Tag: Pushpraj Sahu

संगी के बिहाव

दोस्ती म हमर पराण रिहिस हे, जुन्ना अब संगवारी होगे।
तोर बिहाव के बाद संगी, मोर जिनगी ह अंधियारी होगे।

बाबू के घर म खेले कूदे, तै दाई के करस बड़ संसो।
सुन्ना होगे भाई के अंगना, जिहाँ कटिस तोर बरसों।।
अपन घर ह पराया अऊ, पर के घर अपन दुवारी होगे।
तोर बिहाव के बाद संगी, मोर जिनगी ह अंधियारी होगे।।

तोर आंखी म आँसू आतिस, त मोर छाती ह कलप जाये।
जबै तैहा खुश होतै पगली, तभै मोला खुशी मिल पाये।।
बिहाव होए ले‌ संगी तोर, दिल के मोर चानी चानी होगे।
तोर बिहाव के बाद संगी, मोर जिनगी ह अंधियारी होगे।।

खुशी के मारे आयेव बिहाव म, आके मोला थरथरासी लागिस।
बिदाई बेरा तोला रोवत देख, महु ल बड़ रोआसी लागिह।।
चंदा चमकत रिहिस फेरा म, बिदाई के बेरा एतवारी होगे।
तोर बिहाव के बाद संगी, मोर जिनगी ह अंधियारी होगे।।

भुलाबे झन तै मोला संगवारी, खियाल राखबे तैहा तोर।
दुख झन मिलै कभु मिस खान, विनती हवै ईहीच मोर।।
सुरता त‌ तोर आही संगी, फेर तै अब काकरो सुवारी होगे।
तोर बिहाव के बाद संगी, मोर जिनगी ह अंधियारी होगे।।

पुष्पराज साहू “राज”
छुरा (गरियाबंद)

हिसार म गरमी

चालू होवत हवय गरमी, जम्मो लगावय डरमी कूल।
लागथे सूरज ममा हमन ल, बनावत हे अप्रिल फूल।।

दिन म जरे घाम अऊ, रतिहा म लागथे जाड़।
एईसन तो हवय संगी, हरियाणा म हिसार।‌‌।

कोन जनी का हवय, सूरज ममा के इच्छा‌।
जाड़ अऊ गरमी देके, लेवय जम्मो के परीक्क्षा।‌।

मोटर अऊ इंजन के खोलई, होवत हवे आरी-पारी।
पना-पेंचिस के बुता म, मजा आवत हवय भारी।।

टूरा ता टूरा इहाँ, नोनी मन घला मजा उठावत हे।
अऊ जादा होवत हवय, ताहन मुहुँ ल फुलावत हे।।

इंजन के पढ़ई म, अजय सर के हँसी-ठिठोली।
बड़ा निक लागे ओखर, छत्तीसगढ़ी म बोली।।

फेर चालू होईस हमर, इलेक्ट्रॉनिक के कक्छा।
राम सर के निक पढ़ई, होईस पढ़े के इच्छा।।

बरथे कइसे लट्टू टेक्टर म, तहू ल बताईस।
स्टाटर अऊ बेटरी ल घलो, खोल के दिखाईस।‌।

होली के दिन म खेलेन जम्मो, चिखला संग म गुलाल।
जम्मो के मुँहु धो-धो के, होगे रिहिस लाले लाल।।

ऐखर बाद क्लच अऊ, बेरेक ल समझाईस।
कइसे करबो टेक्टर कन्ट्रोल, तेला घलौ बताईस।।

आंध्रा के भास्कर सर, अऊ इँहा ले सर अरविंद।
दोनों झन के पढ़ई ले, भाग जाथे जम्मो के नींद।।

आज जम्मो झन टेक्टर ल, बने-बने चलावत हवन।
अट्ठो आठ जइसन चलाके, जम्मो मुचमुचावत हन।‌।

सुकरार के बिहिनिया ले, पावर टिलर ल भगायेन।‌
कउनो कउनो त भोरहा म, रूख म घलो टेकायेन।‌।

चाय पियई छोड़ टेक्टर ल, कालोनी म दउड़ायेन।‌
मजा लेके चक्कर म, काँटातार म घला झपायेन।‌।

ताहन नाँगर संग मा होईस, टेक्टर के मुलाकात।‌
पीछू भागिस, जब एक्सीलेटर म परिस लात।‌।

आठ-दस दिन म जम्मो संगी, अपन घर चले जाबो।‌
एक-दूसर मन के संगी, सूरता करतेच रही जाबो।‌।

एखर बाद कभू हमन, मिल पाबो कि नी मिल पाबो।‌
हिसार के ये गोठ ल, कभू नी भुलाबो।‌।

“राज” ल सूरता राखहू, इ़ँहा ले जावत जावत।
बैरी-दुश्मनी ल भुलाके, तुमन रहू मुचमुचावत।।

दिल म समा जाही हमर, दोस्ती के निसानी।‌
बड़ सुरता आही संगी, बीते संझा के कहानी।‌।
बड़ सुरता आही….‌‌।।

पुष्पराज साहू “राज”
छुरा (गरियाबंद)

बेरोजगारी

दुलरवा रहिथन दई अऊ बबा के, जब तक रहिथन घर म।
जिनगी चलथे कतका मेहनत म, समझथन आके सहर म।।
चलाये बर अपन जिनगी ल, चपरासी तको बने बर परथे।
का करबे संगी परवार चलाये बर, जबरन आज पढ़े बर परथे।।

इंजीनियरिंग, डॉक्टरी करथे सबो, गाड़ा-गाड़ा पईसा ल देके।
पसीना के कमई लगाके ददा के, कागज के डिग्री ला लेथे।।
जम्मो ठन डिग्री ल लेके तको, टपरी घलो खोले बर परथे।
का करबे “राज” ल नौकरी बर, जबरन आज पढ़े बर परथे।।

लिख पढ़ के लईका मन ईहाॅ, बेरोजगारी म ठेलहा सब घूमत हे।
अऊ सबला पियाके देशी दारू, सरकार ह खुदे झूमत हे।।
चलाये बर जिनगी 12वीं पास ल, दारू के ठेका ले बर परथे।
का करबे संगी परवार चलाये बर, जबरन आज पढ़े बर परथे।।

घाम पियास म करथे किसानी, हमर दुनिया के भगवान ह।
तभो ले दारू महँगा बेचाथे, बोनस घलो नई पावे किसान ह।।
कभु-कभु त कर्जा के मारे, आत्महत्या घलो करे बर परथे।
का करबे संगी परवार चलाये बर, जबरन आज पढ़े बर परथे।।

पुष्पराज साहू
छुरा (गरियाबंद)

नवा बछर के मुबारक हवै

जम्मो झन हा सोरियावत हवै, नवा बछर हा आवत हवै।
कते दिन, अऊ कदिहा जाबो, इहिच ला गोठियावत हवै।।
जम्मो नौकरिहा मन हा घलो, परवार संग घूमेबर जावत हवै।
दूरिहा-दूरिहा ले सकला के सबो, नवा बछर मनावत हवै।।

इस्कूल के लईका मन हा, पिकनिक जाये बर पिलानिंग बनावत हवै।
उखर संग म मेडम-गुरूजी मन ह, जाये बर घलो मुचमुचावत हवै।।
गुरूजी मन पिकनिक बर लइका ल, सुरकछा के उदिम बतावत हवै।
बने-बने पिकनिक मनावौ मोर संगी, नवा बछर ह आवत हवै।।

नवा बछर के बेरा म भठ्ठी म, दारू के खेप हा आवत हवै।
दारू पियईया भईया मन घलो, पी के नवा बछर मनावत हवै।।
इही दारू के सेतिन घलो त, दुरघटना हा अब्बड़ होवत हवै।
दारू पियई ल अब छोड़ देवौ संगी, नवा बछर ह आवत हवै।।

मास-मछरी के खवईया मन ह, कुकरी बोकरा ला पुजवावत हवै।
निरबोध जिनिस मन के बलि चघाके, अपन ल धन्य कहावत हवै।।
इही मास-मछरी खाय के सेतिन, जम्मो चिरई-चिरगुन ह नंदावत हवै।
साग-भाजी ल अपनावौ संगी हो, नवा बछर ह आवत हवै।।

जम्मो झन ह खुश हे अब्बड़, फेर किसान भाई मन के मुड़ी पिरावत हवै।
कब, का हो जाहि नवा बछर म, उखरेच चिनता सतावत हवै।।
भगवान् ले करथौ इहिच बिनती, जम्मो लईका-सियान ह मुचमुचावत रहै।
“राज” डाहर ले जम्मो झन ल संगी, नवा बछर के मुबारक हवै।।

पुष्पराज साहू
छुरा (गरियाबंद)

मोर छत्तीसगढ़ के माटी

गुरतुर हावय गोठ इहाँ के,
अऊ सुघ्घर हावय बोली।
लइका मन ह करथे जी,
सबो संग हँसी-ठिठोली।।‍
फुरसद के बेरा में इहाँ,
संघरा बइठे बबा- नाती।
महर-म‌हर ममहाये वो,
मोर छत्तीसगढ़ के माटी।।

बड़े बिहनिया ले संगी,
बासी ह बड़ सुहाथे।
आनी-बानी नी भावय,
चटनी संग बने मिठाथे।।
ईज्जा-पिज्जा इहाँ कहां,
तैहा पाबे मुठिया रोटी।
महर-म‌हर ममहाये वो,
मोर छत्तीसगढ़ के माटी।।

गैस ले बड़ सुघ्घर संगी,
चूल्हा के भात खवाथे।
घाम के दिन बादर म,
आमा के चटनी ह भाथे।।
मटर-पनीर नी मिलय,
पाबे किसम-किसम के भाजी।
महर-म‌हर ममहाये वो,
मोर छत्तीसगढ़ के माटी।।

इस्कुल ले आतेच लईका,
गुल्ली-डंडा धरके भागे।
परय नी रतिहा नींद टूरा के,
काहानी सुनेबर जागे।।
बेट-बाॅल, फुटबाॅल कहाँ,
इहाँ खेलय भऊँरा-बाँटी।
महर-म‌हर ममहाये वो,
मोर छत्तीसगढ़ के माटी।।

बरदी आये के बेरा ल‌ई‌का,
गाय-बछरू धरेबर भागे।
जाड़ घरी म जम्मो झन,
गोरसी म आगी तापे।।
संधकेरहे बेरा म नोनी,
बारे दिया अऊ बाती।
महर-म‌हर ममहाये वो,
मोर छत्तीसगढ़ के माटी।।

पुष्पराज साहू
बोईरगाँव-छुरा (गरियाबंद)

कहानी – देवारी के कुरीति

गाँव म देवारी के लिपई-पोतई चलत रिहिस। सुघ्घर घर-दुवार मन ल रंग-रंग के वारनिश लगात रहिस। जम्मो घर म हाँसी-खुशी के महौल रिहिस। लइका मन किसम-किसम के फटाका ल फोरत रिहिस। एक झन ननकी लइका ह अपन बबा संग म घर के मुहाटी म बइठे रिहिस। ओ लइका ह बड़ जिग्यासु परवित्ति के रहिस। लइका मन ह बड़ सवालिया किसम के रहिथे। उदुक के अपन बबा ले पूछिस – बबा हमन देवारी तिहार ल कब ले अऊ काबर मनाथन। बबा ह ओ लइका ल राम भगवान के अयोद्धया लहुटे के कहानी ल सुनइस कि इही खुसी म देवारी के तिहार ल उही समे ले मनाते। राम भगवान के जम्मो कहानी ल सुनिस त ओखर मन म बड़ अकन सवाल अऊ आईस, जम्मो ठन ल पूछत गिस कि काबर ओला वनवास भेजिस? रावण ल काबर मारिस? बबा ह जम्मो ठन के जुवाब दिस।
देवारी के रतिहा कुन जम्मो घर म लक्ष्मी माई के पूजा-पाठ करके परसाद अमरईक अमरा होईस, परसाद पईस। ताहन लइका ह अपन बबा संग गउरा-गऊरी ठउर म पहुँचीस। ऊहाँ जम्मो लोगन मन ह सकलाय रिहिस। नोनी जात अऊ माई लोगन मन ह चऊरा म फूल कुचलत रहय, गउरा-गऊरी पार के बाजा बाजत रहय। लइका ह बड़ खुस होईस। लइका, जवान मन फटाका फोड़त रहाय। एकेच कनि होईस ताहन कलसा परघाय बर निकलिस। कलसा परघावत-परघावत गाँव भर म घुमिस। ओखर बाद म गउरा-गऊरी परघाय बर गिस। बबा ह लइका ल गउरा-गऊरी के कहानी घलो सुनाइस। रतिहा बड़ होवत रिहिस, घर जावत रिहिस त लइका ह देखिस कि सियान मन ह बाजू म दारू के निशा म ताश, खड़खाडिया, जुआ खेलई म भुलाय हवै अऊ आनी-बानी के गारी एक-दूसर ल बकत हवै। लइका के मन म फेर एक ठन सवाल ह उठिस कि देवारी के जम्मो पूजा-पाठ के कहानी त सुनेव फेर ये ताश, जुआ, दारू पियई के कहानी का होही? रतिहा होगे रिहिस त बबा ह लइका ल सुतेबर कहिस। फेर लइका के मन म ईही सवाल ह घुमत रिहिस।
दुसरईया दिन खिचरी खवाय के दिन रहिस। मंझनिया कुन रऊत मन ह घरो-घर म गिस अऊ बइला-बछरू ल सोहई बाँधिस। ताहन बइला-बछरू मन ल खिचरी खवाईस। भात खायके बेरा म घलो मखना-कोचई ल खावत-खावत लइका के दिमाक म उही सवाल ह दिमाक म भटकत रहिस। भात खईस ताहन ओ लइका ले अब नि रहिगिस। बबा तिर म गिस अऊ पूछ परिस – “देवारी के जम्मो ठन कहानी समझगेव, फेर ये दारू पियई अऊ ताश खेलई के पाछू का कहानी हवय गा बबा?” लइका के सवाल म बबा ल बड़ दुख लागिस। ओखर मुड़ी हा समाज के अईसन कुरीति अऊ लइका के आघू म झुक गिस। लइका के सवाल के आघू म बबा घलो निरूत्तर हो गिस। बबा ह अतके भर कहिस – “बेटा! इही जम्मो बुरई अऊ पाप के सेती त राक्षस मन के नाश होईस, अईसन बुरई तै कभू झन करबे।”
सिक्छा:- देवारी म जुआ खेलई, दारू पियई जइसन बुरई अऊ कुरीति ल नाश करबो, तभे हमर समाज अऊ नवा अवइया पीढ़ि ल आघू बढ़ा पाबो। निहि त बुरई करईया मन के सबो जगा नाशेच होथे।

पुष्पराज साहू “राज”
बोइरगांव-छुरा (गरियाबंद)

बतावव कइसे ?

मया पिरीत म बँधाय हन जम्मो,
ए बँधना ले पाछू छोड़ावव मै कइसे? !1!

बिना लक्छ के मोर डोंगा चलत हे,
येला बने कुन रद्दा देखावव मै कइसे? !2!

तोर दुख अऊ पीरा ल मानेव अपन मै,
ओ पीरा ल तोर भूलावव मै कइसे? !3!

नी देखे सकव तोर आँखी म आँसू,
बिन जबरन तोला रोवावव मै कइसे? !4!

सुरता ह तोर बड़ सताथे ओ संगी,
अपन सुरता करवावव मै कइसे? !5!

मया त तोर ले बड़ करथो जहुरिया,
ये मया ल तोला जतावव मै कइसे? !6!

ये मया पिरीत के अंधेरी कुरिया म “राज”,
मोर आरूग मया ल बतावव मै कइसे? !7!

पुष्पराज साहू “राज”
बोईरगाँव-छुरा (गरियाबंद)

हमर शिक्षा व्‍यवस्‍था

पढ़हईया लईका मन ला हमर देश के सिरिजन करईया कहे जाथे। फेर आज के दिन मा ऊखर जिनगी के संग खिलवाड़ होवत हवै। ओ लईका मन ल बिन जबरन के कल्लई करात हवै। आजे काली बिहिनिया कुन पेपर म पढ़ेबर मिलिस कि एक झन लईका ह 12वीं म पहिलि सेरेणी म पास होगे हवै तभो ले कालेज म अपन मन के पढ़ नी सकत हवै।
पेपर म छपय रिहिस कि ओ लईका ह एसो 12वीं के परीक्छा दे रिहिस। फेर ओ लईका के काय गलती। ऐमा गलती तो ओछर पेपर ल जँचईया गुरूजी के रिहिस, जउन हा बिचारा लईका के बने-बने बनाए पेपर ला घलो अईसन जाँचिस कि ओ लईका हा उहिच बिषय मा पूरक आगे। जब ओ लईका ल लागिस कि मोर पेपर मा अंक निच्चट कम आगिस हवै ता अपन ईस्कूल के गुरूजी अऊ घर के सियान मन के केहे म अपन पेपर ला खोलवईस। जउन बिषय म ओ लईका हर फेल हो गे रिहिस ऊही बिषय म दूसरईया जँचवाए के बाद मा बने-बने अंक के संग म पास होगिस। ऐ दूसरईया जँचई के चक्कर मा ओ लईका के समेय ह घलो सिरागे, जेखर सेती ओ बिचारा कालेज मा दाखिला घलो नी पईस। आज ओ लईका हर पहिलि सेरेणी म पास होगिस तभो ले स्वाध्यायी पढ़ईया मन बरोबर ऊँहा पढ़ेबर परत हवै।
ए गोठ-बात म जँचईया मन के संगे-संग म हमर शिक्षा व्‍यवस्‍था के ऊपर म घलो सवाल उठत हवै कि हमर शिक्षा व्‍यवस्‍था ह अईसन कइसे कोनो लईका के जिनगी संग खेल सकत हवै। येहा एके झन लईका के गोठ नोहे, ऐखर असन कतको लईका मन ल अईसन हर बछर म छेले बर परथे। जउन मन ला बड़ कल्लई होथे। हमर राज के शिक्षा व्‍यवस्‍था ह अइसने रहिबे करहि त हमर देश के भाग्य बनईया कहवईया हमर पढ़हईया लईका मन के का होही? जउन मन ह अपन मेहनत ले पढई करथे फेर अईसन शिक्षा व्‍यवस्‍था के सेती ओ मन ल रोये ल पर जाथे।

पुष्पराज साहू
छुरा (गरियाबंद)

बादर के कन्डीसन

छत म मेहा बइठे रेहेव, तभेच दिमाक मोर ठनकिस।
तुरतेच दिमाक ह मोर तीर, एकठन सवाल ल पटकिस।।

कि बादर ह बरसे निहि, काबर ये हा ठड़े हवय।
कोनो सराप दे दे हवय, धून सिकला म जड़े हवय।।

कब गिरहि पानी कहि के, खेत म किसान खड़े हवय।
एति-ओति निहि ओखर आँखि, बादर म गड़े हवय।।

किसान मन ह बस ऐखरेच बर तरसत हवय।
कि काबर ये साल बादर नी बरसत हवय।।

ए साल किसान मन पानी ल सोरियावत हवय।
इहिच ल सोरिया के ऊखर मुँहू सुपसुपावत हवय।।

तरिया, नरवा, नहर, डबरी घलो सुखावत हवय।
पेड़ अऊ पऊधा के डारा-पाना पीऊरावत हवय।।

चिरई-चिरगुन ह घूमत हवय, पानी बर चारो कोति।
फेर मिलत नी हे पानी ह, ना ऐति, ना ओति।।

मऊसम के मारे ईहाँ, मनखे मन छटपटावत हवय।
गरमी हरय धून जड़कल्ला, समझ म नी आवत हवय।।

बादर ल पूछेव मेहा, हमर ईहाँ कब तुमन आहू?
होही कुछु तोर कन्डीसन, ता मोला बताहू।।

बादर ह किहिस मोला, तुमन कचरा झन बगराहू।
अऊ जम्मो डाहर ल सफ्फा राखके, पेड़ ल जगाहू।।

अतकिच मोर कन्डीसन हवय, इहिच ल करके देखाहु।
ताहन मेहा दौड़त-भागत, तुहरेच तिर म आहू।।

पुष्पराज साहू
छुरा (गरियाबंद)



आज के बड़का दानव

अभिच कुन के गोठ हवै। हमर रयपुर म घाम ह आगी कस बरसत रिहिस, जेखर ले मनखे मन परसान रिहिस। मेहा एक झन संगवारी के रद्दा देखत एक ठन फल-फूल के ठेला के तीर म बैठै रहव। ओ ठेला वाला करा अब्बड झन मनखे मन आतिस, अऊ अपन बड़ महँगा जिनिस लेके चल देवय। आप मन ह सोचत होहू कि फल-फूल वाला करा काय महाँगी समान होही? ओ समान रिहिस गुटका, बीड़ी, माखुर, सिगरेट, जरदा जैसे निशा के समान। असल म वो ठेला वाला मेर फल-फूल, कुरकुरे-पापड़ी के संग म निशा क समान घलो राखे रिहिस। ऊँहा बिकट मनखे आवय फेर फल-फूल बर निहि, बीड़ी-माखुर बर। आघूच म टेरैफिक पुलीस मन गाड़िवाला मन ऊपर चालान बनावत रिहीस, फेर बिन कोनो रोक-टोक के वो ठेला म मनखे मन के मौत के समान बेधड़क बेचात रिहिस।



आज कुन मनखे मन हा ये सबो निशा अऊ जानलेवा समान मन के आदत बना डारे हवै। आज मनखे मन ल एखर बिना जिंदा रहेबर अलकरहा होगे हवै। मनखे मन ह हवा, पानी असन ये निशा समान मन ल घलो जिनगी म मिझार डारे हवै, जानथे तभो कि येहा हमर जान के बैरी हरै। आज के लईका मन ए मन म फँसगे हवै। आज कुन बीड़ी-सिगरेट पियई ल फेशन बना डारे हवै। ये सबो के गलत आदत लईका मन के उपर हमर बड़े सियान मन के सेती होवत हवै। लईका मन ल सिखाथै कि ए मन ला हाथ नी लगाहू अऊ खुदेच येला पिथे-खाथै अऊ लईका मन ल घलौ देखाथै। कहावत घलो हवै जैसने बड़का मन करथे ओखर नकल ननकी लईका मन करथे। फल-फूल ल छोड़के ईहाँ बीड़ी-माखुर म पईसा गँवाके अपन मौत ल बुलावा देथे।

ए सबो निशा के समान मन ह जानलेवा हरै, जउन ला सरकार के डाहर ले घलो बढावा देवत हवै काबर कि ए सबो समान म सरकार ल बड़ कन टैक्स मिलथे। फेर मेहा बतायेबर चाहथो कि जतका टैक्स ईहाँ ले सरकार ल मिलथे ऊखर ले कतको जादा पईसा सरकार ल एखर से होवईया बीमारी ल मिटाये बर दवाई के कम्पनी मन ल देबर पड़थे। येहा त ऊही बात होगे ना कि फोकट बर मेहनत ले गढ्ढा खन, ताहन ओला फेर ले पाट।

भारत के एक झन मनखे होये के सेती सरकार अऊ हमर समाज मन के बड़े पद म बैठे सियान मन ले मोर एक ठन बिनती हे कि ये सबो निशा के समान मन ल धिरलगहा सहीच फेर चूकता बंद कराके हमर समाज, गांव, सहर अऊ देश के जम्मो लईका सियान मन ल ये चिखला भराय जिनगी ले बाहर निकाल के अऊ देश ला विश्वगुरू बनाय के डाॅ. अब्दुल कलाम जी के देखय सपना ल पूरा करेबर अपन योगदान देवव। ये सबो निशा के समान ह बिकहिच निहि ता दुरघटना नी होवय, घर-परवार म झगरा नी होवय, बिमारी कम होही अऊ हमर देश हा आघू बाढ़ही। वईसने घलो ये बीड़ी-माखुर ले कोनो फाईदा नहिच हवै, फेर नकसान आनी-बानी के हवै। ये सबो ल चुकता खतम कराके हमर देश क जम्मो लईका सियान मन बने रद्दा म लाय के बादेच म राज्य अऊ देश ल आघू बढ़ाये जा सकथे। निहिते आप मन खुदे सोच सकत हवौ कि एखर ले समाज के संगे-संग देश ला काय नकसान हो सकत हवै ?

पुष्पराज साहू “राज”