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कविता

नवा बछर के मुबारक हवै

जम्मो झन हा सोरियावत हवै, नवा बछर हा आवत हवै।
कते दिन, अऊ कदिहा जाबो, इहिच ला गोठियावत हवै।।
जम्मो नौकरिहा मन हा घलो, परवार संग घूमेबर जावत हवै।
दूरिहा-दूरिहा ले सकला के सबो, नवा बछर मनावत हवै।।

इस्कूल के लईका मन हा, पिकनिक जाये बर पिलानिंग बनावत हवै।
उखर संग म मेडम-गुरूजी मन ह, जाये बर घलो मुचमुचावत हवै।।
गुरूजी मन पिकनिक बर लइका ल, सुरकछा के उदिम बतावत हवै।
बने-बने पिकनिक मनावौ मोर संगी, नवा बछर ह आवत हवै।।

नवा बछर के बेरा म भठ्ठी म, दारू के खेप हा आवत हवै।
दारू पियईया भईया मन घलो, पी के नवा बछर मनावत हवै।।
इही दारू के सेतिन घलो त, दुरघटना हा अब्बड़ होवत हवै।
दारू पियई ल अब छोड़ देवौ संगी, नवा बछर ह आवत हवै।।

मास-मछरी के खवईया मन ह, कुकरी बोकरा ला पुजवावत हवै।
निरबोध जिनिस मन के बलि चघाके, अपन ल धन्य कहावत हवै।।
इही मास-मछरी खाय के सेतिन, जम्मो चिरई-चिरगुन ह नंदावत हवै।
साग-भाजी ल अपनावौ संगी हो, नवा बछर ह आवत हवै।।

जम्मो झन ह खुश हे अब्बड़, फेर किसान भाई मन के मुड़ी पिरावत हवै।
कब, का हो जाहि नवा बछर म, उखरेच चिनता सतावत हवै।।
भगवान् ले करथौ इहिच बिनती, जम्मो लईका-सियान ह मुचमुचावत रहै।
“राज” डाहर ले जम्मो झन ल संगी, नवा बछर के मुबारक हवै।।

पुष्पराज साहू
छुरा (गरियाबंद)

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