लोक कथा : सुरहीन गैया

एक गांव में एक झन डोकरी रिहिस, ओखर एक झन बेटा रिहस जउन ह निचट लेड़गा अउ कोड़िहा रहय। डोकरी ह गांव में बनी-भूती करके दु पइसा कमावय उही आमदनी में दुनों महतारी बेटा के गुजारा होवय। उपरहा में लेड़गा ह अपन-संगी जहुंरिया मन ला बने खई-खजाना खावत देख के वइसनेच जिनिस के मांग अपन दाई ले करे। अब बिचारी गरीबिन डोकरी ह लेड़गा के मांग ला कहां पूरोय बर सकतिस। एक दिन लेड़गा ह पान-रोटी खाहूं कहिके अड़बड़ जिद करिस। बिचारी गरीबिन काय करे, एक डहर दुलरवा बेटा के…

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लोक कथा : सतवंतीन

बहुत जुन्‍नस बात आय। एक गांव में सात भाई अउ एके झन बहिनी के परिवार रहय। सब ले छोटे भाई के नाव संतु अउ बहिनी के नाव सतवंतीन रहय। छै झन भाई मन के बिहाव होगे रहय। संतु भर के बिहाव होय बर बांचे रिहिस। बिचारी सतवंतीन अपन दाई-ददा मन ला जानबे नइ करय, काबर कि वोहा जब बहुत छोटे रिहिस तभे ओखर दाई-ददा मन सरग सिधार गे रिहिन। भाई-भैजई मन ओखर पालन-पोशण करे रिहिन अउ पर्रा में भांवर किंजार के ओखर बिहाव घला कर दे रिहन। अभी सतवंतीन के…

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दू ठन गीत रोला छंद अउ कुण्डलियां छंद म

1. मोर गवा गे गांव (रोला छंद) मोर गवा गे गांव, कहूं देखे हव का गा । बइठे कोनो मेर, पहीरे मुड़ी म पागा ।। खोचे चोंगी कान, गोरसी तापत होही । मेझा देवत ताव, देख मटमटवत होही ।।1।। कहां खदर के छांव, कहां हे पटाव कुरिया । ओ परछी रेगांन, कहां हे ठेकी चरिया ।। मूसर काड़ी मेर, हवय का संगी बहना । छरत टोसकत धान, सुनव गा दाई कहना ।।2।। टोड़ा पहिरे गोड़, बाह मा हे गा बहुटा । कनिहा करधन लोर, देख सूतीया टोटा ।। सुघ्घर खिनवा…

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करिया बादर छागे

करिया करिया बादर छागे, सनन सनन पुरवैया चलै ना उमड़ घुमड़ के गरजन लागे, कड़क कड़क के बिजुरी चमकै  ना झिमीर झिमीर गीत सुनावै, गावै बरखा रानी नरबा तरिया डिपरा खोचका, गाव माँ भरै पानी टिप टिप छानी चुहचुहागे, खुजरी ओढ़े खपरा उलतैना टरर टरर मेंचका के बोली, मोर नाचै वन मा चकवा चकवी दुनो मिलगे, फूल महके तन मा धरती के अचरा हरियागे, ठुमके गोगी कनिहा लचकै ना…. तो तो तो तो बइला के तुतारी, जोते नांगर खेत ला मारे ददरिया के तान जोही, बासी धरे मेड़ मा नंगरिहा…

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छंद – अजब-गजब

अजब संसार होगे, चोर भरमार होगे चोरहा के भोरहा म चंउकीदार उपर सक होथे सच बेजबान होगे, झूठ बलवान होगे बईमान बिल्लागे ते, ईमानदार उपर सक होथे मुख बोले राम – राम, पीठ पीछु छुरा थाम बेवफा बिल्लागे ते वफादार उपर सक होथे रखवार देख बाग रोथे, जंगल म काग रोथे वरदी म दाग देख, थानादार उपर सक होथे दूभर ले दू असाड़, जिनगी लगे पहाड़ नैनन सावन-भादो, एला खार-खेती कहिथे पानीदार गुनाह करे, कानून पनिया भरे जनता जयकार करे, एला अंधेरगरदी कहिथे ढेकना कस चूसथे, मुसवा कस ठूंसथे बोहाथे…

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कविता – सुकवा कहे चंदा ले

सुकवा कहे चंदा ले गांव-गंगा नइ दिखे चोला चिटियाएहे, मन चंगा नइ दिखे खुमरी नंदागे कहॉं, खुरपा नइ दिखे खार सिरागे कहॉं, करपा नइ दिखे बिलासपुर म जइसे अरपा नइ दिखे सुकवा कहे चंदा ले गांव-गंगा नइ दिखे खांसर नंदागे, दमांद आवै दुलरू बईला के गर म बाजे झूल घुंघरू नंदिया तीर बंसी बाजे उही बेरा म राग बखरी ह छेड़े कुऑं – टेड़ा म मुटियारी खोपा म वो दावना नइ दिखे सुकवा कहे चंदा ले गांव-गंगा नइ दिखे कोठार नंदागे, कोठा नइए लछमी अगोरत राहे दूध, दही, कोरनी नांगर…

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गीत – जागो हिन्दुस्तान

सुनो रे संगी ! सुनो रे सांथी ! सुनो मोर मितान ! देसी राज म गोहार होवथे, होगे मरे बिहान ! जागो-जागो, गा जवान ! जागो-जागो, गा किसान ! जागो, जम्मो हिन्दुस्तान ! अजादी संगी ! रखैल होगे, ठाट-बाट अउ पोट के अंधरा कानून कोंदा-भैरा, पग-पग म खसोट हे ईमान के इनाम लंगोटी, बईमान बिछौना नोट हे देस-राज बर सहीद होगे, होगे जे बलिदान दाना-दाना बर तरस जथे, fतंकर लइका अउ सियान ! जागो-जागो, …. देंवता कस मान पावथे, खादी म हुंर्रा-गिधवा सुवारथ के सरकार ए, चोर-लुटेरा मितवा जोगनी लुटइया…

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बरखा गीद

बेलबेलहीन बिजली चमकै बादर बजावै मॉंदर घूमके नाचौ रे झूम झूमके मात गे असढ़िया हॅ, डोले लागिस रूख राई भूंइया के सोंध खातिर, दउड़े लागिस पुरवाई बन म मॅजूर नाचे बत्तर बराती कस झूम के सिगबिग रउतीन कीरा, हीरू बिछू पीटपीटी झॉंउ माउ खेलत हे, कोरे कोर कॉंद दूबी बरखा मारे पिचका भिंदोल के फाग सुन सुनके खप गे तपैया सुरूज, खेत खार हरिया गे रेटही डोकरी झोरी ल देख , जवानी छागे जोगनी झॅकावै दीया भिंगुर सुर धरै ऑंखी मूंदके भूंइया के कोरे ल मुड़ी, नांगर बइला धर किसान…

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कहॉं जाबो साहर

कहॉं जाबो साहर काबर जाबो साहर मिहनत पूजा गॉंव इस्सर भूईया सरग हमर पेरके जॉंगर पीबोन पसिया करम के डारा झर्राबो जाही कहॉं रे मोती बरोबर बोहत पसीना पझर चंदा सुरूज कस जग म ऑंखी दाई ददा के लाठी अन सेवा बजावत कोरा म रहिबो जाही पहा रे उमर धान कटोरा छत्तिसगढ़ म नइहे कुछू के खानी सोन चिरैया फुदगत चरथे दाना जम्मो डहर धरके असीस दाई ददा के भूईया के कोरा म उतरबो सरग खजाना इंहे भरे हे चल नॉंगर धर धमेन्द्र निर्मल

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बस्तर

हमर हरियर-हरियर बस्तर आज लाल होवथे गरीब ल मुरकेटे बर बड़हर मन के चाल होवथे दंतेसवरी दाई! सुवारथ के सेवइया मन के सर्वनास कर गोली खा-खाके बस्तरिहा चमगेदड़ी के खाल होवथे ताकत अउ सियासत जंगल के धुर्रा बिगाड़ दिस जंगल के दुलौरिन ल सहरिया हुंर्रा बिगाड़ दिस करेजा फाटगे, फेर दाई के ऑंखी म ऑंसू के दुकाल होवथे हमर हरियर-हरियर बस्तर आज लाल होवथे बस्तर के बिकास बर, बजट के टुकना धरे सरकार हे आने ह कहिथे, ये तो ऊंट के मुंह म जीरा ए, अउ दरकार हे बस्तर के…

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