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कहानी व्यंग्य

चुनावी कथा : कंठ म जहर

समुनदर मनथन म, चऊदह परकार के रतन निकलीस। सबले पहिली, कालकूट जहर निकलीस। ओकर ताप ले, जम्मो थर्राये लगीन। भगवान सिव, अपन कंठ म, ये जहर ला धारन कर लीन। दूसर बेर म, कामधेनु गऊ बाहिर अइस, तेला देवता के रिसी मन लेगीन। तीसर म, उच्चैश्रवा घोड़ा ल, राकछस राज बलि धरके निकलगे। चउथा रतन के रूप म निकले, एरावत हाथी, इंद्र ला दे दीन। पांचवा रतन, कौस्तुक मनि निकलीस तेला, भगवान बिसनु अपन हिरदे म राख लीस। छठवा रतन, कल्पबिरिक्छ निकलीस तेला, देवता मन अपन सरग म, लगा दीन। सांतवा रतन, रमभा अपसरा निकलीस, यहू ला देवता मन धर के भाग गे। आंठवा रतन के रूप म, लछमी बाहिर अइस तेला, भगवान बिसनु अपन तीर राख लीस। अपन संग होवत अनियाव ला देखके, राकछस मन घुस्सागे। जे निकलय तेला, देवता मन हाथ मार देवय। राकछस मन ये दारी सोंच डरीन के, ये पइत चाहे जो निकले, उहीच मन धरही। नवमा रतन, वारूनी निकलीस। येकर निकलतेच साठ, राकछस मन छकत ले पी डरीन। दसवा रतन, चनदरमा निकलीस तेला सिवजी ला, जहर के ताप ले बांचे बर दे दीन। गियारहंवा रतन पारिजात बिरिक्छ बाहिर अइस, यहू ला देवता मन सरग म रोप दिस। बारहवा रतन पांचजन्य संख ला, भगवान बिसनु राख लीस। तेरहंवा रतन भगवान धनवनतरी अपन संग, चउदहवां रतन अमरित ला धर के बाहिर अइस। एक कोती धनवनतरी हा सबो तीर रेहे के आसवासन दीस त, दूसर कोती अमरित कलस ला अकेल्ला देवता मन चुहंक दीन।
अमरित ला अकेल्ला देवता मन पी डरीन तेकर सेती, राकछस मन नराज होगे। ओमन भगवान बिसनु करा सिकायत करीन। भगवान किथे – कुछ समे के बाद हमन धरती म, मनखे के रचना करबोन। देवता अऊ राकछस दूनो मनला, मनखे बना के भेजबो, उही समे अपन तिर के, कुछ समान ला, देवता मनले कतको जादा, तुही मन ला देबो। भगवान सिव ला घला कहि देहूं के, अपन तिर माढ़हे समान, तूमन ला बांट दिही। राकछस मन खुस होगे।
समे के साथ, मनखे के सनरचना होगे। भगवान बिसनु हा वादा निभावत, चुन चुन के, मनखे के देहें धरे राकछस मनला, बिगन मेहनत करे, जादा जादा लछमी देवावत गिस। दूसर कोती, सिव जी, बिसनु के आसवासन ला भुलागे अऊ चनदरमा ला बरोबर बांट पारीस। मनखे रूपी राकछस मन, नराज होगे सिवजी बर। सिव भगवान किथे – मोर तीर समुनदर मनथन ले निकले, सिरीफ जहर बांचे हे जेला कनहो राखे नी सकव, तेकर सेती, नी बांटव। मनखे मन किथे – जब तें राख सकत हस भगवान, त हमू मन तोरे अंस आवन, कइसे नी राख सकबो। मानलो जहर हा, दुखदायी होही, त येला जदि, हमन ला बांट देहू त, तुहंरो दुख, थोकिन हरू हो जही। तभे बिसनु जी के फोन आगे, ओहा सिवजी ला अपन बचन के सुरता करावत, अपन तिर के समान ला बांटे के आगरह करथे, तब, भगवान सिव किथे – बिगन सोंचे समझे, समुनदर मनथन ले निकले समान दे बर कहि दे। चनदरमा ला बरोबर बांट डरेंव, अभू मोर तीर सिरीफ जहर हे ….. येमन यहू ला मांगत हे, येला कइसे बांटव ? तिहीं बता भलुक ! भगवान बिसनु कुछ कहि नी सकिस, फोन काट दीस।
बिसनु के बिबसता, सिवजी समझगे। बिसनु भगवान के आसवासन पूरा करे बर, सिव भगवान, अपन कंठ ले जहर के कुछ अंस हेरीस अऊ मनखे मनला देवत किहीस के – येला सिरीफ एके सरत म उही मनखे ला देहूं, जे किरिया खाके कही के, जहर ला सिरीफ अपन कंठ म, धारन करहूं, कभू बाहिर नी निकालहूं। सिवजी हा, येमन ला समझावत किहीस के – तूमन अभू घला मोर बात ला मान जावव अऊ येला अपन कंठ म, धारन करे के जिद ला छोंड़ देवव, येहा बड़ नकसान दायक आय, जे मनखे ये जहर ला भीतर घुटकही, ते खुद नकसान म रही अऊ जदि कंठ ले बाहिर निकालही ते ….. सरी दुनिया ला नकसान पहुंचाही …..। जहर ला कंठ ले बाहिर नी निकाले के, खमाखम बिसवास देवत, मनखेमन किहीन के, जहर कन्हो जादा पदोही, त, येला भितरी म घुटक के, अपन इहलीला ला खतम कर देबो भगवान, फेर, जनम बाहिर नी निकालन। भगवान सिव किथे – तुंहर जइसे इकछा, फेर एक बात ये हे के, जे मनखे अपन मुहुं ले जहर उगलही तेला, इहां के मनखे मन जान डरहीं के, इही मन राकछस आय।
कुछ दिन बाद, राकछस परजाति के मनखे मनला, बिख के गरमी हा पदोये बर धरिस। सधारन मनखे मन झिन जानय के, हमन राकछस आवन कहिके, बिख ला अबड़ लुकाये के कोसिस करिन, फेर नी सकिन। बिख के परभाव म इही मन जरे बर धरिन तब बिख ला उगले के सिवा अऊ कन्हो चारा नी दिखीस तब, अपन परान बचाये बर, जे तिर पाये ते तिर, जतर कतर, जब पाये तब, जहर उगले के, ठान डरीन। येमन, जऊन खांधी म बइठ जावय, उही मेर, अपन कंठ ले जहर उगलय अऊ दुनिया ला बरबाद करय। जे धरम के खांधी म बइठे तेहा, जन सुधार के नारा देवत जहर निकालय, जे समाज के खांधी म बइठे तेहा, समाज सुधार के नारा देवत, समाज म जहर बगराये अऊ सत्ता के खांधी के सवाद जनइया मन, देस सुधार के नारा देवत, जब जब चुनई के मउका आय तब तब, अपन कंठ ले जहर निकालय अऊ जगा जगा बगरावय, अऊ मनखे ला मनखे संग लड़ाके सत्ता पा जाय। कती मनखे राकछस अऊ कती देवता ………… तेकर भेद खुलगे। मनखे के याहा चरित्तर देख, भगवान सिव बियाकुल होके पछताये लगीस।

हरिशंकर गजानंद देवांगन
छुरा.

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