Category: उपन्‍यास

छत्तीसगढी उपन्यास : भुइयाँ

लेखक – रामनाथ साहू
प्रकाशक – वैभव प्रकाशन, अमीन पारा चौक, पुरानी बस्ती, रायपुर- 492001 (छत्तीसगढ़)
दूरभाष : 0771-4038958 मोबाइल : 094253 58748
मुद्रक : वैभव प्रकाशन, रायपुर (छत्तीसगढ़)
मूल्य : 100 रू.
ISBN : 81 -89244-03-05
( भूमि : ज़मीं : The Land)
छत्तीसगढी राजभाषा आयोग, रायपुर से प्राप्त आर्थिक सहयोग से प्रकाशित

समर्पण
छत्तीसगढ के ‘लोक सुर’ लक्ष्मण मस्तुरिया अउ आन जम्मो छोटे-बडे़ लोक गायक, संगीतकार मन ला जेमन के नाद-बरम्ह हर मोला सदाकाल ले आनंदित करत हावे।

साभार
छत्तीसगढी लोकाक्षर (संपादक श्री नन्द किशोर तिवारी) ला जेहर ये उपन्यास ल अपन जनवरी-मार्च, 2009 अंक-44 बना के छापे रहिस ये सिरिस्टी म सबले बड़का हे अगास…। अगास ले छोट हे हमर मन्दाकिनी हमर सौरमंडल सूरुज हमर पिरथवी। पिरथवी म जल अउ थल भूईयां अउ पानी। पानी से थोर हे… पानी ले कम हे… भृइयां, भूईयां म रचाय सहर नगर… वन डोंगरी नाना विध के रचना एमन के बीच संकेलात खियात अन्न उपजईया खेती के भुईयां। चार आंगुर पेट भरे बर दू आंगुर भूईयां तो बांचे…राम ! खेती के भूईयां सब ले अनमोल… ! येकर मोल? सब ले अनमोल !!





छत्तीसगढी उपन्यास – माटी के बरतन

रामनाथ साहू

छत्तीसगढ राजभाषा आयोग रायपुर के आर्थिक सहयोग ले प्रकाशित

प्रकाशक : वैभव प्रकाशन, अमीनपारा चौक, पुरानी बस्ती रायपुर (छत्तीसगढ) दूरभाष : 0771-4038958, मो. 94253-58748

आवरण सज्जा : कन्हैया, प्रथम संस्करण : 2017, मूल्य : 200.00 रुपये, कापी राइट : लेखकाधीन

समरपन
हिन्दी अउ छत्तीसगढी के बरकस साहित्यकार डॉ. बिहारीलाल साहू जी ला सादर समरपित !




अध्याय – 1

दूनों परबत के मांझा म जात वो सॉकर डहर जइसे चलत-चलत जाथे तौ वो पहुँचथे रैनपुर । हाँ …,वो गाँव के नाव रहिस रैनपुर अब ले… घलो वोला वोइसनेहेच कथे ।
जब दूनों परबत के माथा मन ह सुरूज नरायन के पहिली किरन ल छूथें वोकर पहिली ये गाँव हर जाग जाय रथे। सुरूज नरायन ल ए गांव वाला मन ला… चलौ अब उठा कहे बर नई लागै। सुरूज नरायन अपन खाता म ऊँकर हर करनी के हिसाब राखथे… ए विस्वास हर ये गाँव के सब्बे रहवासी मन म कूट-कूट के भरे हावै वोकरे खातिर ऊँकर आत ले सब एकदम तियार… अपन-अपन बूता म… । बिहनिया ले संझा तक।
बिसराम बाबू रैनपुर के मंझोलन काठी के मनखे । मंझोलन काठी एकर बर एक दू घर ला वोहर अपन ले अब्बड उच्च मानथे,उँहे दू चार घर ल अपन ले कम घलो । फेर येहर वोकर मानना ये। जडन घर म साल भर म गिनबे तौ कम से कम छह महीना बरोबर बने कर के संझोती बेरा हॉडी नई चढे वोहर कई सन मंझोलन आदमी ! फेर विसराम के संतोस ल का करबे जेकर सेती वोला अपन ले पोठलगहा मन ल देख के अमरिसई नइ होवे फेर अपन ले तरी मन ल देखके जरूर संताप होथे।
कनकी बाई आईस बोकर डहर। कनकी बाई वोकर जीवन साथी सात भाँवर के बरे-बिहाय । वोहर आईस वोकर करा अउ तीर म बइठ गिस डेहरी म ! विसराम हर गेरवा बनाय के खातिर डोर मन ला जोड-तोड करत रहिस।
”कस हो… सुनत हा…।” – कनकी कहिस।
” यहींच तो बईठे हों तोर आगू म… ।” विसराम डोर ल फेसोत कहिस हाँस के… ।
‘ ‘संझोती बर…”
” कहि ले पूरा के संझाती बर अठिया नई ये… । कोन हे एकरा सुनइया।”
‘ठीक हे कनकी… संझौती बर हमर घर अढिया नईये…।”
”फेर जाके किंजर देख… कै झन के घर अभी बिहनिया चूल्हा चढे है।”
करा तो कुछू कहना भी पाप हे…।” कनकी बाई थोरक रिसावत कहिस।
”का सिरतोच संझा बर नई ये…?”
”मैं करा ठठ्ठा-मसखरी करिहाँ?” कनकी तुरंतेच कहिस । येला सुनके विसराम सिरतोच गुनान म पर गिस ।
विसराम उठिस अपन जघा ले गेरवा बनाय ल छोड के… । घर म एक ठन हे गाय… वोहर कै ठन गेरवा ल टोरे सकिही जेकर खातिर दर्जन-दर्जन गेरवा बनाके राखे बर लागही। वोहर उठके आगिस अपन भाँठी के तीन… । भाँठी म आगी धधकत रहिस । वोला देख के वोहर मुचमुचाईस | जात जन्मन के वाहर कोहार… माटी के बुता म रमे हे रचे हे… । वोहर करत हे ये बुता ल… वोकर पुरखा करसि हे अब वोकर लईका मन घलो करत हें अड सायद वोकरो लईका… पिचका मन घलो ये बुता ल करिही…।
विसराम देखिस… एकठन भाँठी म आगी हर घुमरत हे… धधकत हे… अउ दूसर भाँठी रचा के माढे हे। थोरकुन धुरिहा म करन वोकर बड्खा बेटा हर खाँचा म माडी भर कन्हार गैरी म रमे रहै । माटी तियार करत रहै । तपती दुपहरी के सूरज हर वोकर मुँह ल करिया परई कस करिया कर देय रहे । खाँचा के उपर म वोकर माथा ले चूहत बूंदी हर गिरत रहै… टप… टप… जइसन वोहर ठान ले रहै कहूँ माटी म पानी के जरूरत परिही त वोकर ये पसीना के बूँदी हर काम आ जाही।
करन उही खाँचा म वोईसनेहेच गैरी मचावत हॉसीस थोरकुन अपन बाप कती ल देखत- ” ददा तैं काबर आये हस ये डहर मंझनिया बेरा म… ।’
” अईसनेहेच आ गयेंव बेटा…
” आगै हस तौ थोरकुन बतर ल देख ले ये माटी के । मोला ये हर थोरकुन गजमजहा लागत हे ।”
”गजमजहा तो पूरा संसार हे बेटा। कोन इहॉ निकता हे सोरा आना खाँटी… सबे कोती मिलावट के राज हे बेटा…” विसराम कहिस अउ आगू बढके खाँचा के माटी ल अपन मुठा म धर लिस। माटी ल मुठियाईस विसराम सब चिक्कट माटी पिल… पिल ले निकल गै फेर हाथ म एकठन गोटर्रा गोंटी बाँचे रहि गइस । विसराम वोला देखके हाँसथे…
”देख अईसन तो हावे ये हर।”
”इही तौ महू हर कहत रहेंव ददा । बतर ह ठीक हे के नहीं।”
”काकर बेटा अस?” – विसराम हॉसत कहिस त करन घलो मुचमुचा उठिस।
”ददा ये पईत तो बड अच्छा माल निकाले बर हे…
” काबर…?”
”ठिकादार हर कहे हावे… जौनमन के बरतन हर अच्छा रहही वोला कुछू न कुछ इनाम-इकराम दिही वोहर…।”
”इनाम दीही वोहर…।”
‘हाँ कहे तो हे वोहर।”
”चल ठीक इनाम लेके आबे अड अपन महतारी ल धरा देबे।”
”ददा…।” करन बोकर मुख ल बने देखत कहिस।
”काय ये…?”
”तैं एक ठन जिनिस ल जानत हस का…?”
”बता… काये तडउन ल ?”
”हमर हाथ ले सिरझे पकाये बरतन मन अब हमरेच हाथ ले नई बेचाय…।”
” हॉ… वो तो हे गॉव गराम के हाट-पटान नन्दावत हे… ।
सिल्वर स्टील के बरतन आवत हे।”
”तेकरे सेती हमर ये जिनिस मन सहर के वो चठक म जाके बैपारी मन के हाथ म खप जाथे। जडन हर बिसाही… चार पइसा दिही तेकरे तो बात ल मानबे।” करन माटी ले बाहिर आके हाथ धोवत अपन ददा के आधू म ठाढ हो गै।
विसराम वोला देखत रहिस…। देखतेच रहिस वोला आँखी गड्य के… कइसे पचहत्था चेलिक फुट गै हे ये करन हर… । कालेच्च नानकुन रहिस । कतेक जल्दी बाढ गै अड खाली बाढिस भर नहीं दुनियादारी के गोठ ला वोकर ले जादा जानत हे । वोला निज बुता म, जात जन्मन के काम म चिभिक लेवत देख विसराम ल अब्बडु आत्मसंतोस होइस। बोला लागिस मुडी के उप्पर जउन बड्खा छाता… मस रंग के छाता तनाये हे तउन हर वोकर ले अब बड्खा हे जडन हर दिखत हे, अउ ये टूरा हर वो छाता के दण्डी ल धर के ठाढे हे बोकर आगू म खम खम ले… । वो अब भुला गै के ये छाता धरा लइका के महतारी अउ वोकर सुख-दुख के साथी कनकी बाई हर का कहत रहिस… । ये नीला छाता धरा बलखरहा के पेट भर वोइरे बर दू मुठा… बस्स। बस्स।
विसराम ये गुन… दू मुठा के गोठ लइका सुरता करके ये लइका के मन ल मइला करना नई चाहत रहिस । वो चुपेचाप वोला देखत भर रहिस।
”ददा… !’
”हाँ…।”
फेर खाँचा म…?”
‘ हॉ… नहीं…।”
” कइसे बता नइ बनत हे ।”
”ये… ! वइसन गोठ नोहै बेटा…
”त फेर का बात ए ? तैं चुप काबर हवस ?”
”मैं कहाँ चुप बने गोठियावत तो
”ये भातरंधनी हड्या मन बने बनत हावे न…?”
” भात… भातरंधनी… हंड्या! हॉ बने बनत हे।” विसराम कहिस तहाँ ले फेर अपन जेवनी हाथ के तरजनी अंगुरी ले वो माटी कोती इसारा करे लागिस जेती खेप के खेत हँडिया म बन के माढे रहें। बोला लगिस के वोहर अब अपन आप ल अउ न रोके सकै वोकर मुख ले कनकी के हंडिया अउ भात के गोठ निकलिच जाही अड ये लइका के मन हर मइला होही… मन मइला होही त देंह गरूवा जाही… ।
” अड बेटा तैं… वो दुलपुतरी बनाय के नही…?”
”ये देख तो… करन माथा ला छूवत कहिस, ” मरे कस भुला गयेंव।”




छत्‍तीसगढ़ी उपन्‍यास : जुराव

कामेश्‍वर पाण्‍डेय

Jurav Kameshwar Pandey‘कुस’ का बड़बड़ाइस, भीड़ के हल्ला-गुल्ला मं समझ मं नइ आइस। नवटपा के ओहरत सुरुज हर खिड़की मं ले गोंड़ जी के डेरी कनपटी लऽ तमतमावऽथे। भीड़ के मारे सीट मं बइठइया सवारी घलउ मन के जी हलकान हे। देंव हर ओनहा-कपड़ा के भीतर उसनाए कस लगऽथे। ऊपर ले पंखो हर गर्राटेदार तफर्रा लऽ फेंकऽथे। मनखे के मुँह बार-बार सुखावऽथे। कतको झन के दिमाग तो टन्न-टन्न करऽथे। डब्बा हर कोचकिच ले भर गै हे। सीट मं तो खूब करके रिजर्वेसन वाला मद्रासीच मन बइठे हें। छत्तीसगढिय़ा मन बर तमिल, तेलगु, कन्नड़, मलयाली, सबे मद्रासी। लिंक एपरेस हर ओमन लऽ अपन देस जाए बर सीधा अउ सुभीता परथे। बाकी लोकल बैपारी, कामगार, किसान बोगी मं भरे हें। सीट मन के बीच तक मं इहॉ-उॅंहा ले अकबकावत अउ बकबकावत मुंडीच-मुंडी। गठरी-मोटरी लेहे आदमी औरत धंसे परऽथें। ओला रोके के बहाना करत ‘कुस’ अपन डेरी गोड़ लऽ सामने प्रभा के सीट मं तान देहे हे जउन भीड़ के दबाव मं ओकर सरीर लऽ छूवऽथे। प्रभा ‘जय’ कती खसक के ए समस्या के निराकरन करिस अउ ‘कुस’ अपन गोड़ लऽ हटा लिहिस, लेकिन नीचे ओकर पॉंव तक अड़ाएच रखिस, ताकि भीड़ हर धॅंसे मत पावै। बइठइया तक मन लऽ अपन जघा मं हलाई-डोलाई हर मुस्किल हो गए हे, लेकिन ए फेरी वाले सिंकिया सूर मन कइसे अपन बड़े-बड़े बाल्टी, टुकनी, पेटी मन ल धरे, गुंथाए भीड़ लऽ अपन कोहनी में हुदरत अउ तॅंउरत कस आत्ते-जावत रथें।
(उपन्‍यास अंश)








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तॅुंहर जाए ले गिंयॉं

Tuhar Jaye le giyanतॅुंहर जाए ले गिंयॉं श्री कामेश्वर पांडेय जी द्वारा लिखित आधुनिक छत्तीसगढ़ की स्थिति का जीवंत चित्रण तो है ही, संघर्ष की राह तलाशते आम आदमी की अस्मिता के अन्वेषण की आधारशिला भी है। इसे छत्तीसगढ़ की अस्मिता पर लिखित और ‘हीरू के कहिनी’ के बाद प्रस्तुत 21वीँ सदी का श्रेष्ठ औपन्यासिक साहित्य भी कहा जा सकता है। छत्तीसगढ़ के माटी पुत्र श्री कामेश्वर पांडे पिछले 10 वर्षोँ से लगातार श्रम और शोध के द्वारा इसे परिष्कृत—परिमार्जित करते हुए अब प्रकाशन के लिए तैयार हुए है।
उपन्यास मे जहाँ छत्तीसगढ़ी मजदूरों के पलायन की पीड़ा है, वहीं छत्तीसगढ़ी जनजीवन पर वर्चस्ववादी सभ्यता का दबाव, स्थानीय जनपत पर परदेसियों के शोषण का प्रभाव, अपने ही घर में मेहमान के रुप में तब्दील हो जाने का उदभाव और नव उदारवादी औद्योगिक सभ्यता के प्रलोभन और प्रदूषण से उन्मुक्त होने का सात्विक भाव उद्घाटित है। उपन्यासकार इसमें यह स्वप्न भी देखता है कि छत्तीसगढ़ी मनुष्य आलस्य को त्याग कर श्रम—साधना और कर्मठ जीवन को अंगीकार करें,उंच—नीच व अमीर—गरीब जाति—पाति के अलगाव से अलग होकर पारस्परिक सद्भाव को अंगीकार करें तथा उदार सांस्कृतिक विरासत को संजोते हुए अपनी सामासिकता, विशाल हृदयता और भलमनसाहत की छाप छोड़ने में सक्षम हो सके, अपनी निरीह छवि से मुक्त हो सके। इस उपन्यास की एक और खूबी यह भी है कि यह केवल पारम्परिकता और ग्रामीण जीवन को ही आंचलिकता का पर्याय न मानकर आधुनिक जीवन—बोध की जटिलता, नागर संस्कृति की संवेदनहीनता और अभीजन वर्ग की चेतनता से सरोकार रखकर सर्वथा युगीन संदर्भों से जुड़ती है।
डॉ. विनय कुमार पाठक
(फ्लैप मेटर)

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