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कविता

रूख तरी आवव

रूख तरी आवव,
झुलवा झुलव,थोरकुन बइठव, सुसता लेवव,
रूख तरी आवव……

घाम गम घरी आगे रुख तरी छइया पावव, जिनगी के आधार रूख तरी आसरा पावव.
रूख तरी आवव……

चिरिया-चिरगुन,पंछी-परेवा बर रूख सुघ्घर ठीहा हवय,
चलत पुरवइया पवन ले ,जम्मो तन मन ल जुड़ावव.
रूख तरी आवव…….

चारो अंग कटगे जंगल झारी नागिन रददा रेंगत हवय,
बगरगे मकान बहुमंजिला,बड़का कारखाना उठत, धुंगिया ले बचावव.
रूख तरी आवव…….

झन काटव रूख राई ल ,ग्लोबल वार्मिंग होवत हवय,
परियावरन ल जुरमिर, धरती ल नास ले बचावव.
रूख तरी आवव……….

सीख ले मनखे एक ठन काटय रूख,दस ठन पौधा रोपय,
पाना,डारा,फूल ,फर देवइया,रूख के महिमा ल बगरावव.
रूख तरी आवव…..

पहार,रूख-राई ,हमर पुरखा पुरोधा संस्कृति हवय,
देवता धामी औसधि मिले बरदान ले जिनगी सुघ्घर बितावव.
रूख तरी आवव….
झुलवा झुलव ……रूख तरी आवव.

डॉ. जय भारती चंद्राकर
प्राचार्य
सिविल लाइन गरियाबंद, जिला गरियाबंद. छत्तीसगढ़
मोबाइल नंबर 9424234098

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