Categories
गज़ल

गजल

सुरुज नवा उगा के देखन,
अँधियारी भगा के देखन।

रोवत रहिथे कतको इहाँ,
उनला हम हँसा के देखन।

भीतर मा सुलगत हे आगी,
आँसू ले बुझा के देखन।

कब तक रहहि दुरिहा-दुरिहा,
संग ओला लगा के देखन।

दुनिया म कतको दुखिया हे,
दुख ल ग़ज़ल बना के देखन।

बलदाऊ राम साहू

1 reply on “गजल”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *