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गोठ बात

नोनी मन के खेलई कुदई ह हिरदे में मदरस घोलय

बड़ सुघ्घ्रर लागय नोनी मन के खेले खेल म गाना गवई अऊ ओकर मन के इतरई ह, अभी के समे म वोईसना खेलईया नोनी बाबु देखे बर नई मिलय। अईसने लागथे ओखर मन के पहिचान ह नदा गेहे, हँसई खेलई ह लईका मन के सबो ह, बस्ता के बोझ तरी चपका गेहे। का देहात का शहरिया बस्ता के बोझ ले उबरिस तहाले मोबाइल में मति ह सकला गेहे। कान ह तरसत हे नांगर बईला बोर दे पानी दमोर दे सुने बर, नगरिहा किसान मन खेती बारी बियारा बखरी के काम अऊ घर कुरिया के छानही लहुटाय त गली में खेलत नोनी मन के खेले खेल म मीठ बोली ह गली में अवैईया जवैईया मन के कान में खनकत राहय। खवई पियई अऊ सुतई बसई के चेत ल घलो भुला के नोनी मन हरहिन्सा बिगर चिंता फिकर के खेलत रहय।




खेत खार में जब चारों कोती अरा ररा तता तता के भाखा गुंजत रहय, त गली खोर में अतका अतका पानी गोल गोल रानी खेलत नोनी मन दऊड़त भागत रहय। किसनहा मनखे के मुँह ले अरा ररा तता तता नदागे तईसने गड़हन नोनी के मुँह ले अतका अतका पानी गोल गोल रानी नदागे। खेती किसानी के दिन में किसनहा मनखे अऊ मजूरी करैईया ल खाय पिए के बरोबर समे तको नी मिलय त अंगाकर रोटी अऊ आमा के अथान म डपट के खाय। अबके लईका मन ल पूछबे अथान काय ये, नी बता पावय, गाँव के खेत खार में मेला लगे रहय कोनों ददरिया गावय कोनों चोंगी पीयत खेती बारी के काम ल सिरहाय।
काम करके खेत ले आतिस तहाले खेलत नोनी ल हुत पारय, नोनी अपन धुन में आन खाव कि पान खाव सूपा भर पिसान खाव कईके अपन बाबू करा आतिस अऊ सुघ्घ्रर दाई बनाय राहय तेन भात साग ल निकाल के परोसय। नोनी के खेले खेल में परोसई अऊ ओकर गाना गवई ल सुनके ददा के हिरदे ह जुड़ा जय, अतेक कमा के आय रहय तेनो थकान ह नोनी के बोली सुनके पीरा ह भगा जय। फेर अब के समे म किसनहा मनखे के तरुवा सुखा गेहे सबो किसानी के भाखा भुला गेहे वोईसने लईका मन खेलई कुदई ल भुला गेहे। बड़ सुरता आथे ओकर मन के अटकन मटकन दही चटाका ह, रेलगाड़ी छुकछुक रेलगाड़ी छुकछुक,गोबर दे बछरू गोबर दे सुने बर कान ह तरस गेहे। वो समे रिहीस नोनी मन के खेल खेलई ह दाई ददा किसान जवान के हिरदे म मदरस घोलय।

विजेंद्र वर्मा अनजान
नगरगाँव (धरसीवां)

1 reply on “नोनी मन के खेलई कुदई ह हिरदे में मदरस घोलय”

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