गुरू ह मुक्ति के दुवार होथे त सिस्य ह मुक्ति दुवार के तोरन – धजा, बंदनवार होथे। मुक्ति के दुवार ए सेती काबर के दुनिया के छल परपंच दुख संताप के बोहावत बैतरनी नदिया ल पार कराथे गुरू हॅं। गुरूच ह अग्यान के घपटे अंधियारी म जोगनी कस जुगुर – जागर सही फेर रस्ता देखावत गियान के जगमग- चकमक अंजोर तक ले जाथे। अतके भर नही गुरूच हॅं सिस्य ल वो परम आतमा के घलो बोध कराथे , जेन ए जगत बिधाता ए। एकरे सेती तो कहे गे हवय के…
Read MoreYear: 2014
लोककथा के शिक्षक- संत गुरु घासीदास अउ उंकर उपदेस
शिक्षक कोन? ये प्रश्न करे ले उत्तर आथे कि जउन मन के मलिनता ल दूर कर के भीतरी म गियान के परकास फइलाथे अउ अंतस के भाव निरमल करथे, सत के रद्दा बताथे, उही शिक्षक आय। कबीरदासजी कहिथे- ‘गुरु कुम्हार सिस कुंभ है, गढ़-गढ़ काडे ख़ोट।’ अर्थात् जउन शिष्य के अवगुन ल कुम्हार के भांति दूर कर के ओला सत गुन ले जुक्त बना दे। सत्यम्, शिवम् अउ सुन्दरम् के भाव बोध करा दे उही सद्गुरु आय। शास्त्र पुरान म गुरु के गजब महिमा गाये गे हे। फेर उही गुरु…
Read Moreतय जवान कहाबे
जा मोर बेटा तय जवान कहाबे, माता के रक्षा बर जान गंवाबे जा मोर बेटा तय जवान कहाबे। दुनिया मा किसम-किसम, के मनखे भरे हे कानो हे गरीबहा त, कानो धन ला धरे हे, अइसन के बीच रही, जिछुटठा झन कहाबे जा मोर बेटा तय जवान कहाबे। मालिक ला गुण नई लागयए जबरन खिसियाही गा थोरेक जादा कमाबे त, दुनिया सिसियाही गा अइसन अनदेखना के, तीर झन ओधियाबे जा मोर बेटा तय जवान कहाबे। पइसा के राहत ले जी, तीर मा ओधियाही गा हो जाबे गरीबहा त, मुंहू ला टेंडवाही…
Read Moreहरितालिका व्रत (तीजा)
भादो महीना अंजोरी पाख के तीजा के दिन सधवा माईलोगन मन अपन अखण्ड सुहाग के रक्षा खातिर श्रध्दा भक्ति ले हरितालिका व्रत (तीजा) के उत्सव ल मनाथें। शास्त्र पुरान म सधवा-विधवा सबे ये व्रत ल कर सकत हें। कुमारी कइना मन घलो मनवांछित पति पाय खातिर ये बरत ल कर सकत हें, काबर के कुंवारी म ही ये बरत ल करके पारबती जी ह भगवान शंकर ल पति के रूप म पाय रहिस। आज के दिन माईलोगिन मन ल निराहार रहना पड़थे। पानी ल नई पिययं। निर्जला व्रत ल करथें।…
Read Moreफेर दुकाल आगे
आंखी होगे पानी-पानी मन हा मोर दुखागे रद्दा जोहत बरसा के आसाढ़ घलो सिरागे कइसे बदरा उड़ियात आही रूख-राई घलो कटागे अइसन हम का पाप करेन बरूण देव घलो रिसागे धान हा बोआये नईहे अऊ बियासी के बेरा आगे रद्दा जोहत बरसा के भुंइया घलो थर्रागे नई सुनावय टर-टर बोली लागे मेचका घलो नंदागे पूजा-पाठ ला करत-करत कुकुर घलो बिहागे पइसा के जमाना पाके कोठी हा सुखागे का खाबो पेट भरे बर सफ्फा धान हा बेंचागे शहर कोती रद्दा पाके बनिहार घलो नंदागे कइसे करबो गुजर बसर महंगाई घलो झपागे…
Read Moreवाह रे तै तो मनखे (रोला छंद)
जस भेडिया धसान, धसे मनखे काबर हे । छेके परिया गांव, जीव ले तो जांगर हे ।। नदिया नरवा छेक, करे तै अपने वासा । बचे नही गऊठान, वाह रे तोर तमाशा । रद्दा गाड़ी रवन, कोलकी होत जात हे । अइसन तोरे काम, कोन ला आज भात हे ।। रोके तोला जेन, ओखरे बर तै दतगे । मनखे मनखे कहय, वाह रे तै तो मनखे ।। दे दूसर ला दोष, दोष अपने दिखय नही । दिखय कहूं ता देख, तहूं हस ग दूसर सही ।। धरम करम के मान,…
Read Moreमिसकाल के महिमा
मोबाइल आए से लइका सियान सबो झन मुंहबाएं खडे रहिन हे। जब देखव, जेती देखव गोठियाते रहिथे। जब ले काल दर ह सस्ता होइस तब ले किसिम-किसिम के चरचा शुरु होगे हे। सारी के भांटो से, प्रेमका के प्रेमी से, आफिसर के करमचारी से, शादीशुदा के ब्रह्मचारी से, घरवाली के घरवाले से, अऊ घरवाले के बाहिरवाले से। गुप्त चरचा, मुखर चरचा, आदेश, संदेश, डांट-फटकार, गाली-गलौज, ब्लेक मेल, प्रेम प्रस्ताव, अउ चुगली सब्बो के एके साधन हे मोबाइल। खखोरी में फाइल दबा के बात करत पहिली साहेब शुभा मन ल देखन।…
Read Moreबेंगवा के टरर-टरर
एक समे के बात ये, पानी नी गिरीस। अंकाल पर गे। सब कोती हाहाकार मचगे। सब ले जादा पानी म रहवइया जीव-जंतु मन के करलई होगे। एक ठन बेंगवा ल अपन भाई-बंधु के याहा तरहा दुख ल देख के रेहे नी गीस। ओ मन ल ये केवा ले उबारे बर इंद्र देवता मेर पानी मांगे बर जाये के बिचार करीस। एक कनिक दुरिहा गेय राहय त ओला एक ठन बिच्छी भेंट पारिस अउ पूछथे- बेंगवा भईया तैं लकर-लकर कांहा जावत हस गा? बेंगवा अपन मन के बात बतईस। बिच्छी ह…
Read Moreमय अक्खड़ देहाती अंव
छत्तीसगढ़ के रउहइया अंव, छत्तीसगढ़ी मा गोठियईया अंव। संगी मय देहाती अंव, मय अक्खड़ देहाती अंव।। चार महिना ले बुता करईया आठ महिना ले सुरतईया अंव। जम्मों सुख ले जीये-खाये, मय बिनती के करइया अंव।। मय छत्तीसगढ़ के माटी, मय माटी के सिरजइया अंव। माटी के घर बनाये बर मय नींव के खनइया अंव।। संगी मय देहाती अंव। मय अक्खड़ देहाती अंव।। माटी ला चिक्कन बनाये बर, मय माटी के मतइया अंव। नींव खोदागे त लोंदी-लांेदी, मय माटी के अमरइया अंव।। मुंड़-पुरूष होगे त संगी, मय म्यार के मडहईया अंव।…
Read Moreअपन बानी अपन गोठ
बड़े बिहिनिया दीदी छरा छितत हावय कोठा ले सुरहीन गईया बइठे हांसत हावत संदेसिया कस कांव कहि डेरा मा बलाहू अपन बानी गोठ मा जुरमिल गोठियाहू देखव fभंसरहा किसनहा भईया ला नागर-जुड़़ा खांधे बोहे रेंगइया ला सुग्धर धनहा खेती ला जुरमिल उपजाहू अपन बानी गोठ मा जुरमिल गोठियाहू महतारी के भाखा ये भइया संसो लजाये के उघारव फइका कतका दिन ले छितका कुरिया मा तू मन हा धंधाहू अपन बानी गोठ मा जुरमिल गोठियाहू महतारी के भाखा छत्तीसगढी साग मा मिठाथे जइसे सुग्धर कढ़ी चटवा-चटवा मांदी मा जम्मों ला खवाहू…
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