छत्तीसगढ़ी भूल भूलैया

समर्पन धमधा के हेडमास्टर पं. भीषमलाल जी मिसिर महराज के सेवा मा :- लवनी तुहंला है भूलभुलैया नींचट प्यारा। लेवा महराजा येला अब स्वीकारा।। भगवान भगत के पूजा फूल के साही। भीलनी भील के कंद मूल के साही।। निरधनी सुदामा के ओ चाउर साही। सबरी के पक्का 2 बोइर साही।। कुछ उना गुना झन हाथ अपन पसारां लेवा महराजा, येला अब स्वीकारा।। जावलपुर, दिनांक 12. 04. 1918 तुहंर दया के भिखारी, शुकलाल प्रसाद पांड़े भूमका ये बात ला सब जानथें कि आदमीमन धरम-करम, नीत-प्रीत, बुद्धू-बिबेक, चतुराई कहां ले कहों, भगवान…

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रमजान अउ पुरूषोत्तम के महीना : सियान मन के सीख

सियान मन के सीख ला माने म ही भलाई हे। संगवारी हो तइहा के सियान मन कहय-बेटा ! अधिक मास के हमर जिनगी म भारी महत्तम हावय रे ! फेर संगवारी हो हमन उॅखर बात ला बने ढंग ले समझ नई पाएन। हमन नानपन ले सुनत आवत हन-“हिन्दु मुस्लिम सिख इसाई, आपस में सब भाई-भाई।” हमर भारत देस के यही विशेषता हवय कि इंहा अनेकता में एकता के वास हावय। इंहा भांति-भांति के धर्म, रीति-रिवाज अउ संस्कृति के मेल हावय एखरे सेती हमर भारत जइसे देस पूरा विश्व मे अउ…

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लोक कथा : लेड़गा मंडल

– वीरेन्द्र ‘सरल‘ एक गांव म एक झ लेड़गा रहय। काम बुता कुछ नइ करय। ओखर दाई ओला अड़बड़ खिसयावय। लेड़गा के दाई जब सियान होगे अउ लेड़गा जवान, तब रिस के मोर डोकरी ओला अड़बड़ गारी-बखाना दिस। लेड़गा हाथ जोड़के किहिस-‘‘ले दाई अब जादा झन खिसया। काली ले महुं कुछु बुता काम करके चार पैसा कमा के तोर हाथ में दुहूं। डोकरी खुश होगे अउ बिहान दिन आज मोर बेटा ह कमाय बर जाही कहिके लेड़गा बर सात ठन मुठिया रोटी रांध के मोटरी म जोर दिस। लेड़गा रोटी…

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आँखी के काजर

भुला डारे मोला काबर बैरी बनाये तोर आँखी के काजर हाथ के कंगन मोला अबड़ आथे सुरता तोर गुस्सा तोर हसना तोर नखरा तोर मीठ बोली सच म गांवली गाँव मोर सुरता कराथे बर पीपर के छाँव तोर अंगना के टूटहा खटिया डर डर के तोर गली म जाना छुप छुप के मीठ बोली बोलना अब सपना होगे तोर संग बैठना बैरी रहिन तोर पारा के संगवारी सब अब संगवारी होगीन जबले तोर गवना होइस हे मोर पुछैया मन मोला भुलागींन अब तो तेही ह मोर मया ल मुरेछ देहे…

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पान के मेम

जान चिन्हार सूत्रधार, दाई, बप्पा,बिरजू, चंपिया, मखनी फुआ, जंगी,जंगी के पतो, सुनरी, लरेना की बीबी दिरिस्य: 1 बिरजू:- दाई, एकठन सक्करकांदा खान दे ना। दाईः- एक दू थपड़ा मारथे- ले ले सक्कर कांदा अउ कतका लेबे। बिरजू मार खाके अंगना मा ढुलगत हवय, सरीर भर हर धुर्रा ले सनात हवय। दाईः- चंपिया के मुड़ी मा घलो चुड़ैल मंडरात हावय, आधा अंगना धूप रहत गे रिहिस, सहुआइन के दुकान छोवा गुर लाय बर, सो आभी ले नी लहुंॅटे हवय, दीया बाती के बेरा होगिस, आही तो आज लहुंॅट के फेर। बागड़…

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सिरीपंचमी का सगुन

जान चिन्हार सिंघाय कहारः- किसान माधोः- सिंघाय कहार का बेटा जसोदा:- सिंघाय कहार की घरवाली कालू कमार:- एक लोहार कमला:- कालू कमार की घरवाली गंॅजेड़ियाः- बूढ़ा रेलवे मिस्त्री धतुरियाः- जवान रेलवे मिस्त्री कोटवारः- हांॅका लगोइया हरखूः- गांॅव का किसान मनखे 1,2,3,4,5,ः- सभी किसान गांॅजा, बिड़ी, सिगरेट और शराब पीना स्वास्थ्य बर हानिहारक हावय। दिरिस्यः 1 ठौर:- सिंघाय के घर अनमना मन ले सिंघाय आथे, कौंआ बोलथे- कांव कांव सिंघायः- असुभ, असगुन बोली कौंआ के, टेड़गा फाल, टेड़गा भाग। माधोः- ददा आगिस, ददा आगिस, सबले पहिली मोर ददा आगिस, मोर बर…

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ठेंसा

जान चिन्हार: सूत्रधार, सिरचन, बेटा, दाई, नोनी, बड़की भौजी, मंैझली भौजी, काकी, मानू दिरिस्य:1 सूत्रधारः- खेती बारी के समे, गांॅव के किसान सिरचन के गिनती नी करे, लोग ओला बेकार नीही बेगार समझथे, इकरे बर सिरचन ला डोली खेत के बूता करे बर बलाय नी आंय, का होही ओला बलाके? दूसर कमियामन डोली जा के एक तिहाई काम कर लीही, ता फेर सिरचन राय रांॅपा हलात दिखही, पार मा तौल तौल के पांय रखत, धीरे धीरे, मुफत मा मजूरी दे बर होही, ता अउ बात हावय।——- आज सिरचन ला मुफतखोर,…

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