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कविता

छत्तीसगढ़िया जागव जी

छत्तीसगढ़िया बघवा मन काबर सियान होगेव,
नवा नवा गीदड़ मन ल देखव जवान होगे।
भुकर भुकर के खात किंजरत,
बाहिरी हरहा मन आके ईहाँ पहलवान होगे।

सेठ साहूकार मन फुन्नागे,
अजगर कस ठेकेदार मोटागे।
अंगरा आगी में किसान भुन्जात,
दाई ल नोनी के पोसई जीव के काल होगे।

मुरहा के अब दिन बिसरगे,
करमछड़हा उछरत जात हे।
मिहनत करैईया अंगाकर कस सेकाय,
कोलिहा गद्दी में बईठ चिल्लात हे।

छत्तीसगढ़िया अब तो जागव जी,
अपनेच हित ल साधव जी।
टांग खिचैईया बईरी ल,
धरव,मुड़भसरा गिरावव जी।

विजेंद्र वर्मा अनजान
नगरगाँव(धरसीवां)
मो. 9424106787



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