भटकुल नानचुन गांव रथे, फेर ऊंहा लड़ई-झगरा अऊ दंगा असन बुता होवते राहय। ऊंहा के गंउटिया इही झगरा के पीरा ल नई सही सकीस अऊ परलोक सिधार गे, ओखर माटी पानी में पुरा अतराब के मनखे सकलइस, ओमा एक झन साधु घलो आय राहय। वोहा गंउटिया के ननपन के संगवारी रथे, वोहा गंउटिया के जिनगी के हर-हर कट-कट ल जानत रथे, गंउटिया हा एक घंव अपन मया बिहाव बर जात बदले रथे, फेर ये बात ल ज्यादा मनखे नई जानय। गंउटिया के परवार वाला मन अपन छाती पीट के रोवत…
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बंटवारा
बुधारु अऊ समारु दूनों भाई के प्रेम ह गांव भर में जग जाहिर राहे ।दूनों कोई एके संघरा खेत जाय अऊ मन भर कमा के एके संघरा घर आय । कहुंचो भी जाना राहे दूनों के दोस्ती नइ छूटत रिहिसे ।ओकर मन के परेम ल देख के गाँव वाला मन भी खुस राहे अऊ बोले के एकर मन के जोड़ी तो जींयत ले नइ छूटे । बिचारा बुधारु अऊ समारु के बाप तो नानपन में ही मर गे रिहिसे ।बाप के सुख ल तो जानबे नइ करत रिहिसे ।ओकर दाई…
Read Moreसाहित्य हरे अंधरा के तसमा
मटमटहा राम हा नवा-नवा साहित्यकार बने रथे, ओकर लेखनी के चारो खुंट परसंसा होथे वोहा कम दिन मे ज्यादा नाम कमा डरथे, त वोला लागथे के वोहा सबे जिनिस ल जान डरे हे अऊ इही बात के घमंड में साहित्य ल बिन जाने समझे जेन मिले तेन ल साहित्य काय आय कइके पुछथे, वोहा सबले पहिली अपन संगवारी साहित्यकार मन ल पुछथे, त बड़ सुग्घर जवाब पाथे, एक झन कथे साहित्य तो अंतस के दरपन आय, फेर मटमटहा अपन घमंड पाय के जवाब ल नई समझे, वोहा दुसर संगवारी ल…
Read Moreगाय निकलगे मोर घर ले
समारू आज गजबेच अनमनहा हे। 40 बच्छर ले जौन कोठा म पैरा, कांदी, भुसा, कोटना म पानी डारत रहिस ओ आज सुन्ना परगे। पांच बच्छर के रहिस तब ले अपन बबा के पाछू पाछू कोठा म गाय बछरु ल खाय पिये के जिनीस देय बर, गाय ,बछरु , बईला, भईसा ल छोरे बर सीख गे रहिस। बिहाव होईस त गऊअसन सुवारी पाईस। कम पढ़े लिखे रहिस त दूनो के खाप माढ़ गे। छै ठन पिलहारी गाय, दू ठन बईला ,दू नंगरजोत्ता भंईसा 4-6 ठन छोटे मंझोलन बछिया बछवा सबो के…
Read Moreकहानी : अलहन के पीरा
गुमान ओ दिन अड़बड़ खुस रहिस जेन दिन ओखर घर लछमी बरोबर बेटी ह जनम लीस। ओकर छट्ठी ल गजबेच उछाह मंगल ले मनाईस, गांव भर ल झारा-झारा नेवता पठोइस। बरा, भजिया, सोंहारी अऊ तसमई संग जेवन कराइस।अरोस परोस के सात–आठ गांव के पटेल , मंडल, पंच, गऊंटिया,बड़े किसान ल घलाव नेवता देय रहीस।बेटी के नांव सरसती राखिस। ओला बेटी पाय के बड़ गुमान राहय। गुमान के अंगना म सरसती ह किलकारी मारत ,खेलत कूदत बाढ़े लागिस। इस्कूल जाय के लाईक होइस तब गुमान ओकर दाखिला करा दीस।नोनी इस्कूल जाय…
Read Moreकहानी : फूल के जघा पउधा भेंट करव
रवि अपन संगवारी उदय संग छोकरी खोजे बर निकरथे, लहुट के गांव म अपन ददा ल जाके कोनहो छोकरी नई भइस कइके बताथे। सरकारी नौकरी करईया पढ़े-लिखे रवि हा जम्मों झन ल पढई-लिखई, रंग-रूप, चिज-बस, गवंईहा-सहरिया कइके कमी खोजिच डारे। ओखर ददा कइथे तेहा अइसने करबे त जिनगी भर डेड़वा रेहे ल परही, भगवान के छोड़ कोनहोच हा सर्व गुन वाला नई मिलय, अऊ फेर जेखर संग तेहा बिहाव करबे तेखर भीतर का गुन हमाय हे तेला कोन जानथे? जिनगी हा तोर नचाय ले नई नाचे, जिनगी म बेरा-बखत के…
Read Moreकहानी : कलम
दू झिन संगवारी रिहीन। अब्बड़ पढ़हे लिखे रिहीन। अलग अलग सहर म रहय फेर एके परकार के बूता करय। दूनों संगवारी एक ले बड़के एक कहिनी कंथली बियंग कबिता लिखय, कतको परकार के अखबार अऊ पतरिका म छपय। हरेक मंच म जावय। फेर दूनों के रहन सहन म धीरे धीरे अनतर बाढ़त रिहीस। एक झिन अबड़ परसिद्ध अऊ पइसा वाला होगिस, ओकर करा गाड़ी बंगला अऊ सरकारी पद होगे। दूसर ल परसिद्धि मिलना तो दूर, अभू घला गोदरी ओढ़इया, चटनी बासी खवइया अऊ फूटहा खपरा के घर ल टपर टपर…
Read Moreचिरई चिरगुन अतका तको नईये, वाह रे मनखे
एसो के देवारी गाँव गे रेहेव, गाँव जाथव त तरिया म नहाय के अलगे मजा रहिथे, अईसे लागथे बुड़ के नहाबे त कभू तरिया में नहाय नई रेहेव। नाहवत नाहवत मोर नजर तरिया पार के बंभरी के रूख म गिस जेमे पड़की चिरई ह खोंदरा बनाय रहाय, खोंदरा म दू ठक पिला ह चोंच ल निकाल के झाकत राहय। माई चिरई मन चोंच म दबा के चारा ल ला लाके खवावत रहाय, घेरी बेरी फुदुक फुदुक के आवय चारा ल खवावय, मेंहा कठ खागेव पिला मन के चारा खवई ल…
Read Moreकहानी : अंधविसवास
असाढ के महिना में घनघोर बादर छाय राहे ।ठंडा ठंडा हावा भी चलत राहे ।अइसने मौसम में लइका मन ल खेले में अब्बड़ मजा आथे। संझा के बेरा मैदान में सोनू, सुनील, संतोष, सरवन, देव,ललित अमन सबो संगवारी मन गेंद खेलत रिहिसे। खेलत खेलत गेंद ह जोर से फेंका जथे अऊ गडढा डाहर चल देथे । सोनू ह भागत भागत जाथे अऊ गडढा में उतर जथे ।ओ गडढा में एक ठन बड़े जान सांप रथे अऊ सोनू ल चाब देथे ।सोनू ह जोर जोर से अब्बड़ रोथे अऊ रोवत रोवत…
Read Moreखूंटा म साख निही, गेरवा के का ठिकाना
तइहा तइहा के गोठ। धरमतरई तीर नानुक गांव धंवराभांठा, जेमे रामाधीन नाव के मनखे रहय। ओकर दू झिन बेटा आशा अऊ कातिक। परबतिया अऊ रामाधीन अपन दूनों लइका ल एके बरोबर पालीन पोसीन अऊ एके बरोबर सिकछा दीकछा घला दीन। काकर दई ददा जिनगी भर साथ निभाथे, रामाधीन सरग चल दीस। समे बीते ले, लइका मन के कारोबार घला अलग बिलग होगे। परबतिया अपन छोटे बेटा कातिक तीर रहिके, समे समे म सियानी रसदा सिखावत पढ़हावत बतावत रहय। कातिक घला, पूरवज के रीत रेवाज अऊ सनसकार ल, एकदमेच अंगिया डरे…
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