी कस ओरमे हे।

आज काली दुनिया म बरन बानी के बटन आगे हवय।अलग अलग परकार के, अलग रंग के।का करिया, का हरियर, का सादा, का भगवा।जिसन नीही तिसन। जउन ल जइसन संउक,वइसन ल बउरो।अउ ए बटन सिरिफ बिग्याने के बिसय नइ होय रे भईया, भूगोल इतिहास बर घलो वोतके कारगर हवय। एक बटन म सौ दू सौ बछर जुन्ना परेत ल, परेतिन ल जियाय जा सकत हे। अउ ते अउ कोनो ल परेत परेतिन बनाय घलो सकत हें।




नवा जमाना म बटन के रुप घलो बदलत हे। कई ठिन नाव होगे। काम घलो अलग होवत हे। ईज्जत ढांके बर मुख्य कार्यकर्ता बनके आगु म खड़े पावन। फेर अब तो काकरो ईज्जत उतारे बर, कोनो ल डरवाय बर, धमकाय बर, एकर उपयोग करे जात हे। कोनो संदुक म तोप ढांक के राखे हे, कोनो आलमारी पठेरा म त काकरो आपिस के टेबल म माढ़े हे, अउ कोनो तो थैली म धरे किंजरत हे। जे ला देखबे, बटन चपकिच दुंहू कस करथे।अरे चपकना हे त चपक न रे भईया, के सिरीफ भाषने मारबे? आज काली भाषन मारे के घलो बटन बना डारे हंवय हमर बिग्यानिक नेता मन।कोन बटन कब दबाना हे सब जानबा रथे। फेर समय के संग जनता घलो हुसियार होवत हे, अइसने बटन वाला नेता ल बटने दबा के बटेरे बर मजबूर करदेथें ।

ये दुनिया के सिरजन कइसे होइस होही येला तो हम नइ जानन, फेर नाश तो बटने ले होही अइसे लागथे।हे दुनिया के मालिक! देख तोर संसार म हर मनखे के हाथ म कंही न कहीं के बटन हाबे। बिनती हे तोर ले जउन बटन म परमारथ के भावना मिले उही काम करे, सुवारथ के, लालच के,हिंसा के कुकरम के, जगत के अहित करईया बटन ल नंगाके ते धर लेबे!
कोनो ल बटन के घमंड मत राहय।

ललित नागेश
बहेराभांठा (छुरा)
493996
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गज़ल

कतेक करबे इंहा तै बईमानी जिनगी
एक दिन ए जरूर होही हलाकानी जिनगी!

जब कभु टुट जाही मया ईमान के बंधना
संतरा कस हो जाही चानी चानी जिनगी!

चारी लबारी के बरफ ले सजाये महल
सत के आंच म होही पानी पानी जिनगी!

घात मेछराय अपन ठाठ ल हीरा जान के
धुररा सनाही तोर गरब गुमानी जिनगी !

सुवारथ के पूरा म बहा जाही पहिचान
बचा, बिरथा झन होय तोर जुवानी जिनगी!

जब कभु उघारय कोनो किताब इतिहास के
हरेक पन्ना म मिलय तोरे कहानी जिनगी!

ललित नागेश
बहेराभांठा (छुरा)
493996
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ललित नागेश के गज़ल

दुख संग म मोर गजब यारी हे
दरद म हांसे के बीमारी हे!

कहां सकबो नगदी मोलियाय
तरी उपर सांस घलो उधारी हे!

आंसू म धोआगे मन के मइल
काकरो बर बैर न लबारी हे !

रोना ल गाना बना दंव मय हर
पा जांव हुनर के बस तय्यारी हे !

जे दिन कलेचुप देखबे मोर ओंट
जान उही दिन खुशी मोर दुवारी हे!

ललित नागेश
बहेराभाठा (छुरा) 493996
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