घाम बइसाख-जेठ के : कबिता

बइरी हमला संसों हे, बीता भर पेट के।खोई-खोई भुंज डरिस, घाम बइसाख जेठ के।तिपत हे भुइंया, तिपत हे छानी।तात-तात उसनत हे तरिया के पानी।मजा हे भइया इहां सेठ के।खोई-खोई….रचना हे जांगर, खेत म ढेलवानी।भुंजावत हे बइरी, कोंवर जिनगानी।बेसुध हे जिनगी, सुरता न चेत के।खोई-खोई….चलत हे झांझ, जरत हे भोंभरा।मन पंछी खोजत हे खोंदरा।पोट-पोट लागे घाम देख के।खोई-खोई….नइए दऊलत दाऊ, गरीब काबर बनाएस।नइए अन्न-धन दाऊ, पेट काबर बनाएस।कइसे लुबो धान हसिया बिन बेंठ के।खोई-खोई….बनी-भूती म जिनगी सिरागेबइरी भूख म मति सिरागे।बनिहार होगेन घर न खेत के।खोई-खोई…. डॉ. राघवेन्द्र कुमार ‘राज’जेवरा सिरसा

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यहू नारी ये

यहू नारी ये फेर येकर समाज म कोनो सुनाई होवे। कोन जांच कराही की येकर कोख कइसे हरियागे। नारी सही दिखत ये पगली संग कोन अपन तन के गरमी जुड़ाइस। हादसा होही या बरपेली। का समझौता घलो हो सकथे? मन म सवाल ऊपर सवाल उठत हे। फेर जवाब के अभाव म ओ सवाल के कोनो अस्तित्व नई दिखथे। हमर समाज आज नारी परानी ल देवी अउ जननी कइके उंखर मान बढ़ाथे। फेर का हमर मन मानथे ओला देवी? ये आत्मचिंतन के विसय आय। देव दानव ले भरे समाज म नारी…

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फुगड़ी गीत

चल टूरी चल टूरी खेलबो फुगड़ी, फुगड़ी रे फाय-फाय फुगड़ी। सुरूज लुका गे, चंदा टंगा गे, फुगड़ी के खेलत ले आगी बुतागे, होगे भात गिल्ला लांघन माई पिल्ला ददा गुसियाही, दाई दिही गारी। चल-चल टुरा अब तोर पारी। चल-चल टूरा खेलबो फुगड़ी, फुगड़ी रे फाय-फाय फुगड़ी। सावन गढ़ा गे नागर फंदागे फुगड़ी के खेलई मां बेरा पहागे। मेंचका के गाना, नइए एको दाना। कोदो न कुटकी आरी न बारी, चल-चल संगी अब सबके पारी। चल-चल संगी खेलबो फुगड़ी फुगड़ी रे फाय-फाय फुगड़ी। फरियर पानी मां खोखमा के फूल, आमा तरी…

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छत्तीसगढ़ी संस्कृति के खुशबू ल बगराने वाला एक कलाकार- मकसूदन

सुआ नृत्य अउ गीत नारी मन के पीरा ल कम करथे। सुर अउ ताल म बंधे सुआ के चारो डाहर गोल घूमत नारी ऐखर पहिचान आय। ये दल म 180 झन नारी नृत्य करहीं त कइसे लगही ये सोचे के बात आय। ये सोच ल पूरा करे हावय मकसूदन राम साहू। राजीव लोचन महोत्सव म ये अनोखा आयोजन होथे। राजधानी रइपुर तीर के एक ठिन गांव चिपरीडीह म जनमे एक झन पातर दूबर ऊंच अकन मनखे जेन ला मकसूदन राम साहू के नांव ले लोगन जानथे, पहिचानथें। उनला ‘बरी वाला’…

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बहुरिया – कहिनी

बहु ह ससुरार म घलो मइके कस मया अउ दुलार म राहय। ससुर काहय बेटी हमरो बेटी ह घलो ककरो बेटी बनही, हमू मन सोचबो न बेटी ल ससुरार म घलो बेटी कस दुलार मिलय। हमन जइसन करबो तइसन तो हमरो बेटी मन ल मिलही मान सम्मान पाना कुछु अपनो हाथ का रइथे बेटी। देखत हावच बेटी मनोज ह अपन माइलोग के बात ल मान के अलग घर म चलदीच, बिचारी कौशिला ह नानपन ले अपन लइका अस सब ल पालिस पोसिस, पढ़इस-लिखइस अउ देख ले दुए महीना म ओकर…

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मक्खी-मच्छर मारो अभियान – कबिता

(कविता-जनहित मा जारी) जौन गढ्ढा मा जनम धरिसे , ओला सपाट बनालव मक्खी-मच्छर ला मारव अउ तुम उनला दूर हकालव. मच्छर के चाबे से होथे डेंगू अउ फायलेरिया ऊंकर पेट मा घलो पनपथे चिकनगुनिया मलेरिया. इंकर बचाव करना हे तुम्हला मच्छरदानी लगालव मक्खी-मच्छर ला मारव………. मक्खी के स्पर्श से होथे पेचिस,दस्त अउ पीलिया ऊंकर पांव मा रहिथे बीमारी हैजा अउ मोती-झिरिया इंकर से बच के रहना हे तुम्हला साफ-सफाई अपनालव मक्खी-मच्छर ला मारव………. खाये-पीये के चीज मा अपन इनला झन बैठारव खोमचा,ठेला ,खुली जगह के चीज ला झन तुम खावव…

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मक्खी-मच्छर मारो अभियान – कबिता

(कविता-जनहित मा जारी) जौन गढ्ढा मा जनम धरिसे ,ओला सपाट बनालवमक्खी-मच्छर ला मारवअउ तुम उनला दूर हकालव. मच्छर के चाबे से होथेडेंगू अउ फायलेरियाऊंकर पेट मा घलो पनपथे चिकनगुनिया मलेरिया.इंकर बचाव करना हे तुम्हला मच्छरदानी लगालवमक्खी-मच्छर ला मारव………. मक्खी के स्पर्श से होथे पेचिस,दस्त अउ पीलिया ऊंकर पांव मा रहिथे बीमारीहैजा अउ मोती-झिरियाइंकर से बच के रहना हे तुम्हलासाफ-सफाई अपनालवमक्खी-मच्छर ला मारव………. खाये-पीये के चीज मा अपन इनला झन बैठारवखोमचा,ठेला ,खुली जगह केचीज ला झन तुम खाववइंकर बीमारी होगे जिनलाओखर इलाज कराववमक्खी-मच्छर ला मारव………. मनखे के दुस्मन हे इमनबहुत बीमारी…

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मोला कभू पति झन मिलय – कहिनी

धान कोचिया राधे हर हुत करात अइस- सदानंद ठेलहा हस का रे? चल खातुगोदाम मेर मेटाडोर खड़े हे। विसउहा तेली के धान ल भरना हे। कइसे सुस्त दिखत हस रे। अल्लर- अल्लर। चल जल्दी। सुरगी म मार लेबे एकाध पउवा। पउवा के गोठ सुन के सदानंद के मुंहुं पंछागे। एक्के भाखा म टुंग ले उठगे।’ एसो के बइसाख म मंगली ह अठरा बछर के होगे। बिसराम अउ सोनारिन ल मंगली कस सुघ्घर बेटी पाए ले आन असन जादा सगा-सोदर देखे बर नइ लागिस। बड़ सुंदर रूपस राहै मंगली हर। मंगली…

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भोंभरा : कबिता

भुइंया ह बनगे तात-तवई बंडोरा म तोपागे गांव-गंवई नइये रूख-राई के छईहां रूई कस भभकत हे भुईंहां रद्दा रेंगइया जाबे कती करा थिराले रे संगी, जरत हे भोंभरा गला सुखागे, लगे हे पियास कोनो तिर पानी मिले के हे आस तरर-तरर चूहत हे पछीना जिव तरसत हे, छईहां के बिना का करबे जाबे तैं कती करा थिराले रे संगी, जरत हे भोंभरा कछार म नदिया के कलिंदर तै खाले पीपर तरी बईठके थोरिक सुरता ले नदिया के पानी ह अमरित कस लागय बिन पानी मोर भाई, परान नई बांचय सुन्ना…

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धरनहा – पं. जगमोहन प्रसाद मिश्र के गीत

तोर भोली सुरत मोला निक लागे रे, मोला निक लागे । हरियर हरियर लुगरा पहिरे चूरी कारी कारी धीरे धीरे आवत रहे बोझा धरे भारी तोला देखेंव तभे ले मोर सुध भुलागे । झिमिर झिमिर पानी बरसै चलथे पुरवाई तोरेच सुरता आथे कईसे करौं भाई तोर बिना मोला कईसे सुन्ना सुन्ना लागे । ताना देबे गारी देबे तोरेच कोती आहौं सबे कुछु सइहौं टूरी मारो घला खाहौं हांथ जोडे खडे र‍इहंव तोरेच आगे । ददा छोडेव दाई छोडेंव छोडेंव अपन भाई तोरेच खातिर घूमत रहिथंव नदिया अमराई परे रहिथंव कदम…

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