योग रखय निरोग बरसात मा

असाढ़ के दिन आ गए। पानी गिरेबर धरलीस। अब मउसम हा ऊँच नीच होही। कभू अड़बड़ पानी गिरही, झड़ी करही, तब ठंडा लागही अउ दू दिन घाम करही ता मनखे उसना जही। हमर तन ला भगवान हे तौन अइसे विचित्र बनाके भेजे रहीस कि ठंडा में गर्म रहाय अउ गर्मी में ठंडा रहे। फेर हमन अपन तन ला आनी बानी के जिनिस,बेरा कुबेरा खवई पीयई, सुुतई बइठइ मा बेकार कर डरेन। अब ना ठंडा ला सही सकन ना गरमी ला। अउ तुरते बीमार हो जाथन। बरसात के आय ले भूइँया…

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असाढ़ ले आसरा हे….

सूरुज नरायन ला जेठ मा जेवानी चढ़थे। जेठ मा जेवानी ला पाके जँउहर तपथे सूरुज नरायन हा। ताते-तात उछरथे, कोनो ला नइ घेपय ठाढ़े तपथे। रुख-राई के जम्मों पाना-डारा हा लेसा जाथे, चिरई-चिरगुन का मनखे के चेत हरा जाथे। धरती के जम्मों जीव-परानी मन अगास डाहर ला देखत रथें टुकुर-टुकुर अउ सूरज हा मनगरजी मा मनेमन हाँसत रथे मुचुर-मुचुर। सूरुज के आगी ले तन-मन मा भारी परे रथे फोरा,आस लगाय सब करत हें असाढ़ के अगोरा। गरमी के थपरा परे ले सबो के तन मा अमा जाथे अलाली अउ असाढ़…

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किसना के लीला : फणीश्वर नाथ रेणु के कहानी नित्य लीला के एकांकी रूपांतरण

जान चिन्हार: सूत्रधार, किसना- योगमाया, जसोदा, नंदराजा, मनसुखा, मनसुखा की दाई राधा, ललिता, जेठा, अनुराधा, सलोना बछवा दिरिस्य: 1 जसोदा के तीर मा राधा, ललिता, जेठा, अनुराधा ठाढ़े हवय, किसना आथे। जसोदा: एकर जवाब दे, ले एमन का कहत हवय? लाज नी आय रे किसना? छिः छिः समझा समझा के मैंहर हार गयेंव। किसना:- गायमला अउ बछवामला साखी देत कइथे- धौली ओ मोर बात सही हावय ना। धौली कोठा ले हुंकारी देथे हूँक-हूँ। सलोना बछवा घलो इच कहथ हवय, सलोना बछवा: हूँक- हू। किसना: सुनत हस दाई, सफ्फा सफ्फा लबारी…

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पं. खेमेस्वर पुरी गोस्वामी के दस ठन कविता

1. चुनाव के बेरा अऊ नेता जइसे–जइसे चुनाव लकठियावत हे फिजा के आलम बदलत जावत हे मिडिया वाले घलो कवरेज देखावत हे ऐखर मतलब मोरो समझ में आवत हे कल तक जो नेता पुछत नई रिहिस साथ म प्रचार करवाये बय वो आज गरीब किसान ल घलो अपन माई- बाप बतावत हे जइसे–जइसे चुनाव लकठियावत हे फिजा के आलम बदलत जावत हे। कल तक जेन नेता दबंगई ले बात-बात म उछालय लोगन के इज्जत बाजार म वो आज अपन इज्जत बचाय के सेति आँसू के गंगा बोहावत हे। अऊ ते…

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छत्‍तीसगढ़ी व्‍यंग्‍य कविता

1 मोर तीर मोर स्कूल के लइका मन पूछिस गुरुजी पहले के बाबा अउ अब के बाबा म काय काय अंतर हे। मय कहेव बेटा “पहिली के बाबा मन सत्याचारी होवय, निराहारी रहय ब्रह्मचारी और चमत्कारी होवय। और अब के बाबा मन मिथ्याचारी, मेवाहारी, शिष्याधारी आश्रमधारी होथे पहिली कबीरदास, रैदास तुलसीदास होवय अब रामपाल आशा राम, रामरहीम असन बलात्कारी होथे। । 2 मंत्री जी ह पेड़ लगाइस बिहनिया बोकरा वोला खा लिस मंझनिया रात म बकरा ह बन गे मंत्री जी भोजन अइसना करिस मंत्री जी ह परियावरण सरंच्छन 3…

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नशा : कविता

नशा – नाश के जड़ होथे एला तेहा जान। पइसा – इज्जत दूनो होथे जगा – जगा अपमान।। जेहा पीथे रोज दारू दरूहा ओहा कहाथे। लोग लइका के चेत नइ करे अब्बड़ गारी खाथे।। थारी, लोटा, गहना, सुता सबो बेचा जाथे। भूखन मरथे सबो परानी तब होश में आथे।। छोड़ दे अब तो दारू – गांजा जीवन अपन सुधार। भक्ति भाव में मन लगाले कर जीवन उद्धार।। महेन्द्र देवांगन माटी पंडरिया (कवर्धा ) छत्तीसगढ़ 8602407353 mahendradewanganmati@gmail.com

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दाई के आँखी मा आंसू

बिसाहिन अबड़ेच कमेलिन तो रहय। गवन आइस अउ बिहान दिन ले खेत जाय के सुरु करे रहिस। उमर 65 बच्छर होगे फेर कमइ ल नी छोड़े हवय। चार बेटा के महतारी नाती नतनीन वाली होगे हवय, फेर कमइ मा बहूमन नी सकय। अपन हाथ मा सियानी करत 48 बच्छर बिता डरिस। अपन रहे के पुरतिन घर कुरिया, बोय खाय के पुरतिन खेत पहिलीच बना डरे रहिस। बेटामन के बिहाव करे पाछू सब ल हिल्ले हिल्ले लगा दिस। सबोमन अपन लोग लइका ल धर के आन सहर मा जियत खात हे।…

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आल्हा छंद : झाँसी के रानी

बरस अठारा में रानी ने, भरिस हुंकार सीना तान। भागय बैरी ऐती तेती, नई बाचय ग ककरो प्राण। गदर मचादिस संतावन में, भाला बरछी तीर कमान। झाँसी नई देवव बोलीस, कसदिच गोरा उपर लगाम। राव पेशवा तात्या टोपे, सकलाईस जब एके कोत। छोड़ ग्वालियर भगै फिरंगी, ओरे ओर अऊ एके छोर। चना मुर्रा कस काटय भोगिस, चक रहय तलवार के धार। कोनों नई पावत रिहिस हे, झाँसी के रानी के पार। चलय बरोड़ा घोड़ा संगे, त धुर्रा पानी ललियाय। थरथर कांपय आँधी देखत, कपसे बैरी घात चिल्लाय। मारे तोला अब…

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अपने घर म बिरान हिंदी महिना

हमर देस म आजकल हिंदू अउ हिंदू संस्कृति के अब्बड़ चिंता करे जावत हे। साहित्यकार अउ संस्कृति करमी मन नंदावत रीत-रिवाज अउ परंपरा के संसो म दुबरात जावत हे। फेर एक ठन बिसय अइसे हे जेकर डाहन काखरो धियान नइ गे हे तइसे लगथे। वो बिसय हे हिंदी महिना अउ तिथी। हिंदी महिना के ज्ञान प्रायमरी कक्छा म देय के औपचारिकता के बाद कोनो मनखे ल हिन्दी महिना अउ तिथी के चिंता करे के सुध नइ राहय। आज कोनो भी अच्छा पढ़े-लिखे आदमी ल हिंदी महिना अउ तिथी बताय ल…

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खेती मोर जिंनगी

नांगर धर के चले नंगरिहा, बइला गावय गाना। ढोढिया,पीटपिटी नाचय कुदय, मेचका छेड़य ताना। रहि-रहि के मारे हे गरमी ह, तन-मन मोरो जुड़ा जाही। अब तो अइसे बरस रे बादर, भूइयां के पियास बुझा जाही। । धान बोवागे बीजहा छीतागे, कतका करिहंव तोर अगोरा ल। उन्ना होगे आ के भर दे, मोर धान के कटोरा ल। गांव गली हो जाही उज्जर, धरती घलो हरिया जाही। अब तो अइसे बरस रे बादर, भूइयां के पियास बुझा जाही। । तहुं तो थोरकुन तरस खा, पथरागे मोर जांगर ह। अब तो आ के…

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