दाई के होगे हलाकानी रदरद रदरद गिरत हे पानी, दाई के होगे हे हलाकानी। घेरी बेरी देखे उतर के अँगना में, माड़ी भर बोहात हे गली में पानी। लकड़ी ह फिलगे छेना ह फिलगे, चूलहा में तको ओरवाती ह चुहगे। रांधव रंधना कईसे बड़ परशानी, दाई खिसयाय का बताव कहानी। झनन झनन झींगुरें चिल्लाये, टरर टरर मेचका नरियाये। सरफर सरफर मछरी चढ़त जाये, बिला ले केकरा झाकय फेर खुसर जाय। रदरद रदरद गिरत हे पानी, बरत नईये आगी बताव का कहानी। दाई के होवत हे हलाकानी, माड़ी भर बोहात हे…
Read MoreMonth: July 2018
गति-मुक्ति : छत्तीसगढी कहिनी संग्रह
गति-मुक्ति ( छत्तीसगढी कहिनी संग्रह ) रामनाथ साहू वैभव प्रकाशन रायपुर ( छ.ग. ) छत्तीसगढ राजभाषा आयोग रायपुर के आर्थिक सहयोग से प्रकाशित गति-मुक्ति ( छत्तीसगढी कहिनी संग्रह ) समरपन छत्तीसगढी अऊ हिन्दी के समरथ साहित्यकार श्री अंजनी कुमार ‘अंकुर’ ला मोती अऊ धागा 1. छानही 2. बीज 3. चक्का जाम 4. काकर शहर काकर घर 5. गणित के पाठ 6. पूजा-आरती 7. टिकट 8. गति-मुक्ति 9. नडउकरी 10. गंवतरी 11. कोंचई पान के इड्हर 12. ददा-बेटा 13. छाया-अगास 14. सुरबईहा छानही तीनों के तीनों छानही हर एके कोती रहिस,…
Read Moreपतंजलि के योग दर्शन, बाल्मिकी मूल रामायण, ईशावास्योपनिषद : अनुवाद
छत्तीसगढी कवित्त मं मुनि पतंजलि के योग दर्शन अउ समझईस बाल्मिकी मूल रामायण रचयिता डॉ हर्षवर्धन तिवारी पूर्व कुलपति प्रकाशक श्री राम-सत्य लोकहित ट्रस्ट ज्ञान परिसर पो.आ. रविशंकर विश्वविद्यालय रायपुर ( छ.ग.), मो. 09977304050 अनुक्रमणिका भाग-एक छत्तीसगढी कवित्त मं मुनि पतंजलि के योग दर्शन अउ समझईस 7-84 भाग-दो बाल्मिकी मूल रामायण 85-104 भाग-तीन ईशावास्योपनिषद 105-110 त्याग का अध्यात्म । जगत गुरू स्वामी विवेकानन्द का आध्यात्मिक खोज तथा मानवता और विश्व धर्म 115–126 परिशिष्ट श्री राम सत्य लोकहित ट्रस्ट की कार्य शृंखला 1996-2014 पतंजलि के योगसूत्र ह आध्यात्म साधना के मंत्र…
Read Moreमोर गाँव के बिहाव
नेवता हे आव चले आव मोर गाँव के होवथे बिहाव। घूम घूम के बादर ह गुदुम बजाथे मेचका भिंदोल मिल दफड़ा बजाथे रूख राई हरमुनिया कस सरसराथे झिंगुरा मन मोहरी ल सुर म मिलाथे टिटही मंगावथे टीमकी ल लाव।।1।। असढ़िया हीरो होण्डा स्प्लेण्डर म चढ़थे मटमटहा ढोड़िहा अबड़ डांस करथे भरमाहा पीटपीटी बाई के पाछू घुमथे घुरघुरहा मुढ़ेरी बिला ले गुनथे चोरहा सरदंगिया डोमी खोजै दांव।।2।। बाम्हन चिरई मन बने हे सुहासीन अंगना परछी भर चोरबीर चोरबीर नाचीन कौंआ चुलमाटी दंतेला बलाथे झुरमुट ले बनकुकरी भड़ौनी गाथे झूमै कुकरी कुकरा…
Read Moreलोक कथा : लेड़गा के बिहाव
– वीरेन्द्र ‘सरल‘ एक गाँव म एक गरीब लेड़गा रहय। ये दुनिया म लेड़गा के कोन्हों नइ रिहिस। दाई रिहिस तउनो ह कुछ समे पहिली गुजर गे। लेड़गा ह बनी-भूती करके भाजी-कोदई, चुनी-भूंसी खाके अपन गुजर बसर करत रहय। सम्पत्ति के नाव म लेड़गा के एक झोपड़ी भर रहय तब उही झोपड़ी के आधा म पैरा के खदर छानी रहय अउ आधा ह अइसने खुल्ला। एक ठन गाय रहय जउन ह आधा भीतरी तब आधा बहिरी बंधाय। एक ठन हउला रहय तहु ह नो जगह ले टोड़का रहय जउन ला…
Read Moreकल्चर बदल गे
पहिली के जमाना मा साझा-परिवार रहिन। हर परिवार मा सुविधा के कमी रहिस फेर सुख के गंगा बोहावत रहिस। सियान मन के सेवा आखरी साँस तक होवत रहिस।अब कल्चर बदल गे, साझा परिवार टूट गे। सुविधा के कोनो कमी नइये, फेर सुख के नामनिशान नइये। लोगन आभासी सुख के आदी होवत हें। सियान मन वृद्धाश्रम जावत हें। जउन मन वृद्धाश्रम नइ जावत हें, उंकर घर मन वृद्धाश्रम सहीं बन गेहे। ककरो बेटा ऑस्ट्रेलिया मा, ककरो अमेरिका मा, ककरो कनाडा मा, ककरो सिंगापुर मा। अपन जिनगी के सरी सुख ला त्याग…
Read Moreअसाढ़ आगे
चारो मुड़ा हाहाकर मचावत, नाहक गे तपत गरमी, अउ असाढ़ आगे। किसान, मजदूर, बैपारी, नेता,मंतरी,अधिकारी,करमचारी… सबके नजर टिके हे बादर म। छाए हे जाम जस करिया-करिया, भयंकर घनघोर बादर, अउ वोही बादर म, नानक पोल ले जगहा बनावत, जामत बीजा जुगुत झाँकत हे, समरिद्धी। केजवा राम साहू ”तेजनाथ” बरदुली, कबीरधाम (छ. ग.)
Read Moreगांधीजी के बानी दैनिन्दिन सोंच बिचार
(छत्तीसगढी राजभासा में ) पूर्व कुलपति आचार्य डॉ. हर्षवर्धन तिवारी, रचयिता मुख्य न्यासी, श्री रामसत्य लोकहित ट्रस्ट ज्ञान परिसर, पो. रविशंकर विश्वविद्यालय, रायपुर छत्तीसगढ मो. 9977304050 प्रकाशक श्री राम सत्य लोकहित ट्रस्ट ज्ञान परिसर पो. रविशंकर विश्व विद्यालय रायपुर छ.ग. मो. 9977304050 मुद्रक महावीर प्रेस गीतानगर, चौबे कालोनी, रायपुर मूल्य : मात्र 240 रुपये समर्पण मोर पिताजी महात्मा गांधी के बिचार औ जिंदगानी से बहुत लगाव रहिस। ओकर जीवन के आदर्श ल ओहा पालन करत रहिस, जीवन भर, औ ओकर जीवन दर्शन के अनुकरन करिन। सोंच बिचार, रहे, सहे मा…
Read Moreछत्तीसगढ़ के पहली तिहार हे हरेली
छत्तीसगढ़ अउ छत्तीसगढ़िया मन के पहली तिहार हे हरेली जेला पूरा छत्तीसगढ़ म बढ़ धूम-धाम ले मनाथे, हमर छत्तीसगढ़ ह परम्परा अउ संस्करीति के राज आये इँहा थोड़- थोड़ दुरिहा म नवा-नवा संस्करीति अउ परंपरा देखे ल मिल जाथे, जेखर सबले बड़े कारन हे कि हमर छत्तीसगढ़ म तरह- तरह के जाति वाला मनखे मन रहिथे, अउ ये मन अपन सियान मन के दे परंपरा ल आजो देवता धामी असन पूजनीय मानथे, अउ कतको परकार के तिहार ल कतको बछर ले पीढ़ी दर पीढ़ी मनात आत हे येही म परमुख…
Read Moreमानक बिना मान नही
हमर राज के गुरतुर छत्तीसगढ़ी बोली अब भाषा बन गेहे, अब तो छत्तीसगढ़ी के मान सम्मान आगास मा पहुंच जाना चाही, फेर अइसन का होवत हे कि हमर अंतस मा हमाय छत्तीसगढ़ी, सम्मान के अगोरा मा दिनोदिन दुबरावत हे? जम्मों झन ये बात ला नकार नइ सके कि कोनो राज, संस्कृति, परंपरा, भाषा अउ गियान-बिग्यान ला साहित्य हा सहेज के राखथे, साहित्य के बिना ये दुनिया अंधियारी खोली बरोबर हो जही, अउ यहू गोठ ला माने ला परही कि ये दुनिया अउ समाज ला साहित्यिकार मन ही अपन ढंग ले…
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