मास्टर कहे के मतलब, मास्टर माइंड नो हे, फेर आजकल तो कलजुगी इस्टाईल के गुरू हर, अपन ला चाल्स सोभराज ले कोन्हों कम नई मानय । फोकट चंद अउ घिस ले चंदन, ऐमन ला पोगा पंडित अउ भकला महराज के उपाधि ले घलो नवाज अउ जाने जाथय । फेसन के चिखला सहर, महानगर भर मा हावय, अइसन न हे, आज के माहोल मा तो गली-कूचा अउ खोर-खोर मा येहा बगरे हावय । तेमा कोन कहाय, ओ चिपरू, मंदू अउ लडबडहा मनखे मन करा घला खिसा मा मोबाइल ह चटके रहिथय…
Read MoreYear: 2011
छत्तीसगढ़ के जन-कवि स्व.कोदूराम “दलित “के दोहा
छत्तीसगढ़ के जन-कवि स्व.कोदूराम ‘दलित’ जी ह आजादी के संघर्स के समय रास्ट्रीयता के भावना जागृत करे खातिर दलित जी ह छत्तीसगढ़ी दोहा ल राउत नाचा के माध्यम ले गाँव-गाँव तक पहुँचाये रहिस. आज दलित जी के 101 वां जन्म दिन आय, आज उनला सुरता करत उखंर लिखे राउत नाच के छत्तीसगढ़ी दोहा हमर संगी मन बर प्रस्तुत हावय । येला हमर बर भेजे हावय दलित जी के सुपुत्र अरूण कुमार निगम जी ह । निगम जी ह जन-कवि के रचना मन ला इंटरनेट के पाठक मन बर सुलभ कराए…
Read Moreलाली चूरी
तुलसी ह अंगना के धुर्रा ल रपोट रपोट के परदा रुंधे। पारा भर के लोग लइका सेकला के घरघुfधंया खेले। एक झन नोनी के दाइ बने एक झन बाबू के दाई। सुघ्घर पुतरी पुतरा के बिहाव ल रचै। लइकुसहा उमर के लइकुसहा नेंग जोग। उही बरतीया उही घरतीयाए उही लोकड़हीन उही बजनीया। नान नान पोरा चुकिया म साग भात चुरय। कमचिल के मड़वा म तेल हरदी चड़हय अउ भांवर परय। टूरा मन कनिहा म नंगारा बांधे। रोंगो बती अउ पानवाला बाबू गाना गा गा के गुदंग गुदंग नाचे। ये ठट्ठा…
Read Moreकहिनी : करनी दिखथे मरनी के बेरा
सुकवारो अब बस्ती में किंजर-किंजर के साग-भाजी बेचय अउ कुरिया में राहय। ओला एक बात के संतोष रहीस कि ओकर दूना लइका मन ओकर आंखी के आघु में हावय। ओहा अपन लइका मन के खाय पीये ले लेके कपड़ा लत्ता तक के खरचा उठाय बर धरलीस। ओ दिन मेहा पटेवा बाजार म गिंजरत रहेंव ओतके बेरा मोर सुखदेव भइया संग भेंट होगे। राम रमउवा होय के बाद मेहा ओला पूछ परेंव बने बने गा सुखदेव भइया। अतका ला सुनीस अउ सुखदेव भइया जोर जोर से रोय बर धर लीस। मै…
Read Moreकबिता : हाबे संसो मोला
हाबे संसो मोला, होगे संसो मोला ये देश के। भाई-भाई भासा बर लड़थे, बिपदा गहरावथे महाकलेस के॥ मंदिर-मस्जिद के झगरा अलग, सुलगावत रहिथे आगी। मया-पिरीत ल छोंड़ भभकावत बैरी पाप के भागी। बात-बात म खून-खराबा, भाई ल भूंजत हे लेस के॥ माँहगी होगे भाजी-भांटा, तेल, सक्कर, चाउर-दार। छोटे-बड़े, मंझला झपागे, धरम-करम होगे भ्रष्टाचार। माफिया सरगना, डाकू, डॉन, उड़ावै मजा, नकली माल बेंच-बेंच के॥ जम्मो अनैतिक धंधा के होवै कारोबार। चोरी-डकैती अपहरन के, फूलत-फरत हे बजार। डॉक्टर किडनी-विडनी बेंचय, बेटी बेंचावथे, सहर, नगर भेज-भेज के॥ कोनो नक्सलवादी बनगे, कोनो अतलंगहा आतंकवादी…
Read Moreनंदावत हे लोककला, चेत करइया नई हे…
गीतकार लक्ष्मण मस्तुरिहा से खास बात ‘देवार डेरा’, ‘चंदैनी गोंदा’, कारी बर लिखे गीत अऊ कवि सम्मेलन मा सोझेच अपन मन के बात कहइया गीतकार कवि लक्ष्मण मस्तुरिहा के कहना हे कि नवा राज बने नौ बछर बीतगे फेर छत्तीसगढ़ के लोककला के चिन्हारी करइया नई मिलीस। जतका बड़का आयोजन होइस ओमा दिल्ली, बम्बई के कलाकार ला नेवता देइन, इहां के कलाकार के पूछारी नई हे। इही हाल रईही त हमर लोककला नंदावत देरी नई लागय। कतका उछाह उमंग नवा राज बनिस त मन मा रहिस फेर मन के साध…
Read Moreछत्तीसगढ़ के राजिम धाम
बड़ भाग मानी मानुष तन।नंदिया तरिया कहत हे बन॥जग म होगे कुंभ नाम।मोर छत्तीसगढ़ के राजिमधाम॥ऋषि, मुनि के दरसन पाए।दूर-दूर ले मनसे आए।सरग ले भगवान कुंभ मेला आगे।सब नगर म मंगल छागे॥देख के महादेव कुंभ के गुन गाईचजेन नहाइच त्रिवेणी म तेन सरग पाइच॥इंहा सब सरग लागे।जगा-जगा मंगल गीत बाजे।महानदी सोढुर, खारून नदिया नाम।मोर छग के राजिमधाम॥इंहे हे काशी, इंहे हे मथुरा।आस्था म दीखय देवता पथरा॥महानदी के निर्मल धार।जेकर नहाय ले हो जाही पार॥जिंहा आवत हे ऋषि मुनि नागा।जय शिव शंकर के बाजे बाजा॥धन-धन हे ये नाम।मोर छत्तीसगढ़ के राजिमधाम॥…
Read Moreदारू बंदी के रद्दा अब चातर होवत हे
हमर प्रदेस मा चारो मुड़ा कारखाना उपर कारखाना लगत हावय, धान के कटोरा छत्तीसगढ़ मा किसानी जोंत के रकबा दिनो-दिन घटत जावत हावय। सहर ले लगे गांव-खेत मन ला बिल्डिंग हा लीलत हावय अउ जंगल-ड़ोंगरी के जमीन मन ला कारखाना हा लीलत हावय। बांचे खोंचे किसानी के जमीन हा कारखाना के चिमनी ले उड़ात करिया राखड़ अउ प्रदूसन ले पटर्रा भांठा होवत जावत हे। कारखाना वाले मन पइसा के बल मा सइघो नदिया अउ बांधा जईसे ला बिसा के पानी के प्राकृतिक संसाधन ला सिरवात हावंय। कारखाना बर सरकार अउ…
Read Moreदाई अउ बबा के वेलेन्टाइन डे – कहिनी
”सुफेद बबा हा अतेक सुंदर बंसरी बजावय कि ओकर सोर दस कोस ले बगरे रहीस। का रामायन मण्डली, का नाचा मण्डली, कीर्तन, राम सप्ताह सबे जगह ले बबा बर बुलावा हा आवय। एती दाई ला बबा के बंसरी नई सुहावय। वइसने बबा ला घलो दाई के घेरी-बेरी दखल देवई हा नई सुहावय। दाई हा तो रीस के मारे बबा के बंसरी ला एक बेर चुल्हा म जोर घलो डारे रहीस। ये झगरा के मतलब ए नई रहीस कि दूनो के बिल्कुल नई बनत रहिस हे।” झगरा तो सबो झन होथें…
Read Moreकबिता : मोर अंगना मा बसंत आगे ना
आगे बसंत आगे ना, मोर अंगना मां बसंत आगे ना पियर-पियर आमा मउरे, लाली-लाली परसा फूले मन मंदिर महकन लागे ना, आगे बसंत आगे ना। मुच-मुचावय फगुनवा, मुच-मुचावय फगुनवा मन न ल महर-महर महकावय फगुनवा फगुनवा के रंग बरसाय बर बसंत आगे ना। महुवा के रस मन ला मतावन लागे ना बैरी बसंत हिरदे मां मया के बान चलावन लागे ना आगे बसंत आगे ना, मोर अंगना मा बसंत आगे ना। पियर-पियर सरसों फूलें, लाली-लाली परसा हिरदे मां करत हावय मधु बरसा अमुवा के डार मां कोयली कुहकन लागे ना…
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