Tag: Vijendra Kumar Verma

सुमिरव तोर जवानी ल

पहिली सुमिरव मोर घर के मइयां,
माथ नवावव धन धन मोर भुइयां I
नदियाँ, नरवा, तरिया ल सुमिरव,
मैना के गुरतुर बोली हे I
मिश्री कस तोर हँसी ठिठोली ल,
महर महर माहकत निक बोली हे I
डीह,डोगरी,पहार ल सुमिरव,
गावव करमा ददरिया I
सुवा,पंथी सन ताल मिलालव,
जुर मिर के सबो खरतरिहा I
जंगल झाड़ी बन ल सुमिरव,
पंछी परेवना के मन ल सुमिरव I
पुरखा के बनाय रद्दा मा चलबो
नवा नवा फेर कहानी ल गढ़बो I
पानी ल सुमिरव, दानी ल सुमिरव,
बलिदानी तोर कहानी ल सुमिरव
माटी के मान बढ़ईया
अन्नदाता तोर जवानी ल सुमिरव I

विजेन्द्र वर्मा अनजान
नगरगाँव(जिला –रायपुर)

तयं काबर रिसाये रे बादर

तयं काबर रिसाये रे बादर
तरसत हे हरियाली सूखत हे धरती,
अब नई दिखे कमरा,खुमरी, बरसाती I
नदियाँ, नरवा, तरिया सुक्खा सुक्खा,
खेत परे दनगरा मेंड़ हे जुच्छा I
गाँव के गली परगे सुन्ना सुन्ना,
नई दिखे अब मेचका जुन्ना जुन्नाI
करिया बादर आत हे जात हे,
मोर ह अब नाचे बर थररात हेI
बिजली भर चमकत हे गड़गड़ गड़गड़,
बादर भागत हे सौ कोस हड़बड़ हड़बड़ I
सुरुज ह देखौ आगी बरसात हे,
अबके सावन ल जेठ बनात हे I
कुआँ अऊ बऊली लाहकत लाहकत,
चुल्लू भर पानी म कोकड़ा ह झाकत I
बुलकगे आसाढ़ ढूलकगे सावन,
ठलहा बईठे हे बियासी के रावनI
तोर अगोरा म टकटकी लगाये,
संसो म सबो परानी दुख पाये I
अन्न पानी अब कुछु नई सुहावय,
देख किसान के तरुवा ठननायेI
अब गिरही तब गिरही कीके आस लगाये,
पड़की, परेवना तोरेच गीत गायेI
छिन छिन जिंनगी घटत बढ़त हे,
हंसी ठिठोली अब कोनों नई करत हे I
रुख राई जीव जंतु के अरथी उठत हे,
बूंद बूंद पानी बर जिनगानी तरसत हे I
मसमोटीयाँ तयं ह रिसाये काबर,
अब तो बरस जा रे निरदयी बादर I

विजेन्द्र वर्मा अनजान
नगरगाँव(धरसीवां) जिला-रायपुर
मो.9424106787

मोरो बिहा कर दे

गाँव में सरपंच घर ओकर बड़े लईका के बिहाव में तेल हरदी चढ़त रहीस हे, सगा सोदर सब आय घर अंगना गदबदावत रिहीस फेर ओकर छोटे बाबू श्यामू ह दिमाग के थोरकिन कमजोरहा रिहीस पच्चीस साल के होगे रिहीस तभो ले नानकुन लईका मन असन जिद करत रिहीस I ओहा बिहाव के मायने का होते उहूँ नीं जानत रिहीस, तभो ले अपन बड़े भैय्या ल देखके ओकरे असन मोरो बिहा करव कईके अपन दाई ल काहत रहय I सहीच में मंद बुद्धि के मनखे ले देखबे अउ ओकर गोठ ल सुनबे ते सोगसोगावन लागथे I

दाई ओ महूँ ल हरदी लगादे,
तेल चघा के मंऊरे पिहना के
महूँ ल दूलहा बना दे I
दाई ओ ऐदे मोरो बिहा करादे I

बाजा लगा दे मोटर ल सजा दे,
भैय्या असन कुरता पेंट पिहना दे I
ददा ल कहिदे बरतिया सन जायबर,
दीदी करा मोरो मंऊर सौंपा दे I

जाबो बरात लाबो दुलहनियां,
नाचबो गाबो सरी मंझनिया I
कोंदा ल नचाबो लेड़गा ल नचाबो,
लाड़ू ल मारके लाड़ू ल ढूलाबो I

बांध के गठरी सोंहारी ल लाबो,
बरा अऊ भजिया के रार मचाबो I
दाई ओ ऐदे मोरों बिहा करा दे
थोरकिन फूफा ल घोड़ी बनादे I

विजेन्द्र वर्मा अनजान
नगरगाँव (जिला –रायपुर)

फाग गीत – होली हे

उड़त हे अबीर गुलाल,
माते हे मऊहा चार I
टेसू फुले, परसा डोले,
पींयर पींयर सरसों रस घोरे,
दुल्हन कस धरती के सिंगारI
उड़त हे अबीर गुलाल,
होली हे ——–

मऊरे आमा मद महकाएँ,
कोयलियाँ राग बासंती गायें I
कनवा, खोरवा गंज ईतरायें,
नशा के मारत हे उबाल,
उड़त हे अबीर गुलाल I
होली हे ———

ढोल,मजीरा, मृदंग बाजै,
घुँघरू के सन गोरी नाचै I
होठ रसीले गाल गुलाबी,
फागुन के येदे चाल शराबी I
माते हे मऊहाँ अऊ चार,
उड़त हे अबीर गुलाल I
होली हे ——–

नींद निरमोही सपना भागै,
रंगे में डूबके फागुन हासैI
मन में सागर के जल उमड़े,
मया के बोहावत हे धार I
उड़त हे अबीर गुलाल,
माते हे मऊहाँ चार I
होली हे ———

विजेन्द्र वर्मा अनजान
नगरगाँव (धरसीवां)
जिला-रायपुर (छ.ग.)

रीतु बसंत के अवई ह अंतस में मदरस घोरथे

हमर भुईयां के मौसम के बखान मैंहा काय करव येकर बखान तो धरती, अगास, आगी, पानी, हवा सबो गोठियात हे। छै भाग में बाटे हाबय जेमे एक मोसम के नाव हे बसंत, जेकर आय ले मनखे, पशु पक्षी, पेड़ पऊधा अऊ परकिरती सबो परानी म अतेक उछाह भर जथे जेकर कोनों सीमा नईये। माघ के महीना चारों कोती जेती आँख गड़ाबे हरियरे हरियर, जाड़ के भागे के दिन अऊ घाम में थोरको नरमी त कहू जादा समे घाम ल तापे त घाम के चमचमई। पलाश के पेड़ ल देखबे त अंगरा आगी असन पिवरा पिवरा फुल के खिलई, बौरे आमा पेड़ के ममहई, कोयल के कुहकई, चिरई चिरगुन के ये डारा ले वो डारा फुदकई, तरिया, डबरी, नदिया नरवा के पानी के गहरई, चारों कोती देख ले कोनों मेर सुन्ना नीं लागय सबो जगा भरे भरे उचास लागथे। घर होवय ते बन, खेत खार बियारा बारी अईसन निक लागथे अंतस के पीरा ह बसंत के आय ले भगा जथे। शादी बिहाव के होवई, गीता भागवत पूजा पाठ के चारों मुड़ा गियान बगरत रीथे। तिहार असन उछाह, कोनों नाचत हे, कोनों गावत हे, झांझ मंजीरा बजात कतको झन स्नान धियान अऊ मेला मंडई ते कोनों ह तीरथ बरथ करत दान पुन करत पुन कमात हे। अऊ ओकरे सेती कला, संगीत, वाणी, परेम, बिदया, लेखनी, ऐश्वर्य के देवी सरसती ह सबो परानी ऊपर अपन आशीष ल घलो बरसात रीथे।
शुभ मंगल सबो काम सजय,
चहूं ओर मिरदंग बाजै।
शीतल सुरभित मदमस्त पवनवा,
अमुआ के बौर ले खुशबु बाटै।
कुक कुक कुक कोयली कुहकय,
तभे तरुवर ले कमलिनी झाकै।
मतवाला माहोल देखके,
अंतस के तरंग बड़ हिलोरे मारे।

तभे तो बसंत के महीना ल रीतु मन के राजा कीथे। ये महीना ल सबो परानी के सेहत बर बड़ अच्छा माने गेहे, सबो परानी मन में नवचेतना अऊ नवउमंग के जोश समाथे। चारों कोती बहारे बहार ओनहारी पाती के गदबदाय झुमई ल देख डोकरा मन जवान हो जथे, ठुड़गा मन पहलवान बन जथे। सरसों के खेत के महर महर महकई, गेहूं के बाली के निकलई, पंखुड़ियों में तितली के मंडरई, भंवरा के गुनगुनई, अईसे लागथे चारों मुड़ा प्यारे प्यार के बरसात होत हे। धरती में होले होले पवन के चलई, मतवाला मनखे के इतरई, तरिया डबरी में कमल के खिलई देख के अईसने अभास होथे कि कोनों नवा बहुरिया के घर दुवार में आगमन होय हे। जेकर सुगंध ह पूरा घर दुवार ल सुगन्धित करत हे। अऊ ओकर आय ले सब नाचत, गावत, झूमरत उछाह मनात हे। ये सब ल देख के अईसे लागथे कि कोनों आके अंतस में मदरस घोरत हे।
का धरती, का अगास,
विहंग उड़य बुझाय बर पियास।
परकिरती के नवा रंगत देख,
झुमै नाचै सबो परानी आज।

विजेन्द्र वर्मा अनजान
नगरगांव (जिला-रायपुर)

सुन तो भईरी

अई सुनत हस का भईरी,
बड़े बड़े बम फटाका फुटीस हे I
येदे नेता मन के भासन सुनके
कुकुर मन बिकट हाँव हाँव भूकिस हे I

पंडरा ह करिया ल देखके,
मुंहूँ ल फूलोलिस I
कीथे मोर अंगना में काबर हमाये,
आय हाबै चुनई त,
खरतरिहा बन बड़ रुवाप दिखायेस I

सिधवा कपसे बईठे रिहिस,
कीथे, मिही तांव मुरख अगियानी,
तुहीमन तांव ईहाँ के गियानी धानी I
मंद के मरम ल में का जानव,
तलुवा चाटे के काम हाबै मोर पुरानी I

कोन जनी काय पाप करे रेहेंव,
चारों खूंट अंधियार म डूबत हंव I
जिहां रिहिस चिरईजाम, आमा के रुख,
छईहाँ कहाँ नदागे कीके गुनत हंव I

अई सुनत हस भईरी,
परीक्षा में कोन होही पास,
अऊ कोन होही फेल I
काकर घर भाई भाई में मातही झगरा I
कोन ह दिही चुनई के बिहान दांड़ तगड़ा I

छिनार ह सुनत नींये,
मिहिच मिही ह गोठियात हंव I
मुहाटी में बईठे हे कीके,
चुनई के किस्सा सुनात हंव I

अतका सुन भईरी के मुंहू बिचकगे,
सूपा ल भर्रस ले पटक के I
कंझावत मोर उपर उमड़गे,
किरहा नेता मन ल मोर हंसी खुशी नीं देखे जात हे I
मोरे सास ल मोरे खिलाफ भड़कात हे I
अईसन काय चुनई ये चंदोर,
घरों घर भाई भाई अऊ सास बहू ल लड़ात हे I

विजेंद्र वर्मा अनजान
नगरगांव(धरसीवां)

अईसने चुनई आथे का

अईसने चुनई आथे का
नकटा ह नाचथे,
अऊ बेशरम ताल मिलाथे।
लाज नीं लागय कोनों ल,
कूटहा ल संगे संग घुमाथे।
देख तो संगी अईसने चुनई आथे का!

मद अऊ मऊहा के हिसाब,
करमछड़हा मन बईठ जमाथे।
कुकरी बोकरा के रार मचाथे,
उछरत बोकरत मनखे चिल्लाथे।
देख तो संगी अईसने चुनई आथे का!

गाड़ी मोटर फटफटी,
जो गांवें गाँव दऊड़ाथे।
धरम के ठेकेदार मन घलो,
घरों घर खुसर आरों लगाथेI
देख तो संगी अईसने चुनई आथे का!

मीठ मीठ गोठिया के कीथे,
बासी बड़ सुहाथे ।
वादा उपर वादा करके,
दिन में चंदा देखाथे ।
देख तो संगी अईसने चुनई आथे का!

फाफा, बतरकीरी कस,
हपटत गिरत जगा जगा झपाथे ।
पाख जरगेहे तभो ले,
घोलन घोलन के मनखे ल मनाथे ।
देख तो संगी अईसने चुनई आथे का !

गाँव गाँव में गदर मचाथे,
दारु ले सस्ता खून बोहाथे ।
दूध दही ल कोनों नीं पूछे,
सत ईमान ल अंधरौटी छाथे ।
देख तो संगी अईसने चुनई आथे का!

येकर दांव ओकर पेंच,
जेकरे लाठी ओकरे भईस।
लेड़गा के दिन बिसरथे,
कोंदा तको चिल्लाय बर धरथेI
देख तो संगी अईसने चुनई आथे का!

भाई भाई लड़थे बईरी बन,
चुनई के चक्कर में निकलथ हे दम।
डोकरी काहते हे डोकरा ले,
चंदोर चुनई आय हे तबले,
रात दिन मरत हन हम।

विजेंद्र वर्मा अनजान
नगरगांव(धरसीवां)

मोर गाँव के सुरता आथे

कांसा के थारी असन तरिया डबरी,
सुघ्घर रूख राई, पीपर,बर अऊ बंभरी I
खेत खार हरियर हरियर लहलहाय,
मेड़ में बईठ कमिया ददरिया गाय I

बारी बखरी में नार ह घपटे,
कुंदरू,करेला,तरोई झाके सपटके I
चारों मुड़ा हे मंदिर देवालय,
बीच बस्ती में महमाया ह दमकय I

होत बिहनिया गरवा ढीलाय,
कुआं पार मोटियारी सकलाय I
हंसी ठिठोली करत पानी भरय,
कांवर बोहे राऊत मचमच चलय I

घाम बिहनिया ले छानही में बईठे,
बम्हनीन कुदन रौऊनिया तापय डटके I
कोन जनी कऊवा ह का गोठियाय,
कान ल लेगे कीके नऊवा चिल्लाय I

पड़की,परेवना,सुवा अस लईका,
बांचा माने जेन सियान के ठऊका I
सुघ्घर लिपाय, बहराय गली खोर,
ममहाय माटी के घर, जलय जब जोत I

कमा के आवय भईया जभे मजूरी,
अंधना मढ़ाय भऊजी के बाजय चुरी I
फेटा बांधे जब किसान खेत में घुमय,
धान के अचरा येती वोती गदबद झूमय I

सगा आवय ते घर अँगना गदबदाय
तिहार सबो झिन जुरमिर के मनाय I
एके कुरिया में चोरबिर चोरबिर,
सुतैईया तको चैन के नींद सुत जायI

पथरा पूजे बर कोनों, पहार नीं जाय,
बिहनचे बिहनचे ठाकुरदेव में सकलाय I
कोल्हान के तीर बोहरही दाई,
बदना बदै जेकर दुख पीरा हर जाय I

गंगा अऊ काशी कस लागय घर कुरिया,
पड़ोसिन के साग सुहावय बहुतेच बढिया I
मड़ई मेला बने जबर लागय,
उड़य जभे बईला गाड़ी के धुर्रा I

विजेंद्र वर्मा अनजान
नगरगाँव(धरसीवां)



छत्तीसगढ़िया जागव जी

छत्तीसगढ़िया बघवा मन काबर सियान होगेव,
नवा नवा गीदड़ मन ल देखव जवान होगे।
भुकर भुकर के खात किंजरत,
बाहिरी हरहा मन आके ईहाँ पहलवान होगे।

सेठ साहूकार मन फुन्नागे,
अजगर कस ठेकेदार मोटागे।
अंगरा आगी में किसान भुन्जात,
दाई ल नोनी के पोसई जीव के काल होगे।

मुरहा के अब दिन बिसरगे,
करमछड़हा उछरत जात हे।
मिहनत करैईया अंगाकर कस सेकाय,
कोलिहा गद्दी में बईठ चिल्लात हे।

छत्तीसगढ़िया अब तो जागव जी,
अपनेच हित ल साधव जी।
टांग खिचैईया बईरी ल,
धरव,मुड़भसरा गिरावव जी।

विजेंद्र वर्मा अनजान
नगरगाँव(धरसीवां)
मो. 9424106787



नोनी मन के खेलई कुदई ह हिरदे में मदरस घोलय

बड़ सुघ्घ्रर लागय नोनी मन के खेले खेल म गाना गवई अऊ ओकर मन के इतरई ह, अभी के समे म वोईसना खेलईया नोनी बाबु देखे बर नई मिलय। अईसने लागथे ओखर मन के पहिचान ह नदा गेहे, हँसई खेलई ह लईका मन के सबो ह, बस्ता के बोझ तरी चपका गेहे। का देहात का शहरिया बस्ता के बोझ ले उबरिस तहाले मोबाइल में मति ह सकला गेहे। कान ह तरसत हे नांगर बईला बोर दे पानी दमोर दे सुने बर, नगरिहा किसान मन खेती बारी बियारा बखरी के काम अऊ घर कुरिया के छानही लहुटाय त गली में खेलत नोनी मन के खेले खेल म मीठ बोली ह गली में अवैईया जवैईया मन के कान में खनकत राहय। खवई पियई अऊ सुतई बसई के चेत ल घलो भुला के नोनी मन हरहिन्सा बिगर चिंता फिकर के खेलत रहय।




खेत खार में जब चारों कोती अरा ररा तता तता के भाखा गुंजत रहय, त गली खोर में अतका अतका पानी गोल गोल रानी खेलत नोनी मन दऊड़त भागत रहय। किसनहा मनखे के मुँह ले अरा ररा तता तता नदागे तईसने गड़हन नोनी के मुँह ले अतका अतका पानी गोल गोल रानी नदागे। खेती किसानी के दिन में किसनहा मनखे अऊ मजूरी करैईया ल खाय पिए के बरोबर समे तको नी मिलय त अंगाकर रोटी अऊ आमा के अथान म डपट के खाय। अबके लईका मन ल पूछबे अथान काय ये, नी बता पावय, गाँव के खेत खार में मेला लगे रहय कोनों ददरिया गावय कोनों चोंगी पीयत खेती बारी के काम ल सिरहाय।
काम करके खेत ले आतिस तहाले खेलत नोनी ल हुत पारय, नोनी अपन धुन में आन खाव कि पान खाव सूपा भर पिसान खाव कईके अपन बाबू करा आतिस अऊ सुघ्घ्रर दाई बनाय राहय तेन भात साग ल निकाल के परोसय। नोनी के खेले खेल में परोसई अऊ ओकर गाना गवई ल सुनके ददा के हिरदे ह जुड़ा जय, अतेक कमा के आय रहय तेनो थकान ह नोनी के बोली सुनके पीरा ह भगा जय। फेर अब के समे म किसनहा मनखे के तरुवा सुखा गेहे सबो किसानी के भाखा भुला गेहे वोईसने लईका मन खेलई कुदई ल भुला गेहे। बड़ सुरता आथे ओकर मन के अटकन मटकन दही चटाका ह, रेलगाड़ी छुकछुक रेलगाड़ी छुकछुक,गोबर दे बछरू गोबर दे सुने बर कान ह तरस गेहे। वो समे रिहीस नोनी मन के खेल खेलई ह दाई ददा किसान जवान के हिरदे म मदरस घोलय।

विजेंद्र वर्मा अनजान
नगरगाँव (धरसीवां)