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मंगल पांडे के बलिदान : 8 अप्रैल बलिदान-दिवस

अंगरेज मन ल हमर देस ले भगाए बर अउ देसवासी मन ल स्‍वतंत्र कराए बर चले लम्बा संग्राम के बिगुल बजइया पहिली क्रान्तिवीर मंगल पांडे के जनम 30 जनवरी, 1831 के दिन उत्तर प्रदेश के बलिया कोति के गांव नगवा म होय रहिस। कुछ मनखे मन इंकर जनम उत्‍तर प्रदेश के साकेत जिला के गांव सहरपुर म अउ जन्मतिथि 19 जुलाई, 1927 घलोक मानथें। मेछा के रेख फूटतेच इमन सेना म भर्ती हो गये रहिन। वो बखत सैनिक छावनी मन म गुलामी के विरुद्ध आगी सुलगत रहिस।
अंग्रेज मन जानत रहिन कि हिन्दू गाय ल पवित्र मानथें, जबकि मुसलमान सूंरा ले खिक मानथें। तभो ले अंग्रेज मन अपन सैनिक मन ल जऊन कारतूस देवत रहिन, ओमां गाय अऊ सूंरा के चर्बी मिले रहत रहिस। गोली चलाए के बेरा वो कारतूस ल सैनिक मन ल अपन मुँह ले खोले ल परय। अइसनहे अड़बड़ बछर ले चलत रहिस फेर सैनिक मन ल एकर सच मालूम नइ रहिस। मंगल पांडे ओ समय बैरकपुर म 34 वां हिन्दुस्तानी बटालियन म तैनात रहिन। उहाँ पानी पियइया एक हिन्दू ह ए बात के जानकारी सैनिक ल दीन के कारतूर के खोल म गाय अउ सूंरा के चर्बी चढ़े हे। एखर से सैनिक मन म आक्रोश फैल गीस। मंगल पांडे ले रहे नइ गीस। 29 मार्च, 1857 के दिन उमन विद्रोह कर दीन। एक भारतीय हवलदार मेजर ह जाके सार्जेण्ट मेजर ह्यूसन ल ये हाल ल बताइस। मेजर घोड़ा म बइठके छावनी गीस। उहां मंगल पांडे सैनिक मन ल कहत रहिन के अंग्रेज हमार धरम ल भ्रष्ट करत हें। हमला उंखर नौकरी छोड़ देना चाही, मैं छोंडहूं, मैं तो परन कर लेहे हवंव अउ कोनो अंग्रेज कहूं मोला रोकही में ओला मार दूंहूं।




सार्जेण्ट मेजर ह्यूसन ह सैनिक मन ल मंगल पांडे ल पकड़े ल कहिन; तब तक मंगल पांडे के गोली ह ओखर सीना छलनी कर दीस। ओखर लाश घोड़ा ले नीचे आ गिरिस। गोली के अवाज सुनके एक अंग्रेज लेफ्टिनेण्ट उहाँ आ गीस। मंगल पांडे ह ओकर उपर घलोक गोली चलाईस; फेर वो बचके घोड़ा ले कूद के गे। मंगल पांडे ओकर उपर झपट परिस अऊ तलवार ले ओखर काम तमाम कर दीस। लेफ्टिनेण्ट के सहायता बर एक आन सार्जेण्ट मेजर आइस; उहू मंगल पांडे के हाथ मारे गीस। अब तक चारों मूड़ा खबर फइल गीस। 34 वां पल्टन के कर्नल हीलट ह भारतीय सैनिक मन ल मंगल पांडे ल पकड़े के आदेश दीस; भारतीय सैनिक मन एखर बर तैयार नइ होइन, मने बिद्रोह कर दीन।




अंग्रेज सैनिक मन ल बलाए गीस अउ सबले पहिली मंगल पांडे ल चारो मूड़ा ले घेर लिए गीस। जब चारो तरफ ले मंगलवार घेरा गये त वो समझ गइस के अब बचना असम्भव हे। तेखर सेती वो अपन बन्दूक ले खुदे ल गोली मार लीस। गोली ले मंगल मरे नइ रहिस भलुक घायल होके गिर गए रहिस। अंग्रेज सैनिक मन ह ओला पकड़ लीन, घायल मंगलवार उपर कोर्ट मार्सल होइस। मंगल पांडे उपर सैनिक न्यायालय म मुकदमा चलाए गीस। उमन कहिन, ‘‘मैं अंग्रेज मन ल अपन देश के भाग्यविधाता नइ मानंव। अपन देश ल आजाद कराना कहूं अपराध हे, त मैं हर दण्ड भुगते ल तैयार हंव।’’
न्यायाधीश ह ओला फांसी के सजा दे दीस अउ 18 अपरेल के दिन फाँसी देहे बर निरधारित कर दीन। एती भारतीय सैनिक मन के बीच मंगलवार के लगाए आगी ह फइल गए रहिस। अंग्रेज मन ह देश भर म अउ जादा विद्रोह झन फइले ये डर म, घायले अवस्था म 8 अपरेल, 1857 के दिन मंगल ल फाँसी दे दीन। बैरकपुर के छावनी म मंल ल फाँसी देहे बर कोनो जल्‍लाद तइयार नइ होइन, तीर तखार के छावनी वाले मन तको तइयार नइ होइन। हार खाके अंग्रेज मन कोलकाता ले चार जल्लाद जबरन बला के वोला फांसी देहे गीस।
मंगल पांडे ह क्रान्ति के जऊन मशाल जलाईस उही आगू चलके 1857 के बड़का अउ जबर स्वाधीनता संग्राम के रूप लीस। हमर भारत देस भलुक 1947 म स्वतन्त्र होइस फेर ये आजादी बर पहिली क्रान्तिकारी मंगल पांडे के बलिदान ल हमेसा श्रद्धापूर्वक स्मरण करे जाथे।

– अनुवाद : संजीव तिवारी
– मूल हिन्‍दी आलेख : इंटरनेट में उपलब्‍ध विभिन्‍न स्रोतो से प्राप्‍त



बाबू जगजीवनराम अऊ सामाजिक समरसता : 5 अप्रैल जन्म-दिवस

हिन्दू समाज के निर्धन अऊ वंचित वर्ग के जऊन मनखे मन ह उपेक्षा सहिके घलोक अपन मनोबल ऊंचा रखिन, ओमां बिहार के चन्दवा गांव म पांच अप्रैल, 1906 के दिन जनमे बाबू जगजीवनराम के नाम उल्लेखनीय हे। ऊंखर पिता श्री शोभीराम ह कुछ मतभेद के सेती सेना के नौकरी छोड़ दे रहिस। उंखर माता श्रीमती बसन्ती देवी ह गरीबी के बीच घलव अपन लइका मन ल स्वाभिमान ले जीना सिखाइस।
लइकई म बाबू जगजीवनराम के स्‍कूल म हिन्दू, मुसलमान अउ दलित हिन्दु मन बर पानी के अलग-अलग घड़ा रखे जात रहिस। बाबू ह अपन संगवारी मन के संग मिलके दलित मन वाले घड़ा मन ल फोर दीन। प्रबन्ध समिति के पूछे म उमन कहिन कि ओला हिन्दु मन म बंटवारा स्वीकार नइ हे। ये बात ले प्रबंधन के आंखीं तको उघरिस अउ एखरे सेती सबो हिन्दु मन बर एकेच घड़ा के व्यवस्था करे गीस। 1925 म ऊंखर स्‍कूल म मदन मोहन मालवीय जी आइन। वो समें म बाबू जगजीवनराम ह स्वागत भाषण दीन, येकर ले प्रभावित होके मालवीय जी ह उमन ल काशी बला लीन।
कासी म घलो छुआछूत उंखर पाछू नइ छोडि़स। नाउ ऊंखर बाल नइ काटय, खाना बनइया ओला जेवन नइ दय। जूता पालिस करइया पालिस नइ करय। अइसन म मालवीय जीच ह उंखर सहारा बनत रहिन। कई पइत त मालवीय जी खुदे ऊंखर जूता पालिस कर देवत रहिन। अइसन वातावरण म बाबू ह अपन विद्यालय अऊ काशी नगर म सामाजिक विषमता मन के विरुद्ध जनजागरण करत रहिस।



1935 म बाबू ह हिन्दू महासभा के अधिवेशन म एक प्रस्ताव पारित कराइस, जेमां मंदिर, तालाब अउ कुआं मन ल सब हिन्दु मन बर समान रूप ले खोले के बात कहे गए रहिस। 1936 म उमन प्रत्यक्ष राजनीति म प्रवेश करिन अऊ 1986 तक सरलग एके सीट ले जीतत रहिन।
गांधी जी के आह्वान म ओ मन कई पइत जेल गइन। अंग्रेज भारत ल हिन्दू, मुसलमान अउ दलित वर्ग के रूप म कई भाग मन म बांटना चाहत रहिन, बाबू जगजीवन राम उही समें ए खतरा के बारे म बताए रहिन। स्वाधीनता के बाद ओ मन सरलग केन्द्रीय मंत्रिमंडल के सदस्य रहिन। 1967 ले 70 तक खाद्य मंत्री रहत उमन हरित क्रांति के सूत्रपात करिन। जब श्रम मंत्री रहिन तब उमन अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अध्यक्ष घलोक रहिन। जब उमन रेलमंत्री रहिन त सबे स्टेशन म मनखे मन ल लोटा ले पानी पिलइया ‘पानी पांडे’ के नियुक्त करे रहिन, ये पद म उमन जादातर वंचित वर्ग के मनखे मन ल रखिन।
1971 म उंखरे रक्षामंत्री रहे के बेरा म पाकिस्तान हारिस अऊ बंगलादेश के निर्माण होइस एमा घलोक उंखर बड़का भूमिका रहिस। 1975 के आपातकाल ले ऊंखर दिल ल बहुत चोट लगिस। चुनाव घोषित होतेच उमन ‘कांग्रेस फार डैमोक्रैसी’ बनाके कांग्रेस के विरुद्ध चुनाव लडि़न। जनता पार्टी के शासन म ओ मन उपप्रधानमंत्री बनिन। छै जुलाई, 1986 के दिन समरस भारत बनाए के इच्छुक बाबू जगजीवन राम जी के देहांत हो गए।

अनुवाद : संजीव तिवारी
(मूल आलेख : नवोत्थान लेख सेवा, हिन्दुस्थान समाचार के भावानुवाद)


सुरता – गीत संत डॉ. विमल कुमार पाठक

इतवार १४ जुलाई, २०१३ के संझा वीणा पाणी साहित्य समिति कोती ले पावस गोस्ठी के आयोजन, दुर्ग म सरला शर्मा जी के घर म होइस. कार्यक्रम म सतत लेखन बर छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग के अधियक्छ पं.दानेश्वर शर्मा, जनकवि मुकुन्द कौशल, हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी के वरिष्ठ लेखिका डाॅ.निरूपमा शर्मा, संस्कृत हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी के वरिष्ठ लेखिका शकुन्तला शर्मा के सम्मान समिति ह करिस. ये अवसर म डॉ. विमल कुमार पाठक के घलव सम्मान होवइया रहिसे फेर डाॅ.पाठक कार्यक्रम म पधार नइ पाइन. कार्यक्रम बर डाॅ.पाठक के उप्पर लिखे मोर आलेख गुरतुर गोठ के पाठक मन बर प्रस्तुत हावय – Continue reading

रायपुर नगर निगम के मयारू : ठाकुर प्‍यारे लाल

अगस्त सन् 1937 म जब ठाकुर प्‍यारे लाल साहब रायपुर मुनिसपल कमेटी के अध्यक्ष चुने गीन तब मुनिसिपल कमेटी म डेढ़ लाख रूपिया के करजा रहिस। मुनिसिपल कमेटी के कर्मचारी मन के तरक्की छै-सात बछर ले रूके परे रहिस। इही हालत स्कूल के गुरूजी मन के घलोक रहिस। शहर के सड़क उखर गए रहिस, स्कूल के छत अतका टपकत रहिस के पढ़इया लइका मन ल स्कूल म बइठके पढना मुश्किल हो गए रहिस। ठाकुर साहब के दू साल के प्रेसीडेंटी म सब करजा अदा होगे, सड़क मन के हालत सुधार गए, अऊ स्कूल के इमारत मन के मरम्मत घलोक हो गए। रायपुर मुनिसपल कमेटी म करजा के अतका भारी बोझ काबर रहिस, ओखर व्यवस्था अतका खराब काबर रहिस? एखर कारन उपर प्रकाश डालत ठाकुर साहब ह खुदे लिखे हें ‘सरलग कई बछर तक कमेटी म प्रेसीडेंट हमेसा वकालत पेशा के मनखे मन चुने जात रहिन। ओ मन ल न तो अपन व्यवसाय ले फुरसत मिलत रहिस अऊ न ही अपन धनी मुवक्किल मन ल नाराज करे के उमन म साहस रहिस।“



शहर म पानी के समुचित व्यवस्था नइ रहिस, सड़क मन अऊ इमारत मन बर घलोक कमेटी तीर पइसा नइ रहिस। ठाकुर साहब ह कमेटी के अध्यक्ष बनतेच ए सब्बो काम ल कर डरिन अऊ कमेटी के आमदनी बाढ गए। नगर के विकास होइस अउ नगरपालिका के कर्मचारी मन अऊ शिक्षक मन के तरक्की होइस। ठाकुर साहब नगर म पीये के पानी के उचित व्यवस्था करिन। मुनिसपल अध्यक्ष रहत उमन अपन मातहत कर्मचारी मन ल वोतकेच मंहगाई भत्ता दीन जतका कि प्रान्तीय शासन देत रहिस। प्रदेश म ओ समय कोनो म्युनिसपल कमेटी ओतका महंगाई भत्ता अपन कर्मचारी मन ल नइ देत रहिस। जतका के ओ मन अपन कर्मचारी मनं ल देवत रहिन। अतका होए बाद घलोक उमन जनता उपर टैक्स नइ बढाइन। ये काम ऊंखर निष्ठावान अउ कुशल प्रशासक होए के स्पष्ट प्रमाण हे।

नगर के विकास ल देखत जनता के मांग के आधार म उमन नयापारा अऊ जुन्ना बस्ती म लड़की मन बर दू स्कूल खोलिन। गंजपारा जिहां गरीब मजदूर मन के बस्ती रहिस, उहां मुनिसपल के तरफ ले अस्‍पताल खोलवाए गीस। प्रौढ शिक्षा बर शहर के बहुत अकन जघा म केन्द्र खोलवाये गीस। जुन्ना पुलिस लाइन ल व्यवस्थित रूप ले बसाए बर उमन शासन ल जरूरी प्रस्ताव भेजिन। उमन नगर म खेलकूद के सुविधा बर स्थानीय कोआपरेटिव्ह बैंक तीर खेले बर मैदान बनाए के प्रस्ताव शासन ल भेजिन जऊन ल स्वीकृति प्रदान करे गीस।



गुढ़ियारी ल रायपुर मुनिसपल कमेटी के अंदर लेहे के मांग 1906 ले चले आत रहिस। गुढ़ियारी ल रायपुर मुनिसपल कमेटी म लेहे ले कमेटी के आर्थिक स्थिति मजबूत हो जातिस। एखर से कमेटी ल 30-40 हजार रूपिया के सालाना लाभ होतिस। फेर गुढियारी ल कमेटी म लेहे के मांग जइसे के तइसे परे रहिस अउ कमेटी ल हजारों रूपिया के नुकसान उठाए ल परत रहिस। उमन गुढि़यारी ल मुनिसपल म सामिल कर दीन येकर से राजस्‍व आए बाढ् गए।

सन् 1938 म ठाकुर साहब ह एक बड़का काम करिन। जेमा हिन्दू मुस्लिम एकता बर अऊ सद्भावना ल बनाए रखे बर उमन कमेटी के तरफ ले हिन्दू मुस्लिम दंगा मन के मुकदमा मन ल मुनिसपल कोति ले न्यायालय ले वापस ले लीन। एखर से मुकदमे बाजी म मुनिस्पल के होवत हजारो रूपिया के खरचा बांचिस। ए प्रकार ऊंखर उदीम ले नगर म सुख शांति स्थापित होइस, अऊ हिन्दू – मुसलमान म सद्भावना बाढ़िस। ठाकुर साहब के हिन्दु अऊ मुसलमान मन म एकता के भावना अउ सौहाद्रपूर्ण वातावरण के निर्माण करे के स्पष्ट उदाहरण हमला म्युनिसपल लारी हाई स्कूल के एक ठन घटना ले मिलथेा उहां मुसलमान अउ हिन्दू लड़का लड़की मन एक राष्ट्रीय झंडा के तरी वंदना नइ करना चाहत रहिन। ठाकुर साहब ल जब ये पता चलिस त उमन उंखर हृदय म बदलाव लाइन अउ ओ मन एके झंडा के तरी सकला के भारत माता के वंदना म सामिल होए लगिन। उमन जनता ल राष्‍ट्रीय चरित्र के अइसन शिक्षा दीन जऊन संभवतः कोनो मुनिसपल कमेटी के अध्यक्ष कोति ले आज तक नइ दे गए होही।



ओ मन एक अच्छा शिक्षा शास्त्री घलोक रहिन। छड़ी हाथ म लेके टहलत रहंय त अचानक कोनो स्कूल म अऊ कोनो क्लास म चल देत रहिन अऊ जऊन विसय के पीरियड होतिस, पढ़ाए लगत रहिन। हिन्दी, अंगरेजी, संस्कृत अउ इतिहास के विद्वान त उमन रहिन, कठिन ले कठिन गणित के सवाल के हल ओ मन कुछ समय म ही कर देवत रहिन। पढ़ाए के शैली घलोक उंखर आकर्सक रहिस। कोनो स्कूल म अचानक पहुंच जाय ले शिक्षक मन म बड़ प्रभाव परय। ओ मन हमेसा सजग रहंय कि ठाकुर साहब कब उंखर शाला म आ जहीं। इही बात आन विभाग मन के कर्मचारी मन बर घलोक लागू होत रहिस। मुनिसपल कमेटी के कर्मचारी मन म जऊन अनुशासन अऊ कर्त्तव्यनिष्ठा ओ समय रहिस, ओखर प्रमुख कारन ठाकुर साहब के औचक जांच ह रहिस। शहर म ओ मन अक्सर पैदल घूमत रहिन। रात के बारा एक बजे घलोक 4 मील दूरिहा नल घर के निरीक्षण करे बर पैदल ही रेंग देत रहिन। माननीय महंत श्री लक्ष्मनारायण दास जी ह ठाकुर साहब के विसय म लिखे रहिन ’सन् 1933 ले मैं ह ये बराबर अनुभव करे हंव कि रायपुर ल उपर उठइया अऊ आगू बढइया कोनो हे त सिरिफ ठाकुर प्यारेलाल सिंह ही हे। ऊंखर सिवाय अतका त्याग करइया कोनो नइ रहिन।’

य े सब करे के बाद घलव ठाकुर प्‍यारे लाल के शासन संग मतभेद रहिस। ये मतभेद के पीछू शासन के कारिंदा मन के चाल रहिस। सरकार के कारिंदा मन चाहत रहिन कि मुनिसपल कमेटी अपन बिजली व्यवस्था बेच दय। फेर ठाकुर साहब एखर विरोधी रहिन। ओ मन प्रजातंत्र अऊ सत्ता के विकेन्द्रीकरण म विश्वास करत रहिन। बिजली व्यवस्था मुनिसपल कमेटी के हाथ ले निकाल के शासन ल सौंप देहे के मतलब रहिस, प्रकाश व्यवस्था बर नगर ल दूसर के मुंह ताके ल परय, अऊ शासन कोति ले जउन टेक्स बढ़ाए जाये ओला चुपचाप जनता सहत रहय। दुसर बात मुनिसपल कमेटी के हाथ म बिजली व्यवस्था होए ले मुनिसपल ल हर साल 25,000 रूपिया के आमदनी तको होत रहिस। ए आमदनी ल अऊ बढाए जा सकत रहिस। ओ समय बिजली व्यवस्था जनता के प्रतिनिधि मन कोति ले संचालित होत रहिस। बिजली बेचे के मतलब रहिस प्रजातंत्र के सिद्धांत ले विलग होना। ये खातिर उमन बिजली व्यवस्था शासन ल सौंपे ले इंकार कर दीन। एखर से शासन ठाकुर साहब ले नाराज हो गीस।



शासन के आरोप येहू रहिस कि मुनिसपल कमेटी के आर्थिक व्यवस्था ठीक नइ हे। ठाकुर साहब ह एकर घलोक समाधान कारक उत्तर दीन। उमन लिखिन कि ऊंखर रहत कम समय म ही रायपुर मुनिसपल कमेटी के डेढ लाख के जुन्ना करजा अदा करे गए हे। गुढियारी ल कमेटी म लेके 50 हजार सालाना आमदनी बढाए गए हे, जम्मो जुन्ना दबे टैक्स के रकम वसूल हो गए हे, अइसे म ये आरोप लगाना अन्यायपूर्ण हे।

असल बात तो ये रहिस कि ठाकुर साहब ह गंज व्यापारी मन ल नाराज कर दे रहिन। उंखर नाराजगी के कारन ये रहिस कि आक्ट्राय नियम के अनुसार अनाज के टैक्स नाका म ही पटाए जाना चाही। फेर व्यापारी मन नाकेदार संग मिल के बिना नाका महसूल पटाए गंज म गाड़ीं ले आत रहिन। गंज म मनगरजी महसूल देवत रहिन नइ तो नइ देवत घलव रहिन। ए प्रकार के भ्रष्टाचार के जानकारी जब ठाकुर साहब ल मालूम चलिस त उमन नाकेच म महसूल वसूले के हुक्म दीन, अऊ ये नियम बना दीन कि जऊन व्यापारी महसूल पटाही उही ह सामान गंज ले जा पाही। ए निर्णय के विरोध म व्यापारी मन ह हड़ताल घलोक करिन, फेर नियम हटाए नइ गीस। एखर से मुनिसपल कमेटी के राजस्व आय करीबन दू लाख्र रूपिया बाढ़ गीस। व्यापारी मन शासन से शिकायत करिन त शासन ह मुनिसपल कमेटी ल भंग कर दीस।

ठाकुर साहब के मुनिसपल कमेटी ल भंग करे के एक अऊ कारन रहिस वो ये कि रायपुर म्युनिसिफल कमेटी के अंतर्गत जऊन तीर तार के गांव जइसे टिकरापारा, कुशालपुर, डंगनिया, चिरहुलडीह, फाफाडीह, राजा तालाब आदि सामिल करे गए रहिस, ऊंखर किसान अऊ बसुंदरा मनखे मन के बस्ती के जमीन म वो मनखे मन के कोनो अधिकार नइ रहिस। ठाकुर साहब ओ जमीन म उंखर अधिकार देहे के बात करंय। ठाकुर साहब के ए बात ले ओ गांव के मालगुजार मन उंखर ले नाराज हो गए रहिन। ए मालगुजार मन म ले कुछ मुनिसपल के सदस्य घलोक रहिन। उमन घलोक कमेटी ल भंग करे म ठाकुर साहब के बिरोध म शासन ल सहयोग करिन। ए प्रकार कमेटी भंग हो गीस, फेर ठाकुर साहब के ओखर से कुछ नइ बिगड़िस। एखर उलटा जनता के हृदय म ठाकुर साहब बर सम्मान अउ बाढ़ गीस।

संजीव तिवारी
संदर्भ : त्‍यागमूर्ति ठा.प्‍यारेलाल – हरि ठाकुर
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पं. दीनदयाल उपाध्याय : व्यक्तित्व अउ कृतित्व
– संजीव तिवारी

जनम अउ शिक्षा
कभू-कभू धरती के जनमानस ल नवा दिशा देहे अऊ जुग बलदे के उदीम ल पूरा करे बर युग पुरूष मन के जनम होथे। ओ मन संकट के समय म जनम लेहे के बाद घलोक अपन जनमजात चमत्कारिक प्रतिभा ले बड़े ले बडे़ काम पूरा करके अन्तरध्यान हो जाथें। बीसवीं शताब्दी के सुरू म भारतीय क्षितिज म कुछ अइसनहे जाज्ज्वल्यमान नक्षत्र मन के उदय होइस। जेमन अपन प्रकाश ले भारत वसुन्धरा ल आलोकित कर दीन। ए काल खण्ड म दू प्रकार के व्यक्तित्व मन के दर्शन होइस, एक तो ओ मन जऊन पाश्चात्य जगत ले शिक्षा दीक्षा प्राप्त करके आइन अऊ उहां के भोगवादी संस्कृति के आकर्षण ले कुछ करे ल लालायित रहिन। दुसर तरफ कुछ अइसन मनखे के भारत के धरा म आगमन होइस जऊन पस्चिमी जगत के वैभव वाले भोगवादी संस्कृति ल नकारत भारतीय संस्कृति ल नवा आयाम देहे म जुट गइन, काबर कि उंखर विश्वास रहिस कि गुलामी के सेती भारतीय सनातन ज्ञान परम्‍परा ला खतम करे के षडयन्त्र रचे गए हे।
स्वामी विवेकानंद अऊ महर्षि अरविन्द के गौरवशाली भारतीय परम्परा ल आगू बढइया प्रखर राष्ट्रभक्ति के अलख जगइया बहुमुखी प्रतिभा के धनी ‘एकात्म मानव वाद’ के प्रणेता महामानव पं. दीनदयाल जी उपाध्याय के जनम 25 सितम्बर 1916 (विक्रम सम्बत 1973, शालिवाहन शक 1938, भाद्रपद अश्विन कृष्ण 13) सोमवार के दिन राजस्थान प्रान्त के जयपुर-अजमेर रेलवे लाइन म स्थित ’धनकिया’ नाम के रेलवे स्टेशन म होय रहिस। पं दीनदयाल जी के नाना पं. चुन्नीलाल जी शुक्ल ’धनकिया’ म स्टेशन मास्टर रहिन। इखंर जनम के समय इंखर माता जी अपन पिता तिर ’धनकिया’ म ही रहत रहिन।
पं. दीनदयाल जी के पूर्वज मथुरा जिला के आगरा मथुरा मार्ग म स्थित ’फरह’ कस्बा ले एक किलोमीटर पिछौत म ’नगला चन्द्रभान’ नाम के गांव म रहत रहिन जिहां दुर्भाग्य ले पण्डित जी कभू नइ रह सकिन। पं. दीनदयाल जी के आजाबबा पं. हरीराम जी शास्त्री अपन क्षेत्र के प्रसिद्ध ज्योतिषी रहिन। शास्त्री जी अपन भाई श्री झण्डूलाल जी भतीजा शंकर अऊ वंशीलाल पुत्र भूदेव, रामप्रसाद अउ प्यारेलाल के संग ए छोट कन गांव म रहत रहिन। पं. हरीराम जी शास्त्री के मृत्यु के पाछू ए कुटुंब म मौत के अइसन सिलसिला सुरू होइस कि पूरा कुटुंब के पुरुष सदस्य मन के कुछु ना कुछु कारन ले मौत होए लगिस। पूरा कुटुंब म सिरिफ विधवां मन भर बांचे रहि गीन, जिंकर जीवन के अधार पं.रामप्रसाद जी के एक मात्र पुत्र भगवती प्रसाद रहिन। भगवती प्रसाद पढ़ लिख के बडे़ होइन अऊ धर्मपरायण श्रीमती रामप्यारी ले उंखर बिहाव होइस। आर्थिक चिन्ता ले बिवश होके ओ मन ल रेलवे म नौकरी करना परिस। उमन उत्तर प्रदेश के जलेसर रोड रेलवे स्टेशन म स्टेशन मास्टर के पद म काम करे लगिन। पूरा कुटुंब के खरचा अउ छोट कन नौकरी, पुरत नई सहिस तेकर सेती भारी पांव के अपन धर्मपत्नी श्रीमती रामप्यारी ल ऊंखर पिता श्री चुन्नीलाल जी तीर ’धनकिया’ (राजस्थान) भेज दीन। अउ पं. दीनदयाल जी के जनम उन्‍हें ’धनकिया’ म होइस। नाना घर म जनम होए के सेती पंडि़त जी ल अपन ननिहाल ले गहरा सम्बन्ध रहिस।
कुछ दिन के बाद पंडि़त जी के माता श्रीमती रामप्यारी अपन पति तिर वापस आ गइन अऊ दू साल के बाद दूसर पुत्र ल जनम दीन जेखर नाम शिवदयाल रखे गीस। पं. दीनदयाल जी के बचपन के नाम “दीना“ अउ शिवदयाल के “शीबू“ रहिस। शिवदयाल के जनम के छः महिना बाद मने पं. दीनदयाल जी के जनम के ढाई साल बादेच इखंर पिता श्री भगवती प्रसाद जी उपाध्याय के निधन हो गीस। दुनों भाई माँ के संग फेर नाना तीर रहे लागिन। पण्डित जी छै साल के रहिस होही उही समें उंखर माता श्रीमती रामप्यारी क्षयरोग बिमारी के कारन स्वर्ग सिधार गइन।
“दीना“ सही म “दीना“ (अनाथ) रहि गीस। पं. दीनदयाल जी के पारिवारिक जीवन अड़बड़ दुःखमय रहिस। बचपन ले उंमन अपन मयारू मन के मृत्यु के दुख ल सरलग सहत आइन। ओ मन कभू अपन पैतृक निवास म नइ रह पाइन। पारिवारिक कारन से उंखर लइकई नाना चुन्नीलाल के संग धनकिया म बीतिस। ढ़ाई बछर के रहिन उही समे उंखर ऊंखर पिताजी के देहान्त हो गए। थेरकेच दिन म विधवा अउ दुखी मां रामप्यारी क्षयरोग ले ग्रस्त गीन अऊ सरग सिधार दीन। वो समें पं. दीनदयाल जी ल छै-सातेच साल के रहिन, दीनदयाल ल माता पिता दुनों के मया नइ मिल पाइस।
एकर पाछू पं. दीनदयाल जी के नाना पं. चुन्नीलाल जी शुक्ल नौकरी छोड़ के “दीना“ अऊ “’शीबू“ के संग अपन गांव ’गुड के मडई’ आगरा चले आइन। ’गुड के मडई’ आगरा जिला म फतेहपुर सीकरी तीर स्थित छोटकुन गांव रहिस। इहीं गांव पं. दीनदयाल जी के सही ननिहाल रहिस पण्डित जी के उम्मर अभी 9 साल रहिस कि ऊंखर पालक नाना श्री चुन्नीलाल जी शुक्ल सितम्बर 1925 म स्वर्ग सिधार गइन। पिता, माता अउ नाना के मया टुटे लइका मन अपन ममा श्री राधारमण शुक्ल के कोरा म पले लगिन। श्री राधारमण शुक्ल गंगापुर म सहायक स्टेशन मास्टर रहिन।
पं. दीनदयाल जी सन् 1925 म अपन मामा श्री राधा रमण शुक्ल के संग गंगापुर सिटी चल दीन इन्हें उंखर पढ़ई सुरू होइस। कक्षा चार तक के पढ़ई उमन गंगापुर म करिन, आगू के पढ़ई के व्यवस्था इन्‍हां नइ होए के सेति इंखर मामाजी ह ’दीना’ ल आगू के पढाई बर कोटा (राजस्थान) भेज दीन। उहां उंखर ’सेल्फ सपोर्टिंग हाउस’ म रहे के व्यवस्था कर दीन। इन्हें दीना ह स्वावलम्बन के पाठ सिखिस। तीन साल के कडा़ मेहनत के बाद उमन मिडिल (कक्षा-7) के परीक्षा पहिली श्रेणी म उत्तीर्ण करिन। पं. दीनदयाल जी जब कक्षा 7 म पढत रहिन उही समें सन् 1930 म ऊंखर पितातुल्य मामा श्री राधारमण शुक्ल के घलोक देहान्त हो गीस। पंडि़त जी के उमर वो समें पन्द्रा साल के रहिस, अब पिता के घर अउ ममा के घर दुनों जघा म परिवार के पुरूष सियान मन सिरा गींन। पिता के घर म दू दादी बांचे रहिन अऊ इहां नानी मामी, आघू के पढ़ई उंखर बर अब समस्‍या होगे। पण्डित जी के मामा श्री राधारमण शुक्ल के चचेरा भाई श्री नारायण जी शुक्ल ’राजगढ’ जिला अलवर म स्टेशन मास्टर रहिन। पण्डित जी के आघू के पढ़ई बर उंमन आश्रय देहे ल तइयार हो गइन। पंडि़त जी सन् 1932 म राजगढ चल दीन। इहां ’दीना’ ह दू साल बिताइन अउ आघू के परीक्षा पास करिन। पं. दीनदयाल जी अपन पढ़ई म अतिक प्रतिभा वाले रहिन कि जब ओ मन कक्षा नौ म पढत रहिन त कक्षा दस के पढ़ईया लईका घलोक उंखर ले गणित के सवाल हल करवावंय।
जब दीनदयाल जी कक्षा नौ म पढत रहिन ओ मन अट्ठारा साल के रहिन कि छोटे भाई शिवदयाल टाइफाइड बिमारी ले पीडि़त हो गीस। लाख उदीम के बाद दीनदयाल जी शीबू ल नइ बचा पाइन। दीनदयाल जी शीबू के मृत्यु ले अत्यन्त विचलित हो उठिन, जिंकर सुरता जीवन म कभू नइ भुला पाइन। अभी तक पं. दीनदयाल जी ह अपन पालक मन के सरलग मृत्यु के दुःख सहन करे रहिन, फेर 7 नवम्बर सन् ।934 को ऊंखर पालित छोटे भाई शीबू के देहान्त ह ओ मन ल अन्दर ले झकझोर दीस। सन 1934 म श्री नारायण शुक्ल (मामा) के स्थानान्तरण ’सीकर’ होए के कारण दीनदयाल जी ऊंखर संग ’सीकर’ आ गईन अऊ महाराजा कल्याण सिंह हाईस्कूल म प्रवेश ले लीन। उन्नीस साल के आयु म सन् 1935 म पण्डित जी अजमेर बोर्ड म पहिली नम्‍बर ले पास होइन, पूरा बोर्ड म उंखर नम्‍बर सबले जादा रहिस।
ये बात ले प्रभावित होके सीकर के महाराज कल्याण सिंह ह उमन ल स्वर्ण पदक ले सम्मानित करिन अऊ आघू के पढ़ई बर ।0 रुपये महिना छात्रवृत्ति अउ 250 रुपया के एक मुश्त आर्थिक सहायता प्रदान दीन। दूसर स्वर्ण पदक अजमेर बोर्ड कोति ले ओ मन ल प्रदान करे गीस। उमन इण्टरमीडियेट के पढाई बर सन् 1935 म ’पिलानी’ (राजस्थान) आ गंय। वो समें पिलानी उच्‍च शिक्षा के प्रसिद्ध केन्द्र रहिस, उमन पिलानी के बिडला इण्टर कालेज म प्रवेश ले लीन। सन् 1937 म इमन इण्टरमीडियेट बोर्ड के परीक्षा म बईठिन अऊ न केवल समस्त बोर्ड म सर्वप्रथम रहिन वरन सब विषय म विशेष योग्यता अंक प्राप्त करे रहिन। बिडला कालेज के ये पहिली छात्र रहिन जऊन हर अतिक सम्मानजनक नम्‍बर ले परीक्षा पास करे रहिन। सीकर महाराज के जइसे घनश्याम दास बिडला ह पंडित जी ल स्वर्ण पदक अउ ।0/- रुपया मासिक छात्रवृत्ति अउ पुस्तक बिसाए बर 250/- रुपया प्रदान करिन। बी.ए. के पढ़ई करे बर सन् 1937 म दीनदयाल जी पिलानी ले कानपुर आइन अऊ एस.डी. (सनातन धर्म) कालेज म प्रवेश लीन।
इहां पढ़त समें उंखर संग श्री बलवन्त जी महाशिन्दे अऊ श्री सुन्दर सिंह भण्डारी घलव पढ़त रहिन। इमन ह पंडि़त जी ल मा. भाऊसाहब देवरस ले मुलाकात करवाइन। देवरस जी पंडि़त जी के प्रतिभा के कायल रहिन उमन पंडि़त जी ल राष्ट्रीय स्‍वयं सेवक संघ म स्‍वयं सेवक बने ल प्रेरित करिन। पंडि़त जी शाखा म सरलग जाए लगिन अउ बौद्धिक क्रियाकलाप मन म आघू बढ़ के हिस्‍सा ले लगिन। बाबा साहब आमटे, दादा राव समर्थ इंखर छात्रावासे च म रूकत रहिन। स्वतन्त्र्य वीर सावरकर ह दीनदयाल जी के शाखा म अपन बौद्धिक देवंय। वेदमूर्ति पण्डित सातवलेकर जी कानपुर के शाखा म जब आइन अऊ पं. दीनदयाल उपाध्याय से मिलिन। पण्डित सातवलेकर जी शाखा म दीनदयाल के बारे म भविष्य वाणी करिन कि कोनो दिन बड़े होके ये कुशाग्र बालक देश के गौरव बनही। कानपुरेच म पण्डित जी के सम्बन्ध श्री बापूराव जी मोघे, श्री भइयाजी सहस्‍त्र बुद्धे, श्री नानाजी देशमुख अउ बापूराव जोशी जइसे राष्ट्रीय स्‍वयं सेवक संघ के कार्यकर्ता मन ले होइस। इहिंचे उंखर भेंट संघ के संस्थापक परमृपूज्य डा. केशवराव बलिराम हेडगेवार ले घलव होइस। इही मेर ले पंडि़त जी के सार्वजनिक जीवन म प्रवेश हो गीस। उही समें कमजोर पिछड़ा पढ़ईया लईका मन के पढ़ई के बढ़ोतरी बर उमन एक ’जीरों क्लब’ के स्थापना करिन जेखर उद्देश्य परीक्षा म शुन्य अंक पवइया छात्र मन ल आन छात्र के समकक्ष लाना रहिस। दीनदयाल जी ओ लइका मन मन ल खुदे पढा-लिखाके अतका समर्थ बना देवत रहिन कि ओ कमजोर लइका मन परीक्षा म उत्तीर्ण हो जात रहिन। एखर से विद्यार्थी समाज म पंडि़त जी के लोकप्रियता अऊ व्यापक हो गीस। सन् 1930 म पण्डित जी ह पहिली श्रेणी म बी.ए. के परीक्षा पास करिन। एम.ए. अंगरेजी साहित्‍य के शिक्षा बर आगरा के सेन्ट जॉन्स कालेज म उमन प्रवेश लीन। सन् 1940 म एम.ए. पहिली साल के परीक्षा म पहिली श्रेणी के अंक प्राप्त करिन। इहां वो राजा के मण्डी म किराया के मकान ’रत्ना बिंल्डिंग’ म रहत रहिन। इही समय उंखर एक ममेरी बहिनी रामादेवी बहुत बीमार हो गीस, वो ह इलाज कराए बर आगरा आइस। दीनदयाल जी अपन बिमार बहिन के सेवा करे म व्यस्त रहे लगिन। ए बखत उमन तीन काम एक संग करत रहिन, पढ़ई, संघ के काम अऊ बहिनी के सेवा। एम.ए॰ दूसर साल के परीक्षा लकठियाए रहिस ऊंखर आघू धरमसंकट रहिस कि परीक्षा के तइयारी करंव के बहिन के तीमारदारी करंव? बहिनी के तकलीफ ल देख के पंडि़त जी किताब-पोथी एक कोति रख के जादा बेरा अपन बहिनी के सेवा-दवई अउ इलाज कराए म लगाए लगिन। पंडि़त जी बहिनी के सेवा म रातदिन एक कर दीन, सब उदीम करिन, प्राकृतिक चिकित्सा बर उमन ल पहाड म तको ले गइन फेर रामादेवी नइ बांचिस। ए सब के सेती पंडि़त जी एम.ए॰ उत्तर्राद्ध के परीक्षा म नइ बइठ पाइन। परीक्षा नइ देहे के सेती सीकर अऊ बिडला के दुनों छात्रवृत्ति मन बन्द हो गंय। ममा जी के आग्रह म पंडित जी एक पइत प्रशासनिक परीक्षा म घलोक बइठिन ओमा पास तको होइन फेर ए नौकरी ल ठुकरा के बी. टी. करे बर प्रयाग (इलाहाबाद) चल दीन। सन् 1942 म उमन बी.टी. के परीक्षा पहिली श्रेणी म उत्तीर्ण करिन।
एखर बाद उंखर प्रवेश सार्वजनिक जीवन म हो गीस अउ ओ मन अखण्ड प्रवासी हो गीन। मत्यु ह ऊंखर शिशु किशोर, बाल अउ युवा मन म सरलग आघात करे रहिस तेकर सेती ऊंखर मन म वैराग्य उत्पन्न होगए। उमन नवा-नवा जघा मन म प्रवास करना अउ नवा-नवा अपरिचित मनखे मन ले मिलना, उंखर मन म पारिवारिकता उत्पन्न करना उमन बचपन के ल ही सीखे रहिन, पूरा राष्ट्र उंखर घर-परिवार रहिस। सन् 1942 म राष्ट्रीय स्‍वयं सेवक संघ के लखीमपुर जिला के प्रचारक नियुक्त होके राष्ट्र के कारज बर कटिबद्ध हो गइन। सरलग प्रवास अऊ संगठन के काम म देश के कोना-कोना म लाखों स्‍वयं सेवक मन ले मधुर स्नेहपूर्ण आत्मीय सम्बन्ध के स्थापना ही ह पण्डित जी के एकेच काम रहिस। संघ के विचारधारा ले ओतप्रोत पण्डित जी ह संघ काज अपन जीवन म उतार लीन अऊ इन्‍हें ले ऊंखर सार्वजनिक जीवन के श्रीगणेश होइस।

पुस्‍तक अंश…
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सुरता : डॉ. विमल कुमार पाठक

डॉ. विमल कुमार पाठक सिरिफ एक साहित्यकार नइ रहिन। उमन अपन जिंदगी म आकाशवाणी म उद्घोषक, मजदूर नेता, कॉलेज म प्रोफेसर, भिलाई स्टील प्लांट म कर्मचारी, पत्रकार अउ कला मर्मज्ञ संग बहुत अकन जवाबदारी निभाईन। आकाशवाणी रायपुर के शुरुआती दौर म उंखर पहिचान सुगंधी भैया के रूप म रहिस अउम केसरी प्रसाद बाजपेई उर्फ बरसाती भैया के संग मिलके किसान भाइ मन बर चौपाल कार्यक्रम देवत रहिन। एखर ले हटके एक किस्सा उमन बताए रहिन -27 मई 1964 के दिन आकाशवाणी रायपुर म वोमन ड्यूटी म रहिन अउ श्रोता मन बर सितार वादन के प्रसारण जारी रहिस। कान म लगे माइक्रोफोन म एक म सितार वादन सुनत रहिन तो दूसरा ह दिल्ली ले जुड़े रहिस। एती सितार वादन के रिकार्ड बजते रहिस के अचानक माइक्रोफोन म दिल्ली ले सूचना आईस कि ”हमारे देश के प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू का निधन हो गया।” तब के बरेा ओ मुश्किल हालात ल उमन कइसन अपन आप ल संभालिन अउ सितार वादन बंद करके नेहरूजी के निधन के सूचना देत श्रोता मन ल दिल्ली स्‍टेशन ले जोडि़न, ये प्रसारण जगत बर एक केस स्टडी हो सकत हावय।
एक दौर म डॉ. पाठक छत्तीसगढ राज्‍य आंदोलन के तहत भिलाई स्टील प्लांट म स्थानीय लोगन मन ल नौकरी म प्राथमिकता देहे बर बेहद मुखर रहिन, तब ओ मन पत्रकारिता घलोक करत रहिन अउ भिलाई स्टील प्लांट के परमानेंट मुलाजिम घलोक हो गे रहिन। दिन म नौकरी के बेरा अपन अफसर मन के हुकुम मानय अउ नौकरी के बाद ओही अफसर मन के घर मजदूर मन ल ले जाके धरना प्रदर्शन घलोक करवावंय अउ फेर ओखर खबर घलोक अपन अखबार म छापंय। ये अउ मजे के बात के अपन अखबार बर विज्ञापन घलोक भिलाई स्टील प्लांट से लेवंय। आज शायद एके मनखे अतेक ‘रोल’ एके संग नइ निभा पावंय।

भिलाई स्टील प्लांट के छत्तीसगढ़ी लोक कला महोत्सव के शुरूआत करे ले लेके ओला ऊंचाई देहे वाले तिकड़ी म रमाशंकर तिवारी, दानेश्वर शर्मा के संग तीसर सदस्य डॉ. पाठक रहिन। साहित्यकार के तौर म उंखर कलम हमेशा जीवंत रहिस। भिलाई इस्पात संयंत्र के नौकरी के संग उमन यश घलोक खूब कमाइन तो कई बार आलोचना के घेरे म घलोक रहिन। खास कर श्याम बेनेगल के धारावाहिक ”भारत एक खोज” म पंडवानी सुनात तीजन बाई के दृश्य म मंजीरा बजात बइठे म समकालीन लोगन मन हर उखर उपर कई सवाल उछाले रहिन।

बीते डेढ़ दशक म लगातार गिरत सेहत के बावजूद हमर जइसे पत्रकार मन ल ‘खुराक’ देहे बर उन हमेशा तैयार रहंय। पूरा हिंदोस्तान के बहुत से चर्चित हस्ति म न के संग ऊंखर कई अविस्मरणीय संस्मरण रहिस। हाल के कुछ दिन मन म उंखर सेहत लगातार गिरत रहीस। अब ऊंखर गुजरे के खबर आईस। जइसे उमन खुदे बताए रहिन कि उंखर अतीत आपाधापी ले भरे अउ संघर्षमय रहिस अउ बाद के दिन मन म उमन नाम-वैभव खूब कमाइन। फेर हकीकत ये हावय कि ए सब म भारी उंखर बेहद तकलीफदेह बुढ़ापा रहिस।

पहली तस्वीर कल्याण कॉलेज सेक्टर-7 म हिंदी के प्रोफेसर रहे डॉ. पाठक (बाएं से तीसर) के तत्कालीन सांसद मोहनलाल बाकलीवाल अउ कॉलेज कुटुंब के संग के हावय अउ दुसर तस्वीर सुपेला रामनगर म ओ जगह के हावय, जिहां आज शासकीय इंदिरा गांधी उच्चतर माध्यमिक शाला हावय। 1967 म उहां एक निजी स्कूल चलत रहिस अउ ”वक्त” फिल्म के सुपरहिट होए के ठीक बाद बलराज साहनी अपन जोहरा जबीं (अचला सचदेव) के संग भिलाई स्टील प्लांट के कार्यक्रम म आए रहिन। निजी स्कूल के बुजुर्ग संचालक हर पत्रकार विमल पाठक के माध्यम ले अनुरोध भिजवाइन त बलराज साहनी टाल नइ सकिन अउ अगले भिनसरहा बच्चा मन बर मिठाई अउ तोहफा लेके स्कूल आ पहुंचिन। तस्वीर म बलराज साहनी के पीछू अचला सचदेव अउ ऊंखर ठीक बाजू पत्रकार पाठक अउ ऊंखर बाजू स्व. डीके प्रधान नजर आवत हें। स्व. प्रधान देश के प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के बड़ी मौसी के बेटा रहिन अउ इहां भिलाई स्टील प्लांट म अफसर रहिन।

मो. जाकिर हुसैन के मूल हिन्‍दी पोस्‍ट के छत्‍तीसगढ़ी अनुवाद संजीव तिवारी द्वारा







श्रद्धांजलि – गीत संत: डॉ. विमल कुमार पाठक

हमर जइसे कबके उबजे कोलिहा का जाने खलिहान मन के सामरथ म डॉ. विमल कुमार पाठक के व्यक्तित्व अउ कृतित्व के उपर बोलना आसान नइ हे. तभो ले हम बोले के उदीम करत हन आप मन असीस देहू. एक मनखे के व्यक्तित्व के महत्व अउ ओखर चिन्हारी अलग अलग लोगन मन बर अलग अलग होथे. इही अलग अलग मिंझरा चिन्हारी ह ओखर असल व्यक्तित्व के चित्र खींचथे. जइसे हमर मन बर ‘राम‘ ह भगवान रहिस त केवटराज बर ‘पथरा ला मानुस बनईया चमत्कारी मनखे‘, परसराम बर धनुस ला टोरईया लईका.. आदि इत्यादि. त छत्तीसगढ़ राज्य आन्दोलन के प्रमुख आन्दोलनकारी, भिलाई स्पात संयत्र के माध्यम ले छत्तीसगढ़ के लोक कला ला एक नवा आयाम देवईया अधिकारी, साहित्यकार, ख्यात मंचीय कवि, प्रखर पत्रकार, डॉ.विनय कुमार पाठक के बड़े भाई डॉ. विमल कुमार पाठक.. आप बर अउ मोर बर अलग अलग आय.

उंखर व्यक्तित्व के आंकलन मोर हिरदे म एक समग्र मानव के रूप म हावय जेखर हिरदे म प्रेम, दया अउ सहानुभूति हे. सबले बड़े बात के उमन आज तक ले तप करत हांवय, दुखमय जिन्दगी के बावजूद मुस्कान ढ़ारत रचनासील हांवय ये मोला बड़ नीक लागथे, उंखर इही व्यक्तित्व हम युवा मन ला प्रेरणा देथे. डॉ. पाठक जी कोनो जघा ये बात ला लिखे घलो हांवय के चलते रहो चलते रहो.

मैं दू-तीन बरिस पहिली जब उंखर मेर मिले उंखर घर गे रेहेंव तेखर पाछू अपन ब्लॉग म उंखर बारे म लिखे रेहेंव के छत्तीसगढ के नामी साहित्यकार डॉ. विमल कुमार पाठक पाछू कइ बछर ले अडबड गरीबी म दिन गुजारत हांवय. उखर हाल देख-सुनके मोला दुख के संग अति अचंभा होइस. सरलग गिरे हपटे अउ बीमारी म पानी कस पइसा बोहाए के पाछू आजकल डॉ. पाठक छत्‍तीसगढ सासन कती ले साहित्‍यकार मन ला मिलत मानदेय अउ पत्र-पत्रिका मन म प्रकासित लेख के मानदेय म अपन गुजारा करत हावय. एक समय रहिस जब डॉ. पाठक भिलाई स्पात संयंत्र के प्रसार अधिकारी रहिन तब उनखर नाम के डंका चारो मूडा लोक कला अउ साहित्‍य के पुरोधा के रूप म बाजय. जम्मा संसार म लोहा उदगारे बर बजरंगा भिलाई स्पात संयंत्र के सामुदायिक विकास विभाग के माइ मूड के अब का हाल हावय येला आप मन सब देखते हावव, वैभवपूर्ण पद म काम करे डॉ. पाठक ये हाल म घलव पहुंच सकते हें, विस्वास नइ होवय, फेर इही नियति आय.

आप सब मन ये समय के फेर जानत हावव, अउ इहू जानत हावव के डॉ.पाठक जी ल ये सबके चिंता नइ हे, ना वो ह ये बात ला सोंचय. समय ले जूझत डॉ.पाठक जी के जीवन निराला जइसे कठोर हो गे हावय जेखर भीतर ले संवेदना रूपी गीत मन के उलुव्हा पीका लगातार फूटत हावय.

अब गोठ बात डॉ. पाठक के साहित्यिक व्यक्तित्व के, त पाठक जी के रचना यात्रा बड़ लम्बा हावय. देस भर म कवि सम्मेेलन के मंच, रेडियो, टीबी मन म छत्तीसगढ के धजा फहरावत, पेपर गजट मन म छपत लगभग ३० किताब के प्रकासन तक, डॉ.पाठक जी के लिखइ आज तक ले चलत हावय. डॉ.पाठक जी हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी दूनों भाषा म लिखथें, साहित्य सृजन बर उंनला कोरी कोरी पुरस्कार अउ सम्मान मिले हावय.

उंखर रचना यात्रा म गद्य अउ पद्य दू विधा देखे बर मिलथे, मोर उंखर गद्य ले भेंट प्रखर समाचार म छपत सरलग कड़ी “कहां गए वे लोग” ले होइस. ये कड़ी अंदाजन ६० ठन छपिस, जेमा हमर पुरखा मन के मान बढ़इया हमर सियान मन के बारे म पाठक जी ह बड़ सहज अउ सरल ढ़ग ले लिखे हांवय. ये कड़ी पाछू म एक किताब के रूप म “छत्तीसगढ के हीरे” के नाव ले छपिस. जीवन परिचय जइसे सहज लेखन ला रूचिकर बनाये के कला ये किताब म देखे बर मिलथे. समाज, संस्कृति, परम्परा अउ इतिहास संग परिस्थिति के ताना बाना जोड़त डॉ.पाठक जी ह भूले बिसरे सियान मन के जउन गौरव गाथा लिखे हांवय वो ह छत्तीसगढ़ के एतिहासिक दस्तावेज बन गए हावय. ये अकेल्ला एक ठन किताब ह उंखर लेखन ला अमर करे के समरथ रखथे.

मैं डॉ.पाठक जी के जम्मो रचना ला पढे सुने त नइ हंव, फेर जतका ला पढे सुने हांवव ततकेच म मोर हिरदे म उखर संवेदनसील कवि के व्यक्तित्व परखर रूप म उभर के सामने आथे. डॉ.पाठक जी गीत कवि आंए, उमन परम्परा ले जुरे प्रेम, सौंदर्य अउ दर्सन के गीत लिखथें. उमन हिंदी गीत मन म घलव हमर आंचलिक संवेदना ला उभार के आघू लाथें. इंखर कविता म स्‍वर साधना अउ छंद-योजना लाजवाब रहिथे. इमन अपन रचना म गौ भक्ति अउ आध्यात्मिकता के सुर तको भरे हांवय जउन मन म बाबा सिरीज के गीत मन ला छांट दन त बांचे मन एके नजर म कखरो मान खातिर बनाये नजर आथे, सिरजे के भाव अउ अंतस के पीरा जइसे उंखर सौंदर्य अउ बिरोधी स्वर के गीत मन म हावय वो उमन म नइ हे.

अपन बिरोध के कविता मन म डा. पाठक दलित, किसान अउ कमइया मन के दुख ला सुर देवत समाज के बुराई अउ अनीत उप्पर तेल डार डार के खंडरी घलो निछथें. कोन जनी कब आही नवा बिहान म इमन कहिथें –
नेता मन बेंच डारिन अपन इमान,
कोन जनि कब आही नवा बिहान!
अफसर बेपारी मन बनके मसान,
पीस डारिन जनता ला,
कर दिन पिसान.
दमित सोसित मनखे के पीरा ह इनला अतका अंतस ले जियानथे के इही गीत म आघू कहिथें –
नइ तो फेर हम उठाबो धनुस, जहर बान,
मरकनहा मन के हम लेबोन परान.
ये कवि के हिरदे ले उदगरे अकुलइ ये, जहर बान धरइया मन के जल जंगल जमीन जब छिनाही त इही बात होही.

अइसन वामपंथी सुर के संगें संग इंखर छत्तीेसगढ़ी कविता मन म लोक जीवन के उभार घलो रहिथे, प्रेम, सौंदर्य, श्रृंगार, प्रकृति के संग इमन जनजीवन ल अपन गीत म बहुत सुघ्घर रंग म उतारथें-
चंदा झाकै चनैनी,
लरजत गरजत रात म.
धान के हरियर लुगरा पहिरय,
धरती हर चौमास म.
येमा चंदा के चनैनी ल झंकई अउ रात के लरजई गरजई संग देह के भाषा के मानकीकरन देखव, आघू इही गीत म कवि कहिथें- चूमा लेवय हवा, लजावय खेत खार हर, सांस म. अइसनेहे सौंदर्य के चित्र कवि अपन अडबड अकन गीत मन म कोनो मूर्तिकार कर गढे हावयं, तेन म कोनो कोनो जघा अतिरंजन घलो हो गए हे तइसे कस लागथे-
फरकय अंग अंग तोर अमरित,
पीके मैं हर गएंव मताय,
टिप टिप भरे रखे हस करसी,
दू ठो छाती म बंधवाए.

भक्ति, प्रेम सौंदर्य के पाछू कवि के प्रिय विसय प्रकृति आय, प्रकृति के दुख ला गोहरावत कवि पानी जइसे आम अउ खास जिनिस बर एक ठन लम्बा गीत रचथे जेमा पानी के सहारे जीवन ला जोरथे जउन म जवानी के घुरे ले पानी के महमहइ के बरनन करथें-
महर महर महकत मम्हावत हे पानी ह,
लागत हे घुरगे सइघो जवानी ह.
अइसनेहे प्रकृति के बरनन करत कवि छत्तीसगढी के सटीक सबद मन के घलो प्रयोग करथें जउन हा एक नजर म भले अटपटा लगथें फेर जब दूसर पइत सुनबे त सार बात समझ म आथे कि कइसे कवि ह पानी बरसइ ला लंगझग लंगझग कहिथे, फेर उही पानी जब नरवा नदिया तरिया म बरसथे त झिमिर झिमिर अउ रद रद रद पानी बरसइ के अंतर समझ म आथे.

अइसनेहे कइ ठन गीत हावय जउन कवि के कविता के असल सास्त्रीय रूप के बखान करथे. सबद मन के बाजीगर ये कवि ह अपन अउ समाज के अभी के हालत उप्पर कोनो कोनो जघा दुखी दिखथें, फेर अपन गीते म उमन येला फलियार के कहिथें कि कवि निरास बिल्कुल नइ हें उनखर आसा के डोर उखंर अडबड अकन गीत मन म परगट होये हे. उमन आवाज लगावत हें सब ला जुरमिल के ये संकट के घरी ला टारे बर-
आवव अधिंयारी ला मेटन,
हम पिरथी के बिटियन बेटन.
अपन मया के तेल अउ बाती,
चलव जलावन हम सरी राती.
आपो मन हरदम सुख पावौ,
सुख ला बांट बांट बगरावव.
दीया सही सुघ्घर बरके,
घर घर म अंजोर बरावव.
उंखर इही आसावादिता हमर मन बर प्रेरना आए अउ इही उखंर व्यक्तित्व अउ कृतित्व के सार आए.

संजीव तिवारी


इतवार १४ जुलाई, २०१३ के संझा वीणा पाणी साहित्य समिति कोती ले पावस गोस्ठी के आयोजन, दुर्ग म सरला शर्मा जी के घर म होइस. कार्यक्रम म सतत लेखन बर छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग के अधियक्छ पं.दानेश्वर शर्मा, जनकवि मुकुन्द कौशल, हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी के वरिष्ठ लेखिका डाॅ.निरूपमा शर्मा, संस्कृत हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी के वरिष्ठ लेखिका शकुन्तला शर्मा के सम्मान समिति ह करिस. ये अवसर म डॉ. विमल कुमार पाठक के घलव सम्मान होवइया रहिसे फेर डाॅ.पाठक कार्यक्रम म पधार नइ पाइन. कार्यक्रम बर डाॅ.पाठक के उप्पर लिखे मोर आलेख गुरतुर गोठ के पाठक मन बर प्रस्तुत हावय – Continue reading

गुनान गोठ : पाठक बन के जिए म मजा हे




एक जमाना रहिस जब मैं छत्तीसगढ़ी के साहित्यकार मन ल ऊंखर रचना ले जानव। फेर धीरे-धीरे साहित्यकार मन से व्यक्तिगत परिचय होत गीस। महूँ कचरा-घुरुवा लिख के ऊंखर तीर बइठे बर बीपीएल कारड बनवा लेंव। समाज म अलग दिखे के सउंख एक नसा आय, लेखन एकर बर सहज-सरल जुगाड़ आय। घर के मुहाटी भिथिया म दू रूपया चाउंर वाला नाम लिखाये के का रौब-दाब होथे, एला झुग्गी-झोपडी मुहल्ला म रहे ले महसूसे जा सकत हे। जइसन समाज तइसन उहाँ के अलग मनखे, मने विशिष्ठ व्यक्ति।

खैर, अलग दिखे बर, बन तो गयेंव साहित्यकार, कहाये लगेंव तमंचा.. फेर वोकर गुण-तत्व नई आ पाईस। समाज के मनखे, अपन गुण-तत्व कइसे बदलय? जइसे-तइसे संघर गयेंव, साहित्यिक जुरियाव म तको जाये लगेंव। पहिली लगय के मही भर मनखे आंव बाकी मन बौद्धिक आयं मने साहित्यकार। सुने रेहेंव के बौद्धिक मन, मनखे जइसे बहस-निंदा, खुसुर-फुसुर, जलनकुकड़ई नई करयं, वोला महसूस करथें अउ समाज के आघू अपन लेखनी के दरपन टांगथे। फेर धीरे-धीरे समझ म आ गए के जम्मो झन मनखेच आयं। अब मैं बीच म फदक गए हँव, न मनखे बन पावत हँव न साहित्यकार।

बड़ दिन बाद गम पायेंव, सुधि पाठक के साहित्यकार आन अउ साहित्यकार के साहित्यकार आन होथे। पाठक बन के जिए म मजा हे। आहितकार-साहितकार बने रहे म बाय हे।

© तमंचा रायपुरी



छत्तीसगढ़ी के सर्वनाम





मैं / मैं हर (मैं) – मैं दुरूग जावत रहेंव/ मैंं हर दुरूग जावत रहेंव।
हमन (हम) – हमन काली रईपुर जाबो।
तैं / तें हर (तुम) – तैं का करत हस? / तैं हर का करत हस?
तुमन (आप लोग) – तुमन कहां जावत हव। (बहुवचन)/ तुमन बने दिखत हव। (एकवचन)
ओ / ओ हर (वह) – ओ खावत हे। / ओ हर खावत हे।
ओमन (वे) – ओमन नई खईस।
ए,/ एहर (यह) – ए कुकुर आए। / ए हर कुकुर आए। (एकवचन)
एमन (ये) – एमन बिलासपुर ले आवत हें। (बहुवचन)

छत्‍तीसगढ़ी भाषा संबंधी हमारेे इस प्रयास में कोई त्रुटि या कमी हो तो कृपया टिप्‍पणी करके सुझाव देवें।



छत्तीसगढ़ी भांजरा

छत्तीसगढ़ी के मुहावरे

अकल लगाना = विचार करना
अंगठी देखाना = उंगली दिखाना
अंग म लगना = अंग में लगना
अंगरी जरना = उंगली जलना
अंधियारी कुरिया = अंधेरी कोठरी
अइसे के तइसे करना = ऐसी की तैसी करना
अकल के अंधवा होना = अक्ल का अंधा होना
अजर-गजर खाना = अलाय–बलाय खाना
अद्धर करना = अलग करना
अपन घर के बडे होना = अपने घर का बडा होना
आँखी-आँखी झूलना = आँखों ही आँखों में झूलना
आँखी-कान मूंदना = आँख-कान मूंदना
आँखी के कचरा = आँख का कचरा
आँखी के तारा = आँख का तारा
आँखी = आँख गडाना
आँखी गुडेरना = आँख दिखाकर क्रोध करना
आँखी फरकना = आँख फडकना
आँखी फार फार के देखना = आँखें फाड फाडकर देखना
आँखी म समाना = आँख में समाना
आँखी मटकाना = आँख मटकाना
आँखी मारना = आँख मारना
आँखी मिलना = आँखें मिलना




आँसू पी के रहि जाना = आँसू पीकर रह जाना
आगी उगलना = आग उगलना
आगी देना = आग देना
आगी बूताना = आग बुझाना
आगी म घी डारना =ऱ आग में घी डालना
आगी म मूतना = आग में मूतना
आगी लगना = आग लगना
आगी लगाके तमासा देखना = भग लगाकर तमाशा देखना
आघू-पीछु करना = हीला हवाला न करना
आघू-पीछु घुमना = चमचागिरी करना घुमना
आडी के काडी नि करना = कोई काम न करना
आन के तान होना = कुछ का कुछ हो जाना
आसन डोलना = आसन डोलना
आसरा खोजना = सहारा खोजना
इज्जत कमाना = इज्जत कमाना
उबुक चुकुक होना = डूबना उतराना
उलटा पाठ पढाना = उल्टा पाठ पढाना
एडी के रिस तरवा म चढना = अत्यधिक क्रोधित होना
एक कान ले सुनना = एक कान से सुनकर
दुसर कान से बोहा देना = दूसरे कान से निकाल देना
एक खेत के ढेला होना = एक खेत का ढेला होना
एक ताग नि उखाड सकना = कुछ भी न बिगाड सकना।
एक दु तीन होना = नौ दो ग्यारह होना
एक हाथ लेना दूसर हाथ देना = बराबरी का सौदा करना
एके लवडी म खेदना एक ही लाठी से हाँकना
एती के बात ओती करना = इधर की बात उधर करना
कचर-कचर करना = बकबक करना
कठवा के बइला = काठ का उल्लू
कन्हियाँ टूटना = कमर टूटना
कमर कसना = कमर कसना
करजा बोडी करना = कर्ज आदि करना
करम फूटना = भाग्य फूटना
करेजा निकलना = कलेजा निकल आना
काटे अंगरी नि मूतना = कटि अंगूली में न मूतना
कान म तेल डारे बइठना = कान में तेल डालकर बैठना
कान ल कौंआ ल जाना = कान को कौंआ ले जाना
कुल के दिया होना = कुल का दीपक होना
कोन खेत के ढेला होना = किस खेत का ढेला होना
कोरा भरना = गोद भरना
कोरा म लेना = गोद में लेना
खटपट होना = यथावत




खटिया धरना = खाट पकडना
खांध देना = कंधा देना
खाक छानना = खाक छानना
खाए के दाँत अलग = खाने के दाँत अलग और
देखाए के दाँत अलग = दिखाने के दाँत अलग होना
खुसुर पुसुर करना = खुसुर फुसुर करना
गंगा नहाना = गंगा स्नान करना
गडे मुरदा उखाङना = गडे मुर्दे उखाङना
गरवा पुछी छुना = गाय की पूँछ छूना
गांड जरना = मलद्धार जरना
गुड गोबर करना = गुड गोबर करना
गोड धोके पीना = पैर धो के पीना
परना = गांठ पडना
घुचुर-पुछुर करना = आगे-पीछे करना
चारी करना = चुगली करना
चुरी उतरना = विधवा होना
चुरी पहिराना = चूडी पहनाना
छाती म दार दरना = छाती पर मूंग दलना
जरे म नून = जले पर नमक छिडकना
जहाँ गुर तहाँ चाँटा होना = जहाँ गुड वहाँ चिंटा होना
जुच्छा हाथ होना = खाली हाथ होना
जे थारी म खाना ओही म छेदा करना = जिस थाली में खाना उसी में छेद करना
झक मारना = झक मारना
टुकुर-टुकुर देखना = टुकुर-टुकुर देखना
पीटना = टिंडोरा पीटना
डेरी हांथ के खेल होना = बाँए हाथ का खेल होना
तिडी-बिडी होना = तितर बितर होना
दाँत ल खिसोरना = दाँत निपोरना
धरती म पाँ नि मढाना = जमीन पर पैर न रखना
नाक कटोना = नाक कटाना
नाक घसरना = नाक रगड्ना
पहुना बनना = मेहमान बनना
पाठ–पीढा लेना = शिक्षा-दीक्षा लेना
पिंजरा के पंछी उड जाना = पिंजरे का पंछी उड जाना
पुदगा नि उखाड सकना = बाल न बाँका कर सकना
पेट म आगी बरना = पेट में चूहे कूदना
पोटार लेना = गले लगना




फूटहा आँखी म नि सुहाना = फूटी आँख न सुहाना
बनी भूति करना = मजदूरी करना
भोरका म गिरना = गडढे में गिरना
माटी के माधो = गोबर गणेश
मीट लबरा होना = मीठी छुरी होना
मुंह करिया कर डारना = मुंह काला कर डालना
मुड्भसरा गिरना = सिर के बल गिरना
मोर चिरई के एक गोड = मेरी मुर्गी की एक टांग
लुगरा चेंदरा तक बेचा जाना = कंगाल हो जाना
एक हंसिया के टेडगा होना = अनुशासन में रखना
हर्रा लागय न फिटकरी = हर्रा लगे न फिटकरी
हाथ उचाना = हाथ उठाना
हाथ झर्राना = पल्ला झाडना
हाडा गोड नि बाचना = हड्डी पसली न बचना।