बकठी दाई के गांव

एती बकठी दाई के मिहनत के हाथ रहीस। ओहा बिहानिया ले रतिहा सुतत तक काहीं न काही बुता करते राहय। ओकर घर के मन घलो मिहनत करे म बरोबरी ले ओखर संग देवयं। तीर- तार के गांव म इज्जत बाढ़गे, लइका मन ल बने संस्कार मिलीस।कोनो माई लोगन ला अगर कोनो बकठी कही देही तो ओहा गुस्सा में आगी असन बरे बर धर लिही। फेर बकठी दाई ला कभु ये बात हा खराब नई लागिस। सिरतोन में बिचारी हा बकठी रहिस। बिहाव होय के बाद दस बच्छर तक आगोरिस ओकर…

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मितान के मया देखे बर उमड़िस भीड़

‘मितान’ परंपरा ला अपन छत्तीसगढ़ी फिलिम ‘मितान 420’ मा संघारत फिलिम बनाए हे। ओखर बाते अलग हे। पहिली च दिन सिनेमा ला देखे बर अतका भीड़ उमिड़स कि देखइया-सुनइया के संग फिलिम के कलाकार, गीतकार, संगीतकार, अउ जम्मो छत्तीसगढ़ी सिनेमा ले जुड़े लोगन गदगद होगे। फिलिम के मनभावन गीत घलो चर्चा मा हे। जेमा से खास गीत हे- कुहुक, कुहुक बोले काली कोयरिया, मन के मंजूर नाचे संगी मोर….। उछाह अउ उमंग भरे गीत सुनके मन मगन हो जथे। दूसरइया गीत हे जादू चलाए वो, बइहा बनाए ना तोर खोपा…

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नान्हे कहिनी – दहकत गोरसी म करा बरसगे

ये बखत कतका जाड़ परिस अउ कतका गरमी रही येला प्रकृति के नारी छुवइया मन बने बताही। रेडियो अउ टीबी वाला मन ओकरे बात ल पतिया के सरी दुनिया म बात बगराथें। टीबी म संझा के समाचार सुन के मैं मुड़ी गोड़ ले गरम ओनहा पहिरेंव अउ रातपाली काम म जाय बर निकलेंव। गर्मी होवे चाहे ठंड, खाय बर कमाय ल परथे। दस बजती रात म पूरा शहर कोहरा ले तोपा गे रिहीस। गली म एक्का-दुक्का मनखे रिहीस। हमन गली के आखिरी कोन्टा म रिक्सा वाला के परिवार रिथे। कोनो…

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छत्तीसगढ़ गीत म सिंगार रस

छत्तीसगढ़ी भाखा ल भले भारत सरकार ह भासा के मान्यता नइ देये फेर येमा जम्मो रस के गीत अउ गोठ समाय हे। तभे तो गीत म ये भाखा सही कोनो मीठ अउ धीरलगहा भाखा नइए केहे हे। मोर भाखा संग दया-मया के, सुग्घर हावय मिलाप रे। अइसन छत्तीसगढ़िया भाखा, ककरो संग झन नाप रे॥ ये भाखा के मिठास अतेक हे ते ककरो संग तुलना नइ करे जा सकय। सिंगार रस म छत्तीसगढ़ी के कतको गीत हे जेला रेडियो अउ पोंगा रेडियो म सुने ल मिलथे जइसे टूरा अपन पिरोहील ल…

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कलेवा

ये ह, छत्तीसगढ़ के कलेवा आय। तिहार बार के रोटी-पीठा आय॥ अइरसा, अंगाकर रोटी, इडहर, कढ़ी। करी लाड़ू, कोचईपाग, कोचईपीठा, पपची॥ खस्ता, खाजा, खुरमा, खुरमी। गुलगुला, गुरहाचीला, गुरहा भजिया, कुसली। चीला नूनहा, चौसेला, घुघरी, ठेठरी। डुबकी, बफौरी, डुबका, दूधफरा। तुमापाग, तिलगुझिया, तसमई, कतरा। दुधकुसली, देहरौरी, तुमा तसमई, दही बरा॥ नमकीन, नूनहाकरा, नूनहाचीला, पूरनपूरी। पापड़ी, पापर, पकुवा, पनकरी॥ बुदिंया, पनबुदिंया, बुदिंयालाड़ू, बोबरा। भजिया, मिर्चीभजिया, प्याजीबड़ा, मालपुआ॥ मुरकू, मुगौड़ी, मूंगकतरा, मूंगबड़ा। मोतीचूर, मुर्रालाड़ू, रखियापाक, हलुवा॥ रेहनकतरा, तिखुरकतरा, लपसी, सिंघाड़ा कतरा। सेवई, सोंहारी, रसगुल्ला, मोहनभोग॥ जलेबी, गुरहाचीला, तिललाड़ू, तिलपापड़ी। सलौनी, चिरौंजी, लाई, बेसनपापड़ी,…

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परोसी के परेम

डोकरी-डोकरा के एक-एक सांस नाती नतरा ल देख के भीतर बाहिर होथे। जानों मानो ऊंकर परान नाती-नतरा म अटके रहिथे।’ ‘ये दुनिया मया पिरित म बंधाय हे तभे ये जुग ह तइहा-तइहा ले चले आत हे। एक सादा सुंतरी म गूंथे रंग-बिरंग के फूल कस सरमेट्टा गुंथाय हे। मया बर जात लगे न कुजात। घर-परिवार, पारा-परोस, गांव मुहल्ला सब नत्ता-गोत्ता मानत एक दूसर के सुख-दुख म काम आवत, अपन करज निभावत, हंसी-खुसी से जियत रेहे के सिक्छा देवत रहिथे ये मया-परेम। जिंकर हिरदे म जतेक परेम हे तेला कभू आंसू…

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आगे-आगे बसंत के महीना

आगे-आगे बसंत के महीना झूमो नाचो रे संगी जहुंरिया। बइसाख-जेठ म धरे झांझ-झोला पानी बिना तरसे सबके चोला। डाहर चलईया हा खोजत हे छैहा। धुर्रा के उड़े बड़ोरा। आगे… अगहन-पूस ठिठुरन महीना खेती किसानी म भदराये हे धनहा। कोलिहा बपुरा हा देवत हे पाहरा भुर्री तापत बइठे सियनहा। आगे…। मांग-फागुन बसंत के महीना सरसो ह फूले अऊ फूले हे परसा। आमा बगीचा हा महक मारे। कोइली मार हावे कुहकिया। बलौराम कोसा

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फिल्मी गोठ : छत्तीसगढ़ी फिलीम म बाल कलाकार

एक-एक ईंटा, एक-एक पथरा, रेती-सीमेंट अउ बड़ अकन मकान बनाए के जीनीस ले मिस्री ह एक सुग्घर मकान, भवन, महल के निर्माण करथे। ठीक वइसने एक फिलीम के निरमान म नान-नान जीनीस अउ कई झन व्यक्ति के सहयोग ले होथे। फिलीम म बाल कलाकर मन के भूमिका ल घलो छोड़े नई जा सकय। चाहे वो फिलीम मुंबइया हो, बंगाली हो, दक्षिण भारतीय हो उड़िया हो या फेर हमर छत्तीसगढ़िया हो। छत्तीसगढ़िया फिलीम के बाल कलाकार ले मोर भेंट होईस त मोला लागिस कि छत्तीसगढिया फिलीम घलो बाल कलाकार के बिना अधूरा…

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नान्हे कहिनी: लइकाहा बबा

नउकरी ले रिटायर होये के बाद गांव ले ये सोच के अपन बेटा कना शहर आ गे कि बांचे जिनगी बेटा कने नाती मन संग खेलत खावत कट जाही। संझा सात बछर के नाती संग सहर के एक मात्र बगीचा मा घूमे बर आ गिन। वो हा देखिन बगीचा मा जम्मो मइनखे घूमत-फिरत हावय, कोनो-कोनो बइंच मा या भुंइया के घांस मा बइठ के गोठियावत हावय। नान-नान लइकामन घांस मा घोंडत हावय। सूरज देवता पछिम मा डूबत हावय। चिरई-चिरगुन मन अपन-अपन खोदरा तनि लहुटत हावय। वो ह अपन नाती संग…

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हीरानंद सच्चिदानंद वात्सायन अज्ञेय के तीन कविता

सांपसांप! तोला सऊर अभी ले नई आईससहर म बसे के तौर नई आईसपूछत हंव एक ठन बात-जवाब देबे?त कइसे सीखे डसे बर-जहर कहां पाये? पुलजोन मन पुल बनाहींवो मन सिरतौन पाछू रहिं जाहींनहक डारही सेनारावन ह मरही जीत जाही राम हजोन मन बनईया रहिनवो मन बेन्दरा कहाहीं। बिहनिया जागेंव त…बिहनिया जागेंव त घाम बगर गे रिहिसअऊ एक ठन चिरई ह अभीच्चे गीत गावत रिहिस।मेंहा घाम ले कहेंव, मोला थोरिक गरमी देबे का उधार?चिरई ले केहेंव तोर गुरतुर बानी थोरिक उधार देबे का?कांदी के हरियर पाती ले पूछेंव- थोरिक हरियर सुघरई…

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