धरम बर तुकबंदी

आड़ लेके धरम के, सत्ता सुख के छांव अस्त्र धरे कोनो हाथ म, कोनो घुंघरू बांधे पांव छुरी छुपी हे हाथ मं, मुख म बसे हे राम कंहूं हजरत के नाम ले, करथें कत्लेआम भोला बचपन विश्व म, भाला धरे हे हाथ भरे जवानी आज इंखर, छोड़त हवय रे साथ कराहत हे इंसानियत, चिल्लावत चारो डहर धरम हमार मौन हे, सत्ता के नईहे ठउर कोई कहे अल्लाह बड़े, कोई कहे श्रीराम कोई कहे ईसा सही, कोई कहे सतनाम कहूं धरम के नाम म, चलत हवे बंदूक कहूं धरम के नाम…

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छत्तिसगढि़हा कबि कलाकार

पानी हॅ जिनगी के साक्षात स्वरूप ये। जीवन जगत बर अमृत ये। पानी हँ सुग्घर धार के रूप धरे बरोबर जघा म चुपचाप बहत चले जाथे। जिहाँ उतार-चढ़ाव, उबड़-खाबड़ होथे पानी कलबलाय लगथे। कलकलाय लगथे। माने पानी अपन दुःख पीरा, अनभो अनुमान अउ उछाह उमंग ल कलकल-कलकल के ध्वनि ले व्यक्त करथे। पानी के ये कलकल- कलकल ध्वनि हँ ओकर अविचल जीवटता, सात्विक अविरलता अऊ अनवरत प्रवाहमयता के उत्कट आकांक्षा ल प्रदर्सित करथे। ओइसने मनखे तको अपन सुख-दुख ल, अंतस के हाव भाव ल गा-गुनगुना के व्यक्त करथे। वोहँ अपन…

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अब्बड़ सुग्घर मोर गांव

जिहाँ पड़की परेवना, सुवा अउ मैना, बढ़ नीक लगे, छत्तीसगढ़ी बोली बैना, कोयली ह तान छेड़े अमरइया के छांव, अब्बड़ सुग्घर हमर गंवई गांव जिहाँ नांगर, बईला संग नंगरिहा, गवाय करमा ददरिया, आमा अमली के छईहा, चटनी संग बासी सुहाथे बढ़िया, पैरी के रुनझुन संवरेगी के पांव, अब्बड़ सुग्घर हमर गंवई गांव डोकरी दाई के कहानी, नरवा नदिया के पानी, अब्बड़ सुग्घर इहां के जिनगानी, ठउर ठउर मिलही मितान के मितानी, कतेक ल मैंहा बतांव, अब्बड़ सुग्घर हमर गंवई गांव। – धर्मेन्द्र डहरवाल “मितान” सोहागपुर जिला बेमेतरा

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परकीति के पयलगी पखार लन

आवव, परकीति के पयलगी पखार लन। धरती ला चुकचुक ले सिंगार दन। परकीति के पयलगी पखार लन।। धरती ला चुकचुक ले सिंगार दन।। रुख-राई फूल-फल देथे, सुख-सांति सकल सहेजे। सरी संसार सवारथ के, परमारथ असल देथे। । धरती के दुलरवा ला दुलार लन। जीयत जागत जतन जोहार लन।। परकीति के पयलगी पखार लन।। 1 रुख-राई संग संगवारी, जग बर बङ उपकारी। अन-जल के भंडार भरै, बसंदर के बने अटारी। । मत कभु टँगिया, आरी, कटार बन। घर कुरिया ल कखरो उजार झन।। धरती ल चुकचुक ले सिंगार दन।। 2 रुख-राई…

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