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कहानी : रेलवे टईम टेबुल के भोरहा

मँझन के दू बज गे राहय, मूँड़ मा मोटरा लादे, बाखा मा पेटी चपके, गाँव के मोठडाँट मनखे रामू हा धोती पागा के छूटत ले दउँड़ के रेलवे इसटेसन मा हबरिस, जाड़ के दिन मा घला वोहा पछिना मा नहा डरे राहय, पाछू-पाछू ओकर गोसानिन रेवति अपन दू झन लइका ला धरके हबरिस, वहू पछिना मा लथपथ राहय, वोमन पहिली घँव टरेन चढ़े के साद करे राहय, दूरिहा के सफर, सुने सुनाय गोठ अउ जाड़ के डर मा अड़बड़ अकन समान अउ साल सेवटर ओढ़े लादे राहय।
इसटेसन मा पहुँच के रामू हा येला-वोला पूछे लागिस, टरेन कहाँ हे, दिखत नइये छूटगे का, ओकर के जम्मों झन वोखर गोठ सुनके ओखरे डहर देखे लागिस, फेर रामू ला काहीं के सुध नइ रीहिस, वोला हलाकान होवत देख के एक झन भलमानुस बतइस कि टरेन हा इसटेसन मा हे, त रामू फेर कइथे त हमन इसटेसन म तो खड़े हन का ? वो भलमानुस कहिस पहिली तो ते धीरज धर अउ सुन, अभी तेहा इसटेसन के गाड़ी मोटर राखे के ठउर मा हावस, इँहा ले वो बिलडिंग मा निंगबे त पूछताछ करे बर चेंबर बने होही, रामू फेर किहीस चेंबर काला कइथे गो? भलमानुस बतइस भुलकी वाला खोली, एक डहर जानकारी माँगे के ठउर हे अउ एक डहर टिकिट कटवा के, उँहे जाबे, अउ वो बिल्डिंग ला नाहकबे त पटरी वाला इसटेसन दिखही उही मा टरेन आथे-जाथे। त रामू डिंग मारके खिसा ले टिकिट निकाल के कइथे टिकिट ला तो हमर पड़ोस के पढ़ईया बाबू हा गाँवेच मा बना देहे, अपन कंपुटर मा काला-काला चपकिस पइसा ला माँगिस अउ ये कागद हेर के हाथ मा धरा दिस, वोहा कहिस कि मोबाइल धरे होबे त कागद घलो नइ लागे। मेहा मोबाइल तो धरे हँव फेर जादा कोचके ला नइ आवय कइके कागद वाला टिकिट माँगेंव।




त भलमानुस टिकिट ला देखा कहिस अउ देखे लागिस, अब वोहा थोकन संसो मा रामू ला देख के कइथे ये टिकिट में तो तीन बजे के समे लिखाय हे। रामू अपन घड़ी ला देख के कइथे हव जी जल्दी टरेन चघे बर लागही आधा घंटा भर तो बाँचे हे। भलमानुस फेर कइथे, नही भाई तोर टरेन हा तो कबके चल देहे येमा तीन बजे लिखाय हे, अउ अभी साढ़े चउदा बजत हे, तोर टिकिट मा तीन बजे लिखाय हे, तेहा रतिहा के बेरा आये। रामू ओखर गोठ ला नइ पतियाय अउ हाँस के कइथे सिरतोन मा जी शहरी मनखे मन लबारी मारे मा कमी नइ करव, तँय कोनों ला पूछ ले घड़ी मा बारा बजथे, तेरा चउदा नइ बजे, कहीं आय रात कुन टरेन चलही, हमर गाँव म साँझ कुन चार ले सवा चार होथे त मोटर नइ पावस। अउ ताहन रामू हा वोला खेदारे सरीख भाखा मा कइथे महू हा तीस फरवरी के जनमें रेंहव समझे! दे मोर टिकिट ला, जा अपन बूता कर।
अउ रामू इसटेसन के आने-आने चेंबर (भुलकी वाला खोली) मा दतके पूछे जाने के जतन करथे, फेर वोहा पूछे-ताछे के खुदे ठिकाना नइ पावय त कोनें हा वोला बता डरतिस। वोकर हलाकानी ला एक झन पुलिस वाला देखथे त गोठ ला सुनके, किस्सा ला समझ के रामू ला समझाथे कि टरेन के टईम टेबुल हा चउबीस घँव बेरा बतईया घड़ी के हिसाब ले चलथे, बारा घंटा वाला घड़ी हा एके तारीख मा दू घँव एके बेरा बताथे, अइसन में रेलवे के कोनों करमचारी ला भोरहा झन होवय, अउ भोरहा मा दुर्घटना झन होवय कइके चउबीस घँव बेरा बतईया वाला घड़ी के हिसाब ले टरेन चलथे, इही ला रेलवे टईम-टेबुल घलो केहे जाथे। येला एक घँव जाने के बाद मा यातरी मन ला घला सुभिता लागथे।
अब रामू के हाथ गोड़ जुड़ा जथे, थोथना ओरमा के अपन लोग-लइका डहर ला देख के कइथे वो टिकिट बनईया डिंगरा टूरा हा एक कान ला फोन मा दतायेच रीहिस अउ सट ले मोला टिकिट ला धरा दिस, ओखर लटर-पटर के मारे कुछु पूछे घला नइ सकेंव, रही जा रे डिंगरा टूरा गाँव लहुट के तोर बर बइठका कराहूँ। फेर मूँड़ धरके कइथे अब मेहा का करँव साहेब तिही उपाय बता। त पुलिस वाला कइथे फिकर के कोनों बात नइये, तँय पइसा नइ राखे होबे त हमन तोला बस बइठार के घर भेज देबो, अउ कहूँ पइसा राखे होबे त जिहाँ जाना हे तिहाँ के आने टरेन के टिकिट कटवा के ओखर सही बेरा मा बइठार देबो, अइसन हालत ले निपटे बर रेलवे बिभाग अउ शासन हा अड़बड़ अकन उदीम करके राखे हे। रहे से लेके सुरकछा तक सब बेवस्था इसटेसन मा रइथे। हाँ फेर अब दू चार आखर अइसन जिनिस के जानकारी रखना सब झन बर जरूरी हे। रामू पइसा धरे रीहिस इसटेसन मा लोग लइका ला खवा-पिया के चार घंटा अगोरे के पाछू टरेन पहुँचईस अउ पुलिस वाला के परसादे रामू अउ ओखर परवार हा पहिली पइत टरेन सफर के मजा अउ सुवाद पईस।

ललित साहू “जख्मी”
छुरा जिला – गरियाबंद (छ.ग.)

मानक बिना मान नही

हमर राज के गुरतुर छत्तीसगढ़ी बोली अब भाषा बन गेहे, अब तो छत्तीसगढ़ी के मान सम्मान आगास मा पहुंच जाना चाही, फेर अइसन का होवत हे कि हमर अंतस मा हमाय छत्तीसगढ़ी, सम्मान के अगोरा मा दिनोदिन दुबरावत हे? जम्मों झन ये बात ला नकार नइ सके कि कोनो राज, संस्कृति, परंपरा, भाषा अउ गियान-बिग्यान ला साहित्य हा सहेज के राखथे, साहित्य के बिना ये दुनिया अंधियारी खोली बरोबर हो जही, अउ यहू गोठ ला माने ला परही कि ये दुनिया अउ समाज ला साहित्यिकार मन ही अपन ढंग ले रद्दा देखा सकत हे। फेर साहित्यिकार ला बल कहाँ ले मिलय? यहू एक ठन जबर गोठ आये, काबर की भाषा अउ साहित्य के बिकास बर कलम मा ताकत होना चाही।
हमर राज के साहित्यिकार मन के लगन, तप, मिहनत, महतारी भाखा बर मया, अउ गियान बुद्धि मा कोनो कमी नइये, फेर छत्तीसगढ़ी के मानक सबद के अभाव मा सबो सुरुज बरोबर चमकत साहित्यिकार मन ला गरहन धर लेथे। कतको कलम के पुजारी साहित्य के सेवा मा अपन जिनगी खपा डरिन, कोनो गद्य मा कोनो पद्य मा साहित्य ला उँचाई देखइन, त कोनो छंद मा साहित्य ला पोठ करे के बूता करिन। अउ ये बूता अभू घलो पीढ़ी दर पीढ़ी चलत हे, फेर मानक सबद के अगोरा मा जम्मों झन के उदीम हा अध्धर हो जथे। अइसे तो सुरुज ला कतको चपक के राख ले फेर अंजोर तो बाहिर आबे करही। तभो ले कलम के सिपाही मन के अथक परयास ला मान सम्मान नइ पावत देख के अंतस मा छाला पर जथे।




जम्मों साहित्यिकार स्वाभिमानी अउ संतोसी हे, ते पाय के कोनो अपन सम्मान के बाट नइ जोहे, फेर महतारी के सम्मान नइ होही त अंतस कचोटबे करही। हमर राज भाषा आयोग के गठन साहित्यिकार मन के इही पीरा ला कम करे बर करे गे रीहिस। जेखर ले पीरा थोकन कमतियाय हे, फेर पूरा कटे नइये, काबर कि जेन आसरा कलमकार मन ला आयोग से हवय ओखर पूरा होना बाँचे हे। सबले पहिली तो जम्मों कलमकार मानक सबद के अगोरा करत हे। जम्मों झन अपन सकत ले भाषा के सम्मान बर जतन करत हे, फेर मानक सबद लाने के बूता तो आयोगेच ला करे ला परही।
मानक सबद के अभाव मा कोनो काहीं रचना करे, सबला मानेच ला परथे, येमा जम्मों के नकसान हे, नवा लिखईया मन ला कोनो टोक नइ सके, काबर कि टोके या सुधारे बर कोनो आधार घलो तो होना चाही, अउ एक घँव नवा कलमकार के अधकचरा रचना आघू बढ़गे ताहन वोला सुधार नइ सकस, ये भोरहा मा कतको कलमकार अब छत्तीसगढ़ी के मूल सबद ला घलो भुलावत हे। जइसे बउरना, बेरा, पहुना, कपाट, दुवार ये सब छत्तीसगढ़ी के मूल सबद आय फेर अब ये सब ला छोड़के साहित्यिकार मन हिन्दी ला टोर के लिखत हे, परयोग करना, समे, मिहमान, फाटक, अँगना। अइसन मा मूल सबद के नंदाये के खतरा बाढ़त हे।
अब जेन हा मात्रा गनती मा रचना लिखत हे तेखर पीरा तो अउ जबर हे, छंद रचना मा एक मात्रा के कम या जादा होय ले पूरा रचना गलत हो जथे, अब सँझा बिहिनिया मिहनत करके कोनो हा रचना करे हे, अउ बाद मा वोला कहे जाही कि तोर रचना मा मात्रा कम या जादा हे, त ओखर छ्त्तीसगढ़ी साहित्य अउ भाषा बर का सम्मान रही, ये सब समझे सकत हव। अब उदाहरन बर उपर के मोरे एक सबद ला देख लव, मेहा अभी ‘मिहनत’ लिखे हँव, अउ काली के दिन मा मानक सबद मा कहे जाही की ‘मेहनत’ सबद ला मान्य करे जाही त मोर ये सबद मा एक मात्रा बाढ़ जही, अउ मेहा ये सबद ला छंद मा घलो बउरे हँव, त मोर ये सबद आय वाला जम्मों छंद गलत हो जही। अउ बहुत झन साहित्यिकार मन के मानना हे कि हिन्दी वर्नमाला के कुछ सबद ला छत्तीसगढ़ी मा नइ बउरना हे, त अइसन मा घलो ब्याकरन मा रचना लिखना कठिन हो जथे। छत्तीसगढ़ी मा 12 ठन स्वर अउ 40 ठन व्यंजन माने गे हवय। ड, त्र, ण के काम अं या न ले चल जथे, ‘क्ष’ अउ ‘श’ ‘ष’ के जगा ‘छ’ अउ ‘स’ हो जथे। जइसे कि मोला तुकांत मिलान हे, त ‘क्लेश’ अउ ‘परदेस’ के तुकांत उत्तम तुकांत नइ होवय, फेर छत्तीसगढ़ी मा ‘श’ ल ‘स’ लिखबो त ‘कलेस’ अउ ‘परदेस’ के तुकांत बन जही, अतका सब ठीक हे, फेर जेन दिन मानक आही अउ साहित्यिकार ये दुनिया मा नइ रही त ओखर लिखे साहित्य मा सुधार कोन करही? अउ सुधार नइ होही त वो साहित्य ला सही माने जाही या गलत?




एक ठन अउ जबर गोठ ये हवय कि जम्मों साहित्यिकार के लेखन मा अंतर होय ले पढ़ईया मन छत्तीसगढ़ी रचना ला पढ़े मा रुची नइ देखाय, सुने अउ बोले मा छत्तीसगढ़ी ला भले जम्मों झन बउरथे, फेर पढ़े-लिखे के बेरा छत्तीसगढ़ी हा साहित्यिकार मन के जिम्मा छोड़ दे जाथे। इही पाय के कतको वरिष्ठ साहित्यिकार मन के कहना हे कि जेन छत्तीसगढ़ी के मूल सबद हे उही ला बउरे जाये, अउ छत्तीसगढ़ी के मूल सबद नइ मिले के स्थिति मा उधारी के सबद ला ज्यों के त्यों बउर लेना ही, ये बेरा के मांग हे। अउ सिरतोन कबे त अब काखरो गोठ ला माने जाय, फेर छत्तीसगढ़ी के मानक सबद आना खच्चित जरूरी होगे हवय। मानक बिना छत्तीसगढ़ी ला पूरा मान सम्मान नइ मिल सके।

ललित साहू “जख्मी” छुरा
जिला- गरियाबंद (छ.ग.)

कहिनी : राजा नवयुग के मंत्रीमंडल

सतराज नाव के बड़ सुग्घर राज्य मा सत्यबीर सिंह नाव के प्रतापी राजा राज करय, वइसे तो ओखर नाम बीर सिंग ही रीहिस, फेर जब वोहा राजा बनिस तब राज परंपरा निभाय खातिर बीर सिंह के नाव के आघू मा सत्य जुडगे, ये परंपरा ला उँखर पुरखा मन तइहा जमाना ले चलाय रीहिन, उँखर कहना रीहिस कि राजा ला गियानी अउ पराकरमी होये के संग सत्यवान होना जरूरी हे, अइसे भी सत्य अजेय अमर हे, ये गोठ ला सबो झन तइहा ले मानत हे, अउ वोमन सत्य ला अपन कुलदेवँता घलो माने। उहाँ के मानता रीहिस कि सत्य के रहत ले ना कोनों बिपत आये ना कोनों ये राज्य ला जीत सके। त इही सोच के संग राजा के नाव मा सत्य जोडे के परंपरा रीहिस, अउ येखर असर मा ओखर राज्य म लोगन हाँसी खुसी ले रहय।
राजा हा अपन मंत्रीमंडल मा सबले ज्यादा मंत्री संतोष ला पसंद करे। संतोष के रहत ले राज्य मा कोनों ल काहीं अड़चन नइ होवत रीहिस, छोटे-बडे सबो बिपत ला वोहा अपन सूझबूझ ले संभाल डरे। निच्चट सिधवा संतोष दूसर के गोठ अउ उपकार माने बर कभू पाछू नइ रहय, अउ अपन मानगुन कभू नइ खोजय, ओखर रेहेच ले कतको अकन झगरा बिपत टल जाये। वोला कतको झन डरपोकना घलो समझे, फेर ओखर गुन ला राजा जाने तभे तो वोहा वोला अपन अंतस मा घलो जगा दे रीहिस।




अब संतोष के सूझबूझ अउ राजा के मिहनत पराकरम के सेती राज्य के यस-जस हा चारो कोती बगरगे, राज्य के मनखे मन सबो बेरा खुस रहय, धन दौलत कुठार कोठी घलो उन्ना दुन्ना होय लागिस, अउ बिपत म परे मनखे ल पंदोली देके लोगनेच मन हा बिपत ले उबार डरे, अइसन म राज्य के नकसान थोरको नइ होवय, अउ राज्य के जनता के पोठ होय ले राज्य घलो पोठ्ठावन लागिस।
फेर अउ आने राज्य मा संतोष असन मंत्री नइ राहय, अउ ओमन सतराज असन खुस नइ रहे सकय। त दुनिया भर के सबो राज्य मा सतराज अतका सुखी कइसे हे कइके कारन के खोज भीतरे-भीतर करे लागिस। त जलनराज के राजा पापचंद हा सोचथे, कि मेहा सतराज ला हरा के अपन राज्य मा सँघेर लुहूँ, त मोरो राज्य सतराज असन सुखी हो जही। इही सोच के वोहा इरखा बैर अउ लालच ल सतराज के कमजोरी पता करके भीतरघात अउ छल ले जीत पाये खातिर उदीम करे बर कथे, काबर कि वोहा जानत रथे कि सत्य अउ संतोष के रहत ले, सोज जुद्ध करके जीतना संभव नइये।
राजा पापचंद के आदेस पाके इरखा बैर अउ लालच हा जुगत लगाथे, फेर सत्य अउ संतोष के रहत ले उँखर एको उदीम काट नइ करे, त ओमन ताक म रथे, कि कभू तो मउका मिलही ओतकी बेरा सेंध लगा के खूसर जबो।
अउ ये डहर ये सब सडयंत्र ले अनजान, राजा सत्यबीर सिंह डोकरा होवत रथे, अउ बेरा बदले के संगे-संग ओखर बेटा नवयुग हा बाढ़त जथे, नवयुग के तेवर अउ काम-काज, बोलचाल सबो हा राजपरिवार के आने मनखे मन ले अलग ढंग के लागय, फेर जम्मों झन सोचथे कि राजा के लइका त कुछू नवा ढंग के कारज ले राजपाठ अउ दिन दुनिया ला देखही, इही सोचके मनखे मन नवयुग के वाहवाही करे।
धीरे-धीरे नवयुग के बूता हा अउ अलकरहा होय लागथे, फेर जम्मों झन वोला नवा संस्कृति अउ परंपरा के नाव ले अपना लेथे। अउ नवयुग हा जम्मों मनखे, मंत्री, अउ परंपरा ले बड़का माने जाथे, अब राजा सत्यबीर सिंह ला अथक होवत देख के नवयुग ला पूरा बाढ़े के पहिलीच राजा अउ मंत्रीमंडल हा सतराज के राजकुमार बना देथे।
त नवयुग हा अब मेहा राजकुमार बनगेंव, मिही भावी राजा हरँव कइके अपन मनमानी करे लागथे, अउ एक घँव राजा कर दूसर राज्य मा घूमे बर जाये के अनुमति माँग डरथे, राजा हा खतरा भाँप के, वोला संतोष संग जाये के सरत मा अनुमति दे देथे। अब नवयुग हा राज्य ले तो संतोष संग निकलथे, फेर वोला डोकरा संतोष संग घूमे मा लाज लागथे, त वोहा संतोष ला आने बूता मा अरझा के धोखा देके अपन अकेल्ला घूमे बर भाग जथे, अउ इही बेरा के ताक मा तो इरखा बैर अउ लालच बइठे रथे, नवयुग ला अकेल्ला पाके वोमन तिर मा ओधियाथे, अउ मीठ-मीठ गोठिया के मितानी कर डरथे, नवयुग हा झट ले उँखर परभाव मा आ जथे, अउ जब नवयुग हा लहुटथे त अपन रथ मा बइठार के वो तीनों झन ला राज्य मा ले आनथे।
संतोष नवयुग के पहिलीच राज्य मा लहुट जाये रथे, अउ राजा ला सबो बात ला बता डारे रथे, फेर जब नवयुग आथे त राजा वोला बेटा हरे कइके कुछू नइ कही सके। अउ नवयुग हा इरखा बैर लालच ला अपन राज्य मा किंजरे के अनुमति घलो दे देथे, अब ये तीनों झन लोगन संग कउखन मितानी कर लेथे, अउ संतोष के बिरोध मा मनखे मन ला उकसा देथे, अउ नवयुग ला राजा बने के लालच देके, राजा ला धीरे-धीरे चारी-चुगली अउ छल-कपट के जहर दे बर कथे, ये जहर के सेवन ले राजा सत्यबीर हा धीरे-धीरे दुबराके मर जथे।




राजा मरथे ताहन नवयुग हा राजा बनथे, फेर इरखा बैर लालच के केहे मा अपन नाव के आघू मा सत्य नइ लिखे। तब बेरा ला अपन पाले मा जान के पापचंद हा नवयुग ला कथे ते मोर अधिनता मान ले, नइते राज्य मा हमला करके मेहा सबला हथिया लुहूँ, अब नवयुग हा अपन हाथ मा तो काहीं बनाये नइ रहय ! पुरखा के बनाये धन अउ नाव ला दूसर के गोड़ मा राखे बर चिटिक बिचार नइ करे, अउ झटले वोला मितान बना लेथे।
तब पापचंद अउ नवयुग हा मिलके ये समिलहा राज्य के नाम कलयुग राख देथे, अउ अपन राज्य के राजा तो नवयुग ही रथे, फेर इरखा बैर अउ लालच ला उहाँ के मंत्री बना के बइठार देथे। नवयुग हा पहिली ले वोमन ल मितान समझे त वोहा ये बात मा कोनों बिरोध नइ करे।
अब नवयुग के राजतिलक के दिन आथे त वोहा अपन कुलदेवँता सत्य के मुर्ति करा जाथे त वोला वोखर ठऊर मा नइ पाये, ताहन अपन पूर्व मंत्री संतोष ला खोजवाथे त वहू नइ मिले। त वोहा धरम डोकरा ल वोखर मन के बारे मा पूछथे, त धरम डोकरा अब्बड़ हाँसथे अउ कथे- सत्य अउ संतोष इँहा रतिस त ये पापचंद, इरखा, बैर, लालच मन इँहा कभू नइ आतिन। अउ अब महूँ जावत हँव काबर कि जिहाँ सत्य अउ संतोष रही उँहें महूँ रइहूँ, उँखर बिना इहाँ मोर दम घूटथे।
नवयुग थोकन मुडी ला गडियाथे फेर वोला ज्यादा फरक नइ पड़े, वोहा सोचथे कि ले येमन चल दिस त का होगे हमर करा खुसी तो हवय, फेर एक झन सैनिक हा नवयुग के कान मा आके बताथे, कि सत्य संतोष अउ धरम के संग मा खुसी घलो राज्य छोड़ के चलदिस, त नवयुग हड़बडा जथे, अउ वोहा पहिली ले ज्यादा सुंदर नकली खुसी ल बुलवाथे, अउ सत्य, संतोष, धरम के मुखौटा बनवा के जनता ला ठगे लागथे। अउ उही नकली खुसी अउ मुखौटा के फेर मा लोगन आज ले ठगावत हे।

ललित साहू “जख्मी” छुरा
जिला-गरियाबंद (छ.ग.)



व्‍यंग्‍य : चुनाव के बेरा आवत हे

अवईया समे मा चुनाव होवईया हे, त राजनीतिक दाँव-पेंच अउ चुनाव के जम्मों डहर गोठ-बात अभी ले घुसमुस-घुसमुस चालू होगे हे। अउ होही काबर नही, हर बखत चुनाव हा परे-डरे मनखे ला हीरो बना देथे अउ जबर साख-धाख वाला मनखे ला भुइयाँ मा पटक देखे। फेर कतको नेता हा बर रुख सरीख अपन जर ला लमा के कई पीढ़ी ले एके जगा ठाड़े हे। अउ कतको छुटभईया नेता मन पेपर मा फोटू छपवा-छपवा के बड़े नेता बने के उदीम करथे। फेर चुनाव हा लोकतंत्र के अइसन तिहार आय जेमा लोगन ला जम्मों नेता मन के हार अउ जीत तय करे अधिकार मिले रथे। ये हार-जीत ले नेता मन के जिनगी घलो बदल जथे, कोनो लबरा अपराधी किसम के मनखे चुनाव मा जीत जथे त ओखर जम्मों करनी ढँका जथे। त कतको भला मनखे राजनीति मा आके बिगड़ जथे, या ओमन हा अपन असली रंग चुनाव जीत के बादे मा देखावत होही। अब कान ला कोनो डाहर ले धर, धराही तो कानेच हा। केहे के मतलब नेता मन के कोनो बूता ले आम जनता के भला होगे अइसन बहुते कम देखे बर मिलथे, अउ देखे बर मिलही तहू हा सुवारथ के सेतन आय। हाँ पाँच बछर मा सारा संगवारी अउ परवार वाला मन भले पोट्ठा जथे।
चुनाव मा अपन रुपिया-पईसा मिहनत अउ सरबस ला दाँव में लगा के नेता मन अपन भाग ला जागही के बुड़ही कइके अगोरा मा डर्रावत रइथे। ते पाय के जम्मों दल अउ नेता मन, लोगन ला रिझाय के उदीम घलो करथे। कोनो हा जगा-जगा जाके नइते पोंगा बाँध के अभीच ले चिचयावत हे, त कोनो हा लोगन तिर मा जाके लुड़हारत हवय। अब जनता के बीच मा घलो गोठ बात होना अचरज के बात नो हे।
अइसने एक दिन बड़ झन मंधवा मन पी-खा के चाउँरा मा बइठ के गपियावत राहय, कइसे रे ये बछर ते कोन ला वोट देबे, त दूसर मंदू हा बड़ जानकार बनके कहिस, कोनो नेता जीते सबेच हा जीते के बाद अपने भला करथे, जनता बर तो कोनो सोचें तक नही, तेखर ले जेहा मोला ज्यादा पियाही अउ पईसा दिही तिही ला वोट दूंहूँ। त अउ बइठे रीहिन ते मन किहिन, जब तोला कोनो मन नइ आवत हे त तेहा नोटा ला काबर नइ चपकस। त वोहा फेर कथे, नोटा मा चपके ले का होही, फेर चुनाव होही, ताहन फेर कोनो ना कोनो नेता चुनाव लड़े बर आही, तेखर ले अपन भला ला देखबो जी। त जम्मों मनखे फेर दूसर ला पूछिन ते कोन ला वोट देबे जी। त येहा तो पहिली वाला ले ज्यादा समझदार निकलिस येहा कथे, अरे चुनाव के बेर एक घँव पियाही त कतका ल पी डरबे, ताहन पाँच बछर ले तो अपनेच पईसा मा पीये बर परही। तेखर ले मेहा अइसन नेता ला वोट दूहूँ, जेहा दारू के किमत ला कम करवा सके, अउ पाँच बछर ले ओखर नाव लेके दारू के किमत मा छूट (डिस्कांउट) मिल सके। त तिसर मनखे तुरते चिचयाथे, अउ कुकरा बोकरा कहाँ ले आही रे.., त अउ बइठे मनखे मन कथे, अभी चुनाव बर कोनो नेता हा कुकरा बोकरा दिही तेला खावन नही बलुक पोसे रइबो अउ ओमन पीला फोरही तेला पाँच बछर ले खावत रहिबो।
अब मंधवा मन के गोठ-बात हा बढ़ जथे, अउ झगरा होय ला धरथे, त ओतकी बेरा एक झन सियान ओ करा ले नाहकत रथे, वोहा ओमन ला देख के पूछथे का होगे तुमन झगरा काबर होवत हो, त वोमन सब गोठ बात ल बताथे अउ वो सियान ला पुछथे कइसे गा ते कोन नेता ला वोट देबे। सियान संसो करे सरीख लंबा साँस लेथे अउ कथे, जेन नेता हा देस-समाज के भला करही, जात-पात के नाव ले लड़ाये के बूता नइ करही, जनता ल बरोबर आँखी मा देखही, बिकास के काज ला बिना भ्रष्टाचार के करही, जम्मों जीव के मान-सम्मान अउ जतन करही, जुआँ-सट्टा अउ तस्करी ला रोकही, संस्कृति परंपरा अउ धरोहर मन ला सहेजही, लूट खसोट अउ लालच ले दूरिहा रही, जेखर आदत बेवहार बने रही अउ अपराध ले दूरिहा रही, तइसनेच नेता ल मेहा अपन वोट दूहूं। त जम्मों झन खलखला के हाँस डरिन, अउ कथे कइसे गा सियान तेहा जागत मा सपना देखथस का जी, नेता मन तो जम्मों झन, ते काहत हस तइसनेच गोठियाथे, फेर कभू कोनो नेता ला सिरतोन मा अइसन करत देखे हस का। अइसन सपना तो देस के जम्मों मनखे देखथे अउ सही में नेता मन अइसन हो जतिस ता देस मा अउ फिकरे का बात के रहितिस।

ललित साहू “जख्मी” छुरा
जिला-गरियाबंद (छ.ग.)

हमर खान-पान मा नून-मिरचा

मिरचा कहिबे ताहन सुनईया अउ कहईया दूनो के मुहु चुरपुराय अउ आँखी झरझराय सरीख लागथे, फेर उही मिरचा ला हमर खान-पान ले अलगाय के सोचेच भर ले हमर मुहु के सुवाद सबर दिन बर सिराये सरीख घलो लागथे। नून अउ मिरचा बिन काहिंच नइ सुहावय। ये दूनो ला हमन कब ले बउरत हन तेखर परमान घलो जल्दी नइ मिल सकय। फेर बेरा बदले के संग जम्मों जिनिस असन यहू मन ला बउरे के तरीका मा फरक आय हे।
अइसे तो पहिलीच ले मिरचा कई किसम के रीहिस। फेर अब शंकरण विधी ले मिरचा के नवा-नवा किसम उपजाये जावत हे, वइसने नून बनाय बर कतको कंपनी आघू आय हे, जेमन चिक्कन, गड़ा अपन-अपन हिसाब ले नून बनावत हे। फेर कोई काहीं करले नून अउ मिरचा के असली गुन तो उहीच रही, नून खारा अउ मिरचा चुरपुर। हरियर देशी मिरचा खान-पान के सबो चीज मा सबले ज्यादा बउरे जाथे। फोंगला मिरचा ला मिरचा भजिया अउ अम्मट मा फिजो के सुखो के तेल मा तल के खाय मा बउरे जावत हे। लाल मिरचा के भूरका ला बर-बिहाव माँदी मा घलो परोसे जाथे। धान मिरचा, गोंटी मिरचा (काली मिर्च), मन हा मसाला अउ औषधि बर घलो बउरे जाथे। अइसने नून मा करिया नून, सेंधा नून मन ला औषधि बर बउरे जाथे, अउ गड़ा नून ला गाय गरु के पानी मा घोर के पियाये जाथे।




नून मा आयोडिन अउ सोडियम रथे जेहा हमर सरीर मा बरोबर रहना जरूरी हे, अउ हिरदे रोग वाला मन बर तो नून ना कम ना ज्यादा बरोबर होना घात जरूरीच हे। नून मिरचा ला मनखे मन नजर उतारना, फूंक-झाड़ असन बूता बर घलो बउरथे, लइका रोवत रथे ता मिरचा ला आगी मा डार देथे, नइते नून ला हाथ मा धर के सात घँव नजर उतार के नून ला पानी मा डार देथे, ये टोटका कतका काम करथे तेला उही मन जाने, फेर नून मिरचा ला जेहा बिन गुने ताने अड़बड़ अकन खा पारही तेखर भूत तो तुरते उतर जही। अइसे तो वैज्ञानिक मन मिरचा के झरझराहट बर कथे कि ये सिरिफ हमर इंदरी मन के भोरहा आय, फेर बात चाहे जौन हो, हमन ला जइसे लागथे व इसनेच तो समझबो।




आजकल के मनखे मन शिमला मिरचा के अंग्रेजी नाव ला धरके चिल्ली कहिके पनीर अउ कुकरा संग मिंझार के पनीर चिल्ली अउ चिकन चिल्ली बना के बउरत हे, मिरचा के साग घलो रांधे जाथे, अउ अचार घलो डारे जाथे। होटल बासा मा मिरचा कई किसम ले परोसे जाथे, हरियर मिरचा नून संग सोजहे, नइते तेल में तल के नून छित के, नून अउ लिमंऊ डार के परोसे जाथे। लाल मिरचा ला घलो सोजहे, नइते पीस के, तल के नून छित के परोसे जाथे। आजकल होटल बासा अउ ठेला में आलूगुंडा, भजिया, आलू भजिया बेचईया मन हा लाल मिरचा ला सोजहे पीस के चटनी देवत हे, अउ खवईया मन ला घलो ये चटनी बड़ सुहावत हे।
अइसे तो मिरचा मा विटामिन सी अउ विटामिन बी-6 के भरमार रथे, अउ येला हमर पुरातन संस्कृति ले औषधि जान के खान-पान मा संघेरे गे हवय। फेर अब नून-मिरचा के ज्यादा बउरे मा कई किसम के बिमारी घलो होवत हे, ते पाय के तो डॉक्टर बैध मन हा तेल नून मिरचा ले परहेज करे के सलाह देवत हे। हरियर मिरचा ले ज्यादा परहेज नइ हे फेर लाल मिरचा पाउडर अउ नून ला थोरको ज्यादा बउरे ले बड़े-बड़े बिमारी सचरे के डर रइथे। अइसे तो कोनों चीज के अति बने नो हे। फेर जब गोठ मुहू के सुवाद के रथे ता मनखे काखर ला सुनथे।

ललित साहू “जख्मी”
छुरा, जिला-गरियाबंद (छ.ग.)
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कहानी : सेमी कस बँटागे मनखे

रामपुर नाव के एक ठन सुग्घर गाँव रीहिस, जिहाँ के सब मनखे सुनता सलाह अउ संगी मितानी, छोट-बड़े ला मान देवईया रीहिन, सिरतोन मा रामपुर मा रामराज हावय सरीख लागे। उहाँ के मुखिया रामदास घलो सबके हित सोचईया रीहिस, पूरा गाँव ला वोहा एके घर बरोबर समझे अउ जनता ला अपन लोग लइका बरोबर मया दुलार करे। फेर नवा युग नवा चरित्तर अउ फोन टीवी के प्रकोप ले कोन बाँचे हे?
एक घँव खाल्हे पारा वाला मनके बीचपारा वाला मन संग झगरा मातगे, झगरा के आगी एकट्ठा नइ बरीस, थोकन गोठ बात होके झगरा थिरागे, फेर सबके मन मा बैर हा थोक-थोक करके सिपचत-सिपचत भीतरे भीतर बगरत रीहिस, मुखिया रामदास ला ये सब बात के खबर रीहिस, फेर झगरा के बात आघू नइ आवत रीहिस ता वहू निपटारा नइ कर सकत रीहिस, अउ वोला कुछू उपाय घलो नइ सुझत रीहिस, वोहा झगरा के जर के पता लगाय के जतन करीस फेर सही बात के पता नइ चल पइस, बस अतकि थाहा लगिस कि शहर ले एक झन सकेलु नाव के मनखे पढ़लिख के आय हे, सकेलु के करम नाव ले बिपरीत हे वोहा सबला टोरवायच के बूता करथे। वोहा नेता अधिकारी मनले अपन पहुँच बताके लोगन ला बरगलावत रहिथे वोहा गाँव मा जमीन बेपार अउ राजपाठ के लालच मा हवय, जात धरम के नाव लेके उही सबला भड़काये हे। मोबाइल मा पेपर मा आने-आने जगा के दंगा झगरा अउ घटना किस्सा ला देखा के अउ कान भर के, जुआँ नशा के लत लगाके गाँव के सिधवा मनखे मन ला फाँसे हे।
मुखिया झगरा के जर सकेलु ले मिलिस अउ वोला अइसन सब करे बर मना करिस फेर मुखिया के ओखर ले मिलत ले देरी होगे रीहिस, वोला गाँव मा आय अब बछर भर होगे रीहिस वोखर संग देवईया गाँव के भोला सिधवा लोगन मन आघू आ गिन अउ मुखिया के आघू मूँड़ी निहार के रेंगईया मन घलो तमक के मुखिया ला चूप करा दिन, सकेलु घलो सिधवा बनके कही दिस मेहा कुछू गलत नइ करे हँव, बाहिर के गोठ-बात अउ सही गलत ला बताय मा का परहेज हे।



मुखिया कुछू नइ कही सकिस अउ घर आके गुनत बइठे रीहिस, ता वोहा अपन मन बहलाय बर अपन नातिन संग खेलत रीहिस अउ वोखर बहु हा साग रोटी ला लान के किहीस बाबू आज नोनी ला तिही खवा दे, तीन बछर के नोनी अड़बड़ गोठू रीहिस, एक ठन गोठ ला घेरी बेरी पूछय, वो दिन सेमी साग अउ रोटी बने राहय, ता ओखर नातिन खावत बेरा कइथे बबा ये साग हरे, रामदास कइथे ये सेमी साग हरे, ता लइका कइथे सेमी साग ये ता सेमी कहाँ हे, रामदास फोकला ला धरके कइथे, इही तो सेमी ये, नोनी फेर कइथे ये तो फोकला ये, सेमी कहाँ हे, रामदास सोचथे कि लइका ला ठग लेहूँ, ता वोहा बीजा ला देखाके सेमी हरे कही देथे, फेर लइका नइ माने वोहा कइथे येहा तो बीजा हरे, सेमी कहाँ हे, ता रामदास सोच में पड़ जथे अउ वोहा अड़बड़ सोच के फोकला के दूनो भाग ला धरके ओखर बीच मा बीजा राखके कइथे, ये हरे सेमी, ये पइत लइका मान जथे अउ खुश होके साग रोटी खाथे। लइका संग ये गोठ बात ले रामदास घलो खुश हो जथे।
अउ ओती झगरा के आगी पूरा गाँव मा बगर गे रहिथे, गाँव के आठ पारा जे कभू एक होके राहय अब दू भाग मा खँड़ागे, अउ एक दिन तो छोटकन रैली में पथरा फेंके के घटना ले जम्मों झन मारकाट मा उतारु हो जथे। झगरा के खबर मुखिया रामदास करा पहुँचथे ता वोला घर ले निकले के बेरा नोनी के गोठ सुरता आ जथे ता वोहा घरले अपन खिसा मा सेमी धर के जाथे। झगरा करईया मन मुखिया ला देख के थोकन थिराथे, ता मुखिया जम्मों झन ला बइठे बर कथे, लोगन मन दू भाग मा अलग-अलग बइठथे, एक डहर आने जात धरम के मन हा अउ दूसर डहर आने जात धरम के मन हा, मुखिया पारी-पारी पुछथे तुमन कोन हरो, ता दूनो खेमा के मनहा अपन परिचय अपन-अपन धरम के नाव बता के देथे। अब मुखिया अपन खिसा ले सेमी निकालथे अउ वोला फलिया के फोकला ला एक डहर अउ बीजा ला दूसर डहर देथे, अउ पूछथे तुमन का धरे हो, ता दूनो डहर के मन कइथे सेमी धरे हन, मुखिया हाँसथे अउ कथे सेमी कहाँ हे, एक डहर कइथे तुमन तो फोकला धरे हो, अउ एक डहर कइथे तुमन तो बीजा धरे हो, अब बताओ सेमी कहाँ हे, दूनो डहर के मध मूँड़ी ला गड़िया देथे। ता मुखिया फोकला अउ बीजा ला माँग के जूरिया के देखाथे येला कइथे सेमी।



जइसे सेमी फोरियाय के बाद अपन मूल स्वरूप ला खो देथे, वइसने तहू मन आने-आने जात धरम के हरन कइके अपन परिचय देवत हव, ता में पूछथँव कि जेला भगवान सिरजा के ये भुइयाँ मा भेजे रीहिस वो मनखे कहाँ हे। तुमन सब फोकला अउ बीजा मा बँट गेव अउ ये शहरी सकेलु राम हा अपन मतलब साधे बर तुमन ला टोर के साग राँधत हे मतलब झगरा करवावत हे। ये बैरी मन राजपाठ अउ धन दौलत के लालच मा खुद रइके सबला ये लालच देवत रहिथे। दूसर के झाँसा अउ गोठ बात मा आय के पहिली कभू ये सोचे हव कि हमन ला भगवान का करे बर भुइयाँ मा उतारे हे, अउ हमर जिनगी के सिरतोन मरम अउ काज का हरे, अतका दिन ले सुमत अउ एका मा गाँव आघू बढ़त रीहिस तेला तुमन छिन भर मा कइसे बिसरा डरेव। मुखिया रामदास के गोठ ला सब समझ के वो शहरी कपटी मनखे सकेलु ला गाँव ले निकाल देथे, अउ झगरा ला छोड़ के एक हो जथे, फेर टूटे रस्सी ला जोड़बे ता गाँठ दिखी जथे, सिरतोन कबे ता सबके भलाई इही मा हे कि रस्सी टूटे के गोठे झन होय।

ललित साहू “जख्मी” छुरा
जिला-गरियाबंद (छ.ग.)

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उछाह के परब गणतंत्र दिवस

26 जनवरी के दिन हा हमर बर राष्ट्रीय तिहार आय, अउ हमन जम्मों झन ये उछाह के परब गणतंत्र दिवस ला मिलके मनाथन। ये दिन ला हमन अपन संविधान के स्थापना दिवस के रूप मा घलो जानथन। फेर संविधान के सिरतो मा सम्मान करे बर येखर महत्ता ला जानना घलो जरूरी हे। गणतंत्र बर कहे गे हवय “मनखे के, मनखे बर, मनखे ले”। हमर इही बिचार ल संविधान के रुप म संजोय गे हवय। हमर दू सौ बछर के अंग्रेजी गुलामी ले 15 अगस्त 1947 के दिन आजादी मिलिस फेर एखर ले पहिलीच ले हमर देस ला सुग्घर चलाये बर उपाय सोचे जावत रीहिस, येखर बर जम्मों नेता, आजादी के महानायक, समाज सेवक मन मिलके दू बछर गियारह महिना अउ अठारह दिन मा पोठ मिहनत करके ‘संविधान’ के रचना करिन। डॉ. भीमराव अंबेडकर ला भारतीय संविधान के जनक कहे जाथे।




26 जनवरी सन 1950 के दिन हमर आजाद संविधान ला लागू करे गिस। ये दिन हा हमर बर बड़ मायने राखथे, काबर कि आजादी के संगे संग यहू हा देस ला सहेजे अउ आघू बढ़ाय बर बड़ जरूरी बूता रिहिस। संविधान हा देस के सबले बड़े कानून हरे, येहा विधाईका, कार्यपालिका अउ न्यायपालिका ला चलाथे, अउ तानाशाह होय ले घलो रोकथे। गणतंत्र के मायने जानना घलो जरूरी हे, मोर ढंग ले येखर बियाख्या- गण+तंत्र, गण माने जनता अउ तंत्र माने मसीन, जनता ल चलाना, माने सुग्घर संजोना, आघू बढ़ाना, दूसर पईत गुलाम होय ले बचाना, कानून कायदा के पालन करवाना, भेद-भाव ल मेटाना, मान सम्मान, बरोबरी के हक देना अइसन जम्मों बुता बर संविधान बनाय गे हवय, माने नियाव करे बर नियम तय करे गे हे, तेला लिपिबद्ध करे गे हवय, जेमा 444 अनुच्छेद अउ 12 अनुसूची हवय। सबले पहिली 395 अनुच्छेद 22 भाग अउ 8 अनुसुची रिहिस, येमा 96 घँव सुधार घलो करे गे हवय। येखरे आधार मा देस ला चलाये जाथे। शासन करे के कई ठन तरीका म गणतंत्र ला जम्मों ले ऊंच माने जाथे। हमर देस मा गणतंत्र विधि ला अपना के संविधान बनाये गे हवय। सरकार, नेता, मनखे अउ देस के जम्मों बूता हा येखर दायरा ले बाहिर नइ जा सके, जम्मों मनखे के एके बिचार राहय यहू जरूरी नइये। ते पाय के सबो ल सोंच के अइसन गणतंत्र बनाये गे हवय। हमर संविधान म कोई राजा कोई प्रजा नइ होवय इहाँ तो सरकार हा बूता करईया अउ जनता हा मालिक होथे। अउ ये जम्मों बूता के नियम हा मसीन असन एक दूसरा ले जुड़ के अपन बूता करथे। जनता हा वोट के माध्यम ले अपन पसंद के मनखे ल चुन के देस के बूता करे बर पद म बइठारथे, आने-आने पद बर आने-आने ढंग ले चुनाव करे जाथेे। ताहन पद म बइठे मनखे हा अपन जिम्मेदारी ला समझ के देस अउ समाज बर बूता करथे, ये ढंग ले मसीन (गणतंत्र) हा बने चलत रइथे त देस हा बिकास करथे अउ दूसर देस हा कबजाय के नइ सोचय। मेहा हा गणतंत्र ला मसीन ये पाय के कहे हँव काबर कि मसीन के जम्मों पुरजा के एक संग बूता करना जरूरी हे, नइ ते मसीन बिगड़ जही अउ कहीं काम के नइ राहय। हमर गणतंत्र घलो अइसने हावय जम्मों ल अपन जिम्मेदारी ल निभाये ला परही कोनहो एक पुरजा हा बुता नइ करही त हमर देस के दसा बिगड़ जही।




नेता अफसर अउ हमन सब अपन घर-परवार, अपन कमई ला पहिली देखथन, लबरा हो चाहे सजा काटे मनखे हमन अपन मतलब साधे बर बिना सोचे पद मा बइठार देथन, इही करा ले हमर गणतंत्र के बिमारी चालू हो जथे, लालच, सुवारथ इरखा असन रोग हमाय ले काहीं नइ बाँचे। ये गणतंत्र हमर ताकत आय, अभिमान आय, गुमान आय अउ हमन येखर महत्तम ला नइ जान सकत हन। जम्मों झन अपन-अपन जिम्मेदारी ले भागथन त कोनेच हा बूता ला बने करही। दुनिया भर में हमर देस के संविधान ला सबले रोंठ अउ कोंवर कहे जाथे। फेर हमर लालच हा कोंवर संविधान के फायदा उठा के हमर गणतंत्र के सिद्धांत ल चरपट करत हे। ये गणतंत्र दिवस के बेरा म हमन अपन अंतस ले जिम्मेदारी ला समझे अउ निभाय के किरिया खाबो तभे देस अउ संविधान के सिरतो मा सम्मान होही।

ललित साहू “जख्मी”
छुरा जिला-गरियाबंद (छ.ग.)
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नवा बछर के शुरुआत : कहानी

स्कूल के लइका मन गोठियावत रइथे कि ये पइत नवा बछर के शुरुआत कोन ढ़ंग ले करबो, त जम्मों झन अपन-अपन योजना अउ संगे संग पऊर नवा बछर के सुवागत कइसे करे रीहिन वहू ला सुरता करत राहय, एक झन कइथे हमन तो परवार भर के जम्मों झन जुरिया के दर्शन करे बर अउ पिकनिक मनाय बर जावत हन, पऊर घलो अइसने भोरमदेव गे रेहेन, बड़ मजा आय रीहिस फेर आवत-जावत ले छोटी हा उछर डरिस अउ डोकरी दाई हा बीमार परिस तेहा पाख भर मा चेत पइस।
अइसने दूसर लइका गोठियाथे हमन तो कई बछर जंगल बांधा नइते झरना तिर मा जाके पिकनिक मना के आथन दूरिहा जाये ले बढ़िया तिर मा मजा ले लेथन फेर ददा अउ कका उपराहा ढरका देथे, त मजा के सत्यानास हो जथे। फेर एक झन कइथे हम तो अपन बड़े भाई मन संग मोटर साइकिल मा घूमे ला जाथन अउ बड़ मजा लेथन एक घँव कट मारत खानी उलँड़ गे रेहेन फेर घर मा नइ बतायेन, एक झन कइथे हमन तो मंदिर जाथन, कोई कइथे हमन तो पारा में डीजे लगा के नाचथन, कोनों केक काटे के गोठ गोठियाथे त कोनों अउ कुछू, त ये सब ला एक झन राजू नाव के लइका हा कलेचुप सुनत रइथे। आखिर मा जम्मों झन वहू ला पूछथे ते काय करथस अउ ये बछर का करबे। त वोहा काही नइ काहय अउ उदास होके उठ जथे।



अब नवा बछर आथे जम्मों झन अपन-अपन योजना के हिसाब ले घूम-फिर के मजा करके लहुट जथे। जम्मों झन हाँसत गोठियावत रइथे। स्कूल मा गुरुजी पूछथे कोन-कोन का-का करेव थोकन बतावव तो जी। त लइका मन खुशी के मारे अपन पिकनिक, घूमई, केक मिठई खवई नचई-कुदई सबला गोठियाथे, कई झन छकत ले कुकरी-बोकरा खाके घलो आय रइथे, कोनों जुँआ, ताश अउ फिलीम टाकिज के मजा बताथे त कोनों हा वो बेरा मा भोगे पीरा अउ अड़चन ला बताथे।
ताहन राजू के बारी आथे त वोहा कइथे मेहा कहूँ नइ गे रेहेंव अउ नाचे कुदे घलो नइ हँव। त राजू कइथे मेहा नवा बछर के शुरुआतेच ला सुग्घर ढंग ले करे हँव। गुरुजी के फेर पूछे मा राजू कइथे मेहा जम्मों झन असन हर बछर अपन ददा संग मोटर साइकिल मा घूमे ला जावत रेहेंव फेर दू बछर पहिली हमन एक ठन सरपट दउँड़त बस के चपेट मा आ गेन मेहा तो बाँच गेव फेर मोर ददा के जीव नवा बछर के दिन चल दिस। ते पाय के पऊर के नवा बछर ला घर में रो-रो के बिताए रेहेंव। मोर दाई हा अब मोला पोसत हे, त ये पइत मेहा बिहनिया ले उठ के ओखर पाँव परके नहा धोके भगवान के पूजा पाठ दाई संग करेंव। ताहन मोला पड़ोस के डोकरी दाई के सुरता अइस मेहा ओखर पाँव परे ला गेंव त रद्दा मा चार पाँच झन गरीब लइका मन झगरा होवत दिख गे, त मेहा झगरा ला छोड़वा के अपन जेब खरचा बर मिले रीहिस ते पईसा के गोली बिस्कुट खवा देंव त वोमन खुश होगे। फेर डोकरी दाई करा पहुंचेव त वोहा जर बुखार मा तिपत राहय त वोला अस्पताल लेगेंव, वोहा मोला आवत-जावत भर ले हजारों घँव आशीर्वाद दिस होही। फेर थोकन बेरा मा दाई मोला दुकान भेजिस त मेहा देखेंव जम्मों झन काही खाके रद्दा मा फेंकत हे, अइसे तो ये ऊखर मन रोज के बूता रीहिस अउ आज तो कचरा बगराय मा ओमन अतिच कर डारे रीहिन, फेर मेहा आज नवा बछर मा नवा शुरुआत करे के सोचेंव, अउ कचरा झिल्ली मन ला बिन-बिन के डब्बा मा डारेंव। रद्दा तिर मा रखाये डब्बा ननची रीहिस अउ टूटहा रीहिस त कचरा ला लेग के मोला दूरिहा मा फेंकना पड़िस। मोर मिहनत ला देख के दुकानदार हा मोला पईसा देवत रीहिस त मे केहेंव येखरे तेहा कचरा डब्बा लान देते त कचरा नइ होतिस, त वोहा बड़े नवा कचरा ड़ब्बा लाने के वादा करे हे। ताहन मेहा घर जावत-जावत देखेंव एक झन अंधरा डोकरा हा रद्दा नइ नाहक सकत हे त वोला रद्दा नहका देंव, त वो कहिस कि येखर छाँव दार रुख रतिस अउ ओखर तरी मा चँवरा त मोर बाँचे दिन हा इही कर बइठ के कट जतिस, वो करा एक ठन पहिली छोट कन झाड़ रीहिस ते हा मर गे रीहिस त वोला देख के मोरो भेजा मा अइस कि सिरतोन मा जेन होगे ते होगे, फेर अब सबला भूला के नवा शुरुआत करे के दिन आहे। अउ रुख रेहे ले छाँव मिलही, भुइँया मा पानी पहुंचही, अवईया-जवईया मन बर बने हो जही। त मेहा वो ठऊर के मनखे मन ला पुछ के, अपन साइकिल मा नर्सरी जाके दू ठन पेड़ लान के लगाय हँव। अउ अब वोला ददा के चिन्हा समझ के बढोय के जतन करत हँव।



अतका सबला दाई हा जानिस ताहन अड़बड़ खुश होके आशीर्वाद दिस, अउ जम्मों झन मोला मया करीन, अउ महू हा मया पाके गदगद होगेंव। सिरतोन मा दूसर ला खुशी दे के आनंद अलग होथे। गुरुजी घलो राजू के गोठ ला सुन के किहीस कि सबले सुग्घर नवा बछर के शुरुआत तो राजू करे हवय। चलो राजू ले सिख लेके हमू मन पर्यावरण ला सहेज के जीव हत्या अउ जुँआ नशा ला छोड़ के अपन तिर तिखार के मनखे ला खुशी देके नवा बछर के शुरुआत करबो।

ललित साहू “जख्मी”
छुरा, जिला – गरियाबंद (छ.ग.)
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चुनाव के बेरा आवत हे

अवईया बछर मा चुनाव होवईया हे, त राजनीतिक दाँव-पेच अउ चुनाव के जम्मों डहर गोठ-बात अभी ले चालू होगे हे। अउ होही काबर नही, हर बखत चुनाव हा परे-डरे मनखे ला हीरो बना देथे अउ जबर साख-धाख वाला मनखे ला भुइयाँ मा पटक देखे। फेर कतको नेता हा बर रुख सरीख अपन जर ला लमा के कई पीढ़ी ले एके जगा ठाड़े हे। अउ कतको छुटभईया नेता मन पेपर मा फोटू छपवा-छपवा के बड़े नेता बने के उदीम करथे। फेर चुनाव हा लोकतंत्र के अइसन तिहार आय जेमा लोगन ला जम्मों नेता मन के हार अउ जीत तय करे अधिकार मिले रथे। ये हार-जीत ले नेता मन के जिनगी घलो बदल जथे, कोनो लबरा अपराधी किसम के मनखे चुनाव मा जीत जथे त ओखर जम्मों करनी ढँका जथे। त कतको भला मनखे राजनीति मा आके बिगड़ जथे, या ओमन हा अपन असली रंग चुनाव जीत के बादे मा देखावत होही। अब कान ला कोनो डाहर ले धर, धराही तो कानेच हा। केहे के मतलब नेता मन के कोनो बूता ले आम जनता के भला होगे अइसन बहुते कम देखे बर मिलथे, अउ देखे बर मिलही तहू हा सुवारथ के सेतन आय। हाँ पाँच बछर मा सारा संगवारी अउ परवार वाला मन भले पोट्ठा जथे।



अपन रुपिया-पईसा मिहनत अउ सरबस ला दाँव में लगा के नेता मन अपन भाग ला जागही के बुड़ही कइके अगोरा मा डर्रावत रइथे। ते पाय के जम्मों दल अउ नेता मन लोगन ला रिझाय के उदीम घलो करत हे। कोनो हा जगा-जगा जाके नइते पोंगा बाँध के अभीच ले चिचयावत हे, त कोनो हा लोगन तिर मा जाके लुडहारत हवय। अब जनता के बीच मा घलो गोठ बात होना अचरज के बात नो हे।
अइसने एक दिन बड़ झन मंधवा मन पी-खा के चाउँरा मा बइठ के गपियावत राहय, कइसे रे ये बछर ते कोन ला वोट देबे, त वोहा बड़ जानकार बनके कहिस, कोनो नेता जीते सबेच हा जीते के बाद अपने भला करथे, जनता बर तो कोनो सोचें तक नही, तेखर ले जेहा मोला ज्यादा पियाही अउ पईसा दिही तिही ला वोट दूंहूँ। त अउ बइठे रीहिन ते मन किहिन, जब तोला कोनो मन नइ आवत हे त तेहा नोटा ला काबर नइ चपकस। त वोहा फेर कथे, नोटा मा चपके ले का होही, फेर चुनाव होही, ताहन फेर कोनो ना कोनो नेता चुनई लड़े बर आही, तेखर ले अपन भला ला देखबो जी। त जम्मों मनखे फेर दूसर ला पूछिन ते कोन ला वोट देबे जी। त येहा तो पहिली वाला ले ज्यादा समझदार निकलिस येहा कथे, अरे चुनाव के बेर एक घँव पियाही त कतका ल पी डरबे, ताहन पाँच बछर ले तो अपनेच पईसा मा पीये बर परही। तेखर ले मेहा अइसन नेता ला वोट दूहूँ, जेहा दारू के किमत ला कम करवा सके, अउ पाँच बछर ले ओखर नाव लेके दारू के किमत मा डिस्कांउट मिल सके। त तिसर मनखे तुरते चिचयाथे, अउ कुकरा बोकरा कहाँ ले आही जी, त अउ बइठे मनखे मन कथे, अभी चुनाव बर कोनो नेता हा कुकरा बोकरा दिही तेला खावन नही बलुक पोसे रबो अउ ओमन पीला फोरही तेला पाँच बछर ले खावत रहिबो।



अब मंधवा मन के गोठ-बात हा बढ़ जथे, अउ झगरा होय ला धरथे, त ओतकी बेरा एक झन सियान ओ करा ले नाहकत रथे, वोहा ओमन ला देख के पूछथे का होगे तुमन झगरा काबर होवत हो, त वोमन सब गोठ बात ल बताथे अउ वो सियान ला पुछथे कइसे गा ते कोन नेता ला वोट देबे। सियान संसो करे सरीख लंबा साँस लेथे अउ कथे, जेन नेता हा देस-समाज के भला करही, जात-पात के नाव ले लड़ाये के बूता नइ करही, जनता ल बरोबर आँखी मा देखही, बिकास के काज ला बिना भ्रष्टाचार के करही, जम्मों जीव के मान-सम्मान अउ जतन करही, जुआँ-सट्टा अउ तस्करी ला रोकही, संस्कृति परंपरा अउ धरोहर मन ला सहेजही, लूट खसोट अउ लालच ले दूरिहा रही, जेखर आदत बेवहार बने रही अउ अपराध ले दूरिहा रही, तइसनेच नेता ल मेहा अपन वोट दूहूं। त जम्मों झन खलखला के हाँस डरिन, अउ कथे कइसे गा सियान तेहा जागत मा सपना देखथस का जी, नेता मन तो जम्मों झन ते काहत हस तइसनेच गोठियाथे, फेर कभू कोनो नेता ला सिरतोन मा अइसन करत देखे हस का। अइसन सपना तो देस के जम्मों मनखे देखथे अउ सही में नेता मन अइसन हो जतिस ता देस मा अउ फिकरे का बात के रहितिस।

ललित साहू “जख्मी”
छुरा, जिला-गरियाबंद (छ.ग.)
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बरी-बिजौरी मा लुकाय बिग्यान

हमर संस्कृति हा हजारों बछर मा थोक-थोक करके पनपे हवय, ते पाय के जम्मों चीज मा काहीं ना काहीं गूढ़ बात नइते बिग्यान लुकाय रथे, जेनहा सोजहे मा नइ समझ आवय। अब हमर खान-पान ला देख लव, कते मऊसम मा का खाना हे का बनाना हे अउ ओखर हमर तन मन धन अउ समाज मा का असर परही सबला सियान मन बड़ सोच के हमर संस्कृति ला सिरजाय रीहिन। बरी-बिजौरी बनाना, उपराहा माढ़े चीज जइसे सेमी, पताल, भांटा, आमा, के खुईला करना, चाँउर पापड़, हरदी, मिरचा मसाला ला सुखोना कुटना पिसना ये सब ला माई लोगन मन हा घरे में कर डारे, बारी बखरी के साग पान ले घर खरचा चला के ओमन हा घर के बेवस्था ला संभाल डारे। हमर खान-पान के अउ छत्तीसगढ़ी संस्कृति के चिन्हा बरी बिजौरी मा घलो बिग्यान लुकाय हे। येला दाई महतारी मन जड़ कल्ला मा बना सूखो के राखय अउ बछर भर खान-पान मा बउरे।




बरी कई किसम के बनथे, अदवरी बरी, मखना बरी, रखिया बरी, अउ नवा उदीम करईया मन तो पपीता, मुरई, नवलगोल के घलो बरी बनाथे। फेर रखिया बरी ला जम्मों जगा जानथे अउ बनाथे, येहा गजब के सुहाथे घलो। रखिया के फसल जड़कल्ला मा होथे, अब तो रखिया बिसा के लाने ला परथे, फेर पहिली बारी बखरी के रखिया लान के बरी बना डारें, अउ रखिया उपराहा राहे त पारा परोस मा घलो बाँट दँय। रखिया ला दू भाग मा फोर के ओला करोनी मा घँस-घँस के झेंझरी टूकनी मा राख के ओखर पानी ला निथारे जाथे। अउ पहिली ले फिजे उरीद दार ला सील-लोढ़ा मा एक नेत के पीसे जाथे, ताहन बड़े सरीख गंज, बर्तन मा पिसाय दार, अउ रखिया के करी ला मिंझार के फेंटे जाथे, ताहन घाम मा जाके पर्रा सूपा मा पानी छू-छू के बरी बना के छानी परवा नइते छत मा घाम पाय तइसन जगा मा सुखोय जाथे। बिजौरी बर घलो उरीद दार फिजो के पीस के बड़े सरीख गंज, बर्तन मा राखे जाथे, फेर बिजौरी मा मसाला कतका होना चाही तेला जानना घलो कला आय, सादा तील, मिरचा अदरक ला पीस के, अउ मखना के बीजा ला नून संग मा डार के कस के फेंटे जाथे, ताहन घाम मा लेग के पर्रा सूपा मा एके बानी के गोल गोल बना के सुखोय जाथे। ये सब बूता ला माई लोगन मन जड़कल्ला मा बडे फजर ले रोज थोक-थोक करके करथे। अउ सिरजाय अइसन जिनिस के सुवाद हा घलो अउ कहूँ मा नइ मिलय।




सिरतोन कबे ता येहा बड़ मिहनत के बूता आय, फेर अब येमा लुकाय बिग्यान ला देखव, जम्मों झन कथे के बियाम हा सरीर बर जरूरी चीज आय अउ बडे फजर जड़कल्ला के बियाम हा तो बड़ असर करथे। त दार पीसे, रखिया करोय, अउ वोला फेंटे मा सरीर के जबर बियाम हो जथे, फेर येला घाम मा बनाय जाथे, त माई लोगन मन के इही बहाना घाम तपई घलो हो जथे, नइते माई लोगन मन घाम तापे के लइक रीता कभू नइ होय। फेर कई घंटा उखरु बइठे-बइठे सरकना घलो जबर बियाम हरे। लइकोरी मन संग लइका मन हा घलो तीर-तार मा रेहे रइथे। अउ केहे जाथे के बिहिनिया जुआर सूरज के प्रकाश पाये ले विटामिन डी मिलथे, जेहा लइका मन बर बड़ उपयोगी आय। फेर हाथ के बने खान-पान के चीज हा तन बर बनेच होथे। बरी बिजौरी के गुन के सेतन येला लइकोरी माई लोगन ला जँचकी के बाद बड़ दिन ले खवाय जाथे।




बारो मास हरियर साग-भाजी नइ मिलय, अउ कभू-कभू घर मा रुपिया पइसा घलो नइ राहय अइसन मा बरी-बिजौरी, अचार, पापड़, खुइला मन के राहत ले खान-पान बर चिन्ता नइ करना पड़े। हमर संस्कृति के जम्मों जिनिस मा कतको अकन नफा हे। फेर आज के लोगन हा ये सबला छोंड़ के नकल संस्कृति ला अपनावत हे। अरबन-चरबन पीजा-बरगर मा झपावत हे, अउ अपने सरीर समाज अउ परयावरण ला खोखला करत हे।

ललित साहू “जख्मी” छुरा
जिला-गरियाबंद (छ.ग.)
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