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आल्हा छंद : झाँसी के रानी

बरस अठारा में रानी ने, भरिस हुंकार सीना तान।
भागय बैरी ऐती तेती, नई बाचय ग ककरो प्राण।
गदर मचादिस संतावन में, भाला बरछी तीर कमान।
झाँसी नई देवव बोलीस, कसदिच गोरा उपर लगाम।
राव पेशवा तात्या टोपे, सकलाईस जब एके कोत।
छोड़ ग्वालियर भगै फिरंगी, ओरे ओर अऊ एके छोर।
चना मुर्रा कस काटय भोगिस, चक रहय तलवार के धार।
कोनों नई पावत रिहिस हे, झाँसी के रानी के पार।
चलय बरोड़ा घोड़ा संगे, त धुर्रा पानी ललियाय।
थरथर कांपय आँधी देखत, कपसे बैरी घात चिल्लाय।
मारे तोला अब मरन नहीं, चाहे अब काही हो जाय।
जन्मभूमि के रक्षा खातिर, परान घलो अब हमरो जाय।
रानी के बचन सुन सैनिक, घात पै घात करते जाय।
जंगहा तीर कमान ह तको, लाश पै लाश बिछात जाय।
मार काट आगू बढ़त रिहिस, घोड़ा नाला देख डराय।
आगिस शत्रु आगू पीछू ले, सिंहनी वीर गति को पाय।
बुझिस दिया झाँसी के जभे, डलहौजी के मन मुस्काय।
तेईस के उमर में रानी, अईसन इतिहास बन जाय।

विजेंद्र वर्मा अनजान
नगरगाँव (धरसीवां)



चलनी में गाय खुदे दुहत हन

चलनी में गाय खुदे दुहत हन
कईसन मसमोटी छाय हे,
देखव पहुना कईसे बऊराय हाबै।
लोटा धरके आय रिहीस इहाँ,
आज ओकरे मईनता भोगाय हाबै।
परबुधिया हम तुम बनगेन,
चारी चुगली में म्ररगेन।
छत्तीसगढिया ल सबले बढिया कीथे,
उहीं भरम में तीरथ बरथ करलेन।
भाठा के खेती अड़ चेथी जानेंन,
खेती बेच नऊकरी बजायेन।
चिरहा फटहा हमन पहिरेन,
ओनहा नवा ओकरे बर सिलवायेन।
लाँघन भूखन हमन मरत हन,
दांदर ओकरे मनके भरत हन।
हमर दुख पीरा हरय कोन,
बिन बरखा तरिया भरय कोन।
सांप के मुंडी करा,
हमर मन के झुलेना होगे।
मारथे फुफकार त कीथन,
भागव कपसे के अब बेरा होगे।
सियनहा मन कीथे,
जेकर खाय, तेकरे गुन गाव।
पहुना मनके ईहाँ उलटा हे नियाँव,
जौन में खाव उहीं पत्री ल छेद लगाव।
चलनी में गाय खुदे दुहत हन,
करम ल कोश जर मरत हन।

ठिनिन ठिनिन घंटी बजाके,
मुड़ी ल धर बईठ रोवत हन।
पहुना बर ऊचहा पाटा रखलौ,
नगात खात हे तेकर खाता रखलौ।
हरहिंसा चरन मत दव,
बाँधे बर गेरवा अऊ फाटा रखलव।

विजेंद्र वर्मा अनजान
नगरगाँव (धरसीवां)

भक्ति करय भगत के जेन

परिया परगे धनहा डोलि,
जांगर कोन खपाय।
मीठलबरा के पाछू घुमैईया,
ससन भर के खाय।

बांचा मानै येकर मनके,
कुंदरा, महल बन जाय।
मिहनत करैईया भूखे मरय,
करमछड़हा देखव मसमोटाय।

लबारी के दिन बऊराय,
ईमान देखव थरथराय।
पसीना गारे जेन कमाय,
पेट में लात उही ह खाय।

भक्ति करय भगत के जेन,
पावय परसाद दपट के।
खंती माटी कोड़य जेन,
मार खावय सपट के।

विजेंद्र वर्मा अनजान
नगरगाँव (धरसीवां)

विजेंद्र वर्मा अनजान
नगरगाँव(धरसीवां)

पंचू अऊ भकला के गोठ : चुनई ह कब ले तिहार बनगे

पंचू अऊ भकला के गोठ बात चलत रिहिस हे, थोरकिन सुने बर बईठ गेंव पंचू काहत रहय भकला ल, सुन न रे भाई भकला, चुनई आवत हे हमर गाँव गंवई के मईनखे बर बड़का तिहार ये।
भकला- किथे, पंचू भईया चुनई ह कबले तिहार बन गेहे नवा बनाय हे का ? पहिली तो अईसनहा तिहार सुने नीं रेहेंव। दसेरा, देवारी, होली, हरेली ल जानथव अऊ सबो गाँव वाले मन मिरजुर के मनाथे, फेर ये चुनई ह तिहार कबले बनगे ?
पंचू- किथे, जबले अंगरेज मन हमर देश ल छोड़े हे, तबले हमर देश के कोकड़ा भगत मन ह ऊकर कपटी चाल ल आगू बढाय के गियान सिखे हे. तऊने दिन ले तिहार बनगे हे। देवारी होली ले भी बड़का होथे, काबर सबो तिहार ह तो हर साल आवत रीथे। फेर चुनई के तिहार ह पांच साल म ऐके बार आथे। अऊ अईसन खलबली मचाथे कि अवैईया पांच साल तक मईनखे मन नीं भूलय।
भकला- कईसनहा होथे ये तिहार ह, देवारी असन नवा नवा कुरता सिलाय बर पड़थे ते होली असन चिरहा फटहा पहिर के घुमे बर पड़थे।
पंचू- काही नई जानस रे तेंहा, गाँव गाँव में गाड़ी मोटर अऊ फटफटी मन धुर्रा उड़ाथे, बरदी के बरदी मनखे मन ह सकलाय, घरों घर खुसरथे अऊ किथे देखे रहिबे ददा इहूँ साल भुलाबे झन बटन चपके बर। कोनों बरदिहा ह बम फोड़थे, कोनों रंग गुलाल उड़ाथे, कोनों बरदिहा ह मोटर कार म बईठे रहिथे तेन मनखे ल माला पहिराथे। कतको जगा म ओकर मन बर मंच तको बनाय रीथे भूके बर। त जब बम फूटथे त सुते रीथे तेन बेंदरा मन ये डारा ले वो डारा हूँत हूँत कीके खुशी के मारे कुदत रीथे। कोलिहा कुकुर गजबिज गजबिज सकलाय रीथे, बिलई कपसे देखत रीथे काय होवत हे कीके, चुनई तिहार वाले मन ल।
भकला- मोर मगज में समझ नई परत हे भईया, बड़का तिहार मनाय के रीत ह, बेंदरा मन काबर खुश होथे मईनखे के तिहार म। कोलिहा कुकुर काबर सकलाथे, बिलई काबर कपसे रीथे। फरिया के बताव न, दाई ल जा के बताहूँ बड़का तिहार आय हे कीके, तभे तो मोर बर रोटी पीठा खीर तसमई बनाही।
पंचू- अरे बईहा निचट तेंहा भोकवा हस रे, बेंदरा माने मनखेच, ये जेन ह चुनई तिहार वाले के आगू पीछू भागत रीथे। ये पारा ले वो पारा ये गाँव ले वो गाँव तेला काहत हौ। रोटी पीठा नई बनावय ग, वो चुनई तिहार वाले मन ह खुदे बोलथे रोटी पीठा ल काय खाहू, कोनों मेर हिसाब जमावव मुर्गी बकरा के पारटी मनावव। जेन जतका पीही वोकर बर वोतके बेवस्था करबो कीथे। सबो मईनखे ल भरमाथे, अऊ किथे इहूँ साल देख लिहू मोला,बटन चपके बर झन भुलाहूँ।
भकला- त काबर देखे बर किथे भईया, अऊ कोनों तिहार में तो नींय काहय देखे बर। देवारी में दिया जलाथन, दसेरा म रावन जलाथन, होली म होलिका ल जलाथन। माने सबो तिहार में हमन कुछु न कुछु बुरई ल जलाथन अऊ ओकर तियाग करथन। फेर ये चुनई तिहार म काय करे बर पड़ही। चुनई ल जलाय बर पड़ही कि बटन चपके बर किथे तेन ल जलाय बर पड़ही। मोर मगज में समझ नई परत हे येमन हमी मन ल तो जलाय बर तो नीं आय हे न।
पंचू- देखे बर माने चुनई में मोला जिताहूँ किथे भकला, तभे तो तिहार मनाहू किथे, भारी भारी घोषणा करथे। कीथे मोला एक बार जितवा दव जतका कुंदरा अऊ छानही दिखत हे, सबो ल पक्का बना देबोन। सबो घर बिजली पानी के नरवा बहा देबो, कोनों लाँघन नई मरय, अऊ मरही तेन ह खायेच के मरही कीथे।
भकला- येंहा तो तिहार असन नई लागत हे, इसकुल म गुरूजी अऊ सरपंच ह भासन देथे पंदरा अगस्त के दिन तईसने बरोबर बतावत हस भईया। हमर मन के कोनों फायदच नईये येकर मन के भासनबाजी में, ले फेर छोड़ त नवा नवा ओनहा पहिरे बर नई मिलय, न आनी बानी के जिनिस खाय बर नीं मिलय। न बम फोड़ सकन, न गुलाले उड़ा सकन, दारू सारु बोकरा भेंड़वा ल दुरिहा ले परनाम करथन, त अईसन तिहार मनाय के काय फायदा जेमे रात दिन जीवे के हतिया करवावथ रीथे।
पंचू- तोर भले फायदा नीये रे भकला, फेर कुकुर माकर बेंदरा मन जेन पाछू पाछू घुमत रीथे चुनई तिहार वाले सन, वोमन आदमी बन जथे। कुंदरा ह वोकर महल म तन जथे जी। चिरहा खीसा ह पैईसा म फुल जथे, जनम के मुरहा ह गोल्लर असन मसमोटा जथे।
भकला- टार भईया ये तिहार ल तोरे सन रख गाँव में मत बगरा, नईते गाँव के गली चिक्कन चांदर चिखला मात जही साले ह। जम्मों मुरहा मन फेर हुल्लड़ मचाही, देवारी, दसेरा, होली, हरेली सबो नदा जही अईसन चुनई तिहार म, भाई ह भाई के बैइरी हो जही त गुलाल काकर माथा म लगाबो। नवा कुरता पहिने बर तरस जबो, रामलील्ला कोन करही, सफ्फा सादा मन रावण बन जही, पिचका पिचक जही त कईसे होली में रंग छिचबों। सबो गाँव के मईनखे मन ल इही तिहार के अगोरा रईही फेर, कब आही चुनई तिहार, कब आही चुनई तिहार कीके। हमर अईरसा, बरा, बोबरा खीर तसमई के करलई हो जही। हमर असन मनखे बर जीव के काल हो जही।
पंचू- अरे यार भकला कोनों जीव के काल नी होवय, कोनों बुरई ल ये तिहार म नीं जलाना ये। चुनई वाले के बुरई कतको रहय, वोकरे गुण गाना हे, ओकरे नाव के बटन ल चपक के कुरसी म बैईठारना हे। न रावण ल मारना हे न होलिका ल जलाना हे, बस राम ल चीखला म धकेलना हे। काबर इहाँ रावने रावन सकला गेहे, राम बपुरा अकेल्ला पड़ गेहे, रावण चारों मुड़ा गंजमजा गेहे।
पंचू अऊ भकला के गोठ ल सुन के मंय दंग रहिगेंव, नाव भले भकला हे फेर जेन गोठ वोहा गोठयाईस मोर अंतस ल छु लिस। ये चुनई के चक्कर म हमन अतेक अंधिरियाँ गेंहन अपन बेवस्था ल छोड़के सुवारथी मन के पाछू म पल्ला भागत हन। ये चुनई ह कब ले तिहार बनगे कईके, सोचे बर मजबूर होके गुनत हौ। अईसे लागत हे राख के भोरहा म अंगरा ल छुवत हन।
परिया परगे धनहा डोली, जाँगर कोन खपाय,
मीठलबरा के पाछू घुमैईया ससन भर के खाय।
बाँचा माने येकर मनके, कुंदरा, महल बन जाय,
पंचू, भकला के गोठ संगी, इही बात ल बताय।
आगे चुनई तिहार, आगे चुनई तिहार कीके,
करमछड़हा मन बेंदरा असन हूँत हूँत चिल्लाय।

विजेंद्र वर्मा ‘अनजान’
नगरगाँव (धरसीवां)

झाड़ फूंक करलौ जी लोकतंत्र के

कोलिहा मन करत हे देखव सियानी,
लोकतंत्र के करत हे चानी चानी।
जनम के अढहा राजा बनगे,
परजा के होगे हला कानी।

भुकर भुकर के खात किंजरत,
मेछराय गोल्लर कस ऊकर लागमानी।

अंधरा बनावत हे लोकतंत्र ल,
रद्दा घलो छेकावत हे।
कऊवा बईठे महल के गद्दी,
हँस देख बिलहरावत हे।

महर महर महकय लोकतंत्र ह,
अईसन बनाय रिहीस पुरखा मन।
बईरी बनके आगे कलमुवा,
अंधरा कनवा अऊ नकटा मन।

सिरतोन केहे तै नोनी के दाई,
खटिया म पचगे मिहनत के पाई।
भागजनी ह राजा बनथे,
करम के फुटहा चुर चुर मरथे।

उलटा जमाना उलटा नियांव,
मिहनत करैईया के होवत हे घाव।
गरकट्टा मन खुल्ला घुमय,
फक्कड़ झूलय फंदा म।

मोर देश हाबे धान के कटोरा,
छानही में चढ़के नेता भुजत हे होरा।
नोहय गरीबहा के लोकतंत्र भाई,
पोठ लऊठी के जबर लड़ाईI

झाड़ फूक अब करलौ जी तुमन,
घोलन के अजादी के पाव परलौ जी।
आँखी फूटय अंधरा मन के,
इलाज करावव थोरकुन लोकतंत्र के।

विजेंद्र वर्मा अनजान
नगरगाँव (धरसीवां)
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आल्हा छंद : भागजानी घर बेटी होथे

भागजानी घर बेटी होथ, नोहय लबारी सच्ची गोठ I
सुन वो तैं नोनी के दाई, बात काहते हौ जी पोठ I1I
अड़हा कहिथे सबो मोला, बेटा के जी रद्दा अगोर I
कुल के करही नाव ये तोर, जग जग ले करही अंजोर I2I
कहिथव मैं अंधरा गे मनखे, बेटी बेटा म फरक करत I
एके रूख के दुनो ह शाखा, काबर दुवा भेदी म मरत I3I
सोचव तुमन बेटी नई होय, कुल के मरजाद कोन ढोय I
सुन्ना होय अचरा ममता के, मुड़ी धरके बईठे रोय I4I
आवव एक इतिहास रच दव, जिनगी के राह गढ़ दव I
दुनिया दारी के बेड़ी से, आजे तुमन अजाद कर दव I5I
बेटी पढ़ाव बेटी बढ़ाव, बेटी के तुम सनमान कर I
दुनो कुल के मान ये बेटी,सपना म ऊकर उड़ान भर I6I

विजेंद्र वर्मा अनजान
नगरगाँव(धरसीवां)
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महतारी भासा

मातृभासा म बेवहार ह बसथे,
इही तो हमर संसकार ल गढथे।
मइनखे के बानी के संगेसंग,
सिक्छा म वोकर अलख ह जगथे।

लईकोरी के जब लईका रोथे,
इही भाखा के बोल ह फबथे।
आगू आगू ले सरकथे काम,
महतारी के घलो मान ह बड़थे।

समाज के होथे असल चिन्हारी,
भासा म जब हमर संसकिरती ह रचथे।
सकलाइन एके ठऊर म त,
एकजुटता के भावों ह पनप थे।

नवा पीढ़ी के मइनखे मन,
घरघुन्दिया असन मिन्झारत हे।
अंतस म बसे भाखा के मया ल,
हंसी ठिठोरी करत बेंझावत हे।

महतारी भासा के भाव ल समझव,
कोनों उदिम करव बचाय बर।
गम्भीरता ले सोचव तुमन,
येकर मान बढाय बर।

विजेंद्र वर्मा ‘अनजान’
नगरगाँव (धरसीवां)
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सेल्फी ह घर परवार समाज ल बिलहोरत हाबय

समे बदल गेहे जमाना कती ले कती भागत हे तेकर ठिकाना नईये, जमाना सन पल्ला भगैईया हमर मन के मगज ह कोन चिखला दांदर म बोजा गेहे, सबो के मति अऊ सोचों ह सेल्फी सन रहीके सेल्फीस होगे हे। सुघ्घर दिखे के चक्कर में हमन भुला जथन कोन करा गढ्ढा हे, कतीहा पखरा हे, कती के रद्दा म काँटा बगरे हे सेल्फीस बनके एक धर्रा म रेंगत हन। थोरको झमेला ल ककरो नई सेहे सकन, अकेल्ला के खुशी बर घर परवार ल मजधार में छोड़ के सेल्फी सन रेंग देथन। बड़ चिन्ता होथे ये सेल्फी ह जब ले आय हे, सबो मनखे के चैन ल छीन लेहे, जम्मों झिन के मुँह ह टेड़गा होगे हे। सोजे मुँह कोनों बाते नी करय। ये बीमारी मोरे घर के बात नोहय कोन बड़का कोन गरीबहा सबो घर देहगिरी असन पलथियाय बईठे हे। जईसने बेटा के बाप सन नी जमय, भाई सन भाई के तारी नीं पटय, ननद भौजई के पटरी नीं मिलय, सास बहु के रोजे रोज महभारत, काला गोठीयाबे सबो मनखे सेल्फीस बन गेहे। अकेल्ला पहार ल फोड़ डारबो कीथे फेर पहार तो पहार अपनेच गोड़ ल दनगरा ले नीं निकाल सकय।




पहिली जमाना अऊ पहिली के मनखे मन बने रिहीस हे, सबो कोही मिरजुर के कमावय खावय बड़े बड़े पहार जईसने बिपत ल हाँसत हाँसत निपटावय। खुशी म अईसे खुशी मनावय कि कोनों बड़का परब असन लागय फेर उहूँ जमाना में फूटो खीचे के मिशीन रिहीस हे। सुघ्घर सबो परवार बईठ के ऐके साथ फूटो खीचवावय अऊ फरेम म बंधवा के घर के देहरी नईते परछी में टागें राहय। सबो काम सुनता सलाह अऊ सुमत में चलत राहय, अब तो कोन अंधरा मन के नजर लगगे, अईसे सबके मति ल मार दिच जेला देखबे तेन ह सेल्फी के पीछू म भागत हे। लईका लागत हे, न सियान, जानत हे ये सेल्फी ह सबो झिन के चेहरा म धुर्रा पोत के सेल्फीस बनावत हे। तभो ले जीव ल जोखिम में डारके, बने सहराही कहीके अकेल्ला अकेल्ला सेल्फी खीचत हे। मेंहा मानथव परसथिति के हिसाब से ढले में समझदारी हे, पर अईसना ढलई ह तो नासमझी अऊ गंवारी लगथे। हमन कीथन शहर में जादा सेल्फीस रईथे मनखे मन, फेर गाँवों ह सेल्फी के मार ले नई बच पाय हे ।




शहरिया के बड़े भाई बनगे हे गंवैईहाँ मन, कोनों ककरो नीं सुनय मनखे के गोठ ल मनखे नई गुनय। सुखावत हाबे बड़का रूख राई ह, डारा पाना सेल्फि होगे, ढूड़गा देखत रोवत हे ओकर दुख पीरा आँसू पोछैईया कोनों नीये। ढूड़गा तरी कांदी कचरा लद्दी बजबजावत हे, कांदी कचरा म सेल्फी लेके आज के मनखे अतेक इतरावत हे जेकर कोनों सीमा नींये। सेल्फी के बिख ह नस नस म अईसे फ़ैईल के पाँव पसार डरे हे कि हमन ओकर पीछू भागके घर परवार समाज देश के समस्या ल भुला डरेहन। कईसे बनही समाज ह समरिध, परवार ह खुशहाल वोला सोचे बर पड़ही, अऊ अब नई संभलबो त भोगे बर पड़ही। सेल्फी के बिसफोट अतेक भयानक हाबे, फूट जही एकात दिन बम बनके तव सहीच म मुंहू कान टेड़गा बेड़गा हो जही। ये सेल्फी ह सबो कोही ल बिलहोरत हे, हमन सेल्फी के धारे धार म सेल्फीस बनके बोहावत हाबन अऊ गरी के फोही असन उफल के उबुक चुबुक काया ल देख सहरावत हाबन।

विजेंद्र वर्मा अनजान
नगरगाँव (धरसीवां)
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संबंध मिठास के नांव ताय मड़ई ह

खेत के सोनहा धान ल जब किसान मन बियारा म काटके लाथे, उहा ले मींज के माई कोठी म लाके रखथे त घर म लक्ष्मी के वास से सबो मनखे मन के हिरदे म एक खुशी झलकत रीथे। उही बीच म थोरकिन मिहनत करैईया सबो मनखे मन ह अपन आप ल ठलहा अऊ काम के बोझ ले उबर गेन कहिके गाँव के पंचाईत म सबो कोही जुरियाथे जेमे मड़ई मनाय के तारिख ल मिरजुर के करार करथे। अईसे कहिबे त हमर छतीसगढ़ के संस्कीरति अऊ परमपरा ल पहिचान देय के नांव आय मड़ई ह। एक ठन खुशी मनाय के परब जेमे बईगा, गाँव के केंवट अऊ राऊत जात के मनखे मन एक चिनहा सरूप डांग बनाथे। जेला मड़ई कीथे, पूजा पाठ करके येमे देवता ल मड़हाथे, फेर ये डांग ल बईगा अऊ केंवट मिलके जेन मेर बजार भराथे तेन मेर राऊत मन ह डांग के चारों कोती नाचत नाचत जाथे। जेला परघना करत हे तको कीथे, आज के समे म मड़ई के सरूप ह भले बदलगेहे, फेर पहिली धरम करम के संगे संग मया के सतरंगी छाँव म रहचुली झूले के नांव आय मड़ई ह। जम्मो सगा सजन के मेल मिलाप इही मड़ई म होवय अऊ अपन सुख दुख ल बाटय अऊ फरियाके गोठ गोठीयावय। जेन गाँव या जगा म मड़ई भरायव वो गाँव म सगा मन के दु चार दिन पहिलीच रेला पेला लगे राहय। सबो जात के मनखे मन अपन अपन सगा के अगोरा तको करय, संबंध में अतका मिठास राहय पहिली, अब के समे म देखे बर नई मिलय। सबो जात के मनखे मन झगरा लड़ई ल गठरी म बांध मड़ई के रंग में रंग जाय, याने मानबे त एक परकार के एकजुटता तको दिखय। पटवा मन के चुरी फूंदरी के दूकान सज जाय माने गाँव के सबो नवा बहुरियाँ मन जईसे ऐकरे करा चुरी पहीनही। झूला, सरकश अजब तमाशा नाचा के पंडाल सज जाय। गोदना गोदैईया करा गोदना गोदाय बर लाईन लग जाय, गन्ना के रस के पागे लाई ऊखरा के ढेरी गंजाय राहय। मड़ई के चमक अईसे बने राहय कि मनखे मन जात पात ल भुला के नाचा गम्मत, सुआ करमा ददriyaरिया के ऐके संग बईठ के मजा लेवय। आज वो मिठास कोनों परब म देखे बर नई मिलत हे। हमर गाँव गाँव के खुशी के परब ह आज अपन सरूप ल खो चुके हे, जेकर जिम्मेदार हमन खुदे हरन अइसे लागथे।

विजेंद्र वर्मा अनजान
नगरगाँव(धरसीवां)
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ईंहा के मनखे नोहय

जिंहा के खावत हे तेकर गुण ल नई गाही,
तिरंगा के मया बर अपन लार ल नई टपकाही,
वोहा ईंहा के मनखे नोहय I
जेन ह ईंहा के माटी ल मथोलत हे,
अपनेच दांदर ल मरत ले फुलोवत हे,
वोहा ईंहा के मनखे नोहय I
कनवा खोरवा मुरहा ल जेन ह कुआं म ढपेलत हे,
मदहा अऊ जाँगरओतिहा ल सरग म चढ़ोवत हे ,
वोहा ईंहा के मनखे नोहय I
जेकर मिहनत के कमई म उदाली मार जियत हे,
उकरे मिहनत ल जेन ठेंगा दिखावत हे,
वोहा ईंहा के मनखे नोहय I
जांत पांत अऊ धरम ल बांटेके गोठ गोठीयावत हे,
अधरम सन कुमत के रद्दा म रेंगे बर सिखावत हे,
वोहा ईंहा के मनखे नोहय I
बने हाबय रखवार पारत बस हाबय गोहार,
रथिया कुन चोरी करे के जेन ह गुर बतावत हे
वोहा ईंहा के मनखे नोहय I
छत्तीसगढ़िया सबले बढिया कही कहीके फुलोवत हे,
पीठ पीछू गर ल डोरी बांध के अरोवत हे,
वोहा ईंहा के मनखे नोहय I
टोटा ल मसकबे त कहूँ जन गण मन गाथे,
छोरेच तहाले तिरंगा ल आगी लगाथे,
वोहा ईंहा के मनखे नोहय I

विजेंद्र वर्मा ‘अनजान’
नगरगाँव (धरसीवां)