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कविता

जेठ के कुहर

जेठ के महीना आगे,
कुहर अब्बड़ जनावत हे।
घाम के मारे मझनिया कून,
पसीना बड़ चूचवावत हे।
सुरूज नरायन अब्बड़ टेड़े,
रुख राई घलों सुखावत हे,
येसो के कूहर में संगी,
जीव ताला बेली होवत हे।
सरसर सरसर हवा चलत हे,
उमस के अबड़ बड़हत हे।
तरिया नरूआ सुख्खा परगे,
चिरई चिरगुन ह ढलगत हे।
कुआ बावली के पानी अटागे,
पानी पिए बर तरसत हे।
सुरुज देवता के मुहू ले घाम,
आगी असन बरसत हे।
धरती दाई के कोरा ह,
तेल असन डबकत हे।
इहा रहइया परानी मन,
कुहर उमस म दनकत हे।

युवराज वर्मा
बरगड़ा
साजा, बेमेतरा

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