Tag: Tejnath

बरखा रानी

बहुत दिन ले नइ आए हस,
काबर मॅुह फुलाए हस?
ओ बरखा रानी!
तोला कइसे मनावौंव?

चीला चढ़ावौंव,
धन भोलेनाथ मं जल चढ़ावौंव,
गॉव के देवी-देवता मेर गोहरावौंव,
धन कागज मं करोड़ों पेड़ लगावौंव।
ओ बरखा रानी……?

मॅुह फारे धरती,
कलपत बिरवा,
अल्लावत धान,
सोरियावतन नदिया-नरवा,
कल्लावत किसान…
देख,का ल देखावौंव?
ओ बरखा रानी…..?

मैं कोन औं
जेन तोला वोतका दूरिहा ले बलावत हौं?
मानुस,पसु,पक्छी,
पेड़-पउधा…
वो जीव-निरजीव,
जेखर जीवन,जरूरत,
सुघरई अउ सार तैं,
मैं तोर वोही दास आवौंव।
ओ बरखा रानी!
तोला कइसे मनावौंव?

केजवा राम साहू ‘तेजनाथ‘
बरदुली,कबीरधाम (छ.ग.)

जल अमरित

पानी के बूँद पाके,
हरिया जाथें, फुले, फरे लगथें पेड़ पउधा,
अउ बनाथें सरग जस,धरती ल।
पानी के बूँद पाके,
नाचे लगथे,
मजूर सुघ्घर, झम्मर झम्मर।
पानी के बूँद पाए बर,
घरती के भीतर परान बचाके राखे रहिथें
टेटका, सांप, बिछी, बीजा, कांद-दूबी,
अउ निकल जथें झट्ट ले पाके पानी के बूँद,
नवा दुनिया देखे बर।
पानी के सुवागत मं
नाचथें फुरफून्दी, बत्तर कीरा।

इसकूल घलोक करत रहिथे अगोरा पानी के
खुले बर।
पानी पाके लाइन घलोक हो जथे अंजोर,
पहिली ले जादा।
पानी ल पाके,
किसान सुरु करथे काम किसानी के,
पानीच के भरोसा मं लेथे ठेका
जग के पेट भरे के,
अउ बन जथे भगवान भुइँया के,
पानीए ल देखके बेयपारी,
अनुमान लगाथे अपन आमदानी के।
पानी पाके नदिया गरजथे,
आघू मं अथाह समुंद के।
पानीच के सेती,
सबले अलग हे हमर धरती।
पानी के भीतरे मं होथे संगी,
अनमोल मोती।
पानी के एक बूँद के खातिर,
मरत हें लाक्खों परानी हर साल
मजबूरन मतलहा पानी पीके,
बीमार,मरत हें लाक्खों परानी हर बरिस।

देख,
अपन आस पास मं देख,
टीबी मं, सामाजिक नेट मं देख संगी।
जल हे त कल हे संगवारी,
जल बिन सब अचल हें जी
जले ह तो अमरित हे संगी,
जले ह सबले जादा पबरित हे संगी।
पवन बरोबर,
जल मं घलोक अधिकार हे सबके।
गाड़ी धोअई मं, गदगद- गदगद नहई मं…
अपन बपौती समझ के,
ये ल अइसने फालतू झन फेक संगी।

केजवा राम साहू ‘तेजनाथ’
बरदुली, कबीरधाम (छ ग )
7999385846

कपड़ा

कतका सुघ्घर दिखथे वोहा
अहा!
नान-नान कपड़ा मं।

पूरा कपड़ा मं,
अउ कतका सुघ्घर दिखतीस?
अहा!!

केजवा राम साहू ‘तेजनाथ‘
बरदुली,कबीरधाम (छ.ग. )
7999385846

सरकारी इसकूल

लोगन भटकथें सरकारी पद पाए बर,

खोजत रहिथें सरकारी योजना/सुविधा के लाभ उठाए बर,
फेर परहेज काबर हे,
सरकारी इसकूल, अस्पताल ले?
सबले पहिली,
फोकट समझ के दाई ददा के सुस्ती,
उप्पर ले,
गुरुजी मन उपर कुछ काम जबरदस्ती।
गुरुजी के कमी,और दस ठोक योजना के ताम झाम मं,
गुरुजी भुलाये रहिथे पढ़ई ले जादा
दूसर काम मं।
नइ ते सरकारी इसकूल के गुरुजी,
होथे अतका जबरदस्त
जइसे पराग कन फूल के,
जेन सरकारी गुरुजी बने के योग्यता नइ रखै
नइ ते बन नइ पावै,
तेने ह बनथे संगी गुरुजी पराभीट इसकूल के।
तभे तो टॉप आथें लइका,
सरकारीए इसकूल के,
संगी गलती माली के होथे भले
झन निकालौ फूल के।
आखिर मं एक बात अउ
कड़ुआ हे फेर सच्चा हे,
दाई ददा धियान देही त,
सरकारी इसकूल पराभीट ले अच्छा हे।
   केजवा राम साहू ‘तेजनाथ’
   बरदुली, कबीरधाम ( छ ग)
       7999385846

सक

‘‘मोर सोना मालिक,
पैलगी पहुॅचै जी।
तुमन ठीक हौ जी?
अउ हमर दादू ह?

मोला माफ करहौ जी,
नइ कहौं अब तुंह ल?
अइसन कपड़ा,अइसे पहिने करौ।
कुछ नइ कहौं जी,
कुछ नइ देखौं जी अब,
कुछू नइ देखे सकौं जी,
कुछूच नहीं,
थोरकुन घलोक नहीं जी।

तुमन असकर कहौ,
भड़कौ असकर मोर बर,
के देखत रहिथस वोला-वोला,
जइसे मरद नइ देखे हे कभू,
कोनों दूसर लोक ले आए हे जनामना तइसे………।

मोर राजा मालिक,
तुहर ऑखि के आघू,
कोनों माई लोगिन/मावा लोग आ जाथे कभू,
त तुमन देख लेथौ जी,
वोइसने देख लेत रहेंव जी महूॅ जी।

चलौ,
दूर होगे अब तुंहर एक सिकायत।
नइ देखौं जी अब कोनों ल,
देखेच नइ सकौं जी अब।

मैं नइ जानौं,
के ए ह एक्सीडेंट आवै के तुंहर इक्छा?
मैं एहू नइ जानौं जी,
के तुंहर देखे के लाइक हौं अब धन नहीं?
फेर,
मोला एक बात के भरोसा जरूर हे जी,
के खतम हो जाही अब,
तुंहर सक।‘‘
तुंहर नंदनी

केजवा राम साहू ‘तेजनाथ‘
बरदुली,कबीरधाम (छ.ग.)

नान्‍हे कहिनी : आवस्यकता

जब ले सुने रहिस,रामलाल के तन-मन म भुरी बरत रहिस। मार डरौं के मर जांव अइसे लगत रहिस। नामी आदमीं बर बदनामी घुट-घुट के मरना जस लगथे। घर पहुंचते साठ दुआरीच ले चिल्लाईस ‘‘ललिता! ये ललिता!‘‘ ललिता अपन कुरिया मं पढ़त रहिस। अंधर-झंवर अपन पुस्तक ल मंढ़ाके निकलिस। ‘‘हं पापा!‘‘ ओखर पापा के चेहरा, एक जमाना म रावन ह अपन भाई बिभिसन बर गुसियाए रहिस होही, तइसने बिकराल दिखत रहिस। दारू ओखर जीभ मं सरस्वती जस बिराजे रहिस अउ आंखी म आगी जस। कटकटावत बोलिस ‘‘मैं ये का सुनत हौं कुलबोरिक! … तैं, वो साले मोहन के टूरा संग बात करथस?घूमथस?.. आज के बाद कभू अइसन सुने म आइस त सुन ले‘‘ अंगरी उठा के खबरदार करिस ‘‘त भुला जाहौं के तैं मोर बेटी अस,भुला जाहौं के तोला बेटा जस पाले हौं,भुला जाहौं के महीं तोर ददा औं अउ दाई घलोक,भुला जाहौं के मोर दू लईका हें। सुन ले…आज के बाद तैं कहॅूं…।‘‘ ललिता फाइनल मं रहिस। सियान के इज्जत करना ओखर नस-नस म हे फेर गलत बात सुन के चुप रहि जाना ओखर आदत नइ रहिस। बोले के बेरा चुप रहे ले मनखे चार गोड़ के जानबर बन जाथे। जवाब देइस ‘‘मैं कोई गलती नइ करौं पापा! आज के भौतिक युग म अपन हेसियत बनाए बर,देखाए बर,झूठ,बईमानी जईसे आपके आवस्कता हे पापा, अईसने मोरो इच्छा होथे के कोनों मोला मया करै…ये मोर तन-मन के आवस्कता हे पापा।‘‘ अपन सब कुकरम, करोध के घुरूवा नारी जात ला बनइया पुरूस जात बर,ललिता आज जइसे बेसरम होगे रहिस। ‘‘अगर वो ह गलत नइहे त एहू गलत नइहे पापा।‘‘ बोलत ललिता अपन कुरिया म घुसरगे। रामलाल कठ खाए खड़े रहिगै।

केजवा राम साहू ‘तेजनाथ‘
बरदुली,कबीरधाम (छ.ग.)
मो. 7999385846

नवा साल मं

महिना के का हे संगी हो?
आत रइही-जात रइही,
जनवरी,फरवरी…।
साल के का हे संगी हो?
आत रइथे-जात रइथे ये तो,
…..दू हजार अठारा,
दू हजार अठारा ले दू हजार ओन्नईस,
ओन्नईस ले बीस,बीस ले….।
बदलत रईही कलेंडर घलोक।
महत्तम के बात हे संगवारी हो,
हमर नइ बदलना।
संगी हो,
हमन मत बदलिन,
हमर पियार झन बदलै,
हमर संस्कार झन बदलै,
जीए के अधार झन बदलै।

केजवा राम साहू ‘तेजनाथ‘
बरदुली,कबीरधाम (छ.ग. )
7999385846

डर

सोंचथौं,
कईसे होही वो बड़े-बड़े बिल्डिंग-बंगला,
वो चमचमावत गाड़ी,
वो कड़कड़ावत नोट,
जेखर खातिर,
हाथ-पैर मारत फिरथें सब दिन-रात,
मार देथें कोनों ला नइ ते खुद ला?
अरे!
वो बिल्डिंग तो आवे
ईंटा-पथरा के, कांछ के,
वो कार तो आवै लोहा-टीना के,
अउ
कागज के वो नोट, वो गड्डी आवै।
वो बिल्डिंग
आह! डर लगथे के खा जाही मोला,
वो कार,
डर लगथे,
वो जाही मोरे उपर सवार,
डर लगथे
पागल बना दिही मोला वो पइसा।
डर लगथे
निरजीव ईंटा-पथरा,
कांछ, लोहा-टीना,कागज के बीच घिर के,
निरलज्ज, निरजीव झन हो जाय मनखे।

केजवा राम साहू ‘तेजनाथ‘
बरदुली, पिपरिया, कबीरधाम
7999385846

असाढ़ आगे

चारो मुड़ा हाहाकर मचावत,
नाहक गे तपत गरमी,
अउ
असाढ़ आगे।
किसान, मजदूर, बैपारी,
नेता,मंतरी,अधिकारी,करमचारी…
सबके नजर टिके हे बादर म।

छाए हे जाम जस करिया-करिया,
भयंकर घनघोर बादर,
अउ
वोही बादर म,
नानक पोल ले जगहा बनावत,
जामत बीजा जुगुत झाँकत हे,
समरिद्धी।

केजवा राम साहू ”तेजनाथ”
बरदुली, कबीरधाम (छ. ग.)



अपन

पहिनथन अपन कपड़ा ल,
रहिथन अपन घर म,
कमाथन खेत ल अपने,
खाथन अपन हाथ ले,
लीलथन अपने मुंह ले,
सोंचथन घलो, सिरिफ अपने पेट के बारे म।
अपन दाई, अपन,
अपन ददा अपन,
अपन भाई, अपन,
अपन बहिनी, अपन
अपन देस, अपन
अपन तिरंगा, अपन,
मरना पसंद करथन अपन धरम म।
मानथन घलो अपनेच देबी देवता ल।
अपन बेटा-बेटी ए बर तो कमाथन का ?
अपन संतान ए ल तो दे पाथन का, हक अपन संपत्ति म ?
त, फेर छेड़ना- छाड़ना काबर कोखरो बेटी माई ल?
छेड़नाच हे त….
कइसे, ठीक हे न ?

केजवा राम साहू ‘तेजनाथ’
बरदुली, पिपरिया, कबीरधाम