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छत्‍तीसगढ़ के वेलेंटाईन : झिटकू-मिटकी

लोक कथा म कहूँ प्रेमी-प्रेमिका मन के बरनन नइ होही त वो कथा नीरस माने जाथे। छत्तीसगढ़ के मैदानी इलाका मन म जहां लोरिक-चंदा के कथा प्रचलित हे, वइसनहे बस्तर म झिटकू-मिटकी के प्रेम कथा कई बछर ले ग्रामीण परवेश म रचे-बसे हे। पीढ़ी दर पीढ़ी इंकर कथा बस्तर के वादी म गूंजत रहे हे। बस्तरवासी इनला ल धन के देवी-देवता के रूप म कई बछर ले पूजत आवत हें। इंकर मूर्ति मन ल गांव वाले मन अपन देव गुड़ी म बइठारथें, उन्हें इहां अवइया सैलानी मन झिटकू-मिटकी के प्रतिमा ल संग ले जाथें अऊ ए मन ल बस्तर के अमर प्रेमी के रूप म सम्मान देथें।
कोन रहिन झिटकू-मिटकी
बस्तर म झिटकू-मिटकी के कथा अलग-अलग नांव मन ले चर्चित हे। झिटकू-मिटकी के कहानी ल मनखे खोड़िया राजा अऊ गपादई के कहानी के नाम ले घलोक जानथें। कोनो गांव म झिटकू नाम के एक युवक रहिस। एक दिन मेला म ओखर भेंट मिटकी नाम के युवती ले हो गीस। संयोग ले वो युवती घलोक स्वजातीय रहिस। पहली नजर म ही दुनों एक-दूसरे के प्रति आसक्त हो गें। बात परिवार तक पहुंचीस।
स्वजातीय होए के सेती परिवार वाले मन ल कोनो आपत्ति नइ रहिस, फेर मिटकी के सात भाई एखर बर तियार नइ रहिन। ओ मन नइ चाहत रहिन के उंखर बहननी बिहाव करके उंखर ले दूरिहा चल दे। ओ मन चाहत रहिन के मिटकी बर अइसन युवक के तलाश करे जाय जऊन घरजमाई बनके ऊंखरे संग रहय। मिटकी के भाइ मन के सरत ले झिटकू के परिवार के मन गुसिया गें। झिटकू न परिवार ल छोड़ सकत रहिस, नइ ही अपन प्रेमिका मिटकी ल। ओ हर बीच के रद्दा निकालिस।
झिटकू ह कहिस के वो मिटकी ले बिहाव तो करही, फेर वो ओखर भाइ मन के घर म नइ रहय। वो मिटकी के गांवे म घर बनाके अपन गृहस्थी बसाही। मिटकी के भाइ मन ह सरत मान लीन। ओ मन झिटकू के संग मिटकी के बिहाव करे ल तइयार हो गे। बिहाव के बाद झिटकू मिटकी के गांव म धोरई (मवेशी चराए के काम) करे लगिस अउ जिदंगी हंसी-खुशी बीते लागिस।
…अऊ फेर कहानी म आइस ये मोड़
कुछ साल बाद अकाल परिस। मनखे मन भूख ले मरे लागिन। ए समस्या ले निपटे बर गांव वाले मन के एक बैठक होइस। बैठक म ये बात आघू आइस के पियासे खेत मन बर कहूं गांव म सिंचाई तरिया होही त समस्या खतम हो सकत हे। गांव वाले मन ह श्रमदान करके बड़का तरिया कोड़ लीन। तरिया तो तइयार हो गे, फेर बरसा के पानी भरा गे। बरसा खतम होतेच तरिया सूखा गीस।
गांव वाले मन के फेर बैठक होइस। ये मां गांव के सिरहा-गुनियां (तांत्रिक मन) ह ये ऐलान कर दीन के जब तक तालाब म कोनो मनखे के बलि नइ दे जाही, तरिया म पानी नइ रूकय। बलि के बात सुनके गांव वाले मन पाछू घुंच गें, फेर गांव म कुछ अइसे युवक घलोक रहिन, जेन मिटकी ल पाये के लालच रखत रहिन। अइसन युवक मन ह मिटकी के भाइ मन ल भरमाइन के झिटकू तो दूसर गांव के ये। अउ रहिस बात मिटकी के त, ओकर संग कोनो युवक शादी कर लेही, कहूं तुमन झिटकू के बलि दे देहू त गांव म तुंहार मान बाढ़ जाही। मिटकी के भाई मन स्वार्थी युवक मन के बात म आ गें। एक दिन जब मिटकी के भाई अऊ झिटकू जंगल म मवेशी चरात रहिन, तब योजना बनाके मिटकी के भाइ मन ह झिटकू ल मारे के कोसिस करिन।
झिटकू उहां ले जान बचाके भागिस। एक भाई ह टंगिया ले झिटकू उपर वार करिस। ये टंगिया वोकर गोड़ म परिस। तभो ले वो भागत रहिस, तरिया तीर मिटकी के भाइ मन ह झिटकू ल धर लीन अऊ टंगिया ले ओकर गला ल काटके मूड़ी ल तरिया म फेंक दीन। ए घटना के बाद अच्‍छा बरसा होइस।
ओती, पति के अगोरा करत मिटकी परेशान रहिस। रात म ओ ह सपना देखिस के तरिया पानी ले लबालब भरे हे अऊ बीच तरिया म झिटकू खड़े हे। सपना म ये देख के मिटकी डेरा गीस। वो बिना कुछ सोचे तरिया कोति दउंड़ गे। तरिया पहुंचिस त मिटकी आश्चर्य म पड़ गीस। काबर के सपना म ओ ह जऊन देखे रहिस, वो दृश्य प्रत्यक्ष रूप ले ओखर सामने रहिस।
येती झिटकू ह मिटकी ल ऊंखर भाइ मन के करतूत बता दीस। झिटकू बर अगाध प्रेम करइया मिटकी ह घलोक तालाब म कूद के अपन जान दे दीस। दूसर दिन भिनसरहा जब गांव वाले मन तरिया पहुंचिन, त मिटकी के लास तैरत मिलीस। ए प्रकार से प्रेमी युगल के दुखद अंत हो गीस। टंगिया लगे के बाद दंउड़त रहे के सेती झिटकू खोड़िया देव अऊ तरिया पार बांस के टोकरी छोड़ के मौत ल गले लगाय के सेती मिटकी गपादई के नाम ले चर्चित होइस।
गांव वाले करथे पूजा
बस्तर के आदिवासी समाज झिटकू-मिटकी ल धन के देवी-देवता मानथे। कई ठन मेला-मंडई म झिटकू-मिटकी के पीतल अऊ लकड़ी ले बने प्रतिमा बेचे बर लाए जाथे। गांव वाले मन अपन परिवार के खुसहाली बर ए मन ल देवगुड़ी म अर्पित करथें। येती बस्तर अवइया हजारों सैलानी मन घलोक ए प्रेमी के कठवा अऊ धातु के मूर्ति मन बड़ आस्था के संग अपन संग ले जाथें।

हेमंत कश्यप
जगदलपुर
(जागरण समाचार म छपे लेख के छत्‍तीसगढ़ी अनुवाद – संजीव तिवारी)

पुरुस्कार – जयशंकर प्रसाद

जान-चिन्हार
महाराजा – कोसल के महाराजा
मंतरी – कोसल के मंतरी
मधुलिका – किसान कइना, सिंहमित्र के बेटी
अरुन – मगध के राजकुमार
सेनापति – कोसल के सेनापति
पुरोहित मन, सैनिक मन, जुवती मन, पंखा धुंकोइया, पान धरोइया

दिरिस्य: 1

ठान: बारानसी के जुद्ध।
मगध अउ कोसल के मांझा मा जुद्ध होवत हावय, कोसल हारे बर होवत हावय, तभे सिंहमित्र हर मगध के सैनिक मला मार भगाथे। कोसल के महाराजा खुस हो जाथें।

महाराजा – तैंहर आज मगध के आघू मा कोसल के लाज राख ले सिंहमित्र।
सिंहमित्र – सबो तुंहर किरपा हावय महाराज।

दिरिस्य: 2

ठान: राजमहल के गली।

आदरा नछत्तर, अगास मा करिया करिया बादर घुमड़त हावय। जेमा देवतामन के नगाड़ा के अवाज। पूरब के एकठन सुन्ना कोन्टा मा सोन पुरुस डोंगत हावय। दिखे बर लागिस महाराजा के सवारी। परबत माला के अंॅचरा मा समतल बहरा भुंइया ले सोंधी कहरत हावय। नगर तीर जयकारा होइस। भीड़ मा हाथी के सोंड़ ठाढ़े दिखिस। मजा अउ उछाह के सागर हिलोर मारत आघू बाढ़त हावय। बिहनिया के सोन किरन ले रचाय नानु नानु बूंॅदी के एकठन झोंका सोन मोती साही बरसिस। मंगल सूचना ले मनखेमन मजा के मारे नरियाइन।

दिरिस्य: 3

ठान: मधुलिका के खेत।

रथ, हाथी अउ घोड़ामन के लाइन। देखोइया मन ले खचाखच भरे हावय।

हाथी मा बइठ के महाराजा आइन। हाथी बइठ गिस। महाराजा मिसेनी ले उतरिन। सुहागिन अउ कुमारी मन के दू दल। आमपान ले सोभित मंगल कलस अउ फूल, कुमकुम अउ लाई ले भरे थारी। मीठ गीद गात आघू बढ़िन। महाराजा के मुंहू मा मीठ मुसकान रिहिस। सोन धराय नागर के मूठ धरके महाराजा हर फंदाय सुघ्घर बइलामन ला रेंगे बर किहिन। बाजा बाजे बर लागिस। किसोरी कुमारी मन लाईमन अउ फूलमन के बरसा करिन।

सूत्रधार – कोसल के येहर परसिध तिहार हावय। एकदिन बर महाराजा ला किसान बने बर परथे। इ दिन इन्दर पूजा बड़ घूमधाम ले मनाय जाथे। नगरीमन ओ पहरी भुंइया मा मजा ले मनाथे। हर साल खेती के ये तिहार उछाह ले होथे। दूसर राज के जुवराज मन घलो ऐला देखे बर आथे। मगध के राजकुमार आपन रथ मा चढ़े चढ़े ऐला देखत हावय। इ खेत हर मधुलिका के हावय। जेला इ साल खेती करे बर चुने गिस हावय। एकरे सेती बीज दे के मान मल्लिका ला मिले हावय। वोहर कुमारी हावय अउ सुघ्घर घलो हावय। गेरुवा रंग के बासन ओकर सरीर ले लहरात ओहर सुघ्घर दिखत हावय। वोहर कभू ओला ठीक करय, कभू आपन चूंदी ला।

बीज ला थारी मा धरे कुमारी मधुलिका महाराजा के तीर हावय। बीज बोय बर महाराजा जब हाथ करथे ता मधुलिका ओकर आघू मा थारी कर देथे। किसान कइना के सुघ्घर कपार मा पछीना के कमी नीए, वोमन बिरइन मन मा समा जात हावय। फेर महाराजा ला बीज देबर कोताही नी करत हावय। सबझन महाराजा ला नांगर जोतत देखत हावय, अचरज ले, कुतुहल ले। अउ अरुन देखत हावय किसान कइना मधुलिका ला। अहा!कतका सुघ्घर हावय। कतका सरल मन।

महाराजा हर मधुलिका के खेत ला पुरुस्कार दिस। थारी मा कुछु सोन मुदरा। येहर राजा के नियम रिहिस। मधुलिका हर थारी ला आपन माथा मा लगाइस। फेर ओ सोन के मुदरा मला महाराजा के उपर चढ़ात बीछ दिस। मनखेमन अचरज ले देखे बार लागिन। महाराजा के टेपरा तनगिस।

मधुलिका – देवता! येहर मोर ददा बोबा के भिंया हावय। ऐला बेचे हर अपराध हावय। एकरे बर दाम लेहर मोर सामरथ ले बाहिर हावय।

मंतरी – कड़कत- अबोध! का बकत हावस। राजा के नियम के तिरस्कार। तोर भिंया के चैगुना दाम हावय। फेर कोसल के येहर बनाय नियम हावय। तैंहर आज ले राजा के रच्छन पाय के अधिकार पाय। इ धन ले आपन ला तैंहर सुखी बना।

मधुलिका – राजा के रच्छन पाय के अधिकार जमो मनखे मनला हावय। महाराजा ला भिंया दे मा मोला कोन्हों बिरोध नी रिहिस, आभी घलो नीए। फेर दाम मैंहर नी लेवंव।

महाराजा – कोन हावय ये छोकरी।

मंतरी – देवता! बरानसी जुद्ध के महान बीर सिंहमित्र के एकझन बेटी हावय।

महाराजा – सिंहमित्र के बेटी । जेहर मगध के आघू मा कोसल के लाज राखिस। ओई बीर के मधुलिका बेटी हावय।

मंतरी – हांॅ देवता।

महाराजा – इ तिहार के नियम का हावय, मंतरी।

मंतरी – देवता! नियम हर सधारन हावय। कोन्हों बने भिंया ला इ तिहार बर चुनके ओला नियम अनुसार पुरुस्कार मा ओकर दाम दे जाथे। वो दाम हर ओकर चैगुना रइथे। ओ खेती ला ओइच हर साल भर देखथे। वोला राजा के खेत कइथे।

मनखेमन – महाराजा के जय। महाराजा के जय। महाराजा के जय।

सबो चल देथे। मधुलिका आपन खेत के पार मा बड़खा महुआ पेड़ के तरी कलेचुप बइठे रइथे।

दिरिस्य: 4

ठान: बिसराम भवन

तिहार अब बिसराम लेत हावय। राजकुमार अरुन जागत हावय। ओकर आंॅखी मा नींद नीए। पूरब मा जिसने गुलाली उअत हावय। वोई रंग ओकर आंॅखी मा रिहिस। आघू देखिस ता मुंडेर मा परेविन एक गोड़ मा ठाढ़ होके पांख खोलके टर्रात हावय। अरुन ठाढ़ होइस। मुहटा मा सजाय घोड़ा हावय। वोहर देखते देखत नगर के तीर पहंॅुच गिस। सैनिक मन उंॅघात रिहिस। घोड़ा के गोड़ के अवाज सुनके चमकिन। राजकुंमार तीर साही निकल गिस।

दिरिस्य: 5

ठान: मधुलिका के खेत।

सिंधु देष का घोड़ा बिहनिया के हवा साही खुस होवत हावय। घूमत घूमत अरुन ओइ महुआ पेड़ के तरी आइस। जिहांॅ मधुलिका आपन हाथ मा मुंड़ी धरके सूतत रिहिस। अरुन हर देखिस एक महुआ डार परे हावय। फूल फूले हावय, भंवरा सांत हावय। अरुन आपन घोड़ा ला मुक्का रहे बर किहिस। ओ सुघ्घरता ला देखे बर, फेर कोयली कूकिस। जेला सुनके मधुलिका के आंॅखि खोलिस। ओहर देखिस, एकझन अनचिन्हार छोकरा। वोला लाज लागिस।

अरुन – देवी! तैंहर काल के तिहार के संचालन करोइया रेहे।

मधुलिका – तिहार! हाहो! तिहारेच रिहिस।

अरुन – काल ओ सम्मान।

मधुलिका – काबर तोला काल के सपना सतात हावय। आप मोला तैंहर इ अवस्था मा संतोख नी रहन दस।

अरुन – मोर हिरदे तोर ओ छवि के भगत बन गे हावय देवी।

मधुलिका – मोर ओ नाचा के, फेर मोर दुख के। आह! मनखे कतका निरदय हावय। अनचिन्हार, छमा करबे, जा अपन डहर।

अरुन – सरलता के देवी। मैंहर मगध के राजकुमार। तोला पाना चाहत हवौं, मोर हिरदे के भाव बंधना मा रेहे नी जाने। ओला आपन—।

मधुलिका – राजकुमार ! मैंहर किसान कइना हवौं। आप नंदनबिहारी अउ मैंहर कमोइया। आज मोर मया के भ्ंिाया मा ले मोर अधिकार छीन ले हावय। मैंहर दुख ले बियाकुल हवौं, मोर हंसी झन करा।

अरुन – मैंहर कोसल महाराजा ले तोर भिंया देवा दिंहा।

मधुलिका – नीही! येहर कोसल राज के नियम हावय। मैंहर ओला बदलना नी चाहत हवौं, चाहे ओमे मोला कतको पीरा होवय।

अरुन – ता तोर रहस का हावय?

मधुलिका – ये रहस मनखे हिरदे के हावय। मोर नी हावय। राजकुमार नियम ले यदि मनखे के हिरदे बंधाय रथिस ता आज मगध के राजकुमार के हिरदे कोन्हों राजकुमारी कोति नी तीराके एक किसान छोकरी ला अपमान करे नी आथिस।

चोंट खाके राजकुमार लहुंॅट गिस। किरन ले ओकर रतन मुकुट चमकिस। घोड़ा दउंॅड़त हावय। मधुलिका इसने कहके खुद आहत होइस। वोहर सजल आंॅखि ले उड़त धुर्रा ला देखे बर लागिस।

दिरिस्य: 6

ठान: मधुलिका के खेत के पान के झाला।

मधुलिका हर राजा के सोन मुदरा नी लिस। वोहर दूसर के खेत मा काम करथे अउ चैथा पहर रूखा सूखा खाके परे रइथे। महुआ पेड़ तरी नानकन पान के झाला रिहिस। सूख्खा डार के दीवार रिहिस। मधुलिका के ओई आसरम रिहिस। कठोर मेहनत ले जे रूखा सूखा मिलथे, ओकर सांस ला बढ़ाय बर अबड़ रिहिस। पतली होय मा घलो ओकर सरीर मा तपसिया के कांति रिहिस। आसपास के किसान ओकर आदर करे। वोहर बढ़िया छोकरी रिहिस। दिन हप्ता महिना अउ साल बीते बर लागिस।

दिरिस्य: 7

ठान: मधुलिका के खेत के पान के झाला।

ठंढा रतिहा, बादर भरे अगास, जेमा बिजुरी कूदत हावय। मधुलिका के झाला चुहत हावय। ओढ़े बर नीए। वोहर ठिठुर के एकठन कोन्टा मा बइठे हावय। मधुलिका आपन अभाव ला बढ़ा के सोचत हावय। आज ओला राजकुमार के सुरता आत रिहिस। का कहत रिहिस?

पानी गिरत हावय।

अरुन – कोन हावय इहांॅ? पथिक आसरा चाहत हवौं।

मधुलिका हर डार के फइरका खोल दिस। बिजुरी चमकिस। ओहर देखिस एकझिन मनखे घोड़ा के डोर धरे ठाढ़े हावय।

मधुलिका – राजकुमार।

अरुन – मधुलिका।

मधुलिका – अतका दिन बाद फेर।

अरुन – कतका समझाय फेर।

मधुलिका – अउ आज तुंहर का दसा हावय?

अरुन – मैंहर मगध के बिदरोही हवौं, देस ले निकाल दे गे हवौं। कोसल में जीविका खोजे बर आय हवौं।

मधुलिका – मगध के बिदरोही राजकुमार के सुआगत करे, एकझन बिना दई ददा के छोकरी। इ कइसे दुरभाग हावय। ता फेर मैंहर सुआगत करे बर तियार हवौं।

दिरिस्य: 8

ठान: पहरी गुफा के दुआर मा बर पेड़ के तरी।

मधुलिका – तैंहर अतका गरीब हावस ता अतका सैनिक राखे के का जरूरत हावय।

अरुन – मधुलिका, बाहुबल हर बीरमन के आजीविका हावय। येमन मोर जीवन मरन के संगी हावय। भला मैंहर इमनला कइसे छांड़ देवंव। अउ का करथे?

मधुलिका – काबर? हामन मेहनत ले कमाथेन अउ खाथेन ता तैंहर।

अरुन – भुला झन । मैंहर आपन बाहुबल मा भरोसा करथों। नवा राज बना सकत हवौं। निराष काबर हो जाओं।

मधुलिका – नवा राज। ओहो! तोर उछाह हर कम नी होइस। भला बता कइसे। कोन्हों ढंग के बतावा। ता मैंहर घलो कलपना के आनंद ले लों।

अरुन – कलपना के आनंद नीही, मधुलिका। मैंहर तोला रानी साही सिंघासन में बैठांहा। तैंहर आपन छीने खेत के चिंता करके झन डराव।

मधुलिका – मैंहर आज तक तोर इंतजार करत रेंहे राजकुमार।

अरुन – ता मोर भरम रिहिस। तैंहर सिरतोच मोला पिंयार करत हस। तोर चाह होही ता मैंहर परान लगाके तोला इ कोसल सिंघासन मा बैठा दिंहा। मधु अरुन के तलवार के आतंक देखबे।

मधुलिका – का।

अरुन – सच मधुलिका, कोसल राजा तभू ले तोर बर चिंता करत हावय। ये मैंहर जानत हौं, तोर सधारन बिनती ला वोहर नी मानिही। अउ मोला पता हावय, कोसल के सेनापति अबड़ सैनिकमला लेके दस्युमला दमन करे बर बड़ दूरिहा चल दिन हावय। — तैंहर बोलत नीहस।

मधुलिका – जे कइबे ओला करिहांॅ।

दिरिस्य: 9

ठान: राजमहल

सोन के मंच मा कोसल राजा आंखि मूंदे हावय। एकझन छोकरी पंखा धूंॅकत हावय। एकझन छोकरी पान धरे मूरति साही ठाढ़े हावय। कमिया आथे।

कमिया – जय हो देवता। एक झन छोकरी तुंहर मेर मिले बर आय हावय।

महाराजा – छोकरी। आन दे।

कमिया जाथे अउ मधुलिका ला लेके आथे।

मधुलिका – जय हो देवता।

महाराजा – तोला कहूंॅ देखे हवौं।

मधुलिका – तीन बच्छर होगिस देवता। मोर भिंया ला खेती बर ले गे रहिस।

महाराजा – ओह! तैंहर अतका दिन कस्ट मा बिताय। आज ओकर दाम मांॅगे आय हावस। ठीक ठीक, कमिया।

मधुलिका – नीही महाराजा। मोला दाम नी चाहत हों।

महाराजा – मुरुख फेर का चाहत हावस।

मधुलिका – ओतनेच भिंया। दुरुग के रक्सहू नाला के तीर मा जंगली भ्ंिाया। उहांॅ मैंहर आपन खेती करिहांॅ। मोला एकझन संगी मिलगे हावय। वोहर बइरीमन ले मोर सहायता करिही। भिंया ला समतल बनाय बर होही।

महाराजा – किसान कइना। वोहर अबड़ उबड़ खाबड़ भिंया हावय। तेमा वोहर दुरुग के तीर सैनिक महता राखथे।

मधुलिका – का मैंहर फेर निरास लहुंॅट जांव।

महाराजा – सिंहमित्र की बेटी। मैंहर का करौं? तोर ये बिनती?

मधुलिका – देवता! जइसने तुंॅहर आग्या।

महाराजा – जा तैंहर ओमा कमिया लगा। मैंहर अमात्य ला आग्या पत्र देबर आग्या देवत हवौं।

मधुलिका – जय हो देवता।

मधुलिका चल देथे।

दिरिस्य: 10

ठान: दुरुग के रक्सहू नाला के तीर के जंगली भ्ंिाया।

अरुन अउ मधुलिका बइठे हावय।

अरुन – चार पहर अउ बिसराम कर। बिहनिया तोर जुन्ना कलेवर कोसल राज के राजधानी श्रावस्ती मा तोर अभिसेक होही अउ मैंहर मगध के भगोइया कोसल के राजा होंहा।

मधुलिका – भयानक, अरुन तोर साहस देख के मैंहर चकित होवत हवौं, सिरिफ सौ सैनिक ले तैंहर—।

अरुन – रतिहा के तीसर पहर मा मोर बिजय यात्रा होही।

मधुलिका – ता तोला इ बिजय यात्रा मा बिस्वास हावय।

अरुन – अवस्य। तैंहर आपन झाला मा ये रतिहा बिता, बिहनिया तो राजमंदिर तोर लीलाघर होही। अच्छा अंधियार जादा होगिस। आभी तोला दुरिहा जाय बर हावय। अउ मोला परान पन ले इ अभियान ला आधा रतिहा पूरा करना हावय। ता रात भर बर बा बिदा।

मधुलिका उठिस अउ आपन झाला कोति गिस।

दिरिस्य: 11

ठान: कांॅटा ले भरिस डगर

मधुलिका के आत्मा – अरुन अगर सफल नी होइस ता।

मधुलिका – वोहर काबर सफल होही? श्रावस्ती दुरुग एक बिदेसी के अधिकार मा काबर जाही? मगध कोसल के चिर बइरी। ओह ओकर बिजय। कोसल राजा का कहे रिहिस- सिंहमित्र की कइना! सिंहमित्र कोसल रच्छक बीर, ओकर कइना, आज का करे जात रेहे। नीही नीही।

सिंहमित्र की आत्मा – मधुलिका मधुलिका।

सैनिक – कोन हस।

मधुलिका –

सेनापति – तैंहर कोन हावस छोकरी? कोसल के सेनापति ला तुरत बता।

मधुलिका – बांध लेवा मोला। मोर हतिया करा। मैंहर इसने अपराध करे हवौं।

सेनापति – पगली हावय।

मधुलिका – पगली नी हवौं। पगली होथें ता अतका बिचार बेदना काबर होथिस मोला। सेनापति मोला बांध लेवा। राजा के तीर ले चला।

सेनापति – का हावय? सफफा बता?

मधुलिका – श्रावस्ती के दुरुग एक पहर मा दस्युमन ले लिहीं। रक्सहू नाला के तीर ओमन हमला करिही।

सेनापति – तैंहर का कहत हावस।

मधुलिका – मैंहर सच कहत हवौं। तुरत करा।

सेनापति – अस्सी सैनिक तुमन नाला कोति जावा। मंगल तैंहर इला आपन संग बांध ले।

दिरिस्य: 12

ठान: दुरुग के दुआर

जब थोरे घुड़सवार आके रुकिन। ता दुरुग के जोगोइया चैंकिन।

जोगोइया – सेनापति तैंहर।

सेनापति – हांॅ अग्निसेन! दुरुग मा कतका सैनिक होही।

जोगोइया – सेनापति जय हो। दू सौ होही।

सेनापति – ओमन ला बला, फेर बिना बात करे। सौ मनला लेके तैंहर तुरत दुरुग के रक्सहू कोति जाबे। परकास अउ बात करे बर नी होय।

सेनापति हर मधुलिका कोति देखिस, वोला छोर दिन। ओला आपन पाछू आय बर किहिस।

कमिया महाराजा ला सचेत करिस।

सेनापति – जय हो देवता। इ छोकरी के सेती मोला इ बेरा आय बर लागिस हावय।

महाराजा – सिंहमित्र की बेटी। फेर इहांॅ काबर आय हावस। का तोर खेत हर नी बनत हावय? कोन्हों बाधा। सेनापति, मैंहर एला रक्सहू नाला के तीर के भिंया ला दे हवौं, का ओकरे संबंध मा तैंहर कुछू कहना चाहत हावस?

सेनापति – देवता! कोन्हों गुपुत बइरी हर ओई कोति ले आज रतिहाकन दुरुग मा अधिकार कर ले के परबंध करे हावय। अउ इ छोकरी हर मोला रस्दा मा इ संदेस बताय हावय।

महाराजा – मधुलिका येहर सच हावय?

मधुलिका – हां देवता।

महाराजा – सिंहमित्र की बेटी, तैंहर ए घ फेर उपकार करे हावस। ये सूचना देके तैंहर पुरुस्कार के कारज करे हावस। अच्छा तैंहर इहांॅ ठहर। पहिली ओ आतंकवादी मन के परबंध कर लों।

दिरिस्य: 13

ठान: सभा मंड़वा

अरुन ला बंदी बनाय गे हावय।

मनखेमन – एकर बध करा।

महाराजा – परानदंड देवत हवौं। मधुलिका ला बलावा।

मधुलिका पगली साही ठाढ़ हो जाथे।

महाराजा – मधुलिका तोला जे पुरुस्कार लेना हावय मांॅग ले।

मधुलिका –

महाराजा – मोर जतका खेती हावय मैंहर सबला तोला देवत हावौं।

मधुलिका एक घ बंदी अरुन कोति देखिस।

मधुलिका – मोला कुछू नी चाही।

अरुन हांॅसथे

महाराजा – नीही! मैंहर तोला खच्चित दिंहा। मांग ले।

मधुलिका – ता मोला घलो परानदंड मिलय।

अतकी कहके वोहर बंदी अरुन तीर ठाढ़ होगिस।

एकांकी रूपांतरण- सीताराम पटेल सीतेष

जगत गुरू स्वामी विवेकानन्द जी महराज के जीवन्त संदेश, मंत्र औ समझाईस

राजभाषा छत्तीसगढ़ी मा
काव्यात्मक प्रवर्तक- आचार्य हर्षवर्धन तिवारी
पूर्व कुलपति, अध्यक्ष-ए.एफ.आर.सी., म.प्र.

ए सुरता मा के स्वामी जी महराज अपन लईकई के दू साल छत्तीसगढ़ के रायपुर मा बिताईस छत्तीसगढ़ के जंगल के रास्ता ल बैलगाड़ी मा पार करत अपन जीवन के आध्यात्म के सबसे पहली अनुभूति ल पाईस ओकरे सेती ओकर जिन्दगानी के किताब म छत्तीसगढ ल ओकर अध्यात्मिक पैदाईस के जनमभूमि लिखेगे हे। फेर मैं चाईहौं के छत्तीसगढ़ के लइका लोग मन जिंदगानी भर सुरता राखंय ओकर उपदेष उद्गार ल अपन जिंदगानी म अपनाय बर औ सुकता राखे बर के ऐतका बड़ महापुरूष के छत्तीसगढ़ ह अध्यात्मिक पैदाई के जघा ये यई माटी के पैदाइस ये जेमा तुम मन जन्मे। औ ओकर उपदेस ह हमर करतब ये छत्तीसगढ़ महतारी बर ।




पतंजलि के योग दर्शन, बाल्मिकी मूल रामायण, ईशावास्योपनिषद : अनुवाद

छत्तीसगढी कवित्त मं मुनि पतंजलि के योग दर्शन अउ समझईस

बाल्मिकी मूल रामायण

रचयिता
डॉ हर्षवर्धन तिवारी पूर्व कुलपति

प्रकाशक
श्री राम-सत्य लोकहित ट्रस्ट
ज्ञान परिसर पो.आ. रविशंकर विश्वविद्यालय
रायपुर ( छ.ग.), मो. 09977304050




अनुक्रमणिका

भाग-एक छत्तीसगढी कवित्त मं मुनि पतंजलि के योग दर्शन अउ समझईस 7-84
भाग-दो बाल्मिकी मूल रामायण 85-104
भाग-तीन ईशावास्योपनिषद 105-110
त्याग का अध्यात्म ।
जगत गुरू स्वामी विवेकानन्द का आध्यात्मिक खोज तथा मानवता और विश्व धर्म 115–126
परिशिष्ट
श्री राम सत्य लोकहित ट्रस्ट की कार्य शृंखला 1996-2014

पतंजलि के योगसूत्र ह आध्यात्म साधना के मंत्र ये
प्रथम अध्याय
चिंतन

योगसूत्र ह, पंतजलि मुनि बर सोच विचार के अभ्यास करे के विचार ह हमर हिन्दु धरम या के बाद, रचेगे रहिस। भगवान वैदिक दर्शन छठों दर्शन मन म शिव ल शिवसंहिता मा योग के एक दर्शन विचार ये । जैसे भागवत् नींव माने, गे हे। फेर गीता ह अउ घेरण्ड संहिता ह घेरण्ड संहिता मा आसन, मुद्रा, योगिक इतिहास मं मील के पथरा प्राणायाम, ध्यान अउ चेतना ल ये, वैसने योग सूत्र ह, हमर मन लांधे के मार्ग बताय गे हे । फेर ल आध्यात्म चिंतन मं बांधे बर, हठयोग प्रदिपिका ह बहुत बाद सुरता करे बर, सोंचे बिचारे बर में योग के पहली सीढी बनाय मंत्र मा ये। योग के दर्शन के बर आसन प्राणायाम, मुद्राबंध अउ अभ्यास पालन करे बर आजो वो तीनों योग के योग करे बर, ह जब ले पंतजलि मुनि, बनाये पहली शरीर ल साधे बर माने बिचारे रहिन, ओतके आजो सोचे गिस । कहिथे न, ‘शरीर माध्यम बिचारे अठ करे के लाइक हे। खलु धर्म साधनम्” पंतजलि महाराज के पंतजलि मुनि के योग सूत्र योगसूत्र ह दू शबद से बने हे ह योग के जब्बर कठिन समझे संस्कृत के योग अउ सूत्र ले। के साधना अउ बिचार ये। चार योग ह हमर मन अ भाव ल औ अध्याय मं पहली सीढी बताथे के हमर सोचंई ल थामे बर ये। अउ योग कय किसिम के होथे? फेर सूत्र ह सूजी अउ धागा बरोबर दूसर सीढी मं ओला कइसे योग सही माला ल पिरोये रखे साधथें, बताये जाथे । फेर तिसर बर ये । जइसे माला के धागा मं सीढी मं योग के का सिद्धी हे, कण्ठी ल पिरो के राखथें । का शक्ति हे, बताये गे हे। अउ पंतजलि मुनि के योग आखिरी चौथा खण्ड मं हमला दर्शन पुराण के काल ले योग ल योग ह कहां उठा देथे, जड एक चिंतन, अभ्यास, अ जगत से चैतन्य मां फेर चैतन्य आध्यात्म के यात्रा म आगे बढे से चेतनातीत के अनुभूति, मन ले उठा के भावातीत अउ फेर आठ अंग मन हें –
पार्थिव जगत ले उपर उठाके आध्यात्म जगत के अनुभूति के हल पाये बर पतंजलि के योग सूत्र ह मार्ग दर्शक साधक ग्रंथ ये। निर्विकार भावातीत आध्यात्मिक अनुभूति बर ए हा अलगे रस्ता ये । योग सूत्र ह १६४ मंत्र-सूत्र मा हे । एक एक सूत्र ह एक एक सीढी ये । ये ह चार अध्याय मं चार पद मा हे । पहली समाधि पाद ह ५१ सूत्र मा दूसर साधन पाद ह ५९ सूत्र मा तीसर विभूति पाद ह ५४ सूत्र मा चौथा कैवल्य पाद ह ३५४ सूत्र मा हे। पंतजलि योग ल अस्टांग योग भी कथें। याने आठ अंग वाला योग । योग के अभ्यास बर पतंजलि मुनि ह साधन पद मा योगाभ्यास के आठ अंग ल बताय हे, ओमा से एक हे शरीर आसन के बारे मा हे । अष्टांग योग के आठ ठन अंग मन म हे-
1. यम-जेमा सत्य, अहिसा, अस्तेय, ब्रम्हचर्य अपरिग्रह आथे ।
2. नियम–जेमा शुद्धता, संतोष, तप, स्वाध्याय अउ ईश्वर समर्पण आथे ।
3. आसन-योग करेबर, योग के आसन ।
4. प्राणायाम–मा स्वांस, प्रश्वास ल करे के तरीका आय ।
5. प्रत्याहार–मं इंद्रिय संयमित कर के, मन ल संयमित करइ, बताये गे हे ।
6. धारणा-एकाग्रता प्राप्त करइ ये।
7 . ध्यान-मन ल बिचार रहित, निर्विकार करे के, अभ्यास ये।
8. समाधि-चैत्यन्यातीत अवस्था ल पाये के अभ्यास अउ स्थिति ये ।

पूरा ई बुक खाल्‍हे म हे –




गांधीजी के बानी दैनिन्दिन सोंच बिचार

(छत्तीसगढी राजभासा में )

पूर्व कुलपति आचार्य डॉ. हर्षवर्धन तिवारी, रचयिता
मुख्य न्यासी, श्री रामसत्य लोकहित ट्रस्ट
ज्ञान परिसर, पो. रविशंकर विश्वविद्यालय, रायपुर छत्तीसगढ
मो. 9977304050

प्रकाशक
श्री राम सत्य लोकहित ट्रस्ट
ज्ञान परिसर
पो. रविशंकर विश्व विद्यालय
रायपुर छ.ग.
मो. 9977304050

मुद्रक
महावीर प्रेस
गीतानगर, चौबे कालोनी, रायपुर

मूल्य : मात्र 240 रुपये




समर्पण
मोर पिताजी महात्मा गांधी के बिचार औ जिंदगानी से बहुत लगाव रहिस। ओकर जीवन के आदर्श ल ओहा पालन करत रहिस, जीवन भर, औ ओकर जीवन दर्शन के अनुकरन करिन। सोंच बिचार, रहे, सहे मा ओकर पालन करैं। एकरे सेती मैं लइकई ले गांधी जी के जीवन से प्रेरना लेत रहें।

1 जनवरी
भगवान ह सबों जघा व्याप्त विचित्र सक्ति ये जौन ह अवरणनिय हे। वो सबो जघा व्याप्त सक्ति ल मैं भले देखे नई सकंव फेर, मोला आभास होथे । ये महा सक्ति देखे नई जाय जौन सब ला अपन अभास करा देथे, फेर ओकर प्रमान नई खोजे जा सकय, काबर के वो ह सबले उपर हे, जे ला हमन अपन इन्द्री ले जान थन। वो इंद्री गियान ले उपर हे। फेर हम भगवान के होवई ल थोड बहुत जान सकत हन।

2 जनवरी
मोला ऐसे तो लागथे के मोर चारों कोईत सबो बदलत हे, समाप्त होत हे, फेर ओकरो उपर वो जीवन्त सकती हे, जौन सब ल सकेले हे जौन कभू नई बदलत हे, जौन निर्माता ये, सबो के घोलैय्या ये, पुनर निर्माता ये, ऐसना वो सक्ति, ऐसन निर्माता सूक्ष्म तत्व ह ईश्वर ये, भगवान ये । फेर काबर के जौन मैं नई देखे सकंव अपन इंद्रिय जगत ले, जौन होही, औ जौन हो सकत हे, वो भगवान ये।



किसना के लीला : फणीश्वर नाथ रेणु के कहानी नित्य लीला के एकांकी रूपांतरण

जान चिन्हार: सूत्रधार, किसना- योगमाया, जसोदा, नंदराजा, मनसुखा, मनसुखा की दाई
राधा, ललिता, जेठा, अनुराधा, सलोना बछवा

दिरिस्य: 1
जसोदा के तीर मा राधा, ललिता, जेठा, अनुराधा ठाढ़े हवय, किसना आथे।
जसोदा: एकर जवाब दे, ले एमन का कहत हवय? लाज नी आय रे किसना? छिः छिः समझा समझा के मैंहर हार गयेंव।
किसना:- गायमला अउ बछवामला साखी देत कइथे-
धौली ओ मोर बात सही हावय ना।
धौली कोठा ले हुंकारी देथे हूँक-हूँ।
सलोना बछवा घलो इच कहथ हवय,
सलोना बछवा: हूँक- हू।
किसना: सुनत हस दाई, सफ्फा सफ्फा लबारी मारत हवय, बोल दाई पसु बेचारामन काकरो बर काबर लबारी मारहीं। आं।
राधा, ललिता, जेठा, अनुराधा जोर से हॉंसथे, नंदराजा आके कड़कथें।
नंदराजा: काबर एक निरदोस ला रोज रोज दोस लगाथा?
राधा, ललिता, जेठा, अनुराधा हॉंसी ला रोक के भागथें।

दिरिस्य: 2
एक कोति किसना हवय अउ दूसर कोति सलोना हवय। सलोना डंहकथे ता ओकर घंटी टिनिंग टिनिंग बाजथे।
सलोना: उं-यां-यां।
किसना: ओ-ले! आ जा।
किसना आपन हाथ आघू कर दिस, सलोना ओकर हाथ ला एक मुड़ी मारिस।
किसना: काबर भाग आय।
जसोदा दीया जलाय जात हावय, सलोना मया मा अहू ला मुड़ी मा मारिस। घी के दीया छलक गिस।
जसोदा: आः सलोना! कन्हाई!
जसोदा धूप दीया देथे, संख बजाय खानि सलोना ओकर सूर मा सूर मिलाथे।
सलोना: उं-यां-यां।
किसना: ए! संख के मुंहू चिढ़ात हावस तैंहर अउ गारी खाहॉं मैंहर।
जसोदा: संख मा पानी पखारत- थोरकुन हॉंसके- मुंहू नी चिढ़ाय, संख के संग ओ रोज जयध्वनि करथे।
जसोदा दुनों के मुंहू मीठ करथे।
जसोदा: चल जलपान कर ले।
किसन: आपन घुंघरालू चूंदी ला झटकत – दाउ ला घलो आन दे।




दिरिस्य: 3
जसोदा डेहरी मा बइठ के जरीबूटी के झोली ले कुछू निकालथे।
किसना: बाबा के दाढ़ा मा दरद हवय का?
जसोदा: —–।
किसना: सुन ले दाई मैंहर आज ले गोरस नी पीवों। हॉं।
जसोदा: जरी खोंटत- ये तो रोज सुनथों, का बात हवय?
किसना: काबर? बतांहा, ये तोर गुनधर सलोना कभू मुंहू दांत धोथे, कभू भूल ले घलो मुंहू मा माटी नी लगाय।
जसोदा: मुंहू धोय के बहाना कभू माटी खा नी पाय।
किसना: मुंहू हर अतका गंधाथे कोन्हो एकर तीर मा बइठे नी सकय। एकर दाई के थन मा एकर थूक लार सबो लगे रइथे। — उवाक्।
सलोना: उं-यां-यां।
किसना: अमरित घलो काबर रहे, मैंहर एकर दाई के गोरस नी पीवों।
किसना झट के सलोना के मुंहू ला धर लीस।
किसना: एती देख दाई, आज जमुना कछार के माटी ले दांत ला एकर रगड़ दे हावों मैंहर, कतका चमकत हावें। फेर मुंहू हर आभी ले गंधात हावय।
सलोना: उं-यां-यां।
किसना अउ सलोना लड़े बर लागिन।
किसना: आजकाल मोर मेर हमेसा लड़ना चाहत हस, छोटे छोटे सींगमन मा अतका गुमान? वाह रे लड़ोइया।
सलोना दू घ मुंड़ी मा मार के जसोदा के लुगरा मा लुका जाथे।
सलोना: उं-यां-यां।
किसना: हारा हारा!
जसोदा: सलोना रिसागे हवय बेचारा!
बड़ लाड़ ले सलोना ला चुमकार के हॉंसिस।
जसोदा: बड़ आय हावस, एकर मुंहू धोवोइया, गंगा जमुना के माटी ले, ए-हे, गोरस नी पीये
एकर दाई के अउ पूतना रक्छसिन के बेटा मन केसर ले मुंहू धोवत रिहिन ? मुंहू हर गंधात हवय! मुंहू मा मुंहू जोर के सूतथस रतिहा भर ता बन जाथे।
किसना आपन बंसरी के बेधा ला देखे बर लागिस, जसोदा दवा कूट डारे रिहिस, उठे के पहिली किहिस।
जसोदा: देख देख सलोना मोर कान मा का कहत हावय धीरे धीरे सुने तैंहर? कहत हावय मैंहर तो नंदी बाबा हावों, किसना आपन काली कमरी कोपीन कछनी लंगोटी अउ पीताम्बरी आपन तीर राखे। इहॉं कोन्हों ला लाज नी आय जाय।
किसना लजा गिस, जसोदा मोहाके किसना के रूप ला एकटक देखत हावय। पीढ़ा ले उठत किसना किहिस।
किसना: काल ले कोठा मा गेरवां मा बांध दिंहा।
जसोदा: अउ दिन भर इहॉं उहॉं सलोना उं-यां-यां करत रिहि।
किसना: ता का करों? बन मा कभू चैन ले रइथे इहॉं, झाड़ी झुरमुटमन मा दिन भर कोन ढूढ़त फिरय, एती खेदबे ता ओती जाके जमुना मा कूदे बर तियार, जानत हस दाई, जमुना के कछार मा ठाढ़ होके अजरज देखत रइथे, फेर आपन छांय ला देख के भड़कथे, भाग आथे।
जसोदा: ओकर का कसूर? संग दोख–।
बाहिर ले मनसुखा नरिया के कइथे।
मनसुखा: तोर गाय आइस ओ रे किसना।
किसना कूदके बाहिर आइस।
मनसुखा: बलदाउ मौसी के घर गिस आवय।
किसना उदास हो गिस, दाउ घलो आज नीए।
गायमन रंभात आइन, फेर किसन ला सूंघ सूंघ के चुप हो गिन, सलोना के ढेंटू के घंटी बाजत हवय, टिनिंग टिनिंग। राधा, ललिता, जेठा, अनुराधा गुमसुम किसना ला देखके लहंुटगिन।
राधा, ललिता, जेठा, अनुराधा: सांवरिया ला आज डांट परे हावय, छन मा सारा गांव उदास हो गिस।
सूत्रधार: नंद जसोदा के इ लाडला ला बिरज के एकेक झन आपन दे नांव ले बुलाथे, करिया, बिलवा, सांवरिया, मोहन, कन्हैया, गोपाल, केसव, मुरारी, चोर, छिछोर, बटमार, बनमाली, हरि—। हरि के हजार नांव।

दिरिस्य: 4
मनसुखा की दाई लाठी टेकत आथे- ओ बांके! बांकेबिहारी-ई-ई!
किसना: इसारा करत बताथे- आज इहॉं सबो के सिर मा दांत मा दाढ़ा मा आंखि मा कान मा दरद हवय। दरद।
मनसुखा के दाई: दरद नीही गरग! वे बूढ़वा पंडित फेर आय रिहिस आज। मैंहर मंझनिया आय रेंहे ता सबो फुसुर फुसुर गोठियात रिहिन। यों तो कान ले कम सुनथों, फेर पीठ पाछू बांके के नाम ले कोन्हों अउ मैंहर नी सुनिहा भला! वो गरग पंडित कहत रिहिस कतको घलो लाड़ मया करा किसना काकरो नी होय। काकरो नी होय।
किसना: कान के तीर मा- अउ का का कहत रिहिस?
मनसुखा के दाई: अउ ना जाने का का इरिंग विरिंग बतात रिहिस ओ भिथि के ओधा मा। सो घलो इ कान ले का समझों, इकरे सेती कइथों कोन्हों दवा दारू हे, इ कान के हे तोर करा। काबर सबो कइथे बांके बैइद घलो हावय, बने बात, दवा नी सही, तैंहर मोर कान के तीर मा फुसफुसा के कछु कह। या फेर वो गरग पंडित के बात हर ठीक हावय।
किसना ने मनसुखा के दाई के कान के तीर बंसरी राख फूंक दिस- सी-ई-ई-ई!
मनसुखा की दाई: हॉं रे बांके! इ कान ले कुछू कुछू सफ्फा सुनात हवय, कोनहों दिन अहू कान मा घलो।
जसोदा बाहिर आइस ता मनसुखा के दाई हर किसना ला कनखी ले समझाइस- गरग के बात पूछत मोर नांव झन लेबे।
बानी बदल के कइथे- मोर मनसुखा इसने नी रिहिस बांके, तोर संग रहके मोर मनसुखा घलो चैपट हो गिस। कन्हों ला खीख लागे या बने मनसुखा के दाई चापलुसी नी करय। जे अपन दाई ददा के नी होईस वोहर काकरो नी होय।
जसोदा: का बके बर आय हस संझा के बेरा?
मनसुखा के दाई: हॉं हॉं मैंहर बकथों।
नंदराजा: मनसुखा की दाई-ई-ई।
मनसुखा के दाई लाठी टेकत चल देथे।
जसोदा: तैंहर दाउ बर बैठे हस इहॉं अउ दाउ उहॉं मौसी के आंखि मा जाके समा गिस हावय। चल कुछू खा ले मोहना!
किसना: ना ना ना।
सलोना: उं-यां-यां।
जसोदा: कुंवर चल आभी आभी दही बना के राखे हवौं मैंहर।
किसना: गरग पंडित मेर काबर नी भेज दे गघरी भर?
जसोदा: आ बेचारा बाम्हन!
किसनाः सबो बेचारा हावें, एक मैंहर हवौं अवारा, मोर कोन्हो विसवास नीए।
जसोदाः कोन कहत हावय?
सलोना हर किसना ला एक मुड़ी मारथे।




दिरिस्यः 5
रात मा उठके किसना कहत हावय।
किसना: दाई का होइस? रोवत काबर हस? मुंड़ी मा दरद हवय जादा? ला लगर दिंहा।
जसोदा: कलाई ला धर के- ना ना मैंहर रोवत नी ओं। सपना देखत रेंहे, तैंहर सूत जा। आ।
धक धक धक धक किसना आपन दाई के धड़कन ला सफ्फा सुनत हावय, सांसमन के तरी उपर ला देखत हावय, दरद बड़ गहियर बाजत हावय, कोख के पीला बर दाई के मन नी तरसही, नी रोही, ता का सिरतो किसना के आपन कोन्हों नीए।

दिरिस्य: 6
ठान: गोकुल के गली
योगमाया: कोनहों बताहा मोला, नंदमहर के हवेली ला कोन कोती जाहॉं?
राधा: अरी काहॉं के गोरी आय हावस, गुमान ला भरके, अतकी जाबी छोकरी के बोली सुना, कइसने बीख भरे हावय, कोनहो इसने रस्दा घाट पूछत हावय भला। आपन नांव गांव नी बतात हावय।
ललिता: इसने टेड़गी बात काबर करत हस रे, तोर संग कोन्हों मरद नीए?
योगमाया: ना भइया, देखत हवौं, इहॉं के मनखे मन तन के नीही मन के घलो करिया हावें। कइसने हावय गोकुल गांव रे भइया?
जेठा आथे
जेठा: सुनत हावो एकर बोली, का हावय? काबर इहॉं भीड़ करे हावा?
योगमाया: हां-ए! तुमन आपन बहु बेटी मनला इ कइसने सीख दे हावा कि कोन्हों भुलाय भटकके परदेसिन मनला रस्दा घलो नी बताय कोन्हों? नंदराजा के डेहरी कती हावय।
जेठा: अउ तैंहर कोन राजा के बेटी हावस, कि परदेस मा आके टेड़गी मेड़गी गोठियात फिरत हावस, आपन नांव गांव काबर नी बतात हस?
योगमाया: मैंहर मथुरा ले आत हावौं, बसुदेव राजा के बेटी अउ महाराजा कंस के भांची हावों।
राधा, ललिता, जेठा, अनुराधा सबो चिंचयाइन- भांची कंस की-ई-ई।
योगमाया: काबर?
अनुराधा: येहर कंस के भेजे कोन्हों डाकिनी हावय रे! कंस की भांची।
राधा: कोन्हो बलावा यदुराई ला, कूदा मुरारी-ई-ई-ई।
योगमाया: एकेझन काबर जमोझन मिल के बलावा। कहूँ सूतिस होही?
योगमाया गठरी राख के बइठ गिस – देखत हवौं, वो छोकरा ठीक कहत रिहिस।
जेठा: कोन छोकरा? सुन रे ललिता, आप कोन छोकरा के बात कहत हावय?
योगमाया: वो करिया कलूटा, घटवार के बेटा होही।
ललिता: करिया कलूटा? घाट के इ पार या ओ पार?
योगमाया: घाट के ओ पार के मन करिया नी होंय अउ भैंसिन साही कोन्हों जानवर पोसे, डोंगा लेके कूदत आइस मोर तीर। मैंहर काबर ओकर डोंगा मा पांय रखिहा, जमुना पार करे बर डांेगा के का काम? हां हां मैंहर रेंग के नदी पार करके आय हावों, पूछिहा आपन घटवार
के बेटा ले।
राधा: ता ओ लइका ह का किहिस?
योगमाया: का किही भला? कुछू मिनमिना के किहिस, मैंहर सुना दें मैंहर कंस के भांची हावों। रस्दा घाट मा छोकरी मनला छेड़ोइया मन के सूरत देख के जान लेथें मथुरा के छोकरीमन। हॉं-आं।
ललिता: आभी तैंहर बताय ना, ठीक कहत रिहिस ओहर, का किहिस ओहर?
योगमाया: ओ-हो! वोहर तुंहर गांव के छोकरीमन के चाल-चरित्तर के बारे मा कहत रिहिस, गोकुल गांव मा जरा होसियारी ले जाहा, उहॉं दूझन इसने चोट्टी हावें, बात बात मा झगरा करके आंखि के आघू ले माल गायब कर देथे।
जेठा: चोट्टी? नांव बताय रिहिस काकरो?
योगमाया: का नांव भला? हॉं बिरिसभानु के बेटी अउ ओकर सखी दूसर।
जेठा अउ अनुराधा: राधा अउ ललिता।
राधा अउ ललिताः सुनत हन।
जेठा अउ अनुराधा: येहर लबारी मारत हावय, किसना इसने बात कभू नी करे। अच्छा ओहर आपन नांव घलो बताइस?
योगमाया: हॉं! बताइस, किहिस मोर नांव बंसरीवाला हावय, मोला आपन बंसरी बजाके रोकना चाहत रिहिस, जइसने मैंहर ओकर पीं-पीं-रीं-रीं सुने बर गोकुल आय हावों।
योगमाया गठरी बोहके चलत चलत कइथे- कहत रिहिस बेचारा बंसरीवाला के बंसरी ला कतका घ इसने चोराय रिहिन।
सबो चुप हावय, राधा अउ ललिता के आंखि मा आंसू निकलत हावय।
मनसुखा के दाई: अरी ओ छोकरी! तोर गठरी मा का हावय, कोनहो जरी बूटी राखथस कान के? काहां जाबे? नंदमहर के हवेली? चल मैंहर ले चलत हावौं।
दुनों चल देंथे।
जेठा: जाके किसना मेर पूछी काबर इसने छिछोर बात करथे। इ बार जो किही ओ लबरा ला।
सबो आपन आपन बेंटरी अउ गघरी लेके चलिन घाट कोति।




दिरिस्य: 7
जसोदा ला योगमाया दाई कहके पांय परथे, जसोदा ठगाय ठाढ़े हावय।
योगमाया: दाई री! आपन बेटी ला नी चीन्हत हस। आपन कोख के बेटी ला नी चीन्हत हस। मैंहर हवौं योगमाया।
जसोदा: योगमाया ? काहां ले आय हावस?
योगमाया: काबर? मथुरा ले, ओ मैंहर समझ गे दाई, झूठमूठ बात उढ़ियात उढ़ियात इहॉं घलो आ गिस हावय, कोनहों किहिन होही अगास मा उढ़िया गिस, कोनहों किहिन होही कंस हर मार दिस, मैंहर जानत हवौं, मथुरा मा एकझन पंडित हावय गरग, वोहर ऐती आथे का? ओकर परतीत झन करे कभू। मोर हाथ ला देख के का का कह दिस दाई करा। ओ दिन ले दाई मोला।
जसोदा के ढेंटू मा हाथ डालके- दाई तैंइहर मोर दाई हावस, होस ना, बोल ना।
जसोदा – ——।
राधा बाहिर ले नरियात हावय- कंस के भांची आय हावय, होसियार रिहा, कंस हर भेजे हावय।
जसोदा: तोला कंस हर भेजे हावय, बता कोन हस तैंहर राक्छसीन?
योगमाया: ओ दाई! तैंहर दूसर के बात ला सच अउ आपन बेटी के बात ला लबारी समझत हस, कंस के भांचा तुंहर घर मा पलत हवय, ओकर बर अतका दरद, न जाने कोन घरी मा मोर जनम होइस कि जनम ले आज तक सबो दुरदुरात हावें।
योगमाया रोवत हावय, नंदराजा आथे।
नंदराजा: गोपाल के दाई।
योगमाया: चैंकके- बाबा चीन्हत हस मैंहर कोन हवौं, तैंहर झन बताबे दाई।
जसोदा: सरकी बिछात- कहत हवै मैंहर योगमाया हवौं।
योगमाया: योगमाया नीही, बिंधबासिनी घलो, मथुरा के दाई मोला बिंधा कहके बोलाय।
योगमाया नंद के कोरा मा बइठ गिस, नंद हर आप मुंहू ओकर लंग कर दिस।
जसोदा: कइसने कइसने अजगुत बात बोलत हावय, येहर कइथे, जतकी बात फैलिस हावय सब लबारी हावय।
योगमाया नंद के मन ला थाह डारिस, नंद के दाढ़ी ला छुअत छुअत किहिस।
योगमाया: एकठन बात पहिली कह दों, मैंहर मथुरा ले भाग के आय हावों, देवकी बसुदेव के घर मा आप पांय नी रखों आप, बाबा। रोवत- बाबा गरग जोतसी अउ नारद के बात सुन सुन
के मथुरा के दाई मोला रोज कोसथें। मथुरा के बाबा तो आप बेटी कहके घलो नी बलाय, कहत हावय काकर बेटी, बेटी नीही टेटी। काहां ले आ गिस।
नंदराजा: काहां ले आगिस, मोर सो भेंट होही ता पूछिंहा।
जसोदा: आखिर काबर कब ले इसने बिहवार करत हवय ओमन?
योगमाया नंदराजा के ढेटूं के कंठी गने बर लागिस।
नंदराजा: तैंहर काबर इकर लंग आंखि बटेरत हस, का कहत हे जरा सूझे के कोसिस कर ठंडे दिल ले। हॉं कह बेटी, गरग पंडित हर जरूर कुछू किहिस होही?
योगमाया: सिरिफ कुछू, अतकी बात, इ छोकरी के खातिर भीख मांगे बा परही, फूहड़ दाई ददा के बेटी जरूर जग मा हंसाई करवाही। सोन जइसने लइका के बदला मा माटी के पुतरी।
नंदराजा: सुनत हस हामन फूहड़ हन।
योगमाया: आप बात बात मा ठोना देंथे, दही बेचे जाबे ओ छेनावाली, एक दिन किहिस मोर बेटा ले चरवाही करवाथें, तोर ले बगीचा के जोगवारी नी होय, दाई मैंहर भाग आय।
योगमाया जशोदा के ढेंटू मा लपट गिस। जसोदा ओकर पीठ मा हाथ फेरत किहिस।
जसोदा: बने करे बेटी।
योगमाया: दाई मोला वापिस झन भेजबे।
नंदराजा: कभू नीही, आय तो कोन्हों, आप बइठे का करत हस गोपाल के दाई, हाथ धोवाके बेटी ला कलेवा दे। न जाने कब ले भूखी पियासी हावय।
नंदराजा बाहिर गिस, जसोदा योगमाया ला पाके भीतरी गिस।
योगमाया: एकठन बात कहों दाई, किसना ला मथुरा वापिस भेज दे।
जसोदा के करेजा धड़क गिस, हाथ ढिल्ला होगिस, योगमाया गिर गिस।
योगमाया: दाई-ई-ई।
जसोदा: इसने बात फेर झन कइबे बेटी।
जसोदा योगमाया का पांय छुए बर लागिस।
योगमाया: फेंके ला एक घ नीही दस घ फेंका कोरा ले। फेर आपन कुंवर कन्हाई ला एक पल बर घलो मन ले दूरिहा नी करस काबरकी?
जसोदा: सुन बेटी, तैंहर कुंवर ला देखे नी अस, एक घ देख लेबे, ता कुछू कहिबे, ओला
कइसे दूरिहा कर सकत हन, चल उठ, आ जा कोरा मा।
योगमाया: राख आपन कोरा, ये कोरा तोर किसना बर हावय, मैंहर पूछत हवौं कभू किसना ला कभू इसने कोरा ले फेंके हावस।
जसोेदा: —-।
योगमाया: मैंहर काबर देखिहां किसना ला, इहॉं किसना के राज, उहॉं किसना के राजधानी, उहॉं घलो किसना के हजार नांव सुनत रहेंव, इहॉं सबो बिरज किसनमय हावय, वाह रे भाग! रंग पंड़रा नी होइस, नीही ता, आप मोर देंहे के रंग के बात ले लेवा, मैंहर पंड़री हावों, मोर दाई ददा पंड़री पंड़रा हावय, मोर का कसूर? मोर पड़री के सेती मोला उहॉं धंवरी गाय कइथे सबो। रहय इहॉं किसना हर। मैंहर तो फेंके होय हों, मरी होय हों, अगास मा उढ़ियाय हवौं, जेहर उढ़ियात आइस अउ जुरगिस हावय ओकर पांय के पूजा होथे अउ आपन देंहे के संतान ला ठुकराय जाथे।
जसोदा: योगमाया बेटी पहिली कुछू जलपान कर ले।
योगमाया: काकरो जूठा माखन मिसरी मैंहर नी खावों, इहॉं सुनत हवौं, बिना किसना के जुठाए कोनहो कुछू सूंघे नीही। कइसे खीख आदत हावय।
जसोदा: मनेमन सोचथे। सिरतो कुछू घलो तो जूठा नी होय किसना के खातिर, सबो गांव मन काकरो घर के गोरस जूठा हो, इसने आसा नीही।
बाहिर मा गोपीमन नरियात हावय।
योगमाया: मोर चिन्ता झन कर दाई, किसना के घर लहुंटे के बेरा होगिस हावय, ओकर बर कलेवा तियार कर, मैंहर आपन बर खिचड़ी रांध डारिहॉं। उहॉं घलो इच मिलत रिहिस, सिरिफ नांव दूसर रिहिस, खिचड़ी नीही खेचरान्न।
योगमाया डेहरी के तीर ठाढ़ होगिस, गोपीमन अचानक ठाढ़ होगिस।
योगमाया: इस तरह मुंड़ मा उठात काबर आत हावा, का होइस? इ धरती रिहि कि बूड़ही?
राधा: का री, कंस की भांची, काहॉं हावय बंसरीवाला।
योगमाया: अहा-हा! हाय री बंसरीवाला, वाली रे ! दरद देखा तो, दाई ले जादा दरद मौसी ला। पूछत हवौं, कोन ला पूछ के संझा के बेरा पूछ के आय हावा? इहॉं कोन्हों मंडिर नी होय, जिहॉं रोज दीया बाती अउ आरती के पाछू मिठाई बंटही। इस घर के छोकरा के भविस्य ला हंस के पांख साही उज्जर कर दे हावा तुमन। का समझ ले हावा इ घर मा धीया बेटा नीए।
जसोदा कूद के आथे- का होइस?
ललिता: कि किसना कनहों लंग नीए, ना जमुना के तीर, ना कदंब तरी, ना बिरन्दावन मा।
घाट बाट मा कन्हों लंग नीए। सबो खोजत हवें, बलदउ किहिस हवे, नंदबाबा काहां हावें।
राधा: अउ ए कंस के भांची इहॉं काबर आय हावय, जब ले आय हावय, गांव मा कौंआ नरियात हावय।
जसोदा जोर ले रोना कहत रइथे फेर चुप हो जाथे। ——–।
राधा: योगमाया मेर लिपट के- बता रे सखी, तैंहर बंसरीवाला ला काहॉं देखे रेहे।
योगमाया दूरिहा भाग जाथे।
योगमाया: ए-हे! एला मिरगी उरगी तो नी आय, इसने थरथर काबर कांपत हावय।
नंदराजा आथें।
सबोझन: बाबा! किसना नी मिलत हवय। दाउ केंहे हें बाबा ला जलदी भेजा।
नंदराजा चल देंथे।
योगमाया: बाबा।
जसोदा: पाछू ले झन बला।
योगमाया: अतकी अधीर होय के का बात हावय, आभी संझा परे हावय, सुनत हवौं, लुकौवल ओहर रोज खेलत हवे। ये घलो हो सकत हवे, इहॉं आके सबले जादा रोवत हे ओकरे घर मा लुकाय होही। इ छोकरी मनला लुकौवल खेले के कइसने खीख आदत हवे।
मनसुखा आपन संगी के संग मा निकलथे – चला चला।
राधा घलो आपन गिंया मन के संग मा निकलथे – चला चला खोजी खोजी।
सबो डंडा मसाल लेके खोजत हवें। योगमाया खिचड़ी बनात हावय, जसोदा जाय बर होथे, ता योगमाया टोंकथे।
योगमाया: तैंहर काहॉं जात हावस इ अंधियारी मा एकेझिन, बस खिचड़ी चूरे मा जतका देरी लागही, खा पी के चल दिंहा दाई री। एकर ले तो देवकी दाई बढ़िया, कभू भूख भूख कहके रोय नीओं मैंहर। मैंहर भूख ला नी सहे सकों।
बाहिर किसना को हजार नांव ले सबो नरियात हावें, योगमाया खिचड़ी उतार के परोसे बर बइठिस।
योगमाया: कोन्हों बरतन भाड़ा घलो नीए, मैंहर पूछत हवौं इ घर मा बरतन भाड़ा मन घलो किसना ला खोजे बर चलदिन हे का। खा पी के चल दिंहा दाई ओ।
जसोदा पथरा के मूरती साही ठाढ़े हावय, योगमाया कराही ला पटकथे, ता होस आथे।
योगमाया: कराही मा खांव का?
जसोदा: आघू मा पथरोटा हवय बेटी।
योगमाया: ओमा कुंवर कनहाई के नांव लिखे हावय।
बाहिर मा सबो किसना के हजार नांव ल नरियात हावें, योगमाया जोर जोर ले रोथे।
योगमाया: अरी दाई! मैंहर भूख ले बिलबिलात हवौं, मोर अंगठी जर गिस खिचड़ी मा।
जोर जोर ले रोथे, ओकर रोवाई मा अगास पताल एक हो जाथे।
जसोदा: रो झन बेटी।
बड़ देरी ले कोरा मा मया करथे।
योगमाया: दू मा एक ला जाय बर लागही मन ले, किसना ला या फेर योगमाया ला।
जसोदा कछू बेरा बर किसना ला भुला गिस, खिचड़ी परोस के खवाय बर बैठिस।
योगमाया: उहॉं देवकी दाई ला खवाय बिना मुंहू मा कौरा नी डारत रेंहे। खा ना दाई।
जसोदा के होंठ के तीर मा कौंरा गिस किसना के सूरता आगिस। किसना भूखाय होही। भूखा किसना के दाई मुंहू मा कौरा डारही कइसे।




दिरिस्य: 8
जसोदा योगमाया ला सुतात हवय।
योगमाया: जेती किसना सूतय ओती नी सूतंव, गोरसाइन गंधाय हर मोला बने नी लागे, अउ एकेझिन नी सूतंव, आदत नीए, दाई के गोड़ लगरे बिना मोला नींद नी आय।
योगमाया सूत जाथे।
जसोदा: सोचत हावय- जे कहा, देवकी दाई हर एला बने सीख दीस हावय, बेटी के बिना घर के हालत कइसे होथे, येला मैंहर पहिली बार आंखि ले देखत हवौं, आप वोहर आपन दाई के हाथ पांव हलाय नी दिही, बेटी हर दाई के सेवा कर सकत हावय सचमन ले, बिना बेटी के दाई के दुरदसा ओहर देखत हावय, सिरतो योगमाया हर ओला लगर के इसने सुता दिस दू पहर रतिहा के पाछू नींद खुलिस।
योगमाया: सपना मा बड़बड़ात हावय- हॉं हॉं वो आपन दाई देवकी के छाती मा सट के सूतित होही पलंग मा। तैंहर काबर?
जसोदा: कुंवर कन्हाई ओ ओ।
योगमाया: जागथे- दाई बस दू घंटा के बात हावय, अउ दू घंटा आपन तीर सूतन दे, जे
मैंहर इसने जानथें, ता खा पी के संझा के चल देंथे।
योगमाया आपन बांहा मा हाथ समारथ कइथे- तोर किसना के देंहे के रंग झरथे का? देख तो कइसने करिया करिया धब्बा पर गिस हावय।
जसोदा देखत हावय, सलोना सूंघत आथे अउ पलंग के तीर ठाढ़ हो जाथे। योगमाया के बांहा ला चाटे बर जीभ निकालथे।
योगमाया: दाई के छाती मा संटके- गाय बछरू ला बड़ डराथों।
योगमाया के बांहा ला सलोना जीभ मा फेर चाटथे।
योगमाया: दाई ओ।
जसोदा: चल भाग।
सलोना नी भागे अउ पीताम्बरी ला चाबे बर लागथे।
योगमाया: गिस गिस मोर पीताम्बरी के कलेवा।
योगमाया पलंग ले कूद परिस, ओकर चुनरी गोड़ा ले संटाके छूट गिस, चूंदी सबो छिछरागिस।
सलोना: उं-यां-यां।
जसोदा: चोर किसना, योगमाया, बिंधा, लीलाधर।
गायमन नरियाइन, जै-हो, जै-हो। बां-आं-य। सबो सुनिन किसना लहुंट के आगिस हे। राधा अउ ललिता देखत हावें, सलोना चाट चाट के किसना के समरई ला सफ्फा करत हावय।
जसोदा: दाई ले घलो छल छलिया।
राधा अउ ललिता – देखंव सखी रोज लीला—– हरि हरि बोल।
जसोदा घलोक गाय बर लागिस, जसोदा देखत हावय, जे किसना, वो राधा, वो अनुराधा, वहीच सलोना, खुद जसोदा घलोक किसना। सबो आके गात हावें।
किसना किसना किसना किसना कह जसोदा दाई किसन के कथा।
किसना चोर साही आंखि तरी करके चोर साही ठाढ़े हावय, गठरी मा हावय राधा के रेसमी चुनरी, ललिता के कंगन, जेठा के बाजूबंद, अनुराधा के सांटी।
सलोना सबो के चारों ओर गुल्ला घूमत हावय- टिनिंग-टिनिंग-उं-यां-यां।
(फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी नित्य लीला से)

एकांकी रूपांतरण- सीताराम पटेल सीतेश

चिरई चिरगुन (फणीश्वरनाथ रेणु के कहानी आजाद परिन्दे)

जान चिन्हार –
हरबोलवा – 10-11 साल के लइका
फरजनवा – हरबोलवा के उमर के लइका
सुदरसनवा – हरबोलवा के उमर के लइका
डफाली – हरबोलवा के उमर के भालू के साही लइका
भुजंगी – ठेलावाला
हलमान – भाजीवाला
करमा – गाड़ीवाला
मौसी – हरबोलवा की मौसी
हलधर – सुदरसनवा के ददा
चार लइका – डफाली के संगीमन
चार लइका – सुदरसनवा के संगीमन




दिरिस्य: 1
खोर मा भुजंगी अउ हलमान लड़त हवंय, हरबोलवा देखत हवय।
भुजंगी – साला तोर बहिनी ला धरों।
हलमान – बोल साला, ठड़गी के डउका।
लड़त लड़त भाग जाथें।
हरबोलवा – नावा गारी वाह, ठड़गी के डउका।
अतकी बेरा करमा गाड़ी चलात आथे, हरबोलवा ओकर पाछू मा लटके रइथे, कोर्रा मा मारत गारी देथे।
करमा – उतर! हरामी के पिला!
थोरकुन धूरिया जाय के पाछू उतरथे, हरबोलवा घलो गारी देथे।
हरबोलवा – साला! ठड़गी के डउका।
करमा कसमसा के रह जाथे। करमा चल देथे। हरबोलवा जात जात स्कूल करा हबरते।
चपरासी आथे अउ कइथे।
चपरासी – साला तोला चीन्हत हों, तइंच हावस ना ओ दिन मोर छेरी ला धर के दूहत रेहे।
सबजीबाग के कसाई गली मा रथस ना, साला, इहांॅ का करे बर आय हस।
हरबोलवा – ए! गारी काबर देवत हस, मैंहर इहांॅ गली मा ठाढ़े हवौं, काकरो कुछु लेवत हौं।
चपरासी – साला! मुंॅहू लगत हस फेर, नाक के हाड़ा टोड़ दिहांॅ, मारो साला एक दू झापड़, साला इहांॅ नाली मा छोकरीमन तीन मिलट करथें, तेला देखत रथस। भाग साला, नीही ता दिहांॅ, एक दू झापड़।
ओ करा ले हरबोलवा भाग जाथे, चपरासी घलो भीतिरीया जाथे, हरबोलवा जात रथे ता फरजनवा ला भेंटथे। फरजनवा के मुंॅहू लटके हावय।
हरबोलवा – यार काबर मुंॅहू लटकाय हावस।
फरजनवा – मोर मोमा मोला बिहनिया बेरा के नास्ता बंद कर दिस हवय।
हरबोलवा – अरे यार, तोला तो एक दिन के नास्ता नी दीन हावैं अउ तैंहर हिम्मत हार गे, मोर तो कभू कभू दिन भर के खाना गोल कर देथें, उपर ले मार अउ गारी झन पूछ, ले सुन तोला मैंहर तीन मिलट के मायने बताहांॅ।
फरजनवा – ये तीन मिलट का हावय?
हरबोलवा तुर्री मार के मूतथे अउ कइथे।
हरबोलवा – समझे, तीन मिलट के मायने, — हे हे हे हे।




दिरिस्य: 2
हरबोलवा जात हावय, आज इतवार हावय, स्कूल के छुट्टी हावय, स्कूल तीर नाली करा जाथे, ओ सब सूरता करथे, इ तीर छोकरीमन मूतथे, अहू ओकरा मूतिहा कइथे, पेंट के चैन ला निकालिहांॅ कइथे कि ओला चपरासी के सूरता आ जाथे, ओहर बंद कर देथे।
हरबोलवा – ऐती आ गें हावों, ता मौसी घर जाथों, ठड़गी के डउका! ठड़गी के डउका! ठड़गी—।
एक करा लइकामन गधा के पूछी मा टीपा बांॅधत हावय, गधा रिहिस चालाक, पूछी ला चिपकाय रिहिस, हरबोलवा आपन पेंट के जेब ले तार के हुक निकालिस अउ ओमन के बिन मांॅगे मदद करिस।
हरबोलवा – अजी उसने नी होय, ला इ हुक ऐला डोर मा बांधके, पूछी मा लपेट दा, फेर हुक ला खोंच देवा।
फेर उसने करदिन, गधा भागत हे, टीपा बाजत हे , लइकामन जमो हांसत हवय, सुदरसन ओकर यार बन गिस।
सुदरसनवा – ऐन मउका मा तैंहर आ गे भला, काहांॅ रथस?
हरबोलवा – कसाई गली मा रइथों।
सुदरसनवा – बाप का करथे?
हरबोलवा – खलासी हावय।
सुदरसनवा – दाई हावय?
हरबोलवा – हावय।
सुदरसनवा – भाई बहिनी?
हरबोलवा – दू भाई तीन बहिनी। तोर दाई हावय?
सुदरसनवा – हांॅ हावय, सउत दाई हावय, फेर मोला अबड़ मया करथे, फेर मोर ददा कसाई हावय। असल मा मोर ददा हर हवय सउत ददा। माने नी समझे, मोर असली ददा मर गिस, ता मोर इ ददा हर मोर दाई ला फुसलाके एक दिन आपन घर बुलाइस, फइरका दे के सेन्दूर भर दिस मांॅग मा जबरदस्ती। दाई रोइस, फेर रोय ले का होही, सेन्दूर भर दिस एक घ ता, आखिरी मा मोर दाई इ सरत मा राजी होइस, सुदरसन ला आपन बेटा के साही राखबे, ता मैं तोर सुआरी, नीही ता–।
हरबोलवा – ए! सुदरसनवा, इ कोति तोर ददा आत हावय।
सुदरसनवा – आन दे।
हरबोलवा – मैंहर जात हवौं यार! मोला मौसी के घर जाय बर हावय।
सुदरसनवा – रूक यार!
हलधर – कस बे सूरा! बारह बज गिस ना अउ तैंहर सड़क मा खचड़इ करत हावस।
सुदरसनवा – आज छुट्टी हवय दुकान मा।
हलधर – छुट्टी हवय ता आभी ले घर काबर नी गे हावस, साला एक दिन तोर पीठ के चमड़ी उधेड़े ले बनही, जा घर जा।
अतकी कह के चल देथे।
हलधर भागिस ता सुदरसनवा आपन चेहरा ला पोंछिस फेर किहिस।
सुदरसनवा – तैंहर काहांॅ जात हावस?
हरबोलवा – मौसी के घर।
सुदरसनवा – काहांॅ रइथे तोर मौसी?
हरबोलवा – पगलखनवा के तीर मा। अउ तोर घर कति हवय, कोन दुकान मा काम करथस?
सुदरसनवा – इच खोर मा, पीर साहेब के मजार देखे हावस, ओकरे तीर। —चली यार! देखिहा तोर मौसी के घर, चली।
हरबोलवा – तैंहर? तैंहर मोर मौसी के घर काबर जाबे?
हरबोलवा ओला नी ले जांव कहत हावय तभू ले सुदरसनवा जोंक जइसने चपकगे हावय। एक करा के पानी के बंबा बिगड़े देख के दुनों खुसी ले उछल जाथें।
सुदरसनवा – पानी के फव्वारा! नहाबे?
हरबोलवा – अउ तैंहर?
सुदरसन पेंट छोर के नहाय बर लागिस। हरबोलवा आघू पाछू के बात सोचे बर लागिस।
आपन जेब ले साबुन के कुटी फेंकत कइथे।
हरबोलवा – जरा पाजामा सफ्फा कर ले।
दुनों झन नंगरा नहात हावय। बीच बीच मा नल ला चिमक के पिचकारी बनात हवय। डफाली अउ ओकर संगीमन नरियात कूदथे।
संगीमन – धरा धरा साला मला धरा।
हरबोलवा डरा गिस, फेर सुदरसनवा लापरवाही ले कुल्ला करत रिहिस।
डफाली – काहांॅ रथस बे? इहांॅ नंगरा होके नहाय बर आय हावस खचड़े।
हरबोलवा हर आपन आधा सुखाय पजामा ला जल्दी जल्दी पहिर लिस। सुदरसनवा हांॅसिस।
डफाली – ये साला बड़ चालू मालूम होत हावय, होसियार रिहा।
सुदरसनवा – तोर नांव डफाली हावय ना?
डफाली के मुड़ी के लिटी के चूंदी ठाढ़ होगिस, आंॅखि गुल्ला होगिस।
डफाली – तैं, तैंहर काहांॅ रथस? तैं कोन? तैंहर मोर नांव कइसे जाने?
सुदरसनवा – तोर दाई तोला लेके एक दिन हकीम साहेब के दवाखाना मा गे रिहिस ना?
डफाली – हांॅ।




सुदरसनवा हांॅसत रहय।
डफाली – जान चिन्हार के हावय रे! चली जाई।
सबो भाग जाथें।
सुदरसनवा – जानत हस, अतका बड़खा होगिस ना अउ दसना मा मूत दारथे।
हरबोलवा – हांसत किहिस – एकरे बर ससूर भागिस।
दिरिस्य: 3
ठौर – मौसी के घर।
हरबोलवा अउ सुदरसनवा जाथें, मौसी ओमनाला देख के एकोरच खुस नी होय।
मौसी – अउ इ कोन हावय? दिदिया तोला पीटथे, ता फेर ठीके करथे, दुनिया भर के लुच्चा लफंगामन के संग ऐती ओती मटरगस्ती करत रइबे ता एक दिन जेल जाबे। जा घर जा।
दुनों लहुंटे बर लागथे। हरबोलवा ला कुछु समझ नी आइस, आज मौसी इसने बिगड़ काबर गिस।
दिरिस्य: 4
सुदरसनवा – यार, वो झोपड़ी के भीतरी मा कोन बइठे रिहिस? ओहर तोर मौसा हावय?
हरबोलवा – मौसा? नीही तो, मौसा हर बरौनी मा रइथे।
सुदरसनवा – फेर वो लाल कमीजवाला कोन रिहिस?
हरबोलवा – कती?
सुदरसनवा – अरे, मैंहर झांॅक के देखे रेंहे, ऐकरे सेती तोर मौसी झटपटाके झोपड़ी ले बाहिर आय रिहिस अउ तोला डांॅटत रिहिस।
हरबोलवा – ओ!
सुदरसनवा – एकठन बात किंहा बुरा तो नी मानबे, तोर मौसी छिनाल हावय।
हरबोलवा – धत्त।
सुदरसनवा – धत्त का? मैंहर झांॅक के देखे रेंहे।
सुदरसनवा हांॅसे बर लागिस, हरबोलवा के मुंॅहू डफाली साही होगिस, मानों अहू हर दसना मा मूत दारथे।
हरबोलवा – तैंहर कोन चीज के दुकान मा काम करथस?
सुदरसनवा – दफ्तरी के दुकान मा, साला सड़े बासी लासा के गंध के मारे तोर दिमाग फाट जाही। करबे काम।
हरबोलवा – कतका मिलथे?
सुदरसनवा – मोट पंदरा रूपया।
हरबोलवा – बस।
सुदरसनवा – ता कागज मा लासा लगाय के अउ कतक मिलही सौ रूपया? बोल काम करबे?
मखनियांॅ कुंॅआ के नुक्कड़ मा कुछू होय रिहिस, ओमन कूदत कूदत जाथें, जब ओमन पहुंॅचथे ता खेल खतम हो जाय रेहे, स्कूटर अउ रिक्सा के एक्सीडेंट मा आदमी घायल होय रिहिन अउ दुनों अस्पताल चल दे रिहिन। दुनों पछताइन, हरबोलवा पाछू करके देखिस, सुदरसनवा बिड़ी के दुकान मा ठाढ़े होइस, बिड़ी छपचा के हरबोलवा के तीर आइस।
सुदरसनवा – बिड़ी पीबे?
हरबोलवा – मैंहर बीड़ी नी पीवंव।
हरबोलवा आपन मुहल्ला कोति जाय बर लागिस, सुदरसन के दिल बुता गिस। हरबोलवा ला नरियाइस।
सुदरसनवा – ऐ! सुन ना।
हरबोलवा – का हावय?
सुदरसनवा – तुंॅहर घर जांव, तोर संग मा?
हरबोलवा – नीही। बेकार मा मोर दाई तोला गारी दिही।
सुदरसनवा – तैंहर काम करबे?
हरबोलवा – ददा ला पूछिंहा? मोला बेला होवत हावय मैंहर जात हावौं।
सुदरसनवा – रूक ना जरा यार, सच्ची, लागत हावय तोर ले बड़ दिन ले जान पहचान हावय।
हरबोलवा हांसिस, ओकर हांॅसी हा सुदरसनवा ला मोह डारिस।
सुदरसनवा – तैंहर लकरी के कोयला के मंजन करथस।
हरबोलवा – हांॅ।
सुदरसनवा – महूंॅ घलो करिहांॅ।
हरबोलवा जाय बर लागिस।
सुदरसनवा – कहा सुना माफ करबे भाई।
सुदरसनवा के आंॅखि मा ना जाने का दिखिस कि हरबोलवा के दिल उमड़ आइस, वोहर रूक गिस।
हरबोलवा – का होइस?
सुदरसनवा – साला आज अबड़ मार परही।
हरबोलवा – तोला।
सुदरसनवा – जब तक मूच्छा नी जामही, तब तक हामन बालिग नी हो सकन, अउ जब नाबालिग रइबो, रोजेच लत्तम-जुत्तम! साला घर जाय के जी नी करत हावय। कहूंॅ भाग जाय के मन करत हावय। जब तक बालिग नी हो जान, रोजेच लत्तम-जुत्तम सहे बर परही, साला! सुन एक काम करबे? सलीमा मा टनटन भाजा बेचबे?
हरबोलवा – सलीमा मा टनटन भाजा?
सुदरसनवा – लोन सलीमा के तीर एकठन टनटन भाजा कंपनी हावय, ओमा मोर कतका संगवारीमन काम करथे, खूबेच मजा के काम हावय, यार! फेर जमानतदार नी मिले कोन्हो, अउ ददा साला काहे चाहिही कि ओकर बेटा टनटन भाजा बेचके पैसा जमा करिही। बीस रूपया महीना, एकदम अजादी के काम अउ उपर ले फोकट मा सिनेमा देख। मोर ददा किहिस टनटन भाजा कंपनी का मालिक एक सौ रूपया के पेशगी दिही? दफ्तरी हर दो सौ रूपया एडवांस दिस हावय।
हरबोलवा के खांॅध मा हाथ रखके बड़ मया ले पूछिस- बोल ना यार, टनटन भाजा कंपनी मा काम करबे?
हरबोलवा – फेर जमानतदार?
सुदरसनवा – ओकर इंतजाम हो जाही।
हरबोलवा – काहांॅ?
सुदरसनवा – हामर मुहल्ला मा एकझन अमजद मिस्तरी हावय, फेर अबड़ खचड़ा हावय।
सुदरसनवा थूंकत किहिस
यार एक घा कोन्हों जमानतदार हो जाही, एक घा टनटन भाजा कंपनी म नौकरी मिल जाय। फेर कोन ददा धरके ले जाही घर अउ कोन साला मारिही? फेर अमजद मिस्तरी साला अबड़ खचड़ा हावय।
हरबोलवा – खचड़ा हावय, ता जमानत कइसे–?
सुदरसनवा – खचड़ा हावय ऐकरे सेती तो जमानतदार होही।
सादी के ढोल बाजत हावय। दूनों झन ल्रबा सांस लीन।
हरबोलवा – इ साल खूबेच लगन हावय, तुंहर मुहल्ला मा कोन्होें सादी नी होइस? हामर गली मा एक रात मा पांॅच।
सुदरसनवा – मारो यार गोली! सादी ला! जब तक मुच्छा दाढ़ी नी जामही, साला, नाबालिग रबो हामन। चली अमजद मिस्तरी के घर चली।
हरबोलवा ला लागिस, सुदरसनवा ओकर सब कुछ हावय, सुदरसनवा के सिवाय इ दुनिया मा ओकर कोन्हों नी ए। ओकर दुख के समझोइया इ सुदरसनवा।
हरबोलवा – सुदरसनवा के हाथ ला धर के कइथे – फेर मोला डर लागत हावय।
सुदरसनवा – का के डर।
हरबोलवा – ददा।
सुदरसनवा – अरे एक घ कंपनी मा घूसन तो दे फेर देखबे इ ददामन ला। ए देख ऐती, ऐमा तेल लगाही, आके तोर अउ हामर ददा दाई, मौसा मौसी सबो, समझे।
हरबोलवा – खांध मा हाथ राखके – ता मिल जाही नौकरी?
सुदरसनवा – अमजद मिस्तरी ला तेल लगाय बर परही।
हरबोलवा – लगाबो, कंपनी के नौकरी बर जे करना रिहि करबो, आप लहुंट के घर नी जायबर हावय। थूकत हन घर ला।
सुदरसनवा – पक्का।
हरबोलवा – पक्का।

फणीश्वरनाथ रेणु के कहानी आजाद परिन्दे से।
एकांकी रूपान्तरण – सीताराम पटेल



छत्तीसगढ़ी भूल भूलैया

समर्पन
धमधा के हेडमास्टर पं. भीषमलाल जी मिसिर महराज के सेवा मा :-
लवनी
तुहंला है भूलभुलैया नींचट प्यारा।
लेवा महराजा येला अब स्वीकारा।।
भगवान भगत के पूजा फूल के साही।
भीलनी भील के कंद मूल के साही।।
निरधनी सुदामा के ओ चाउर साही।
सबरी के पक्का 2 बोइर साही।।
कुछ उना गुना झन हाथ अपन पसारां
लेवा महराजा, येला अब स्वीकारा।।

जावलपुर, दिनांक 12. 04. 1918
तुहंर दया के भिखारी,
शुकलाल प्रसाद पांड़े

भूमका
ये बात ला सब जानथें कि आदमीमन धरम-करम, नीत-प्रीत, बुद्धू-बिबेक, चतुराई कहां ले कहों, भगवान घलोक ला अपन अपन बोली के प्रताप से पा जाथें। उनकर सब काम अउ सब इच्छा उनकर बोलिच से सिद्ध हो जाथैं। आदमी जउन देस-राज मा जनम पाथे, ओही देस के बाली हर ओकर असल बोली कहाथे। मनखे हर अपन जतका बढ़ती अपन बोली के परसाद से कर सकथे, ओतका दूसर बोली से नई कर सके।
आदमीमन ला अपने बोली मा दू उपाय से सिक्षा मिलथे :-
1. एक दूसर से बातचीत कराई से।
2. किताब पढ़ाई से।
जउन आदमी हर ये दुन्नोंं उपाय ला रोज 2 करथे, ओहर बहुत जल्दी बुद्धमान हो जाथे अउ सबो बात मां ओकर बढ़ती होथे। येही खातिर पोथी रचे जाथे, जेला पढ़के अउ ओमां लिखे अनुसार चल के कतको गवाँर आदमी मन तरह 2 के गियान सीख के खूब बुद्धमान बन जाथैं अउ संसार मा जस पाथैं।
जउन हिंदी हर हमर हिन्दुस्तान देस भर के बोली अय, हमर ये छत्तीसगढ़ी बोली हर ओही हिन्दी के रूप अय। छत्तीसगढ़ी अउ हिन्दी मा निंचट थोरक भेद है। बात ये है कि हिन्दी हर सुद्ध रूप अय अउ छत्तीसगढ़ी हर ओकर बिगड़े रूप अय। दुन्नों मा निंचट थोरक फरक है। हिन्दी मा अउ छत्तीसगढ़ी मा अतेक लकठा के नाता है, तबो ले खाली छत्तीसगढ़ी जनैया मनखे हर हिन्दी बोली ला बने नई समझ सकै। येकर असल कारन ये ही है कि छत्तीसगढ़ हर बिद्या मा खूबिच पाछू हावै। फेर अब सरकार अंगरेज बहादुर के दया से इहां ला ठौर 2 कतको मदरसा खुलत जात है अउ पढ़ैया-लिखैया आदमी मन के संख्या आगू ले बढ़त जात है, फेर तभो ले आज काल इहाँ ला किताब अउ अखबार बाँच के ज्ञानी बने के इच्छा रखैया आदमी अतेक थोरे हावैं कि जउन मन अँगठी मां गने लाइक हावैं।
एक बुद्धमान मनखे के कहना है कि ‘‘जिस देस के मनुष्य सदा पुस्तक पठन में अपना समय व्यतीत करते हैं, उन्हीं की उन्नति अवश्यसम्भावी है।‘‘ इहाँ ला ये बात ला माने बर एक लाख आदमी पाछे एक्को आदमी तैयार नइँये। हाय ! कतेक दुःख के बात अय ! कान्नों लैका हर कुछू किताब पढ़े के चिभीक करे लागथे, तौ ओकर दाई-ददामन ओला गारी देथें अउ मारपीट के ओ बेचारा के अतेक अच्छा अउ हित करैया सुभाव ला नष्ट कर देथैं। येकरे बर कहेबर परथै कि इहाँ के दसा निँचट हीन हावैं। इहाँ के रहवैयामन से किताब अउ अखबार पढ़के ज्ञान अउ उपदेस सीखे बर कोन्नों कहैं तौ ओमन अइसे कहथैं :-
‘‘हमन नई होवन पंडित-संडित तहीं पढ़े कर आग लुवाठ !
ले किताब अउ गजट-सजट ला जीभ लमा के तइँहर चाट !!
जनम के हम तो नाँगर-जोता नई जानन सोरा-सतरा !
भुरवा भैंसा ता ! ता ! ता ! ता !!! यही हमर पोथी पतरा !!!‘‘
धन्य है ! ऐसन बुद्ध के बलिहारी है ! अपन हित अनहित ला पसु-पक्षीमन घलोक जानथैं, जब आदमी अपन हित-अनहित ला नई समझै, तौ ओकर-साही अनाड़ी अउ कोन होही ?
मैं हर राजिम (चंदसूर) के पंडित सुन्दरलाल जी त्रिपाठी ला जतेक धन्यवाद देवौं, ओतके थोरे है। उनकर छत्तीसगढ़ी दानलीला ला जबले इहाँके पढ़ैया-लिखैया आदमी मन पढ़े लागिन हैं, तब ले ओमन किताब पढ़े मां का सुवाद मिलथै अउ ओमां का सार होथे, ये बात ला अब धीरे धीरे जाने लगे हावैं। ये ही ला देखके महूँ हर बिलायत देस के जग-जाहिर कवि शेक्सपियर के ‘‘भूलभुलैया‘‘ कथा ला छत्तीसगढ़ी बोली के पद्य मां लिख डारे हावौं। ये कहिनी हर श्री बाबू गंगाप्रसाद एम. ए. के रचे ‘‘हिन्दी शेक्सपियर के अधार से लिखे गये है, येकर खातिर मैं बाबू साहेब के निंचट अहसान मानत हावौं।
जबले छत्तीसगढ़ के रहवैया मन ला हिन्दी बर प्रेम नई हो जावैं अउ जबले ओमन हिन्दी के पुस्तक से फायदा उठाय लायक नइँ हो जावैं, तबले उँकरे बोली छत्तीसगढ़ीच हर उनकर सहायक है। येकरे खातिर छत्तीसगढ़ी बोली मां लिखे किताब हर निरादर करे के चीज नों है अउ येकरे बर छत्तीसगढ़ी बोली मां छत्तीसगढ़ी भाई मन के पास बड़े 2 महात्मामन के अच्छा 2 बात के संदेशा ला पहुंचावव हर अच्छा दिखथय।
हिन्दी बोली के आछत, छत्तीसगढ़ी भाईमन बर छत्तीसगढ़ी बोली मां ये किताब ला लिखे के येही मतलब है कि एकतो छत्तीसगढ़ी ला उहाँ के लैका, जवान, सियान, डौका डौकी सबो कोनों समझहीं अउ दूसर, उहाँ के पढ़े लिखे आदमी मन ये किताब ला पढ़के हिन्दी के किताब बाँच के अच्छा 2 सिक्षा लेहे के चिभिक वाला होजाहीं। बस अैसन होही, तौ मोर मिहनत हर सुफल हो जाही।
मोर मन मां छत्तीसगढ़ी भाषा मां कोनो किताब लिखे के इच्छा पं. नर्मदाप्रसाद जी मिसिर पैदा कराइँन, येकर खातिर मैं मिसिर जी के नींचट अहसान मानत हावौं। ये किताब के रचाई अउ लिखाई के काम मा मित्र पं. दुखीराम जी अवस्थी कोटा अउ पंडित गुरूप्रसाद जी ठाकुर हुशंगाबाद ये दुन्नों मनझन खूब सहायता देइन हैं, तेकर खातिर मैंहर इनकरो खूब गुन मानत हावौं।

जबलपुर, तुँमन के एकझन छत्तिसगढ़िया भाई
15.04.1918 ई. शुकलाल प्रसाद पांड़े

छत्तीसगढ़ी भूल भुलैयाँ

सवैया
राम-गनेस-गुरूजी के पाँव म मैंहर आपन मूंड़ नवाके।
भूलभुलैयाँ-कथा कहथौं हँसहीं पढ़ जेला सबेच्च ठठाके।।
होवैं चिरँजी बोलैया ये बोली के कान घलाय कभू झन पाकै।
फैलयँ नार के साही दिनोंदिन फूलें-फरैं सुख खूबिच पाके।।
दोहा – सिवपुर, हरिपुर नाँव के धन अउ बल चुचुवात।
राज रहिन संसार मा दूठन सुघर अधात।।
चौपाई
कभू लराई भये रहिस है। दुनों राज मां बैर रहिस है।।
दुनों राज के महराजा मन। कानुन कर देइन तब ऐसन।।
हमर हाट मां हमर डहर मा। हमर राज मां हमर सहर माँ।।
बैरी राज के कान्नों आही। ओकर मूंड़ कटाये जाही।।
देही रूपिया जब हजार ठन। तबे बांच पाही ओकर तन।।
ये कानुन रैयत जब सूनिन। सन्न खाय के मनमां गूनिन।।
कहिन, आज ले सुन ला भाई। छोंड़ा बैरी-राज जवाई।।
देइन छोंड़ खाय के किरिया। होथे जोहर सबला पिरिया।।
दोहा – अड़बड़ दुखिया जनम के भूले भटके बाट।
सिवपुर के मनखे कोनों आइस हरिपुर-हाट।।
ओला बैरी-राज के जान मने मन हाँस।
बाँध सिपाही ले गइँन आपन राजा-पास।।
चौपाई
रस्ता मा सुन बात मरम के। थाँह पा गइस अपन करम के।।
मैं सिवपुर के रहवैया हौं। येकर खातिर मारे जाहौं।।
दुख मां माथा ठोंके लागिस। तर 2 आंसू चूहे लागिस।।
राजा मेर पहुँचिस ओहर जब। करिस जोहार नवां मुंड़ ला तब।।
हाथ जोर आंसू बोहा के। कहे लागिस राजा ल सुना के।।
अनजाने मैं ईहां आयेवँ । एको हाल के गम नइँ पायेवँ ।।
छोंड़ मोला महराजा देवाँ। अउ जग मा भारी जस लेवा।।
जेहर पर के प्रान बचाथे। तेकर से इसवर सुख पाथे।।
दोहा – राजा हर अतका ल सुन दुन्नों नैन तनेर।
कहे लगिस तोर चाल हर नइँ चलही मोर मेर।।
चौपाई
जैसन राज के कानुन होथे। राजा ल पालेच बर होथे।।
नइँ मानै ओला ओहिच जब। अड़बड़ गड़बड़ मच जाथे तब।।
जेकर मन मां आथे जैसन। रैयत रस्ता चलथैं तैसन।।
येकरे बर बैठेवँ गादी जब। करे हवौं किरिया मैंहर तब।।
अबस मानिहौं कानुन मन ला। नइँ मेटिहौं कभू मैं उनला।।
छोड़ सकौं नइँ मैं येकरे बर। अबस के मारे जावे तैंहर।।
तेर राजा मोर मनखे पाइस। सब बपुरा मन ला मरवाइस।।
नइँ मालुम अतको का तोला ? निंचट बने हस भाँभर भोला।।
दोहा – बहँचे के जो मन हवै तौ सुन कान उघार।
गन दे आगू मोर तैं रूपिया एक हजार।।
मोला ये बिसवास है तोर देख के हाल।
सौ ले जादा लँग नहीं निकरही माल।।
जब सिरतो बेंच ऐसने अगा ! हाल है तोर।
तो फेर कैसे बांचही भला प्रान हर तोर।।
चौपाई
अतका जब ओ बपुरा सूनिस। पागा फेंक मूंड़ ला धूनिस।।
भुइयाँ मां पेटघैयाँ गीरिस। तिरिन चाब के ऐसन बोलिस।।
मलिक, दुखिया मैं हौं ऐसन। नइँ होहीं एक्को झन जैसन।।
मोला जिंदगी नइँये प्यारा। जल्दी मोरा मरवा डारा।।
महराजा, जब मैं मर जाहौं। तब सबेच्च दुख ले छुट जाहौं।।
पुजवैया मन ला बलवावा। मोला जल्दी पार लगावा।।
निंचट भार होगइस जिआई। अब अबेर झनकरा दोहाई।।
अच्छा भइस इहाँ जो आयेवँ। खोजत रहें तौन ला पायेवँ।।
मोला होगै ऐसन कहना। औंघावत अउ पाइस दसना।।
दोहा – कलकुत ऐसन मरे के ओकर जब सुनीस।
राजा के मन मां मया ओकर बर उपजीस।।
चौपाई
राजा हर ओला उठवाइस। ओकर से पूछे फेर लागिस।।
नइँ रहिस रूपिया-पैसा जब। काबेर घर ले निकरे तैं सब ?
येहूला तैं बता मुसाफिर। आये हवस इहाँ का खातिर ?
निंचट बोहावत आंसू धारा। कहिस हाथ ला जोर बिचारा।।
अपने दुखला अपने मुंहले। कैसे कहिहौं कैसन मुंह ले।।
जब सब दुख के सुरता आथे। मन नींचट ब्याकुल हो जाथे !
तुहँर हुकुम ला टारौं कैसन ! अच्छा, कहथौं बनही जैसन।।
उहाँला ओकर कथा सुने बर। डटाडट्ट कचहेरी गै भर।।
दोहा – कहे लगिस कहिनी अपन राजा-अज्ञा मान।
सुने लगिन सब आदमी देके नींचट कान।।
चौपाई
जात के बनियां जाना मोला। तन के नाँव मोर है भोला।।
सिवपुरमां मैं जनम ल पायेवँ । उहेंल खेलेवँ कूदेवँ बाढ़ेवँ ।।
भयेवँ जवान उहाँ जब मैंहर। करेवँ बिहाव जात-अतमा-घर।।
नींचट सुन्दर सब गुन खानी। मिलिस मोला महराज परानी।।
रँग के ओकर प्रेम के रँग मां। रहे लगेवँ मैं ओकर सँग मां।।
कटक सहर मां मैंहर जाके। करत रहें रोजगार मजा के।
बुधमंता मन सिरतो कहथें। बनिजेच मां लछिमी जी बसथें।।
थोरेच दिन रोजगार करें मैं। खुब धनवंता होय गयेंवँ मैं।।
दोहा – एक बखत मोर संग के मरगै साझीदार।
चले गयें मैं कटक तब आपन हान बिचार।।
चौपाई
मैके मां करि के तिरिया ला। छय महिना मैं रहेंवँ उहांला।।
गरभवती हो गये रहिस जब। कहे रहिस सब हाल अपन तब।।
मोर सुरता कर 2 के रोवै। नइँ खावै पीवै नइँ सोवै।।
सह नइँ सकिस मोर बिछुरनला। तौ आ गइस रहें मैं जहं ला।।
दस महिना बीतिस जब गन गन। बाबू भइँन जरौंधा दूझन।।
निचट अचंभा का गुठियाबौं। नइँ पतियाहा कहत लजावौं।।
एके रूप-रँग एक्के तन के। दुनो रहिन एक्के मुहरन के।।
आगू जनमिस तेहर कौनै। पाछू जनमिस ओकर कोनै।।
कैसे कहौं अचंभो भारी। नइँ कोन्नो के मिलै चिन्हारी।।
दोहा – कंगालिन के एक झन ऊहेंला सरकार।
लेइँन जाँवर छोकरा ओही दिन अवतार।।
इसवर-माया का कहौं है ओ अपरंपार।
ओहू दूनो झन रहिन निँचट एके अनुहार।।
चौपाई
उनकर दाई अऊ ददा मन। निँचट रहिन हैं जनम के निरधन।।
बाबू मन सँग मां खेले बर। बिसा लिहें ओमन ला मैंहर।।
बाम्हन ला मैंहर बलवायों। चारों झनके नाँव दुवे ठन।।
बाबू मन के होइस पूर्रू। नौकर मन के होइस झुर्रू।।
बड़े पुरू-सँग बड़का झुर्रू। ननकी-सँग मां ननकी झर्रू।।
रहे लगिन अउ खेले लागिन। दूध-भात खा बाढ़े लागिन।।
नई रहिन हैं कोन्नो रोनहाँ। मुँच 2 हँसैं करैं खुब धोनहाँ।।
दोहा – देख चोचला हमन के छाती जावै फूल।
दुख मन ला हम दुनों झन नींचट जावन भूल।।
घर जायेबर एक दिन होयेन हमन तियार।
आऊ एक जहाजमां सबझन भयेन सवार।।
चौपाई
सुघर बोहावत महानदी मां। ओ जहाज पहुँचीस समुँद मां।।
समुँद म गइस थोरके दुरिहा। चले लगिस वैहर जमपुरिहा।।
देख के अंधाधुंधी गर्रा। उठिस परात हमन के थर्रा।।
आंसू बोहे लागिस झर झर। सुमिरे लागेन देंवता-पीतर।।
बांचे के भरोस तज देहेन। जानेन काल-परोसा होयेन।।
साहुन बाबू मन ला पायेन। लागिस अड़बड़ रोये गाये।।
रोवत देख अपन दाई ला। अऊ देख मुँड़ कचराई ला।।
लैको मन तब रोये लागिन। छातीम बरछी हूले लागिन।।
दोहा – केवट बूजापूतमन जानिन मरबो आज।
डोंगा मां झट बैठ के भाग गइन महराज।।
भगवानेहर विपत मां देथे जतन सुझाय।
मेला सूझिस ओ बखत मां एक उपाय।।
चौपाई
दुलरू पुरू-झूरू ला छोटे। जिनला मैंहर रहें अँगोटे।।
पागाला उतार झट लेहें। बांध तुरत धारन मां देहें।।
ओही छिन साहुन हर घला। बड़का बाबू अउ नौकरला।।
लुगरा तोर एक ठन लेइस। बाँध दुसर धारन मां देइस।।
दुनों परानी चिंत्तामां भर। चपट गयेंन लकठेच मां उनकर।।
बहे लागिस फेर निंचट गर्रा। जो होगे दुन्नों के हर्रा।।
येती-ओती खुब झोंका ले। लगिस जहाज निंचट्टे हाले।
जनेन, अब ये देथे खपले। बूढ़ेन अब सब समुँद म झपले।।
धुक धुक धुक धुक धुक्की धड़कै। डेरी भुजा-नैनहर फरकै।।
राम-हरोला सुमिरक लागेवँ। कथा भागवत मैं बद डारेंवँ।।
फेर सहाय करिन नइँ पतियैहा। रकसा-साही होगै बैहा।।
निंचट बोर्रकी देहे लागिस। चक्रदेय के किंदरे लागिस।।
जेती 2 बैहर दौड़ै। तेती 2 ओह दौड़ै।।
निंचट उँच्च लहरा चढ़ जावै। ओहू ओकरे सँग चढ़ जावै।।
ओकरे सँग मां खाल्हे गीरै। येती-ओती सरसर फीरै।।
दोहा – अतका कहि लागिस कहे हे महराज दयाल।
कहत बनै नइँ मोर से अब आगू के हाल।।
होइस होही जैसना लेवा तूंहीं ज्ञान।
सुरता कर ओ बातके रोये लगथे प्रान।।
चौपाल
राजा बोलिस, सुनगा भोला। होही सबेच कहेबर तोला।।
नींचट कर नइँ सकौं छमा मैं। तब ले करिहौं कुछू दया मैं।।
छातीला हाथमां मसक के। भोला बोलिस सुसक 2 के।।
दक्खिन कोती सन सन सन सन। लागिस बोहाये ओहर छत 2।।
ऐसने करते पांच कोसले। हमन ल ओहर आगू गै ले।।
भीतर मां पानी के खारी। रहिस चटान एक ठन भारी।।
पहुँचिस जब लकठा मां ओकर। निंचट जोर से खाइस ठोकर।।
पाछू घूंच जहाज टूटगै। देख हमन के छक्का छूटगै।।
अतको मां खुब धीरज धारे। लैका मन ला रहेन सँभारे।।
हाय ! हाय !! राजा, अतके मां। साहुन चढ़े रहिस है जेमा।।
ओ तखता हिंट के जहाज ले। बोहा गइस साहुन ला सँग ले।।
लैकन मन ला निँचट सँभारत। टुकुर 2 ओमन ल निहारत।।
बैठे अलग 2 कठवा मां। लगे न बोहाये हमन समुँद मां।।
दोहा – भगवाने ला सबेके रथे याद महराज।
हमर भागबर आ गइँन दू ठन उहाँ जहाज।।
चौपाई
लेइस एक चढ़ाय हमनला। दूसर चढ़ा लिहिस ओमनला।।
लिहिन चढ़ा मोला जौने मन। रहिँन चिन्हार मोर तौने मन।।
मनखे 2 होथे अंतर। कोनो हीरा कोनो कंकर।।
दया लगिस नींचट ओमन ला। सिवपुर पहुँचा दिहिन हमन ला।।
गइँन कहाँ साहुन-लैकन मन। जियत हवैं की मरगैं ओमन।।
सोर डोर मैं खूब लगायों। ककरो कुछू सोर नइँ पायों।।
राजा बोलिस जानेवँ मैंहर। येकरेबर दुखियाहस तैंहर।।
ऐसन अड़बड़ तोर कथा है। बिलम सहेबर मन नइँ चाहै।।
अपन सबोच्च कथा ला मोला। धरके धीर सुना दे मोला।।
दोहा – सुन राजा के बातला ओहर फेर कहीस।
साल अठारा घर रहत दुख मां बीत गईस।।
चौपाई
अतका दिन मां दुन्नों लड़का। होय गइँन चतुरा अउ बड़का।।
सुनिन हाल ला साहुन मनके। मन दुखिया होगै ओमन के।।
ओ तीनों झन ला खोजे बर। बिदा माँग के गोड़ ल धर धर।।
चिथरा 2 पहिर के जुन्ना। चल देइँन घर ला कर सुन्ना।।
निकर गइँन ओहूमन जबले।पता मिलिस नइँ उँकरो तबले।।
दुनोंदीन ले बिनसिन पांड़े। हलुआ मिलिस, मिलिस नइँ मांड़े।।
मैंहर छोड़ अपन सब धँधा। दुख मां उँकर गये अँधमंधा।।
घर मां लगा दिहें मैं आगी। निकर परायें बन बैरागी।।
जप सिय-राम-कृष्ण अउ राधा। डारें खोज जगत ला आधा।।
कहाँ कहौं गनियार-घुटकू। कहि देथौं एक्के ठन ठुपकू।।
ककरो कुछू सोर नइँ पायेवँ। भूलत भटकत इहाँ ल आयेवँ।।
अब ईहाँला मरना होही। दुख छुट जाही अच्छा होही।।
दोहा – जीवित हावैं सबो झनसुन पातें जो आज।
हांसत 2 घेंचला कटवातें महराज।।
चौपाई
राजा कहिस कहौं का तोला। निंचट करम फुटहा हस भोला।।
कानुन बाँधे रतिस निं मोला। देतें छोड़ अभी मैं तोला।।
मोर लचारी तहीं समझ ले। अतका दया करतहौं तबले।।
तोला देख दुःख मां कुहरत। देथौं आजेच भर के मुहलत।।
तैंहर मोर सिपाही-संग मां। जाके मोरेच इही सहर मां।।
भीख माँग नइँ तो उधार ले। कोन्नों बिध ले आज सांझ ले।।
माल होय या होवै रूपिया। एक हजार लान दे रूपिया।।
सँझा ले तैं नईं पटावे। तो जरूर तैं मारे जाबे।।
दोहा – ओ बपुरा के नइँ रहिन कोन्नो उहाँ चिन्हार।
देतिस कोन बिदेस मां रूपिया एक हजार।।
ओहर ये ही सोंच के छोड़ जिये के आस।
अपने अपन धँधा गइस जहल म होय निरास।।
सबे बात हर जगत के रहथै दई-अधीन।
ओकर दुन्नों बेटवा ओदिन उहें रहींन।।
चौपाई
छोटे पुरू-झुरू दुन्नोंमन। भाई मनला खोजत आपन।।
ळरिपुर मां आइन ओही दिन। भोलाहर आइस जेही दिन।।
एक आदमी कहिस उँकर सन। है ईहाँके कानुन ऐसन।।
सिवपुर के जे इहाँल आथै। तेकर प्रान लेलिहे जाथे।।
तुँमन उहेंके औ येकरेबर। समझा देथौं तुहँला मैंहर।।
पुछही कोन्नों कहिहा ऐसन। हमन कटक के रहवैया अन।।
सहर मा जब घूमेबर निकरिस। उहाँल पुर्रू ऐसन सूनिस।।
सिवपुर के बैपारी बनियां। पकरे गइसै आज बिहनियां।।
कहिस कहैया करके हाँसी। ओला होही संझा फाँसी।।
दोहा – अतकासुन ओला भइस मनमां खुब संताप।
बपुरा नइँ जानत रहिस की मोरेच अै बाप।।
चौपाई
अब बड़काके हाल-भलाई। सुन ला अगापढ़ैया भाई।।
सुना चुके हौं मैंहर तुहँला। बूड़त समुँद म साहुन मन ला।।
एक जहाज के मांझी देखिन। अपन जहाज म बैठा लेइन।।
ओमन दुन्नों लैकामन ला। छुड़ा के दुखिया साहुन-सँगला।।
बाँध जबरदस्ती डोरीमां। इेइन बेंच पांच कोरीमां।।
काकाहर सिवपुर राजा के। बिसालिहिस खातिर राजा के।।
राजा-घरमां खाय दुनोझन। होगै जबर जवान दुनोंझन।ं
पुरू-बल देख अपन नैना मां। ओला भरलेइस सेनामां।।
खांड़ा-फरसी गरू गरू धर। अड़बड़ बलके खान पुरूहर।।
एक लड़ाई मां सँग जाके प्रान बचा लेइस राजाके।।
दोहा – राजा हर परसन्न होकर करके निँचट उछाव।
हरिपुरेच मां पुरू के करदेईस बिहाव।।
चौपाई
बीस बरिस ले झुरूके सँग मां। पुर्रू रहत रहिस हरिपुर मां।।
राजामेर होयके नौकर। रहिस कमाये धन खुब होहर।।
बाप-हाल सुन ओहर पातिस। रूपिया गन छँड़वा ले लातिस।।
छोटे पुरू आइस हरिपुर जब। छोटे झुरू हर संग रहिस तब।।
मालिक के सब दिन सेवा कर। अच्छा 2 बात सुना कर।।
छिन 2 पुय ला हँसवा देवै। सबो दुःखला भुलवा देवै।।
थैली यपिया के झन्ना के। कहिस पुरू ण्ुर्रूल सुना के।।
ये यपिया के थैली लेजा। तैं सराय मां अभी चले जा।।
कुछू साग अउ दार-भात बस। राँध राखबे तैंहर सुनथस।।
नींचट भूखलगे है मोला। जादा अउर कहौंका तोला।।
दू कौरा जाथे जब भीतर। तभे सूझथे देंवता-पीतर।।
दोहा – मैं ये सहर म घूम के देख के हाट-दुकान।
लहुट देख मैं आवथौं तें सिरतो ले जान।।
चौपाई
जब नौकर सराय चल देहइस। पुर्रू घूमेबर मनदेइस।
आपन दुखके कर 2 सुरता। लगिस भिंजोय धोती-कुरता।।
हाय ! अतेक खोज में आयों। कोन्नों के पत्ता नइँ पायों।।
भटकत 2 गोड़ खियागै। भूख-प्यास मां देह सुखागै।।
भाई-दाई-ददा छँड़ाये। हाय ! दई ! काबर सिरजाये ?
लागिस मौत रामेसर मांगे। ओही बखत झुरूहर आगे।
भेजे रहिस सराय म जेला। कहे रहिस रांधेबर जेला।।
समझत होहा ओही होहै। नो है ! नो है ! ओहर नो है !!
दोहा – ये ओ झुर्रू अै सुना जेला बीस बरीस।
उहें ल बड़का पुर्रू-संग रहते बिते रहीस।।
चौपाई
भाई 2 पुर्रू मन मां। आऊ दुन्नों झुर्रूमन मां।।
बीस बरिस बित गये रहिस है। रूप-भेद नइँ भये रहिस है।।
जैसन बड़का पुर्रू दीखै। तैसन छोटे पुर्रू दीखै।।
जैसन दीखै बड़का झुर्रू। तैसन दीखै छोटे झुर्रू।।
ओला अपन जान के ण्ुर्रू। ऐसन पूछे लागिस पुर्रू।।
कसरे झुर्रू होगै काय ! ऐसन जल्दी काबर आये ?
बड़का पुर्रू आय जान के। ओला मालिक अपन जान के।।
कहे लगिस झुर्रू हर ऐसन। मालिक तूं गुटियाथा कैसन।।
आज कहाँ जल्दी आये हौं। खूब बेर करके आये हौं।।
जेवन हर चुर-पाक गयेहै। खाये के नइँ बेर भये है।।
कब के बाज गये है बारा। अब तो मालिक घर म पधारा।।
जुड़ा गइस नींचट जेवन हर। घर मां तूँ नइँ गया एकर बर।।
हमर मालकिन गुस्सा छाके। देबीसाही निंचट रिसाके।।
गारी देहे लागिन ऐसन। सुने कभूच्च रहें नइँ जैसन।।
‘‘छतफट्टा ! भड़ुआ ! ननजतिया ! निर्वंसी ! चंडाल ! असतिया !
जुठहा ! गऊमार ! मुड़पिरवा ! परै तोर जाँगर मां किरवा !!!
आज अतेक्क बेर हो आइस। घर मां मालकिन हर नइँ आइस।।‘‘
कहिके ‘‘संसो नइँये तोला‘‘। मारिन-बहिरिच-बहिरी मोला !
मेंहर किरहा कूकुर-साही। बहिरी-मुठिया खा कदमाही।।
कान-देह फटकारत भागैं। भागत 2 इहाँल आगैं।।
दोहा – तुँहला लागे भूख नइँ होवै कतको बेर।
तूंहर पाछू मोला तो लेथे सनीचर घेर।।
चौपाई
कहे लगिस पुर्रू हर ऐसन। करत हवस ठट्ठा तैं कैसन।।
रूपिया दिये रहें मैं तोला। डारे कहाँ ? बतातैं मोला ।।
झूर्रू कहिस ‘बापरे ! येहे ! रूपिया कहाँ रहा तूं देहे !
ओदिन दूठन दिये रहे हा। कापी मां लिख लिये रहे हा।।
चलथौं तुहँर हुकुम के भीतर। तुहँरे हुकुम से ठकुराइन बर।।
कहथौं तुहँर गोंड़ ला छूके। लेयें लुगरा पौनेदूके।।
दू आना के लेहें फुँदरी। अउ ओतके के लेहें मुँदरी।।
करा हिसाब भइस दू रूपिया ? अऊ कहाँ के लानौं रूपिया ?
ओकर ऐसन बात ल सुनके। कहिस पुरू हर मूँड़ ल धुनके।।
मोला तो रूपिया के चिंन्ता। ये बूजा ला हँसिच के चिन्ता !
अरे ! बता, हजार रूपिया ला। कहाँ करे ? देहे तैं काला ?
कहिस झूर्रू ‘हाँसी नइँ करथौं। सिरतो 2 मैंहर कहथौं।।
हवै हँसे के इच्छा मन मां। हँसिहा कतेक चला तो घर मां।।
खसल गये है बेरा नींचट। भात जुड़ावत होही नींचट।।
परथम करैं पेट के पूजा। पाछू करैं काम ला दूजा।।
चला 2 अब बेर करा झन। करहीं गुस्सा निंचट मालकिन।।
थोरको अउर बेर हो जाही। मोर केश नइँ बाँचे पाही।ं।
पुर्रू कहिस ‘देत हौं घुस्सा। कोन करत होही रे गुस्सा !
सुन के ऐसन कहिस झूर्रू हर। ‘होही मुंड़ढक्की हर मुंहर‘।।
सुन पुर्रू ला गुस्सा लागिस। गुर्री 2 देखे लागिस।।
दोहा – जब झुर्रू घर चलेबर नींचट टेंक करीस।
पुर्रू के मन मां गुसा तब अड़बड़ उमड़ीस।।
कहिस कुवाँरा हौं अभी कहथस तैं अजगूत।
डौकी कहाँ के पाइहौं कस रे बूजापूत।।
कह अतका मारे लगिस मुटका-गोड़ेच-गोड़।
देह छँड़ा के झुरू हर भागिस मूंड़ा छोड़।।
चौपाई
अपन पीठ ला छूवत 2। पहुँचिस घर मां कुहरत 2।।
देख के ओला ठकुराइन हर। पूछिस ‘आइस रे ! मालिक हर ?‘
कहिस कहौं का मैं ठकुराइन। खूब कहें मालिक नइँ आइन।।
सिरतो कह देवत हौं मैंहर। करम फूट गै बाई तूंहर !
कहिस बगधरा, कहथस कैसन ? बैहा साही बकथस कैसन।।
झुरू कहिस मैं औं नइँ बैहा। मालिक हर होगै है बैहा।।
दोहा – मैं कहेवँ घर चला तौ मालिक हाथ पसार।
मांगे लागिस मोर से रूपिया एक हजार।।
कहें कि जेवन हो गइस ढरक गये है बेर।
कर देइन कनघेंटरी रूपिया मांगिस फेर।।
चला बबाजी घर कहें गोड़ म मूंड़ मढ़ाय।
हवैं अगोरत इस्तिरी तूंहर निंचट रिसाय।।
कहे लगिन चिल्लाय के गुस्सामां झकझोर।
भाड़ म जावै इस्तिरी कहाँ के इस्त्री मोर।।
हाय ! बबारे ! का कहों मारे लगिन अघात।
जरै करम बहिरी इहाँ, उहाँल खायेवँ लात !!
चौपाई
पुर्रू के दुलही भड़भड़ ही। रहिस सुभाव के खुब चिड़चिड़ ही।।
जे भतार नित रहै धरम मां। तेला भरमै दूसर संग मां।।
जब सूनिस भरतार कहै है। की मोर डौकी कोन्नो नइँ है।।
गुस्सा मां भर रकसिन साही। होगै खूंदे नागिन-साही।।
चड़चड़ अँगठी फोरे लागिस। पति ला अपन सरापे लागिस।।
का अतको मालुम नइँ मोला। चोरिच के गुर भाथै तोला ?
घरके खांड़ घरै मां सड़थै। छाती मां पांजर मां गड़थै।।
सुन के ऐसन गारी-गिल्ला। फते करे बर जस के किल्ला।।
चँपहिन, धमधीहिन, धमतरहिन। जुर आइन तीन परोसिन।।
उँकर मेर डौका के निंदा। करे खुब लगिस बाइ्र बिन्द्रा।।
हला 2 नथ ओमन फिरतो। करे खुब लगिन बहिनी अै सिरतो।।
डौका मन हम डौकी मनके। नइँ जानैं कुछ दुखला मन के।।
धोती पहिर लाल धारी के। बन के बैला देवारी के।।
अली-गली मां हाँसत फिरथैं। येती ओती घद्दकत रहथैं।।
अब गोई ! झन बेर लगातैं। मना पथा उनला ले लातैं।।
बिन्द्र कहिस कहत हा ठौका। ऐसने हावै मोरो डौका।।
सिरतो अब मैं जाथैं दाई। इही म दिखथै मोर भलाई।।
झुर्रू हर लेकर डोरी। चल देइस छाँदे बर घोड़ी।।
संग मां ले बिन्द्रा छै नौकर। चलिस अपन पति ला पकरे बर।।
दोहा – अतका मां छोटे पुर्रू किँदरत उहाँ गईस।
भात राँध नौकर झुर्रू बैठे जहाँ रहीस।।
चौपाई
कहिस पुरू गुस्सा कर ओला। कस झुर्रू का होगै तोला।।
कोन गढ़न के ऐसन झुर्रू बपुरा। हाट-बाजार म हाँसी करथस।।
सुन के ऐसन झुर्रू बपुरा। नींचट गइस मने-मन चकरा।।
खोजत डौका ला अतका मां। बिन्द्रा पहुँच गइस सराय मां।।
ठाढ़े देख पुरू ला पाइस। हौहाँवत झट दौड़त आइस।।
हाथ-मूंह भउँ ला चमकावत। कहे लगिस लुगरा घिरलावत।।
हाय ! हाय ! का होगै तुहँला। बाय समागै कैसन तुहँला।।
रोज 2 जाके गुरू-द्वारा। धरम ल अपन बोर तूं डारा।।
जब बिहाव नइँ भये रहिस है। तूंहर कैसन प्रीत रहिस है !!
कुँअर कन्हैया बन के आवा। हँस 2 के मोला ललचावा।।
आगू तो मोला देखे बिन। बीते जुग 2 साही छिन छिन।।
जबले मिल गै ओ लमगोड़ी। मोर मोल होगै दू कौड़ी।।
मया-दया भुरिया के सरगै। सबो प्रीत आगी मां जरगै।।
दोहा – बपुरा बिन्द्रा ला कभू देखे नहीं रहीस।
बात ल सुन के अकबका ओहर निँचट गईस।।
चौपाई
कहिस बिचारा लछिमी, सुनला। थोरको नइँचीन्हतहौं तुँहला।।
बात कहे हावा तूं काकां नइँ समझेवँ कुद काँचा-पाका।।
ऐसन ओकर बात ल सुन के। कहे लगिस बिन्द्र हर गुन के।।
मेर भाग फुट गै हा ! दाई। अब तैं जुड़ा हई ! अन्यायी।।
न्इँ चीन्हें मोहूं ला इन तो। चाबे कोथे लागैं झिन तो !
कहिस नौकरन मन से ऐसन। अरे ! तुँमन ठाढ़े हा कैसन।।
ये आपन मालिक ला बैहा। ले जैहा की ठाढ़े रैहा।।
ओमन पुरू के पाँव ल परके। पाछू ओकर हाथल धर के।।
धरे हरू झन परै फफोला। कोरकिर 2 लेगै ओला।।
मालिक ला लेजावत देखिस। झुर्रू हर भितरीले निकरिस।।
ओला नौकर अपन जान के। बिन्द्रा कहिस भउँ ल तान के।।
तहूँ इहे हस ? हुँड़हुँड़-पीला। च लना तउँ खाबे मोर जीला।।
दोहा – बिन्द्रा घर मां पहुँच के परछी झार बटोर।
भात परोसिस कहिस अऊ खावा राजा मोर।।
आलु-डुबकी साग हर रहिसै मीठ अघात।
जनम के भुखमर्रा पुरू खाइस अड़बड़ भात।।
चौपाई
इन्द्रा नाँव पुरू के सारी। रहत रहिस बहिनी-घर क्वांरी।।
मुँड़ गड़ियाये खेतल अट्ठा। करे लगिस ओकर से ठठ्ठा।।
चोरिच के गुर भाथै तोला। निँचट अचंभा लगथै मोला।।
मेंछो ला चाबै नइँ चांटो। धन 2 धन गा तोला भांटो।।
घोड़ी छाँद बड़े झुर्रू हर। गइस बजार लिये बर माखुर।।
मिलगै ऊहां ला पुर्रू हर। मालिक आय असल जो ओकर।।
घर के द्वार म दुन्नों आइन। अउ भीतर मां जाये लागिन।।
द्वारम लेहे लौठी भारी। एक सिपाही गंगापारी।।
बड़े 2 मेंछा ला ऐंठे। चीलम पियत रहिस है बैठे।।
दू दिन आये भये रहिस है। उनला बने चिन्हत नइँ रहिसै।।
दोहा – रोक के रसता ला कहिस उन ला दूसर जान।
मालिक रोटी खात हें अबै देब नहिँ जान।।
चौपाई
सुन ऐसन खुब अचरज करके। कहिस पुरू गुस्सा मां भरके।।
मालिक तो औं अरे ! महीं हर। कहाँ के मालिक आगै दूसर !
पुर्रू हर अतका कह पाइस। आगू बढ़े के डौल लगाइस।।
कहिस सिपाही नाँव के गंजन। देखौ लट्ठ खोपड़ा भंजन।।
बित्तउ भर भी बढ़े अगाड़ी। समुझौ पहुँची मौत तुम्हारी।।
अतका कह रिस मां भन्नाये। लौठी नींचट लगिस घुमाये।।
दोहा – गुस्सा मां नींचट भरे ओला जब देखीन।
सिरतो झन मारै समझ दुन्नों परा गईंन।।
चौपाई
नींचट सुन्ना ठौर म जाके। बड़े पुरू बोलिस खिसिया के।।
सुने आज रे झुर्रू तैंहर। डौकी है दोषी की मैंहर ?
मोला दूसर-संग भरमथै। अपन निंचट पतिबरता बनथै।।
आज भेद मिल गै पापिन के। बिखभरही कारी सांपिन के।।
कतको हरनी ऊपर कुदही। आखिर भुइयें मां पग धरही।।
काला आज खुसेरे हावै। लगा कपाट जेवाँवत हावे।।
अपन मुँह नइँ देखौं छुतही के। डाइन चंडालिन भुतही के।।
झुरू कहिस मोरो ला सूना। तूं कुच्छू ऊना नइँ तूना।।
क्ह देथा तूं तो भसरँग ले। झट आगी बर जाथै बँगले।।
दोहा – आज अवैया रहिन हैं मामा ससुर तुम्हार।
ओही आये होइहीं मन मां करा बिचार।।
चौपाई
ओ दिन आइस गंगापारी। ओला काकर हवै चिन्हारी।।
हावैं सतवंतीन मालकिन। नाहक गुस्सा-भरम करा झिन।।
पुरू कहिस भिथिया मां ओधे। चलरे ! तैंहर लागे बोधे।।
जा पूजा ! ओकरे मेर जीबे। दुनों गोड़ ला धो धो पीबे।।
मैं जाथौं सालिक भाई-घर। भूख म थर्रा गै है जीहर।।
ऐसन कड़ुवा बात सुनाके। रेंगिस पुरू अउ थोरक जाके।।
छींके लागिस ‘‘आः छू ! आः छू‘‘। रेंग के झुर्रू पाछू पाछू।।
क्हिस की हाहाक आवत हावौं। तूँहर पेट ल छूवत हावौं।।
ठठ्ठा जब ऐसन सुन पाइस। पुरू भुला दुख नींचट हाँसिस।।
दोहा – सालिक-घर बड़का पुरू नौकर-संग गईस।
भौजाई मेर नतैतिन खाये बर मांगीस।।
ओहर पानी हेर के देइस पिढ़ा मढ़ाय।
गोड़ धोय के पुरू हर जेंये लागिस जाय।।
औंहां-झौंहां प्रथम तो ओहर खुब खाईस।
धीरे 2 खात फिर ऐसन कहे लागीस।।
चौबोला
धन ! धन ! भौजी-रानी, तुँहला राँधे हावा ऐसन।
पांडोमन बर द्रुपदा जेवन रहिस बनावत जैसन।।
ये थारी हर सब कोती ले ऐसन निँचट सफा है।
जैसन भीतर अउ बाहिर ले मन हर तुहँर सफा है।।
तात बफात भात ले ऐसन सुगँध अघात उड़त है।
जैसन तूंहर निरमल जस हर जग मां बगर उड़त है।।
घारी-गोभी-कांदा-भांटा साग मीठ हैं ऐसन।
तूंहर बोली-ठोली भौजी मीइ लागथे जैसन।।
मिलवट दार चला-राहेर के बटुरा आऊ तिवरा।
तुँहर देह-साही दीखत है सुन्दर पिउँरा पिउँरा।।
धनिया-मिरचा लसुन-पुदेना डारे चुरपुर चटनी।
उँटनी भौजी, तुँहरे साही येहू है मनलुटनी।।
दीखथे ऐसन चेंच के भाजी मनराजी चुटपुटुवा।
दिखथै जैसनकरिया 2 भैया हर करलुठुवा।।
जरे बिजौरी अउ पापर मन दीखत हावैं ऐसन।
दिखथें कबरी जरे तेल मां तूंहर मौसी जैसन।।
दोहा – आऊ थोरक खायके सबो भूख ला खोय।
भौजी मेर कहे लगिस धो मुँह-हाथ अँचोय।।
नींचट अच्छा रांधथा लेइहा मोरो नाम।
सँकरी सोन के देइहौं संझा आज इनाम।।
चौपाई
छोटे पुरू-झुरू मन खाके। बैठ गइन कुरिया मा जाके।।
साम्हूं जा पुर्रू ल सुनाके। बिन्द्रा कहिस निँचट झन्ना के।।
अब जादा मुँड़ मां झन मूता। दसा दिहे हौं जाके सूता।।
चल देइस अतका कह ओ जब। कहिस पुरू हर झुर्रू से तब।।
भाई झुर्रू बता तो तैंहर। सपना अै की काये येहर ?
जहाँ ले सुरता हावै मोला। किरिया खाके कहथौं तोला।।
दोहा – मैं हर करें बिहाव नइँ कोन्नो डौकी संग।
फेर आगइस कहाँ ले ये अड़बड़ परसंग !
ये डौकी, डौकाथे मोला डौका जान।
टूरी हर भांटो कथे, कहाँ हवस भगवान !
सूत भुलाये मां कभू होये होय बिहाव।
तेला नइँ जानौं बबा ! तोर लँग कौन दुराव।।
चौपाई
ऐसन सुन झुर्रू हर बोलिस। तुहँर बिहाव भये जो होतिस।।
ते पागा बांधे मनहरिया। बन के सुघर अघात बरतिया।।
तुँहर बिहाव म मैं नइँ जातेवँ। अउ लडुवा-पपची नइँ खातेवँ।।
रब्बस रब्बस खावत लडुवा। डौकिन के नइँ बनातेवँ भड़ुवा।।
पुरू कहिस आँखी ला फरिया। कुच्छू हवै दार मां करिया।।
ये डौकी ला लागै आगी। चले भाई ! इहाँ ले भागी।।
अतका कह के ओमन ऊहाँ। देखे लागिन ईहाँ ऊहाँ।।
भागे लाइक मोरी देखिन। पारी 2 मूंड़ खुसेरिन।।
निकर के हपटत गीरत भागिन। जल्दी जा बजार मां पहुँचिन।।
दोहा – उहाँ ल उनला गोरिया एक सुनार मिलीस।
ओहू जान बड़े पुरू ओला कहे लगीस।।
चौपाई
ओ दिन तूंहीकहे रहे हा। की दू सँकरी बनवा देहा।।
बाबू मन से बनवा तेला। ले लाने हौं येला लेला।।
कहिस पुरू कहथस का तैंहर। चिन्हते नइयौं तोला मैं हर।।
सँकरी बर मैं कहे रहें कब ? गजब रीत है ईहाँ के सब !
बोलिस ओ हँस खुलखुल खुलखुल। पेट हलावत थुलथुल थुलथुल।।
काबर चिन्हिहौं रथौं सरग मां। अउ तूं बस था देस अरब मां।।
ले लेवा झट के तूं सँकरी। पाछू लेनइँ पाहौं मछरी।।
दोहा – नइलौं नइलौं पुरू हर कतको बेर कहीस।
सँकरी जबरन हाथ मां देके चल देईस।।
ऐसन ढँग ला देख के पुर्रू गै घबराय।
नौकर मेर कहे लगिस कान म मुँह ल लगाय।।
चलरे ! ईहाँ ले अभिचजाई हमन पराय।
लान कँवरियाखोज के काँवर सिँका धराय।।
अजगुतइहाँ के हाल है देख प्रान घबराय।
टोनही मन मे सहर ला देये हवैं सिहाय।।
चौपाई
सँकरी देइस जे सुनार हर। रिनियाँ रहिस काकरो तेहर।।
पुलिस-सिपाही बलवा लेइस।ओहर ओला बँधवा लेइस।।
जब सुनार फांदा मो परगै। मछरी-बछरी सबो बिसरगै।।
रहिस सुनार जहल जब जावत। बड़े पुरू हर मिल गै आवत।।
कहिस जहल ले बहँचा लेवा। सँकरी के रूपिया ला देवा।।
पुरू कहिस सँकरी दे मोला। तब तो रूपिया देहौं तोला।।
ऐसन ओकर बात ला सुन के। मन मां निंचट अचम्भा गुन के।।
कहिस सुनार अभी तो देहेवँ। पुरू कहिस मैंहर नइँ पायेंव।।
बाते बात म बढ़िस कड़ाई। दुन्नों लागिन करे लराई।।
सोरठा – पुरू कहिस तोर बात ऐसन अड़बड़ है निंचट।
नइँ उपास नइँ धात लकर 2 फरहार बर।।
दोहा – रूपिया नइँ पाइस अपन ते खातिर खा खार।
लिहिस पकड़वा अपन सँग ओहू ला सोनार।।
चौपाई
दूनों जहल मां जात रहिन जब। छोटे झुरू ला देखिस पुरू तब।।
गये रहिस कँवरीहा खोझे। आत रहिस चुचुवाये सोझे।।
बड़े पुरू गुन बोलिस आतो। घर मां हमर दौड़ के जातो।।
हाल परानी मेर बताबे। जल्दी सौ रूपिया ले लाबे।।
नौकर घला खाय गै धोका। अपने मालिक जानिस ओका।।
सन्न हो गइस देख बँधाये। कहिस मने मन अचरज छाये।।
कब ये मुँड़ मां मौर बँधाइन। कब ले येहू डौकी पाइन।।
उहेँ ल भेजत हावैं का इन। जहाँ ल आलू-डुबकी खाइन।।
जहाँ बैठ के कुरिया-भीतर। रोइन नाक ल छींकर छींकर।।
कहथैं अब ऊहें जा तैंहर। इन ला का होगै परभेसर।।
ऐसन गुनत झुरू चल देइस। घर जाके रूपिया ले लेइस।।
दोहा – नौकर झुरू ल भेज के लाने बर बनिहार।
डरत 2 किंदरे लगिस छोटे पुरू बजार।।
चौपाई
धीरे धीरे सटका टेंकत। खाँसत हाँफत निहुँरे रेंगत।।
कानी भैरी देह के सुखरी। आइस एक पुरू मेर डोकरी।।
पूछिस तैं बाबू अस कागा ? आज निँचट बाँधे हस पागा !
जात रहें तोरेच मेर मैंहर। येही मेर मिल गये तैंहर।।
तोर बहुरिया मोर बहू मन। गींया बदबो कथैं दुनोंझन।।
हवैं डेरावत ओमन तोला। हुकुम का देवत हस मोला।।
कौवा गै पुर्रू सुन ऐसन। कहिस कि बुढ़िया कहथस केसन।।
पुर्रू कहिस बात अउरे कुछ। बुढ़िया समझ लिहिस अउरे कुछ।।
दोहा – टेढ़वा देखत एके ठन आँखि ल निँचट बटेर।
टेंटा ला लिब 2 करत बोलिस पुर्रू मेर।।
चौपाई
पूछे हस तैंहर का बदहीं ? सुन बेटा ! तुलसी दल बदहीं।।
पुरू कहिस आफत के पुड़िया। कहाँ ले आगै इहाँ ल बुढ़िया।।
रकस 2 मुँड़ ला खजुवावत। बोलिस बुढ़ियादेह डोलावत।।
हाहो लुगरा-नरियर ओमन। बिसा लिहे हैं चिन्ता कर झन।।
कहिस गुसा मां भर पुरू हर। अरे परेतिन बुढ़िया तैं मर।।
बुढ़िया बोलिस तैं का कहथस। घर के मोर साग ला पुछथस ?
बने रहिस बरबटी मसलहा। अउ सेमी-भांटा तेलपरहा।।
दोहा – समझ के ओला टोनही मन मां अपन डराय।
ओकर मेर ले पुरू हर दुरिहा गइस पराय।।
चौपाई
कहाँ ले आके झट्ट उहों ला। छेंकिस एक कोसटिन मोला।।
बड़े पुरू ला रँग के पिउँरा। देहे रहिस पोतिया लुगरा।।
ओला बड़का पुर्रू जानिस। दाम के रूपिया मांगे लागिस।।
देख के ओला धामर धूसर। समझिस पुरू टोनहीं दूसर।।
कहिके आऊ आइस ! आइस !। हाय ! बाप ! कह उहों ले भागिस।।
कोस्टिन जब रूपिया नइँ पाइस। अड़बड़ गारी देहे लागिस।।
चमकुल मुलमुलही अउ फुलही। पहिर पोतिया येकर दुलही।।
सारी-परछी-खोल म बुलही। ये भड़ुवा के छाती फुलही।।
रूपिया मांगे लगें भगाइस। हाय ! मोर कुरिया जोर गाइस।।
चौबोला
मिलिस एक झन खोरवा नाऊ बड़ गोटकार रसीला।
हाँसत पूछिस कब ले होहीमालिक बाबू पीला।।
मोर नवाइँन दुन्नों झनमनलीला अउ कौंसीला।
पुछथैं कब ले लुगरा पाबो खाबो रोटी-चीला।।
मिलिस एक झन राउत आढ़े कमरा, पीयत चोंगी।
कहिस चला घर रौताइन ला भूत धरे है ढोंगी।।
देथे छोंड़ फेर धर लेथे खिसिया गइन झरैया।
मोला तुहँरे बांधेबर है बैला-बछरू-गैया।।
दोहा – येती ओती टरक के धुकधुकी ला थाम।
पिंड दँड़ाइस सबो ले पुर्रू हर जप राम।।
कहिस मने मन अभी ले आइस नइँ बनिहार।
टोनहां-टोनहीं सबोच हैं इहाँ के नर अउ नार।।
चौपाई
ओही बखत झुरू हर आइस। रूपिया के थैली ल धराइस।।
पूछे लागिस ओहर ऐसे। छूटा तूं थाना ले कैसे ?
ये रूपिया मन ला बिन्द्रा हर। भेजे है लागा छूटे बर।।
जहल म जात रहिस पुरू बड़का। पकड़े गये रहिस नइँ छोटका।।
येकरे खातिर अचरज मां भर। लागिस मन मां कहे पुरू हर।।
थाना कब मैं गयें अभी कन। नांच नचाइन हां टुनहीं मन।।
अभिच कहाँ ले लागा होगै। ये बूजाहर बैहा होगै।।
दोहा – गुन है इहाँ के पवन मां देथे झट बैहाय।
नइँ तो काबर झुरू हर बैहा होतिस हाय।।
देवी दाई कहाँ हस ? मौंहू झन बैहावँ।
देहौं जांवर बोकरा पहुँच के दूसर गाँव।।
अपन द्वार मां एक झन डौकी खड़े रहीस।
हाथ के चूरी मां अपन देखत मुँह ल रहीस।।
पढ़त हनूमत चालिसा पुर्रू चले लगीस।
ओ डौकी-नजदीक मां सँकरी धर पहुँचीस।।
चौबोला
डौकी रहिस कछौरा भीरे पहिरे लाली लुगरा।
सोने सोन के गहना लादे करे रहिस मुँड़ दघरा।।
छेख पुरू ला छोर कछौरा जल्दी मुँड़ ला तोपिस।
म्ुसकावत आँखी ल नचावत लुगरा झारत बोलिस।।
अहो दुलरूवा देवर बाबु, अभी कहाँ जावत हा ?
हां हां, जानेवँ, मोला सँकरी देहेबर आवत हा !
चारेच तोरा के बनवाया ठग्गू हौजी हौजी !
कहाँ छोटकन सँकरि कहाँ, अउ तूँहर रानी भौजी !
जबरन भौजी बनवैया के मुँह ले सुन के ऐसन।
कहिस लजाय पुरू ‘मोला तूं ठठ्ठा करथा कैसन !‘
ओहर बोलिस देख लजावत, अहो ! नवा लजकुरहा।
अतके सुन चेथी कौवागै अउ है उरहा-धुरहा !
भौजी औं की हँसी-खेल है पिया नून अउ मठ्ठा।।
तुँहला खोले खोल रेंगैहौं बोहा के जंगी गठ्ठा।।
तुँहर परानी दिलजानीला हमर देवरानीला।
खवा के चीला धान कुटाहौं पिया 2 पानी ला।।
आज मँझनियां बेर हमर घर आके जब तूं खाया।
मोर रँधाई तुंहला भाइस साग ल खूब सिहाया।।
कोरा मां ले नोनी ला मोर अपन भतीजिन छोकरी।
कहे रहा इनाम देहे बर साँझ ले सोन के सँकरी।।
धरे हवा, देवा खीसा मां काबर अभी लुकाया ?
जब छूरा के डरेच रहिस तौ काबर मूंड़ मुंड़ाया ?
जाथौं काम कुछू मैं करिहौं हँसी निं भावै मोला।
धोकर 2 पाँव ल परके तूंहिँच देहा मोला।।
दोहा – अतका सुन के पुरू हर घबरा निँचट गईस।
चिल्ला के खुब जोर से ओकर मेर कहीस।।
निकरिस येहू टोनहीं अरे बाप ! रे बाप !!
बोल लबारी मूंड़ मां कुछू देय झन थाप।।
कस ओ ! घर मां तोर कब मैंहर खायें भात ?
कब सँकरी देहौं कहें ? लबरी हवस अघात ?
अनचिन्हार हन दुनोंझन यही ल कहथें राम ।
जान नहीं पहिचान नहीं मुन्नू मियाँ सलाम !
चौपाई
अतका सुन के ओ बपुरी हर। सन्न होय के गै घर भीतर।।
उँचकुल के बेटी अै भोरी। नाता जान के करिस ठिठोरी।।
गुनिस कि इनला होगै काये। इन बैहा होगै हैं काये।।
अैसन मन मां गून गुना के। कहे लगिस ब्रिन्द्रा मेर जाके।।
होगै हाय ! गजब देवरानी। बया गइँन देवर धुरधानी।।
उनला लान बैद बलवावा। कुछू दवा-दारू करवावा।।
ओही बखत हतकड़ी पहिरै। आइस बड़े पुरू घर-भितरे।।
रहिस मँगाये ओहर रूपिया। घर ले ज बनइँ आइस रूपिया।।
तब थाना के इस्पेट्टर हर। भेजिस पुरूला रूपिया बर घर।।
कहिस कि जा यपिया दे देबें। अउ हतकड़ी ल कटवा लेबे।।
रहिन संग मां चार सिपाही। किरिच खोंच पहिरे बरदाही।।
छोटे झुरू-हाथ बिन्द्रा हर। अपन पती ला छुँड़वाये बर।।
थैली मां सौ रूपिया भेजिस। बड़का पुरू मेर नइँ पहुँचिस।।
छोटे झुरू भेद नइँ समझिस। जा छोटे पुरू ला दे देइस।।
घर जा बड़े पुरू गुस्सा कर। कहिस अरे पापिन, तैं काबर।।
घर-कपाट दे दिहे रहे तैं। काला आज जेंवात रहे तैं।।
मूंड़ मुड़ाय चढ़ा गदहा मां। रहि जा किँदरै हौं रस्ता मां।।
नौकर ला भेजें रूपिया बर। रूपिया तैं नइँ देहे काबर ?
चौबोला
मन मां बिन्द्रा गुने लगिस मैं पर ला कहाँ बलायें !
अत्तिस-सालन बत्तिस भोजन इनहीं ला तो जेवायें।।
फेर ये कैसे बकरत हावैं सिरतो कहिंन जेठानी !
नींचट होगैं बैहा दाई जरै मोर जिँदगानी।।
देय सिपाही मन ला रूपिया पति ला छुँड़वा लेइस।
फेर अपन सब झन नौकर ला ऐसन हूकुम देइस।।
तूँ मन जबरन बाँध के इनला भर दा अँधियारी मां।।
मैं हर जाथौं बैद बलाये हवै अपन बारी मां।।
नौकर बाँधे लागिन जबरन हाथ-गोड़ ला धर के।।
देह छँड़ावै गारी दैवै पुरू गुसा कर कर के।।
कहे लगिस मैं नइँ बैहा मोला झन बाँधा रे।।
लमचोंची हरामजादी ओ बेंदरी ला बाँधा रे।।
बैहा जान के बात ल ओकर कोन्नों मन नइँ सुनैं।।
जतके 2 ओ गुस्सावै ततके बैहा गूनैं।।
झुरू घला ला समझ के बैहा दुनों ल धाँधिन झटके।।
चौपाई
बिन्द्रा बेद ले आत रहिस जब। एक झन नौकर आय कहिस तब।।
अभी देख के मैं कौवा गैं। छुट के दुन्नों झनमन आगैं।।
बनियापारा बूलत हावैं। हाथी साही झूमत हावैं।।
लगत हवै डर अड़बड मोला। चाबैं कोथैं झन कोनोंला।।
बिन्द्रा ऐसन सुन कौवा गै। बपुरी हर दुख मां थररागै।।
दूसर मनखेमन ल युना के। कहे लगिस लकठा जा 2 के।।
दौंड़ा रे भई ! दुख के साथी। फेर ढिलागै बैहा हाथी।।
ठुला गइन मनखे दस बारा। दौंड़े लागिन ओमन झारा।।
दोहा – येती-ओती दौड़ के खोजे सबो लगीन।
उहिदे मंदिर मेर मां ठाढ़े हवैं कहींन।।
चौपाई
बड़का पुरू-झुरू रहिन बँधाये। अँधियारी मां रहिन धँधाये।।
ओमन जिनला उहाँ निहारिन। बड़का पुरू-झुरू अैं जानिन।।
बड़े पुरू-झुरू नोहै ओमन। छोटे पुरू-झुरू अैं ओमन।।
देख हाल ऊहाँ के ओमन। करत अचंभा रहिन मने मन।।
बोझा के अंताज मढ़ावत। रहिन भगे के डौल लगावत।।
ओमन इन दुन्नोंल धरे बर। दाँत चाब के दौड़िन सर सर।।
झुरू देख ओमन ला पाइस। मालिक मेर कहे अस लागिस।।
ज्ेकर घर डुबकी खाये हन। दुख देई ओही नँगनाचन।।
कमरू-कामँछा के डउकी। आगय फिर मोहे बर गउकी।।
इही इहाँ के मुखियाइन अै। टोनहीँ मन के गुरवाइन अै।।
दोहा – मंदिर-भीतर जाइके झटले लुका गईन।
उहें रहिस है महंतिन तेकर मेर कहीन।।
अओ महंतिन, परत हन हम दुन्नों झन पाँय।
धरवैया मन ले आओ ! हम ला ले बहँचाय।।
चौबोला
मंदिर के साम्हूँ मां अड़बड़ हल्ला होये लागिस।
करके बंद कपाट पुजेरिन झट बाहिर मां आइस।।
बिन्द्रा कहिस कि तोला देहौं खोवा-खांड़-मिठाई।
दे निकार बैहा भतार ला अओ पुजेरिन दाई।।
पूछे लागिस भेद लेय के ओ भक्तिन हर ऐसे।
नोनी, बता तोर घर केहर बैहा होगै कैसे ?
सब धन चोरी होय गइस की ? मरगैं कोनों येकर ?
की ककरो सँग हवै भुलाये कस ओ बेटी, येहर ?
बिन्द्रा हाथ हलावत मटकत कहिस कहे तैं ठौका !
चार बरिस दू महिना होगै हाव पर-संग डौका।।
जेतर-मंतर जानत हसतो मैं पाँ परौं सिखादे।
सुख पाये के मोर बनौकी दाई, कुछू बनादे।।
चौपाई
पुर्रू ककरो तीन-पाँच मां। नहीं रहै नित रहै साँच मां।।
अपने रस्ता आवै-जावै। कभू धरम ला नहीं डिगावै।।
डौकी मन ला देख पराई। समझै बेटी बहिनी दाई।।
क्बले रहै घरे मां खुसरे। बाहिर जावै बूले-किँदरे।।
अतके खातिर जरा के चोला। बिन्द्रा भरमै पर-संग ओला।।
किँदर-घूम जब घर मां आवै। बिन्द्रा चिर्र चिर्र चिर्रावै।।
भरमेभरम के गोइ निकारै। गारी के आरती उतारै।।
सुन गारी चेथी झन्नावै। बपुरा घर ले फेर परावै।।
दोहा – भक्तिन बिन्द्रा ला निँचट चिड़चिड़ही समझीस।
गूनिस इही सुभाव मां लैका बया गईस।।
चौबोला
पूछिस भक्तिन भेद लिये बर तैं कुछ अकिल लगाते।
करके रोज लराई नोनी ओला नइँ समझाते ?
बिन्द्रा कहिस भऊँला चमका अओ पुजेरिन दाई।
गउ की कहथौं मैं इनकर से रोजे करौं लराई।।
खात उठत बैठत मां जब 2 मैंहर औसर पावों।
गारी दे 2 के मैं इनला रोज 2 समझावौं।।
जब ये सूते लागैं मैंहर इनला सुतन निँ देवौं।
करौं लराई खातो खानी खान घला नइँ देवों।।
कहिस पुजेरिन, मर ! हत्यारिन, मुँह मां आगी लागै।
रोज 2 के काँव काँव मां बपुरा हर बैहागै।।
होथै चिड़चिड़ही डौकीके गारी बिखहर ऐसन।
बैही कुतिया के दाँतों मां बीख रहै नइँ जैसन।।
चल ! किटकिटही तोर हाथ मां नइँ दौं येला मैंहर।
दू दिन मां अल्हरा कल्हरा के मार डारवे तैंहर।।
हाथ देख के जूड़ 2 में येला दवा खवाहौं।
हो ही दया नरायन के तौ जल्दी बने कराहों।।
दोहा – अैसन बोल कपाट मां तारा करके बंद।
गइस पुजेरिन अपन घर मन मां होत अनंद।।
चौपाई
दिन गै बीत सांझ हो आइस। भोला रूपिया नहीं पटाइस।।
आठ सिपाही मन ओला धर। ले गईन फांसी देहे बर।।
लकठेच मां मंदिर के सुन्दर। बने रहिस फांसी के घर हर।।
गुदुम 2 बजवावत बाजा। आइस हाथी मां चढ़ राजा।।
फांसी ला देखे के खातिर। खूबिच मनखे जुरिन तिरे तिर।।
राजा के मन दया समाइस। डौँड़ी पिटवा के कहवाइस।।
दयावान कोनों मनखे हर। ये बुढ़ुवा ला छँड़वाये बर।।
मोर मेर रूपिया गन देवै। जग मां अपन नाँव कर लेवै।।
देतिस उहाँ ल कौन रूपैया। रहिन तमासा सबो देखैया।।
चौपाई
अतके मां ओ पुरू-झुरू मन। घर मां रहिन बँधाये जेमन।।
नौकर मन ला लालच देके। आइन राजा मेर जी लेके।।
पुरू कहिस अरजी सुन लेवा। महराजा नियाव कर देवा।।
मोर जीवलेई डौकी हर। रिछिनी साही सुभाव है जेकर।।
झुर्रू नौकर ला अउ मोला। बैहा जान के निंचट दुनोंला।।
जबरन डोरी मां बँधवाइस। सोज्झे बर दुर्गत करवाइस।।
फोकटे फोकट बर चिचियाथै। बया गये के दोष लगाथै।।
मैं हौं चंगा नींचट ऐसन। रथें निरोगि ल मनखे जैसन।।
जो मैं हो हौं कहत लबारी। बैद बला देखवा ला नारी।।
बड़का पुरू-झुरू दुन्नों ला। येकटक देखे लागिस भोला।।
समझिस छोटे पुरू-झुरू अैं। ये दुन्नों छोटका बाबू अैं।।
भाई-दाई ला खोजे बर। गये रहिन बपुरा मन नींकर।।
खुब दिन मां देखत हौं इनला। भेंटिन की नइँ भेटिन उनला।।
मोर हाल जब ये सुन लेहीं। तो रूपिया गन छँड़वा लेहीं।।
ऐसन गुन लकठा मां जाके। कहे लगिस आँसू चुचुवाके।।
इहाँ तुँमन कब आया बेटा। साहुन-भाई मन ला भेंटा ?।।
ऐसन सुन गुसियाये मने मन। टेढ़वा मुँह कर लेइन ओमन।।
देख हाल ओमन के ऐसन। कहे लगिस भोला हर ऐसन।।
ये मन कैसन होगे लेड़गा। काबर कर लेथें मुँह टेड़गा।।
पाँओं घला परैं नइँ काबर। बतरावत हावैं नइँ काबर।।
बेटा, का होगै रे तोला ? नइँ चीन्हस तैं अपना ददोला।।
अतका सुन पुर्रू कौवा के। कहे लगिस नींचट खिसिया के।।
दोहा – बुड़गा, कैसन बकत हस निँचट अनाप-सनाप।
चिन्हौं निं जानौं अउ नहीं कैसे के अस बाप।।
ये मन जब लैका रहिन तबे बेचाय गईन।
येकरे खातिर बाप लाये मन नइँ चीन्हींन।।
चौपाई
भोला के मन मां दुख छागै। कहिस कि कलऊ निँचट खरागै।।
जेकर पैर निँ फटिस बिमाई। ओ का जानै पीर पराई।।
बिपत ल मोर देख आंखी भर। लाज के मारे ये मूरख हर।।
देखत बटबट कहथै अटपट। मोर बाप तें नोहस चल हट !!
मनखे ला बिपदा जब आथै। तब अपनो दूसर हो जाथै।।
ओही बखत पुजेरिन आइस। छोटे पुरू-झुरू ला सँग लाइस।।
अब तो उहाँ ल दूझन पुर्रू। आऊ होगैं दूझन झुर्रू !
दू मुहरन के देख दुदू झन। निँचट अकबका गइन सबो झन।।
दोहा – बिन्द्रा कौवा गइस जब दू डौका देखीस।
तरी मूँड़ करके लजा मन मां कहे लगीस।।
चौपाई
धरती अभी फटजा जा तैंहर। समा झट्ठ ले जावौं मैंहर।।
दई, तोर जौंहर हो जावै। तोला भैंसासुर हर खावै !
दू डौका मोर होगै दाई !। होगै नींचट मोर हँसाई।।
एक्के साही गोरिया गोरिया। कहाँ ले आगैं इहाँ ल छलिया।।
एक्क साही हवें मेंछर्रा। दुन्नों हावैं कर्रा कर्रा !
स्मझ सकौं मैंहर नइँ ठौका। काला कहौं अपन मैं डौका !
एक रूप-रँग एक्के मुहरन देख पुरू-झुर्रू दू दू झन।।
समझ गइस राजा हर झटकन। ये दू जोड़ी चारों झन मन।।
बेटा-नौकर अैं भोला के। भाग जाग गैअब बपुरा के।।
दोहा – बाप ल लेइस चीन्ह झट छोटे पुरू घलाय।
करिस बाप के पैलगी गोड़म मूँड़ मढ़ाय।।
दोहा – राजा ला ओ मेर जब बिन्द्रा हर देखीस।
गिर के डंडा सरन तब बिनती करे लगीस।।
राजा-महराजा सुना कहथवँ हाथ ल जोर।
बया गये हावैं निंचट घर-गोसैयाँ मोर।।
उनला मँदिर म धाँध के भक्तिन गइस पराय।
तिरिन चाब के कहत हौं तूं देवा निकराय।।
अतका सुनराजा कहिस चपरासी ल सुनाय।
घर मां हावै महंतिन झटके लान बलाय।।
चौपाई
जनम-दुखी बुढ़वा भोला ला। चार पुरू-झुरूये पाँचो ला।।
आँखी ला अराम देहे बिन। ऐसन देखे लगिन पुजेरिन।।
पुन्नी के चंदा ला लकलक। देकथे चकही जैसन येकटक।।
परिस पाँव मां झट भोला के। ऐसे कहे लगिस घिघियाके।।
तुहीं मोर धन अउ कौड़ी औ। तुहीं मोर जाँवर-जोड़ी औ।।
हमर-तुम्हर ये मन अैं बेटवा ! करिस दया दइ देइस भेंटवा।।
ऐसन कह सुन हो खुब पुलकित। होय गइन दुन्नों झन मुरछित।।
मन मां खूबखुसी जब होथे। तब के हाल ऐसन होथे।।
बड़का पुरू-झुरूमन ला धर। केवट जब लेगैं बेंचे बर।।
तब रोवत 2 भर दुख मां। आय गइस साहुन हरिपुर मां।।
तब मुखिया 2 मनखे मन। उहें के रहवैया अैं जेमन।।
बने चाल ओकर जब देखिन। ओला देइन बना पुजेरिन।।
दोहा – मुरछा ले झट जाग के दुन्नों पुरू ल पोटार।।
फलप 2 के रोये लगिस साहुन हर बम्फार।।
चौबोला
मोर कन्हैया ! अउ बलदाऊ ! मोर राम ! अउ लछिमन !
मोर अभगिन के मुंह पोंछन ! मोर परान-रतन-धन।।
मोर लवाई आवा बछुरा ! चाट देह ला झारौं।
उर मां मसक कसक लाजी के मैंहर अपन निकारौं।।
अँधरी के मोर लाटी-बिड़गा, मोर कहैया दाई।
मोर पढ़ैया मैना सूवा, दुख के मोर दवाई।।
मोर गरीबिन के ओंटी के रोटी-मुर्रा-लाई।
मोर अधीनिन भुखमरहिन के मेवा अउर मिठाई।।
कतको सहर गाँव अउ जंगल, परबत डाँकत डूंकत।
काँटा-गोटी गड़त सहत दुख मनखे मन ला पूछत।।
गाय के साही मैं बोंबियावत गुनें निं अहिरा-बिछुरा।
येती-ओती चारों कोती खोजें तुहँला बछुरा।।
तुंहर दुख मां रो 2 बेटा फुटगै रे मोर आंखी।
आँसू पोंछत नई सुखाइस भैगै जीव असाखी।।
जर 2 होगै निँचट सुखागै मोर मुरही के चोला।
कहाँ प्रान हर रहिस लुकाये यही अचंभा मोला !
मोर खिलौना जौंरा-भौंरा ! तूंहीं घोड़ा-हाथी।
तुंहीं दुवे झन हावा साथी पुरखा मन के थाथी।।
उजरे घर के मोर बसैया, कुल के दू ठन दीया।
जाँवर-जीया जुग 2 जीया दूध-बतासा पीया।।
कुर्री के साही रोवाई सुन दुखिया साहुन के।
आँखी ले आँसू चुचुवागै अैर-गैर सब झन के।।
राजो रोये लागिस मुँह मां लाल रूमाल छबक के।
काला नइँ पिघलाय रोवाई जग मां डौकी मन के ?
राजा हर बिरदांत्त ल अैसन देख मने मन गल गं।
ओकर मन के सब बिचार हर छिन मां एक बदल गै।।
कहिस इसारा मां भोला ला लकठा अपन बला के।
देहें छोंड़ अगा भोला ! मैं तोला बिन रूपिया के।।
राजा के दया ला अैसन देख सबो मनखे मन।
उज्जर, लाल फूल बरसा के कहिन सबो झन धन ! धन !!
भोला मन राजा ला झुक 2 खूब पैलगी कर कर।
मन मां होत अनंदित नींचट गइँन बड़े पुर्रू-घर।।
बिद्रा सास के सीखापन ला गांठ बाँध धर लेइस।
पति बर भरम रहिस जो राखत ते सबला तज देइस।।
बड़े पुरू हर सुख पा मन मां, नींचट बने लगन मां।
भाई के बिहाव कर देइस इन्द्रासारी -सँग मां।।
दुख ला सबो भुला आगू के खूब खुसी हो मन मां।
रहे लगिन भोला साहुन मन बेटा-पतो सँग मां।।
फिरिस सिरी भगवान-दया से दिन हर जैसन इनकर।
अगा पढ़ैया ! फिरै तैसन सब्बो झन के दिन हर।।
रहिन हवैं पुरू-झुरू मन एक्के साही दू दू भैया।
मनखे मन ला होये लागिस आऊ भूलभुलैया !
एक पुरू अउ एक झुरू ला दूसर पुरू, झुरू जानैं।
भेद खुलै ला घोलँड 2 के हँस 2 कपड़ा सानैं।।
चौपाई
हाँसत 2 बीन बजावत। नारद रिखि भगवत-गुन गावत।।
पुर बैकुंठ गइँन ओही दिन। भेंटिस भोला सब ला जे दिन।।
जहाँ रहिन लछिमी-नारायन। बैठे रहिन देवता सब झन।।
जब भगवान मुनी ला देखिन। उनकर से तब ऐसन पूछिन।।
मुनि कोती लै आवत हावा। काबर मुँच 2 हाँसत हावा।।
परथम हरि के पाँव म परके। कहे लगिन नारद बल करके।।
का गुठियावौं अंतर जामी। तूं सब जानत हावा स्वामी।।
मरत लोक मां अड़बड़ सुंदर। सहर एक है नाँव के हरिपुर।।
उहें आज मैं जाय गुसैयां। देखेवँ अड़बड़ भूलभुलैयाँ !!
अतका कह के नारद झुल झुल। हाँसे लागिन खुल 2 खुल 2।।
दोहा – पुरू-झुरू के हाल जब देइन मुनी सुनाय।
हँसे लगिन सब देवता नींचट खल खलाय।।
चौबोला
जब गनेश जी हाँसे लागिन थाम 2 के स्वांसा।
तब तो माच गईस उहाँ ला अड़बड़ एक तमासा।।
समझ बिलाई के ‘म्याऊं ! म्याऊं !‘ मुसुवा उँकर हँसी ला।
डर के मारे भागे लागिस पीठ म बोहे उनला।।
अगिन देवता हाँसे लागिन होके निंचट बिहाला।
निकरे लागिसउनकर मुँहले तब अगिनी के ज्वाला।।
येती-ओती सब्बो कोती आगी खूबिच बर गैं।
जरी-मूल ले जमराजा के डांढ़ी-मेंछा जरगैं।।
पवन देवता हाँसिन ऐसन तूँमन सबो सुना गा !
उँकर हँसी मां उड़ा 2 गै देवता मन के पागा।।
मेघ देवता हाँस 2 के जल बरसाये लागिन।
गइस बुझाआगी सब देवता ओमा तौंरे लागिन।।
ऐसन अड़बड़ महादेव जी हाँसिन, सुन के जेला।
डरा गइस अउ कूदे लागिस उनकर नँदिया बैला।।
डँकर हँसी के धक्का खाके हाथ के डमरू ऊहाँ।
डिमिक 2 डिम 2 डिम बाजे लागिस औहाँ झौँहा
हाँसत 2 कहिन नरायन ब्रह्मा जी से अैसन।
दू 2 मनखे एक्के मुहरन तूं सिरजाया कैसन।।
मनखे मन दुख पाबेच करथें गारी मिले हमन ला।
देखा, कैसे आज सरापिस बिन्द्रा हमला-तुहँला।।
ब्रह्मा कहिन लजावत हाँसत हे भगवान कहौं का !
बुढ़ा गयें मैं येकरे खातिर आइस अैसन मौका।।
एक्के पुर्रू एक्के झुर्रू रहें बनैया मैंहर।
फहम भुलागै तौ दू 2 झन गढ़ डारें झट मैंहर।।
सिरतो अै जब एक्के साही दू मनखे हो जाथैं।
होके नींचट भूलभुलैयाँ बपुरा मन दुख पाथैं।।
मनखे-गढ़त-बखत मां अब मैं सुरता नइँ बिसराहौं।
अब मैं आने 2 मुहरन मनखे मन ल बनाहौं।।

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प्रस्तुतकर्त्ता
प्रो. अश्विनी केशरवानी
‘‘राघव‘‘, डागा कालोनी
बरपाली चौंक, चांपा-495671 (36 गढ़)

पान के मेम

जान चिन्हार
सूत्रधार, दाई, बप्पा,बिरजू, चंपिया, मखनी फुआ, जंगी,जंगी के पतो, सुनरी, लरेना की बीबी
दिरिस्य: 1
बिरजू:- दाई, एकठन सक्करकांदा खान दे ना।
दाईः- एक दू थपड़ा मारथे- ले ले सक्कर कांदा अउ कतका लेबे।
बिरजू मार खाके अंगना मा ढुलगत हवय, सरीर भर हर धुर्रा ले सनात हवय।
दाईः- चंपिया के मुड़ी मा घलो चुड़ैल मंडरात हावय, आधा अंगना धूप रहत गे रिहिस, सहुआइन के दुकान छोवा गुर लाय बर, सो आभी ले नी लहुंॅटे हवय, दीया बाती के बेरा होगिस, आही तो आज लहुंॅट के फेर।
बागड़ बोकरा के देंहे मा कुकुरमाछी झूमत रहिन, एकरे सेती बिचारा बागड़ रह रहके ऐती ओती कूदत फांदत रिहिस, बिरजू के दाई बागड़ बर रीस खोज डारे रिहिस, पीछू के मिरचा के फूले गाछ, बागड़ के सिवाय अउ कोन खाय होही, बागड़ ला मारे बर वोहर माटी के छेाटे ढेला धरे रिहिस।
मखनी फुआ आथे
मखनी फुआ:- का बिरजू के दाई, नाचा देखे नी जास का?
दाईः- बिरजू के दाई के आघू नाथ अउ पीछू पगहिया रिहि तब न फुआ।
गरम रीस मा बुताय बात फुआ के देंहे मा गड़ गिस अउ बिरजू के दाई ढेला ला तीरेच मा फेंक दिस, बिरजू हर बागड़ ला सूते सूते एक डंडा मार दिस।
दाईः- रूक, तोर ददा हर तोला बड़ हथछुट्टा बना दिस हवय, बड़ हाथ चलात हस मनखेमन मा, रूक।
मखनी फुआः- पनिहारिन मन करा- थोरकुन देखा तो, इ बिरजू के दाई ला, चार मन पटवा के पैसा का होगिस हवय, भिंया मा पांव नी परत हवय, इनसाफ करा, खुदेच आपन मुंॅहू ले आठ दिन पहिली सबो गांव के अलीन गलीन मा कहत फिरत रिहिस, हांॅ इ दारी बिरजू के ददा किहिन हवय, बैलागाड़ी मा बैठाके बलरामपुर ला नाचा देखाय ले जाहूंॅ। बइला आपन घर मा हावय, ता हजार गाड़ी मंगनी मिल जाही। सो मैंहर आभी टोंक दें, नाचा देखोइया सबो औन पौन तियार होवत हवय, रसोई पानी करत हवय, मोर मुंॅहू मा आगि लगे, काबर मैंहर टोंके गे रहेंव, सुनत हौ, का जवाब दिस बिरजू के दाई हर, अर–र्रे हांॅ! बि र जू के मइया के आघू नाथ अउ पीछू पगहिया नी हो तब ना।
जंगी की पतोः- फुआ सरबे सित्तलमिंटी के हाकिम के बासा मा फूलछाप किनारीवाली साढ़ी पहन के यदि तहू भंटा के भंेट चढ़ाथे, ता तोरो नांव घलो दु तीन बीघा धनहर जमीन के परचा कट जाथिस, फेर तोरो घर मा आज दसमन सोनाबंग पटवा होथिस, जोड़ा बैला बिसाथा, फेर आघू नाथ अउ पीछू सौठन पगहिया झूलत रथिस।
सूत्रधार:- जंगी के पतो, मुंॅहजोर हवय, रेलवे टेसन के तीर के टुरी हवय, तीन महीना पहिली गौना के नवा बोहो होके आय हावय अउ सबो कुरमाटोली के रेंधिन सासमन ले एक आधा मोरचा ले चुकिस हवय, ओकर ससुर जंगी नामी दागी चोर हवय, सी किलासी हवय, ओकर डउका रंगी कुरमाटोली के नामी लठैत, एकरे सेती हमेसा सिंग खुजियात फिरत रइथे जंगी के पतो।
दाई:- अरे चंपिया ! आज लहुंॅटही ता मुंॅड़ी ला मुरकेट के आगि मा दे दिंहा, दिन रात बेचाल होवत जात हवय, गांव मा आप तो ठेठर बैसकोप के गीत गवोइया पतो सबो आय बर लागिन हवय, कहूंॅ बइठ के बाजे न मुरलिया सिखत होही ह-र-जा-ई-ई। अरी चंपि-या-या-या।
जंगी के पतोः- कन्हिया मा मटका धरथे- चला ददिया चला! इ मोहल्ला मा पान के मेम रइथे, नी जाने दुपहर दिन अउ चैपहर रतिहा बिजली के बत्ती भक भक के जरत हवय।
सबो हांॅसथे
मखनी फुआ:- सैतान के मोमादाई।
सूत्रधारः- बिरजू के दाई के आंॅखि मा मानो कोन्हों तेज टारच के रोसनी डार के चैंधिया दिस, भक भक बिजली बत्ती, तीन साल पहिली सरवे कैंप के पाछू गांव के जलनडाही मइलोग मन एकठन कहानी गढ़ के फैलाय रिहिन, चंपिया के दाई के अंगना मा रतिहा भर बिजली बत्ती भुक भुकात रहे, चंपिया के अंगना मा नाक वाले पनही के छाप, घोड़ा के टाप साही। दाईः- जला जला अउ जला, चंपिया के अंगना मा चांदी जइसने पटवा सूखात देखके जलोइया सबो कोठार मा सुतओइया मईलोगमन धान के बोझा ला देख के भांटा के भुरता हो जाहा।
चंपिया गुर ला चाटत आथे, दाई थपड़ा मारथे।
चंपिया:- मोला काबर मारत हस, सहुआइन जल्दी सौदा नी दे एंे ऐं ऐं।
दाई:- सहुआइन जल्दी सौदा नी दे के मोमादाई, एक सहुआइन के दुकान मा मोती झरत हवय, जो जेरी जमा के बइठे रेहे। बोल ढेंटू मा लात देके नेरवा टोड़ दिहांॅ हरजाई, जो कभू बाजे न मुरलिया गात सुने, चाल सीखे बर जात हावस, टेसन के छोकरी मन सो।
बिरजूः- ए मइया एक उंगली गुर दे ना, दे ना मइया एक रत्ती भर।
दाईः- एक रत्ती काबर, उठाके बरतन ला फेक आत हों पिछवाड़ा मा, जाके चाटबे, नी बनही गुरतुर रोटी, गुरतुर रोटी खाय के मन होवत हवय।
उसनाय सक्करकांदा के सूपा ला चंपिया के आघू मा राखत,
बइठ के नींछ, नी ता आभी।
चंपिया:- मनेमन- दाई गारी दिही, पांय पसार के बइठे हर बेलज्जो।
बिरजूः- दाई महू हर बइठ के सक्करकांदा नीछों।
दाई:- नीही, एकठन सक्करकांदा नीछबे अउ तीन ठन ला पेट मा, जाके सिद्धू के बोहो ला कह, एक घंटा बर कराही मांॅग के लेगे हे, फेर लहंुटाय के नाम नी लेत हे, जा जल्दी जा।
चंपिया दाई ले नजर बचाके एकठन सक्करकांदा बिरजू कोति फेंक देथे। बिरजू जाथे।
दाई:- सूरूज नारायन बूड़गिन, दीयाबाती के बेरा हो गिस। आभी ले गाड़ी–।
चंपिया:- कोयरीटोला के मन कोन्हों गाड़ी नी दिन मइया, बप्पा किहिस हे तोर दाई ला कइबे, सबो ठीक ठाक करके तियार रिही, मलदहिया टोली केे मियाजान के गाड़ी लाय बर जात हवौं।
दाई:- कोयरीटोला के मन कोन्हों गाड़ी मंगनी नी दिन, ता फेर मिलगिस गाड़ी, जब आपन गांव के मनखेमन के आंॅखि मा पानी नीए, मलदहिया टोली के मियाजान
के का भरोसा, ना तीन मा , ना तेरह मा, का होही सक्करकांदा नींछ के। राख दे उठाके, इ मरद नाचा दिखाही, बैलागाड़ी मा बइठा के नाचा देखाय ले जाही, बइठ गे बैलागाड़ी मा, देख दारें जी भर के नाचा, रेंगोइया मन पहुंॅचके जुन्ना होगिन होही।
बिरजू:- कराही ला मुड़ी मा राखत- देख दिदिया, मलेटरी टोपी, ऐमा दस लाठी मारे मा कुछू नी होय।
चंपियाः- चुप।
दाईः- बागड़ ला भगात- काल तोला पंचकौड़ी कसाई के हवाले करत हवौं राक्षस तोला, हर चीज मा मुंॅहू लगाही, चंपिया बांध दे बगड़ा ला। छोर दे ढेंटू के घंटी ला, हमेसा टुनुर टुनुर, मोला एको नी सुहाय।
बिरजूः- झुनुर झुनूर बइला मन के झुनकी, तैंहर सुने–।
चंपिया:- बागड़ के ढेंटू के झुनकी छोरत- बिरजू बक बक झन कर।
दाईः- चंपिया, डार दे चुल्हा मा पानी, बप्पा आही ता कइबे, आपन उड़नजहाज मा चेघके नाचा देखे जाय, मोला नाचा देखे के सौक नीए, मोला जगाहा झन कोन्हों, मोर माथा पीरात हे।
बिरजू:- का दीदी, नाचा मा उड़नजहाज घलो उढ़ियाही।
चंपिया:- इसारा करत- चुपेचाप रह, मुफत मा मार खाही बिचारा।
बिरजूः- चुपेचाप- हामन नाचा देखे नी जान। गांव मा एकोठन चिरई घलो नी ए, सबो चल दिन ना।
चंपिया:- पलक मा आंसू आत हे, एक महीना पहिली ले मइया कहत रिहिस, बलरामपुर के नाचा के दिन गुरतुर रोटी बनही, चंपिया छींट के साढ़ी पहनही, बिरजू पंेट पहनही, बैलागाड़ी मा चेघके–।
बिरजूः- गाछ के सबले पहिली भांटा, जिन बोबा, आप मा चढ़ाहा, जल्दी गाड़ी लेके भेज दिहा जिन बोबा।
दाईः- पहिली ले कोन्हों बात के मंसूबा नी बांधना चाही कोन्हों ला, भगवान मंसूबा ला टोड़ दिस, ओला अबले पहिली भगवान ले पूछे बर हवय, ये कोन बात के फल देत हावा भोलेबाबा, आपन जीयत ओ कोेन्हों देवी देवता पित्तर के बदना नी
बांचे हवय, सरवे के समे जमीन बर जतका बदना बदे रिहिस। ठीक ही तो, महाबीर के बदना बांचे हावय, हाय रे देव, भूल चुक माफ करा बाबा, बदना दुगुनी करके चढ़ाही बिरजू के दाई, चोरी चमारी करोइया के बेटी नी जरही, पांच बीघा जमीन का हासिल करे हवय बिरजू के बप्पा हर, गांव के भईखई मन के आंॅखि मा कचरा पर गिस हवय, खेत मा पटवा लगे देखके, गांव के मनखेमन के छाती फाटत हवय, भुंइया फोर के पटवा लगिस हवय, बैसाखी बादर साही घूमड़त आत हे पटवा के पौधामन, ता अलान ता फलान, अतकी आंॅखि के धार भला फसल सहही, जिहांॅ पंदरामन पटवा होय बर रिहिस, उहांॅ दसेमन होइस, फेर तोल मा ओजन होइस रबीभगत के इहांॅ, इमांॅ जरे के का बात हवय, बिरजू के बप्पा हर तो पहिली कुरमाटोली के एकेक मनखेमला समझा क केहे रिहिस, जिनगी भर मजूरी करत रह जाहा, सरवे के समे आत हे, सो गांव के कोन्हों पुतखौकी के भतार सरवे के समे बाबू साहेब के खिलाफ खांॅसीस नीही, बिरजू के बप्पा ला कम सहे बर पड़िस हावय, बाबू साहेब रीस मा सरकस नाचा के बघवा साही हुमड़त रह गिस। आखिर बाबू साहब आपन सबले छोटे लइका ला भेजिस, मोला मौसी कहके बोलाइस, ये जमीन ददा हर मोर नांव ले बिसाय रिहिस, मोर पढ़ाई लिखाई ओई जमीन ले चलथे, अउ घलो कतका बात, खूबेच मोहेबर जानथे ओतका बड़ लइका, जमींदार के बेटा हवय, — चंपिया बिरजू सूत गिस का? इहांॅ आ जा बिरजू अंदर, तहूंॅ घलो आ जा चंपिया, भला मइनसे आही तो इ दारी,
दुनों आथे
चिमनी बुता दे, बप्पा बोलाही ता झन सुनिहा, खपच्ची लगा दे, भला मइनसे रे भला मइनसे, मुंॅहू देखा थोरकुन इ मरद के, बिरजू के दाई दिन रात साथ नी देथीस ता ले चुकिस जमीन, रोज आके माथा धरके बइठ जांय, मोला जमीन नी लेबर हवय बिरजू के दाई, मजूरी हर बने हवय, छांॅड़ दो जब तोर करेजा हर थिर नी रिही, ता का होही, जोरू जमीन जोर के, नीही ता कौनहों अउर के, बिरजू के ददा ला बड़ तेज ले रीस चघथे, चघत जात हवय, बिरजू के दाई के भाग खराब हवय, जे इसने गोबर गनेस गोसान पांय, कोन सोख मौज दिस हवय ओकर मरद हर, घानी के बैला साही खटत सबो उमर काट दें इकर इहांॅ, कभू एक पैसा के जलेबी बिसाके दिस हवय ओकर डउका हर, पटवा के दाम भगत ले लेके, बाहिरेच बाहिर बइला बाजार चल दिन। बिरजू के दाई ला एको घा नमरी लोट देखे घलो नी दिस आंॅखि ला, बैला बिसा लानिस, ओइदिन गांव मा ढिंढोरा पीटे लागिस, बिरजू के दाई इ दारी बैलागाड़ी मा चेघके जाही नाचा देखेबर। दूसर के गाड़ी के भरोसा नाचा देखाही।
अपने आप ले
अहू खुद घलो कुछू कम नीए, ओकर जीभ मा आगि लगे, बैलागाड़ी मा चेघके नाचा देखे के लालसा कोन कुसमे मा ओकर मुंॅहंॅू ले निकले रिहिस, भगवान जाने, फेर आज सुबे ले दूपहर तक कोन्हो न कोन्हों बहाना अठारा घ बैलागाड़ी मा नाचा देखाय जांहा किहिस हावय, ले खूब देखा नाचा, वाह रे नाचा, कथरी के तरी दुसाला के सपना, काल बिहनिया पानी भरे बर जब जाही, पतली जीभ वाली पतोमन हांॅसत आही अउ हांॅसत जाहीं, सबो जरत हवे इकरले, हांॅ भगवान दाढ़ीजार घलो, दू लइका के महतारी होके जस के तस हवय, ओकर गोसान ओकरे बात मा रइथे, वो चुंदी मा गरी के तेल डारथे, ओकर आपन जमीन हवय, काकरो करा एक घूर जमीन नीए इ गांव मा, जरही नीही, तीन बीघा धान लगे हवय अगहनी, मनखेमन बिख देबर बांचे तब ता।
बाहिर मा बैलामन के घंटी के आवाज आइस।
आपनेच बैलामन के घंटी हवय, का रे चंपिया?
चंपिया अउ बिरजू:- हूंॅ उंॅ उंॅ।
दाईः- चुपा, फेर गाड़ी घलो हवय, घड़घड़ात हे न?
चंपिया अउ बिरजू:- हूंॅ उंॅ उंॅ।
दाई:- चुपा, गाड़ी नी ए, तैं कलेचुप देखके आ तो चंपिया, भाग के आ चुपंचाप।
चंपिया:- हांॅ मइया, गाड़ी घलो हावय।
बिरजू हड़बड़ात उठ बैठिस, दाई ओला सुतादिस, बोले मत कहके, चंपिया गोदरी तरी सूत गिस, बाहिर मा बैलागाड़ी ला ढिले के आवाज आइस।
बप्पाः- हांॅ हांॅ, आगेन घर, घर आय बर छाती फाटत रिहिस। चंपिया बैलामनला ला कांदी दे दे, चंपिया।
बिरजू पांच मिनट ले खांॅसत रइथे।
बिरजू, बेटा बिरजमोहन, मइया रीस के मारे सूत गिस का, अरे, आभी तो मइनसे मन जातेच हवे।
दाईः- मनेमन- नी देखन नाचा, लहुंॅटा देवा गाड़ी।
बप्पाः- चंपिया उठत काबर नीअस, ले धान के पंचसीस राख दे,
धान के बालीमन ला ओसारे मा राखथे
दीया बारा।
दाईः- डेढ़ पहर रात के गाड़ी लाय के का जरूरत रिहिस। नाचा तो आप खतम होत होही।
बप्पाः- नाचा आभी सुरू नी होय होही, आभी आभी बलरामपुर के बाबू के कंपनी गाड़ी मोहनपुर होटल बंगला ले, हाकिम साहेब ला ले बर गे हावय, इ साल के आखिरी नाचा हावय, पंचसीस मिंयार मा खोंच दे, हामर खेत के हावय।
दाईः- हामर खेत के हावय, पाकगिस ना धान।
बप्पाः- नीही, दस दिन मा अगहन चढ़त चढ़त लाल होके नय जाही, सबो खेत के बाली मन। मलदहिया टोली मा जात रेंहे, हामर खेत के धान देखके आंॅखि जुरा गिस, सच कहत हों, पंचसीस टोरत मोर अंगठी कांॅपत रिहिस।
बिरजू हर एकठन धान ला लेके मुंॅहू मा डार दिस।
दाईः- कइसे लुक्कड़ हस रे, इ बैरीमन के मारे कोन्हों नेम धरम जो बांचे।
बप्पाः- का होइस, कड़कत काबर हस?
दाईः- नवा खाय के पहिली नवा धान ला जुठार दिस, देखत नीआ।
बप्पाः- अरे, इमन के सबो कुछू माफ हावय, चिरई चिरगुन ये येमन। हामन दुनों के मुंॅहू मा नवा खाय के पहिली नवा अन झन परे।
चंपिया:- धान ला दांत मा चाबके- अतका गुरतुर चाउर।
बिरजूः- अउ कहरत घलो हवय नी रे दिदिया।
बप्पाः- रोटी ओटी तियार हो गिस ना।
दाई:- नीही, जाय के ठीक ठिकाना नीए अउ रोटी बनाथे।
बप्पा:- वाह खूब ह, तुमन, जेकर मेर बैला हवय, ओला गाड़ी मंगनी नी मिलही का भला, गाड़ीवाला मनला कभू बैला के जरूरत होही, पूछिहांॅ, फेर कोयलीटोला मनला, ले जल्दी रोटी बना ले।
दाई:- बेर नी होही।
बप्पा:- अरे, टोकरी भर रोटी तैंहर पलक मारत बना लेथस, पांच रोटी बनाय मा कतका बेर लागही?
बिरजू:- मइया बेकार रीस करत रिहिस ना।
दाईः- चंपिया, जरा धौलसार ले ठाढ़ होके मखनी फुआ ला आवाज दे ना।
चंपिया:- फुआ- आ, सुनत हस फुआ, मइया बलात हवय।
मखनी फुआः- हांॅ, फुआ ला काबर गुहारत हस, सबो ओला मा एकेझिन फुआभर तो हवय बिना नाथ पगहिया वाली।
दाईः- अरी फुआ, ओ बेरा बुरा मान गे रेंहे, नाथ पगहिया वाले ला आके देखा, दूपहर रात मा गाड़ी लेके आय हावय, आ जाना फुआ, मैंहर गुरतुर रोटी बनाय नी जानों।
मखनी फुआः- खांॅसत आथे- एकरे बर घरी पहर दिन रहत पूछत रहेंव, नाचा देखे जाबे का? केहे रइथे ता पहिली ले आपन अंगीठी छपचा दे रइथे।
दाईः- घर मा अनाज दाना बगैरह ता कुछू नीए, एक बागड़ हवय अउ कुछू बरतन भाड़ा, सो रात भर बा इहांॅ तमाखू राख जाथों, आपन हुक्का ले आने हस ना फुआ।
मखनी फुआः- फुआ ला तमाखू मिल जाही ता रात भर का, पांच रात ले बइठ के जाग सकत हों। ओ हो हाथ खोलके तमाखू राखे हे, बिरजू के दाई हर, वो सहुआइन, राम कहा, ओ रात अफीम के गोली साही, एक मटर भर तमाखू राख के चल दिस गुलाब बाग के मेला मा अउ केहे रिहिस डिब्बा भर तमाखू हवय।
बिरजू के दाई चुल्हा छपचाय लागिस, चंपिया सक्करकांदा ला पिचकोले लागिस, बिरजू मुड़ी मा कराही ला राख के आपन ददा ला देखाथे।
बिरजूः- मलेटरी टोपी, एमा दस लाठी मारिहा तभू ले कुछू नी होय।
सबो हांॅसथे।
दाईः- तसका मा तीन चार बड़खा सक्करकांदा हावय, दे दे बिरजू ला चंपिया, बिचारा संझा ले –।
चंपियाः- बिचारा झन कह, मइया, खूबेच सचारा हावय, तैं का जानबे, कथरी के तरी
मुंॅहू काबर चलत रिहिस बाबू साहब के।
बिरजूः- ही ही ही बिलेक मारटिन मा पांच सक्करकांदा खा डारेन, हा हा हा।
सबो हांॅसथे।
दाईः- एकठन कनवा गुड़ हवय, आधा दांे फुआ?
मखनी फुआः- अरी सक्करकांदा तो अतका मीठा रइथे, अतका काबर डारबे?
बैलामन दाना कांदी खाके एक दूसर के देंहे ला चाटत हें, बिरजू के दाई तियार हो गिस, चंपिया छींट के साढ़ी पहनीस, बिरजू बटन नीए ऐकर सेती पटवा के डोर मा बंॅधवाय बर लागिस।
दाई:- अतका बेर का रेंगोइयामन रूके होही।
बिरजू के बप्पा बिरजू के दाई ला एकटक देखत हावय, मानो नाचा के पान के मेम। गाड़ी मा बैठिस ता बिरजू के दाई के देंहे मा अजीब गुदगुदी लागे बर लागिस।
दाई:- गाड़ी मा आभी बड़ जगह हावे, थोरे जवनी सड़क ले गाड़ी ला ले जाहा।
बिरजूः- उड़नजहाज साही उढ़िया बप्पा।
बप्पा:- रोवत सुनके- अरे जंगी भाई कोन रोवत हे अंगना मा?
जंगीः- का पूछत हस, रंगी बलरामपुर ले नी लहुंटिस हे, पतो नाचा देखे कइसे जाय, आसरा देखत देखत ओती गांव के जमो मइलोग चल दिन।
दाईः- अरी टीसनवाली तैं काहे रोवत हस, आ जा झट ले कपड़ा पहिरके, सारी गाड़ी परे हावय, बिचारी आ जल्दी आ।
सुनरी:- गाड़ी मा जगहा हावे, मैंहर घलो जाहांॅ।
लरेना के बीबी घलो आथे।
दाईः- जे बांचे हावा सबो आ जावा जल्दी।
तीनों झन आथे, बैला हर पीछू के पांय फेंकथे।
बप्पाः- साला, लात मारके खोरी बनाबे पतो ला।
सबो हांॅसथे।
दाई:- रोटी देत – खा लेवा एकेक करके, सिमराहा के सरकारी चुंआ मा पानी पी लिहा, अच्छा आप एक बैसकोप के गीत गा तो चंपिया, डरात हस काबर, जिहांॅ भूला जाबे, बगल मा मास्टरनी बैठिस हावे।
बप्पाः- चल भइया, अउ जोर ले, गा रे चंपिया, नीही ता बैला मनला धीरे धीरे रेंगे बर किंहा।
चंपिया:- चंदा की चांदनी—-।
बिरजू के दाई जंगी के पतो ला देख के सोचत हवय, गौना के साढ़ी ले एक खास किसिम के गंध निकलत हवय।
दाईः- मनेमन- ठीके तो किहिस हे ओहर, बिरजू के दाई बेगम हावे, येहर तो कोन्हों बुरी बात नीए, हांॅ वोहर सिरतोच पान की मेम हवय।
बिरजू के दाई के मन मा आप कोन्हों लालसा नीए, ओला नींद आवत हवय।

फणीश्वर नाथ रेणु की लालपान की बेगम कहानी से
एकांकी रूपान्तरण:- सीताराम पटेल

सिरीपंचमी का सगुन

जान चिन्हार
सिंघाय कहारः- किसान
माधोः- सिंघाय कहार का बेटा
जसोदा:- सिंघाय कहार की घरवाली
कालू कमार:- एक लोहार
कमला:- कालू कमार की घरवाली
गंॅजेड़ियाः- बूढ़ा रेलवे मिस्त्री
धतुरियाः- जवान रेलवे मिस्त्री
कोटवारः- हांॅका लगोइया
हरखूः- गांॅव का किसान
मनखे 1,2,3,4,5,ः- सभी किसान
गांॅजा, बिड़ी, सिगरेट और शराब पीना स्वास्थ्य बर हानिहारक हावय।
दिरिस्यः 1
ठौर:- सिंघाय के घर
अनमना मन ले सिंघाय आथे, कौंआ बोलथे- कांव कांव
सिंघायः- असुभ, असगुन बोली कौंआ के, टेड़गा फाल, टेड़गा भाग।
माधोः- ददा आगिस, ददा आगिस, सबले पहिली मोर ददा आगिस, मोर बर नानकुन रांॅपा बनवाय ददा, देखों काहांॅ हावय मोर रांॅपा।
सिंघाय अंगना के बरत चुल्हा मा फाल ला फेंक देथे, हा हा करत जसोदा आथे।
जसोदा:- तोर मति मारा गिस हे का? का होगिस हे तोला?ऐन सिरीपंचमी के दिन फाल ला कोन्हों चुल्हा मा फेंकथे?
सिंघाय:- ठीक करेे हों। फालेच ला नीही, आभी नागर ला घलो चूंॅद के।
जसोदाः- चुपे रहा, अलच्छन कुलच्छन बात ला जुबान मा झन लावा। का होइस हे, बोलत काबर नी आ?
सिंघाय:- इसने खेती बारी के।
माधो रोवत हवय, माधो बबुआ, एती आ, रो झन।
जसोदाः- बबुआ ला चुप परात हावस अउ खुदे कलपत हावस,बोलत काबर नीअस, माधो के बापू, बोलत काबर नीअस।
सिंघायः- आप हामन खेती नी करन, माधो के दई,मैंहर तय करे हावौं, आज कालू कमार हर दस झिन के आघू मा मोला बेपानी कर दिस, फाल टेड़गा कर दिस।
जसोदाः- फाल टेड़गा कर दिस?
सिंघायः- दस डेढ़े पंदरा मन धान मैंहर नी दे हवौं, तेकर सेती, अउ दिहां काहांॅ ले पंदरा मन धान, बाप रे।
जसोदा बांॅस के पोंगी से फाल ला निकालत हे।
जसोदाः- खैन धान के बात नी होइस, असल कारन मैंहर जानत हवौं, ओ दिन कालू के घरवाली कमला हर हामर खेत ले एक बोझा कुसियार चूंॅद के ले जात रिहिस, मोर ले गरमा गरम बतकही हो गिस, लइका बर, एक डांॅग नीही चार डाॅंग कुसियार ले जाथिस, कोनहों बात नी रिहिस? फेर बोझाभर कुसियार, बिना पूछे चूंॅद के, ता फेर का कहा जाय, कड़कके कुसियार फेंक दिस, ओई दिन मैंहर समझे रेहें ओ पतलजीभी ला।
सिंघाय:- कब ? कोन दिन?
जसोदा:- इ पांॅच सात दिन होइस हावय।
सिंघायः- तैंहर मोला केहे काबर नीही? अउ कुसियार ला का करे? काहांॅ दे आय?
जसोदा हुक्का बर चिलम बनाय बर लागिस।
जसोदाः- चिलम मा माखुर डारत, — केहे के का बात रिहिस, मइलोग मन मा इसने झगरा होवत रइथे, कुसियार ला मैंहर हाट मा बेंच दें।
सिंघायः- सिरीपंचमी के पहिली काबर झगरा करे बेकार, आप इ टेड़गा फाल ले सिरीपंचमी के नांगर कइसे ठाढ़ करबो।
जसोदाः- जान बूझके झगरा मोल लेय बर आय रिहिस, कालू के घरवाली, ओकर पेट मा बड़ पहिली ले बदमासी पलत रिहिस, आप समझे असल कारन।
सिंघायः- असल कारन, मईलोग मनला सबो कारन मालूम हो जाथे सबा ले पहिली, माधो बबुआ!
जसोदाः- आप ता गलती हो गिस।
सिंघायः- उदास झन हो माधो के दाई।
जसोदाः- उदास नी होवत हों सोचत हावौं, रूकजा।
सिंघाय:- आज सिरीपंचमी के दिन कोन खाही, परेवा काबर निकालत हस माधो के दाई।
जसोदाः- सबर करा, भगवान हर चाही ता, खिचड़ी के पानी उतार दों या फेर तैंहर रांॅधबे।
सिंघाय:- तैंहर जात काहांॅ हस?
जसोदा आधा सेर गोरस, सेर भर अरवा चउर, मंूंॅग के दार धरिस।
सिंघाय:- काहांॅ जात हावस, हाट मा, कहत हवौं, दुनिया के कोन्हों नही छुअय तोर टेड़गा फाल।
जसोदाः- माधो के ददा, तैंहर बइला मनला धो, मैं आभी आत हवौं, पाव कोस भ्ंिांया जात जात जतका बेरा लागिही।
जसोदा चल देथे
सिंघाय:- काहांॅ गिस, भगवान जाने!
माधोः- दई मोर बर रांपा लेबर गिस हावय।
दिरिस्य:2
ठौर:- लुहार सार
कालू कमार फाल बनात हावय, चार पांॅच मइनसे अउ बइठे हवे, एकठन फाल ला जानबूझ के टेड़गा करदिस।
सिंघायः- अच्छा, तैंहर मोर फाल ला टेड़गा कर दे, कालू
कालू कमारः- ता का करथें? ता का करथें? एक नीही दू नीही, पूरा पांॅच साल के खैन बांॅचे हावय, न अगहनी फसल मा ऐ चुटकी धान अउ न रबी फसल मा एक मुट्ठी चना, खैन खातिर कछेरी मा नालिस करे बर तो नी जांॅव, का करथे?
सिंघाय:- ऐन सिरीपंचमी के दिन।
कालू कमार:- ऐन केन बतकही पंचइती बुलाके करबे, सिंघाय, बइठे हवे इहांॅ जुआर भर ले किसान, छोटे बड़े। इमन मेर बिचार कराव।
फाल ला टोकरी मा धर के चल देथे।
सबोझन:- मियाद के घलो एक ठन हद होवत हवय।
दिरिस्य: 3
ठौर:- रेलवे पुल के तीर
जसोदा ले कहानी सुन के गंजेड़िया कइथे।
गंजेड़ियाः- सिरीपंचमी के सगुन लेके आय हस, माधो के दाई।
धतुरियाः- एमा सोचे बिचारे के का बात हवय, मास्टर, पीट देवा फाल।
गंजेड़ियाः- पाछू कोन्हों झंझट करिही गांववाला मन ता।
धतुरिया:- तहूंॅ घलो किसे गोठियाथा मास्टर! रेलवही के हद मा कोन झंझट करे आही, तेमा देहात के मनखे।
गंजेड़ियाः- जसोदा ला देख के मनेमन सोचत हवय- दुपहरिया फूल! बढ़िया बात! बइठ, बइठ आराम ले बइठ।
जसोदाः- जरा जल्दी मिस्त्री जी, सगुन के बेरा मा आप देर नीए।
गंजेड़ियाः- काहांॅ हे टेड़गा फाल?
जसोदा टेड़गा फाल ला देथे, गंजेड़िया ओला आगि मा डारथे, लाली होय के पाछू हेरथे,
धतुरियाः- सौ चोट लुहार के ता एक चोट सरकार के।
लाली टेड़गा फाल ला हेरके निहाई मा राखथे, ठनांग ठनांग ठनांग
जसोदा के मुड़ी के ओनढा घरि घरि सरक जाथे, फाल के पाछू भोथरी रांपा हेरथे।
धतुरियाः- ओनढा मा लुकाके अउ का का राखे हावय, न जाने अउ का का।
जसोदाः- लजात- बस इच रांपा हवय, अउ एकठन नानकन रांपा बना देथा ता, हंॅसिया ला मैंहर सिल मा टें लिंहा।
गंजेड़ियाः- बना दे धतुरिया, बना दे जो जो कहत हे सबो बना दे, रांपा के बेंट हामर मेर नी बनही।
धतुरियाः- अहू हर हो जाही, बड़खा बाकस मा कतकाकन जुन्ना बेंट हावय, धरा दिंहा।
गंजेड़ियाः- गांजा के दम लगात- धरा दे, धरा दे, तैंहर छांॅय मा बइठ गोरसवाली, बना दिही सबो ला, बना दे रे धतुरिया।
सबो बनाय के पाछू जसोदा कइथे।
जसोदाः- काल ले सिरीपंचमी के परसाद दिहां, केला अधपक्का हावय घर मा, गरीब हावन हामन।
गंजेड़िया:- कोन अमीर हे कोन गरीब हे, तोर गोसैंया भला गरीब हे, बस दस दिन हामन इहांॅ रबो, चाय बर पाव भर गोरस लागथे, परदेसी हन।
जसोदाः- पाव भर काबर, रोज मैंहर आधा सेर दे दिहांॅ।
धतुरिया बीड़ी छपचात, जसोदा के आघू मा एकठन बीड़ी फेंक दिस।
ज्सोदा:- मैंहर बीड़ी माखुर नी पीयों भइददा।
जसोदा जात हवय, गंजेड़िया ओला देखत हवय।
दिरिस्य:4
ठौरः- सिंघाय के घर
सिंघाय कंबल ओढ़ के सूतत हावय, पिंवरा धोती पहिर के माधो घुमत हवय।
जसोदाः- बबुआ तोर रांपा।
माधो खुस हो जाथे अउ आपन ददा ला बतात हवय।
माधोः- ददा, जल्दी बइलामला धो, दाई फाल ला सिद्धा करवा लीस हवय,
तोर रांपा मा घलो अंगरेजी बेंट हावय।
सिंघाय:- ऐं! माधो अउ रांपा ला छू के देखथे,- अरे माधो के दाई।
जसोदाः- इसने नींद हे तुंॅहर, अउ इसने का देखत हावस।
सिंघाय हड़बड़ात उठिस, जसोदा अंचरा मा लुकाय टोकरी आघू मा कर दिस।
सिंघाय:- फाल, अरे वाह, इसने धार, अउ ये तोर हंॅसिया, अउ मोर रांॅपा मा अंगरेजी बेट, माधो के दाई, अब आप का कहों, सचमुच तैंहर जादू जानथस।
जसोदाः- रहन दा, घंटा भर मा पांच घ मिजाज बदलथे मरद के, तुरत आंॅखि लालि करके लाठी चलात लाज अउ न दांत निपोरत , दूम हिलात लाज, गांव के मन नागर-बइला धर के निकलत हवय अउ तूंॅ सूतत हावा।
सिंघाय:- तियार होत हों तुरत।
दिरिस्यः 5
ठौर:- भांठा भिंया
कोटवारः- चला– चला– नांगर धरा चला— ए ए ए–हो –ओ ओ ओ —
गांव के जुन्ना रीत हवय, का बारा नांगर जोतोइया बड़खा अउ का एक नांगर जोतोइया छोटे, सबो किसान एक संग नांगर ठाढं करिही।
मनखे1ः- नंगरिहा सबो आगिन, सिंघाय ला छांॅड़के।
मनखे2ः- सिंघाय ला छूटेच समझा।
मनखे3ः- आवत हे, सिंघाय घलो आवत हे।
मनखे4ः- टेड़गा फाल ले सिरीपंचमी करही, टेड़गा फाल ले।
सिंघायः- खांॅध ले नांगर ला उतार के- भगवान के नजर टेड़गी झन होय, फेर फाल ता फाल, सिंघाय के बाल ला घलो टेड़गा नी करे सके कोन्हों।
मनखे1ः- सिरतोच, फाल घलो सिद्धा हावे अउ रांपा के बेंट, बेंट मा पालिस हे, ओकर बेटा के रांपा हर तो अउ फेंसी हवय, लाली बेट, अंगरेजी बेंट।
सिंघाय:- अंगरेजी नीही, जरमनियांॅ, पूजा के पहिली कोन्हों झन छुआ भई, हामन गरीब मनखे काहांॅ ले अंगरेजी बेंट लाबो।
जसोदाः- पूजा करे बर बइठे हावा ता, पूजा करा, अंगरेजी फारसी पीछू छांॅटिहा।
सिंघाय हर पूजा करिस, नांगर जोते के पाछू, जसोदा अठन्नी अउ आमा पान बांधिस, जसोदा अठन्नी साही चमकत हावय, सिरीपंचमी की रात मा होरी गात सिंघाय के ढेंटू में सबो ले जादा रस हवय।
दिरिस्यः6
ठौरः- गांॅव के खोर
मनखे1ः- सगुन सुभ कइसे होइस?
मनखे2ः- माधो के दाई मा नवा चोली बिसाय हवय।
मनखे3ः- माधो के कुरता बाघ छाप कपड़ा के हवय।
मनखे4ः- माधो के दाई चार घंटा ले बइठे रइथे, मिस्त्री मन करा।
मनखे1ः- जेहर बिगड़े सगुन सुभ करिस, ओकर मन राखे बर परे होही।
मनखे2ः- आधा सेर गोरस के दाम तीन घंटा मा मिलथे का? सिंघाय बेखबर हवय।
मनखे3ः- कड़ा पानी के फाल हावे ओकर हर, खूबेच गहियर जोतथे।
मनखे4ः- खेत मा कड़ा होय ले का? घर मा तो माटी के लोंदा होत हवय सिंघाय।
दिरिस्यः 7
ठौरः- लुहारसार
कालू कमारः- आप तो इ गांव मईलोग मन फाल पिटवायबर जात हावय। रेलवे के लुहार के इहांॅ।
मनखे5ः- मइलोग मला झन कहा, एकझन के चलते सबोझन ला बदनाम झन करा, सबो के मईलोग मन हाट बाजार मा सौदा बेचत बिसात हावय, अकारन कोन्हों ला दोख झन देवा, सिंघाय ले कुछू ले दे के निपटारा कर लेवा कालू।
कालू कमार कलेचुप लोहा ला लाली करत हवय।
दिरिस्य:8
ठौरः- खेत के पार
सिंघायः- कुकुर साला! नी देखत हस, मोर खेत मा तोर बइला चरत हवय।
हरखूः- सिंघाय जरा धीरे बोल, जान बूझ के मैंहर, तोर खेत मा नी छांॅड़े हावों, जनावर हे हारा चारा के लालच लगीस होही तरी मा उतर गिस।
सिंघायः- पर तैंहर का करत रेहे रे कुकुर साला।
हरखूः- चुप रह सिंघाय, ये रेलवे के गरमी बड़ देर नही रहय तोर।
रेलवे के गरमी सुन के सिंघाय कठवा साही हो गिस, ओकर बात ओकर दिल मा लग गिस।
दिरिस्य:9
ठौर:- सिंघाय के घर
जसोदाः- सिरीपंचमी के सगुन तो होगिस, एकोदिन मिसतरी मन ले भेंट कर आथे।
आजेच कहत रिहिन मिसतरीमन।
सिंघाय:- आज अबेर मा खैनी तमाखू देबर हवय मिसतरी मला।
जसोदाः- आप अबेर कुबेर के मैंहर तो नी जांव खैनी तमाखू लेके।
सिंघाय:- आज मंॅइच हर जात हवौं, देखंव तोर रेलवे मिसतरी मनला।
हरखू के बात ठीक हवय की तोर, आजेच देखे बर हवय, माधो काहांॅ गिस हे, तैंहर आज उदास काबर हस माधो के दाई, एती सुन तो जरा।
जसोदा मुचमुचाथे।
दिरिस्य:10
ठौरः रेलवे पुल के तीर
सिंघायः- राम राम मिसतरीजी, मैंहर माधो के ददा हावों।
गंजेड़ियाः- राम राम , माधो के ददा।
धतुरियाः- गोरसवाली के घरगोसैंया?
गंजेड़ियाः- ओ ओ, गोरसवाली के घरगोसैंया? टेड़गा फालवाला। बइठा बइठा का नांव हे तोर।
सिंघाय:- मोर नांव सिंघाय कहार हवय।
गंजेड़ियाः- ओ ओ, पर सिंग रहत घलो, ओ ओ, कहार न हो, तोर गांव के कमार के का नांव हे, कालू कमार, ओ ओ, बस एके लइका, पहिला बेटवा, ओ ओ, भैंसिन तोर दुधारी हावय, दू सेर दूध देथे, ओ ओ, कुसियार के घलो खेती करथा।
सिंघायः- मनेमन- बड़ रसिया हवय, डोकरा मिसतरी हर, गोरसवाली।
चाहा पिलाथें, सिंघाय पहिली घ चाहा पिअत हे, पहिली पीते पिअत हांेठ हर जर जाथे। दूनों हांसथे।
गंजेड़ियाः- ओ ओ, फूंॅक के पिया, देखत हवौं तोर ले हुसियार तोर गोसानिन हर हावय।
तीनों झन गांजा पीथे।
सिंघायः- हामन सधारन किसान नी होवन, राज कहार अन, हामर पुरखा मन राजा रानी ला ढोंय डोली मा, मैंहर आइ साल ले अखाड़ा के माटी ला मोर देंहे मा पचोय हवौं, भैंसिन के गोरस–।
गंजेड़ियाः- ओ ओ, बड़खा बड़खा अखाड़ा के पहलवान घलो मईलोगन के फेर मा परके, एक साल मा चित पर जाथे, समझे, मईलोग का हवय लोहा ला गला देथे।
धतुरियाः- भैंसिन के गोरस अउ अखाड़ा के माटी के मुंॅहूजबानी बयान खूब सुनेन, दू हथोड़ा चलाहा ता जानबो।
सिंघाय मुड़ी मा पागा बांध के हथोडा चलाय बर लागिस।
गंजेड़ियाः- ओ ओ, संभाल के ए ए ए।
धतुरिया के हाथ ले संड़सी सहित लोहा छूटके छिटक जाथे, बाल बाल बांचथे सिंघाय के जवनी गोड़।
गंजेड़ियाः- ओ ओ, ऐसी देह वाले का फाल टेड़गा कर देत हवय, गांव के कमार लुहार, का धरिस हवय, गांव मा, सहर मा तोर जइसने मनखे कमा के साल मा मगरमस्त हो जाथे। हामर साहब अबड़ बढ़िया मनखे हावंे, ओकर तोर जइसने बड़ जवान मला नौकरी दिलाय हवय, तैंहर गांव मा आपन हाड़ा बेकार गंवात हावस, तैंहर सोच बिचार के देख, घर बाहिर मिलाकर राय बात करे।
सिंघायः- कइसने राय बात, गांव छांॅड़े के, माधो के दाई ले, सहर जाय के बात घर मा सुनाके घर मा झगरा कोन मोल लेय, एक तो मोर गोसानिन, सहर अउ सहरवाला मन ले चिढ़े रइथे। दूसर हामन ठहरेन गांव गंवई के मनखे, खेत कोठार मा बेकार परे रइबो ता कोन्हों बात नीए, सहर मा तो–।
धतुरियाः- तोर गोसानिन तो कहत रिहिस, गांव ले बाहिर नी जाय मोर गोसैंया।
सिंघायः- सहर के आदमी के का परतीत, हांॅस हांॅस के बात करिही, करेजा भीतर हाथ धरिही, गांव के बहू बेटी का जाने?
गंजेड़ियाः- ओ ओ गोरसवाली।
सिंघायः- गोरसवाली झन कहा, बड़ खीख लागथे सुने मा।
सिंघाय घर लहुंॅटत राम राम कहे बर भूला गिस।
धतुरियाः- काल ले जल्दी भेज देबे गोरस लेके।
सिंघायः- कल गोरस नी होय।
दिरिस्य: 11
ठौर:- लुहारसाय
कालू कमार काम करत हावय, सिंघाय कहार आथे।
कालू कमार:- मैंहर घलो तोर मेर मिलके बात करे बर चाहत रेंहे। फेर तोर घर के बोहो हर कुसियार छीन के बेपानी कर दिस मोर गोसानिन ला। नीही ता तइंच कह, कभू खैन के तकाजा करे हवौं।
कमलाः- अहा हा, सिंघाय ला दोख झन देवा कोन्हों, मनखे नीही मिसरीकंद हे, फेर आप जान द का कहों, कतक झन कतक बात करथें, रेलवे मिसतरी मन के का ठिकाना।
कालू कमार:- फेर एक लइकावाली मइलोग, डोकरी नीही। जवान जहान के मति हवय आभी, फेर तोर गोसानिन तो लछमी हवय, लछमी।
कमलाः- लछमी सिंघाय ल लेके सहर उड़े बर कल कांटा ठीक करोइया बोहो।
कमला जाथे।
सिंघाय:- एकठन बात हावय, आपन लइका के सपथ खा के कहत हवौं, काकरो सो नी कइबे, रेलवे के बात हवय, इकरे खातिर थोरकुन डरात हवौं, पुल के तरी पानी मा लोहे के नान नान टूटे ला डाल देथे काम करत करत।
कालू कमार:- काहांॅ पुल के तरी, पानी मा, जरूर वो लोहा हाट के लुहार के पेट मा जाही, कब तक काम चलही इहें।
सिंघायः- बस काल तक। रात के वोमन माइल घर मा चल देथें। मोर बर एक ठन टंगिया बना देबे कालू भईददा।
कालू कमारः- एकठन टंगिया, चल पहिली कुछू खा पी ले, फेर बात करबे।
कमला खाना परोसथे।
कमला:- तोर ले खैन धान कोन मांॅगत हवय, हमनला हिरदे के भूख हवय।
दिरिस्य: 12
ठौर:- लोहार सार
रेलवे ले दुनों लोहा चोरी कर घर लाथंे।
कालू कमार:- तैंहर हथौड़ा चला देबे ता चार भाग मा एक भाग तोर हो जाही, लकरी के बूता मा मोर दुनों लइका के देंहे खराब होगे हे, चार हथौड़ा नी पीट सकें, कोयला मोर घर मा बड़ हवय।
सिंघाय मान गिस, दुनों बूता करे लागिन।
कालू कमार:- वाह सिंघाय भई, आप आज रहन दे, बिहान पहा गिस, तोर गोसानिन सिरतोच लछमी हावय, ओहर का जतन ले तोर देहे ला पालीस हावय, इहांॅ तो साली–।
सिंघाय:- चिलम तियार करत- का बिहनिया मइलोगमन के बात लेके सुरू कर दे, घटरमेन!
कालू कमार:- नीही सिंघाय भईददा, मईलोगमन के बात मा परके मैंहर तोर सो मनमुटाव कर लें, अउ मइलोग हर तोर बिगड़े सगुन ला सुधार दिस, मइलोग मइलोग के बात हवय।
सिंघायः- पहिली अंदाज बताव कि कतका हिसाब बनिही?
कालू कमार:- तैंहर निस्चिन्त होके आप जा घर, आराम कर, तोर गोसानिन रात भर नी सूते होही।
दिरिस्य:13
ठौर:- सिंघाय के घर
सिंघाय आथे, जसोदा सूतत हवाय, जगाथे।
जसोदाः- हे भगवान! खूब हस तैंहर, संझा के तारा उगे ले बिहनिया के तारा के बूड़े तक टकटकी लगाय बइठे हवौं, माधो भूख मरत सुत गिस, काहांॅ रहा माधो के ददा रतिहा भर।
माधोः- सपनात हवय – मोर रांपा कोन्हों झन लिहा।
सिंघाय:- चुप रे।
जसोदाः- तोर देंहे ले लोहाइन गंध आत हावय, गोड़ मा जिहां तिहां खोमचाय हवय, हाथ हे राम, हाथ मा अतका फोरा कइसे हावय।
कुकरा बासिस, सिंघाय के नाक बाजिस।
दिरिस्य: 14
ठौर:- सिंघाय के घर
सिंघायः- माधो के दई, बइठ, तोर जी गांव मा नी लागत हवय, सहर जाय बर चाहत हस, बोल इहांॅ का धरिस हवय? कह ना सबो कुछू?
जसोदाः- का होगिस तोला, कह ना, कइसने अलच्छन भरे बात करत हावा, सहर जाय बर रथिस ता सिरीपंचमी के सगुन काबर? मोला का लक्का परेवा समझत हावा, उढ़ियाय बर छटपटात हवय जी मोर, माधो के ददा, इसने मोर कोति झन देखा आप, सच कहत हावों सिल मा माथा कूट के मर जाहांॅ मैंहर, मोला चार लाठी मार लेवा, फेर इसने बात झन करा।
सिंघायः- हांॅस के – कालू तोला ठीक जानिस हावय।
जसोदा:- दूसरमन के बात मा परके–।
सिंघाय जसोदा के गरदन ला धरके झिंझोड़िस, जसोदा के चूंदी बिछागिस।
सिंघायः- मोर का आपन आंखी नीए बही, एती सुन तो–।
सिंघाय जसोदा के मुंॅहू ला निहारत रहय।
जसोदा:- छिः माधो के ददा, का होगिस तुंहला, रोत काबर हावा?
माधो रांपा ले तुलसी के एकठन बिरवा उखान लानिस हावय।
माधो के ददा, एती देखा, माधो ला देख के कहा, आप कभू इसने काम नी करों, तैंहर सोच, तैंहर बने करे हस।
सिंघायः- तैंहर फेर बिहनिया, गोरस देबर गे रेहे पुलिया के तीर।
जसोदाः- हांॅ गे रेंहे, उहांॅ कोन गोरस लेथिस आज, दुनों मिसतरी के मूंॅहू सुखाय रिहिस, मोला डोकरा मिसतरी हर पूछिस, कालू कमार ले तोर गोसैंया के मेल होगिस का?
सिंघायः- तैंहर का कहे?
जसोदा:- मैंहर का जानो?
सिंघायः-ओ ओ।
जसोदाः- फेर तोला बताय बर परही, बोला फेर इ रस्दा मा गोड़ झन धरिहा, माधो के ददा।
सिंघाय हर तुलसी के बिरवा हाथ मा लिस, माधो ला कोरा मा लेके किहिस।
सिंघायः- बबुआ, तैंहर फाल रांपा छांॅड़, सिलेट पिसिल धर, हामन बइला सही रेहेन, बइला के बुद्धि।
माधो:- आज तुलसी ला जगान दे पहिली ददा।

सिरीपंचमी के सगुन – फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी से
एकांकी रूपान्तरण- सीताराम पटेल