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चंदैनी गोंदा के 14 गीत

  1. शीर्षक गीत – रविशंकर शुक्ल
  2. घानी मुनी घोर दे – रविशंकर शुक्ल
  3. छन्‍नर छन्‍नर पइरी बाजे – कोदूराम ‘दलित’
  4. मइके के साध – रामरतन सारथी
  5. झिलमिल दिया बुता देबे – श्री प्यारे लाल गुप्त
  6. घमनी हाट – द्वारिका प्रसाद तिवारी ‘विप्र’
  7. गाँव अभी दुरिहा हे – नारायणलाल परमार
  8. बसदेव गीत – भगवती सेन
  9. चल सहर जातेंन – हेमनाथ यदु
  10. तोर धरती तोर माटी – पवन दीवान
  11. माटी होही तोर चोला – चतुर्भुज देवांगन ‘देव’
  12. चलो जाबो रे भाई – रामकैलाश तिवारी
  13. मोला जान दे संगवारी – रामेश्वर वैष्णव
  14. चलो बहिनी जाबो – मुकुंद कौशल

 

1. शीर्षक गोत

देखो फुलगे, चंदइनी गोंदा फूलगे, चंदइनी गोंदा फूलगे।
एखर रंग रूप ह जिव मा, मिसरी साही घुरगे॥
अइसन फूलिस गोंदा चंदइनी,
कुछु कहे नहि जाये,
बघेरा मा फूलिस-
भारत भर मा महमहाये,
आंखी के आघूच आघूच मा, देखो कइसे झुलगे॥
सुन संगवारी सबले आघू
एक फूल टोरत हँव-
सरसुती माई के मंय हां,
गोड़ मां चघाथंव,
जेखर दया ले मोर कंठ हा, सुवा साहीं खुलगे॥
बाँचे फूल मंय तुमला देथंव
बबा, ददा अउ भाई-
नानुक बाबू नोनी दुलउरिन
बहिनी अउ मोर दाई
तुंहर दरस ला पाके, हमर सबके भाग हा खुलगे॥

– रविशंकर शुक्ल

2. घानी मुनों घोर दे

घानी मुनी घोर दे
पानी दमोर दे
हमर भारत देस ल भइया, दही दूध मां बोर दे।
गली गांव घाटी घाटी
महर महर महके माटी
चल रे संगी खेत डहर, नागर बइला जोर दे।
दुगुना तिगुना उपजय धान
बाढ़े खेत अउर खलिहान
देस मां फइले भूख मरी ला, संगी तंय झकझोर दे।
देस मां एको झन संगी
भूखन मरे नहीं पावे
आने देस मां कोनो झन
मांगे खतिर झन जावे
बाढ़े देस के करजा ला, जल्दी जल्दी टोर दे।

– रविशंकर शुक्ल

3. छन्नर-छन्नर पईरी बाजय

छन्नर-छन्नर पैरी बाजय, खन्नर-खन्नर चूरी,
हांसत,कुलकत,मटकत रेंगय, बेलबेलहीन टूरी।
काट-काट के धान मड़ावयं, ओरी-ओरी करपा,
देखब-माँ बड़ निक लागय, सुन्दर चरपा के चरपा।
लकर-धकर बपुरी लैकोरी, समधिन हर घर जावय,
चुकुर-चुकुर नान्हें-बाबू-ला, दुदू पिया के आवय।
दीदी लूवय धान खबा खब, भांटो बांधय भारा,
अउहा, झउहा बोहि-बोहि के, लेजय भौजी ब्यारा।

– कोदूराम “दलित”

4. मोला मइके देखे के साध

मोला मइके देखे के साध लागय-
लुगरा लेदे
धनी मोर बर लुगरा लेदे हो।
आजे कॉली म आवत होही, दाई ददा भेजे भइया हा।
सुघ्‍घर बन के जावंव संग संग, आजे करम मोर जागे॥
रंगे बिरंगा आँछी देख के, मोटहा अउर खटउहां।
गोड़े मुढ़ी ले रूंध वाला, देखे ते ह सहराये॥
लइका लोगन बर धरबो खजानी, अइरसा अउ धरबो लाड़ू।
पावंव पोटारंव चूमा लेके सब के, देहूँ ओला जइसे मांगे।।

– रामरतन सारथी

5. झिलमिल दिया बुता देबे

गोई पूछहीं जब उन हाल मोर, तब घीरे से मुस्का देबे।
अंउ आंखिच आंखी मां उनला, तंय मरना मोर जता देबे॥
अंतको मां मोई ना समझे, अउ खोद खोद के बात पूछे।
तब अंखियन मां मोती भरके, तंय उन्कर भेंट चढ़ा देबे॥
अउ अतको मां गर न समझे, प्रीत के रीतला न बूझे।
तब फुलकंसिया थारी मां धरके, मुरझाये फूल देखा देबे॥
गोई कतको कलकुत उन करहीं, बियाकुल हो हो पांव परहीं।
तब कांपत कांपत हाथ ले तंय हां, झिलमिल दिया बुता देबे॥

– प्यारेलाल गुप्त

6. घमनी हाट

तोला- देखे रेहेंव गा, तोला देखे रेहेंव रे
घमनी के हाट मां बोइर तरी।
लकर धंकर आये जोहीं आंखी ला मंटकाये गा
कइसे जादू करे मोला, सुक्खा मां रिझाये।
चोंगी पीये बइठे बइठे माड़ी ला लमाये गा
घेरी बेरी देखे मोला हांसी मां लोभागे।
बोइर तरी बइठे बहहा चना मुर्रा खाये गा
सुटुर सुटुर रेंगे कइसे, बोले न बताये।

– द्वारिका प्रसाद तिवारी ‘विप्र’

7. गांव अभी दुरिहा हे

जरय चाहे भोंभरा, झन बिलमव छांव मां
जाना हे हमला ते गांव अभी दुरिहा हे।
कतको तुम रेंगव गा
रद्दा ह नई सिराय
कतको आवयं पड़ाव
पांव न जस नइ थिराय
तुम जिंदगी म, मेहतत सन मीत बदव
सुपना देखव गा छांव अभी दुरिहा हे।
धरती हा माता ए
धरती ला सिंगारो
नइये चिटको मुसकिल
हिम्‍मत ला झन हारो
उंच नीच झन करिहव धरती के बेटा तुम
मइनखे ले मइनखे के नांव अभी दुरिहा हे।

– नारायण लाल परमार

8. बसदेव गीत

सुन संगवारी मोर मितान, देस के धारन तंही परान
हावय करनी तोर महान, पेट पोसइया तंही किसान
कालू बेंदरुवा खाय बीरो पान, पुछी उखनगे जरगे कान…
बुढ़वा बइला ल दे दे दान, जै गंगा …।
अपन देस के अजब सुराज
भूखन लांघन कतको आज
मुसुवा खातिर भरे अनाज
कटंगे नाक बेचागे लाज
नीत नियाव मां गिरगे गाज
बइठांगुर बर खीर सोहारी, खरतरिहा नइ पावय मान।
महंगाई बाढ़े हर साल
बैपारी होवत हैं लॉल
अफसर सेठ उडावंय माल
नीछत हें गरीब के खाल
रोज बने जनता कंगाल
का गोंठियावंव सब जानत हव, बहरी बनगें आज मितान।
उठ संगवारी अब तो जाग
हांका पार लगा एक राग
तपनी रोज तपइया मन बर
तंयहर बन जा संउहत नाग
गउकी जोखा तमे माड़ही, घर घर होही नवा बिहान।

– भगवती सेन

9. सहर जातेन

चल सहर जातेन रे भाई
गांव ला छोड़ के सहर जातेन।
ढकर ढकर पसिया पीके, कमई करे जाथन
बइला भंइसा कस कमाथन, गांव मां दुख पाथन
दुख ला हरे जातेन रे भाई।
माड़ी भरके चिखला हावय रद्‌दा किचकिच लगथे
माड़ी ऊपर घोती उघारत अड़बड़ लाज लगथे
चिकन चिक्कन रेंग तेन रे भाई।
टिमटिम टिमटिम दिया करथे, धुंगिया आँखी भरथे
डर लागथे कोलिहा के बोली, हुवां हुवां जब करथे
बिजली बत्ती बारतेंन रे भाई।

– हेमनाथ यदु

10. तोर धरती तोर माटी

तोर धरती तोर माटी रे भइय्या तोर माटी॥
लड़इ झगरा के काहे काम
जे झन बेटा ते ठन काम
हिन्दू भाई ला करंव जय राम
मुस्लिम भाई ला करंव सलाम
धरती बर तो सबो बरोबर, का हांथी का चांटी रे भइय्या॥
कल फूले तरोई के सुंदर फुंदरा
जिनगी बचाये रे टुरहा कुंदरा
हमन अपन घर मां जी संगी
देखव तो कइसे होगेन बसुंदरा
बड़े बिहिनिया ले बेनी गंथा के, धरती हा पारे हे पाटी रे भइय्या॥
खावव जी संगवारी धान के किरिया
चंदन कस चांउर पिसान के किरिया
बने भिखारिन गली मां भटकय
हमर महतारी किसान के तिरिया
चुकुल बनाके छाती मां हमर, बइरी मन खेल थे बांठी रे भइय्या॥

– पवन दीवान

11. माटी होही तोर चोला

माटी होही तोर चोला रे संगी,
माटी होही तोर चोला
माटी ले उपजे माटी मां बाढ़े,
माटी में मिलना हे तोला॥
माटी के घर मां माटी के भुइंय्यां
लाख जतन करे माटी के दुनियां
बड़े बड़े मन के नइ बांचिस
कोन कहे अब तोला के संगी॥
चारेच दिन के सुघ्‍घर मेला
आखिर में सब माटी के ढेला
मत बन कखरो दुसमन बइरी
जाना हे एक दिन तोला रे संगी॥
सुंदर काया ले मोह हटा ले
मन मंदिर मे जोत जगाले
ये तन संग न जाही रे मूरख
जीयत भर के चोला रे संगी॥

– चतुर्भुज देवांगन ‘देव’

12. चलो जाबो रे भाई

सांवा, बदौरी सोमना मागिस
पकड़ निकारो करगा
बइरी संग झन मया बढ़ावव
जिव ले लेही हमर गा।
चलो जाबो रे भाई, जुर मिल के सबो झन करबो निंदाई।
खातू डारेन माटी डारेन
जोते हन पर परिया
हीरा मोती दाना बोयेन
कइसे जामिस करगा कइसे जाम गे कंदाई, चलो जाबो रे भाई।
हांक दून के बोनी भइया
गुदगुद ले हे बियासी
कोपर अउर दंतारी मारेन
माल मरिसे थकासी
हमर घर बुड़थे भाई, चलो जाबो रे भाई।
लाल पेड़ौरा धान दुब्बर
धंवरा पेड़ हे करगा
चेत करके धर निकारो
झन रहे कुछ कसर गा
भले जिव तुंहर छुट जाही, चलो जाबो रे भाई।

– रामकैलाश तिवारी

13. मोला जान दे संगवारी

अब मोला जान दे संगवारी, आधा रात पहागे मोला घर मां देहीं गारी।
गांव भर के सब मइन्से सुत गिन
देख चिराई चिरगुन सुतगिन
पुरवाई ओंधावत हावय–
ठाढ़े रूख राई मन सुतगिन;
नदिया सुतगे, नरवा सुतगे
छानी सुतगे, परवा सुतगे
दिन दिन भरके थके मांदे
कोठा में सब गरुवा सुतगे
सोवथे रात ये उजियारी, अब मोला जान दे संगवारी।
काल फेरेच मंय ये मेर आहूं
हांस हांस तोर सो गोठियाहूं
तंय मोर जिनगानी के संगी
तोला छोड़ कहां मंय जाहूँ;
तोर कहे ले दउड़त आथंव
घर मां अब्बड़ गारी खाथंव
गोड़ पिराथें तभों तोर बर
घेरी पइत तरइया आयंव
मंय राधा तोर तंय बनवारी, अब मोला जात दे संगवारी।
तोर का तंय तो तान के सुतबे
दिन चढ़ जांही तम्भे उठबे
बृता कुछ नहीं करे बर
मोर गली में गावत बुलबे;
मंय घर के सब बुता करथंव
गाय गरू बर पानी भरथंव
रंघाई कुठाई करथंव
बड़े बिहाने जाथंव बारी, अब मोला जान दे संगवारी।

– रामेश्‍वर वैष्‍णव

14. चलो बहिनो जाबो

चलो बहिनी जाबो अमरर्इय्या मां खेले बर घरघुंदिया।
खोर के खेलाई मां ददा खिसियाथे, घर के खेलाई मां दाई
दूसर के घर मां जाबोन ते बहिनी, नंगत ददा हा ठठाही
पटकू के अंचरा मां घर लेबे झूटकुन, दिया चुकिया॥
नानेचकुन चुकिया मां आमा के चटनी, अउ ओही मां थोरचकुन बासी
तरिया के पानी मां दारे चुरोबो, कुंवा के पानी कुंवासी
रांधे बर साग मय राखे हंव घर मां, बरी रखिया॥
आमां के छइहां में पुतरी अउ पुतरा बर, कमचिल के मड़वा गड़ियाबों
माटी के चुकिया धन माटी के दिया मं तेल अउ हरदी मढ़ाबो
नइ लागे बाजा, बजनिया नई लागय मरदनिया॥

– मुकंद कौशल

धान कटोरा रीता होगे

धान कटोरा रीता होगे कहां होही थिरबांह है।
छत्तीसगढ़ के पावन भूइया बनगे चारागाह है।

बाहिर ले गोल्लर मन के आके, ओइल गइन छत्तीसगढ़ मा।
रौंद रौंद के गौंदन कर दिस, भूकरत हे छत्तीसगढ़ मा।
खेत उजरगे जमीन बेचागे खुलिस मिल कारख़ाना हे।
छत्तीसगढ़ के किस्मत मा दर दर ठोकर खाना हे ।
हमर खनिज ला चोरा चोरा के डोहारत हे चोरहा मन।
जंगल ल सब कांट काटके भरे तिजोरी ढोरहा मन।
इंहा के पइसा हा बंट जाथे दिल्ली अउ भोपाल हे।
जुर मिलके सब निछत हावै छतीसगढ़ के खाल हे।
शोसन के चक्की ह निस दिन चालत हे बारो मास हे |
छतीसगढ़ के पावन भुईया बनगे चारागाह हे |

कहां उड़ागे सोन चिरइया, कहां गे धान कटोरा हे
गांव गांव म होत पलायन, परे पेट मा फ़ोरा हे।
छत्तीसगढ़ मा लूट मचे हे, हमर उजरगे कुंदरा हे।
अपने धरती में हम होगेन कइसे आज बसुंधरा हे।
शोसन साहत कनिहा टूगगे फटे पाव बेवाई हे।
पेट चटक पोचवा परगे चेहरा परगे झाई हे।
सरे आम हमरे इज्जत के होवत हवै नीलामी हे।
छत्तीसगढ़ ह भोगत हावै अइसन घोर गुलामी हे।
छत्तीसगढ़ महतारी के अब करे कौन परवाह हे।
छत्तीसगढ़ के पावन भुइंया बनगे चारागाह हे।

सुशील यदु

हमर देस राज म शिक्षक के महत्तम

कोनो भी देस के बिकास ह सिछक के हाथ म होथे काबर के वो ह रास्ट्र के निरमान करता होथे। वो ह देस के भबिस्य कहे जाने वाला लईकरन मन ल अपन हर गियान ल दे के पढ़ईया लईकरन मन ल ये काबिल बनाये के कोसिस करथे के वो ह देस के बिकास के खातिर कोनो भी छेत्र म सहयोगी बन सकय। हर मनखे के जीनगी म गुरू के बिसेस हमत्तम हावय। हमर देस राज म गुरू अउ सिस्य के परंपरा सनातन काल ले चले आवत हे। हर देस म कोनो बिसेस दिन सिछक दिवस के रूप म मनाये जाथे। हमरो भारत देस म आजादी के बाद के पहिली उपरास्ट्रपति अउ, पहिली रास्ट्रपति डॉ.सर्वपल्ली राधाकिसनन जी के जनम दिन याने 05 सितम्बर के हर बछर ओखर याद म सिछक दिवस के रूप म मनाये जाथे। डॉ राधाकिसनन एक महान सिछाबिद अउ दारसनिक रहिन। अउ सिछा से उनला बहुत लगाव रहिस।

‘‘सिछक वो नई जे ह छात्र के दिमाग म तथ्य मन ल जबरन ठूंसय, बलकि वास्तविक सिछक वो होथे जे ह छात्र ल आने वाला कल के चुनौती के लिए तैयार करथे।’’
डॉ. सर्वपल्ली राधाकिसनन

हमर देस ह सनातन काल ले आज तलक सिछा मे छेत्र म बहुत समरिध हावय अगर हमर देस भारत ल बिस्व गुरू कहे जाये त कोनो अचरज के बात नई हावय। सनातन काल ले हमर देस म गुरू के अस्थान ह भगवान ले उपर माने गे हावे। वईसे हर मनखे के पहिली गुरू वोखर मॉ-बाप ह होथे, जे ओला ये संसार म जनमाथे। येखर बाद हर मनखे के जीनगी म दूसर गुरू वो होथे जे ह जीवन म आघू बढ़े बर सिक्छा-दिक्छा देथे।

हमर देस म त्रेताजुग म भगवान बिस्नु ह सिरी राम के रूप म मनखे के अवतार म अवतरे रहिस बिस्वामित्र ल अपन गुरू बनाये रहिन। अउ ओखर आज्ञा के पालन करके अधरमी राछस मन ल मारके रिसी-मुनी, तपस्वी अउ लोगन मन के रछा करिस अउ धरम के अस्थापना करिस। अउ अपन गुरू के महत्ता अउ सनमान बनाये रखिन।

गोस्वामी तुलसीदास जी अपन रचना रामचरितमानस के बालकांड म लिखे हावय-
प्रातकाल उठिके रघुनाथा, मातु-पिता, गुरू नावहिं माथा।
आयसु मागि करहिं पुर काजा, देखि चरित हरषई मन राजा।।
गोस्वामी तुनसीदास रचित रामचरितमानस

  • जब रावन के आखिरी घरी आए रईथे त भगवान राम ह अपन भाई लछमन ल ओखर करा सिछा ले बर भेजथे काबर के राम ह जानत रईथे के रावन अधरमी जरूर हावय पर ओखर पहिली वो ह एक परकांड बिदबान हे।
  • भगवान दत्तसत्रय ह अपन जीनगी म 24 गुरू बनाये रहिस।
  • द्वापरजुग म फेर धरम के रछा अउ अधरम के नास करे बर भगवान बिस्नु ह सिरी किस्न के रूप म मनखे के अवतार म अवतरे रहिस अउ येहू जनम म ओ ह उज्जैन म रिसी संदीपनी के आसरम म रईके बिद्या अध्ययन करिन।
  • अई समय म कौरव अउ पांडव मन घलो गुरू द्रोनाचार्य जी के गुरूकुल म रई के अपन सिछा-दिछा पाईन।
  • चानक्य ह चंद्रगुप्त ल अपन सिस्य बनाके ओला मगध के एक बलसाली अउ बिदबान राजा बनाईस।
  • जैइसे महान गुरू वईसनहे महान चेला गुरू बसिस्ट केे चेला भगवान सिरी राम, गुरू संदीपनी के चेला भगवान सिरी किसन अउ गुरू द्रोनाचार्य के चेला अर्जुन, भीम युधीस्ठिर।
  • जिहां महान सिछक के नाव आथे ऊंहा महान सिस्य के घलो नाव लिये जाथे। जईसे गुरू द्रोनाचार्य के नाव आथे त सबले पहिली एकलब्य के नाव आथे जे ह गुरूदछिना म अपन जेनउनी हाथ के अंगूठा ल काट के गुरू के चरन म गुरूदछिना बर रख दिहीस।

अईसने गुरू भक्त आरूनी रहिस जे ह अपन गुरू के आज्ञा के पालन करे बर रतिहा भर खेत के मेड़ म पानी ल रोके बर पार म सुत गे।
कहे जाथे के

गुरूर्ब्रह्मा गुरूर्विष्णुःगुरूर्देवो महेश्वरः।
गुरूस्साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरूवे नमः।।

पर आज कल इस्कूल अउ कालेज म अउ जिंहा सिछक हावय तिहा सिछक दिवस के दिन बहुत बड़े-बड़े आयोजन करके सिछक मन के सम्मान करे जाथे, ये ह बने बात हे पर येखरो ले बने वो सिछक के सिख के पालन करना वोखर ले बड़े बात हावय। सिछक ल सबले बड़े खुसी तब होथे जब ओखर पढ़ाय लईका ह अपन जीनगी म अपन मंजिल ल पा लेथे। त सिछक के मुड़ी ह गरब ले ऊंचा हो जाथे। सिछक समाज घलो बर एक महत्वपूर्ण अस्थान रखथे। एक सिछक के बिना कोना मनखे कुछू नई ये। एक सिछक ह कोनो ल डाक्टर, कोनो ल कलेक्टर, कोनो ल पुलिस कप्तान, देस के रछा करे बर सैनिक, सिपाही कोनो ल इंजीनियर, कोनो ल राजनेता, कोनो ल बैज्ञानिक अउ एक सिछक अउ न जाने कतका परकार के अधिकारी, करमचारी, ब्यवसायी बनाथे।

हर कोनो के जीनगी म सिछा जरूरी हावय, काबर के सिछा जीनगी के अलग-अलग चरन म कई भूमिका निभाथे। ये कारन ये जरूरी हावय के हमन सिछक के महत्तम ल जानन अउ वोखर बताये रद्दा म चल के अपन मंजिल ल पा सकथन। जे भारत म भगवान राम, किष्न ह मनुष्य अवतार ले के अपन गुरू से सिछा लिहिन अउ ओखर महत्तम ल बनाये रखिन त तो हमन साधारन मनखे हन। तुलसीदास, सूरदास, कबीरदास, रहीम, रसखान, मीराबाई, अइसनहा सिस्य रहिन जे अपन गुरू के नाव ल जुग-जुग तक अमर कर दिन। कबीर दास जी ह गुरू के महिमा ल बरनन करत लिखे हावय-

गुरू गोविंद दोऊ खड, काके लागंू पांय।
बलिहारी गुरू आपने गोविंद दियो बताय।।

आज लोगन मन केवल सिछक दिवस के दिन भासन ल बस दे देथे पर सिछक ल भुला जाथे अउ ओला सम्मान देहे कस नई करय। सिछक ह देस निरमाता घलो हावय अउ बिध्वंस केे छमता घलो रखथे पर सिछक अंतरआत्मा ले बिंध्वंसक नई हो सकय काबर के ओ अपन गरिमा अउ मरयादा ल जानथे। लेकिन आज-कल लोगन मन ल नई जाने का होगे हावय के ऊंखर सोच अउ बिचार ह परकिरीति के बिपरीत हो गे हावय। आज दुनिया म सिछक केवल सिछक ही रह गे हावय। आज के समय म देखिहा त ये दिन बिहनिया ले लेके रतिहा तक सोसल मिडिया म केवल संदेसा भेज के सिछक दिवस मनाये के इतिसिरी कर दिये जाथे। जे ह ठीक बात नो हय। आज कल लईकन मन संचार माध्यम म इंटरनेट के जमाना म वोईमा अपन सिछा के बिसय म खोज करत रईथे पर ये सब एक सिछक के भावना संवेदना अउ बिचार, अनुसासन, मारगदरसन नई कर सकय कहे के मतलब ये हावय के सिछक के अस्थान कोई दूसरा नई ले सकय। हमर जीवन म सिछक के महत्तम अउ सिछक के जीनगी ल समझना आसान नई हावय लेकिन हमन ओला बने मनखे बनके उपहार देके ओखर सम्मान रख सकथन।

प्रदीप कुमार राठौर ‘अटल’
ब्लाक कालोनी जांजगीर
जिला-जांजगीर चांपा (छ.ग.)

गणेश पूजा अउ राष्ट्र भक्ति

भारत के आजादी मा गणेश भगवान

अइसे तो भगवान गणेश के पूजा आदिकाल से होवत आत हे।कोनो भी पूजा, तिहार बार के शुरुआत गणेश के पूजा ले होथय।सनातन अउ हिन्दू रीति रिवाज मा गणेश ला प्रथम पूज्य माने गय हे। गौरी गणेश के पूजा बिन कोनो पूजा ला सफल नइ माने जाय। हमर देश मा सबले जादा गणेश पूजा महाराष्ट्र प्रांत मा होथय। इहा हर घर,हर जाति धरम के मनखे गणेश मा आस्था राख के पूजा पाठ करथे।
गणेश पूजा ला धार्मिक परब ले राष्ट्रीय परब बनाय के श्रेय हमर देश के आजादी बर लड़इया  पुरखा बालगंगाधर तिलक ला जाथे।बच्छर 1893 मा जब आजादी के लड़ाई बर सबो कति ले अंग्रेज मन के बिरोध होय लगिस तब अंग्रेज मन हमर मुखिया मन के बइठका उपर रोक लगा दिन। तब एखर तोड़ निकाले बर बालगंगाधर तिलक जी हा एक उदिम करिन। जौन गणेश पूजा घर घर मा होत रहिन ओला समाज के बीच मा लाके जन सहयोग अउ जन संगठन के परब बनाके नवा दिशा देइन।
गणेश पंडाल मा होवइया देसहा गीत संगीत नाचा पेखन मा जा जा के भारत के आजादी बर लोगन मन कर अपन बिचार ला रखँय अउ लोगन ला जगावँय।आजादी आंदोलन मा जोड़य।अंग्रेज मन एला समझ नइ सकय। न एला रोक सकय न एला होवन दे सकय। एखर  फायदा ये होइस कि आजादी पाय बर कहाँ -कहाँ कइसे-कइसे उदिम चलत हे सब लोगन ला जनाकारी हो जावय। आखिर मा 1947 मा विध्नहर्ता संकटमोचक के किरपा ले देश आजाद होइस।
वो बखत ले शुरू होय परंपरा आज ले पूरा  चलत भारत मा चलत हे।अब जतका उछाह ले महाराष्ट्र में गणेश पूजा होथे ओतका उछाह ले छत्तीसगढ़ अउ सबो प्रांत मा होवत हे।फेर अब जौन उद्देश्य ला धर के ये उदिम चले रहिस वो टूटत हे। देश मा एका होय ला छोड़ गाँव-गाँव, पारा-पारा, हा कुटी कुटी होवत हे। सब कर पइसा , राजनीतिक ताकत, होय के गुमान हे। एक गाँव मा चार पारा मा पाँच जगा गणेश बइठारत हे।चंदा उघात हे, दूसर पंडाल ले अपन ला जादा अच्छा देखाय मा लगे हे। माँहगी-माँहगी नाचा पेखन , सजावट, अउ देखावापन गणेश पूजा के अंग हो गे हावय। करोड़ो रुपया जौन गाँव के विकास मा लगतीस वो दिखावापन के भेंट चढ़त हे। कहा बालगंगाधर तिलक हा एकक मनखे ला जोड़े के उदिम बर गणेश परब सिखाइस।आजादी मिले पाछू ओखर सपना ला उलटा करत हावन। गणेश महराज कब किरपा करहीं अउ पारा- पारा मा बिगरे गाँव सहर के पँडाल तिलक के सपना ला सच करहीं।
हीरालाल गुरुजी “समय”
छुरा, जिला-गरियाबंद
Bharat Ki Aajadi Aur Ganesh

तीजा तिहार

रद्दा जोहत हे बहिनी मन,
हमरो लेवइया आवत होही।
मोटरा मा धरके ठेठरी खुरमी,
तीजा के रोटी लावत होही।।

भाई आही तीजा लेगे बर,
पारा भर मा रोटी बाँटबोन।
सब ला बताबो आरा पारा,
हम तो अब तीजा जाबोन।।

घुम-घुम के पारा परोस में,
करू भात ला खाबोन।
उपास रहिबो पति उमर बर,
सुग्घर आसिस पाबोन।।

फरहार करबो ठेठरी खुरमी,
कतरा पकवान बनाके।।
मया के गोठियाबोन गोठ,
जम्मों बहिनी जुरियाके।

रंग बिरंगी तीजा के लुगरा,
भाई मन कर लेवाबोन।
अइसन सुग्घर ढ़ंग ले संगी,
तीजा तिहार ला मनाबोन।।

गोकुल राम साहू
धुरसा-राजिम(घटारानी)
जिला-गरियाबंद(छत्तीसगढ़)
मों.9009047156

तीजा पोरा

तीजा पोरा के दिन ह आगे , सबो बहिनी सकलावत हे।
भीतरी में खुसर के संगी , ठेठरी खुरमी बनावत हे।।

अब्बड़ दिन म मिले हन कहिके, हास हास के गोठियावत हे।
संगी साथी सबो झन,  अपन अपन किस्सा सुनावत हे।।

भाई बहिनी सबो मिलके , घुमे के प्लान बनावत हे।
पिक्चर देखे ला जाबो कहिके, लईका मन चिल्लावत हे।।

नवा नवा लुगरा ला , सबोझन लेवावत हे ।
हाँस हाँस के सबोझन,  एक दूसर ल देखावत हे।।

प्रिया देवांगन “प्रियू”
पंडरिया  (कबीरधाम)
छत्तीसगढ़

राजागुरु बालकदास : छत्तीसगढ़ गवाही हे

भिंसरहा के बात आय चिरइ चुरगुन मन चोंहचीव चोंहचीव करे लगे रहिन…अँजोरी ह जउनी हाथ म मोखारी अउ लोटा ल धरे डेरी हाथ म चूँदी ल छुवत खजुवावत पउठे पउठा रेंगत जात हे धसर धसर।जाते जात ठोठक गे खड़ा हो के अंदाजथे त देखथे आघू डहर ले एक हाथ म डोल्ची अउ एक हाँथ म बोहे घघरा ल थाम्हे दू परानी मुहाचाही गोठियावत आवत रहँय…दसे हाथ बाँचे रहिस होही सतवंतिन दीदी के मुँह माथा झक गय,जोहरीन दीदी के का पूछबे मुँह ला मटका मटका के गोठियई राहय कउ घघरा म भरे झिरिया के कंच फरी पानी छलक-छलक के कुँदाय असन डाढ़ी ले चुचवावत रहय रितउती ओरवाती असन।काहत राहय…भारी सुग्घर राजा बरोबर लइका अँवतरे हे सफुरा घर…छकछक ले गोरियानरिया लाम लाम हाथ गोड़ सूपाभर दई भोकण्ड हे लइका ह काहेक सुघर आँखी करिया करिया घुघरालू चूँदी अँइठे अँइठे बाँह नाक ह तो ऊपरे म माढ़े हे…मुँह के फबित ह मन ल मोहत हे।

पुरखा के आशीर्वाद नइते साहेब के भेजे काँही संदेश होही काहत रहिन सियान दाई मन लइका के छाती म परे चिन्हा ला… जोंकनँदिया के कंकरा म देखे रहेन बघवा के पाँव के चिन्हा ल तइसने डिट्टो दिखत हे लइका के छाती म छपे छप्पा ह…।

बने कब्खन देख के आ गेयेस बहिनी जोहरीन..ए दे महूँ ह पानी ल उतारतेसाट जाहूँ अउ आँखी भर देख के आहूँ अपन घासी के दुलरुवा ला…..।
पाँव परत हँव दीदी कहिथे अँजोरी ह सतवंतिन ला…जीयत रहा के आशीर्वाद अउ खबर ल पा के अँजोरी के अंतस ह गदगदा गय..मने मन मा पुरुषपिता ल सुरता करत मुड़ नवा के भज डरिस अउ गोठिया डरिस तोर महिमा अपरंपार हे पुरुषपिता दुखिया घासी के दुख ला हर लेये तैं..बेटा के बिछोह म कल्पत बपुरी सफुरा के गोदी म बेटा दे देये।

पुरुष तोर महिमा अपार…
गुरू हो तोर महिमा अपार…
बबा हो तोर महिमा अपार…गुनगुनावत गुनगुनावत झोरकी डहर उतर गय अँजोरी ह।

1795 के बछर भादो के अँधियारी पाख आठे के दिन आय सुरुज नारायण आधा घड़ी ठहर गे राहय घासी के अँगना म लइका ल देखे बर..लइका ल टकटक ले निहारिस तेजस्वी होय के आशीर्वाद देइस अऊ घासी संग सतनाम जोहार करत चल दिहिस अपन बूता म।तिहार के दिन परे रहय लइका ल देखे बर गाँव के नर-नारी मन के रेम लग गे घासी के अँगना म..पता नइ चलिस बेरा जुड़ाय लगिस फुरहुर फुरहुर पुरवई तन ल छुवे लगिस,हिरदे म पंथी के धुन उठे लगिस पाँव उसले लगिस हाथ के थपोरी ह लय ताल बनाय लगिस अउ खूंटी म ओरमे माँदर पता नइ चलिस कतका बेर गर म ओरम गे..कण्ठ ले पंथी गीत फूटे लग गे तन मन मा जोश के संचार होगे मँदरहा के चारो-मुड़ा गोल घेरा बन गे पंथी पहुँचे लगिस…अबाध अगास डहर गाँव शहर अउ ओ पुरुष के दरबार डहर…।

सन्ना ना नन्ना..ना नन्ना हो ललना
सन्ना ना नन्ना..ना नन्ना हो ललना

ए घासी के अँगना…ए घासी के अँगना
भेंट होगे संत गुरू राजा संग ना……..।

माँदर के ताल उही दिन अगास म ढिंढोरा पीट के बता दे रहिस गुरु घासीदास के ये ललना आघू चलके अपन पिता के पद चिन्हा म चलही जनमानस म शौर्य अउ सभिमान के भाव जगाही देश राज अउ समाज ल रीति नीति अनुशासन के गुरुमंत्र दीही, एकता के सूत्र म पिरोवत दया मया अउ महिनत के पाठ पढ़ाही,सतनाम पंथ(धर्म)के सादा धजा ला दुनिया दुनिया म फहराही।चारो दिशा म मनखे मनखे एक के संदेश गूँजे लगही…गुरु घासीदास बाबा अउ सतनाम के जय जयकार होय लगही तब समय रूपी शासक शूरवीर बालक के लोकप्रियता नेतृत्व क्षमता अउ सियानी करे के गुण ल देखही अउ देख के ढाल तलवार हाथी अउ लिखित म राजा के उपाधी भेंट करही।सच होगे…. राजागुरु बालक दास साहेब सादा के राजपगड़ी पहिरे हाथ म ढाल तलवार धरे हाथी म असवार हो के आजू बाजू अंगरक्षक महाबली सरहा जोधाई अउ लाव लश्कर के साथ निकले हे भंडारपुरी के महल के सींग दरवाजा ले।

ठँउका सुरता देवाये सुखदेव आज के दिन नेव परगे मानो लोकतंत्र के…छत्तीसगढ़ गवाही हे….।

सुखदेव सिंह अहिलेश्वर
गोरखपुर कबीरधाम छत्तीसगढ़

Rajaguru Balakdas

तीजा – पोरा के तिहार

छत्तीसगढिया सब ले बढ़िया । ये कहावत ह सिरतोन मा सोला आना सहीं हे । इंहा के मनखे मन ह बहुत सीधा साधा अउ सरल विचार के हवे। हमेशा एक दूसर के सहयोग करथे अउ मिलजुल के रहिथे । कुछु भी तिहार बार होय इंहा के मनखे मन मिलजुल के एके संग मनाथे ।

छत्तीसगढ़ ह मुख्य रुप ले कृषि प्रधान राज्य हरे । इंहा के मनखे मन खेती किसानी के उपर जादा निर्भर हे । समय – समय मा किसान मन ह अपन खुशी ल जाहिर करे बर बहुत अकन तीज – तिहार मनावत रहिथे ।
खेती किसानी के तिहार ह अकती के दिन ले शुरू हो जाथे । अकती के बाद में हरेली तिहार मनाथे । फेर ओकर बाद पोरा तिहार मनाय जाथे ।

पोरा तिहार  – पोरा पिठोरा ये तिहार ह घलो खेती किसानी से जुड़े तिहार हरे ।येला भादो महीना के अंधियारी पाँख ( कृष्ण पक्ष) के अमावस्या के दिन मनाय जाथे । ये तिहार ल विशेष कर छत्तीसगढ़,  मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र अउ कर्नाटक मा जादा मनाय जाथे ।

पोरा काबर मनाय जाथे –  पोरा तिहार मनाय के पाछु एक कहावत ये भी हावय के भादो माह (अगस्त)  में खेती किसानी के काम ह लगभग पूरा हो जाय रहिथे । धान के पौधा ह बाढ़ जाय रहिथे । धान ह निकल के ओमे दूध भराय के शुरु हो जाथे । या हम येला कहि सकथन के अन्न माता ह गर्भ धारण करथे । इही खुशी मा किसान मन ह पोरा के तिहार ल धूमधाम से मनाथे ।

बइला के पूजा  –  खेती किसानी बर सब ले उपयोगी पशु बइला हरे । बइला के बिना खेती के काम अधुरा हे । ये पाय के किसान मन ह आज के दिन बइला ल बढ़िया तरिया नदियाँ मा  नउहा के साफ सुथरा करथे अउ ओकर पूजा करथे ।
ये दिन बइला ल बहुत सुघ्घर ढंग ले सजाय जाथे । ओकर सींग मा पालिस लगाय जाथे । घेंच मा घाँघरा पहिनाय जाथे अउ किसम – किसम के फूल माला पहिना के सजाय जाथे ।

प्रतियोगिता के आयोजन  –  पोरा तिहार के दिन गाँव अउ शहर सबो जगा किसम – किसम के प्रतियोगिता भी रखे जाथे । कोनों जगा बइला दौड़ के प्रतियोगिता त कोनों जगा बइला सजाय के प्रतियोगिता रखे जाथे । गाँव के मन ह एकर खूब आनंद उठाथे ।

माटी के बइला –  ये दिन घरो घर मा लइका मन बर माटी या कठवा के बइला बजार ले खरीद के लाय जाथे । पहिली येकर घर मा विधि विधान से पूजा करे जाथे । ताहन लइका मन ये बइला ल खूब खेलथे । लइका मन भी एकर प्रतियोगिता रखथे अउ मजा लेथे ।

चुकी पोरा –  टूरा (लड़का)  मन ह माटी के बइला ल खेलथे त  टूरी (लड़की ) मन ह चुकी पोरा खेलथे ।
चुकी पोरा मा खाना बनाय के जम्मो समान ह रहिथे ।
जइसे  – चुल्हा , कराही,कलछुल,तोपना,तावा,चिमटा,जांता अउ सबो प्रकार बरतन रहिथे । येला लड़की मन ह मन लगा के खेलथे ।

बेटी-  बेटा बर पूजा –  पोरा तिहार के दिन सबोझन अपन – अपन घर मा चौसठ योगिनी अउ पशुधन के पूजा करथे । जेमे अपन संतान के लंबा उमर के कामना करे जाथे ।

आनी बानी के पकवान – आज के दिन घर -घर मा आनी- बानी के पकवान बनाये जाथे । छत्तीसगढ़ मा चीला, चौसेला, ठेठरी, खुरमी, गुझिया, बरा, सोंहारी, खीर -पुरी, गुलगुला भजिया अइसे किसम – किसम के पकवान बनाय जाथे अउ मिल बाँट के खाय जाथे ।

तीजा के तिहार –  भादो महीना मा अंजोरी पाँख (शुक्ल पक्ष) के तीसरा दिन तीजा के तिहार मनाय जाथे । छत्तीसगढ़ मा तीजा के तिहार ल माइलोगिन (औरत) मन बहुत ही धूमधाम से मनाथे । ये समय सबो दीदी बहिनी मन मइके मा आय रहिथे अउ अपन पति के लंबा उमर बर उपास रहिथे ।
दूसर दिन किसम – किसम के पकवान फल फूल अउ कतरा खा के फरहार करथे । तीजा के दिन सबो महिला मन नवा – नवा लुगरा पहिनथे अउ खेलकूद भी करथे ।

ये प्रकार से तीजा – पोरा के तिहार ल बहुत ही धूमधाम अउ उत्साह के मनाय जाथे । येकर से गाँव मा एक दूसर से मेलजोल बढथे अउ भाईचारा के भावना प्रगट होथे ।

महेन्द्र देवांगन माटी 
पंडरिया  (कवर्धा)
8602407353
mahendradewanganmati@gmail.com